पत्रकार चला रहे जिस्‍मफरोसी का धंधा, एक हिरासत में

बुलंदशहर : शहर में उगाही सहित तमाम गैर कानूनी कामों में लिप्त कथित पत्रकारों का एक और दागदार चेहरा सामने आया है। कोतवाली नगर में दर्ज एक मुकदमे में पुलिस ने जब जांच शुरू की तो सामने आया कि यह फर्जी पत्रकार शहर में जिस्मफरोशी के धंधे में भी लिप्त हैं। फिलहाल पुलिस ने एक फर्जी पत्रकार को हिरासत में ले लिया है। कई और नाम भी प्रकाश में आए हैं।

बुधवार रात एक नाबालिग लड़की तलाशती हुई कंट्रोल रूम जा पहुंची, जहां से उसे नगर पुलिस के हवाले कर दिया गया। गिरधारी नगर निवासी इस किशोरी ने बताया कि 5 फरवरी को उसी के मोहल्ले की पूजा नाम की एक महिला उसे नौकरी दिलाने के नाम पर गाजियाबाद ले गई थी, जहां उसने विजय नाम के अपने रिश्तेदार के घर से ठहराया। 10 फरवरी को उसे पता चला कि पूजा और विजय सोनू नामक एक युवक के साथ उसे 15 हजार रुपये में बेचे जाने की चर्चा कर रहे थे। यह सुनते ही किसी तरह वह मकान से फुर्र हो गई। 11 फरवरी से वह भूड़ में अपने एक रिश्तेदार के घर में रह रही थी।

पुलिस ने तत्काल मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की तो कथित पत्रकारों के जिस्मफरोशी नेटवर्क का खुलासा होने लगा। पुलिस ने मोतीबाग निवासी एक कथित पत्रकार को हिरासत में लिया है। उक्त पत्रकार के बारे में पहले भी एक युवती को घर से भगाने के मामले में पुलिस तक शिकायत पहुंची थी। हालांकि कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। यह भी बताया जा रहा है कि एक और लापता लड़की के बारे में उसे जानकारी है। उक्त कथित पत्रकार के दो अन्य साथी पत्रकारों के नाम भी पुलिस तक पहुंचे हैं।

गौरतलब है कि इस गैंग में वह लोग भी शामिल हैं, जिनके नाम कुछ दिनों पहले डॉक्टरों से उगाही में सामने आए थे। इंस्पेक्टर कोतवाली नगर केएन मिश्रा ने बताया कि पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लड़की का मेडिकल कराया है। जिस कथित पत्रकार को हिरासत में ले लिया गया है, पूछताछ में जानकारी मिली है कि उसने किशोरी के साथ दो बार शारीरिक संबंध स्थापित किए हैं। नाबालिग के साथ उसकी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाना भी गैर कानूनी है। लड़की के कोर्ट में बयानों के आधार पर पुलिस कार्रवाई करेगी। जिस नेटवर्क की चर्चा हो रही है, उसे भी खंगाला जाएगा। (जागरण)

फर्जी पत्रकार एवं दरोगा पुलिस के हत्‍थे चढ़े

उत्‍तराखंड के विकासनगर के थाना सहसपुर अंतर्गत धूलकोट के जंगल के समीपी बंशीवाला में वाहनों की चेकिंग कर अवैध वसूली कर रहे फर्जी दरोगा, सिपाही व पत्रकार को झाझरा पुलिस ने दबोच लिया। गुरुवार सायं दबोचे गए तीनों फर्जी पुलिस कर्मियों व पत्रकार के खिलाफ स्कूटर चालक की तहरीर पर संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।

जानकारी के अनुसार गुरुवार सायं धूलकोट के पास बंशीवाला में तीन युवक चेकिंग कर वाहन स्वामियों को थप्पड़ मारकर डरा धमका कर अवैध वसूली कर रहे थे। इसी दौरान वहां से गुजरे स्कूटर सवार पीयूष अग्रवाल पुत्र बृजलाल अग्रवाल निवासी जमनीपुर के साथ भी तीनों ने मारपीट कर पैसे छीन लिए। पीयूष ने इसकी जानकारी झाझरा चौकी इंचार्ज जगत सिंह को दी। इस पर पुलिस मौके पर पहुंचे। पुलिस को देखकर फर्जी तीनों युवक सकपका गए और भागने लगे, तीनों को पुलिस ने दबोच लिया।

दबोचे गए तीनों युवकों के पास से फर्जी पुलिस का आइकार्ड, फर्जी प्रेसकार्ड बरामद किए गए। पुलिस पूछताछ में आरोपियों ने अपनी पहचान राजीव चौधरी पुत्र सोहन पाल सिंह निवासी ग्राम लीलोन शामली यूपी, संदीप सिंह पुत्र वीरेंद्र सिंह निवासी झाल शामली व सोनू गिरी पुत्र राजपाल गिरी निवासी ग्राम झाल जिला शामली यूपी के रूप में बतायी। पुलिस के अनुसार फर्जी पत्रकार राजीव चौधरी के पास से कई इलेक्ट्रानिक चैनलों के फर्जी आइकार्ड बरामद हुए हैं। संदीप फर्जी दरोगा बना हुआ था और सोनू फर्जी सिपाही बनकर लोगों से अवैध वसूली कर रहे थे। पीयूष की तहरीर पर पुलिस ने तीनों गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया है। (जागरण)

दुर्घटना में वरिष्‍ठ पत्रकार दिलावर सिंह घायल, हालत गंभीर

बिजनौर में हुए एक सड़क हादस में वरिष्‍ठ पत्रकार दिलावर सिंह चौहान गंभीर रूप से घायल हो गए। परिजनों ने उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया, जहां से चिकित्सकों ने हालत गंभीर देखते हुए उन्हें मेरठ रेफर कर दिया। वे बिजनौर से अपनी बाइक पर सवार होकर नहटौर जा रहे थे। कलक्ट्रेट के निकट स्थित साकेत कालोनी निवासी वरिष्ठ पत्रकार दिलावर सिंह चौहान बुधवार को किसी काम से बाइक पर सवार होकर जा रहे थे।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सड़क पर एक जानवर को बचाने की कोशिश में उनकी बाइक फिसल गई, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गये। राहगीरों ने घटना की सूचना 108 एम्बुलेंस और उनके परिजनों को दी। मौके पर पहुंचे एंबुलेंस से उनके परिजनों ने उन्‍हें जिला अस्‍पताला में भर्ती कराया। दिलावर सिंह चौहान की गंभीर हालत देखते हुए चिकित्सकों ने उन्हें मेरठ रेफर कर दिया। जहां उनकी हालत गंभीर बनी हुई है।

स्‍टार प्‍लस इस सप्‍ताह भी नम्‍बर वन, कलर्स ने जी टीवी को पछाड़ा

इंडियन एंटरटेनमेंट टेलीविजन के आठवें सप्‍ताह की रेटिंग आ गई है। इस बार की रेटिंग में बदलाव देखने को मिले हैं. स्‍टार प्‍लस रेटिंग प्‍वाइंट कम होने के बाद भी पहले नम्‍बर पर बना हुआ है, जबकि कलर्स ने जी टीवी को पीछे छोड़कर दूसरे नम्‍बर पर कब्‍जा जमाया है। आइए जानें टैम रेटिंग के आठवें सप्ताह में छोटे परदे पर क्या कुछ बदला और क्या नहीं। स्टार प्लस चैनल पिछले सप्ताह 259 जीआरपी रेटिंग के साथ नंबर वन पर था। बेशक इस सप्ताह इसकी रेटिंग गिर गई है। लेकिन इस सप्ताह भी स्टार प्लस 248 जीआरपी रेटिंग के साथ नंबर वन पर है।

इस बार कलर्स जी टीवी को पछाड़ते हुए दूसरे स्‍थान पर पहुंच गया है। पिछले सप्‍ताह कलर्स की जीआरपी रेटिंग 205 थी जो इस बार बढ़कर 235 पर पहुंच गई है। जबकि जी टीवी की रेटिंग बढ़ने के बाद भी वो दूसरे स्‍थान से घिसक कर तीसरे नम्‍बर पर पहुंच गया है। जी टीवी की रेटिंग पिछले सप्‍ताह 226 थी, जो इस बार बढ़कर 231 पर पहुंच गई है। सोनी ने टीवी पिछले कई सप्ताह से नंबर 4 की पोजीशन बरकरार रखा है। इस सप्ताह सोनी टीवी की रेटिंग में इजाफ हुआ है। जी हां, इस सप्ताह सोनी टीवी 164 जीआरपी से बढ़कर 188 जीआरपी तक पहुंच गया है।

पिछले काफी समय से लाइफ ओके की रेटिंग कमाल नहीं दिखा पा रही थी। लेकिन सातवें सप्ताह में उसने सब टीवी को पीछे छोड़ दिया और आठवें सप्‍ताह में भी अपनी बढ़त बरकरार रखने में सफल रहने के साथ पांचवें नम्‍बर पर काबिज है। पिछले सप्ताह जहां लाइफ ओके की रेटिंग 142 जीआरपी थी वहीं इस बार यह 144 जीआरपी प्वॉइंट्स पर पहुंच गई है। सब टीवी की रेटिंग में पिछले सप्ताह के मुकाबले रेटिंग बढ़ी है लेकिन इस बार सब टीवी 138 जीआरपी प्वॉइंट्स के साथ नंबर छह पर है। जबकि पिछली बार इसकी जीआरपी 136 जीआरपी थी। इसके बाद स्‍टार उत्‍सव तथा सहारा वन का नम्‍बर है।

मजीठिया वेज बोर्ड : बेंच के नहीं बैठने से सुनवाई टली, अगली बहस पांच मार्च से

सुप्रीम कोर्ट में पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए न्यायमूर्ति मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ दायर याचिका पर इस सप्‍ताह बहस नहीं हो सकी. पिछली सुनवाई 14 फरवरी को हुई थी, जिसके बाद अगली तारीख 26, 27 और 28 फरवरी तय की गई थी. परन्‍तु दो सदस्‍यी बेंच के नहीं बैठने के चलते इसे अगले सप्‍ताह तक के लिए टाल दिया गया है. अब अगली सुनवाई 5 से 7 मार्च तक होगी.

14 फरवरी को आखिरी बार पीटीआई की तरफ से वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता केके वेणुगोपाल ने बहस की थी. अगली बहस में सरकार तथा पत्रकार संगठनों के वकील अपना पक्ष रखना है. मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में माननीय न्‍यायमूर्ति आफताब आलम एवं रंजना प्रकाश देसाई की दो सदस्‍यीय बेंच के समक्ष चल रही है. संभावना है कि अप्रैल के दूसरे सप्‍ताह में कोर्ट इस मामले पर अपना फैसला सुना सकती है. इस बेंच के वरिष्‍ठ सदस्‍य न्‍यायमूर्ति आफताब आलम अप्रैल में ही रिटायर हो रहे हैं, लिहाजा पूरी संभावना है कि अप्रैल के दूसरे सप्‍ताह तक इसमें फैसला सुनाया जा सकता है.    
 
गौरतलब है कि मजीठिया वेज बोर्ड पर स्‍टे के लिए आनंद बाजार पत्रिका, बेनेट कोलमैन, इंडियन न्‍यूज पेपर सोसाइटी, यूनाइटेड न्‍यूज ऑफ इंडिया, प्रिंटर्स मैसूर प्राइवेट लिमिटेड, राजस्‍थान पत्रिका, ट्रिब्‍यून ट्रस्‍ट, पीटीआई, जागरण प्रकाशन लिमिटेड, एक्‍सप्रेस प्रकाशन (मदुरई) तथा इंडियन एक्‍सप्रेस ने याचिका दायर कर रखी है. पिछले सप्‍ताह से जारी बहस में आनंद बाजार पत्रिका समेत लगभग सभी मीडिया संस्‍थानों की बहस पूरी हो चुकी है.  
 
उल्‍लेखनीय है कि बीते साल 21 सितंबर को सुनवाई करते हुए कोर्ट ने आठ जनवरी की तिथि तय की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए इसे 5 फरवरी तय किया गया था. कोर्ट ने प्रबंधन को कर्मचारियों को अंतरिम व्यवस्था के रूप में अतिरिक्त भुगतान करने पर विचार का सुझाव भी दिया था. परन्‍तु प्रबंधकों ने ऐसा नहीं किया. सरकार ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के बारे में 11 नवंबर, 2011 को अधिसूचना जारी की थी.

गोधरा दंगों के 11 साल बाद मोदी की सद्धभावना या दुर्भावना!

गोधरा दंगों को पूरे 11 साल हो गए हैं, लेकिन अपने मूल से उखड़े हुए आज कितने लोग निर्वासित की जिंदगी जी रहें हैं. अलीफ दरिया खान पठान कभी गुजरात के वीरमगाम में रहते थे, हांलाकि रहने को पतरे वाली झोपड़ी थी लेकिन वीरमगाम के डाय केमिकल फैक्टरी में उन्हें जीविकोपार्जन के लिए कम से कम 2000 रुपए का मासिक वेतन तो मिल जाता था और उनकी पत्नी भी लोगों के कपड़े सिलकर घर की गुजर-बसर कर लेती थी, लेकिन 2002 में हुए गोधरा दंगों की ऐसी मार पड़ी कि ना केवल वह पतरे वाली झोपड़ी आग में भस्मीभूत हो गई बल्कि घर से बेघर हो गए. अब घर से दूर कड़ी के दिल्ला गांव की राहत छावनी में वे निर्वासित सी जिंदगी गुजार रहें हैं, आर्थिक रुप से तो वे टूटे ही क्योंकि कड़ी में उन्हें 50 रु. की मजदूरी करनी पड्ती है और मजदूरी भी रोज नहीं मिलती.

गुजरात में 2002 में हुए जनसंहार के बाद दो लाख से भी ज्यादा लोग विस्थापित हुए थे, लेकिन 16,087 लोग आज भी ऐसे हैं जो दस साल बाद अपने घरों में वापिस ना लौटकर मुस्लिम स्वैच्छिक संस्थाओं और स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा बनाई गई राहत छावनी में जीवन जीने को बाध्य हैं. और करीबन 83 राहत कॉलोनी में 16,087 लोग नर्क से भी बदतर जीवन जीने जी रहे हैं, क्योंकि इन छावनियों में पानी, गटर, बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है, कितनी अजीब त्रासदी है कि गोधरा दंगों के 11 साल बाद भी इस नर्कागार में रह रहे लोगों के लिए एक ऐसी विभाजन रेखा खींच गई है, जो गोधरा दंगों का दंश भूलने नही दे रही, वो भी ऐसे समय में जबकि गुजरात में रह रहे 4 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय के लिए विकास का दावा करने वाले मोदी ने गुजरात के सभी जिलों में सद्भावना उपवास के साथ करोड़ों रुपए के पैकेज़ की बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर चुके हैं, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अल्पसंख्यकों के लिए यह मोदी की सद्भावना है या दुर्भावना.

ये वे लोग हैं जो अपने घरों में जाने से घबराते हैं, जो 2002 में स्वैच्छिक संस्थाओं और मुस्लिम सेवा संस्थाओं द्वारा बनाई गई राहत छावनियों में रह रहे हैं. हालांकि यूनाइटेड नेशन की ‘’गाइडिंग प्रिंसिपल ऑन डिसप्लेसमेंट’’ की धारा 18 के अनुसार आंतरिक विस्थापित लोगों को सड़क, पानी स्वास्थ्य, शिक्षण आदि जैसी प्राथमिक सुविधाएं मुहैया करवानी चाहिए, लेकिन दस सालों के बाद भी वे इन सुविधाओं से वंचित हैं. और अहमदाबाद की ‘’जनविकास’’ संस्था ने हाल ही में 8 जिलों की 83 कॉलोनियों को रहने वाले दंगा पीडितों को  लेकर सर्वे किया है, जिसमें बताया है कि 33 प्रतिशत मकानों में पीने के पानी की किल्लत है, जिसमें आणंद और अहमदाबाद की स्थिति सबसे ज्यादा बदतर है. आणंद के आनंद शिवराज भाई कहते हैं कि आणंद के 33 गांव में 68 परिवार रहते हैं जहां मस्जिद के पास एक बोर है और उस बोर से सब पानी लेने आते हैं, लेकिन इस बोर का पानी भी पीने लायक नहीं है.

उल्लेखनीय है, कि आणंद के पास ओढ में 27 लोग मारे गए थे, लेकिन आज तक वे लोग वापिस नहीं जा पाए हैं और उन्हीं राहत शिविरों में रहने को बाध्य हैं, वहां ना स्कूल हैं, ना सरकारी अस्पताल और ना आंगनबाडी और ना बालमंदिर है. प्राइवेट स्कूल भी 13 कि.मी. दूर है. वे कहते हैं पिछले दस सालों में हमने कितनी ही अर्जियां तहसीलदार से लेकर जिला आयुक्त और अल्पसंख्यक आयोग को दी, लेकिन उन्होंने सभी अर्जिय़ां ले-लेकर फाइलों का ढेर बना दिया. सरकार योजनाएं पर योजनाएं बना रही हैं लेकिन ना हमारे नाम मकान है और ना ही हमारे नाम बिजली का बिल आता है, और सबूत ना होने की वजह से हमें लोन भी नहीं मिलता. दंगा पीडित अय्यूब भाई जो मसाना के विजापुर से 6 किमी लडोद गांव में रहते हैं, उनका कहना है कि मसाना में इस्लामिक रिलीफ कमेटी ने विस्थापित लोगों के लिए एक कमरे के करीबन 97 मकान बनाकर दिए हैं, लेकिन वहां तो इतना बुरा हाल है कि जहां कि कुछ कॉलोनी में पानी लेने के लिए लोगों को एक गांव से दूसरे गांव में जाना पडता है. कुछ कॉलोनी में तो गटर लाइन जुड़ने के कारण पहले 15 मिनट गंदा पानी आता है, और फिर साफ आता है. मसाना नगरपालिका को कहने के बावजूद भी कोई सुनवाई  नहीं होती.

जनविकास की रिपोर्ट के अनुसार 81 प्रतिशत मकानों में आज भी गटर की सुविधा नहीं है, जिसमें पंचमहल, खेडा, और आणंद जिले की 32 कॉलोनियां भी शामिल हैं. पहले इन मकानों में शौचालयों की व्यवस्था भी नहीं थी, लेकिन लोगों ने जैसे तैसे कर अपने घरों में शौचालय बनवा लिए, लेकिन इस्लामिक रिलीफ फंड मकान इनके नाम नहीं कर रही है, क्योंकि इन्हें डर है कि कहीं ये लोग मकान बेचकर ना चले जाएं, इसीलिए घरों के मकान के बिल इनके नाम नहीं आते.

रिपोर्ट के आधार पर 81 प्रतिशत कॉलोनी ऐसी हैं, जो शहर और तालुका और गांवों से दूर है, जिससे लोग मुख्य (एप्रोच) रोड की सुविधा से वंचित हैं. क्योंकि आणंद, मसाना, साबरकांठा और अहमदाबाद की कॉलोनियों में बारिश में पानी भरने से बच्चों को दूर स्कूल भेजने में मुश्किलों का सामना करना पडता है. जिससे बच्चों की शिक्षा पर असर पडता है. 85 प्रतिशत कॉलोनियों आंतरिक रास्तों की सुविधाओं की कमी से निरंतर जूझ रही हैं. जिससे बरसात में पानी भरने से मलेरिया, डेंगू, हैजा, जैसे रोगों का निरंतर सामना करना पडता है. रास्तों के अभाव में तात्कालिक उपचार के लिए अस्पताल पहुंचना भी दूभर हो जाता है. 41 प्रतिशत कॉलोनियों में स्ट्रीट लाइट की सुविधा नहीं है, सिर्फ पंचमहल, बडोदरा और साबरकांठा जिले के मात्र 50 पतिशत मकानों में ही स्ट्रीट लाइट देखने को मिली है., हांलाकि लोगों का कहना है कि स्ट्रीट लाइट के लिए लोगों ने अपनी मजदूरी से पैसे बचा-बचाकर भरे थे, लेकिन सरकार ने बिजली के खंबे खड़े करने में उदासीनता ही दिखाई.

भारत सरकार द्वारा संकलित बाल विकास योजना का मुख्य उद्देश्य बच्चों का विकास है, लेकिन 55 प्रतिशत कॉलोनियों में सरकार विस्थापित हुए लोगों के मामले में आंगबाडी और अन्य बाल कल्याण जैसी प्रवृतियों में सतत उदासीनता दिखा रही है. जितनी भी प्राथमिक शालाएं हैं वह मकानों से तीन किमी की दूरी पर हैं. जहां तक शिक्षण की गुणवता का सवाल है वह भी संतोषजनक नहीं. सबसे प्रमुख बात यह है कि 85 प्रतिशत कॉलोनियों में कोई भी कम्युनिटी हॉल नहीं बनाए गए हैं, यही कारण है कि हिन्दू मुस्लिम के बीच सीधा संवाद ना होने के कारण समाज से अलग बहिष्कृत जीवन जीने को बाध्य है. आंतरिक विस्थापित लोगों को खाद्य वितरण व्यवस्था द्वारा अनाज और राशन पर्याप्त मात्रा में मिले यह जरुरी है लेकिन 23 प्रतिशत लोगों को राशन का जत्था नहीं पहुंचता. जिन लोगों के पास अंत्योदय कार्ड है वे कहते हैं कि इस कार्ड से अब सरकारी अस्पतालों में गरीबों की चिकित्सा बंद कर दी गई है. अब सरकारी अस्पताल के डाक्टर कहते हैं कि पहले पैसे जमा करो. और अब तो उन्हें राशन मिलना भी बंद हो गया है सिर्फ केरोसीन ही दिया जाता है. लेकिन जिन दंगा पीडितों के पास अंत्योदय कार्ड नहीं है. वे कहते हैं कि हम लोग 10 साल बाद सबूत कहां से लाए, क्योंकि वे राहत शिविरों में रह रहें हैं, और ना ही मकान और बिजली का बिल जो उन्हें भरना तो पड़ता है लेकिन उनके नाम नहीं आता है कि जिसका सबूत वे अंत्योदय कार्ड के लिए दें.

इस सर्वे में कहा गया है कि कुल 16,087 लोगों में से मात्र 159 विस्थापित लोगों को ही अलग-अलग सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं का लाभ मिला है. सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि सरकार के पास दंगों के कारण विस्थापित हुए लोगों की बस्ती में विधवा बहनें, या निराधार लोगों के आंकड़े उपलब्ध नहीं है. जबकि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग़ ने 2006 में राज्य सरकार को हिदायत दी थी कि ‘’अगर किसी महिला ने 2 वर्ष के अंदर पेंशन के लिए आवेदन नहीं किया या अगर किसी विधवा महिला का 18 वर्ष का बेटा है तो वह भी पेशन की हकदार है.’’ लेकिन इस सूचना की कभी राज्य सरकार ने कोई परवाह नहीं की. जनविकास की गीता ओझा का कहना है कि दंगों में विस्थापित हुए लोग आर्थिक रुप से काफी टूट गए और राज्य सरकार ने कभी इस दिशा में प्रयास ही नहीं किए कि लोगों को वापिस सुरक्षा की भावना का अहसास कर अपने वतन में वापिस लाया जाए. इतना ही नहीं दंगा पीडितों की संपत्ति को कितना नुकसान हुआ है या कितनी लूट या जला दी गई है, इस दिशा में कभी तटस्थ जांच भी नहीं की गई है. यही कारण है कि सद्भावना मिशन के बाद भी कोई अपने वतन लौटने को तैयार नहीं है.

अहमदाबाद से ऊषा चांदना की रिपोर्ट.

प्रिंट को हराकर इलेक्‍ट्रानिक मीडिया ने जीता कप, कुणाल बने मैन ऑफ द मैच

चाईबासा के एसआर रुंगटा स्टेडियम में खेले गए मीडिया कप क्रिकेट मैच में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया की टीम ने प्रिंट मिडिया की टीम को सात विकेट से हरा दिया। सिंहभूम जर्नलिस्ट एशोसिएशन द्वारा आयोजित इस मैच में टॉस जीत कर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए प्रिंट मीडिया ने निर्धारित सोलह ओवर में सात विकेट पर 115 रन बनाये, जिसमें पवन सिंह ने 42 और मनीष ने 24 रनों का योगदान दिया. इलेक्‍ट्रानिक मीडिया की और से कुणाल ने तीन और आनंद ने दो विकेट लिए.

जबाबी पारी खेलते हुए इलेक्‍ट्रानिक मीडिया की टीम ने कुणाल के 44 रनों की मदद से 12 ओवर में ही जीत हासिल कर ली. कुणाल को मैन ऑफ़ द मैच और बेस्ट बैट्समैन का पुरस्‍कार दिया गया, जबकि आनंद को बेस्ट गेंदबाज का पुरस्कार मिला. इस अवसर पर जिले के उपायुक्त मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद थे. इस आयोजन को सफल बनाने में सिंहभूम जर्नलिस्ट एशोसिएशन के अध्‍यक्ष राजीव नयनम सहित सभी सदस्यों ने अपना योगदान दिया.

आठवें हफ्ते की टीआरपी : आजतक यानि नंबर वन, इंडिया न्‍यूज की टीआरपी में उछाल

टैम ने आठवें सप्‍ताह की टीआरपी जारी कर दी है. आजतक लगातार नम्‍बर वन पर बना हुआ है और इंडिया टीवी दूसरे पायदान पर टिके रहने को अभिशप्त-सा लग रहा है.  तीसरे नम्‍बर पर एबीपी न्‍यूज ने अपना कब्‍जा लगातार बरकरार रखा है. चौथे स्‍थान पर जी न्‍यूज है. इस सप्‍ताह कुछ उठापटक भी हुए हैं. आईबीएन7 ने न्‍यूज24 को झटका देते हुए टॉप फाइव से बाहर कर दिया है.

पिछले सप्‍ताह न्‍यूज24 पांचवें तथा आईबीएन7 छठे स्‍थान पर काबिज था, पर इस बार यह स्थिति उलट गई है. सातवें स्‍थान पर एनडीटीवी इंडिया, आठवें स्‍थान पर तेज मौजूद है. इस बार सबसे अधिक फायदा इंडिया न्‍यूज को हुआ है. दीपक चौरसिया के आने का फायदा चैनल को मिलने लगा है. लगातार कंट्रोवर्सी के कारण भी चैनल को टीआरपी में फायदा मिला है. इंडिया न्यूज चैनल ने सहारा के समय को मात दे दी है.. ये सभी आंकड़े टारगेट एज ग्रुप 15 प्‍लस श्रेणी के हैं. नीचे चैनलों की टीआरपी रेटिंग है….

टीजी- सीएस 15प्लस

आजतक – 20.6,  इंडिया टीवी – 17.9, एबीपी न्यूज़ – 14.5, ज़ी न्यूज़ – 11.9,  आईबीएन7 – 8.5, न्यूज़ 24 – 8.2, एनडीटीवी इंडिया – 5.6,  तेज – 3.9,  इंडिया न्‍यूज : 3.1, डीडी न्यूज़ – 2.7, समय – 2.2, लाइव इंडिया- 1.0

बजट गाथा : जानिए किसने पेश किया पहला बजट और किसने सबसे अधिक बार

वित्‍त वर्ष 2013-14 के लिए आम बजट की उलटी गिनती शुरू हो गई। बजट पूर्व हुए आर्थिक समीक्षा में वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान आर्थिक वृद्धि दर 6.1 से 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसी तरह से और भी कई बातें आर्थिक सर्वेक्षण मे सामने आयी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 में भारत के केन्द्रीय बजट को वार्षिक वित्तीय विवरण के रूप में निर्दिष्ट किया गया है। आज मैं देश की बजट को समझने के लिए उसका इतिहास, अवधारणा, बजट की आवश्यकता और इसकी व्यवस्था पर कुछ बातें प्रस्तुत करने जा रहा हूं, जो तीन से चार भाग मे आपके सामने लाने की कोशिश करूंगा।

हमारे देश मे प्रतिवर्ष संसद मे पेश किए जाने वाले बजट का इतिहास बेहद दिलचस्प और शानदार है। हम लोग हर साल पेश किए जाने वाले बजट को लेकर तमाम किस्म के अन्दाजे लगाते हैं, लेकिन देश के स्वतंत्र होने से अब तक इस दिलचस्प बजट के इतिहास पर शायद ही कभी गौर किया गया हो। दरअसल 1947 से अब तक का बजट इतिहास राजनीतिक बवंडर की कहानी तो कहता ही है, साथ ही कई ऐसे तथ्य भी उजागर करता है जो राजनीति के अध्ययन के लिए बेहद जरूरी और गम्भीर भी है।

इन तथ्यों में आर.के.षण्मुखम शेट्टी का अविभाजित भारत और स्वतंत्र भारत दोनों के लिए बजट पेश करना, गांधी-नेहरू परिवार द्वारा तीन बार बजट पेश करना, राजीव गांधी द्वारा शून्य आधारित बजट पेश करना और वित्त मंत्री के रूप मे डा. मनमोहन सिंह द्वारा एक अंचभित कर देने वाला बजट, जिसमे अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए देश का दरवाजा खोला गया। इनमें उल्लेखनीय हैं 1987-88 का बजट जो राजीव गांधी ने पेश किया था, और वहीं से देश मे शून्य आधारित बजट की परम्परा शुरू हुई।  

यहां इस बात का जिक्र होना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि स्वतंत्र भारत का पहला बजट 26 नवम्बर, 1947 को आर.के.षण्मुखम शेट्टी द्वारा पेश किया गया था, लेकिन वास्तव मे यह नियमित बजट नहीं था। षण्मुखम शेट्टी ने तब कहा था कि अप्रैल, 1946 से मार्च, 1947 के बजट को मार्च, 1946 के अंतरिम सरकार ने स्वीकार किया और वह अविभाज्य भारत का अंतरिम बजट था। फिर वर्ष 1948-49 में षण्‍मुखम शेट्टी ने पूर्ण बजट पेश किया था, और तभी से अंतरिम बजट भी पेश किए जाने लगे।

भारत के बजट के ऊपर कोई भी बात गांधी-नेहरू परिवार के जिक्र बिना आगे बढ़ाना सम्भव नहीं हो सकता है। गांधी-नेहरू परिवार ने कई बार असाधारण हालातों मे बजट पेश किए है, जिन्हें आगे के कुछ बातों से समझा जा सकता है। घटना वर्ष 1958 की है, जब वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णामचारी ने इस्तीफा दिया बजट प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी अचानक से प्रधानमंत्री पंडित नेहरू पर आई। नेहरू जी ने 28 फरवरी, 1958 को बजट पेश करते हुए कहा था कि “प्रथा के मुताबिक अगले वर्ष का बजट आज पेश किया जाना है। अमूमन वित्त मंत्री को यह बजट पेश करना होता है, लेकिन अप्रत्याशित कारणों से आज वे हमारे साथ नही हैं, और यह महती जिम्मेदारी मेरे ऊपर आन पड़ी है”।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गान्धी को भी कुछ इसी तरह की राजनीतिक बाध्यता के कारण बजट पेश करना पड़ा था। मोरारजी देसाई ने जब वित्त मंत्री के पद से त्याग पत्र दिया तो प्रधानमंत्री इंदिरा गान्धी ने वित्त मंत्रालय अपने पास रखा और उन्हें बजट पेश करने का मौका मिला। और इसके बाद अस्सी के दशक में राजीव गांधी ने वर्ष 1987-88 का आम बजट पेश किया और अपने नाना एवं मां के बाद तीसरे प्रधानमंत्री बने जिन्होंने बजट पेश किया हो। लेख में मैंने पहले भी उस शून्य आधारित बजट की चर्चा की है।

अब बात करते है भारत के गणराज्य बनने के बाद के बजट का, तो 1950-52 का अंतरिम बजट पेश किया था जान मथाई ने। सर्वप्रथम उन्होंने ही योजना आयोग के गठन की घोषणा की थी, लेकिन यहां यह भी बताना जरूरी हो जाता है कि बाद में उन्होंने यह महसूस करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था कि योजना आयोग सुपर कैबिनेट बनता जा रहा है। वर्ष 1951-52 का अंतरिम बजट पेश करने का अवसर भारतीय रिजर्व बैंक के पहले गवर्नर सी.डी. देशमुख को मिला, लेकिन उन्होंने भी राज्य पुनर्गठन आयोग से मतभेदों के चलते पने पद से इस्तीफा दे दिया।
 
इसके बाद वित्त मंत्री बने टी.टी.कृष्णामचारी ने अगले बजट से पहले 30 नवम्बर, 1956 को संसद मे पांच हजार शब्दों का भाषण देते हुए नए कर लगाने का प्रस्ताव किया। बाद में कुछ विवादों के कारण फरवरी 1958 में उन्होंने भी त्यागपत्र दे दिया। आर.के.षण्मुखम शेट्टी ने भी इसके पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू मतभेद के चलते इस्तीफा दे चुके थे। उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्री के रूप में मोरारजी देसाई ने सबसे अधिक दस बार बजट पेश किए। उन्होंने अपने वित्त मंत्री रहने के पहले कार्यकाल से पांच नियमित वार्षिक बजट और एक अन्तरिम बजट पेश किया था।

अपने पद के दूसरे दौर में मोरारजी देसाई ने तीन नियमित बजट और एक अंतरिम बजट पेश किया था। बजट के सम्बन्ध में वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चर्चा भी जरूरी है। उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में न केवल पांच बार नियमित बजट पेश किए, बल्कि उदारीकरण के लिए अर्थव्यवस्था के द्वार भी खोले। वर्तमान वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम का बजट गैर कांग्रेसी वित्त मंत्री के रूप मे प्रस्तुत किया था। तब वह तमिल मानिल पार्टी में थे। वर्तमान वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम का 1997-98 का बजट भी विशेष रहा था, क्यूंकि तब संवैधानिक संकट के चलते गुजराल सरकार टिक नहीं पाई और संसद का विशेष अधिवेशन बुलाकर वर्तमान पी. चिदम्बरम का बजट बिना किसी चर्चे के पारित किया गया था।

वर्ष 2000 तक, केंद्रीय बजट को फरवरी महीने के अंतिम कार्य-दिवस को शाम 5 बजे घोषित किया जाता था। यह अभ्यास औपनिवेशिक काल से विरासत में मिला था जब ब्रिटिश संसद दोपहर में बजट पारित करती थी, जिसके बाद भारत ने इसे शाम को करना आरम्भ किया। यशवंत सिन्हा देश के ऐसे पहले केन्द्रीय वित्त मंत्री बने, जिन्होने दोपहर मे बजट प्रस्तुत करने की नई परम्परा डाली। इससे पहले तक शाम पांच बजे संसद मे बजट पेश किया जाता था। अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार (बीजेपी द्वारा नेतृत्व) में वर्ष 2001 का बजट शाम पांच बजे के बजाय दोपहर 11 बजे घोषित किया गया था। वर्तमान मे देश के राष्ट्रपति डा. प्रणव मुखर्जी, एन.डी. तिवारी, एस.बी. चव्हाण, मधु दंडवते, जसवंत सिंह भी ऐसे वित्त मंत्री रहे जिन्हें बजट पेश करने का मौका मिला।       

जारी….

अनिकेत प्रियदर्शी की रिपोर्ट.

तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद का मालिक मनीष जैन बहुत घटिया आदमी : सोनू निगम (देखें वीडियो)

मुरादाबाद : तीर्थंकर महावीर विश्वविधालय, मुरादाबाद (Teerthanker Mahaveer University, Moradabad) के पांचवे वार्षिकोत्सव में शनिवार 23 फरवरी को कार्यक्रम प्रस्तुत करने आये मशहूर गायक सोनू निगम ने विश्वविद्यालय के मालिक मनीष जैन (Manish Jain) पर आरोप लगाया है कि उनके सुरक्षा कर्मियों और खुद मनीष जैन ने उन्हें जबरन रोका और उनके साथ दुर्व्‍यवहार किया। सोनू निगम ने ट्विटर और यूट्यूब पर किसी को भी मुरादाबाद के तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय में न जाने की हिदायत तक दे डाली है।

26 फरवरी को यूट्यूब पर जारी एक वीडियो में सोनू निगम ने कहा कि मुरादाबाद के तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम करने के बाद जब वो वापस दिल्ली जाने के लिए बाहर निकले तो  मनीष जैन के सुरक्षा कर्मी उन्हें जबरदस्ती पकड़ कर अन्दर उनके पास ले गए। सोनू निगम ने ऐसा करने का कारण पूछा तो मनीष जैन की तरफ से कहा गया कि मैंने पचास लाख खर्च किये हैं जब तक तुम्हारे साथ अपने परिवार वालों व परिचितों मित्रों की फोटो नहीं खिचवा लूंगा, जाने नहीं दूंगा। जारी वीडियो में सोनू निगम ने कहा कि मैंने हाथ जोड़ कर  मनीष जैन से विनती की कि मेरी मां मृत्युशैय्या पर है और मेरा जाना बहुत ज़रूरी है, उसके बाद भी मुझे नहीं जाने दिया गया।

सोनू निगम ने आरोप लगाया कि पहली बार ऐसा हुआ कि तीन घंटे मंच पर काम करने के बाद मुझे किसी ने एक गिलास पानी तक नहीं पूछा। जारी वीडियो में सोनू निगम ने मनीष जैन की इस बात पर कि “मैंने पचास लाख खर्च किये हैं जब तक वसूल नहीं हो जायेगा जाने नहीं दूंगा“ की बात को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहा कि मुझे कोई पचास लाख नहीं दिए गए। जारी वीडियो में सोनू निगम ने सुरक्षा कर्मियों द्वारा की गई जबरदस्ती को एक अपहरण जैसा माहौल बताया। उन्होंने कहा कि एक शिक्षण संस्थान के कुलाधिपति ऐसे कार्य करता है तो कितने शर्म की बात है। 


सोनू निगम द्वारा जारी वीडियो देखने के लिए नीचे की तस्वीर पर क्लिक करें…


यूट्यूब पर जारी वीडियो में सोनू निगम ने कहा कि विश्वविधालय में मुलायम सिंह जी, अखिलेश सिंह और आज़म खान के पोस्टर देखे थे, जिससे लगा था कि इनके सम्बन्ध भी इनसे हैं इसलिए मैंने मुलायम सिंह जी से फोन पर बात की और इस सम्बन्ध में उन्हें बताया और एक्शन लेने की अनुमति मांगी, जिस पर पर मुलायम सिंह जी ने कहा कि तुम्हें जो करना है करो, मैं तुम्हारे साथ हूँ। सोनू निगम ने कहा कि मुलायम सिंह जी से मेरे सम्बन्ध भी अच्छे हैं।

वीडियो लिंक..

http://www.old1.bhadas4media.com/video/viewvideo/681/man-and-struggle/sonu-nigam-ke-saath-manish-jain-ne-ki-ghatiya-harkat.html

मुरादाबाद से इमरान जहीर की रिपोर्ट.

‘कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस’ अखबार के मालिक पर निवेशकों से ठगी का आरोप

अपने गोरखधंधे का बचाव करने के लिए मीडिया में आने वाले एक और चिटफंडिया कंपनी ने निवेशकों से करोड़ों रुपये ठग लिए हैं. कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस नाम के दैनिक अखबार का प्रकाशन करने वाले कल्‍पतरु समूह पर आरोप लगा है कि उसने अपने निवेशकों के हजारों करोड़ रुपये ठग लिये हैं. यह समूह जल्‍द ही के7 नाम से एक नेशनल न्‍यूज चैनल भी लांच करने की योजना पर काम कर रहा था. इसके पहले खबर भारती न्‍यूज चैनल का संचालन करने वाले साईं प्रकाश कंपनी के चेयरमैन को ठगी के आरोप में कानपुर पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है.

गौरतलब है कि देश में दर्जनों चिटफंड कंपनियां हैं, जो अपने निवेशकों को धोखे में रखकर उनसे पैसा उगाहती हैं और पुलिस तथा अन्‍य पचड़ों से बचने के लिए मीडिया की दुकानदारी खोल लेती हैं. ऐसे ही संस्‍थानों में मीडियाकर्मियों का शोषण होने से लेकर उनके साथ दिहाड़ी मजदूरों जैसा व्‍यवहार होता है. आप भी नीचे पढि़ए कल्‍पतरु कंपनी के बारे में प्रकाशित खबर.  

आत्मकथा तैयार, बस दिल्ली से विदाई का इंतजार : एसएन विनोद (देखें वीडियो)

प्रभात खबर के संस्थापक संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार एसएन विनोद से बतियाना इसलिए भी अच्छा लगता है कि उनके पास दुनिया जहान के ढेर सारे किस्से, घटनाएं, जानकारियां होती हैं और उसे वे बिना किसी हिचक-संकोच अपने प्रिय कनिष्ठों को बांटा करते हैं. एसएन विनोद जी का मुझ पर भी प्रेम रहा है, और है. वे नागपुर रहें या दिल्ली, हफ्ते महीने में एक या दो बार फोन पर लंबी बातचीत जरूर हो जाती है.

भड़ास के शुरू होने के बाद एसएन विनोद ने भड़ास के उतार चढ़ाव को देखा और इस मंच को मीडिया के लिए एक बेहद जरूरी और अनिवार्य मंच बताया तो भड़ास चलाते हुए मैं एसएन विनोद के जीवन के उतार चढ़ाव को देखता रहा जिसमें उन्होंने इंडिया न्यूज चैनल से हटने के बाद नागपुर से खुद का अखबार हिंदी दैनिक 1857 निकाला और फिर अब दिल्ली में आकर साधना ग्रुप में एडिटर इन चीफ की हैसियत से सक्रिय हैं.

जिस उम्र में लोग रिटायर होकर एक एक दिन गिनना शुरू कर देते हैं, उस उम्र से कहीं ज्यादा उम्र होने के बावजूद एसएन विनोद नौजवानों की तरह चंगे और चंचल हैं. चंचल इसलिए कि जो सहजता सक्रियता उनमें पहले थी, वही आज भी है और कई बार लगता है जैसे उन्होंने उम्र और डिप्रेशन, दोनों को डराकर कहीं दूर दुबका रखा है.

साधना न्यूज से एक दिन मेरे पास बुलावा आया कि स्वामी अग्निवेश के अग्निबाण नामक एक प्रोग्राम में जिसकी एंकरिंग खुद एसएन विनोद जी करेंगे, मुझे गेस्ट के रूप में आना है. मैंने एसएन विनोद जी के साथ चाय पीने और गपियाने के प्रस्ताव को सहर्ष कबूल कर लिया. आधे घंटे के डिबेट कार्यक्रम के बाद फिर वहीं पर मैंने एसएन विनोद जी का वीडियो इंटरव्यू करने की व्यवस्था कराने में सफलता हासिल की, बृजमोहन सिंह और राजीव शर्मा के सौजन्य से.

इंटरव्यू में विनोद जी ने भड़ास4मीडिया पर भी बात की, इंडिया न्यूज पर बात की, खुद के हिंदी दैनिक 1857 पर बात की, जी न्यूज के संपादकों के जेल जाने पर बात की… ढेरों बातें हुईं… और हां, इस दौरान यह बात भी हुई कि एसएन विनोद जी का जो इंटरव्यू भड़ास पर 2009 के जनवरी महीने में तीन पार्ट में प्रकाशित हुआ, वह काफी पढ़ा गया और उस इंटरव्यू के बाद विनोद जी के पास ढेरों फोन आए. तो, चाहूंगा कि वीडियो इंटरव्यू देखने के बाद विनोद जी के उस पुराने इंटरव्यू को भी पढ़ा जाए ताकि उनकी सोच और उनके जीवन से संपूर्णता व समग्रता से परिचित हुआ जा सके. खासकर नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए विनोद जी उस आदर्श की तरह हैं जो किन्हीं भी हालात में हार नहीं मानता, बस कुछ देर रुक कर फिर मोर्चा संभालने और कर दिखाने में जुट जाता है.


वीडियो इंटरव्यू के लिए इस तस्वीर पर क्लिक करें..


विनोद जी के वर्ष 2009 में प्रकाशित इंटरव्यू को पढ़ने के लिए नीचे के शीर्षकों पर क्लिक करें…

प्रभात खबर चौथा बेटा, जिससे अलग किया गया

विनोद जी 'गंगा' इज योर बेबी

हां, यह सच है कि दिल्ली मुझे रास नहीं आई


उपर की तस्वीर पर क्लिक करेंगे तो विनोद जी के ताजा वीडियो इंटरव्यू पर पहुंच जाएंगे. उसके नीचे के तीन शीर्षकों पर एक एक कर क्लिक करेंगे तो विनोद जी के पुराने टेक्स्ट इंटरव्यू को पढ़ पाएंगे. अरे हां, यह बताना तो भूल ही गया कि विनोद जी ने अपनी आत्मकथा तैयार कर रखी है. बस उसमें इस बार के दिल्ली प्रवास का अनुभव निचोड़ डालना भर है. लेकिन हम लोग यही दुआ करेंगे कि अबकी उन्हें दिल्ली रास आए ताकि उनके साथ यूं ही बैठना गपियाना बतियाना और उनसे सीखना होता रहे.

यशवंत सिंह

एडिटर, भड़ास4मीडिया

09999330099

yashwant@bhadas4media.com

साक्षी मीडिया के चेयरमैन जगन मोहन की हिरासत बढ़ी

हैदराबाद : हैदराबाद की एक स्थानीय अदालत ने आज आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति के कथित मामले में साक्षी मीडिया समूह के मालिक एवं वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख वाई एस जगन मोहन रेड्डी और अन्य लोगों की न्यायिक हिरासत 13 मार्च तक बढ़ा दी।

सीबीआई के एक वकील ने बताया कि जगन के अलावा जिन लोगों की हिरासत अवधि बढ़ायी गयी, वे हैं: आंध्र प्रदेश के पूर्व मंत्री मोपिदेवी वेंकट रमन, उद्योगपति निम्मागडा प्रसाद और पूर्व नौकरशाह बह्मानंद रेड्डी। अदालत ने ओबलापुरम खनन मामले में कर्नाटक के पूर्व मंत्री जी जनार्दन रेड्डी और अन्य लोगों की हिरासत अवधि भी बढ़ा दी। (एजेंसी)

जिंदल मामले में जी न्‍यूज की एक और याचिका खारिज

नई दिल्ली : एक स्थानीय अदालत ने ज़ी न्यूज़ लिमिटेड की ओर से दायर वह याचिका खारिज कर दी है जिसमें जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड (जेएसपीएल) की ओर से चैनल के खिलाफ दायर मानहानि के मुकदमे पर रोक की मांग की गई थी। अदालत ने याचिका को प्रीमच्योर करार देते हुए खारिज कर दिया।

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अशोक कुमार ने भी कहा कि यदि चैनल की अर्जी मान ली जाती है तो शिकायतकर्ता (जेएसपीएल) अदालत को किस तरह यह बताएगा कि ट्रायल की विषयवस्तु एवं मामले की जांच एकसमान है। न्यायाधीश ने कहा कि फाइल पर प्रासंगिक दस्तावेजों के अध्ययन और दोनों वकीलों की दलीलें सुनने के बाद मेरा मानना है कि यह अर्जी समय से पहले ही दायर कर दी गई है। मामले में अब तक तो आरोपी को तलब भी नहीं किया गया है।

उन्होंने कहा कि यदि इस चरण में ही अर्जी मान ली जाती है तो शिकायतकर्ता (जेएसपीएल) अदालत को किस तरह यह बताएगा कि ट्रायल की विषयवस्तु एवं मामले की जांच प्राथमिकी में दर्ज विषयवस्तु की जांच के समान ही है। (एजेंसी)

कुंभ मेला में छोटी नदियां बचाने का जुनून

इलाहाबाद। प्रयाग महाकुंभ मेला के समापन काल में विश्व भर के जाने माने चित्रकारों का सम्मेलन सेक्टर छह में शुरू किया गया है। 27 फरवरी को मुम्बई के विख्यात फिल्मकार पंकज मिस्त्री भी पहुंच गए हैं। उन्होंने कुंभ मेला को अपने कैमरे में कैद किया। खासकर गंगा के हाल, तम्बुओं के छोड़े अवशेष, कलश और हवनकुण्डों पर उनकी नजर पडी़।

छोटी नदियां बचाओ अभियान के शिविर में पहले से जुटे मिस्र, नेपाल, भूटान और तिब्बत आदि देशों के अतिरिक्त देश के विभिन्न हिस्से से आए चित्रकारों ने चित्र प्रदर्शनी शुरू किया है। इसमें वसुधैव कुटुम्बकम से जुड़े कलाकारों ने गंगा, यमुना और दूसरी नदियों समेत कुंभ के घटनाक्रमों को सहेजने लायक कई कलाकृतियों की रचना भी की है। उन्होंने 100 से ज्यादा कलश और कपड़ों से बने झोले भी अपनी कला कृतियों के माध्यम से सजाए।

वसुधैव कुटुम्बकम के निदेशक ए.के. डगलस ने शंकराचार्य अधोक्षजानंददेव तीर्थ को पूरी प्रदर्शनी का अवलोकन कराया। प्रसाद के रूप में कपड़े के झोले भी वितरित किए गए। जल बचाओ, जीवन बचाओ और शांति का संदेश देती एक दर्जन से ज्यादा कलाकृतियां प्रस्तुत की गई हैं। ये सब हवनकुंडों की भभूत, गाय के गोबर और संगम में बिक रहे हैं। ये कलाकृतियां विश्व शांति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती हैं। इस अवसर पर शंकराचार्य ने कहा कि ऐसी कलाकृतियां देवालयों और शिक्षालयों में पहुंचनी चाहिए। उन्होंने कहा कि होली के दौरान वृन्दावन में इन कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई जाएगी।

28 फरवरी को इलाबाद इंटर कॉलेज के विद्यार्थी और शिक्षक सेक्टर छह स्थित छोटी नदियां बचाओ कैम्प में पहुंचेंगे। कैम्प में स्थानीय विद्यार्थी और शिक्षक विश्व शांति के इस अभियान से जुड़ेंगे। कार्यक्रम में स्थानीय संसाधनों द्वारा मौके पर ही बनाई कलाकृतियों के जरिये संदेश दिया जा रहा है। इसके लिए राष्‍ट्रीय और अंतराष्‍ट्रीय कलाकार और फिल्ममेकर अपनी पूरी टीम समेत मौजूद हैं। नदियों के संरक्षण के इस अभियान को कथावाचक श्री देवकीनंदन ठाकुर का समर्थन भी हासिल हुआ है। कैम्प में देर शाम गंगा और शिव की पूजा के साथ परफार्मिंग आर्ट का कार्य शुरु हो गया है। इस टीम में मशहूर फिल्ममेकर पंकज मिस्त्री, चित्रकार श्रीधर अयर, ए.के. डगलस, भेपाल से आनंद प्रकाश, धर्मशाला से सिमरन संधू, त्रिपुरा से बबली दास, पटना से मुकेश कुमार यादव, दिल्ली से विलास कुलकर्णी और रवि रंजन, नेपाल से श्यामसुंदर यादव, राम, समुंद्र और ज्योति जैसे प्रमुख चित्रकारों के साथ इजिप्ट से हयाम और हासिम ने भी हिस्सा लिया। नील नदी के आंदोलन में शामिल रहे हयाम और हासिम अब ससुर खदेरी नदी के अंत से उद्गम तक के हालात का जायजा लेंगे।

छोटी नदियां बचाओ अभियान की संयोजक मोनिका आर्या ने बताया कि चित्रकारों और कला विशेशज्ञों का दल गंगा और यमुना की सहायक नदी ससुर खदेरी की असली तस्वीर समाज के सामने पेश करेंगे। इसके लिए दो दिन तक एक दल नदी किनारे भ्रमण करेगा। नदियों के लिए कार्य करने वाले कौशल किशोर, पीएन द्विवेदी, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, राकेश मिश्र, राजेश तिवारी, केनिथ जॉन, एसएस पांडे और अजय मिश्र जैसे विशेशज्ञों का दल ससुर खदेरी के भौगोलिक हालात का जायजा भी लेंगे। इस काम के लिए स्वामी विज्ञानानंद नदी के उद्गम से अंत की ओर एक यात्रा दल लेकर काम शुरु कर चुके हैं। मोनिका आर्या ने बताया कि दो मार्च की शाम को इसी कैम्प में जल संरक्षण को समर्पित एक कवि सम्मेलन का आयोजन भी किया गया है।

कुंभनगरी से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

IIMC में ब्यॉयज हॉस्टल न होना शर्मनाक है

भारतीय जनसंचार संस्थान, यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन…प्रचलित संबोधन IIMC. पत्रकारिता प्रशिक्षण में एक गौरवशाली अतीत….जहां, सिर्फ भारत से ही नहीं, बल्कि करीब आधा दर्जन देशों के छात्र पत्रकारिता की पढ़ाई करते हैं. अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, सेनेगल आदि देशों से आए छात्रों को IIMC की ओर से सुसज्जित छात्रावास मिला हुआ है. उसी तरह यहां पढ़ने वाली छात्राओं को भी IIMC ने हॉस्टल मुहैया करा रखी है, लेकिन दूसरी तरफ संस्थान में पढ़ने वाले लड़कों को छात्रावास से वंचित रखा गया है. 

IIMC में पढ़ने वाले लड़के मुनिरका, बेरसराय या अन्य जगहों पर किराए के तंग कमरों में रहते हैं. बेचारे सुबह जल्दी उठते हैं, जल्दी में नहाना और सीधे बस स्टॉप की तरफ भागना और गर्दन टेढ़ी करके मिंटो रोड से पूर्वांचल हॉस्टल की तरफ जाने वाली 615 नंबर की बस की प्रतीक्षा करना. वहां से पैदल IIMC जाना, ताकि सुबह 9 बजे या 9.30 की क्लास में सही वक्त पर पहुंच सकें. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि करीब 80 प्रतिशत लड़के बगैर सही तरह से नाश्ता किए क्लास में पहुंच जाते हैं और करीब 2 बजे लंच के समय ही वे सही तरीके से खाना खाते हैं.

इससे पहले चाय, समोसे या बिस्किट से ही काम चलता है. नतीजतन कक्षा में ज्यादातर लड़के उदासी, बार-बार जम्हाई आना या नींद आने की समस्या से परेशान रहते हैं. मैं पूरे यकीन के साथ कहना चाहता हूं कि पूरे पाठ्यक्रम के दौरान ज्यादातर लड़के सुबह में नाश्ता करने जैसी अच्छी आदत को भूल जाते हैं. यह उनकी विवशता है….वहीं दोपहर के भोजनावकाश के समय IIMC में पढ़ने वाली छात्राएं और हमारे विदेशी साथी अपने-अपने हॉस्टल की तरफ रुख करते हैं. कमरे में थोड़ा आराम कर लिया और फ्रेश होने के बाद हॉस्टल की कैंटीन में शुद्ध भोजन प्राप्त किया उसके बाद हंसते मुस्कराते दूसरी पाली की कक्षा में बैठते हैं.

दूसरी तरफ उसी संस्थान में पढ़ने वाले लड़के भोजन की तलाश में महिपाल जी के भोजनालय का रुख करते हैं, जहां लंच के समय भोजन पाने वालों की लंबी कतार देखी जा सकती है. इन दिनों तो यह कतार और लंबी हो गई होगी, क्योंकि मैं जिस समय पढ़ता था, उस वक्त IIMC हमारी कक्षा में 40 सीटें होती थी. बहरहाल, उनमें कुछ जीवट और पदयात्रा में माहिर छात्र शुद्ध, बाजार भाव से कम यानी सब्सिडी युक्त भोजन और परसन (दोबारा भोजन लेना) की चाहत में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के हॉस्टलों की तरफ अपनी कदम बढा देते थे. वहां से भोजन करने के बाद वे क्लास में आते थे.

खैर, शाम 7 बजे तक कंप्यूटर लैब और लाइब्रेरी में समय बिताने के बाद छात्र फिर गुट बनाकर कभी पूर्वांचल, कभी नर्मदा, कभी कावेरी, कभी पेरियार, कभी झेलम और कहीं नहीं तो गंगा ढाबा में खाना खाते थे, यह सिलसिला आज भी जारी है, बस नाम बदल गए हैं, चेहरे बदल गए हैं और साल बदल गए हैं, लेकिन IIMC नई दिल्ली के छात्रों का वर्तमान नहीं बदल पाया है. वर्ष 2007-08 में काबुल (अफगानिस्तान) निवासी और IIMC दिल्ली में डीजे के छात्र अब्दुल अजीम नूर बक्श और नेपाल के साथी विष्णु गौतम भी छात्रों की इस समस्य़ा से अवगत थे, एक दिन काबुल वाले मेरे साथी ने कहा यहां इतनी जगह पड़ी हुई है, सरकार को चाहिए कि वह लड़कों के लिए भी हॉस्टल बना दे. अब्दुल अजीम और विष्णु जैसे विदेशी साथी भी छात्रों के इस दर्द को समझने में कामयाब रहे, लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और आईआईएमसी के आला अधिकारी की संवेदना अब तक नहीं जग सकी, जो तकलीफ़देह है.

अभिषेक रंजन सिंह

पूर्व छात्र आईआईएमसी

मो. 9313174426

बरेली में हिंदुस्‍तान ट्रेड फेयर में पुस्‍तक विक्रेता मायूस

झुमका सिटी बरेली में 9 साल बाद हिम्मत जुटाकर आए पुस्तक विक्रेता और प्रकाशक खासे मायूस हैं. दरअसल बरेली में ट्रेड फेयर में आए लोग किताबों को उलट-पुलट कर तो खूब देख रहे हैं, मगर क्रेता बहुत कम हैं. लिहाजा पुस्तक मेला बहुत घाटे में जा रहा है. मगर सबसे ज्यादा हैरानी हिंदुस्तान अख़बार के रवैये को लेकर है जो ट्रेड फेयर की दो-दो पन्नों की खबरें लगा रहा है, मगर बुद्धिजीवियों के इस अख़बार ने पुस्तक मेले पर चंद चार लाइनें लिखने की भी जहमत नहीं उठाई है.

रोज अख़बार में पापड़ से लेकर मेले में बिक रहे बर्फ के गोले तक का फोटो छपता है, मगर पुस्तक मेले की कवरेज नदारद है. बरेली वासियों को पता तक नहीं है कि ट्रेड फेयर के बीच अलग से लगे पुस्तक मेले में दो लाख से भी ज्यादा पुस्तकें उपलब्ध हैं, जबकि हिंदुस्तान प्रबंधन अगर चाहता तो विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को किताबों की खरीद के लिय प्रोत्साहित कर सकता था. गौरतलब है की हिंदुस्तान ने ब्रांड प्रमोशन के लिय दस दिन के ट्रेड फेयर का आयोजन किया है जो 3 मार्च तक चलेगा. 

आई नेक्‍स्‍ट, लखनऊ में हलचल : एनई पर खबर बेचने के आरोप में संपादक को भेजा गया मेल

जागरण समूह के आई नेक्‍स्‍ट अखबार में सब कुछ सही नहीं चल रहा है. जागरण समूह के मालिकों तथा आई नेक्‍स्‍ट के संपादकों को भेजे गए एक मेल में आरोप लगाया गया है कि आई नेक्‍स्‍ट, लखनऊ के न्‍यूज एडिटर राधाकृष्‍ण त्रिपाठी संस्‍थान के एक्‍सक्‍लूसिव खबरों को प्रतिद्वंद्वी समूह दैनिक भास्‍कर के पत्रकार अज्‍येंद्र राजन शुक्‍ला को बेच रहे हैं. यह मेल आई नेक्‍स्‍ट के एडिटर आलोक सांवल समेत शैलेश गुप्‍ता, सुनील गुप्‍ता, संजय गुप्‍ता, संदीप गुप्‍ता को भी भेजा गया है.

अब इन आरोपों में कितनी सच्‍चाई है यह तो जागरण प्रबंधन अपने जांच के बाद ही तय करेगा. परन्‍तु लखनऊ से मिल रही खबरों में बताया जा रहा है कि आई नेक्‍स्‍ट के अंदर तनाव की स्थिति है. कुछ लोगों ने इस्‍तीफा भी दे दिया है. नीचे संपादकों को भेजा गया मेल और खबरों के लिंक.


To: "alok.sanwal@inext.co.in" <alok.sanwal@inext.co.in>; "editor@inext.co.in" <editor@inext.co.in>
Cc: "shailesh@jagran.com" <shailesh@jagran.com>; "sunilgupta@jagran.com" <sunilgupta@jagran.com>; "sanjay@jagran.com" <sanjay@jagran.com>; "sandeep@jagran.com" <sandeep@jagran.com>
Sent: Thursday, February 14, 2013 10:59 AM
Subject: Priye Sampadak Mahoday

Priye Sir,
            Aapko ye suchit karte hue bada dukh ho raha hai ki, aap hi ek employee aapke jagran grup ki news and photographs ke sath andar ki sari information..aapke rival BHASKAR group ko bech rahe hain. Aap niche die hue links pe ja ke dekh sakte hain aur kisi bhi expert se Milan karwa ke dekh sakte hain ki photographs same hain, aur news bhi.

Aapke Lucknow ke News Editor, Radha Krishna ji apne param dost aur inext ke poorv employee Ajayendra Rajan Shukla koi next ki sari exclusive news aur pictures bech dete hain, aur wo bhi bina kisi darr ke. Unhe is bat ka bhi dar nai hai ki ye ek jurm hai aur unpe kanooni karyawahi bhi ho sakti hai. Yahi nahi,,,wo apne mitr Ajayendra Rajan ko aksar office parisar me bula kar baithalte hain aur yaha ki sari information pen drive aur mail ke zariye de dete hain.

Yahi nahi..kharab past rakhne wale ye mahan news editor aksar sharab ke nashe me bhi office aa jate hain. Kripya is case me gambhirta se koi action jald le warna, ye bhi suna gaya hai ki ye Radha Krishna Tripathi ji ko khaas kar ek doosre media group ne bheja hai taki wo akhbar ko ek strategy ke tehat barbad kar sake…wo jald hi apne purine guru Naveen Joshi ji ke akhbar me jane wale hain. Aise me sawal ye uthta hai ki agar unko jana hi tha to wo aaye hi kyu, kya aapko isme kisi sazish ki bu nahi aati?

Khair, kripya nimn die gaye links ka Milan, pics n news ka inext me chapi khabro se zarur kare, sach aapke samne khud aa jaega. Yaha tak jo inext ki exclusive khabren bhi hoti hain, agle din wohi khabren dainikbhaskar ki website pe..pics ke sath aa jati hain. Sochne ke bat ye hai ki agar wo inext ki exclusive story n pics hoti hain to wo Radha Krishna ke dost Ajayendra Rajan Shukla ke pas kaise pahuch jaati hain?

Link 1
http://inextepaper.jagran.com/87621/INEXT-LUCKNOW/06.02.13#page/2/1

Is Link pe aap ja kar dekhe ki ek vidhayak ki gadi se uske kuch sathio ne takkar mari… ye khabar 6 Feb ki hai…

http://www.bhaskar.com/article/UP-LUCK-officers-car-hit-by-drunk-people-related-with-sp-mla-4171692-PHO.html?seq=2

Ab zara is link pe ja ke dekhie ki bhaskar.com pe bhi same khabar, aur same pictures.surprisingly ye bhi 6th Feb ko publish hui hain apne doubts clear karne ke lie aap kisi bhi expert se iski janch karwa sakte hain.
 
Link 2
Inext me exclusive story chapi..jiski pics sirf sur sirf inext ke pas thi…

http://inextepaper.jagran.com/84061/INEXT-LUCKNOW/22.01.13

http://www.bhaskar.com/article/UP-OTH-nd-tiwari-was-conducting-wedding-band-4157288-PHO.html

Aur agle hi din wohi pic plus baaki ki kuch pics bhaskar ki website pea a jati hain…aapko jaan ke hairat hogi ki dainikbhaskar ki website pe jitni bhi pics hain is story ki wo inext ke stringer shubham tripathi ne khichi thi. Lekin fir hamesha ki tarah Radha Krishna ne Ajayendra Rajan se dosti nibhate hue na sirf unhe wo pic di jo inext me chapi thi balki baaki ki sari pics bhi de di.
 
Link 3

http://inextepaper.jagran.com/86086/INEXT-LUCKNOW/31.01.13#page/8/1

Up ke Cm ne prisners dwara banai gai painting ki exhibition ko saraha…iski do pics inext me chapi///

http://www.bhaskar.com/article/UP-OTH-cm-akhilesh-praise-criminales-in-lucknow-4164694-PHO.html

Surprisingly.. badhi hi chalaki se ek bar fir..same pic bhaskar.com pe nazar aai.. Mai request karunga ek bar fir se ki aap kisi expert se in dono pics ka milaan karwa sakte hain.

सुल्‍तानपुर में छायाकार की पिटाई मामले ने पकड़ा तूल, विरोध-पुतला दहन जारी

यूपी के सुल्‍तानपुर जिले में पुलिस द्वारा हिंदी दैनिक हिंदुस्‍तान के छायाकार राज बहादुर यादव की निर्मम पिटाई और उनका कैमरा छीनने के मामले ने तूल पकड़ लिया है. इसके विरोध में पूरे जिले धरना-प्रदर्शन और पुतला दहन का कार्यक्रम शुरू हो गया है. पिटाई के विरोध में पत्रकारों ने बैठक करके आंदोलन की रुपरेखा तय की. जिले के मीडियाकर्मियों ने मौन जुलूस निकालकर डीएम को ज्ञापन सौंपा.  

पत्रकारों ने ऐलान किया है कि एसपी तथा पुलिस महकमे के खिलाफ चल रही जंग न्‍याय मिलने तक जारी रहेगी. पुलिस के गुडवर्क से जुड़ी खबरों को प्रकाशित न करने समेत पत्रकार वार्ता व एच्छिक ब्‍यूरो के बहिष्‍कार भी निर्णय लिया गया है. पत्रकारों ने मांग की है कि पुलिस अधीक्षक, क्षेत्राधिकारी नगर, प्रभारी निरीक्षक व दोषी पुलिसकर्मियों को निलंबित करते हुए उनका स्‍थानांतरण किया जाए. पुलिस के खिलाफ छेड़े जाने वाले संघर्ष के लिए पत्रकार संघर्ष मोर्चा का गठन किया गया है, जिसके नामित सदस्‍य मनोराम पाण्‍डेय, अवधेश शुक्‍ल, प्रमोद शुक्‍ल, अनिल पाठक, दिनेश श्रीवास्‍तव, विजय विद्रोही, केके तिवारी, दर्शन साहू, अनिल द्विवेदी, अलीम शेख व नीरज तिवारी को बनाया गया है.

दूसरी तरफ राजनैतिक पार्टियां भी पत्रकारों के समर्थन में आने लगी हैं. घटना के विरोध में आम आदमी पार्टी के सदस्‍यों ने कूरेभार थाना क्षेत्र के चौराहे पर पुलिस अधीक्षक का पुतला फूंका तथा नारेबाजी की. पुलिसिया कार्यशैली की चारो तरफ निंदा की जा रही है. उल्‍लेखनीय है कि एक हत्‍या के आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर कुछ लोग एसपी को ज्ञापन देने गए थे, परन्‍तु पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज कर दिया साथ ही घटना को कवर कर रहे छायाकार राज बहादुर यादव को बुरी तरह पीट दिया.

विरोध तथा पुतला दहन कार्यक्रम अंशुमान मिश्रा के संयोजन में हुआ, जिसमें केपी यादव, नरेन्द्र कुमार मिश्र, सुमित, दिलीप गुप्ता, सर्वेश, भूपेन्द्र आदि मौजूद रहे. वहीं जिला संयोजक धर्मेश मिश्रा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने कूरेभार कस्बे में चौराहे पर एसपी का पुतला फूंका. इस मौके पर उदय सिंह, मनोज सिंह, सुभाष सिंह, भुल्लन उपाध्याय, दिनेश सिंह आदि मौजूद रहे.

नौकरियों का नया ठिकाना होगा सोशल मीडिया

सोशल मीडिया अब सिर्फ लोगों को आपस में जोड़ने और गपशप करने का प्लेटफॉर्म ही नहीं बल्कि नौकरियां देने में भी अहम भूमिका निभाने वाला है। नैसकॉम की एक रिपोर्ट का कहना है कि देश में आईटी इंडस्ट्री को मजबूत करने में सोशल मीडिया खास भूमिका निभाने को तैयार है। रिपोर्ट का कहना है कि बीपीओ सेक्टर में गिरावट की भरपाई अगले साल सोशल मीडिया में होने वाले विकास से होगी।

जॉब का नया ठिकाना : अगले साल आईटी सेक्टर की संभावना के बारे में तैयार इस रिपोर्ट में सोशल मीडिया में विकास की सबसे अधिक उम्मीद जताई गई है। इसके अलावा मोबाइल एनलिटिक्स और क्लॉउट टेक्नॉलजी में भी तेजी देखने को मिलेगी। इनमें न सिर्फ नई नौकरियां आएंगी बल्कि इनसे आईटी सेक्टर को विकास की रफ्तार बनाए रखने में मदद मिलेगी। इस साल यूरोप में आए ग्लोबल संकट का असर इस सेक्टर पर पड़ने की बात कही गई है। इसी वजह से इसमें नौकरियों के कम अवसर पैदा हुए।

बीपीओ बाजार में भारत ने खोया शेयर: भारत के पारंपरिक आईटी इंडस्ट्री में बदलाव की जरूरत क्यों है, इसकी जरूरत बुधवार को पेश इकॉनमिक सर्वे में भी दिखी। रिपोर्ट में कहा गया कि बीपीओ बाजार में भारत ने पांच साल में चीन, ब्राजील और फिलीपींस जैसे देशों से 10 फीसदी शेयर खोया। इसका फायदा इन देशों की बीपीओ कंपनियों को हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक, मलेशिया, चीन, ब्राजील, फिलीपींस, मोरक्को, चिली, कोलंबिया, पोलैंड और आयरलैंड जैसे देश बीपीओ के लिए नई पसंद के तौर पर उभरे हैं।

क्या हैं उम्मीदें :

– इस साल आईटी इंडस्ट्री में 1 लाख 80 हजार नई नौकरियां पैदा हुईं और अगले साल इसमें 10 फीसदी बढ़ोतरी की उम्मीद है।

– आईटी एक्सपोर्ट इस साल 10.2 फीसदी की दर से बढ़ा जबकि अगले साल इसके 12 से 14 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है। (ईटी)

जेल से रिहा हुए पत्रकार एमआर सिद्दीकी ने कहा- पुलिस ने जबरदस्ती गुनाह कबूल करने का दबाव डाला (देखें वीडियो)

डेक्कन हेराल्ड के क्राइम रिपोर्टर मोतिउर्रहमान सिद्दीकी को कतई उम्मीद नहीं था कि एक दिन उन्हें ही आतंकवादी बताकर जेल के सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा. यही नहीं, पुलिस उन पर जबरदस्ती दबाव बनाती रही कि वे कुबूल कर लें कि वे आतंकवादी हैं. लेकिन उन्होंने पुलिस के दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया. आखिरकार, छह महीने तक बिना वजह जेल काटने के बाद उन्हें यह कह कर रिहा कर दिया गया कि उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं है. बैंगलोर में राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए की एक विशेष अदालत ने बड़ी हस्तियों के कत्ल और आतंकवादी साज़िश रचने के आरोप में गिरफ्तार एमआर सिद्दीकी उर्फ मोतिउर्रहमान सिद्दीकी को छह महीने बाद रिहा कर दिया है. एजेंसी ने कहा कि उनके पास एमआर सिद्दीकी के खिलाफ कोई सबूत नहीं है.

गौरतलब है कि पिछले साल सितंबर में एमआर सिद्दीकी के साथ 12 अन्य लोगों को बड़ी हस्तियों को मारने की साजिश रचने और आतंकवादी संगठन से साठगांठ रखने के आरोप में गिरफ्तार किया था. सिद्दीकी के साथ एक और शख्स यूसुफ़ नालबंद को भी रिहा किया गया है. नालबंद एक इलेक्ट्रिकल शॉप मे काम करता था. रिहाई के बाद मोतिउर्रहमान सिद्दीकी ने कहा, "मैं जल्द ही अपने पुराने पेशे की शुरुआत करूंगा, लेकिन कुछ  दिन जेल की कड़वी यादें भुलाने में लगेगा. हम वापस रिपोर्टिंग में लौटना चाहते है."

पुलिस ने सिद्दीकी और दूसरे 12 लोगों की गिरफ्तारी के बाद दावा किया था कि उनका संबंध आतंकी संगठन हूजी से है और वे बड़ी हस्तियों को मारने की साजिश रचने रहे थे. सिद्दीकी ने रिहाई के बाद कहा, "पुलिस ने हमें जबरदस्ती गुनाह कबूल करने का दबाव डाला, लेकिन एनआईआई की जांच में मैं बेकसूर साबित हुआ." सिद्दीकी बैंगलोर में एक बड़े अखबार के क्राइम बीट के रिपोर्टर थे, लेकिन इसके बावजूद उन्हें पुलिस को यक़ीन दिलाना मुश्किल था कि वे एक आतंकवादी नहीं हैं. सिद्दीकी के साथ गिरफ्तार हुए 10 और लोग जेल में हैं और अभी तक उनके खिलाफ जांच पूरी नहीं हुई है.

उल्लेखनीय है कि दो अन्य पत्रकार जिगना वोरा और एसएमए काजमी को भी आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था और इन दिनों ये दोनों जमानत पर जेल से बाहर हैं.

एमआर सिद्दीकी की रिहाई के प्रकरण को लेकर एक अंग्रेजी ब्लाग Churumuri पर एक दिलचस्प राइटअप प्रकाशित किया गया है, जो  मीडिया के सभी लोगों और लोकतंत्र में भरोसा रखने वालों को पढ़ना चाहिए… जो नीचे दिया गया है..

पत्रकार एमआर सिद्दीकी ने जेल से रिहा होकर पत्रकारों से बातचीत के दौरान क्या कहा, उसे नीचे दिए गए उनके चित्र पर क्लिक करके देख – सुन सकते हैं..


Churumuri blog

9 Lessons A ‘Terror-Suspect’ Journo Learnt In Jail

1- “The media has forgotten the ‘A’ in the ABC of Journalism [Accuracy-Brevity-Clarity].”

2-“I always thought the police, media and society at large do not treat terror suspects fairly. That thinking has been reinforced by my experience.”

3-“Security agencies are not sensitive towards the poor and weaker sections of society. If you look at the way the entire operation was carried out by the police and reported by the media, this insensitivity is clear.”

4-According to the [Bangalore] police and the media, I am the mastermind. If I am the mastermind, why are the others still in jail? I hope they too will get justice.”

5-“The media and the police need to be more sensitive toward the downtrodden, Dalits and Muslims. The way the media and the police behaved raises basic questions about their attitude toward Muslims.

6-“Muslims are often cast by the media and police in stereotypes. There is an institutional bias which manifests in such cases. This is not just about me; it is about hundreds like me who are in jails [across the country] on terror charges. Muslims are not terrorists.”

7-“If I was not a Muslim the police wouldn’t have picked me…. They first arrest people, then find evidence against them. What happened on August 29, 2012 was no arrest but downright kidnapping. A bunch of strong men barged into our house and forcefully took us away in their vehicles. This even as we were pleading and asking why we were being taken out.”

8-“They kept interrogating me as if I was the mastermind and kept saying that I’d be in for seven years for sure. Everyone knows that jail is no fun place. For the first 30 days we were cramped in a small room. The confinement itself was torture.  They did not inform our families. They did not tell us what we were being arrested for. They made us sign 30-40 blank sheets of paper. One of these papers was used to create fake, back-dated arrest intimation.”

9-“Some fair play is still possible in the system. Though justice was delayed, it wasn’t denied in my case.”

मुंबई की झुग्‍गी बस्‍ती के निवेशक सहारा से नाराज

मध्य मुंबई स्थित झुग्गी बस्ती बैगनवाड़ी की एक संकरी गली में भारत के बहु-बिलियन-डॉलर वाले सहारा समूह का स्थानीय कार्यालय ढूंढना मुश्किल है। गौरतलब है कि इस कंपनी के न्यूयॉर्क और लंदन में होटल हैं और एक फॉर्मूला1 रेसिंग टीम भी है। बैगनवाड़ी में नगर निगम के कूड़ेदान से महज़ कुछ किलोमीटर दूर सहारा का एक कमरे वाला ऑफिस एक छोटे, रेडीमेड कपड़े के स्टोर के ऊपर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए, आगंतुक रस्सी थामे, संकरी लोहे की सीढ़ी पर चढ़ते हैं।

इसी जगह से, ऑफिस मैनेजर मोहम्मद राशिद ने 3-4 एजेटों की एक टीम के ज़रिए बैगनवाड़ी के लोगों को हालिया वर्षों में 2.5 मिलियन रूपए (करीब 46,000 डॉलर) के सहारा बॉन्ड बेचे, ऐसा श्री राशिद का कहना है। अब, इनमें से कई लोग, जिनमें हाथों से रिक्शा खींचने वाले और 5000 रूपए (90 डॉलर) से कम मासिक आमदनी वाले फल विक्रेता भी शामिल हैं, धन-वापसी को लेकर चिंतित हैं। वो देशभर के उन 22 मिलियन से ज्यादा लोगों में हैं, जिन्होंने 2008-11 के बीच 3 बिलियन डॉलर से ज्यादा के सहारा बॉन्ड में पैसा लगाया। ये बॉन्ड अब कंपनी और देश के पूंजी बाज़ार नियामकों के बीच विवाद के केन्द्र में हैं।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) कहता है कि सहारा ने इनके निजी स्थापन का दावा करने के बावजूद सीधे लोगों को ये बॉन्ड बेचकर पूंजी बाज़ार के नियमों का उल्लघंन किया है। नियमों के मुताबिक, जब एक कंपनी 50 अथवा उससे ज्यादा लोगों को प्रतिभूति की पेशकश करती है, तो उसे सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में दिए एक आदेश में सेबी के इस विचार को जायज़ ठहराया। कोर्ट ने सहारा को इस महीने तक सेबी में ब्याज़ समेत 3 बिलियन डॉलर जमा कराने के आदेश दिए। कोर्ट ने कहा कि नियामक बॉन्डधारकों को उनका पैसा वापस करेगा।

इस महीने की शुरुआत में, सेबी ने कहा कि सहारा ने पैसा जमा नहीं कराया, लिहाज़ा नियामक ने सहारा की बॉन्ड जारी करने वाली दो इकाईयों, सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉर्प और सहारा हाउजिंग इनवेस्टमेंट कॉर्प की सारी परिसंपदा को निरुद्ध कर दिया। सेबी ने सहारा के संस्थापक और देश के सर्वाधिक अमीर कारोबारियों में एक सुब्रत रॉय के बैंक खातों और परिसंपदा को भी निरुद्ध कर दिया। सहारा ने हाल ही में कई अखबारों में विज्ञापन जारी करके कहा कि उसने सारे बॉन्डधारकों को दोबारा पैसे दे दिए हैं। सहारा के एक प्रवक्ता ने सोमवार को इस मुद्दे पर टिप्पणी से इन्कार कर दिया।

बैगनवाड़ी ऑफिस के मैनेजर श्री राशिद ने पिछले हफ्ते एक साक्षात्कार में कहा कि कंपनी ने स्थानीय लोगों से उगाहे 2.5 मिलियन रूपयों में से करीब 60 फीसदी वापस कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि बाकी दूसरी प्रतिभूति में तब्दील कर दिए गए, जिससे धारक सहारा के क्यू-शॉप नामक खुदरा स्टोरों से किराना और बाकी उत्पाद खरीद सकेगें। गौरतलब है कि मुंबई में अब तक ये स्टोर नहीं खुला है। कई बॉन्डधारक कहते हैं कि वे गुस्सा हैं और उन पर इन नई प्रतिभूतियों में निवेश हेतु दबाव डाला गया।

“मैं अपना पैसा वापस चाहता हूं। मैं महंगे किराने का क्या करूंगा?” बैगनवाड़ी में जूतों के बकसुए बनाने वाले 28 वर्षीय सुरेन्द्र कुमार जायसवाल ने कहा। श्री जायसवाल ने कहा कि 2009-2010 में उन्होंने सहारा बॉन्ड में कुल 25,000 रूपए (करीब 460 डॉलर) निवेश किए। वे इस पैसे को अपनी बेटियों, पांच साल की लक्ष्मी और दो साल की वर्षा की पढ़ाई पर खर्च करना चाहते थे।

श्री जायसवाल ने कहा कि सेबी ने कंपनी को निवेशकों को पैसा लौटाने को कहा है, अखबार में ये खबर पढ़कर पिछले साल उन्होंने अपने सहारा सेल्स एजेंट से संपर्क साधा। एजेंट ने उनसे कहा कि उन्हें अपने मौजूदा बॉन्ड को क्यू-शॉप प्रतिभूति में तब्दील करा लेना चाहिए अथवा सेबी से पैसा मिलने के लिए 10 से 15 साल इंतज़ार करना चाहिए, श्री जायसवाल ने बताया।

बैगनवाड़ी की 45 वर्षीय शमीम बानू शेख ने कहा कि उन्हें तो ये भी नहीं बताया गया कि उनके बॉन्ड एक दूसरी प्रतिभूति में तब्दील किए जा रहे हैं। सुश्री शेख इलाके की कई विनिर्माण इकाइयों में फुटकर काम करती हैं और करीब 3,000 रूपया (करीब 55 डॉलर) मासिक कमा लेती हैं। वह कहती हैं कि उन्होंने सहारा बॉन्ड में करीब 24,000 रूपए (440 डॉलर) निवेश किए, लेकिन सितबंर में उन्हें इनकी एवज़ में क्यू-शॉप सर्टिफिकेट दे दिए गए।

उन्होंने कहा कि वे इसे विशिष्ट तौर पर इसलिए विश्वासघातक समझ रही हैं क्योंकि इन बॉन्ड को बेचने वाला एजेंट उन्हीं के इलाके का है। “ऐसा लगता है मानो आपके किसी अपने ने ही आपका गला काट दिया,” सुश्री शेख ने कहा।

श्री राशिद, जिनके एजेंट ने श्री जायसवाल और सुश्री शेख को बॉन्ड बेचे, किसी भी निवेशक को जबरन खुदरा सर्टिफिकेट देने से इन्कार करते हैं। “हमने किसी को भी क्यू-शॉप में निवेश के लिए बाध्य नहीं किया। जब हम पैसे का पुनर्भुगतान कर रहे थे, उन्होंने कहा कि हमें फिलहाल पैसा नहीं चाहिए, लिहाज़ा हमने उन्हें इस योजना में निवेश का सुझाव दिया,” उन्होंने कहा। श्री राशिद ने कहा कि सहारा 34 सालों से अस्तित्व में है और “हमने हमेशा कानून का पालन किया है।” (आईआरटी)

मैं सरकारी नौकर नहीं हूं, मुझे बोलने का अधिकार है : काटजू

नई दिल्‍ली : प्रेस काउंसिल के चेयरमैन जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा है कि अक्सर ये बोला जाता है कि वो सरकारी कर्मचारी हैं इसलिए किसी के खिलाफ नहीं बोल सकते. काटजू ने कहा कि प्रेस काउंसिल के चेयरमैन पद पर रहते हुए भी उन्हें बोलने का अधिकार है. अंग्रेजी अखबार 'द हिन्दू' अखबार में लिखे लेख में काटजू ने कहा है कि कुछ लोगों की तरफ से लोगों के बीच ये भ्रम फैलाया जा रहा है इसीलिए उन्होंने ये जवाब दिया है.

काटजू के मुताबिक, 'प्रेस काउंसिल के चेयरमैन की नियुक्ति सरकार नहीं करती बल्कि इस पद के लिए चयन राज्य सभा के सभापति, लोकसभा स्पीकर और प्रेस काउंसिल के प्रतिनिधि करते हैं. इस कमेटी ने प्रेस काउंसिल अध्यक्ष के लिए मेरा चयन किया है, इसलिए मैं सरकारी कर्मचारी नहीं हूं. हर सरकारी कर्मचारी का कोई बॉस होता है, मेरा कोई बॉस नहीं है. स्वतंत्र कमेटी ने मुझे स्वतंत्र अधिकार दिए हैं.'

उन्‍होंने कहा, 'ये तर्क दिया जा सकता है कि मैं सरकार से सैलरी लेता हूं, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज को भी तो सरकार से ही तनख्वाह मिलती है तो क्या वे सभी सरकारी कर्मचारी हो गए और सरकार के खिलाफ कोई फैसला नहीं सुना सकते? कुछ लोग कह रहे हैं कि मैंने सिर्फ गैर कांग्रेसी सरकारों की आलोचना की है तो मैं उनको ये बताना चाहता हूं कि मैंने महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली की सरकार की भी आलोचना की है.' (एबीपी)

करंट लगने से पत्रकार मनजीत सिंह की मौत

पंजाब के कपूरथला के नडाला कस्बे में रहने वाले पत्रकार मनजीत सिंह मिर्जापुरी की बुधवार को सुबह लगभग 11 बजे करंट लगने से मौत हो गई। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए कपूरथला सिविल अस्पताल में भेज दिया है। आज ही उनका अंतिम संस्‍कार कर दिया गया।

जानकारी के अनुसार मंगलवार देर रात बारिश होने व आंधी चलने से मनजीत सिंह के घर के पास बिजली का तार टूट गया था। तार टूटने के चलते मनजीत तथा उनके आसपास के घरों की बिजली कट गई थी। मनजीत आज सुबह लगभग 11 बजे घर के बाहर टूट कर गिरे तार को खुद से ठीक करने लगे, इसी बीच उनका हाथ तार से छू गया और उन्‍हें करंट लग गया। करंट के झटके से तत्‍काल जमीन पर गिर पड़े और बेहोश हो गए। तत्‍काल आप परिजन तथा आसपास के लोग उन्‍हें लेकर नडाला के एक अस्‍पताल में पहुंचे। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। मनजीत के मौत से कपूरथला के पत्रकारों ने दुख जताया है।

पत्रकार मुमताज की गोली मारकर हत्‍या

इस्लामाबाद। पाकिस्तान के अशांत कबाइली इलाके में अज्ञात बंदूकधारियों ने एक वरिष्ठ पत्रकार की गोली मारकर हत्या कर दी। पत्रकार के परिवार ने बताया कि मलिक मुमताज जिओ टीवी और जांग ग्रुप के अखबारों के लिए उत्तरी वजीरिस्तान के कबाइली इलाके में काम करते थे। वह पस्तो भाषा के 'खैबर टीवी' के लिए समाचार भेजते थे।

जिओ टीवी की खबर के अनुसार, मुमताज घर वापस लौट रहे थे तभी बंदूकधारी ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। टीवी एंकर हामिद मीर ने कहा कि मुमताज को लंबे समय से धमकियां मिल रही थीं। अभी तक किसी ग्रुप ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। उनके परिवार का कहना है कि उनकी किसी से कोई रंजिश नहीं थी। (भाषा)

मनोज तोमर लखनऊ के संपादक, देवकी नंदन बनारस के यूनिट हेड बने

: स्‍नेह रंजन की सहारा में वापसी : प्रदीप सिन्‍हा पटना के यूनिट हेड बनाए गए : राष्‍ट्रीय सहारा में कई बदलाव किए गए हैं. इसके लिए लेटर जारी कर दिया गया है. नए बदलावों में लखनऊ, बनारस तथा पटना यूनिट प्रभावित हुए हैं. बनारस के स्‍थानीय संपादक मनोज तोमर का तबादला लखनऊ के लिए किया गया है. वे लखनऊ में अखबार के स्‍थानीय संपादक होंगे. यहां पर स्‍थानीय संपादक की भूमिका निभा रहे अनिल पांडेय को क्‍या प्रभार दिया जाएगा इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है, परन्‍तु खबर है कि वे सितम्‍बर के बाद एक्‍सटेंशन पर चल रहे हैं, लिहाजा वे रिटायर किए जा सकते हैं. हालांकि उनके रिटायरमेंट की पुष्टि नहीं हो पाई है.

बनारस यूनिट में स्‍नेह रंजन की एक बार फिर वापसी हो गई है. हालांकि अभी यह तय नहीं हुआ है कि उन्‍हें उनके पुराने स्‍थानीय संपादक के पद पर लाया गया है या एडिटोरियल हेड बनाकर लाया गया है. पर मनोज तोमर के लखनऊ आने के बाद एडिटोरियल की जिम्‍मेदारी स्‍नेह रंजन ही संभालेंगे. स्‍नेह रंजन पूर्व में भी राष्‍ट्रीय सहारा, बनारस के स्‍थानीय संपादक रह चुके हैं. अखबार में पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती को गाली छप जाने के बाद प्रबंधन ने उन्‍हें हटा दिया था.

तीसरी खबर पटना से है. पटना के यूनिट हेड देवकी नंदन मिश्रा का तबादला बनारस किया गया है. उन्‍हें बनारस का यूनिट हेड बना दिया गया है. इसके पहले मुमताज अहमद बनारस के यूनिट हेड थे, जिनको लखनऊ अटैच कर दिया गया था तथा यूनिट हेड की अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी मनोज तोमर को दे दी गई थी. मनोज तोमर के लखनऊ आने के बाद देवकी नंदन बनारस यूनिट के हेड होंगे. पटना में विज्ञापन मैनेजर प्रदीप सिन्‍हा को प्रमोट करके यूनिट का हेड बना दिया गया है. हालांकि अभी पता नहीं चल पाया है कि उन्‍हें यह जिम्‍मेदारी प्रभार के रूप में दी गई है या स्‍थाई तौर पर उनकी नियुक्ति की गई है.

बच्चों के विकास के लिए चिंतित हैं डॉ. कलॉम : प्रो. यशपाल

जाने माने शिक्षाविद प्रो. यशपाल ने कहा है कि बच्चों के जरिये यह बात आनी चाहिए कि उनके शिक्षक कैसे हो? उसी के अनुसार अध्यापकों को प्रशिक्षण देना होगा। जब बच्चों को यह आजादी दी जायेगी तभी उनमें रचनात्मकता का विकास होगा। पूर्व यू.जी.सी. चेयरमैन और जे.एन.यू. के पूर्व चांसलर पदमभूषण प्रो. यशपाल मंगलवार को कुशीनगर आयें और प्रो. यशपाल बुधवार को बुद्ध पीजी कालेज में विज्ञान और प्रौ़द्योगिकी मन्त्रालय के सौजन्य से आयोजित इंस्पायर इंटर्नशिप कैंप में भाग लिये। ग्लोबल साइंस फोरम के लाईफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाजे गये।

प्रो. यशपाल ने कहा कि बच्चों के विकास के प्रश्न पर पूर्व राष्ट्रपति डॉ0 एपीजे अब्दुल कलॉम ने विचार मांगे थे। मैने उनसे भी कहा कि बच्चों से पूछिये वे क्या चाहते हैं। उन्होने कहा कि आज के दौर में ज्यादा सोचने वाले लोग भी हैं और चालाक लोग भी हैं, किन्तु हमारी समस्यायें कुछ परिप्रेक्ष्य में अलग नही हैं। किसी क्षेत्र के पिछडेपन को आंकने को अलग-अलग मानक हैं। तथा डॉ कलाम सदैव बच्चों के विकास पर चिन्ति रहते है। पूर्वांचल की भूमि पर सतहीं पिछड़ापन किन्ही क्षेत्रो में दिखता है तो कही न कही यहां की मेधा का अपना अलग स्थान भी है।

छात्रों को विज्ञान की जानकारी देंगे

प्रो. यशपाल एक मार्च को दिग्विजय नाथ पोस्ट ग्रेजुएट कालेज गोरखपुर में शहर के विभिन्न स्कूलों के विद्यार्थियो की विज्ञान संबन्धी जिज्ञासाओं का समाधान करेगे। कार्यक्रम में प्रो. यशपाल बच्चों के प्रश्नों के उत्तर देगे। यह कार्यक्रम सुबह 10 बजे से शुरू होगा। मंगलवार को प्रो. यशपाल अपने पत्नी निर्मल पाल के साथ कुशीनगर पहुचे। में कहा कि बच्चों के जरिये यह बात आनी चाहिए कि उनके शिक्षक कैसे हो। उसी के अनुसार अध्यापकों को प्रशिक्षण देना होगा। जब बच्चों को यह आजादी दी जायेगी, तभी उनमें रचनात्मकता का विकास होगा।

महराजगंज से ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट

भास्‍कर में मोंगा से लक्ष्‍मीकांत दुबे का तबादला इंदौर

दैनिक भास्‍कर, मोंगा से खबर है कि लक्ष्‍मीकांत दुबे का तबादला इंदौर के लिए कर दिया गया है. वे यहां पर ब्‍यूरोचीफ की जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. संभावना है कि अगले महीने के पहले सप्‍ताह में लक्ष्‍मीकांत इंदौर में अपनी जिम्‍मेदारी संभाल लेंगे. लक्ष्‍मीकांत इसके पहले हिंदुस्‍तान, दैनिक जागरण और प्रभात खबर में लम्‍बी पारी खेल चुके हैं. वे पिछले एक साल से दैनिक भास्‍कर को पंजाब में अपनी सेवा दे रहे थे. लक्ष्‍मीकांत की गिनती अच्‍छे पत्रकारों में की जाती है. 

श्रीनगर के लोकल न्‍यूज चैनल के कार्यालय पर पुलिस ने लगाया ताला

श्रीनगर : एक लोकल केबल टीवी चैनल के प्रसारण पर प्रतिबंध और कार्यालय में पुलिस द्वारा ताला लगाए जाने के विरोध में कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि ऐसा कर सरकार और प्रशासन ने कर्मचारियों के पेट पर लात मारा है। दो प्रदर्शनकारियों ने आत्मदाह करने की कोशिश की, जिसे पुलिस ने समय रहते नाकाम कर दिया। इस चैनल का प्रसारण साइट इंटरटेनमेंट नेटवर्क (सेन) के बैनर तले किया जा रहा था।

चैनल कार्यालय पर मंगलवार को ताला लगाए जाने के दौरान प्रेस कॉलोनी में प्रदर्शन कर कर्मचारियों ने सरकार विशेषकर निजी चैनलों के डिस्ट्रीब्यूटर देवेंद्र सिंह राणा के खिलाफ नारेबाजी की। उन्होंने आरोप लगाया कि राणा ने अपने स्वार्थों के लिए सुरक्षा कारणों का बहाना बना चैनल के प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया। नेटवर्क के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अशफाक अहमद ने कहा कि राणा ने वर्ष 2005 में इस चैनल के साथ टाई-अप किया और तब से लेकर अब तक चैनल बिना किसी बाधा के चलता रहा।

दीप उपाध्‍याय, मोहित शंकर एवं राजीव रंजन इंडिया टीवी से जुड़े

जी न्‍यूज से इस्‍तीफा देने वाले तीन लोगों ने इंडिया टीवी का दामन थाम लिया है. जी न्‍यूज में आउटपुट एडिटर के तौर पर जिम्‍मेदारी निभाने वाले दीप उपाध्‍याय इंडिया टीवी में आउटपुट हेड के पद पर ज्‍वाइन किया है. जी न्‍यूज में इनपुट हेड रहे मोहित शंकर इंडिया टीवी में भी इसी पद पर आए हैं. इन दोनों के साथ राजीव रंजन भी इंडिया टीवी से जुड़ गए हैं. उन्‍हें चैनल में स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट बनाया गया है. राजीव जी न्‍यूज के साथ भी इसी पद पर कार्यरत थे. दीप और मोहित जी न्‍यूज के साथ लंबे समय से जुड़े हुए थे.

उल्‍लेखनीय है कि इंडिया टीवी में कम सैलरी और काम के दबाव तथा कार्यालय दूर होने के चलते तमाम लोग इस्‍तीफा देकर दूसरे चैनलों में जा चुके हैं. इसलिए इस चैनल में कर्मचारियों की कमी है. इसलिए इंडिया टीवी प्रबंधन ने जी न्‍यूज से इस्‍तीफा देने वाले तीनों पत्रकारों को अपने साथ जोड़ लिया. 

कंचन डोगरा सहारा समय पहुंची, सत्‍यजीत श्री न्‍यूज से बाहर

पी7 न्‍यूज से खबर है कि कंचन डोगरा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एंकर कम एसोसिएट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थीं. कंचन ने अपनी नई पारी सहारा समय के साथ शुरू की है. उन्‍हें चैनल में एंकर कम प्रोड्यूसर बनाया गया है. वे यहां पर भी एंकरिंग करेंगी.

कंचन पी7 न्‍यूज से पहले जी न्‍यूज को अपनी सेवाएं दे रही थीं. वे सोनी और डीडी पर कई कार्यक्रमों की एंकरिंग भी कर चुकी हैं. उनकी गिनती तेजतर्रार एंकरों में की जाती है.

श्री न्‍यूज से खबर है कि सत्‍यजीत प्रकाश को टर्मिनेट कर दिया गया है. सत्‍यजीत संस्‍थान में गेस्‍ट कोआर्डिनेटर की भूमिका निभा रहे थे. वे लोकसभा टीवी से इस्‍तीफा देकर श्री न्‍यूज के साथ जुड़े थे. उन्‍हें पूर्व चैनल हेड आरपीएम का नजदीकी माना जाता था. 

ओरछा और झांसी से गहरा रिश्‍ता था चंद्रशेखर आजाद का

देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्ति दिलाकर अपनी मातृभूमि को स्वाधीन करने के लिए महात्मा गांधी और अन्य सेनानियों द्वारा छेड़े गए आंदोलन में सिर्फ पंद्रह साल की उम्र में ही कूद पडे़ थे। पंद्रह दिन की सशक्त कैद और बेतों की सजा मिली लेकिन हौंसले पर रंचमात्र असर न पड़ा। बेतों का बेरहम प्रहार झेलने के बाद भी जिनके मुंह से भारत माता की जय के स्वर लगातार फूटते रहे। उस दृश्य को देखने वालों की रूह भी कांप उठी लेकिन स्वतंत्रता के उस दीवाने की दीवानगी पर कोई जर्फ नहीं आई। मातृभूमि की आजादी के दिए प्राण न्यौछावर कर देने वाले उस वीर सपूत का नाम था चंद्रशेखर आजाद।

स्वतंत्रता सेनानियों के गरम दल की अगुआई करने वालों में उनका नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है। आजाद लंबी अवधि तक झांसी और निकटवर्ती ओरछा क्षेत्र में स्थित सातार नदी के तट पर फैले जंगलों में छदम नाम से रहते रहे। इन स्थानों से ही वे अपने क्रांतिकारी साथियों से संपर्क साधे रहते और अंग्रेजों के हौंसले को पस्त करने के लिए माकूल रणनीति बनाते रहे। उनके समय में झांसी और ओरछा क्रांतिकारियों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन गए थे।

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले के भावरा नामक ग्राम में 23 जुलाई 1906 को चंद्रशेखर का जन्म हुआ। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। ये दोनों बहुत धर्मिक प्रवृत्ति के थे। माता जगरानी चंद्रशेखर को संस्कृत का प्रकांड विद्वान बनाना चाहती थीं। वे उन्हें वाराणसी के काशी विदयापीठ में अध्ययन के लिए भेजने के लिए पिता पर दबाव  डालती थीं, लेकिन विधाता को कुछ और मंजूर था। बचपन भावरा में ही बीता। इसी दौरान उन्होंने भील समाज के लोगों से तीरंदाजी यानी धनुर्विद्या सीख ली जो बाद में अंग्रेजों से संघर्ष के दौरान उनके काम आई। दिसंबर 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन छेड़ा तो सिर्फ 15 साल की आयु वाले चंद्रशेखर भी उसमें कूद पड़े। ब्रिटिश हुक्मरानों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें पंद्रह दिन की कड़ी सजा मिली। बेतों का प्रहार झेलने के बाद भी वे भारत माता का जयघोष करते रहे। इस नजारे को देखने वाले थर्रा उठे लेकिन चंद्रशेखर का हौसला और मजबूत हो गया। अंग्रेजों के जुल्म की आंच में तपकर उनका व्यक्तित्व कुंदन होकर इस तरह उभरा कि पूरी दुनिया उन्हें आजाद के नाम से जानने पहचानने लगी।

हालांकि 1922 में महात्मा गांधी ने आंदोलन को निलंबित कर दिया लेकिन आजाद और आक्रामक हो उठे। उन्होंने देश की संपूर्ण स्वतंत्रता के लिए कुछ भी कर गुजरने का निर्णय लिया। वे देश को आजाद कराने के लिए कड़ा से कड़ा रुख अख्तियार करने के हिमायती थे। वे अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष करने की भी पैरोकारी किया करते थे। उनका मानना था कि अंग्रेज यूं ही आसानी से देश छोड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे उन्हें खदेड़ना पड़ेगा। वे यह भी मानते थे कि भारत का भविष्य समाजवाद में ही सुऱक्षित है। कालांतर में चंद्रशेखर युवा क्रातिकारी प्रणवेश चटर्जी से मिले जिन्होंने उनकी मुलाकात पंति राम प्रसाद बिस्मिल से कराई। बिस्मिल ने हिदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक संगठन बनाया था। इस संगठन के उददेश्य चंद्रशेखर को बहुत भाए। आजाद ऐसे स्वतंत्र भारत का निर्माण करना चाहते थे जिसमें हर व्यक्ति को समान अधिकार मिले। जाति धर्म वर्ग या सामाजिक प्रस्थिति के आधार पर किसी से किसी प्रकार का कोई भेदभाव न किया जाए। परिचय के समय ही बिस्मिल उनसे बहुत प्रभावित हुए। बाद में इन युवाओं ने अंग्रेजों को हिला देने वाले कारनामे अंजाम दिए। सशस्त्र संघर्ष के लिए धन जुटाने की मंशा से क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खजाने को लूटने की भी योजना बनाई। सन 1925 में काकोरी में अंग्रेजों का खजाना ट्रेन से लूटने और सन 1928 में लाहौर में एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी की हत्या में आजाद और उनके साथियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

लाहौर की घटना के बाद भी वे क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम देने में लगे रहे। वे छदम वेश में झांसी में भी रहे। अंग्रेजी सेना की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के लिए वे झांसी के सदर बाजार क्षेत्र के बुंदेलखंड मोटर गैरेज में दूसरे नाम से काम करते रहे। यहीं से उन्होंने कार चलाना भी सीखा। झांसी से करीब 9.3 मील दूर स्थिस है ओरछा। इसी के पास के सातार क्षेत्र के जंगल में आजाद ने अपने क्रांतिकारी साथियों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। जंगल के पास स्थित हनुमानजी के एक मंदिर में लंबे समय तक वे ब्रहमचारीजी के नाम से रहते रहे। पास के धीमरपुरा गांव के बच्चों को उन्होंने पढ़ाया भी। इस कारण गांव के लोगों से उनका संबंध अच्छा हो गया। जब वे झांसी में रह रहे थे तो उनका संबंध सदाशिवराव मलकापुरकर विश्वनाथ वैशंपायन और भगवानदास माहौर से भी हो गया। ये लोग आजाद के बेहद करीबी हो गए। तब के झांसी के प्रख्यात कांग्रेस नेता रघुनाथ विनायक धुलेकर एवं सीताराम भास्कर भागवत से भी उनके काफी घनिष्ठ संबंध बन गए। वे नई बस्ती के निवासी मास्टर रूद्रनारायण के घर भी कुछ दिन तक रुके।

राम प्रसाद बिस्मिल के कारण शाहजहांपुर भी क्रांतिकारियों का अहम केंद्र रहा। काकोरी ट्रेन लूटकांड के बाद ब्रिटिश शासन ने क्रांतिकारियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। बिस्मिल अशफाकउल्ला खान रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को फांसी की सजा सुना दी गई। बिस्मिल का गीत सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजू ए कातिल में स्वतंत्रता के दीवानों पसंदीदा तराना बन गया। यह गीत आज भी सुनने वालों को जोश से भर देता है। अपने कुछ साथियों को फांसी की सजा मिलने के बाद आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के नाम से पुनर्गठित किया। इसके लिए उन्होंने शिव वर्मा महावीर सिंह और भगवतीचरण बोहरा का सहयोग लिया।

वर्ष 1931 के फरवरी माह में आजाद सीतापुर जेल में बंद गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले। उन्हें उम्मीद थी कि विद्यार्थीजी के मार्फत वे भगत सिंह के केस में कांग्रेसियों को उनकी पैरोकारी करने के लिए मना सकेंगे। विद्यार्थीजी ने उन्हें यह सलाह दी कि वे इस संबंध में इलाहाबाद जाकर पंडित जवाहर लाल नेहरू से बातचीत करें। आने वाले समय वायसराय लार्ड इरविन एवं महात्मा गांधी के बीच समझौता वार्ता प्रस्तावित थी। आजाद अपने साथियों भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव के केस में कांग्रेस के बड़े नेताओं का समर्थन हासिल करना चाहते थे, ताकि उन्हें फांसी से बचाया जा सके। जब वे पंडित नेहरू से मिले तो उन्होंने किसी भी प्रकार की मदद देने से इनकार कर दिया। यही नहीं उन्होंने आजाद को तुरंत इलाहाबाद छोड़ने की सलाह भी दे डाली। 27 फरवरी 1931 को आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अपने साथियों से बातचीत करने के लिए पहुंचे। इसी बीच किसी गद्दार ने उनके अल्फ्रेड पार्क में उपस्थित होने की सूचना ब्रिटिश पुलिस को दे दी। पुलिस ने चारों ओर से पार्क की घेरेबंदी कर ली। आजाद ने अपनी पिस्टल से पुलिस की गोलीबारी का सामना किया। उनकी गोलियों से तीन पुलिसकर्मी मारे गए और कई घायल भी हुए। जब आजाद की पिस्टल में सिर्फ एक गोली बची तो अपने नाम को सार्थक करने के लिए उन्होंने खुद को गोली मारकर प्राणोत्सर्ग कर दिया। वे किसी भी सूरत में आजाद ही रहना चाहते थे। पुलिस के हाथों गिरफ्तार होने से बेहतर उन्होंने खुद मौत को गले लगा लेना ही माना। जब लोगों को सूचना मिली तो वे पार्क के पास एकत्र हो गए। लोगों ने वहां आजाद के समर्थन और ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में नारे भी लगाए। बाद में उनका अंतिम संस्कार रसूलाबाद घाट पर कर दिया गया। आजाद से संबंधित फाइल आज भी लखनऊ स्थित सीआईडी के मुख्यालय पर रखी हुई है। उनकी पिस्टल इलाहाबाद के संग्रहालय में रखी गई है। अब अल्फ्रेड पार्क को आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है।

सन 1965 में मनोज कुमार अभिनीत फिल्म शहीद में आजाद भगत सिंह और उनके साथियों की गतिविधियों रुपहले परदे पर दिखाया गया। 23 मार्च 1931 शहीद फिल्म में भी इन सबकी गतिविधियों दर्शाया गया। इसके नायक सन्नी देओल रहे। लीजेंड आफ भगत सिंह फिल्म में भी इन सबको दिखाया गया। सन 2006 में प्रदर्शित आमिर खान की फिल्म रंग दे बसंती में भी इन क्रांतिवीरों को याद किया गया। किसी शायर ने ठीक ही लिखा है – शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले.. वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।

लेखक उमेश शुक्‍ल बुंदेलखंड विश्‍वविद्यालय के जनसंचार और पत्रकारिता विभाग से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क मोबाइल नंबर – 9452959936 के जरिए किया जा सकता है.

रेलवे स्‍टेशन पर सजा सांसद का मंच, राज एक्‍सप्रेस को छोड़ किसी ने नहीं छापी खबर

मध्‍य प्रदेश से खबर है कि मुरैया-श्‍योपुर के सांसद ने नियम के विपरीत रेलवे स्‍टेशन पर डीएम और एसपी की मौजूदगी में राजनीतिक सभा कर डाली. इस खबर को राज एक्‍सप्रेस के अलावा किसी भी अखबार ने प्रकाशित नहीं किया. एमपी के तमाम प्रतिष्ठित अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित करने की बजाय दबा दिया. बताया जा रहा है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना शुरू की गई है.

इस योजना के तहत 25 फरवरी को मुरैना-श्योपुर सांसद नरेन्द्र सिंह तोमर तीर्थयात्रियों को शुभकामनाएं देने के लिए प्रातः 10 बजे मुरैना रेलवे स्टेशन पर पहुंचे. इसी दौरान आनन-फानन में कलेक्टर मुरैना डीडी अग्रवाल व पुलिस अधीक्षक इरशाद वली की मौजूदगी में रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म क्रमांक 02 पर छोटी-छोटी टेबल लगाकर मंच तैयार किया गया. इस मंच से सांसद श्री तोमर ने माइक लगाकर तीर्थयात्रियों को संबोधित किया. साथ ही प्रदेश सरकार की शान में कसीदे गढ़े.

लेकिन असली बात यह है कि नियमानुसार रेलवे स्टेशन परिसर, रेल्वे प्लेटफार्म पर कोई भी जनप्रतिनिधि, राजनीतिक दल सभा को संबोधित नहीं कर सकता, लेकिन रेलवे स्टेशन मैनेजर की सहमति व पुलिस व प्रशासनिक नुमाइंदों की मौजूदगी में सांसद ने रेलवे के नियमों को दरकिनार कर प्लेटफार्म पर ही मंच सजा डाला. इस खबर को राज एक्सप्रेस समाचार पत्र के मुरैना संस्करण में पेज 11 पर प्रमुखता से प्रकाशित किया गया, परंतु दैनिक भास्कर, दैनिक पत्रिका, दैनिक नई दुनिया जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के संज्ञान में होने के बावजूद भी इस खबर को छापना वाजिब नहीं समझा.

फिर मिलने के वादे संग कल्पवासी लौटने लगे घर

इलाहाबाद। संगम की रेती को माथे लगा त्रिवेणी मइया का आशीष मांगा। पड़ोसियों से गले मिले और फिर मिलने का वादा कर लाखों कल्पवासी संगम नगरी से अपने-अपने घरों को विदा हो गए। ना कोई नेवता ना कोई चिट्ठी, बिन बुलाए ही करोड़ों लोगों का हर साल सैकड़ों-हजारों किमी दूर से यहां आना। एक अलौकिक उत्सव… जहां शब्द फीके पड़ जाते हैं। संगम के किनारे बालू की रेती पर आनंद लेना… इसे सिर्फ महसूस ही करके जाना जा सकता है।

घर-गृहस्थी छोड़ एक महीने के लिए संगम के किनारे रेती में सोना, खाना, रहना सब कुछ चला। साथ में पूजा-पाठ, सुबह-शाम घाट पर स्नान करने जाना हो या सत्संग-प्रवचन सुनने, इन सभी में साथ आए-गए। ऐसे में लगाव होना स्वाभाविक था। माघी पूर्णिमा स्नान के बाद कल्पवासियों के विदाई की बेला थी। महीनेभर बाद घर वापस लौटने का समय आया तो त्रिवेणी मइया और पड़ोसी से बिछड़ने का गम चेहरों पर साफ दिखा। थोड़े दिनों का ही सही, स्नेह और लगाव तो हो ही जाता है।

सो, विदा होते कल्पवासियों के चेहरे पर गम साफतौर पर दिखा। गले मिलकर विदा होते समय कई महिलाओं, खासकर बूढ़ी दादी अम्माओं की आंखें भर आईं। भर्राए गले से बामुश्किल आवाज निकली-‘अच्छा! चल रहे हैं दुलहिन। उधर, ‘बहुरियों’ ने भी उन्हें आश्वस्त किया-जाओ अम्मा, अच्छे से रहना। …त्रिवेणी मइया चाहेंगी तो अगले साल फिर यहीं मिलेंगे।’ घर लौटते समय बोरियों में बचे राशन को देकर अन्नदान किया और कपड़े की पोटलियों में गंगा मइया, साधु-संतों का आशीष ले आए।

कुंभ नगरी से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

उल्‍हास तायडे बने मुंबई में जदयू के मीडिया इंचार्ज

जनता दल महाराष्‍ट्र इकाई की बैठक पुणे में हुई. इसमें जदयू के कई वरिष्‍ठ पदाधिकारी मौजूद रहे. जदयू के राष्‍ट्रीय महासचिव जावेद रजा, मुंबई के अध्‍यक्ष राजकुमार सिंह समेत काफी संख्‍या में पार्टी के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित हुए. जावेद रजा ने कहा कि राज्‍य में सबसे बड़ी समस्‍या सूखा की है. उससे भी ज्‍यादा ज्‍वलंत मुद्दा है सूखे से प्रभावित इलाकों के किसानों द्वारा आत्‍म हत्‍या किया जाना.

उन्‍होंने कहा कि कार्यकर्ता किसानों तथा आमलोगों की समस्‍याओं को लेकर संघर्ष करें. खासकर विदर्भ इलाके में जहां कर्ज के बोझ तले दबे किसान आत्‍महत्‍या करने को मजबूर हो रहे हैं और सरकार कुछ नहीं कर पा रही है. इस दौरान आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर तैयार रहने की बात भी कही गई. इस मीटिंग में मुंबई क्षेत्र के महासचिव उल्‍हास तायडे को उनकी क्षमताओं को देखते हुए मुंबई में मीडिया का पार्टी इंचार्ज बनाया गया.

उल्‍हास मुंबई में जाने पहचाने शख्यित हैं. अब मुंबई में जदयू से जुड़े कार्यक्रमों एवं अन्‍य योजनाओं की सूचना उल्‍हास के माध्‍यम से ही मीडिया को दी जाएगी. उल्‍हास आम लोगों की परेशानियों के लिए आए दिन संघर्षरत रहते हैं. उल्‍हास के मीडिया इंचार्ज बनाने जाने के बाद मुंबई के आम लोगों की आवाज और लोगों तक पहुंच पाएगी. मीटिंग में महाराष्‍ट्र में जदयू अध्‍यक्ष राजेश जगताप समेत कई लोग मौजूद रहे.  

”आखिर फंसा ही दिया पुलिस ने मुझे और मेरे पत्रकार साथियों को”

यशवंतजी, नमस्कार. पिछली बार मैंने आपको बताया था कि किस तरह नरसिंहपुर पुलिस ने पत्रकारों पर फर्जी मामला दर्ज किया है. इस बात को लेकर मैं व मेरे पत्रकार साथी प्रदेश के गृह मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक अपनी बात पंहुचा चुके हैं. स्‍वयं गृहमंत्री एवं मुख्यमंत्री से बात कर चुके हैं और सारे सबूत उन्हें दे चुके हैं, पर कोई हल नहीं निकला. एक दिन पुलिस ने थाना कोतवाली में एक मामले में कवरेज के दौरान धोखे से मुझे इस वजह से गिरफ्तार कर लिया कि मैं जिस मामले में कवरेज कर रहा था यदि वहां मीडिया न होती तो पुलिस के वारे न्यारे हो जाते.

पर काम बिगड़ता देख पुलिस ने सारी खुन्नस हम पर उतार दी. मुझे गिरफ्तार कर लिया. इस बात से मुझे बड़ा ही आघात लगा और मुझे चेस्ट पेन होने लगा. मुझे थाने में मानसिक यातनाये दी गईं, धमकाया गया. वो तो शुक्र है कि नरसिंहपुर के सारे पत्रकार साथी थाने आ गए और पुलिस कस्टडी में मुझे तुरंत जिला अस्पताल ले जाता गया और तुरंत ईसीजी की गई और मुझे भर्ती किया गया.  मेरे इसी मामले मुझे और मेरे जिन साथियों को पुलिस द्वारा फंसाया गया था वे भी बेचारे पत्रकारिता के धर्म व मित्रता को निभाते हुए स्वयं ही पुलिस को सरेंडर कर दिया.

मेरी हालत लगातार ख़राब हो रही थी तो मुझे जबलपुर मेडिकल कॉलेज में रेफर कर दिया गया, जहां मुझे तीन-चार दिन आईसीयू में रखा गया. हालांकि दूसरे दिन ही सेशन कोर्ट से बेल मिल गई थी, जबकि प्रदेश के जनसंपर्क आयुक्त ने सारे मामले को समझते हुए प्रदेश के डीजीपी को एक पत्र भी लिखा और फर्जी मामले के तत्काल निवारण को कहा गया था, पर लगता है प्रदेश का कानून अंधा ही नहीं बहरा भी हो गया है. आपको मैं मामले के सारे दस्तावेज मेल कर रहा हूं और आपसे सहयोग चाहता हूं. और निवेदन है कि इसे भड़ास में भी स्थान दें.

धन्यवाद.

पंकज गुप्‍ता

pankajbansalnews@gmail.com


मूल खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें – नरसिंहपुर पुलिस फंसाना चाहती है मीडियाकर्मियों को, फर्जी मामला दर्ज किया

ट्राई का निर्देश – अपने ग्राहकों का ब्‍योरा रखें केबल ऑपरेटर

नई दिल्ली। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकार (ट्राई) ने दिल्ली, मुंबई व कोलकाता के मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ) तथा स्थानीय केबल ऑपरेटरों से कहा है कि वे अपने ग्राहकों का पूरा ब्योरा रखें जिनमें उनकी इच्छित सेवाओं की जानकारी भी हो। नियामक का कहना है कि डिजिटलीकरण का वास्तविक फायदा आम ग्राहकों तक नहीं पहुंच रहा है।

ट्राई ने बुधवार को कहा कि ग्राहकों का पूरा ब्योरा रखने की प्रणाली सब्सक्राइबर मैनेजमेंट सिस्टम की स्थापना से और पारदर्शिता आएगी, क्योंकि इससे ग्राहकों के पास अपनी पसंद की सेवाओं का इस्तेमाल तथा उसके हिसाब से ही खर्च प्रबंधन का विकल्प होगा। ट्राई सेवाओं की गुणवत्ता संबंधी नियमों के अनुसार एमएसओ को सब्सक्राइबर मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस) स्थापित करना होगा जिसमें ग्राहकों का पूरा ब्योरा तथा उनकी पसंद की सेवाओं की जानकारी होनी चाहिए।

ट्राई का कहना है कि अनेक एमएसओ ने इस फीचर का कार्यान्वयन नहीं किया है और अनेक मामलों में केबल ऑपरेटरों ने अपने संबद्ध एमएसओ को पूर्ण ग्राहक आवेदन फॉर्म उपलब्ध नहीं कराया गया है। देश में केबल डिजिटलीकरण का काम चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जा रहा है और पहला चरण एक नवंबर 2012 को पूरा हो गया। (भाषा)

मीडिया को अभिनेत्रियों के कम कपड़े की चिंता है, उन महिलाओं की फिक्र नहीं जिनके पास तन ढंकने को कपड़े नहीं

अगर मुझसे पूछा जाए कि अमृत और स्याही में से तुम क्या लेना पसंद करोगे तो मैं हर बार स्याही को ही चुनूंगा, ताकि यह कलम के जरिए उजाले की ताकत बन सके। उजाले से मेरा मतलब दुनिया को अच्छाई से रोशन करने वाली सभी कोशिशों से है। मेरा जन्म राजस्थान के झुंझुनूं जिले के एक छोटे-से गांव कोलसिया में हुआ। बुजुर्गों से मालूम हुआ कि वह साल 1987 था। भयंकर अकाल का साल। सही वक्त मुझे याद नहीं, तब मैं बहुत छोटा था और बड़ों ने जानने की कोशिश नहीं कि क्योंकि घड़ी रखने का सौभाग्य तब हर किसी को नहीं मिलता था। तारीख थी 6 अगस्त, हिरोशिमा बम कांड की बरसी।

मेरी पढ़ाई की शुरुआत गांव के सरकारी स्कूल से हुई। उन दिनों अध्यापकों की ‘मदर इंडिया’ फिल्म के इस संवाद में गहरी आस्था थी कि – बिना मुर्गा बने विद्या नहीं आती, लेकिन मुर्गा बनने और मास्टर जी की छड़ी का स्वाद चखने के अवसर मेरे जीवन में न के बराबर आए, फिर भी उनका खौफ बराबर बना रहा। स्कूल में मेरे एक शिक्षक श्रवण कुमार जी ने एक दिन मुझसे कहा – तुम पढ़ाई में अच्छे हो, लिखने में भी बुरे नहीं हो। आज से तुम प्रार्थना सभा में अखबार पढ़कर सुनाया करो। उनका यह हुक्म मेरे लिए किसी सुनामी से कम नहीं था। मैंने कोई बहाना याद करना चाहा, पर अक्ल साथ नहीं दे रही थी। लिहाजा ठीक आधा घंटे बाद मेरी पेशी हुई और मैंने राजस्थान पत्रिका से खबरें पढ़कर सुनाई।

फिर एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि तुम इस अखबार के संपादक के नाम चिट्ठी लिखकर भेजा करो। बात मुझे ठीक लगी, मैंने लिखी और वह प्रकाशित हुई। मैं मेरे गांव का पहला व्यक्ति हूं जिसका कोई पत्र अखबार में छपा था। सर्दियों के दिन थे, इसलिए मैंने मित्रों को गुड़ की दावत दी। उन दिनों मेरे दिमाग में एक विचार आया कि हमारे गांव में ताश खेलने वालों के लिए निर्धारित जगह है, शराब पीने वालों के लिए भी इंतजाम हैं, लेकिन विद्यार्थियों के लिए ऐसी कोई जगह नहीं जहां वे स्कूल के अलावा बैठकर पढ़ाई कर सकें। मैंने इसका समाधान तलाशा और कुछ दिनों बाद ही एक लायब्रेरी शुरू की। समझदार और बड़े लोगों ने हमारी इस कोशिश की खिल्ली उड़ाई, लेकिन हमें नहीं मानना था, इसलिए नहीं माने। लायब्रेरी का नियम यह था कि कोई भी, उसका इंसान होना अनिवार्य है, वह सदस्य बन सकता है। अगर चाहे तो अपनी कुछ किताबें दे सकता है और न चाहे तो कोई पाबंदी नहीं। हमारी लायब्रेरी चल निकली। उधर विरोध में कुछ नरमी आई।

कुछ दिन बीते। दिन महीने और साल बने। पढ़ाई के सिलसिले में मुझे जयपुर आना पड़ा। मैं नेचुरोपैथी का कोर्स कर रहा था। इस दौरान लिखने का सिलसिला बदस्तूर जाती रहा। मेरे कई पत्र छप चुके थे और एक बड़ा लेख गीता प्रेस की कल्याण पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ। गांव से सैकड़ों मील दूर आने के बाद भी यह मेरे सपनों में हमेशा जिंदा रहा। लायब्रेरी, जिसमें हजारों किताबें थीं, अब उसे संभालने वाला कोई नहीं था। मैं रोज रात को डायरी में लिखी बातों को पढ़ता और गांवों के बारे में कई योजनाएं बनाता। मैं जानता था कि इस काम में पैसों की भी जरूरत होगी लेकिन मैंने फैसला किया कि किसी से भी आर्थिक मदद नहीं लूंगा और पैसों का इंतजाम खुद ही करूंगा। उन दिनों मैं नेचुरोपैथी की ट्रेनिंग कर रहा थ। बता दूं कि यह कोर्स मुझे एक हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के बाद करना पड़ा। पहले मैंने इससे इलाज कराया था। योजनाएं कई थीं लेकिन आर्थिक जरिया कोई नहीं। जितने पैसे घर से मिलते उनसे किसी तरह पेट पूरा हो सकता था, सपने नहीं। एक दिन मालूम हुआ कि एक नामी अखबार में भर्ती निकली है। आर्थिक जरूरतों के लिए मैं यह काम करना चाहता था। मैंने आवेदन किया, परीक्षा दी और चुन लिया गया।

करीब दो साल तक वहां काम किया। इस दौरान मैंने ग्रामीण भारत की जरूरतों और युवाओं की समस्याओं पर काफी जानकारी हासिल की। मैंने पाया कि गांवों की सभी समस्याओं की वजह है जानकारी का अभाव। युवाओं को नहीं मालूम कि उन्हें क्या पढ़कर क्या करना चाहिए, इसीलिए वे बेरोजगार हैं और गांव के आम लोगों को नहीं मालूम कि देश के कानून ने उन्हें क्या हक दिए हैं, इसीलिए वे भ्रष्टाचार के शिकार हैं और सरकारी बाबू उनसे ठीक तरह से बात भी नहीं करते। यही गरीबी की सबसे बड़ी वजह है जिससे दूसरी समस्याएं पैदा होती हैं और यही भेदभाव का कारण है।

मैं मेरी लायब्रेरी को शिक्षा का एक अहम जरिया बनाना चाहता था, इसलिए मैंने तय किया कि अब इसे नए सिरे से शुरू करना चाहिए। अब तक कुछ तकनीकी बातें भी सीख चुका था। मैंने इसे ऑनलाइन शुरू करने का फैसला किया और नया नाम रखा – लाइट हाउस लायब्रेरी। मैंने इंटरनेट के जरिए मेरी बात रखी तो कई लोगों ने इसमें दिलचस्पी ली। मैंने एक ऑनलाइन न्यूज लेटर भी शुरू किया जिसमें सकारात्मक जीवन की कहानियां और सेहत के बारे में जानकारी दी जाती है। मैं पूर्व में बता चुका हूं कि एक दुर्घटना के बाद मेरी सेहत काफी खराब हो चुकी थी। दवाइयों के असर से मेरे बाल लगभग उड़ चुके थे। मैंने नेचुरोपैथी में खुद के स्तर पर कई प्रयोग किए। कई नुस्खों पर गौर किया और उनसे कुछ उत्पाद बनाए। उनमें से एक केश तेल भी था, जिससे मेरे काफी बाल वापिस आ गए। बाद में मैंने यह उत्पाद अफगानिस्तान तक भेजा। मैं सुबह अखबार के दफ्तर में काम करता और देर रात को मेरे प्रयोग करता। मैंने चर्म रोग, कफ रोग, दमा और मधुमेह पर प्रयोग किए और उनमें काफी हद तक कामयाबी भी मिली। मैं दिल्ली से प्रकाशित होने वाली पत्रिका कंस्यूमर वॉयस की संपादक रूपा वाजपेयी जी का अत्यंत आभारी हूं, जिन्होंने अपनी पत्रिका में मेरा कॉलम शुरू किया और वह निरंतर प्रकाशित हो रहा है। नेचुरोपैथी पर मेरा एक लेख अफगानिस्तान के काबुल से प्रकाशित होने वाले मशहूर आउटलुक अफगानिस्तान में भी संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ।

मेरा विचार अब एक ऐसा लघु उद्योग शुरू करने का है, जो सिर्फ पैसे कमाने के बजाय गांवों की ताकत बन सके। इसमें इंटरनेट की अहम भूमिका होगी। अगले चरण में मैं लायब्रेरी के जरिए स्कूलों पर आधारित एक न्यूज लेटर शुरू करना चाहता हूं। इसके लिए मैं स्कूलों और शिक्षकों से संपर्क करूंगा। अगर जरूरी हुआ तो बच्चों को इंटरनेट और ईमेल का उपयोग करना भी सिखाऊंगा। अक्सर देश की आर्थिक ताकत का जायजा लेने के लिए शेयर बाजार के आंकड़ों की उड़ान, शहरों में ऊंची होती इमारतों के कद, जहरीला होता धुआं, आयात-निर्यात के बोझिल समीकरणों पर बहस और फैशन समारोह में जुटी फिल्मी हस्तियों की बात की जाती है, लेकिन देश के छह लाख से ज्यादा गांव इससे गायब रहते हैं। हमारे मीडिया को उन अभिनेत्रियों की बेहद चिंता है, जिनके जिस्म पर बेहद कम कपड़े हैं, लेकिन उन महिलाओं की कोई फिक्र नहीं जिनके पास तन ढंकने के लिए कपड़े नहीं। मीडिया को किसी खिलाड़ी के शतक का इंतजार है लेकिन वह आदमी उनकी सुर्खियों से हमेशा गायब रहता है जो दिनभर में सौ रुपए भी नहीं कमा पाता और एक दिन आत्म हत्या करता है। यही वजह है कि 2013 का भारत 1913 की समस्याओं से जूझ रहा है और इसके लिए मीडिया अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता। दूसरों को आईना दिखाने से पहले खुद तो देख लीजिए, यकीन कीजिए, हमारे चेहरे पर भी इतने दाग हैं जिन्हें धोने को शायद गंगा भी मना कर दे।

लेखक राजीव शर्मा पत्रकार एवं एक्‍टीविस्‍ट हैं. उनसे संपर्क ईमेल write4mylibrary@gmail.com या मो. नं. 07737-224641 पर संपर्क कर सकते हैं.

मोहब्बत से मरहूम रहा 71 अरब का मालिक!

दौलत और शोहरत के पीछे भागती दौड़ती दुनिया में कई तथ्‍य ऐसे भी हैं, जो आश्चर्य होने के साथ-साथ बेनाम सा विस्मय बन जाते हैं। उदाहरण हिंदुस्तान की औद्योगिक हस्ती खुद रतन टाटा हैं, जिन्हें दौलत और शोहरत तो मिली, लेकिन मोहब्बत-चाहत का एक तिनका भी नसीब नहीं हुआ। यह बात खुद उन्होंने एक साक्षात्कार में खोली है। इश्क उन्हें चार बार हुआ, लेकिन टाटा का नसीब ही खराब था। कुल मिलाकर अरबों डॉलर, यूरो, पौंड का मालिक मोहब्बत की गरीबी में जी रहा है। टाटा प्यार, पत्नी, औलाद के सुख से वंचित हैं। आम आदमी की पहुंच में नैनो का पहुंचाकर एक असंभव सपना पूरा करने वाले टाटा का प्यार पाने का सपना आज तक अधूरा है।

कार से लेकर नमक तक बेचने वाले टाटा ग्रुप को बरसों-बरस बाद साइरस मिस्त्री के रूप में वारिस मिला। 28 दिसंबर को 71 अरब वाले टाटा समूह की मुख्य कंपनी टाटा सन्स के नये उत्तराधिकारी की घोषणा हुई, जिनका नाम सायरस मिस्त्री है। 43 साल के सायरस के नाम का खुलासा खुद रतन टाटा ने किया। रतन टाटा दिसम्बर 2012 में रिटायर हो गए, इसके बाद सायरस ने उनका पदा संभाला। अगर आज रतन टाटा विवाहित होते और उनकी अपनी कोई संतान होती तो शायद आज टाटा ग्रुप का चेयरमैन वो ही होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि अगर ऐसा होता तो इतिहास अपने आप को दोहरा नहीं पाता।

आपको जानकर हैरत होगी कि देश के बड़े घरानों में से एक टाटा ग्रुप के फाउंडर चेयरमैन को छोड़कर किसी भी चैयरमैन का कोई वारिस नहीं था। सन 1887 में टाटा एंड संस की स्थापना करने वाले जमशेदजी नुसेरवांजी के बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा सन्स 1904 में अपने पिता के निधन के बाद कंपनी की कमान संभाली, लेकिन 1932 में वो भी परलोक सिधार गये। उस समय कंपनी को संभालने वाला कोई नहीं था, क्योंकि सर दोराबजी टाटा की कोई संतान नहीं थी। इसलिए इस बार कंपनी की कमान उनकी बहन के बड़े बेटे सर नॉवरोजी सकटवाला को दे दी गयी, लेकिन सर नॉवरोजी सकटवाला की 1938 में अकस्मात मृत्यु हो जाने के बाद जेआरडी टाटा को टाटा ग्रुप सौंपा गया। यहां आपको बता दें कि जेआरडी टाटा जमशेदजी टाटा के चचेरे भाई के बेटे थे, जिन्होंने भारत को पहली एयरलाइंस सुविधा मुहैया करायी।

मगर, अफसोस! जेआरडी टाटा की भी कोई औलाद नहीं थी। इसलिए 1991 में कंपनी की कमान रतन टाटा को सौंपी गयी। रतन टाटा नवल टाटा के बेटे थे, जिन्हें जमशेद जी ने गोद लिया था। उसके बाद तस्वीर आपके सामने है, क्योंकि रतन टाटा के बाद टाटा ग्रुप के मौजूदा वारिस सायरस मिस्त्री हैं। स्पष्ट कर दूं कि सायरस मिस्त्री रतन टाटा के सौतेले भाई के सगे साले हैं। इसे संजोग ही कहे कि विश्व के मानचित्र में भारत को औद्योगिक रूप में मजबूत करने वाले टाटा ग्रुप के चेयरमैन रतन टाटा की शादी नहीं हुई। हालांकि उन्हें मुहब्बत तो कई बार हुई, लेकिन वो शादी के बंधन में नहीं बंध पायी। कुछ समय पहले एक टीवी न्यूज चैनल के कार्यक्रम में रतन टाटा ने खुद इस राज से पर्दा उठाया था।

अरबों की मिल्कियत के मालिक टाटा को एक बार नहीं बल्कि चार बार प्यार हुआ था। तीन बार की मोहब्बत तो यूं ही तफरी के लिए थी, लेकिन अपनी चौथी मुहब्बत के बारे में रतन टाटा ने कहा था, कि जब वह अमेरिका में काम कर रहे थे तो उनका प्यार बेहद गहरा हो गया था, लेकिन केवल इसलिए शादी नहीं हो पायी, क्योंकि उन्हें वापस भारत आना था। यह पूछे जाने पर कि जिनसे उन्हें प्यार हुआ था, उनमें से कोई क्या अभी भी उनसे मिलता है तो उन्होंने हां में जवाब दिया, लेकिन इस मामले में आगे बताने से इनकार कर दिया था। यह है देश के एक ऊंचे खानदान का रोचक सच, जिसे जानने का हक आप सभी को है। जहां टाटा ग्रुप ने नमक और चाय पत्ती से घर की गृहणियों का दिल जीता, वहीं आम आदमी की पहुंच में नैनो कार पहुंचा कर एक असंभव सपना पूरा कर दिया, खुद रतन टाटा का प्यार पाने का सपना आज तक अधूरा है।

लेखक अतुल कुशवाह युवा पत्रकार हैं.

हिंदू महासभा के टिकट पर फैजाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे रविन्‍द्र द्विवेदी

अयोध्‍या। अखिल भारत हिन्‍दू महासभा ने लोकसभा चुनाव 2014 में अपने उम्‍मीदवार उतारने की घोषणा की है। उत्‍तर प्रदेश के फैजाबाद (अयोध्‍या) लोकसभा से उत्‍तर भारत के प्रभारी रविन्‍द्र द्विवेदी होंगे। यह जानकारी उत्‍तर भारत के प्रवक्‍ता संजीव माथुर ने आज अपने अयोध्‍या आगमन पर जारी बयान में दी। संजीव माथुर ने कहा कि रविन्‍द्र द्विवेदी श्रीराम जन्‍म भूमि पर भगवान श्री राम का भव्‍य मंदिर का निर्माण, फैजाबाद का नई दिल्‍ली की तर्ज पर विकास और नागरिक सुविधाओं की बहाली, पृथक अवध प्रदेश का गठन और अयोध्‍या को राजधानी का दर्जा, अल्‍पसंख्‍यक समुदाय को भेदभाव रहित समान अधिकार, समान अवसर और समान संसाधनों के साथ शिक्षा, रोजगार और विकास की धारा में शामिल करना, सामाजिक न्‍याय  पर आधारित समरस समाज की संरचना, किसानों की खुशहाली सहित स्‍थानीय मुद्दों पर फैजाबाद से चुनाव लड़ेंगे।

रविन्‍द्र द्विवेदी ने फैजाबाद से चुनाव लड़ने का निर्णय गत 27 फरवरी को इलाहाबाद महाकुभ में मां गंगा की पवित्र धारा में डुबकी लगाने के बाद वहां के साधु-संतों के परामर्श पर लिया था। संजीव माथुर ने बताया कि अयोध्‍या के धर्माचार्यों और साधु संतों के आशीर्वाद सहयोग से फैजाबाद लोकसभा सीट पर हिन्‍दू महासभा जीत हासिल करने में कामयाब होती है तो श्रीराम जन्‍मभूमि  पर भव्‍य मंदिर निर्माण का सपना पूरा किया जायेगा। उन्‍होंने बताया कि सितंबर-अक्‍टूबर 2013 में दिल्‍ली विधानसभा चुनाव रविन्‍द्र द्विवेदी के नेतृत्‍व में लड़ा जा रहा है। विधानसभा चुनाव संपन्‍न होने के बाद रविन्‍द्र द्विवेदी फैजाबाद लोकसभा चुनाव क्षेत्र पर ध्‍यान देंगे। हिन्‍दू महासभा की ओर से फैजाबाद धर्मयुद्ध आरंभ किया जायेगा, जिसके माध्‍यम से नागरिक समस्‍याओं का समाधान, नागरिक सुविधाओं की बहाली, भ्रष्‍टाचार की समाप्ति और आम आदमी की खुशहाली के लिये आंदोलन होगा।

संजीव माथुर अपने दो दिनों की अयोध्‍या दौरे में हिन्‍दू महासभा कार्यकर्ताओं से संपर्क कर उनसे चुनावी रणनीति पर विचार-विमर्श कर उन्‍हें उचित दिशा-निर्देश दे रहे हैं। उन्‍होंने जारी बयान में बताया फैजाबाद लोकसभा चुनाव में देश के चारों जगतगुरू शंकराचार्यों को अयोध्‍या आमंत्रित करने, हिन्‍दू संगठनों, हिन्‍दू निष्‍ठ राजनीतिक दलों और देश के प्रमुख धर्माचार्यों और अखाड़ों को पत्र लिखकर हिन्‍दू महासभा के लिये समर्थन जुटाने की रणनीति पर भी विचार-विमर्श चल रहा है। चुनाव की तैयारियों को गति देने के लिये शीघ्र ही फैजाबाद लोकसभा में चुनाव प्रभारी, चुनाव प्रचार समिति के अध्‍यक्ष एवं सदस्‍यों तथा लोकसभा की पांचों विधानसभा स्‍तर पर चुनाव प्रचार समितियों का गठन किया जायेगा। प्रत्‍येक स्‍तर की समिति में 50 सदस्‍यों को स्‍थान दिया जायेगा। हिन्‍दू महासभा लोकसभा चुनाव 2014 में तीन सौ से ज्‍यादा सीटों पर अपने उम्‍मीदवार खड़ा करेगी। (प्रेस रिलीज)

चैनल झऊआ भर मगर खबर कहीं नहीं दिखती

कमोवेश ये स्थिति उत्तर प्रदेश की तो है ही. हर जिले में थोक के भाव से चैनलों के माइक आईडी किसी न किसी कैमरामैन के झोले में मिल जायेंगे. पहले इन्हें स्ट्रिंगर कहते थे, मगर अब तो ज्यादातर इस नाम के लायक भी नहीं. जो हाल जिले स्तर पर कभी साप्ताहिक या संध्या दैनिक अखबारों का हुआ करता था, आज वही हाल टीवी चैनलों का हो चला है.

सुबह होते ही एक कैमरामैन झोले में एक कैमरा और 7-8 टीवी चैनलों की आई डी लेकर निकल पड़ता है. सुबह की शुरुआत डीएम दफ्तर के बाहर से शुरू होती है. और शाम किसी कैफे से ख़त्म होती है. कैमरामैन का काम वीडियो शूट करना है, खबर से कोई पंचायत नहीं. होली दिवाली कभी कोई हंगामा का शाट बन गया तो चैनल की फटाफट खबरों में चल गया वर्ना सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के अलावा कोई नतीजा नहीं.

चार साल पहले की बात है. बड़े चैनलों पर क्षेत्रीय खबरों का प्रतिशत अच्छा खासा होता था. आजतक, जीन्यूज़, आईबीएन7, एनडीटीवी, इंडिया टीवी जैसे चैनलों में दो चार जिलों में एक रिपोर्टर/स्ट्रिंगर होता था. खबर के लिए रिपोर्टर गाँव गली से लेकर कई जिलों के मुख्यालयों की दौड़ लगा देता था. कई दिन तक खबर पर शोध और शूटिंग करता था. कई सौ किलोमीटर की दौड़ मोटर साइकिल से कर मौका वारदात से विजुअल इकट्ठे करता और स्टोरी करता था. कभी ये स्टोरी चैनलों पर हंगामा मचाती थीं. गाँव का दर्द झलकता था. तब भुगतान भी अच्‍छा खासा मिलता था.

सभी बड़े चैनल 1200 से लेकर 2500 रुपये प्रति स्टोरी देते थे. अब कीमत 200 से 500 रह गयी है. वो भी मिलेगी या नहीं इसका भी भरोसा नहीं. लिहाजा छोटे कस्बो या जिलों के गंभीर पत्रकारों ने भी अब इस टीवी के पेशे से मुंह मोड़ लिया है. शादी विवाह में कैमरा चलाने वाले कई स्ट्रिंगर टीवी के पत्रकार हो गए हैं. क्या होगा कल के टीवी का भविष्य. कभी छोटे कस्बों और जिलों में टीवी चैनल का खूब कर्ज बढ़ा था, मगर अब दौर बदल चुका है.

लेखक पंकज दीक्षित पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

नोएडा से अलग कलस्‍टर बना मेरठ, भवानी शर्मा को मिली जिम्‍मेदारी

अमर उजाला प्रबंधन मेरठ यूनिट को हर मोर्चे पर मजबूत करने की तैयारी जुट गया है. इस क्रम में मेरठ में बिजनेस मोर्चा को मजबूती देने के लिए अलग कलस्‍टर बना दिया गया है. अब तक अमर उजाला में पांच कलस्‍टर हेड काम कर रहे थे, परन्‍तु मेरठ के कलस्‍टर बनने के बाद से इसकी संख्‍या छह हो गई है. मेरठ और देहरादून यूनिट को एक साथ जोड़ दिया गया है, जो अब तक नोएडा कलस्‍टर के अंतर्गत आता था. मेरठ का कलस्‍टर हेड भवानी शर्मा को बनाया गया है.

नोएडा कलस्‍टर के अधीन नोएडा, मेरठ तथा देहरादून यूनिट की जिम्‍मेदारी थी, जिसे शलभ राय संभाल रहे थे. परन्‍तु अब नोएडा से मेरठ और देहरादून को अलग कर दिया गया है. वहीं नोएडा के अधीन दिल्‍ली और हरियाणा को जोड़ दिया गया है, जिसकी जिम्‍मेदारी शलभ राय के पास रहेगी. अभी तक हरियाणा, चंडीगढ़, जम्‍मू एवं धर्मशाला की जिम्‍मेदारी मोहित शर्मा के पास थी, पर इस कलस्‍टर से हरियाणा को हटाकर नोएडा से जोड़ दिया गया है. अन्‍य कोई बदलाव नहीं किया गया है.

एक साल पहले अमर उजाला ने कलस्‍टर और कलस्‍टर हेड का पद सृजित किया था ताकि अखबार को बिजनेस के मोर्चे पर सफल बनाया जा सके. उपरोक्‍त लोगों के अलावा विनीत तिवारी को लखनऊ-गोरखपुर, अनिल शर्मा को आगरा-अलीगढ़-झांसी तथा डीके सिंह को बरेली-हल्‍द्वानी-मुरादाबाद का कलस्‍टर हेड बनाया गया था. जबकि कानपुर-बनारस-इलाहाबाद पुराने कलस्‍टर से ही संचालित किए जा रहे हैं. 

भास्‍कर से दैनिक सवेरा पहुंचे सुशील, अमर उजाला में नितिन का तबादला

पंजाब में दैनिक भास्‍कर की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं. दैनिक भास्‍कर, रोपड़ के ब्‍यूरोचीफ सुशील पांडेय के बारे में खबर है कि वे दैनिक सवेरा के साथ जुड़ गए हैं. उन्‍होंने भास्‍कर से इस्‍तीफा दे दिया है. दैनिक सवेरा में उन्‍हें रोपड़ का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. सुशील लंबे समय से दैनिक भास्‍कर को अपनी सेवाएं दे रहे थे.

अमर उजाला, नोएडा से खबर है कि नितिन यादव का तबादला मेरठ के लिए कर दिया गया है. वे यहां पर युवान टीम से जुड़े हुए थे. नितिन को मेरठ में माई सिटी लांच करने की योजना के तहत लाया गया है.

दिल्‍ली सरकार का हलफनामा – ‘संतुष्टि के बाद दर्ज की जी न्‍यूज के खिलाफ एफआईआर’

दिल्ली सरकार ने सर्वोच्च अदालत से मंगलवार को कहा कि जी न्यूज के पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर समुचित संतुष्टि के बाद दर्ज की गई है। पुलिस की ओर से पहले साक्ष्यों और आरोपों पर विचार किया गया। इसके बाद आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्णय लिया गया।

शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली सरकार ने कहा है कि सर्वोच्च अदालत में इस मामले में अभियुक्तों के पक्ष में दायर की गई रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। अपराध प्रक्रिया संहिता के तहत उनके पास वैकल्पिक उपाय थे। इसके बावजूद उनकी ओर से सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। ऐसे में उनकी याचिका खारिज करने योग्य है।

दिल्ली सरकार के अतिरिक्त सचिव (गृह) की ओर से सर्वोच्च अदालत यह हलफनामा उस याचिका के जवाब में दायर किया गया है जिसमें कैग की रिपोर्ट में हेरफेर करने, जिंदल समूह से अवैध वसूली करने और दिल्ली गैंगरेप की शिकार युवती के साथ घटना के वक्त मौजूद रहे मित्र का इंटरव्यू दिखाने के मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई है।

हलफनामे में कहा गया है कि इन मामलों में अभी तक जांच पूरी नहीं हुई है। जहां तक मूल अधिकार के प्रयोग का सवाल है। उसके उपयोग में भी कुछ उचित पाबंदियां हैं जो सर्वोच्च अदालत के कुछ फैसलों में स्पष्ट है। इन मामलों में अभियुक्तों के किसी भी मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं होता। अभियुक्तों के खिलाफ अपराध प्रक्रिया संहिता में निर्धारित प्रक्रिया के हिसाब से ही मामला दर्ज किया गया है। आरोप बेबुनियाद हैं, अभियुक्तों के पास इसका कोई आधार नहीं है।

हलफनामे में कहा गया है कि अपराध की संज्ञेयता पर विचार करने के बाद ही मामले दर्ज किए गए और इससे पहले समुचित संतुष्टि की गई। सचिव ने यह स्पष्ट किया है कि मामले की छानबीन से नवीन जिंदल के राजनीतिक स्ततर का कोई लेना-देना नहीं है।

अभियुक्तों को अवैध वसूली के मामले में गिरफ्तार करने के 24 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। मजिस्ट्रेट की ओर से अभियुक्तों की जमानत की मांगों को दो बार खारिज किया गया। इसके बाद उन्हें सेशन कोर्ट से जमानत मिली। अदालतों ने जांच पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया है।

सर्वोच्च अदालत में अभियुक्तों की ओर से जानबूझकर याचिका दायर की गई है। ताकि तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर बचाव किया जा सके। यह आरोप पूरी तरह निराधार है कि सार्वजनिक अवकाश के दिन मामला दर्ज किया गया क्योंकि पुलिस थाने जनता के लिए हमेशा खुले रहते हैं। यह मामले किसी बदनियती से दर्ज किए गए हैं, यह पूरी तरह से गलत है।

सचिव ने याचिका को खारिज करने की मांग सर्वोच्च अदालत से करते हुए कहा है कि अभियुक्तों की ओर से आईपीसी के प्रावधानों की गलत व्याख्या की जा रही है। उनके खिलाफ फर्जीवाड़ा करने के अलावा 228अ, 384, 420, 511, 120ब और 466, 468, 469 व 471 के तहत एफआईआर दर्ज की गई हैं। (अमर उजाला)

मेरठ से जल्‍द लांच होगा अमर उजाला का ‘माई सिटी’

अमर उजाला, मेरठ में अब अपनी पकड़ और मजबूत करने की तैयारी कर रहा है. इसकी जिम्‍मेदारी संपादक राजीव सिंह को सौंपी गई है. मेरठ यूनिट के साथ अमर उजाला का भावनात्‍मक रिश्‍ता है. अखबार के निदेशक रहे अतुल माहेश्‍वरी कभी इस यूनिट की जिम्‍मेदारी संभाला करते थे. इसलिए यहां पर अखबार को अन्‍य अखबारों को कड़ा टक्‍कर देने के लिए 'माई सिटी' लांच करने की तैयारी की जा रही है. फिलहाल माई सिटी लखनऊ एवं कानपुर से प्रकाशित हो रहा है.

बताया जा रहा है कि संपादक राजीव सिंह मेरठ के प्रोफाइल एवं विकास को ध्‍यान में रखते हुए माई सिटी के तेवर को तय करने में जुटे हुए हैं. संभावना है कि इसी टीम को रीआर्गेनाइज किया जाएगा. इसका टेस्‍ट बिल्‍कुल पश्चिमी यूपी की सोच और सरोकार से जुड़ा होगा. सूत्रों का कहना है कि फिलहाल प्रबंधन ने अभी इसको लांच किए जाने की तिथि तय नहीं की है, लेकिन जल्‍द ही इसके प्रकाशन की तैयारियां शुरू की जा चुकी हैं.  

पिछले कुछ वर्षों में मेरठ में अमर उजाला का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है. अब लोगों को अमर उजाला के साथ मानसिक तौर कनेक्‍ट करने के लिए ही राजीव सिंह माई सिटी लांच करने की योजना बना रहे हैं. अमर उजाला अपने कई यूनिटों से माई सिटी का प्रकाशन कर रहा है. कानपुर जैसे शहरों में माई सिटी को बेहतर रिस्‍पांस भी मिला रहा है. हालांकि लखनऊ में माई सिटी लोगों को बहुत प्रभावित करने में सफल नहीं रहा है. 

बीजेपी माने बेटा जमाओ पार्टी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा से निष्कासित भ्रष्ट नेताओं को कमल थमाकर पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने बीजेपी को भ्रष्टाचारी जुटाओ पार्टी का तमगा दिलाया था। अब जब पार्टी लोकसभा की लड़ाई के लिए तैयारी कर रही है तो यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने प्रदेश कार्यकारिणी में कई वरिष्ठ और कर्मठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को खुड्डे लाइन लगाकर दिग्गज और गुटबाज नेताओं के बेटों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाकर बीजेपी को बेटा जमाओ पार्टी का नया खिताब दिलाया है। यूं तो बीजेपी कांग्रेस और सपा पर वंशवाद की राजनीति करने का आरोप लगाती रही लेकिन खुद उसके आंगन में वंशवाद की बेल खूब मजे से फल फूल रही है।

लखनऊ से दिल्ली तक पार्टी के गुटबाज, मठाधीश टाइप नेताओं के पुत्र, भाई और रिशतेदार जमे हुए हैं। प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और लखनऊ के सांसद एवं प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री लालजी टण्डन के नकारा बेटों को खासी तवज्जो दी गई है। पार्टी नेताओं का पूरा ध्यान अपने बेटे-बेटियों का राजनीतिक कैरियर चमकाने और जमाने में लगा है। विधान सभा चुनाव में बीजेपी के धृतराष्ट्र नेताओं के पुत्र मोह ने पार्टी की लुटिया डुबोने में बड़ी भूमिका निभाई थी, लेकिन ऐसा लगता है कि पिछली गलतियों से पार्टी नेताओं और नेतृत्व न कोई सबक नहीं लिया है और कम होने की बजाय उनका पुत्र मोह दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। इन नेताओं के पुत्र मोह के पार्टी के जुझारू, संघर्षशील और पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की अनदेखी तो हुयी ही वहीं लोकसभा चुनावों की तैयारी से पूर्व ही पहले से ही कई धड़ों में बंटी पार्टी में अंसतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं का एक और धड़ा खड़ा हो गया है।

उत्तर प्रदेश भाजपा नेताओं के पुत्र प्रेम के दर्जनों किस्से पार्टी के प्रदेश कार्यालय और लखनऊ की सड़कों में फैले हुये हैं। अटल जी की चरण पादुकाओं को पूज-पूजकर कई बार प्रदेश मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री का पद और लखनऊ के सांसद की सौगात पाने वाले लालजी टण्डन किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पेश से व्यापारी टण्डन जी पुत्र मोह में इस कदर डूबे हुये हैं कि 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब पार्टी ने उन्हें पार्टी प्रत्याशी घोषित किया तो उन्हें विधायक की सीट खाली करनी पड़ी। तब टण्डन जी चाहते थे कि इस सीट के लिए होनेवाले उप चुनाव में उनके सुपुत्र आशुतोष टण्डन उर्फ गोपाल जी को पार्टी उम्मीदवार बनाया जाए। लेकिन उनकी इच्छा के विपरित पार्टी ने पुराने कार्यकर्ता अमित पुरी को टिकट सौंप दिया तो कहते हैं कि टण्डन जी की कृपा से जो सीट बरसों से भाजपा का गढ़ मानी जाती थी, वह कांग्रेस के खाते में चली गई। टण्डन जी यही नहीं रूके। अपने रूतबे और पद का इस्तेमाल कर 2012 के विधानसभा चुनाव में अपने बेटे आशुतोष टण्डन उर्फ गोपाल जी को लखनऊ के उत्तर विधान सभा क्षेत्र से टिकट दिलाने में कामयाब रहे। लेकिन टण्डन जी और उनके सर्मथकों के जोर लगाने के बावजूद भी आशुतोष मुख्य लड़ाई से बाहर ही रहे। बरसों बरस सत्ता का स्वाद चखने वाले टण्डन जी इन दिनों पुत्र को राजनीति में स्थापित करने के लिए आतुर दिखाई देते हैं। प्रदेश कार्यकारिणी में प्रदेश महामंत्री पद पर विराजित गोपाल टण्डन का इस बार प्रोमोशन कर उपाध्यक्ष पद की अहम् जिम्मेदारी सौंपी है। गोपाल जी टण्डन की सबसे बड़ी योग्यता यही है कि वो लाल जी टण्डन के बेटे हैं।

लेकिन लालजी टण्डन कोई अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिनका पुत्रप्रेम हिलोरे मारता है। पार्टी में पुत्र प्रेम में डूबे नेताओं की लंबी लाइन है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी, ओम प्रकाश सिंह सीरखे कई नेता है जो पार्टी से अधिक अपने पुत्रों के राजनीतिक करियर को लेकर चिंतित रहते हैं। कल्याण सिंह की पार्टी का भाजपा में विलय यूं ही नहीं हुआ उसकी बड़ी वजह उनके बेटे और बहू हैं, दोनों ही पूर्व में विधायक रह चुके हैं। जबकि राजबीर सिंह तो कुछ कैबिनेट मंत्री भी रहे।

पूर्व में राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह को छोड़कर हर नेता का पुत्र चुनाव मैदान में जोर आजमाइश कर चुका है और सब के सब औंधे मुंह गिरे हैं। बावजूद इसके भाजपा के नेता अपने पुत्रों को माननीय बनाने की कोशिश में थके जरूर हैं लेकिन हारे नहीं हैं। जो काम पार्टी के नेताओं के हाथ में है वो तो कर ही रहे हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश अध्यक्ष रहे सूर्य प्रताप शाही ने राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को आउट ऑफ टर्न प्रोमोशन देते हुए उन्हें प्रदेश कार्यकारिणी में मंत्री से महामंत्री बना दिया था। प्रदेश नेतृत्व के विरोध में दो मंत्रियों ने इस्तीफा भी दे दिया था। हालांकि पंकज सिंह को 2007 के विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया गया था लेकिन वो चुनाव लड़ने का साहस नहीं दिखा सके। अब चूंकि उनके पिता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तो कहना ही क्या। प्रदेश कार्यकारिणी में फिर कोई नया विवाद न हो इसके लिए पंकज की प्रदेश महामंत्री पद की स्थिति को यथावत रखा गया है। पंकज मैदानी नेता नहीं है लेकिन वो संगठन में अपना प्रभाव बनाये हुये हैं नेता पुत्रों की बढ़ती भीड़ के बाद यूपी के बाकी नेताओं की चिंता स्वाभाविक है।

पार्टी के नेताओं को संगठन पदाधिकारी या कार्यकर्ता से ज्यादा चिंता अपने बेटों के सेटलमेंट को लेकर है। बार-बार नेता पुत्रों के फ्लाप होने के बाद भी उन्हें मौका दिये जाने का ही नतीजा है कि पार्टी के कार्यकर्ता झण्डा, डण्डा उठाने तक ही सीमित हैं। इसी प्रकार भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ओम प्रकाश सिंह के पुत्र अनुराग सिंह भी मिर्जापुर से लोकसभा चुनाव लड़कर अपनी हैसियत दिखा चुके हैं। अनुराग ने 2009 का लोकसभा चुनाव मिर्जापुर से लड़ा था और बुरी तरह परास्त हुये थे। यही नहींय क्षेत्र में इन पिता पुत्र के खिलाफ इतनी नाराजगी है कि इसकी कीमत ओम प्रकाश सिंह को पिछले विधानसभा चुनाव में अपनी सीट गंवा कर चुकानी पड़ी। भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी के पुत्र शरद त्रिपाठी भी सांसदी का चुनाव लड़कर अपना दमखम देख चुके हैं। इनमें से किसी को किसी भी सदन में पहुंचने का मौका नहीं मिला। हालांकि रमापति राम त्रिपाठी भी कोई करिशमाई नेता नहीं रहे। तीन बार विधानसभा का चुनाव लड़े और हार गये। जो नेता पुत्र चुनाव मैदान में फ्लाप हुये उन्हें संगठन में एडजस्ट कराने के लिए पार्टी के दिग्गज पीछे नहीं हैं।

पिछले महीने भाजपा में शामिल हुये पूर्व मुख्यमंत्री के पुत्र राजबीर सिंह उर्फ राजू भैया को प्रदेश कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष के पद से नवाजा गया है और उनकी पत्नी प्रेमलता वर्मा को कार्यकारिणी में सदस्य बनाया गया है। हालांकि राजबीर और उनकी पत्नी प्रेमलता वर्मा 2012 के विधानसभा चुनाव में अपने ही गढ़ चुनाव हारकर अपनी ताकत देख चुके हैं। ऐसे में राजबीर भाजपा के लिये कितने फायदेमंद होंगे ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन फिलहाल तो पार्टी कल्याण सिंह और उनके परिवार के समक्ष नतमस्तक दिख रही है। पूर्व मंत्री प्रेमलता कटियार खुद भले ही पदाधिकारी न बनी हो परन्तु उनकी बेटी नीलिमा कटियार को प्रदेश मंत्री नियुक्त किया गया। पूर्व मंत्री स्व. ब्रह्मादत्त द्विवेदी के पुत्र मेजर सुनील दत्त द्विवेदी इस बार पदाधिकारी नहीं बने सके परन्तु उनका समायोजन कार्यकारिणी सदस्य के रूप में कर लिया गया है।

दिल्ली की गद्दी का रास्ता वाया लखनऊ जाता है इसकी फिक्र किसी भी भाजपा नेता को नहीं है। प्रदेश में अपनी खोयी जमीन और जनाधार बढ़ाने की जद्दोजहद में लगी भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में पिता-पुत्र व मां-बेटी की जोड़ी से सीटों की संख्या बढ़ाने की रणनीति तैयार की है। प्रदेश भाजपा लगातार अपना जनाधार खो रही है। पिछले डेढ़ दशक में पार्टी के सांसदों की संख्या 57 से घटकर 10 व विधायकों की संख्या 187 से घटकर 47 पर पहुंच गई है। इसके बावजूद पार्टी कोई सबक लेने को तैयार नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद संघ ने चलते आड़े हाथों लिया था। संघ ने सवाल उठाया था कि भाजपा में कार्यकर्ताओं से ज्यादा नेता क्यों हैं? क्या इसका जवाब अब भी कठिन है।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

जांच की जद में फंसा जांबाज हीरो!

वायुसेना के पूर्व प्रमुख एसपी त्यागी एक जांबाज योद्धा रहे हैं। अपने लंबे करियर में उन्होंने बहादुरी और हुनर के कई कमाल दिखाए हैं। इसके चलते उन्हें कई विशिष्ट सम्मान भी मिल चुके हैं। 2007 में रिटायर होने के बाद वे आराम से अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे थे। लेकिन, इसी बीच उनके जीवन में भारी उथल-पुथल मच गया। क्योंकि एयरचीफ मार्शल (रि.) त्यागी और उनके करीबी परिजन बहुचर्चित हेलीकॉप्टर सौदे की दलाली के आरोप में फंस गए हैं।

आरोप काफी संगीन है। इस कांड को लेकर राजनीतिक हलकों में खासी सनसनी फैल गई है। मामले की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है। उसने इस प्रकरण की प्राथमिक जांच (पीई) अपने यहां दर्ज कर ली है। इसमें पूर्व वायुसेना प्रमुख सहित दस लोगों के नाम हैं। इसी के साथ चार कंपनियां भी जांच के दायरे में आ गई हैं।

शशींद्र पाल त्यागी का जन्म 14 मार्च, 1945 को इंदौर में हुआ था। इनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई जयपुर के सेंट जेवियर स्कूल में हुई थी। स्कूली दौर में हुई खेल-कूद की प्रतियोगिताओं में हमेशा अव्वल रहते थे। 31 दिसंबर, 1963 को वायुसेना में कमीशन कैडेट के रूप में शामिल हो गए थे। 1965 और 1971 में हुए भारत-पाक युद्धों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी। 1971 में तो उन्होंने अपनी जांबाजी के चलते वायुसेना में काफी शोहरत पा ली थी। 1980 में भारतीय सेना में जगुआर विमान आया था। वायुसेना ने इस विशिष्ट लड़ाकू विमान को उड़ाने के लिए जो आठ पायलट चिन्हित किए थे, उनमें एक एसपी त्यागी भी थे। बाद में, इसी उड़ान से जुड़े एक विशेष कोर्स के लिए दो पायलटों का चयन हुआ, तो एक नाम त्यागी का भी था।

एसपी त्यागी ने जल्द ही फाइटर विमान से पलटवार करने की सभी बारीकियां सीख ली थीं। उन्होंने एक अमेरिकी सैन्य कॉलेज से एक सर्टीफिकेट भी हासिल किया था। 1985 में उन्हें विशिष्ट सेवाओं के लिए वायुसेना मेडल (वीएम) भी मिला। एयर कमोडोर के रूप में उन्होंने जामनगर स्थित 33 विंग सेंटर की कमान संभाली थी। कुछ समय तक वे डिफेंस अटैची के रूप में सऊदी अरब के दूतावास में सलाहकार के रूप में कुछ समय तक पदस्थ रहे। 1994 में उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) मिला था। एओसी के रूप में वे सेंट्रल, साउथ-वेस्टर्न और वेस्टर्न एयर कमांड संभाल चुके हैं। ऐसे बहुत कम उदाहरण हैं कि जब किसी ने अपने करियर में तीन कमांड की जिम्मेदारी संभालने का रिकॉर्ड बनाया हो। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए एयर मार्शल के रूप में उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल (पीवीएसएम) 2003 में मिल गया था।

20वें वायुसेना प्रमुख के रूप में उनकी नियुक्ति 31 दिसंबर 2004 को हुई थी। वे 2007 तक इस पद पर रहे। रिटायरमेंट के पांच सालों बाद वे हेलीकॉप्टर खरीद सौदे के रिश्वतकांड की आंच में झुलसने लगे हैं। करीब एक साल पहले अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपनी खास रिपोर्ट में यह दावा किया था कि अति विशिष्ट लोगों के उपयोग के लिए हेलीकॉप्टर खरीद का जो सौदा रक्षा मंत्रालय ने किया है, उसमें अरबों रुपए की दलाली का खेल हुआ है। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद राजनीतिक हलकों में थोड़ा शोर-शराबा जरूर हुआ था। लेकिन, रक्षा मंत्री एके एंटनी ने यही कह दिया था कि अभी उनके मंत्रालय के पास ऐसी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। यदि कुछ गड़बड़ पाया गया, तो सख्त से सख्त कार्रवाई जरूर होगी।

खांटी ईमानदार छवि वाले रक्षा मंत्री एंटनी ने जब यह आश्वासन दिया, तो बात आई-गई हो गई। लेकिन, इटली की कंपनी अपने देश में शक के दायरे में आ गई थी। ऐसे में, वहां पड़ताल तेज होती गई। दरअसल, फरवरी 2010 में इटली की कंपनी ‘फिनमैक्कनिका’ और रक्षा मंत्रालय के बीच एडब्ल्यू 101 हेलीकॉप्टर खरीद का सौदा हुआ था। 12 हेलीकॉप्टर खरीदे जाने थे। इनकी कीमत करीब 3600 करोड़ रुपए बैठी थी। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे विशिष्ट व्यक्तियों के लिए सुरक्षित एवं आधुनिक तकनीक वाले हेलीकॉप्टरों की जरूरत वर्ष 2000 में ही महसूस की गई थी। उसी दौर से खरीद की शुरुआती प्रक्रिया भी एनडीए सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी।

लेकिन, अंतिम रूप से सौदा 2010 में हो पाया। ये खास किस्म के हेलीकॉप्टर ‘फिनमैक्कनिका’ की एक सहायक कंपनी ‘अगस्टा वेस्टलैंड’ बनाती है। इनका निर्माण ब्रिटेन में किया जाता है। लेकिन,   इस कंपनी का प्रशासनिक नियंत्रण फिनमैक्कनिका के पास ही रहता है। 12 में से 3 हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी भी हो चुकी है। ये सभी दिल्ली स्थित पालम हवाई अड्डे पर खड़े हैं। दलाली की गड़बड़ी की सुगबुगाहट के चलते इनका प्रयोग नहीं शुरू किया गया है। पिछले दिनों ‘फिनमैक्कनिका’ कंपनी के प्रमुख जी. ओरसी की गिरफ्तारी इटली में हो गई थी। उन पर आरोप लगा कि हेलीकॉप्टर सौदे के लिए उन्होंने कई भारतीयों को करीब 362 करोड़ रुपए की रिश्वत भिजवाई थी। दरअसल, इस मामले की पड़ताल इटली की जांच एजेंसियां काफी पहले से कर रही थीं।

यह कंपनी इटली सरकार का एक उपक्रम है। लेकिन, इसके प्रबंधन ने किसी तरह भारतीय सौदे को हासिल करने के लिए तमाम गलत हथकंडे अपनाने से परहेज नहीं किया था। रिश्वत की रकम का ब्यौरा ‘प्रमोशन एक्सपेंसेज’ के नाम पर दिखाया गया था। आॅडिट के दौरान इतनी बड़ी रकम का खेल पकड़ में आ गया। जब वहां की जांच एजेंसियों को पुख्ता प्रमाण मिल गए, तो उन्होंने कंपनी के प्रमुख पर हाथ डाल दिया। इस गिरफ्तारी के बाद ही भारत में सनसनी फैल गई। इस बात की तलाश शुरू हुई कि भारत में किन लोगों ने इतनी बड़ी दलाली की रकम को हजम किया है?

इटली की जांच एजेंसियों ने दाखिल आरोप पत्र में दावा किया कि पूर्व वायुसेना प्रमुख त्यागी और उनके तीन-चार परिजनों के माध्यम से रिश्वत की मोटी रकम एक छद्म इंजीनियरिंग सौदे के नाम पर ट्यूनीशिया और मॉरीशस की बोगस फर्मों के जरिए भेजी गई। इस आशय की खबर आई तो भारत के राजनीतिक हलकों में विवाद ने तूल पकड़ना शुरू कर दिया। यूपीए सरकार को आशंका हो गई कि कहीं विपक्ष इस रक्षा सौदे की दलाली के मामले को दूसरा ‘बोफोर्स’ बनाने की कोशिश न कर दे। उल्लेखनीय है कि 1990 के दौर में बहुचर्चित ‘बोफोर्स’ तोप की दलाली के मामले में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार हिल गई थी। इस सौदे में 64 करोड़ रुपए की दलाली का आरोप लगा था। राजीव सरकार तमाम सफाई देती रही थी, लेकिन राजनीतिक तस्वीर ऐसी बदली कि कई सालों तक कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से बाहर रहना पड़ा था।

इस राजनीतिक खतरे को भांपकर रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने बगैर किसी देरी के मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का ऐलान किया। सीबीआई ने फटाफट पड़ताल का काम भी शुरू कर दिया। पिछले दिनों एक संयुक्त जांच दल पड़ताल के लिए इटली गया था। इस जांच टीम में रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी और विदेश मंत्रालय के भी एक अधिकारी सीबीआई जांच दल के साथ गए थे। इस जांच दल ने वहां वकीलों आदि से मिलकर दलाली के कई सबूत इकट्ठे किए हैं। इनसे यह जाहिर होता है कि इतालवी कंपनी ने 362 करोड़ रुपए की दलाली तो भारत जरूर भेजी थी। इसके प्रमाण भी हैं। अब जांच एजेंसी को यह पता करना है कि इतनी बड़ी रकम यहां किन-किन लोगों ने हजम की है?

पिछले दिनों ही इटली से जांच टीम लौटी है। इसमें शुरुआती पड़ताल के बाद अपने यहां प्रारंभिक जांच (पीई) दर्ज कर ली है। जांच दायरे में एसपी त्यागी के अलावा अन्य 10 लोग हैं। जांच के दायरे में चार कंपनियां भी हैं। पीई रिपोर्ट के बाद सीबीआई ने इन लोगों को जांच के दायरे में ले लिया है। अब उसे अधिकार मिल गया है कि इनमें से किसी को पूछताछ के लिए वह बुला सकती है। लेकिन, जांच एजेंसी को इतने पुख्ता सबूत नहीं मिल पाए कि वह इनमें से किसी के खिलाफ  एफआईआर दर्ज करा सके।

जांच एजेंसी ने प्राथमिक जांच रिपोर्ट दर्ज करने के बाद एसपी त्यागी के अलावा उनके परिजन जूली, डॉक्सा और संदीप त्यागी को जांच के दायरे में लिया है। जबकि इस घेरे में यूरोपियन दलाल कार्लो गरोसा, क्रिस्ट्रीयल माइकल, गोडो होस्को व एरोमाइटिक्स कंपनी के कानूनी सलाहकार गौतम खेतान के नाम भी शामिल हैं। इस दायरे में एरोमाइटिक्स के पूर्व सीईओ प्रवीण बख्शी, फिनमैक्कनिका के पूर्व अध्यक्ष जी. ओरसी, अगस्टा वैस्टलैंड के पूर्व सीईओ ब्रूनो एडनोनली भी नामजद किए गए हैं। इतालवी कंपनी फिनमैक्कनिका, अगस्टा वेस्टलैंड, आईडीएम इंफोटेक व एरोमैटिक्स कंपनियां सीबीआई के जांच दायरे में आ गई हैं।

हालांकि, पूर्व वायुसेना प्रमुख त्यागी ने लगातार यही कहना शुरू कर दिया है कि उन्हें कुछ लोग साजिश के तहत फंसाने में लगे हैं। उन्हें आशंका है कि कुछ बड़े लोगों को बचाने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाने की कोशिश हो रही है। वे दावा करते हैं कि उन्होंने एक रुपए की भी दलाली नहीं ली। उन्हें लगता है कि उनके भतीजों को भी गलत ढंग से फंसाया जा रहा है। सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि जांच का काम खास प्रगति पर है। जल्द ही वे लोग कुछ भारतीयों के लिए ‘लुक आउट’ नोटिस जारी करने की तैयारी कर रहे हैं। ताकि, रक्षा दलाल देश के बाहर न भाग जाएं। जांच एजेंसी रक्षा मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगने जा रही है। कई अधिकारियों के कॉल डिटेल्स भी खंगालने की तैयारी चल रही है। जो लोग शक के दायरे में हैं, उनके बैंक खातों की पड़ताल भी शुरू हो गई है। सूत्रों के अनुसार, एजेंसी को इस बात से खास हैरानी हो रही है कि पूर्व वायुसेना प्रमुख के निजी खातों में कभी भी कोई मोटी रकम नहीं जमा हुई। देश में उनकी ऐसी संपत्तियां भी नहीं है, जिन्हें इस दलाली कांड से जोड़ा जा सके। लेकिन, इनके दो भतीजे पूरी तौर पर   शक के दायरे में हैं। इनमें से एक के घर में तत्कालीन वायुसेना प्रमुख त्यागी ने एक विदेशी दलाल से मुलाकात भी की थी। इसे त्यागी स्वीकार भी कर चुके हैं। बस, इतना ही कह रहे हैं कि उन्हें नहीं मालूम था कि सामने बैठा शख्स कोई रक्षा दलाल है?

एसपी त्यागी यही सफाई दे रहे हैं कि हेलीकॉप्टर खरीद का सौदा 2010 में हुआ। जबकि वे तीन साल पहले ही रिटायर हो गए थे। ऐसे में, सौदे को प्रभावित करने की उनकी हैसियत नहीं थी। जबकि, जांच एजेंसी का मानना है कि वायुसेना प्रमुख के रूप में हेलीकॉप्टर खरीद के लिए त्यागी ने खरीद सौदे की शर्तों में ऐसे बदलाव करा दिए थे, जिनसे कि वेस्टलैंड कंपनी को निर्णायक फायदा हुआ। जबकि, त्यागी सबूत दे रहे हैं कि शर्तों में बदलाव अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौर में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा के निर्देश पर हुए थे।
    
मंत्रालय के पास इस आशय के प्रमाण भी मौजूद हैं। फिर भी, उन्हें फंसाया जा रहा है। जबकि, सीबीआई को इटली से इस आशय की जानकारी मिली है कि ट्यूनीशिया और मॉरीशस की दो बोगस कंपनियों के जरिए करीब 170 करोड़ रुपए की रकम, त्यागी बंधुओं को ही भेजी गई थी। अब पता यह करना है कि इस रकम का बंटरबांट और कहां-कहां हुआ है? शानदार रक्षा करियर वाले त्यागी पूरी तरह से कटघरे में आते दिखाई पड़ रहे हैं। वे ऐसे दूसरे पूर्व रक्षा प्रमुख हैं, जो रिश्वत कांड के मामले में सीबीआई जांच के दायरे में आ गए हैं। करीब 12 साल पहले नेवी के पूर्व प्रमुख एडमिरल सुशील कुमार, बराक मिसाइल्स खरीद के दलाली सौदे में आरोपित किए गए थे। अब एयरचीफ मार्शल त्यागी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही कि वे बताएं कि पाक साफ हैं, तो आखिर कैसे?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्कvirendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

सैलरी के लिए नेटवर्क10 चैनल में कर्मचारियों की हड़ताल

देहरादून से संचालित नेटवर्क10 में स्थिति खराब है. सैलरी नहीं मिलने से नाराज कर्मचारी हड़ताल कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि दो महीने से लेकर पांच महीने तक की सैलरी कर्मचारियों को नहीं मिली है. जो लोग प्रबंधन के नजदीकी हैं उन्‍हें तो बीच बीच में कभी सैलरी के नाम पर पैसे दे दिए गए, परन्‍तु जिनकी मैनेजमेंट से नजदीकी नहीं रही वे लोग कई महीनों की सैलरी नहीं पा सके हैं. कर्मचारी फिलहाल सांकेतिक हड़ताल पर हैं, पर उनका कहना है कि जल्‍द से प्रबंधन ने उनकी बातों पर ध्‍यान नहीं दिया तो वे चैनल का प्रसारण ठप कर देंगे.

कर्मचारियों के सांकेतिक हड़ताल के चलते कोई स्‍पेशल प्रोग्राम नहीं जा रहा है. कर्मचारियों का कहना है कि 15 फरवरी को चैनल के एक साल पूरा होने पर मैनेजमेंट तथा राजीव गर्ग ने लाखों रुपये खर्च कर बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया, लेकिन कर्मचारियों को देने के लिए इनके पास पैसे नहीं हैं. बताया जा रहा है कि चैनल से कई लोग तो बिना सैलरी लिए ही चले गए. चैनल का स्विचर भी कई दिनों से खराब पड़ा हुआ है. पैसा नहीं दिए जाने के चलते चार दिन तक चैनल की आवाज एनएसटीपीएल में पैसा नहीं देने के चलते बंद कर दी गई थी.

बताया जा रहा है कि हड़ताल की संभावना देखते हुए प्रबंधन भी सचेत हो गया है. चैनल के एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर अशोक पाण्‍डेय ने मामले को सलटाने के लिए सभी कर्मचारियों को पोस्‍ट डेटेड चेक देने का वादा किया तथा हड़ताल खतम करने को कहा, परन्‍तु कर्मचारी इसे मानने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि अगले 24 घंटों के अंदर उनका हिसाब किताब क्‍लीयर नहीं हुआ तो वे प्रसारण ठप करने के अलावा प्रबंधन का पुतला फूंकेंगे तथा इसकी शिकायत सीएम से करेंगे. इस संदर्भ में प्रबंधन का पक्ष लेने के लिए अशोक पाण्‍डेय को फोन किया गया परन्‍तु उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया.

जींद में ब्राह्मण समाज ने पंजाब केसरी के ब्‍यूरोचीफ का किया बहिष्‍कार

जींद : समाचार पत्र पंजाब केसरी में "परशुराम ने की थी पहली आनर किलिंग" की हेडिंग से प्रकाशित हुआ समाचार जींद ब्यूरो चीफ जसमेर मलिक के लिए गले की फांस बन गया है। इस समाचार को लेकर यहाँ के ब्राह्मण समाज में गहरा आक्रोश है। ब्राह्मण समाज इस खबर से बुरी तरह नाराज है जिसके चलते यह मामला ब्राह्मणों के मध्य गहरा तूल पकड़ता जा रहा है तथा एक बड़े विवाद की शक्‍ल लेता जा रहा है।

इस समाचार के प्रकाशित होने पर जीन्द पंजाब केसरी कार्यालय में ब्राह्मण समाज से जुड़े कई लोग आ घुसे और उन्होंने इस मामले को लेकर ब्यूरो चीफ जसमेर मलिक के साथ हाथापाई भी करने की कोशिश की, परन्‍तु पंजाब केसरी के अन्‍य स्‍टाफ एवं अन्‍य लोगों ने दखल देकर जमसेर को उनके चंगुल से बचाया। इस दौरान पंजाब केसरी कार्यालय के समक्ष लोगों का गहरा जमघट लग गया, जिसे बड़ी मुश्किल से समझाबुझा कर पुलिस द्वारा वापिस भेजा गया।

इस मामले को लेकर ब्राह्मण समाज के लोगों ने गांव बराह में 12 गांवों की पंचायत आयोजित की तथा खबर को प्रकाशित करने वाले पंजाब केसरी तथा ब्‍यूरोचीफ जमसेर मलिक का सामाजिक बहिष्‍कार करने का ऐलान किया। इसके पश्‍चात ब्राह्मण समाज के लोग जिला उपायुक्‍त एवं एसपी से मिलकर अपनी शिकायत दर्ज कराई तथा ब्‍यूरोचीफ के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की। इस खबर से ब्राह्मण समाज बुरी तरह नाराज है।

द ट्रिब्‍यून के स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट रहे डीएन चतुर्वेदी का निधन

वरिष्‍ठ पत्रकार डीएन चतुर्वेदी का फरीदाबाद में हार्ट अटैक से निधन हो गया. वे 70 साल के थे. डीएन चतुर्वेदी द ट्रिब्‍यून के साथ 34 सालों तक जुड़े रहे. वे फरीदाबाद में अखबार के स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट के पद से रिटायर हुए थे. डीएन चतुर्वेदी जम्‍मू में द ट्रिब्‍यून के पहले स्‍टाफ करेस्‍पांडेंट थे. उसके बाद उनका तबादला 1980 में जालंधर के लिए हो गया. उसके बाद वे फरीदाबाद भेज दिए गए तब से यही रह रहे थे. यहीं पर उन्‍होंने अपने परिवार को सेटल कर लिया था. इन्‍होंने कभी भी पत्रकारिता के मूल्‍यों से समझौता नहीं किया.

डीएन चतुर्वेदी का अंतिम संस्‍कार फरीदाबाद में ही किया गया. उनका अंतिम संस्‍कार फरीदाबाद में ही किया गया. डीएन चतुर्वेदी के निधन पर पत्रकारों ने गहरा शोक व्‍यक्‍त किया है तथा इस मुश्किल घड़ी में उनके परिवार को दुख सहने की क्षमता देने का भगवान से प्रार्थना की है.

आपने तो हमारे अर्थशास्त्र की ऐसी की तैसी कर दी सरदारजी!

हमारे देश का बजट आने वाला है। कहने को भले ही सरदार मनमोहन सिंह पीएम हैं और पी चिदंबरम हमारे वित्त मंत्री। लेकिन सरकार बहुत सारे दलों के बावजूद कांग्रेस की है और श्रीमती सोनिया गांधी उसकी वास्तविक मुखिया है। वह जितना कहती है उतना ही होता है। न उससे कम, न ज्यादा। किसी की औकात नहीं है कि सोनिया गांधी जैसा कहें, वैसा न करे। उनकी बात मानना मजबूरी जैसा है। इसीलिए लोग इंतजार कर रहे हैं कि इस बार के बजट में देश के लिए तो होगा ही, महिलाओं के लिए भी बहुत कुछ होगा।

सरदार मनमोहन सिंह तो खैर मस्ती से जी रहे हैं। पीएम के नाते इस पद के मजे ले रहे हैं। उनके वित्त विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री होने के बावजूद हमारे देश के वित्तीय हालात की मट्टी पलीद हो गई हैं और अर्थ शास्त्र करीब करीब कोकशास्त्र सा हो गया है। किसी को समझ में नहीं रहा है कि क्या हो रहा है। पैसा जितना आता है, उससे भी ज्यादा खर्च बढ़ रहे हैं। महंगाई ने सब कुछ मटियामेट कर रखा है। लोग परेशान हैं। और वित्तमंत्री उलझन में। लेकिन सबसे ज्यादा चिंता घर परिवार संभालने को वाली महिलाओं को है। किसी और को सरदारजी से कोई अपेक्षा हो ना हो, देश की महिलाओं को मनमोहन सिंह की माई बाप सोनिया गांधी से कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं है। क्योंकि वे ही सरकार की असली माई बाप हैं।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भले ही अपने पहले भाषण में संसद को महिलाओं की सुरक्षा के मामले में बहुत कुछ सुना कर आ गए। लेकिन सरदारजी को सोचना चाहिए कि पहली समस्या सिर्फ असुरक्षा की नहीं है। सितारों से आगे जहां और भी है। बहुत कम लोग जानते हैं कि बच्चों को जन्म देते समय महिलाओं की मौत की घटनाएं दुनिया के किसी भी गए गुजरे देश से भी ज्यादा हमारे देश में होती हैं। बजट में उनके स्वास्थ्य को लेकर बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। खासकर गांवों में महिलाओं के लिए ज्यादा अस्पताल बनाने का प्रावधान किया जाना चाहिए। ये सारी बातें अपन तो आज कह रहे हैं। मनमोहन सिंह ने बहुत पहले तब कही थी, जब पहली बार वित्त मंत्री बने थे। उसके बाद खुद कई बार लगातार वित्त मंत्री बने, पर कभी अपना कहा कुछ भी पूरा नहीं किया।

जब पहली बार वित्त मंत्री बने थे, तो आपने तो भारत और इंडिया की दूरी खत्म करना है, ऐसा कहा था सरदारजी…। लेकिन अब तो आप साक्षात प्रधानमंत्री हैं। वह भी दूसरी बार। सवा सौ करोड़ से भी ज्यादा लोगों का यह देश कभी आप पर भरोसा करता था। यह बात अलग है कि आपको खुद पर भरोसा नहीं हैं। पहले राजीव गांधी की तरफ देख कर काम करते थे। फिर नरसिम्हा राव ने आप पर भरोसा किया। और राव साब भले ही सोनिया गांधी को फूटी आंखों नहीं भाते थे, फिर भी सोनियाजी का मौका आया तो उनने भी आप पर ही भरोसा किया। नरसिम्हा राव ने तो आपको वित्तमंत्री ही बनाया था। पर, सोनियाजी ने तो प्रधानमंत्री बना दिया। आप इतने भरोसेमंद आदमी हैं। लेकिन फिर भी यह देश आप पर भरोसा क्यों नहीं करता सरदारजी?

राजनीति के लोग अपने सिवाय किसी भी दूसरे पर कोई भरोसा नहीं करते हैं। लेकिन फिर भी आप उनके भरोसे के काबिल रहे हैं। जब जब आप वित्त मंत्री बने, तो देश ने भी आप पर भरोसा किया था सरदारजी। क्योंकि किसी अर्थशास्त्री से शास्त्रार्थ की उम्मीद भले ही नहीं की जाए पर सामान्य आदमी के सहज घरेलू अर्थशास्त्र को समझने की सामान्य उम्मीद तो की ही जा सकती है। लेकिन आपने तो हर बार पर, हर बजट में हम सबका पूरा अर्थशास्त्र ही उलटकर रख दिया। अपना दावा है सरदारजी कि इस बार भी आप और आपकी सरकार देश का भरोसा तोड़ेंगे। महंगाई बढ़ाएंगे, गरीब को मारेंगे और अमीरों को संवारेंगे। लेकिन अब देश ने आप जैसे सीधे सादे दिखनेवालों पर भी भरोसा करना छोड़ दिया है, यह भी याद रखिएगा।  

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

बरखा दत्त की यह तस्वीर एफबी पर खूब की जा रही शेयर

पवन अवस्थी नामक एक फेसबुक यूजर ने बरखा दत्त की नीचे दी गई फोटो अपने वाल पर प्रकाशित की है. फोटो के साथ कैप्शन के रूप में यह लिखा है- ''बरखा मैडम साथ में कांग्रेस के नेता और मंत्री सचिन पायलट पार्टी मूड़ में ..! अब समझिए आपको टीवी पर सही और असली खबरे क्यों नहीं मिलती …!!!'' इस तस्वीर को करीब तीन सौ लोगों ने शेयर किया है. इसे सैकडों लोगों ने लाइक किया है और सैकड़ों कमेंट आ रहे हैं.

फेसबुक पर लोगों ने अपने अपने तरीके से इस तस्वीर की व्याख्या की है. Chandrakant Redekar लिखते हैं- Aishe logo ka party me hi peth bharta hoga to fir kaishi acchi khabar aam janta tak pahunche gi khud ye log khabar ban jate hai to inko kya padi desh ki our desh ke aam janta ki. इसी तस्वीर पर Nitin Mathur का कमेंट है- ''इस बदलती हुई दुनिया का खुदा कोई नहीं, सस्ते दामों पर रोज खुदा बिकते हैं।''

अंजुम आरा से पहले कई मुस्लिम महिलाएं आईपीएस हो चुकी हैं

यूपी के सहारनपुर के गंगोह में पली-बढ़ी और इंटर तक की तालीम यहीं से हासिल करने वाली अंजुम आरा ने आईपीएस बनने का गौरव हासिल किया है. उन्हें दूसरी मुस्लिम महिला आईपीएस बताया जा रहा है. देश के कुछ बड़े अखबारों ने यह कहते हुए खबरें प्रकाशित की हैं कि अंजुम आरा दूसरी मुस्लिम महिला आईपीएस हैं. पर यह तथ्य गलत है. उनसे पहले कई मुस्लिम महिलाएं आईपीएस हो चुकी हैं.

मूलरूप से आजमगढ़ जिले के रहने वाले अयूब शेख, ग्रामीण अभियंत्रण सेवा विभाग में जेई हैं. उनकी पहली तैनाती जनपद सहारनपुर में हुई थी. यहीं, उन्हें एक पुत्र व तीन बेटियां पैदा हुईं. 1992 से सन् 2006 तक अय्यूब की गंगोह में ही तैनाती रही. यहीं रहकर उनकी दूसरे नंबर की संतान अंजुम आरा ने प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की. यहां के आर्य कन्या इंटर कालेज से हाईस्कूल व एचआर इंटर कालेज से अंजुम आरा ने इंटर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की.

इसके बाद वह लखनऊ के एक इंजीनियरिंग कालेज से बीटेक की प्रथम श्रेणी में डिग्री हासिल की. कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने आइपीएस के 2011 बैच की परीक्षा पास कर लक्ष्य को पा ही लिया. अंजुम आरा की ट्रेनिंग अब पूरी हो चुकी है. अंजुम को मणिपुर कैडर मिला है. अंजुम के चयन पर घरवाले काफी खुश हैं. उनका कहना है कि बेटी ने मिसाल कायम कर समाज में उनका सिर ऊंचा किया है.

उधर, कुछ लोगों का कहना है कि अंजुम आरा हिंदुस्तान की दूसरी मुस्लिम महिला आईपीएस हैं और पहली मुस्लिम महिला आईपीएस मुंबई की रहने वाली गुजरात कैडर की सारा रिज़वी हैं. पर इस बात से वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार पंकज चतुर्वेदी इनकार करते हैं. उनका कहना है कि कई मुस्लिम महिलाएं आईपीएस हो चुकी हैं. उनका कहना है कि देश में अभी तक कम से कम दस मुस्लिम महिलाएं आईपीएस हैं. यही नहीं कश्मीर से भी मुस्लिम महिला आईपीएस हैं. Dr Sehrish Syed Asghar जम्मू-कश्मीर से हैं जो पहली मुस्लिम महिला आईपीएस बनीं. सृजन शिल्पी कहते हैं- कुछ अन्य भी हैं मुस्लिम महिला आईपीएस। एक तो दिल्ली में ही हैं नुज़्हत हसन।

घर बैठे उठाइए संगम स्नान का फल

इलाहाबाद। तीर्थराज प्रयाग के महाकुंभ में जो लोग किसी वजह से संगम स्नान का पुण्य नहीं उठा सके हैं, उनके लिए पछताने की जरूरत नहीं। अब पछतावा छोड़िए। खुशखबरी यह है कि महाशिवरात्रि के पर्व पर जहां भी हैं, वहीं से तीर्थराज प्रयाग और त्रिवेणी का मन में ध्यान कर स्नान करें। इससे महाकुंभ स्नान के बराबर पुण्य फल मिलेगा। शास्त्रों में भी इसका जिक्र स्पष्‍ट तौर पर मिलता है।

ज्योतिष विज्ञान में कहा गया है कि कुंभ में स्नान पर्वों के दिन गंगा, यमुना और सरस्वती वाली त्रिवेणी में स्नान करने से जन्म जन्मांतरों के पाप नष्‍ट हो जाते हैं। इस बार महाकुंभ होने से स्नान का पुण्य फल काफी फलदायी है। ऐसे में जो लोग संगम नगरी में रहकर स्नान, पूजा, दान का लाभ नहीं उठा सके हैं, उनके लिए अब महाशिवरात्रि का पर्व विकल्प के रूप में तैयार है। जहां भी हैं, वहीं से तीर्थराज प्रयाग और त्रिवेणी का स्मरण करते हुए स्नान करें। वह संगम स्नान का फल देगा।

कुंभ नगरी से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

मंत्री समर्थकों का पत्रकार के घर पर कब्‍जा का प्रयास, ज्ञापन सौंपा

फर्रुखाबाद। प्रदेश सरकार के राज्य मंत्री नरेन्द्र सिंह यादव के खास समर्थक शिवकुमार यादव आदि की दबंगई से पत्रकार तथा उसका परिवार भयभीत है। सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आदि अधिकारियों को घटना से अवगत कराया गया है। उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष अरुण कटियार महामंत्री वेदपाल सिंह, संरक्षक प्रदीप गोस्वामी, प्रिन्ट एवं इलेक्ट्रानिक एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष आनंद भान शाक्य, महामंत्री अलोक सिंह, आशू पाल, नितिन मिश्रा, ऋषि सेंगर, मोहनलाल गौड़, शफीउलहसन आदि पत्रकारों ने अपर पुलिस अधीक्षक ओपी सिंह से भेंट कर उन्हें ज्ञापन सौंपा।

एएसपी को अवगत कराया गया कि थाना मेरापुर के ग्राम नदौरा निवासी शिवकुमार यादव पुत्र सिलेटी सिंह अपने अनेकों हथियारबंद साथियों के साथ थाना मऊदरवाजा के मोहल्ला सरदार खां 4/1 निवासी पत्रकार आनंद भान शाक्य के पैतृक आवास पर जबरन कब्जा करने का प्रयास कर रहे हैं। एएसपी से जबरन कब्जा करने का प्रयास करने वालों कों रोकने के साथ ही पीडित पत्रकार परिवार की जानमाल की सुरक्षा किये जाने की मांग की गई। एएसपी श्री सिंह ने घटना की जांच क्षेत्राधिकारी नगर वाईपी सिंह को सौंपते हुये वादा किया कि पत्रकार का उत्पीड़न नहीं होने दिया जायेगा। पत्रकारों ने जिलाधिकारी को सम्बोधित ज्ञापन उपजिलाधिकारी अभिलाष वर्मा को सौपा, ज्ञापन पर तहफीम खान, लक्ष्मीकांत भारद्धाज, निवेदिता सिंह आदि ने हस्ताक्षर किये।

पत्रकार के उत्पीड़न के सम्बंध में भाजपा के प्रदेश मंत्री एवं पूर्व विधायक सुशील शाक्य, भारतीय किसान यूनियन टिकैत गुट के जिलाध्यक्ष एवं जिला पंचायत सदस्य अरविंद शाक्य, भाजपा नेता रामरतन शाक्य, अशोक कटियार एडवोकेट आदि अनेकों व्यक्तियों ने भी उक्त अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। एएसपी श्री सिंह ने पूर्व विधायक को आश्वासन दिया कि पत्रकार को न्याय मिलेगा। कब्जे का प्रयास करने वाले व्यक्ति को भारी मुचलके से पाबंद कराया जायेगा। इससे पूर्व 22 फरवरी को मकान पर कब्जे का प्रयास किये जाने पर राज्य मंत्री नरेन्द्र सिंह यादव, श्रम संविदा बोर्ड के अध्यक्ष सतीश दीक्षित एडवोकेट, नगर विधायक विजय सिंह, पुलिस अधीक्षक जोगेन्द्र सिंह, जिलाधिकारी पवन कुमार आदि आला अधिकारियों कों घटना से अवगत कराया गया।

बदायूं में भी सहारा के सामने मुश्किल, 8 मार्च को कोर्ट में मामले की सुनवाई

बदायूं में  धनवीर सक्सेना बनाम सहारा इंडिया वाद को लेकर बिसौली के न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय में सोमवार को बहुत सरगर्मी रही। सहारा लीगल सेल के अधिकारियों की नगर में उपस्थिति चर्चा का विषय रही। उल्‍लेखनीय है कि नगर के वरिष्ठ अधिवक्ता धनवीर सक्सेना ने 1978 में सहारा इंडिया की गोल्डन की स्कीम में कुछ धनराशि जमा की थी। सहारा इंडिया द्वारा इस स्कीम को बंद करने पर श्री सक्सेना ने 1979 में न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में वाद दायर कर दिया।

न्यायालय द्वारा 6 नवंबर 2011 को प्रतिवादी सहाराश्री सुव्रत राय और स्कीम प्रबंधक के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया। इसके बाद भी अदालत में उपस्थित न होने पर उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया गया। सोमवार को इस मुकदमा की तारीख थी। मुंसिफी परिसर में उपस्थित लोगों की निगाह इस वाद की सुनवाई पर लगी रही। देर शाम तक इंतजार के बाद भी प्रतिवादी पक्ष से कोई भी अदालत में उपस्थित नहीं हुआ। बताते हैं कि सहारा लीगल सेल के अधिकारी नगर में दिखाई दिए। उनकी उपस्थिति को लेकर भी काफी चर्चा रही। अब इस वाद में 8 मार्च तय की गयी है।

सहारा समूह के निदेशक वंदना भार्गव समेत पांच के विरुद्ध गैर जमानती वारंट

लखनऊ : रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज की ओर से सहारा इंडिया रियल इस्टेट के विरुद्ध दायर लगभग आधा दर्जन मामलों में विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सहारा इंडिया की निदेशक वंदना भार्गव समेत पांच लोगों के विरुद्ध एक मार्च के लिए गैर जमानती वारंट जारी किया है। अदालत के समक्ष सभी सात परिवाद रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज की ओर से सहायक रजिस्ट्रार ने अधिवक्ता विनय कृष्ण पांडेय की तरफ से दायर किए गए हैं। श्री पांडेय ने कंपनीज एक्ट की धारा 56, 56, (3), 60बी, 62, 63, 67, 68 एवं 73 के अंतर्गत इस मामले को कोर्ट लेकर गए हैं। 

परिवादों में रेड हियरिंग प्रासपेक्ट्स में सही सूचना न देना, मेमोरंडम के माध्यम से जनता को सूचना न देना, छल कपट द्वारा जुर्माना लगाना एवं स्टॉफ एक्सचेंज की अनुमति के बिना सूचीबद्ध करने समेत कई अन्‍य आरोप हैं। सभी परिवादों में निदेशक वंदना भार्गव, अशोक राय चौधरी एवं रविशंकर दुबे के अलावा गुफरान अहमद सिद्दीकी तथा गोविंद तिवारी को पक्षकार बनाया गया है। इस मामले में सुनवाई करते हुए इसी अदालत ने एक अन्य मामले में विपक्षी निदेशकों के विरुद्ध बिना जमानती वारंट जारी किया है।

जमानती वारंट जारी होने के बाद सहारा में हड़कम्‍प मचा हुआ है। सहारा समूह लगातार परेशानियों से घिरता जा रहा है। पहले सेबी ने उसके कई खातों को सीज किया। सुप्रीम कोर्ट ने सहारा की समय बढ़ाने की मांग खारिज कर दी, उसके बाद इस मामले से सहारा समूह की परेशानियां और बढ़ गई हैं।

कोर्ट ने जी न्‍यूज के मालिक एवं संपादकों की अर्जी खारिज की

नई दिल्ली : कोल ब्लॉक आवंटन मामले में सांसद नवीन जिंदल से संबंधित खबर प्रसारित न करने की एवज में 100 करोड़ रुपये मांगने के आरोप में फंसे जी न्यूज मालिक सुभाष चंद्रा एवं संपादकों सुधीर चौधरी एवं समीर आहलूवालिया की एक अर्जी को पटियाला हाउस कोर्ट ने मंगलवार को खारिज कर दी। जी न्‍यूज के दोनों संपादकों ने कोर्ट में याचिका दायर करके मांग की थी कि उनके खिलाफ की जाने वाली जांच की निगरानी अदालत द्वारा की जाए।

पटियाला कोर्ट के एसीएमएम मुकेश कुमार ने जी न्यूज संपादकों की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि कॉल डिटेल को सुरक्षित रखे जाने की कोई आवश्यकता अदालत को महसूस नहीं हुई है। कोर्ट किसी भी मामले में की जाने वाली जांच को डिक्टेट या डाइवर्ट करने की प्रक्रिया को नहीं अपना सकती। लिहाजा याचिकाकर्ताओं की अर्जी खारिज की जाती है। गौरतलब है कि जी न्यूज संपादकों ने कोर्ट से मांग की थी कि उनके मामले से संबंधित कॉल डिटेल रिकार्ड को अदालत द्वारा संरक्षण में ले लिया जाए और मामले में पुलिस द्वारा की जाने वाली जांच की निगरानी की जाए, क्योंकि उन्हें भय है कि पुलिस कांग्रेस के सांसद नवीन जिंदल के प्रभाव में आकर उनके खिलाफ झूठे साक्ष्य एकत्र कर सकती है।

फर्जी मुठभेड़ के आरोपी आईपीएस को जांच की जगह ‘सौगात’

उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिला बरेली के मुकुल गुप्ता फर्जी मुठभेड़ मामले में सीबीआई आईपीएस जे रविंद्र गौड़ समेत 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने जा रही है। लखनऊ के मौजूदा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गौड़ मुठभेड़ के वक्त बरेली में एएसपी के पद पर  तैनात थे। सीबीआई ने आईपीएस के खिलाफ राज्य सरकार से अभियोजन की स्वीकृति मांगी थी। दो माह से जवाब नहीं मिलने पर सीबीआई तय अवधि के बाद अदालत में चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी में है। हालांकि मामले को तूल पकड़ता देख सरकार ने अभियोजन स्वीकृति पर विचार करना शुरू कर दिया हैं और जल्द की उसकी तरफ से हरी झंडी मिल जायेगी।

गौरतलब हो बरेली के फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच कर रही सीबीआई ने बीते वर्ष के अंत में 24 दिसंबर को उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार को पत्र भेजकर जे रविंद्र गौड़ के खिलाफ अभियोजन की अनुमति मांगी की थी। सीबीआई ने अनुमति पत्र मुख्य सचिव जावेद उस्मानी को भेजा थ। मुख्य सचिव ने फाइल गृह विभाग को भेज भी, लेकिन वहां से फाइल आगे नहीं बढ़ पाई। पिछले दिनों जब गौड़ को लखनऊ का एसएसपी बनाया गया तब भी गृह विभाग से पूछा गया था कि क्या गौड़ के खिलाफ सीबीआई ने अभियोजन स्वीकृति मांगी हुई है? लेकिन गृह विभाग ने यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है। इसके बाद गौड़ लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बना दिये गये। मामला तूल पकड़ने लगा तो गृह विभाग के हाथ-पांव फूल गये। मौके की नजाकत भांप कर तब बाद प्रमुख सचिव गृह ने यह स्वीकार कर लिया कि फर्जी मुठभेड़  मामले में एसएसपी समेत 11 के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सीबीआई जांच कर रही है। सीबीआई ने गौड़ के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति मांगी थी और गृह विभाग अभी इस पर विचार कर रहा हैं।

कहा जाता है कि करीब साढ़े पाच वर्ष पूर्व  30 जून 2007 को बरेली-दिल्ली रोड पर कथित मुठभेड़ में बदायूं निवासी मुकुल गुप्ता की बरेली पुलिस की गोली से मौत हो गई थी, जबकि पंकज मिश्रा नाम के युवक को मौके से पकड़ा गया था। पुलिस का दावा था कि दोनों सीबीगंज में बैंक लूटने की नीयत से जा रहे थे। मुकुल के परिजनों ने पुलिस पर मुकुल की हत्या करने का आरोप लगाया था। काफी हो हल्ला मचा तो दबाव में ‘दूध का दूध और पानी का पानी करने’ के नाम पर उक्त मामले की जांच बदायूं पुलिस को सौंपे दी गई। मुकुल के परिजन विभागीय जांच पर अविश्वास जताते हुए अदालत चले गये। असंतुष्ट परिजनों ने उच्च न्यायालय में गुहार लगाई। जहां पीड़ित पक्ष को सुनने के बाद अदालत के आदेश पर सीबीआई ने जून 2010 में जांच शुरू कर दी। उसी वर्ष सीबीआई की विशेष जांच शाखा ने गौड़ के खिलाफ फर्जी मुठभेड़ मामले में केस दर्ज कर लिया। उनके साथ सीबीगंज थाने में तैनात तत्कालीन थानाध्यक्ष विकास सक्सेना, फतेहगंज वेस्ट थाने के प्रभारी डीके शर्मा, उप निरीक्षक भोला सिंह, देवेंद्र कुमार, आरके गुप्ता, अनिल कुमार, कालीचरण समेत कुल 11 पुलिस कर्मियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज करके उन्हें सहभागी बनाया गया।

करीब दो वर्षों के बाद मई 2012 में गिरफ्तार सिपाही जगबीर ने पुलिस का अपराध स्वीकार करते हुए बयान दिया कि मुकुल को उसकी ही सरकारी रायफल से गोली मारी गई थी। सीबीआई ने गौड़ का भी बयान दर्ज किया था, जिसमें उन्होंने खुद को निर्दोष बताया था। प्रमुख सचिव गृह आरएम श्रीवास्तव का कहना है कि सीबीआई द्वारा जे रविंद्र गौड़ के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मांगे जाने का पत्र उन्हें मिला है। सीबीआई के आग्रह और आगे के फैसले पर विचार चल रहा है। जल्द ही इस बारे में फैसला ले लिया जायेगा। वैसे जनता जर्नादन हैरान जरूर है कि जो आईपीएस शक के दायरे में है, उसके खिलाफ सरकार जांच दबाये बैठी है और उसे लखनऊ का एसएसपी बना कर सौगात दे दी गई।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

डिस्‍कवरी चैनल के शो में एंकरिंग करेंगी सोहा अली

मुंबई। बॉलीवुड अभिनेत्री सोहा अली खान एक टीवी चैनल पर होस्ट बनने जा रही हैं। डिस्कवरी चैनल के एक शो 'स्पेल बी-इंडिया स्पेल्स' को होस्ट करेंगी। सोहा इस बारे में कहती हैं कि अभिनय में मजा आना चाहिए, काम मनपसंद और मजेदार होना चाहिए, इसके लिए माध्यम बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता।

सोहा अली इससे पहले स्टार प्लस के एक शो 'खेलो, जीतो, जियो' और डिजायनर अकी नरूला के साथ 'ह्वाट नॉट टू वियर' जैसे शो को होस्ट कर चुकी हैं। सोहा ने बॉलीवुड में 'रंग दे बसंती', 'खोया खोया चांद', 'मुंबई मेरी जान' जैसी फिल्मों में काम किया है। सोहा कहती हैं कि मुझे बताया गया है कि यह शो खासकर बच्चों की शिक्षा पर आधारित है इसलिए मैं इससे जुड़ना चाहती हूं। तिग्मांशु धूलिया निर्देशित सोहा की नई फिल्म 'साहब, बीबी और गैंगस्टर रिटर्न्सस' जल्द ही रिलीज होने वाली है। (एजेंसी)

आतंकी साजिश के आरोप में अरेस्‍ट पत्रकार को एनआईए ने छोड़ा

बैंगलोर : राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए की एक विशेष अदालत ने बड़ी हस्तियों के कत्ल और आतंकवादी साज़िश रचने के आरोप में गिरफ्तार एमआर सिद्दीकी को छह महीने बाद रिहा कर दिया है. एजेंसी ने कहा कि उनके पास एमआर सिद्दीकी के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं. ग़ौरतलब है कि पिछले साल सितंबर में एमआर सिद्दीकी के साथ 12 अन्य लोगों को बड़ी हस्तियों को मारने की साजिश रचने और आतंकवादी संगठन से साठगांठ रखने के आरोप में गिरफ्तार किया था.

सिद्दीकी के साथ एक और शख्स यूसुफ़ नालबंद को भी रिहा किया गया है. नालबंद एक इलेक्ट्रिकल शॉप मे काम करता था. रिहाई के बाद मोतिउर्रहमान सिद्दीकी ने कहा, "मैं जल्द ही अपने पुराने पेश की शुरुआत करूंगा, लेकिन कुछ  दिन तक जेल की कड़वी यादें भुलाने में लगेगा. हम वापस रिपोर्टिंग में लौटना चाहते है." याद रहे कि पुलिस ने सिद्दीकी और दूसरे 12 लोगों की गिरफ्तारी के बाद दावा किया था कि उनका संबंध आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन से है और वे बड़ी हस्तियों को मारने की साजिश रचने रहे थे.

सिद्दीकी ने रिहाई के बाद कहा, "पुलिस ने हमें जबरदस्ती गुनाह कबूल करने का दबाव डाला, लेकिन एनआईआई की जांच में मैं बेकसूर साबित हुआ." सिद्दीकी बैंगलोर में एक बड़े अखबार के क्राइम बीट के रिपोर्टर थे, लेकिन इसके बावजूद उन्हें पुलिस को यक़ीन दिलाना मुश्किल था कि वे एक आतंकवादी नहीं हैं. सिद्दीकी के साथ गिरफ्तार हुए 10 और लोग जेल में हैं और अभी तक उनके खिलाफ जांच पूरी नहीं हुई है. (एबीपी)

फ्रीलांस फोटोग्राफर का कैमरा छिनवा लिया दीपक चौरसिया ने!

अरविंद केजरीवाल से भिड़ चुके तथा जस्टिस काटजू से गेट आउट सुन चुके इंडिया न्‍यूज के एडिटर इन चीफ दीपक चौ‍रसिया एक बार फिर चर्चा में हैं. दीपक चौरसिया पर फ्रीलांसिंग फोटोग्राफी करने वाले राकेश बंसल ने अपनी टीम के साथ मिलकर कैमरा छीनने का आरोप लगाया है. उन्‍होंने इसकी शिकायत भी पुलिस से की है. पुलिस ने अभी मामला दर्ज नहीं किया है. शिकायत की जांच चल रही है. 

राकेश बंसल ने पुलिस को दी गई अपनी शिकायत में लिखा है कि 21 तारीख को जंतर-मंतर पर आयोजित इंडिया न्‍यूज के कार्यक्रम में दीपक चौरसिया और कुछ लोगों के बीच भिड़त हो गई. मैंने इसकी तस्‍वीर अपने कैमरे में उतार ली. इस घटना से नाराज दीपक चौरसिया ने अपने कुछ लोगों को आदेश देकर मेरा कैमरा छीनवा लिया. कैमरा छीनने वालों में एक महिला भी शामिल थी. राकेश ने आगे लिखा है कि उन्‍होंने दीपक चौरसिया को कहा कि वो गरीब फोटोग्राफर हैं तथा इस तरह का कृत्‍य पत्रकार तथा पत्रकारिता के खिलाफ है. इसके बावजूद उन लोगों ने मेरा कैमरा वापस नहीं लौटाया.

राकेश का कहना है कि वो अपना कैमरा वापस पाने के लिए कई बार दीपक चौरसिया के इंडिया न्‍यूज ऑफिस गए परन्‍तु वहां से उन्‍हें टाल दिया गया. अब तक उनका कैमरा उन्‍हें वापस नहीं मिला है. इसके बाद राकेश ने पुलिस में अपनी शिकायत दर्ज कराई है. इस मामले को लेकर फेसबुक पर भी चर्चा शुरू हो चुकी है. फोटोजर्नलिस्ट दीपक मलिक ने अपने एफबी पर इसी संदर्भ में लिखा कि – Deplorable action by Deepak Chaurasia of India News television channel. Chaurasia along with his crew snatched the camera equipment of a freelance photographer Rakesh Singh 5 days ago at Jantar Mantar. No logical reason was given for their lawlessness. Chaurasia, When contacted to return the camera equipment, wrote back : "Sir am doing it gve me a day". Equipment "stolen" from Rakesh Singh includes a Canon 5D Mark II, 24-105mm lens, Canon Speedlight 800 DX, bought by his mother, after she sold off some of her jewellery.

हालांकि अब इस मामले में कितनी सच्‍चाई है यह तो जांच का विषय है. इस संदर्भ में दीपक चौरसिया का पक्ष जानने के लिए कॉल किया गया तो उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया. जिससे उनका पक्ष नहीं जाना जा सका. नीचे राकेश बंसल द्वारा पुलिस को दी गई लिखित शिकायत की प्रति.

आरबीआई के दिशा निर्देश और नए निजी बैंकों की प्रासंगिकता

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के द्वारा नये निजी बैंक खोलने से संबंधित अंतिम दिशा-निर्देश जारी करने के साथ ही नये निजी बैंकों को खोलने का रास्ता साफ हो गया है। अब कॉरपोरेट्स, सरकारी क्षेत्र की ईकाइयां और ईकाइओं के समूह एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) पूर्ण स्वामित्व वाली गैर-परिचालित वित्तीय होल्डिंग कंपनियों (एनओएफएचसी) के माध्यम से बैंक खोलने के लिए लाइसेंस प्राप्त कर सकेंगे। नये बैंकों के प्रर्वतकों को एनओएफएचसी के पास 40 प्रतिशत इक्विटी पूँजी रखनी होगी, जिसे 10 साल के अंदर 20 प्रतिषत और 20 साल के अंदर घटाकर 15 प्रतिशत करना होगा। साथ ही, इस मामले में एनओएफएचसी को भारतीय रिजर्व बैंक के पास पंजीकृत भी करवाना होगा। इसके संचालन के लिए अलग से निदेशकों को नियुक्त करने का प्रावधान रखा गया है।

बैंकों के निदेशक मंडल में बहुलता में स्वतंत्र निदेशक होंगे, जिनका जोर व्यावहारिक बैंकिंग योजनाओं एवं वित्तीय समावेशन की संकल्पना को साकार करने की तरफ होगा। इन्हें न्यूनतम पूँजी प्रर्याप्तता 13 प्रतिशत रखना होगा। पूर्व में इसे 12 प्रतिशत रखने का प्रस्ताव था। नये बैंक को शुरू करने के लिए 500 करोड़ की न्यूनतम चुकता पूँजी होनी चाहिए। इस मामले में पहले पाँच साल में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 49 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगी। अगस्त, 2011 में पेश किये गये मसौदे में भी नये बैंक शुरू करने के लिए 500 करोड़ की न्यूनतम चुकता पूँजी रखने का प्रावधान था। उक्त मसौदे में यह भी कहा गया था कि इच्छुक उम्मीदवार का कारोबार कम से कम 10 साल से चल रहा हो। साथ ही साथ उसका बेदाग होना भी आवश्‍यक था। अंतिम दिशा-निर्देश में भी इस शर्त को बरकरार रखा गया है। साफ-सुथरा रिकार्ड है या नहीं इसका पता लगाने के लिए केंद्रीय बैंक बैंकिंग नियामक, अन्य नियामक, प्रवर्तन एवं जाँच एजेंसियों की मदद ले सकता है। रिजर्व बैंक के द्वारा जारी दिशा-निर्देश में सबसे महत्वपूर्ण निर्देश 25 प्रतिशत शाखाओं का ग्रामीण क्षेत्रों में खोलना है। इसे इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अभी भी शहरी आबादी वाले क्षेत्रों में बैंकों की पहुँच महज 32 प्रतिशत है और गाँवों में 18 प्रतिशत।

सूत्रों के मुताबिक नये बैंक का लाइसेंस हासिल करने की दौड़ में निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियां शामिल हैं। इच्छुक कंपनियों में आदित्य बिड़ला समूह, टाटा कैपिटल, एलआईसी हाउसिंग, रेलिगेयर, महिन्द्रा एंड महिन्द्रा फाइनेंशियल, रिलायंस कैपिटल, एलएंडटी फाइनेंस, बजाज फिनसर्व, पोस्ट बैंक आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। ध्यान देने योग्य बात है कि रिजर्व बैंक के द्वारा जारी अधिसूचना में कितने नये बैंकों को लाइसेंस दिया जाएगा, इसका खुलासा नहीं किया गया है। ध्यातव्य है कि वर्ष, 1980 से लेकर वर्ष, 2000 के बीच 10 नये निजी बैंकों को केंद्रीय बैंक ने लाइसेंस दिया था। उसके बाद पुनः वर्ष, 2001 में यस बैंक और कोटक महिन्द्रा को लाइसेंस दिया गया।

नये बैंक के लिए लाइसेंस प्राप्त करने के लिए आवेदन भरने की अंतिम तिथि 1 जुलाई, 2013 रखी गई है। उम्मीद है कि 25 फरवरी, 2013 से इच्छुक उम्मीदवारों का आवेदन रिजर्व बैंक को प्राप्त होने लगेगा। आवेदन की जाँच एक उच्च स्तरीय समिति के द्वारा की जायेगी। इस समिति में बाहर के विशेषज्ञ भी शामिल होंगे, लेकिन अंतिम निर्णय लेने का अधिकार रिजर्व बैंक ने अपने पास सुरक्षित रखा है। इसके बरक्स उल्लेखनीय है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री डी सुब्बाराव ने पूर्व में भी संभावित उम्मीदवारों के आवेदनों की जाँच करने के लिए एक समिति गठित करने की बात भी कही थी। लाइसेंस मिलने के एक साल के अंदर संबंधित कंपनी को अपना बैंकिंग कारोबार शुरू करना होगा। इस शर्त का अनुपालन नहीं करने की स्थिति में लाइसेंस को रद्द कर दिया जायेगा। बैंक का कारोबार आरंभ करने के तीन साल के अंदर बैंक के प्रर्वतकों को बैंक के शेयर को सूचीबद्ध करवाना होगा। इसके पहले ड्राफ्ट मसौदे में इसके लिए दो साल का समय मुर्करर किया गया था।

अंतिम नियमावली में रिजर्व बैंक ने किसी भी क्षेत्र में कार्यरत कंपनी को बैंकिंग क्षेत्र में उतरने से मना नहीं किया है। इसके पहले अगस्त, 2011 के मसौदे में रिजर्व बैंक ने रियल एस्टेट और ब्रोकिंग के कारोबार से जुड़ी कंपनियों को बैंकिंग लाइसेंस नहीं देने का प्रावधान रखा था। इस दफा रिजर्व बैंक ने इस दिषा में चतुराई से काम लिया है।

उक्त क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों को सीधे तौर पर मना करने के बजाए इस संबंध में ऐसे नियम-कानून बनाये हैं, जिससे उनके लिए लाइसेंस लेना आसान नहीं होगा। गौरतलब है कि अंतिम मसौदे में यह प्रावधान रखा गया है कि प्रर्वतक समूह का कारोबार मॉडल बैंकिंग मॉडल से मिलता-जुलता होना चाहिए। साथ ही, उक्त कंपनी के कारोबार से बैंकिंग प्रणाली का जोखिम भी नहीं बढ़ना चाहिए। जानकारों का मानना है कि रिजर्व बैंक के इस नियम से रियल एस्टेट और ब्रोकरेज कंपनियों के लिए बैंकिंग क्षेत्र में प्रवेश करना आसान नहीं होगा। रिजर्व बैंक के इस चालाकी को भांप कर ही देश की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ ने बैंकिंग क्षेत्र में उतरने से साफ तौर पर मना कर दिया है। इन दो क्षेत्रों के अतिरिक्त रिजर्व बैंक ने बड़ी समझदारी से एनबीएफसी को भी बैंकिंग क्षेत्र में उतरने से अप्रत्यक्ष रुप से मना कर दिया है। आरोपित प्रावधानों के अनुसार इस मामले में एनबीएफसी को बैंक खोलने के लिए लाइसेंस लेना मुश्किल का सबब होगा, क्योंकि रिजर्व बैंक उन्हें वैसा कारोबार करने के लिए अनुमति नहीं देगा, जो बैंकों के जरिये किया जाता है।

उल्लेखनीय है कि सरकार द्वारा नये निजी बैंक खोलने के लिए सर्वप्रथम फरवरी, 2010 में घोषणा की गई थी। इस दिशा में अग्रतर कार्रवाई करते हुए अगस्त, 2010 में भारतीय रिजर्व बैंक ने परामर्श पत्र जारी किया। तदुपरांत ठीक एक साल के बाद अगस्त, 2011 में रिजर्व बैंक के द्वारा मसौदा नियमावली को प्रस्तुत किया गया। पुनश्‍च: बैंकिंग नियमन कानून (बीआरए) में संशोधन के मुद्दे पर वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के बीच मतैक्य के अभाव में मामला अधर में लटका रहा। भारतीय रिजर्व बैंक बैंकिंग नियमन कानून में ऐसे प्रावधानों को शामिल करना चाहता है, जिसके माध्यम से प्रस्तावित नये निजी बैंकों पर नियंत्रण रखा जा सके। निजी बैंकों को काबू में रखने के लिए जरुरी है कि उक्त बैंक के बोर्ड पर नियंत्रण रखा जाए। इस काम को बखूबी अंजाम देने के लिए चेयरमैन, प्रबंध निदेशक और दूसरे निदेशकों को उनके पद से हटाने का अधिकार रिजर्व बैंक अपने पास रखना चाहता था। ज्ञातव्य है कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम को रिजर्व बैंक का यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं था। वे चाहते थे कि इन पचड़ों में पड़ने की बजाए यथाशीघ्र नये निजी बैंक खोलने के लिए रिजर्व बैंक अंतिम नियमावली पेश करे।

एसोचैम के अध्यक्ष राजकुमार घूत ने अपने एक बयान में रिजर्व बैंक द्वारा जारी नये निजी बैंकों को खोलने के दिशा-निर्देश का स्वागत करते हुए कहा है कि नये निजी बैंकों के आने से बैंकिंग सेवाओं का विस्तार होगा और बैंकों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहन मिलेगा। बैंकिंग क्षेत्र में उतरने के लिए इच्छुक उम्मीदवार सैम घोष, जो रिलायंस कैपिटल के सीईओ हैं का कहना है कि रिजर्व बैंक के द्वारा जारी दिशा-निर्देश स्वागत योग्य है। रेलिगेयर के सीएमडी सुनील गोधवानी ने भी रिजर्व बैंक द्वारा जारी अधिसूचना का स्वागत किया है।

गौरतलब है लाइसेंस प्राप्त करने की होड़ में शामिल पोस्ट बैंक को यदि लाइसेंस मिलता है तो वह जरूर ग्रामीणों एवं सरकार के लिए फायदेमंद होगा, क्योंकि सरकारी योजनाओं की सफलता के लिए सुदूर ग्रामीण इलाकों में बैंक शाखा का होना जरुरी है, जबकि अभी भी ग्रामीण इलाकों में प्रर्याप्त संख्या में बैंकों की शाखाएं नहीं हैं। जहाँ बैंक की शाखा है, वहाँ भी सभी ग्रामीण बैंक से नहीं जुड़ पाये हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत की कुल आबादी के अनुपात में 68 प्रतिशत लोगों के पास बैंक खाते नहीं हैं। बीपीएल वर्ग में सिर्फ 18 प्रतिशत के पास ही बैंक खाता है। अशिक्षा व गरीबी के कारण वे बैंकों में अपना खाता खुलवाने की स्थिति में नहीं हैं। बैंक के पास प्रर्याप्त संसाधन भी नहीं है कि वह उनका खाता खुलवा सके। भले ही वित्तीय समावेशन की संकल्पना को साकार करने के लिए बैंकों में कारोबारी प्रतिनिधियों की नियुक्ति की गई है, लेकिन विगत वर्षों में उनकी भूमिका  प्रभावशाली नहीं रही है। 2008 तक बैंकों में मात्र 1.39 करोड़ ‘नो फ्रिल्स’ खाते खोले जा सके थे। ‘नो फ्रिल्स’ खाता का तात्पर्य शून्य राशि से खाता खोलना है। इस तरह के खाते खोलने में केवाईसी हेतु लिए जाने वाले दस्तावेजों में रियायत दी जाती है। ग्रामीणों को बैंक से जोड़ने के लिए इस नवोन्मेषी प्रोडक्ट को सबसे महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है। बावजूद इसके बीते सालों में रिजर्व बैंक के द्वारा लगातार कोशिश करने के बाद भी वित्तीय संकल्पना को साकार करने के मामले में कोई खास प्रगति नहीं हुई है।

जाहिर है पोस्ट बैंक को वित्तीय समावेशन की संकल्पना को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प के रुप में देखा जा सकता है, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में डाकघरों की उल्लेखनीय मौजूदगी है। 31 मार्च, 2009 तक भारतीय डाकघर की पूरे देश में 155015 से अधिक शाखाएँ थीं, जोकि सभी वाणिज्यिक बैंकों की शाखाओं से तकरीबन दोगुना थी। उल्लेखनीय है कि इनमें से 89.76 प्रतिशत यानि 139144 षाखाएँ ग्रामीण इलाकों में थीं। दिलचस्प है कि आजादी के वक्त डाकघरों की संख्या महज 23344 थी। सरकारी प्रयासों से इसके नेटवर्क में लगातार इजाफा हो रहा है। इस मामले में डाककर्मियों की लगन व मेहनत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सुदूर ग्रामीण इलाकों में डाकघरों की गहरी पैठ तो है ही, साथ में ग्रामीणों का भरोसा भी उनपर अटूट है। ग्रामीण इलाकों में डाककर्मी चौबीस घंटे सेवा के लिए तत्पर रहते हैं। आमतौर पर गाँवों में डाककर्मी खेती-बाड़ी के साथ-साथ डाकघर का काम करते हैं। डाकघर उनके घर से संचालित होता है। जरुरत एवं सहूलियत के मुताबिक ग्रामीण डाकघर से जुड़े हुए अपने काम करवाते हैं। रात-बेरात कभी भी उनका काम हो जाता है। डाकघर के ऐसे व्यवहारिक स्वरुप के कारण ही 31 मार्च, 2007 तक डाकघरों में कुल 323781 करोड़ रुपये जमा किये गये थे, जिनमें से बचत खातों में 16789 करोड़ रुपये जमा थे। डाकघरों की इतनी लोकप्रियता तब है, जब ये प्रौद्योगिकी के स्तर पर अद्यतन नहीं हैं और न ही सेंट्रल सर्वर के द्वारा तकनीकी तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हैं।

बैंक पर हमारी निर्भरता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आज मनरेगा के तहत लाभार्थी को बैंक के माध्यम से मजदूरी देना हो या फिर दूसरी योजनाओं के लाभार्थियों के बैंक खातों में सीधे सब्सिडी की राशि जमा करनी हो, कोई कार्य बैंक की सहभागिता के बिना संभव नहीं है। दूसरी तरफ भ्रष्टाचार ने बैंकों के काम-काज को बुरी तरह से प्रभावित किया है। आम आदमी को उनका हक मुश्किल से मिल पा रहा है। सूचना का अधिकार कानून, 2005 के अस्तित्व में आने के बाद से हालत बदले हैं। पड़ताल से स्पष्ट है कि सरकारी बैंकों पर लगाम लगाने के लिए पचास रास्ते हैं, लेकिन निजी बैंकों का नकेल कसने के मामले में सरकार एकदम असहाय है, क्योंकि अन्यान्य उपायों के निजी बैंकों पर प्रभावशाली नहीं होने के साथ-साथ सूचना का अधिकार कानून, 2005 के दायरे में भी ये नहीं आते हैं।

यहाँ इस सवाल सवाल का उठता लाजिमी है कि क्या भारत में पोस्ट बैंक को छोड़कर और निजी बैंकों की जरुरत है, क्योंकि मौजूदा निजी बैंकों का प्रदर्शन सरकार एवं जनता की कसौटी पर खरा नहीं उतरा है। दूसरा दिलचस्प तथ्य यह है कि एक तरफ सरकार बैंकों के विलय की बात कह  रही है, दूसरी तरफ नये निजी बैंक खोलने के लिए रिजर्व बैंक के द्वारा दिशा-निर्देश जारी किया गया है। नये निजी बैंकों को खोलने के लिए अंतिम नियमावली प्रस्तुत करना सरकार की कथनी व करनी में व्याप्त विरोधाभास को दर्शाता है। एक और महत्वपूर्ण बात इस संबंध में यह है कि क्या बासेल के प्रावधानों को पूरा करने में प्रस्तावित नये निजी बैंक समर्थ होंगे?

मौजूदा समय में बैंकिंग क्षेत्र असंख्य चुनौतियों का सामना कर रहा है। वित्तीय समावेशन की संकल्पना को साकार करना ऐसी ही एक चुनौती है। भले ही रिजर्व बैंक ने नये बैंक खोलने के संबंध में जारी अपने अंतिम दिशा-निर्देश में 25 प्रतिशत बैंक शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्र में खोलने की बात कही है। पर क्या प्रस्तावित निजी बैंक ग्रामीण क्षेत्र में बैंकिंग सेवाओं को सफलता पूर्वक पहुँचाने का कार्य कर सकेंगे? ग्रामीण क्षेत्र में केवल बैंक शाखा खोलने से काम नहीं चलेगा। यहाँ जरूरत है कि सभी तरह की बैंकिंग सेवाओं को ग्रामीणों के बीच उपलब्ध करवाया जाए। इस मामले में निजी बैंक कितने गंभीर हैं इसका खुलासा बिहार के उप मुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी के अगुआई में आहुत बैंकों के प्रर्दशन पर केंद्रीत समीक्षा बैठक में हुआ है। बैंकों के द्वारा मुहैया करवाये गये आँकड़े वाकई में चिंताजनक हैं। किसान क्रेडिट कार्ड और सरकार द्वारा प्रायोजित दूसरे रोजगार परक ऋण किसानों को वितरित करने में निजी बैंक बिहार में फिसड्डी रहे हैं।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पीछे सरकार की मंशा थी, आम आदमी को बैंकों से जोड़ना। उसके स्वरुप को कल्याणकारी बनाना। सरकारी योजनाओं का लाभ जनता तक पहुँचाना तथा रोजगार सृजन के द्वारा उन्हें आत्मनिर्भर बनाना। स्वंय सहायता समूह एवं अन्यान्य सरकारी योजनाओं के माध्यम से लोगों को उनका हक दिलवाने में सरकार बहुत हद तक कामयाब भी रही है। जाहिर है सरकारी बैंकों की महत्ती भूमिका के बिना यह संभव नहीं था। ध्यातव्य है कि राष्ट्रीयकरण से पहले बैंकों की कुँजी राजाओं के हाथ में थी, जिनका उद्देष्य केवल लाभ अर्जित करना था। उस वक्त भी आज की तरह निजी बैंक महाजनी खेल में माहिर थे। आमजन के कल्याण या फायदे से उनका कोई सरोकार नहीं था। इस दृष्टिकोण को मद्देनजर रखते हुए कॉरपोरेट्स को नये बैंकों के लिए लाइसेंस देना तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि निजी बैंक कभी भी सामाजिक और कल्याणकारी बैंकिंग की संकल्पना को साकार करने की दिषा में सक्रिय नहीं होंगे।

लेखक सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह से satish5249@gmail.com या मोबाईल संख्या 08294586892 के जरिये संपर्क किया जा सकता है।

मकसद हंगामा करने का नहीं था, पर वह तो हो गया बंसल साहब!

रेल बजट पेश हो गया। अपने जीवन का पहला और इस सरकार का अंतिम रेल बजट पेश करते समय रेल मंत्री पवन बंसल ने लोकसभा में कहा तो था कि हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,… पर सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी तथा विपक्षी दलों ने भारी हंगामा किया। हंगामे के कारण रेल मंत्री अपना बजट भाषण भी पूरा नहीं पढ़ पाए। अब चर्चा होगी। बहसबाजी भी होगी। और पास भी हो जाएगा। लेकिन सवाल ये है कि क्या रेलवे की हालत सुधरेगी।

पवन बंसल राजीव गांधी के कहने पर राजनीति में आए थे। यह दुनिया को बताने के लिए या पता नहीं अपने सहयोगियों को सताने के लिए यह उनने लोकसभा में भी कहा। लेकिन ममता बनर्जी, लालू यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान जैसों ने रेल मंत्रालय का जो भी विकास या कबाड़ा किया था और विकास की योजनाओं से भरी सारी रेलें अपने चुनाव क्षेत्रों की तरफ मोड़ दी थी, वैसा न तो पवन बंसल कर सकते थे और न हुआ। होने की गुंजाइश भी नहीं थी। बंसल चंड़ीगढ़ के हैं। उनका शहर बहुत आधुनिक है और शुक्र है कि चंड़ीगढ़ किसी की दया से उपजे सुविधाओं के संसार का मोहताज नहीं है। फिर ऐसा नहीं है कि बंसल के पूर्वज रेल मंत्रियों के काल में रेल सेवाओं का विकास और विस्तार नहीं हुआ। हुआ। लेकिन जिस तरह से अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब ज्यादा गरीब हो रहा है। उसी तरह जहां रेल विकास की जरूरत है, वहां जरूरतों का अंबार लगातार बढ़ता जा रहा है और जहां पहले से ही बहुत सारी सुविधाएं हैं, वहां और कई तरह तरह की सुविधाओं का संसार सज रहा है। फिर भी हमारे देश में यह एक आम बात सभी के मुंह से सहज कही जाती है कि रेलवे की हालत खस्ता है।

पवन बंसल ने जैसा भी रेल बजट पेश किया है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्य़ा हमारे देश की खस्ताहाल रेलवे की हालत में में कोई सुधार होगा ? क्या रेल सुविधाओं के विकास और विस्तार के लिए जो धन चाहिए उसके लिए हमारे वित्त मंत्री धन का बंदोबस्त करेंगे? कोई पंद्रह सालों से हमारे देश की रेलवे की हालत ज्यादा खराब लग रही है। खराब पहले भी थी। पर, जब विकास का पहिया तेजी से घूमना शुरू हुआ, तो कमियां भी उतनी ही तेजी से उजागर होने लगी। सरकार चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की रही हो या मनमोहन सिंह की। रेलवे की आर्थिक हालत को सुधारने के लिए हर रेल बजट में बड़ी बड़ी घोषणाएं की गईं। राजनीतिक फायदे और जनता की वाहवाही लूटने के लिए करीब पौने दो लाख करोड़ के कई प्रोजेक्ट्स का ऐलान कर दिया गया, लेकिन इनमें से ज्यादातर प्रोजेक्ट या तो शुरू ही नहीं हुए या फिर बीच में ही रुक गए। ऐलान तो कर दिए, लेकिन किसी भी सरकार ने यह योजना नहीं बनाई कि इन प्रोजेक्ट्स के लिए पैसा कहां से आएगा और उनको पूरा कैसे किया जाए।

जानकार मानते हैं कि रेलवे की बदहाली की सबसे बड़ी वजह है उसका लगातार राजनीतिक इस्तेमाल। और अपना मानना है कि सरकार तो सरकार है। वह राजनीति से ही बनती है। सो, सरकार किसी का भी राजनीतिक इस्तेमाल ही करेगी। उसके अलावा क्या करेगी। सरकार कोई ट्रेन में थोड़े ही बैठती है। उसमें तो बैठते हैं आप और हम जैसे लोग। सो, रेल का इस्तेमाल तो हम लोग करेंगे। कांग्रेस तो इसी बात पर खुश है कि कोई 18 साल बाद उसके किसी रेल मंत्री ने बजट पेश किया है। रेल मंत्री ने एक शेर भी पढ़ा –  सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही, मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिए। तो रेलवे की सूरत बदलिए न साहब, किसने मना किया है। हम भी यही चाहते हैं। लेकिन समाजवादियों ने तो हंगामा करके संसद की ही सूरत बदलने की कोशिश कर डाली उसका क्या?  

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

स्‍वामी अग्निवेश पर हमला मामला : सीबीआई ने दर्ज किया मीडियाकर्मियों के बयान

जगदलपुर। सुकमा जिले के ताड़मेटला व दो अन्य गांवों में हुई आगजनी तथा दोरनापाल में स्वामी अग्निवेश के कापिले पर हुए हमले की जांच कर रही सीबीआई ने कुछ मीडियाकर्मियों का बयान दर्ज किया है। रविवार व सोमवार को पुराना सर्किट हाउस में पत्रकारों के बयान दर्ज किए गए।

सीबीआई टीम इसी सर्किट हाउस में अपना डेरा डाले हुए हैं। जिन मीडियाकर्मियों के बयान दर्ज किए गए हैं उनके बारे में बताया जाता है कि घटना की रिपोर्टिग के लिए वे प्रभावित गांव गए थे। कुछ मीडियाकर्मी स्वामी अग्निवेश के साथ रिपोर्टिग में भी शामिल थे।

सूत्रों के अनुसार कुछ ग्रामीणों के भी बयान दर्ज करने में सीबीआई की टीम को सफलता मिली है। सीबीआई का सिर्फ सोमवार तक रुकने का कार्यक्रम था, परन्‍तु पूछताछ के चलते संभावना है कि वे और दिन भी रुक सकते हैं। उल्‍लेखनीय है कि सीबीआई सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आगजनी व अग्निवेश के कापिले पर हुए हमले की जांच कर रही है। आगजनी की घटना 11 से 16 मार्च 2011 के बीच ताडमेटला, मोरपल्ली, तिम्मापुर में हुई थी। इन गांवों में ढ़ाई सौ मकानों को आग के हवाले कर दिया गया था।

घटना की जानकारी लेने के लिए स्‍वामी अग्निवेश 26 मार्च 2011 को प्रभावित गांव के दौरे पर गए थे। सीबीआई घटना की जांच के लिए पिछले साल प्रभावित गांव गई थी लेकिन वहां इनका अनुभव ठीक नहीं रहा था। इस बार टीम ने संभागीय मुख्यालय में डेरा डाल दिया है। जांच का काम भी तेजी से जारी है। संभावना है कि इस बार सीबीआई टीम अपनी जांच पूरा कर लेगी।

सुल्‍तानपुर में पुलिस ने हिंदुस्‍तान के फोटोग्राफर को पीटा

उत्तर प्रदेश में आम लोग तथा मीडियाकर्मियों पर पुलिस का कहर जारी है. खबर यूपी के सुल्तानपुर से है. कुछ लोग एक युवक की हत्‍या को लेकर एसपी कार्यालय के पास प्रदर्शन कर रहे थे. पर पुलिस इनकी बात सुनने की बजाय इन पर लाठी चार्ज कर दिया. इसी घटना को तमाम अखबारों के प्रेस फोटोग्राफर कवर करने लगे. इससे नाराज पुलिस वालों ने पत्रकारों को गालियां देते हुए उन पर भी लाठी भांज दिया.

मौके पर फोटो खींच रहे हिंदुस्‍तान अखबार के फोटोग्राफर राज बहादुर यादव को भी पुलिस वालों ने लाठियों से पीट दिया. चार पुलिस वालों ने उनका कैमरा भी छीनने का प्रयास किया. कुछ और पत्रकारों से भी अभद्रता की गई. राज बहादुर को पीटे जाने से मीडियाकर्मियों में नाराजगी है. उन्‍होंने आरोपी पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है.  

बदमाशों ने किया पत्रकार राजेश पर हमला, मामला दर्ज

राजगढ़। मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले की पचोर थाना पुलिस ने पत्रकार राजेश पालीवाल के उपर हमला करने के आरोप में तीन अज्ञात बदमाशों के खिलाफ मंगलवार को आपराधिक मामला दर्ज किया है।  पुलिस के अनुसार जिले के पचोर कस्बा में 25 फरवरी की रात आगरा-मुंबई राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर पत्रकार राजेश पालीवाल के साथ तीन अज्ञात बदमाशों ने उनकी मोटर साइकिल रोककर हमला किया। इसके बाद में दो पहिया वाहन पर सवार होकर तीनों बदमाश भाग गए।

घटना की रिपोर्ट पालीवाल ने पुलिस थाने में दर्ज कराई है। पुलिस ने भारतीय दंड विधान की धारा 341, 323, 506 और 34 में मामला दर्ज कर जांच कर रही है। घटना से नाराज पत्रकारों ने मामले की जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस को 3 दिन का समय दिया है। पत्रकारों ने चेतावनी दी है कि इस दौरान आरोपी गिरफ्तार नहीं हुए तो वे थाने के सामने धरना देंगे। पत्रकार पालीवाल के साथ हुई घटना की जिले के समस्त पत्रकारो ने कड़े शब्दों में निंदा की है।

पत्रकारिता कोश का नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में

मुंबई। भारत की प्रथम मीडिया डायरेक्टरी "पत्रकारिता कोश" का नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हो गया है। हाल ही में लिम्का बुक की ओर से कोश के प्रकाशक भारत पब्लिकेशन को इस आशय का एक प्रमाणपत्र भी प्राप्त हुआ है। आफताब आलम द्वारा संपादित इस कोश का प्रकाशन पिछले 13 वर्षों से नियमित रूप से हो रहा है। वर्ष 2001 में पूर्व केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के हाथों इनसार न्यूज मीडिया के राष्ट्रीय सम्मेलन में इसके पहले अंक का विमोचन हुआ था तब से यह पत्रिका हर वर्ष अद्यतन जानकारी व सूचनाओं के साथ प्रकाशित हो रही है। लगभग 900 पृष्ठों वाले इस कोश के अब तक 12 अंक प्रकाशित हो चुके हैं और 13वें अंक का प्रकाशन शीघ्र ही होने वाला है।

इस अखिल भारतीय कोश में देश भर के विविध भाषाओं के समाचारपत्र, पत्रिकाओं, समाचार चैनलों, वेब समाचारों, ई-पत्रिकाओं, सहित उनमें कार्यरत मीडियाकर्मियों व लेखकों की सूचनाएं शामिल हैं। यह कोश मीडिया व साहित्य जगत के साथ-साथ सरकारी कार्यालयों, संस्थाओं व समाज के बुद्धिजीवि वर्ग के लोगों में भी लोकप्रिय है। कोश का नाम लिम्का बुक में दर्ज होने के उपलक्ष्य में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, गृह राज्यमंत्री, मुंबई महानगरपालिका के आयुक्त, मुंबई के महापौर, आदि ने अपनी शुभकामनाएं दी हैं।

निर्भय पथिक के संपादक अश्विनी कुमार मिश्र, दोपहर का सामना के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल, प्रहार के संपादक महेश म्हात्रे, मुंबई मित्र के संपादक अभिजीत राणे, लाइव इंडिया के रवि तिवारी, एबीपी न्यूज के जीतेंद्र दीक्षित, लेमन न्यूज के सैयद सलमान, नवभारत के सुरेंद्र मिश्र, नवभारत टाइम्स के भूवेंद्र त्यागी, विमल मिश्र, महाराष्ट्र टाइम्स के राजेश वाघमारे, नीटी के राजभाषा अधिकारी सुरेशचंद्र जैन, एमटीएनएल के राजभाषा अधिकारी के.एस.खान, श्रुति संवाद साहित्य कला कादमी के अरविंद राही व डॉ. अनंत श्रीमाली, आशीर्वाद संस्थान के डॉ. ऊमाकांत बाजपेयी, आदि सहित प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अनेक संपादक व पत्रकारों ने कोश के संपादक आफताब आलम, सहायक संपादक राजेश विक्रांत व अखिलेश मिश्र और उनकी पूरी टीम को बधाई दी है।

भास्‍कर, उदयपुर के सलाहकार धर्मेश जैन ने दिया इस्‍तीफा, ओम गौड़ किया अस्‍वीकार

दैनिक भास्‍कर, उदयपुर में संपादक सुधीर मिश्रा एवं एडवाइजर धर्मेश जैन के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है. संपादक की कार्यप्रणाली से नाराज होकर धर्मेश जैन ने सोमवार को प्रबंधन को अपना इस्‍तीफा दे दिया था, परन्‍तु वरिष्‍ठ लोगों के आग्रह पर उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा वापस ले लिया है. हालांकि संपादक स्‍तर से उनके इस्‍तीफे को स्‍वीकार किए जाने की पूरी तैयारी हो गई थी, परन्‍तु स्‍टेट हेड ओम गौड़ के हस्‍तक्षेप के बाद मामला सलट गया.

बताया जाता है कि धर्मेश जैन उदयपुर के जाने माने शख्सियत हैं. भास्‍कर प्रबंधन ने उन्‍हें उदयपुर में अखबार का एडवाइजर बना रखा है. धर्मेश जैन कम्‍युनिटी में रसूख रखने के साथ ला से भी जुड़े हुए हैं. वे काफी समय से भास्‍कर के सलाहकार के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे. परन्‍तु संपादक सुधीर मिश्रा कुछ समय से उनकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे थे, जिससे परेशान होकर धर्मेश जैन ने सोमवार को सुधीर मिश्रा को अपना इस्‍तीफा दे दिया तथा उपर वरिष्‍ठ लोगों को भी इसकी जानकारी दे दी.

बताया जा रहा है कि उन्‍होंने इसके लिए नियमानुसार एक महीने की नोटिस भी दी थी, परन्‍तु संपादक सुधीर मिश्रा उनके इस्‍तीफे को तत्‍काल प्रभाव से स्‍वीकार करने की तैयारी करने लगे. परन्‍तु जब इस मामले की जानकारी स्‍टेट हेड ओम गौड़ को हुई तो उन्‍होंने बीच में हस्‍तक्षेप करते हुए सुधीर मिश्रा को धर्मेश जैन का इस्‍तीफा फाड़कर फेंक देने को कहा. उन्‍होंने धर्मेश को भी फोन करके इस्‍तीफा स्‍वीकार नहीं किए जाने की बात कही. साथ उन्‍हें अपना काम करते रहने का आग्रह किया, जिसके बाद धर्मेश जैन ने अपना इस्‍तीफा वापस ले लिया.

बंपर भर्ती : प्रसार भारती ने 1630 पदों के लिए मांगे आवेदन

प्रसार भारती टेक्निकल पदों के लिए बंपर वेकेंसी निकाली है. पूरे देश में 1630 पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए हैं. जिन पदों के लिए भर्ती निकाली गई है उसमें इंजीनियरिंग असिस्‍टेंट और टेक्निशियन पद शामिल है. इं‍जीनियरिंग असिस्‍टेंट के लिए 1290 तथा टेक्निशियंस के लिए 340 पदों के लिए आवेदन मांगे गए हैं.

इन पदों के लिए ऑन लाइन आवेदन प्रक्रिय 23 फरवरी से शुरू की जा चुकी है. आवेदन भरने की आखिरी तारीख 22 मार्च तय की गई है.  इसमें लगभग देश के सभी राज्‍यों में भर्तियां की जाएंगी.

Prasar Bharati invites applications for 1630 technical posts

MUMBAI: In a bid to clear huge backlog of vacancies, Prasar Bharati has now invited applications for around 1630 technical posts across the country. Prasar Bharati will recruit young and skilled personnel for manning the posts of Engineering Assistants and Technicians in offices spread across the country. Applications are invited from Indian Nationals who fulfill the prescribed qualifications and age requirements mandatory for these posts.

In this recruitment drive, around 1290 seats for engineering assistants and 340 seats for technicians are expected to be filled up. The online registration for the same will commence on 23 February 2013. The last date for applying for the posts is 22 March, and the examination is tentatively scheduled to be held on 26 May 2013.

The Staff Selection Commission (SSC), Government of India will further make the recruitment to these posts on behalf of the Prasar Bharati under special dispensation given by the government. A panel for appointment against the said vacancies will be prepared and the candidates included in the panel will be given appointment against the vacancies, in phases extending over a period of two to three years.

The states included under the North Zone are Delhi, Haryana, Punjab, Union Territory of Chandigarh, Himachal Pradesh, J&K, Rajasthan, Uttar Pradesh and Uttrakhand. The East Zone comprises of Bihar, Jharkhand, Odisha and West Bengal; while the North East Zone has the states Arunachal Pradesh, Assam, Nagaland, Manipur, Mizoram, Tripura, Meghalaya and Sikkim.

In the West Zone are the states Maharashtra, Goa, Madhya Pradesh, Chhattisgarh, Gujarat, Union Territories of Daman & Diu and Dadra & Nagar Haveli. The South Zone includes Andhra Pradesh, Union Territory of Andaman & Nicobar Islands, Karnataka, Union Territory of Lakshdweep, Kerala, Tamilnadu and Union Territory of Puducherry. (आरएंडएम )

चीन में बीबीसी की ‘वर्ल्‍ड सर्विस’ की गई बाधित

लंदन: बीबीसी ने सोमवार को कहा कि अंग्रेजी में प्रसारित होने वाली इसकी ‘वर्ल्ड सर्विस’ को चीन में वहां के अधिकारियों ने जानबूझकर बाधित कर दिया है। एक बयान जारी कर बीबीसी ने कहा, ‘‘बीबीसी ऐसी कार्रवाई की कड़ी निंदा करता है जो समाचार एवं सूचना तक दर्शकों की आसान पहुंच को बाधित करती है।’’

बीबीसी ने यह भी कहा कि पिछले दो सालों में चीन में कई दफा उसकी दूरसंचार सेवा भी बाधित की गई है।

संदीप दुबे एवं संजय सिंह अमर उजाला पहुंचे, बबिता आनंद का नेशनल दुनिया से इस्‍तीफा

अमर उजाला, कानपुर से खबर है कि दो लोगों ने अपनी नई पारी शुरू की है. दैनिक भास्‍कर, छत्‍तीसगढ़ से इस्‍तीफा देकर संदीप दु‍बे ने कानपुर में अमर उजाला ज्‍वाइन किया है. उन्‍हें यहां पर सीनियर सब एडिटर बनाया गया है. संदीप कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उनके अलावा संजय सिंह भी राष्‍ट्रीय सहारा, कानपुर से इस्‍तीफा देकर अमर उजाला ज्‍वाइन किया है. उन्‍हें जूनियर सब एडिटर बनाया गया है. दोनों लोग डेस्‍क पर अपनी जिम्‍मेदारी निभाएंगे.

नेशनल दुनिया, गाजियाबाद से खबर है कि बबिता आनंद ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर पेजीनेटर कम रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थीं. पिछले दिनों प्रबंधन ने बबिता का तबादला दिल्‍ली आफिस के लिए कर दिया गया था, जिसके बाद उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया.

यूपी के कई शहरों में अपना विस्‍तार करेगा काम्‍पैक्‍ट

अमर उजाला समूह का बच्‍चा अखबार काम्‍पैक्‍ट जल्‍द ही यूपी के कई और शहरों में अपना विस्‍तार करने जा रहा है. यूपी में उन शहरों में सर्वे का काम करा लिया गया है, जहां से अमर उजाला का प्रकाशन तो होता है परन्‍तु काम्‍पैक्‍ट अभी तक यहां पर लांच नहीं हो सकता है. फिलहाल इस टैबलाइड अखबार का प्रकाशन दस एडिशन के साथ किया जा रहा है. इन जगहों पर इस बच्‍चा अखबार को मिली सफलता ने प्रबंधन को इसका विस्‍तार करने पर मजबूर किया है.

20 पेज का फुल कलर काम्‍पैक्‍ट ने दैनिक जागरण के बाइलिंगुअल टैबलाइड आई नेक्‍स्‍ट को कई शहरों में पीछे छोड़ दिया है. माना जा रहा है कि अगले वित्‍त वर्ष से काम्‍पैक्‍ट के कई एडिशन लांच किए जा सकते हैं. काम्‍पैक्‍ट के लिए अमर उजाला की टीम ही ज्‍यादातर काम करती है. लिहाजा इसको लांच करने में कोई बड़ी दिक्‍कत भी नहीं आने वाली है.

मई में दिल्‍ली से लांच होगा जी समूह का अंग्रेजी अखबार डीएनए

मुंबई बेस्‍ड ज़ी न्यूज समूह का अंग्रेजी अखबार डीएनए अब अपना विस्‍तार करने जा रहा है. अखबार अब अपने चौथे एडिशन के साथ दिल्‍ली में कदम रखने की तैयारी कर रहा है. संभावना है कि इस साल मई तक इस अखबार की लांचिंग दिल्‍ली में कर दी जाएगी. अब तक इस समूह में दैनिक भास्‍कर एवं जी न्‍यूज की आधी-आधी हिस्‍सेदारी थी, परन्‍तु अब जी समूह ने इस अखबार को भास्‍कर से पूरी तरह खरीद लिया है.

बताया जा रहा है कि अभी दिल्‍ली में डीएनए के ब्‍यूराचीफ की भूमिका निभा रहे सैकत दत्‍ता के नेतृत्‍व में इस अखबार की लांचिंग की जाएगी. सैकत ही इस अखबार के स्‍थानीय संपादक की भूमिका निभाएंगे. अभी इस अखबार का प्रकाशन मुंबई, पुणे तथा बंगलुरू से किया जा रहा है. दिल्‍ली इसका चौथा एडिशन होगा. सूत्रों का कहना है कि दिल्‍ली के बाद यह अखबार चेन्‍नई तथा कोलकाता में भी अपना कदम रखने की तैयारी करेगा.

इस अंग्रेजी अखबार के विस्‍तार की जिम्‍मेदारी भास्‍कर दास देखेंगे. भास्‍कर दास कुछ समय पहले ही टाइम्‍स समूह के अखबारों का प्रकाशन करने वाले बेनेट कोलमेन एंड कपनी से इस्‍तीफा देकर डीएनए पहुंचे हैं. उन्‍हें ग्रुप सीईओ बनाया गया है. फिलहाल उनका फोकस दिल्‍ली पर है. दिल्‍ली में जमे जमाए अखबारों के बीच डीएनए अपना स्‍थान कैसे बनाएगा यह देखने वाली बात होगी. संभावना है कि इस अखबार की दिल्‍ली में डेढ़ लाख कॉपियों के साथ लांचिंग की जाएगी.

याहू इंडिया के एमडी अरुण टडांकी का इस्तीफा, राष्ट्रीय सहारा में रमेश मिश्रा का इलाहाबाद तबादला

याहू इंडिया के मैनेजिंग डायेरक्टर अरुण टडांकी ने संस्थान से इस्तीफा दे दिया है. वो अभी जून तक संस्थान में बने रहेंगे, जब तक याहू दूसरे एमडी को संस्थान के साथ ना जोड़ ले. अरुण वर्ष 2009 में याहू के साथ बतौर एमडी इंडिया जुड़े थे. उसके बाद उन्हें प्रमोट करके साउथइस्ट एशिया का भी वर्ष 2011 में एमडी बना दिया गया. 21 वर्ष का अनुभव रखने वाले अरुण इससे पहले मोनेस्टर.कॉम के साथ बतौर एशिया पेसिफिक और वेस्ट एशिया के प्रेसिडेंट जुड़े हुए थे.

अरुण ने ही याहू का बैंगलोर में एडिटोरियल ऑपरेशन सेट-अप किया था. इसके साथ-साथ याहू के यूजर्स को लोकल कंटेंट के साथ साथ, क्रिकेट, बॉलीवुड, इंटरटेनमेंट और छह अन्य भाषाओं में कंटेंट उपलब्ध कराने का श्रेय इन्ही को जाता है. उन्हें बिजनेस टुडे के द्वारा होटेस्ट यंग एग्जीक्यूटिव इन इंडिया-2004 और इंडिया टुडे के द्वारा 50 यंग लिडर्स ऑफ इंडिया से नवाज़ा जा चुका है.

एक अन्य खबर के मुताबिक रमेश मिश्रा का तबादला राष्ट्रीय सहारा नोएडा आफिस से राष्ट्रीय सहारा इलाहाबाद आफिस कर दिया गया है. रमेश राष्ट्रीय सहारा में करीब 2008 से हैं. वे दैनिक जागरण से इस्तीफा देकर राष्ट्रीय सहारा, नोएडा में रिसर्च एंड प्लानिंग हेड के तौर पर जुड़े. सूत्रों का कहना है कि उन्हें इलाहाबाद में सहारा इंडिया मास कम्युनिकेशन (एसआईएमसी) का हेड बनाकर भेजा जा रहा है. रमेश दैनिक जागरण, इलाहाबाद में भी काम कर चुके हैं. उनका तबादला जागरण प्रबंधन ने इलाहाबाद से नोएडा तब किया था जब नोएडा में सेंट्रल डेस्क की स्थापना की जानी थी. वे दैनिक जागरण, नोएडा में कई वर्षों तक कार्यरत रहे.

‘अग्निवेश पहले जासूस के रोल में रहे, अब आंदोलन तोड़क की भूमिका में हैं’

Yashwant Singh : एक चैनल के डिबेट में… मुझे अग्निवेश को कहना पड़ा कि जासूसी करने की जगह अगर आप आंदोलन को मजबूत करते तो शायद देश ज्यादा मजबूत होता… लेकिन आपने तब भी आंदोलन तोड़ा और आज भी घूम घूम कर तोड़ने को राष्ट्रीय कर्तव्य साबित करने में जुटे हैं…

Vivek Singh : अरे यशवंत भैया बहुत बड़ा फ्राड है ये जब अन्ना जी अनशन पर थे तो ये कांग्रेस वालो से सेटिंग कर रहा था कि सब ख़त्म हो जायेगा और अब कह रहा है की ये हुआ था वो हुआ था, इसका तो स्टिंग आ गया था,
 
Santosh Kr Singh : Satya vachan..waise janta is swami ki asliyat janti hai.
 
Meetesh Dixit : Inko janta hi kaun h….is desh ki bheed ne ache acho ko line par la diya to ye kaun h..
 
bevajh : kisi ko mahatva dena apna samy barbad krna hai
 
Rahul Tripathi : बहोत सही कहा बड़े भईया ….और ऐसा सच हिम्मत वाले ही बोलते है
 
Pramod Kumar : Agnivesh aaj kal ke jinnah hain, jo personal mileage ke liye kuchh bhi kar sakate hain.
 
Dharmendra Gupta : swami RAAKH-vesh…
 
Sandesh Dixit : video link dijiye sahab !!
 
Ravish Raj Parmar : Jagdalpur, Chhattisgarh me ye kuch dino phle aaya tha
 
Rajan Mishra : bahut khub bole
 
Rajnikant Gupta : यशंवत जी मैने आप को कल साधना न्युज के प्रोग्राम में देख भी रहा था और सुन भी रहा था आप के द्वारा कहे शब्दों में तत्वो का समावेश था …………
 
Jitendra Dixit : यशवंत भाई, अन्ना आंदोलन के विघ्नविशारद अग्निवेश को आपने आईना दिखा कर एकदम सही किया है।
 
Vivek Choudhary : Bahut badhiya …
 
Yogesh Kumar Sheetal : उन्होंने, माफ कीजिएगा, उसने फिर क्या कहा?
 
Yashwant Singh छ वो क्या कहेंगे, अपनी ढपली अपना राग… मैंने उन्हें बताया कि एक पत्रकार दिलनवाज पाशा ने अन्ना से पूछा कि ''अग्निवेश आपका नाम लेकर कई तरह के आरोप केजरीवाल पर लगा रहे हैं'' तो अन्ना ने सिर पकड़ लिया और कहा कि ''सनसनी के लिए ऐसे आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए…'' मेरे इतना कहने पर अग्निवेश बोले- मुझे नहीं पता अन्ना ने क्या कहा, लेकिन मैंने वही कहा जो मैने देखा सुना है… सोचिए, अन्ना इनकार कर रहे हैं आरोपों से और अग्निवेश जी अन्ना के नाम के सहारे केजरीवाल को बर्बाद करने का गेम खेल रहे हैं…
 
Vaibhav Sharma : You done best work…
 
Rajiv Chaturvedi : Sateek…!!
 
Amit Dwivedi : Bahut badhiya
 
Satesh Sharma : YE sant nahi Yashwant ji, ye to bhakjhak hai..

Shravan Kumar Shukla : क्या धोया सर.. मज़ा आ गया.. यु-ट्यूब पे भी है.!

Dhani Naresh : आपने खरा जवाब दिया. मेरा ख़याल है कि अग्निवेश ने अपना रहस्योद्घाटन इंडिया न्यूज़ के रीलॉन्च के साथ ही किया है. बड़ा वक़्त लग गया नई साज़िश तलाशने में. आपने सही कहा, जासूसी की बजाए भ्रष्टाचार विरोधी कुनबे को जुटाने में लगते तो देश का भला होता. मग़र दीपक चौरसिया, भय्यू और स्वामी ये तीन तिलंगे असल मुद्दों से ध्यान भटकाने में जी जान से जुट गए हैं… ''कपिल मुनि… अरे ये तो पागल हाथी हो गया है'' यही स्वामी अग्निवेश हैं ना जिन्हें पूरे देश ने वीडियो में बलबलाते हुए देखा और सुना है.

Shailendra Singh : sahi kaha.
 
Tomar Sanjeev : You are absolutely right.
 
Vinayak Sharma : स्वामी अग्निवेश चर्चा के लिए नहीं बल्कि चर्चित रहने के लिए ही कार्य करते हैं.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

टुच्ची पत्रकारिता से कब तौबा करेंगे भास्कर डाट काम वाले?

Mohammad Anas : पहले वो स्नान करती महिलाओं की तस्वीर उतार कर 'संगम में हो रही मस्ती' जैसी हेडलाइन चिपकातें हैं और जब उन्हें उनकी भूल और गलती जो उन्होंने पूरे होशोहवास में की होती है, उससे वाकिफ़ कराया जाता है तो वो गलती नहीं मानते, और जब प्रशासन उनके किये की उन्हें कड़ी सज़ा देने की बात करता है तब वो महिलाओं की तस्वीर तो हटा लेते हैं पर वो लाइन नहीं हटाते, जिसमें धर्म और अध्यात्म के संगम की गलत छवि बनायी जा रही होती है, और उसकी जगह साधु-महात्मा की तस्वीरें डाल दी जाती हैं… क्या यह मीडिया में कार्यरत दबंग, लम्मट और रसूखदार संपादको की हठधर्मिता की पराकाष्ठा नहीं है? क्या यह सरोकारी पत्रकारिता के साथ अन्याय नहीं है? क्या यह धर्म की सहिषुणता के साथ खेलना नहीं हुआ?

और जब हम या आप जैसे लोग इस पर सवाल उठाते हैं तो तथाकथित मीडियाकर्मी पूरी की पूरी पत्रकार बिरादरी को अपने फ़ायदे के लिये बदनाम करने के खातिर व्यक्तिगत स्तर पर उतर आते हैं… क्या यही सिखाया जाता है देश के एक बड़े वेब पोर्टल के कर्मचारियों को कि अपने हित साधने के चक्कर में सही और गलत का भेद तक भूल जाये… अपने 'चटका मार' बिकाऊ कंटेंट को साफ़ सुथरा बनाये रखने के लिये उन लोगों पर आरोप और प्रत्यारोप लगाये जो इन्हें इनकी गलती का एहसास करवाते हैं.. महान दैनिक भास्कर.काम और महान उसके एक संपादक इसको पढ़ लें कि लिखना सिर्फ़ उन्हें ही नहीं आता, हमने भी वहीं धूप सेंकी हैं जहां की कुर्सी और मेजों पर उनके किस्से दर्ज़ हैं…

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दैनिक भास्कर के किये की सज़ा मिली लोकतंत्रा के चौथे पाये को, कल होने वाले स्नान पर्व पर घाट के सौ मीटर के दायरे में फ़ोटोग्राफ़ी पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लगाया प्रतिबंध… कौन कहता है मीडिया इस देश मे सर्वोपरि है… हम आम जन अपने पर आ जायें तो कुछ भी असंभव नहीं… मेला अधिकारी और आईएएस मणी प्रसाद उस दिन के किस्से का ज़िक्र करने लगे चाय पीते वक्त… और कहने लगे कि- कहो तो भास्कर के सारे रिपोर्टरस को बेरंग वापिस करवा दें… हमने मुस्कुराते हुए कहा कि जाने दीजिये भैय्या, बेचारों की गलती नहीं है, उन्हें भी अपना पेट पालना है, गरीब गुरबा हैं, रोजी रोटी ऐसे ही चलती हैं इनकी, ये अपनी अर्थी को भी ग्लैमर का तड़का लगा कर बेच डालने वाले लोग हैं, वो तो संगम पर स्नान करती हुई महिलायें थी… वो भी दूसरों के घरों की! ये भास्कर के मठाधीशों और बाकी के मीडिय़ा तुर्कों के लिये जिन्हें लगता है देश की जनता और देश का कानून उनकी जेब में है…

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महाकुम्भ मेलाधिकारी एवं आइएएस मणि प्रासाद मिश्र से मुलाकात हुई, उन्होंने भास्कार.काम के विरुद्ध कड़ी कार्यवाई करने की बात कही… और साथ में ही भास्कर.काम के इस गैर ज़िम्मेवाराना रुख की निन्दा की.. उनका कहना है कि ये काम यदि कोई विदेशी मिडिया करती तो बात अलग थी…

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मैं मानता हूँ भास्कर.काम एक पोर्न साईट है.. हमें पोर्नोग्राफ़ी का विरोध करना चाहिये क्योंकि खबर की आड़ में पोर्न बेचा जा रहा है इसलिये, नाकि इसलिये कि वो पोर्न दिखा रहे हैं… हमें खबर के इस बिगड़े स्वरूप से दिक्कत है…. और बिगाड़्ने वाले लोगों से दिक्कत है… पोर्न के लिये अलग से वेबसाइट्स हैं, दुनिया का बड़ा व्यवसाय है ये… कई देशों में पोर्न लीगल है, कानूनी है.. हमारे खुद के देश मे सबसे ज्यादा चट्का मिलता है पोर्न को … भास्कर.काम की उस पालिसी का विरोध जारी रहेगा जिसमें खबर की आड़ में पोर्न बेचा जा रहा है…

युवा पत्रकार मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.


पूरे प्रकरण को समझने के लिए यहां जरूर क्लिक करें- शर्मनाक, भास्कर वालों ने महाकुंभ में नहा रही महिलाओं की फोटो छाप दी

सहारा समूह प्रकरण में बार अध्यक्ष के बयान पर खफा हो गए प्रधान न्यायाधीश

सहारा समूह के मामले की सोमवार को सुनवाई शुरू होते ही उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एम कृष्णामूर्ति ने खड़े होकर प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ द्वारा इसकी सुनवाई करने पर आपत्ति की. उनका कहना था कि इस पीठ को मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि निवेशकों को धन लौटाने का आदेश दूसरी खंडपीठ ने दिया था. कृष्णामणि ने कहा, 'बार के नेता के रूप में मुझे यही कहना है कि इस अदालत की परंपरा का निर्वहन करते हुये इस खंडपीठ को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए और आदेश में सुधार के लिये इसे उसी पीठ के पास भेज देना चाहिए. इस मामले की सुनवाई करने की बजाये उचित यही होगा कि दूसरी खंडपीठ इसकी सुनवाई करे. कई प्रकार की अफवाहें सुनकर मुझे तकलीफ हो रही है.'

प्रधान न्यायाधीश इस बात पर नाराज हो गये और उन्होंने कहा कि वह इस मामले के तथ्यों की जानकारी के बगैर ही बयान दे रहे हैं. उन्होंने कृष्णामणि को बैठ जाने का निर्देश दिया. न्यायमूर्ति कबीर ने कहा, 'आपको कैसे पता कि इस मामले में क्या होने जा रहा है. यदि कुछ हो तब आप कहिये. कृपया अपना स्थान ग्रहण कीजिये.' बहरहाल अपने निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपये लौटाने के लिये कुछ और मिलने की सहारा समूह की अंतिम उम्मीद सोमवार को उच्चतम न्यायालय ने खत्म कर दी. प्रधान न्यायाधीश अलतमस कबीर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सहारा समूह को और समय देने से इंकार करते हुए फरवरी के प्रथम सप्ताह तक निवेशकों का धन लौटाने की न्यायिक आदेश का पालन नहीं करने के लिए उसे आड़े हाथों लिया.

इसी खंडपीठ ने सहारा समूह की दो कंपनियों को निवेशकों का धन लौटाने के लिये पर्वू में निर्धारित अवधि बढ़ाई थी. न्यायाधीशों ने सख्त लहजे में कहा, 'यदि आपने हमारे आदेशानुसार धन नहीं लौटाया है तो आपको न्यायालय में आने का कोई हक नहीं बनता है.' उन्होंने कहा कि यह समय सिर्फ इसलिए बढ़ाया गया था ताकि निवेशकों को उनका धन वापस मिल सके. सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत राय और इसकी दो कंपनी सहारा इंडिया रियल इस्टेट कापरेरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेन्ट कॉपरेशन पहले से ही एक अन्य खंडपीठ के समक्ष न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही का सामना कर रही हैं. इस खंडपीठ ने निवेशकों का धन लौटाने के आदेश का पालन नहीं करने के कारण छह फरवरी को सेबी को सहारा समूह की दो कंपनी के खाते जब्त करने और उसकी संपत्तियां कुर्क करने का आदेश दिया था.

न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पिछले साल 31 अगस्त को सहारा समूह की दो कंपनियों को निवेशकों का करीब 24 हजार करोड़ रुपया तीन महीने के भीतर 15 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश दिया था. आरोप है कि कंपनियों ने नियमों का उल्लंघन करके अपने निवेशकों से यह रकम जुटाई थी. लेकिन बाद में प्रधान न्यायाधीश कबीर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पांच दिसंबर को सहारा समूह को अपने करीब तीन करोड़ निवेशकों का धन लौटाने के लिये उसे नौ सप्ताह का वक्त दे दिया था. कंपनी को तत्काल 5120 करोड़ रुपए लौटाने थे. उस समय भी सेबी और निवेशकों के एक संगठन ने प्रधान न्यायाधीश से इस मामले को न्यायमूर्ति राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के पास भेजने का अनुरोध किया था लेकिन न्यायालय ने उनका यह आग्रह ठुकराते हुये निवेशकों के हितों ध्यान रखते हुये यह आदेश दिया था.

Pak TV anchors turn moral police, spark outrage

Late last month, a dentist-turned-anchorperson of Pakistani news TV channel Express News gatecrashed a massage parlour in Lahore with her cameraman and two policemen and “uncovered” an alleged brothel. She is believed to have ransacked the parlour, ordered the police around, threatened arrests, and the policemen seemed to have obeyed dutifully. Express News telecast the incident on February 1.

It wasn’t the first incident of its kind, but the latest in a growing trend of Pakistan’s aggressive news TV channels taking to moral policing and vigilantism in a battle for popularity and ratings. The phenomenon has offended viewers and media observers and the two sides often confront each other in the social media.

Kamran Shahid, a former college lecturer and now anchor on Dunya TV’s show ‘On the front with Kamran Shahid’, about a month ago suggested doing away with co-education in Pakistan’s universities as a measure to curb sexual harassment of female students.

In the Lahore incident, Dr Maria Zulfiqar, a little known Express News anchor who hosts a show called Baat se Baat, allegedly forced open the doors of a massage parlour run by Chinese and Russian women and threatened a Pakistani employee that she would get her arrested if she didn’t admit the place was a brothel.

Among the more infamous incidents that marked the early days of this trend involved anchor Maya Khan “raiding” parks in Karachi in January last year to “catch” dating couples for her breakfast show Subah sawere Maya Khan ke saath on CNBC Samaa TV. Cameras were shoved in the faces of couples in total disregard of their privacy. They were bullied and questioned if they were married and if their parents knew what they were up to.

Not surprisingly, the phenomena has sparked outrage among Pakistani rights activists and ordinary TV viewers, some of whom have taken to Twitter and Facebook to brand this as moral policing.

Pakistan has a regulatory body called the Pakistan Electronic Media Regulatory Authority (PEMRA) which has framed a code of conduct for broadcasters to follow. However, PEMRA’s record is patchy and its role itself has been the subject of controversies in the past. The PEMRA chairman did not respond to requests from The Indian Express for a comment for this report.

A letter complaining against Khan was written by a viewer to CNBC Samaa’s CEO, who replied saying Khan was asked to tender an unconditional apology and she and her team were sacked as she refused to apologise.

Khan went on to join ARY channel, and on one show there in July 2012, helped an Islamic cleric convert a Hindu Dalit boy named Sunil to Islam on live TV. The audiences called in to cheer, congratulate and welcome “Mohammad Abdullah” into the faith. But former human rights minister Ansar Burney threatened to sue Khan saying Sunil was his employee and called the entire incident a “drama”.

Last month, prominent rights activist Marvi Sirmed took on Shahid on Twitter. “I told him that the law enforcement agencies have to deal with sexual harassment as a crime. Creating separate universities for men and women will not ensure crimes against women are not committed,” she said. “He called me a bigot.”

Identifying what lies beneath this recent phenomena of vigilante anchorpersons, she said: “They are not trained journalists, so they don’t have a news sense. They can’t identify issue from non-issue. The lure of making a quick buck and easy fame drives them to rake up issues which do not warrant any discussion. You will not find a single reputed TV journalist dealing with such frivolous issues as there is no dearth of real issues in Pakistan.”

Raza Rumi, a well-known columnist and rights activist based in Lahore, says this trend took root around the time of the Lal Masjid operation in 2007. “Chinese massage parlours in Islamabad and surrounding areas were raided and depicted as brothels. Thus began the ‘moral cleansing’ of Pakistan when the clerics of Lal Masjid took the law into their hands, raided these parlours and got the employees arrested. They vowed Shariah would be imposed and this helped the smuggling of arms into the mosque, which ended in a bloody encounter ordered by Pervez Musharraf,” Rumi said.

“Well-turned out TV anchors with no background in journalism are being fed with right-wing scripts to cash in on the the populist religious-moral sentiment in Pakistan. They have no way of justifying their action in the name of journalism,” added Sirmed.

इंडियन एक्सप्रेस में Ruchika Talwar की रिपोर्ट.

पिक्‍चर परफेक्‍ट दिल्‍ली के विजेता बने फोटो जर्नलिस्‍ट मानवेंद्र वशिष्‍ठ

नई दिल्ली : राजधानी दिल्ली पर आधारित पहली फोटो प्रतियोगिता पिक्चर परफेक्ट दिल्ली-2012 के विजेताओं को सोमवार को पुरस्कार वितरित किए गए। एक लाख रुपये का पहला पुरस्कार मानवेंद्र वशिष्ठ, तीन द्वितीय पुरस्कार सुभाष पाल, गौरव छाबड़ा व ज्योति कपूर, तीसरा पुरस्कार आशीष रेही, अमरजीत कुमार सिंह, मनीष, अश्विनी कुमार शर्मा और महेश सिंह को मिले। पुरस्‍कार जीतने वाले सभी लोग अखबार और चैनलों से जुड़े हुए हैं। सेंट्रल पार्क में प्रतियोगिता की श्रेष्ठ तस्वीरों की प्रदर्शनी भी लगाई गई।

मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने विजेताओं को तो पुरस्कार दिए ही, साथ ही इस प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस मौके सीएम ने कहा कि यह प्रतियोगिता दिल्ली के विभिन्न रंगों, उमंगों और विशेषताओं की भावनात्मक अनुभूति का साधन बनी है और विजेताओं ने अपने कौशल और सूझबूझ से दिल्ली की अनूठी छवि की बेहतरीन तस्वीरें खींची। प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में मुख्यमंत्री के अलावा जाने माने छायाकार रघु राय शामिल थे।

समीर, लोकेश, हरेराम, जितेंद्र एवं पूजा पहुंचे ‘खबरें अभी तक’

ए1 तहलका' न्‍यूज चैनल से खबर है कि समीर गोयल ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे असाइनमेंट पर शिफ्ट इंचार्ज के पद पर कार्यरत थे. समीर ने अपनी नई पारी 'खबरें अभी तक' के साथ शुरू कर रहे हैं. उन्‍हें यहां भी असाइनमेंट पर लाया गया है. वे एक मार्च से अपनी जिम्‍मेदारी संभाल लेंगे. समीर इसके पहले भी खबरें अभी तक के साथ ही काम कर रहे थे. ये उनकी दूसरी पारी है. समीर ने अपनी करियर की शुरुआत 2007 में टोटल टीवी से की थी. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद खबरें अभी तक गए फिर वहां से इस्‍तीफा देकर कुछ दिन न्‍यूज एक्सप्रेस से भी जुड़े हुए थे. यहां से इस्‍तीफा देकर ए1 तहलका चले गए थे.

टोटल टीवी से खबर है कि लोकेश सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे लंबे समय से टोटल को अपनी सेवाएं दे रहे थे. लोकेश ने भी अपनी नई पारी खबरें अभी तक के साथ शुरू की हैं. हरियाणा न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर हरेराम भी खबरें अभी तक से जुड़ गए हैं. वे इसके पहले टोटल टीवी को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. जितेंद्र कुमार भी टोटल टीवी से इस्‍तीफा देकर खबरें अभी तक से जुड़ गए हैं. ये तीनों लोग एडिटोरियल में ज्‍वाइन किया है. टोटल से इस्‍तीफा देकर वीडियो एडिटर प्रिया ने भी खबरें अभी तक ज्‍वाइन कर लिया है. उल्‍लेखनीय है कि खबरें अभी तक के डाइरेक्‍टर टोटल टीवी के पूर्व हेड विनोद मेहता हैं.

प्रेस छायाकार ने दुल्‍हन को गोली मारी, अरेस्‍ट

अमरोहा। उत्तर प्रदेश में अमरोहा जिले के हसनपुर क्षेत्र में रविवार रात एक हिंदी समाचार पत्र में छायाकार युवक ने शादी के लिए तैयार होकर ब्यूटी पार्लर आई दुल्हन को गोली मारकर घायल कर दिया। आरोपी छायाकार को तमंचे के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है। जानकारी के अनुसार मनोता मनोता निवासी पुष्पा नामक युवती की रविवार रात शादी होनी थी। जिसके लिए वो तैयार होने ब्‍यूटी पार्लर गई थी।

ब्‍यूटी पार्लर से तैयार होकर जब वह मंडप की तरफ जा रही थी तो तभी प्रेस छायाकार रोहतास ने उसे गोली मार दी। गोली लगते ही वह घायल होकर गिर गई। परिजनों ने तत्‍काल उसे उठाकर अस्‍पताल पहुंचाया जहां उसकी हालत गंभीर है। पुलिस ने आरोपी छायाकार रोहतास को गिरफ्तार करके उसके कब्‍जे से तमंचा बरामद कर लिया है।

सोशल मीडिया पर बजट को लाइव कवरेज देगी सरकार

नई दिल्ली : सरकार ने रेल बजट और आम बजट को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया पर लाइव कवरेज देने की योजना बनाई है। इसके तहत सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब सहित सोशल मीडिया के दूसरे प्लेटफॉर्म्स पर इन दोनों बजटों के लाइव अपडेट की योजना बनाई है।

सूत्रों के मुताबिक, मंत्रालय सोशल साइट्स पर लगातार बजट की हाइलाइट्स देता रहेगा। मंत्रालय यह काम सोशल साइट्स की अपनी डिजिटल वॉलेंटियर्स सेना के जरिए करेगा। गौरतलब है कि 7 फरवरी को मंत्रालय ने अपने सोशल साइट्स को चलाने के लिए डिजिटल वॉलेंटियर्स प्रोग्राम 'माई इंडिया इनिशटिव' की शुरुआत की थी। तीन हफ्ते से भी कम समय में उसके पास सात सौ वॉलेंटियर्स की फौज तैयार हो गई है।

मिनिस्ट्री के एक ऑफिसर के मुताबिक पहले फेज में तकरीबन 500 लोगों को शुरुआती ट्रेनिंग दी गई और उन्होंने काम शुरू कर दिया है। अधिकारी के मुताबिक, वॉलेंटियर्स बनाने की यह मुहिम जारी है, जिसमें बड़े पैमाने पर देशभर से यंगस्टर्स जुड़ रहे हैं। (एनबीटी)

स्याह होती संवेदनाओं में रंग भरती दयानंद पांडेय की कहानियाँ

झूठे रंग रोगन में चमकते चेहरे और मनुष्यता को लीलते हुए बाजार पर पैनी निगाह रखे हुए कथाकार दयानन्द पाण्डेय वस्तुतः स्याह होती संवेदनाओं में रंग भरने वाले अनोखे कथाकार हैं। अनोखापन इसलिए कि एक तरफ तो वे आम आदमी की पक्षधरता ले बैठे हैं। तो दूसरी तरफ ज्वलंत समस्याओं की अग्नि में सीधे हाथ डालते हैं। इस कार्य से उपजे दुख विडम्बना और संत्रास से वे खुद भी पीड़ित होते हैं। इस प्रकार कथाकार दयानन्द पाण्डेय मानवीय पीड़ा को समूची संवेदना के साथ उभारते हैं। उनकी कहानियों में कोई झोल नहीं होता वे सहजबोध के असाधारण लेखक हैं।

अपने उपन्यास, कहानी संग्रह संपादन तथा अनुवाद के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करानेवाले लेखक दयानन्द पाण्डेय डेढ़ दर्जन से भी अधिक पुस्तकों की रचनाकर हिन्दी साहित्य की दुनिया में एक प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में उनका कहना है कि, ‘‘मैं मानता हूँ कि लेखक की कोई रचना फैसला नहीं होती और न ही अदालती फैसला रचना। फिर भी लेखक की रचना किसी अदालती फैसले से बहुत बड़ी है, और उसकी गूँज, उसकी सार्थकता सदियों में भी पुरानी नहीं पड़ती।’’ भूमिका पृ.सं. 8

उनका यह कथन साहित्य संचरण, संप्रेषण, सामर्थ्य और शाश्वतता की ओर संकेत करता है। प्रकारान्तर से वे इस बात का स्वीकार करते हैं कि लेखक ऐक्टिविस्ट नहीं होता है जो समस्याओं को ऊपर-ऊपर से देखकर नारे-पोस्टर लिखकर क्रान्ति कर दे। उनका स्पष्ट मन्तव्य है कि लेखन महज उबाल या प्रतिक्रिया न होकर प्रौढ़ प्राँजल और गम्भीर्य युक्त होना चाहिए। ऐसा ही लेखन दयानन्द के साहित्य में मिलता है। अपनी कहानियों के माध्यम से वे सामाजिक और व्यक्तिगत विसंगतियों के जकड़न को धीरे-धीरे खोलते हैं। वे मरती हुई अुनभूतियों और भावनाओं के खालीपन को रचते हुए यथा तथ्य का वर्णन करते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियों के स्त्री-पुरुष और परिस्थितियाँ बेहद साधारण और जानी पहचानी लगती हैं। फिर भी उनकी कहानियों के विषय वस्तु में वैविध्यता है। जिसकी सरसता को लेकर वे हरदम चर्चा में रहते हैं। प्रस्तुत कहानी संग्रह, ‘फेस बुक में फंसे चेहरे’ में कुल आठ कहानियाँ हैं। ‘फेस बुक में फंसे चेहरे’ कहानी अर्न्तजाल के जाल में फंसे मनुष्य की विडम्बना को उभारती है, जिसका पहला संवाद है, ‘‘आदमी के आत्म विज्ञापन की राह क्या उसे अकेलेपन की आह और आँधी से बचा पायेगी।’ पृ. 31

यहाँ झोंक जाता है दयानन्द के भीतर का सजग कहानीकार जो छोटी-छोटी घटना, भाव अथवा बड़बड़ाहट के भीतर छिपे मानवीय सत्य को सुनने का प्रयास करता है। रामसिंगार भाई यह जानकर मुदित होते हैं कि बड़े बाबू ने अकेले ही गाँव के विकास में बहुत योगदान दिया, जिससे गाँव में बिजली सड़क स्कूल आदि सुलभ हो गया है। राम सिंगार भाई सोचते हैं कि ….यह फेसबुक पर नहीं है। फेसबुक पर वे लोग हैं जो आत्म विज्ञापन के चोंचले में डूबे हुए हैं। वहाँ अतिरिक्त कामुकता है, अपराध है, बेशर्मी है। ऐसे लोगों के मुखौटे उधेड़ती यह कहानी वहाँ खत्म होती है, जहाँ एक मॉडल की कुछ लिखी हुई नंगी पीठ की पोस्ट लगाते ही सौ से ज्यादा कमेन्ट आ जाते हैं, लेकिन जब जन सारोकार सम्बन्धी गाँव की पोस्ट लगाई जाती है तो उस पर सिर्फ दो कमेन्ट आते हैं, वह भी शिकायती अन्दाज में। मजे की बात यह है कि सब जानने के बाद भी राम सिंगार भाई फेसबुक पर उपस्थित हैं। ‘‘तो क्या राम सिंगार भाई फेसबुक के नशे के आदी हो गये हैं।’’ पृ. 44

इस वाक्य के साथ कहानी का अन्त हो जाता है, जो देर तक पाठक को झकझोरता है। कहानीकार कई बातें कहने में सक्षम हुआ है। एक, सोशल नेटवर्किंग के द्वारा बहुत सी चीजे बर्बाद हो रही है। दूसरे, कोकीन, चरस, गाँजा, अफीम सभी कहीं ज्यादाखतरनाक है फेसबुक। और तीसरे फेसबुक मनुष्य को पहचान नहीं देता केवल फँसाता है।

इस कहानी संग्रह की सशक्त कहानी है–‘‘सूर्यनाथ की मौत’’ इसमें मॉल कल्चर की अमानवीयता को दिखाया गया है। निर्मम उपभोक्ता संस्कृति मासूम सम्भावनाओं को ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिस्पर्धा की आग में झोंकने का काम कर रही है। इतना बड़ा बाजार इतने प्रोडक्ट मनुष्य को बौना बना रहे हैं। उनकी मौलिकता के पंख को नोचकर उनमें केवल क्रेता या विक्रेता के भाव भर रहे हैं। कहानी का नायक सूर्यनाथ है जो सूर्य की तरह प्रकाशमान, न्यायी और खरा है, इसीलिए वह धीरे-धीरे मौत की ओर खिसक रहा है। सूर्यनाथ जैसा कद्दावर चरित्र जिसे दयानन्द ने आजादी के समय की बची खुची मिट्टी से लेकर गढ़ा है। ‘फ्लेक्सिबल’ होने की बात पर वह अपना क्रोध पी जाता है। उसके मन में आता है कि ‘बिरला भवन’ में ‘गाँधी स्मृति’ चला जाये जहाँ गाँधी को गोडसे ने गोली मारी थी, वहीं खड़ा होकर प्रार्थना के बजाय चीख-चीख कर कहे कि –हे गोडसे आओ, हमें और हम जैसो को भी मार डालो। इस कहानी के माध्यम से दयानन्द पाण्डेय अपने देश की जनता की सबसे कमजोर और दुखती रग पर अँगुली रख देते हैं।

‘‘कोई गोडसे गोली नहीं मारता। सब व्यस्त हैं, बाजार में दाम बढ़ाने में व्यस्त हैं। सूर्यनाथ बिना गोली खाये ही मर जाते हैं।’’ पृ. 62

कहानी मर्मान्तक पीड़ा देकर समाप्त हो जाती है। स्वार्थ पर टिके हुए विवाहेत्तर सम्बन्ध कभी-कभी जीनियस से जीनियस को भी पतन के गर्त में जाकर पटक देते हैं, जहाँ मौत भी पनाह नहीं देती, उसे हत्या या आत्महत्या के दौर से गुजरना होता है। इसी बात को सच करती है कहानी ‘एक जीनियस की विवादस्पद मौत’।

प्रेम की विभिन्न आकृतियों और विकृतियों की कहानी है ‘बर्फ में फँसी मछली’। मोबाइल और इन्टरनेट से उसकी शाखायें और भी फूली-फैली हैं। इस कहानी का नायक देखता है कि समूचा अन्तरजाल सेक्स को समर्पित है, चैट करते हुए वह देखता है कि ‘सेक्स की एक से एक टर्मानोलाजी कि वात्स्यायन मुनि भी शर्मा जायें। एक से एक मैथूनी मुद्रायें कि ब्लू फिल्में भी पानी माँगे’। पृ.93

कई लड़कियों से प्रेम, फ्लर्ट, चैटिंग और उनसे पीछा छुड़ाते हुए आखिर उसे एक रशियन लड़की से प्यार हो जाता है। रशियन पुरुषों से अतृप्त रीम्मा भारतीय पुरुष से प्यार पाना चाहती है, वह हिन्दुस्तान आना चाहती है। उसके कैंसर की खबर सुनते ही नायक उससे मिलने जाता है लेकिन उससे पहले ही वह देह छोड़ चुकी होती है। प्रेम में डूबा हुआ नायक कहीं का नहीं रहता। उसके दिल का समझ कर भी उससे कोई सहानुभूति नहीं रखता। अब वह बर्फ में फँसी हुई मछली की तरह तड़पता है वैसे ही जैसे रीम्मा तड़पती थी।

दयानन्द पाण्डेय भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के प्रति सजग समर्थ कहानीकार हैं। उनकी लेखनी इतिहास के उन पन्नों को छूती है, जिस पर राही मासूम रजा ने ‘आधा गाँव’, कुर्रतुल हैदर ने ‘आग का दरिया’ लिखा था। ‘मन्ना जल्दी आना’ कहानी विभाजन एवं पूर्वी पाकिस्तान बनने के समय की त्रासदी झेलते हुए ‘अब्दुल मन्नान के विस्थापन की कहानी है। हिन्दुस्तान में जुलाहे जाति क गोल्ड मेडलिस्ट अब्दुल मन्नान अपने ससुराल पूर्वी पाकिस्तान जाते हैं। वहाँ उन पर हिंदुस्‍तानी जासूस होने का दाग लगता है लेकिन ससुर के दबदबे के कारण शीघ्र मिट जाता है। बाँगला देश के दंगे में उनके ससुर व साले की हत्या हो जाती है। मकान जला दिया जाता है और वे वापस हिन्दुस्तान भाग आते हैं। यहाँ पर वे पहले से ही पाकिस्तानी डिक्लेयर्ड हैं। यहाँ से उन्हें सपरिवार बाहर भेज दिया जाता है। मन्नान के विस्थापन में साथ देने वाले शहर के लोग, पड़ोसी, इष्ट मित्र, पारिवारिक सदस्य, मिट्ठू मियां (तोता) आदि के मर्मस्पर्शी चित्रा रचने में कहानीकार को सफलता मिली है।

‘घोड वाले बाऊ साहब’ कहानी विकृत होती, ढहती सामंती व्यवस्था की कहानी है। यह खोखले अहंकार और नैतिकता के टूटने की कहानी है। इस कहानी में झाड़-फूँक, संन्यासी, आश्रम, पुलिस स्टेशन आदि के दोगलपन का वर्णन है। ‘लगाम अपने हाथ में रखना चाहिये’ ऐसा कहने वाले ड्राइविंग का शौक रखनेवाले ‘बाऊ साहब’ को पता ही नहीं था कि उनके और वंश की गाड़ी कोई और लोग हाँक रहे थे। इस संग्रह की सबसे लम्बी कहानी है, ‘मैत्रोयी की मुश्किलें’ मैत्रोयी जितना ही प्रेम, सम्मान और सुरक्षा पाना चाहती है, उतनी ही मुश्किलों में फँसती जाती है। इस कहानी में नाटकीयता है। स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध पल-पल बदलते हैं, स्वार्थ, धन, यौनेच्छा, उम्र तथा प्रतिष्ठा के चलते ये हरदम दाँव पर लगे रहते हैं।

संग्रह की पहली कहानी और बेहतरीन कहानी है, ‘हवाई पट्टी के हवा सिंह’। यह कहानीकार के पत्राकार जीवन की सजीव कहानी है। खिलदंड़े अन्दाज में रची गई इस कहानी में अशिक्षित, बेलगाम युवाओं की समस्या उठाई है। ऐसे युवा अक्सर हमें जान जोखिम में डाले रेल की छतों पर यात्रा करते पाये जाते हैं। कहानी में नेता जी मुख्य मंत्री के प्रोग्राम में शामिल होने के लिए कुछ पत्रकारों को लेकर बिहार की ऐसी हवाई पट्टी पर उतरने का प्रयास करते हैं, जहाँ गोबर पाथा गया है, चारपाइयां हैं और भारी संख्या में लोग। पायलट अपने को और जहाज को बचाने के लिए कुछ दबंग लड़कों को बुलाता है। लड़के भीड़ को तो भगा देते हैं लेकिन पायलट से कहते हैं, ‘‘अच्छा एक काम करो, इस जहाज में एक बार हम लोगों को बैठाकर उड़ा देना। ….ज्यादा नहीं..तीन-चार चक्कर।…धोखा मत देना।….नहीं तो पेट्रोल डाल कर दियासलाई दिखा देंगे तुम्हारे जहाज को।’’ बाद में पी.ए.सी. के जवानों ने उन्हें काबू में किया और जहाज उड़ान भरने लगा। पायलट ने उन लड़कों को हवा सिंह कहा, जिनका चीखना, चिल्लाना, रोब गांठना, प्रार्थना करना, गालियाँ देना सब हवा हो गया। सवाल यह है कि जिन्हें हवा सिंह कहा जा रहा है, वे कौन हैं? क्या उनके भविष्य के साथ देश का भविष्य नहीं जुड़ा है।

दयानन्द की सभी कहानियां उत्तम हैं। कथ्य तो सार्थक और सामायिक है ही, शिल्प भी उसके अनुसार है। दयानन्द की भाषा में प्रवाह है, पाठक को बाँध लेने की क्षमता है। उनके संवाद तीखे हाजिर जवाब एवं प्रभावपूर्ण हैं। भाषा किस्सागोई तो अद्भुत है और यही उनकी भाषा की जान है, जिससे पाठक एकाकार हो जाता है। कहीं कहीं अखबारी भाषा खटकती है और एकाध वाक्य भी, जैसे- उन्होंने डी.एम. को बुलाया जो एक सरदार था। अपनी कहानियों के माध्यम से दयानन्द पाण्डेय एक तरफ नकली संस्कृति से सावधान करते हैं, तो दूसरी तरफ स्याह होती संवेदनाओं को उभार कर उनमें फिर रंग भरते हैं। हिन्दी साहित्य को उनसे बहुत सी उम्मीदें हैं।

पुस्तक: फेसबुक में फंसे चेहरे: लेखकः दयानन्द पाण्डेय
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि., मूल्य: रु. 350/-
पता: 65, आवास विकास कालोनी, माल एवेन्यू, लखनऊ, मो. 09450246765

डा. ऊषा राय की यह समीक्षा लमही पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है. वहीं से साभार.

बिना सवाल का साक्षात्कार

तमाम कोशिशों और कई दिन के इंतजार के बाद श्रीमती उज्ज्वला शर्मा से इंटरव्यू का दिन, समय और जगह तय हो पाये थे। यह बात रही होगी सन् 2012 के मध्य किसी महीने की। जगह थी दक्षिणी दिल्ली में उज्जवला शर्मा का घर। समय दोपहर बाद यही कोई 3 बजे का रहा होगा। मुझे बात करनी थी डॉ. उज्ज्वला शर्मा से। बातचीत का मुद्दा था उज्ज्वला शर्मा और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एनडी तिवारी के बीच रहे निजी-संबंधों पर।

एनडी तिवारी और उज्ज्वला शर्मा की निजता से जन्म लेने वाले रोहित शेखर से। उस रोहित शेखर के भविष्य को लेकर जो जैविक पिता के नाम को खोजने के लिए वर्षों से कोर्ट-कचहरी के धक्के खा रहा था। बात करनी थी, श्रीमती उज्ज्वला शर्मा से उनके और एनडी तिवारी के उस अतीत की, जो कभी उन दोनो के जीवन का स्वर्णिम काल रहा होगा।

खैर छोड़िये मुद्दा और वजह पाठक समझ गये होंगे। ज्यादा भूमिका बनाने की कोई जरुरत महसूस नहीं करता हूं। क्योंकि भूमिका बांधने में वक्त तो जाया होता ही है, साथ ही विषय से भी लेखक भटकने लगता है। उज्ज्वला शर्मा को पहले कभी कहीं नहीं देखा था। चूंकि वो रोहित शेखर की मां और एनडी तिवारी की कभी सबसे विश्वासपात्र थीं। उनका बेटा रोहित पिता का नाम पाने की कानूनी लड़़ाई अदालतों में लड़ रहा था। एक पुरुष और एक महिला के बीच पनपे "अनाम" रिश्ते का बोझ, आखिर वो युवा कैसे अपने कंधों पर ढो रहा है, जिसका इन रिश्तों से दूर-दूर तक कोई ताल्लुक ही नज़र नहीं आता। बस यही जिज्ञासा खींचकर उज्ज्वला शर्मा की देहरी तक ले गयी। उनकी कोख से जन्म लेने वाले रोहित शेखर का पिता कौन है? इस सवाल का जबाब भला उसकी मां (डॉ. उज्ज्वला शर्मा) से सटीक और दे भी कौन सकता था?

पहुंचा तो सही समय। सही जगह। सही इंसान के सामने। कोठी के दरवाजे पर श्रीमती उज्ज्वला शर्मा से भेंट हुई। पहली नज़र में अपना ही मन मानने को तैयार नहीं हुआ, कि सामने मौजूद महिला ही उज्ज्वला शर्मा है, जो कई साल से बेटे (रोहित शेखर) को पिता के नाम का ह़क दिलाने की लड़ाई लड़ रही है। मुझे ड्राइंग रुम में बैठाकर, उज्ज्वला शर्मा घर के अंदर चलीं गयीं। ड्राइंगरुम में वो वापिस लौटीं, तो उनके साथ एक बुजुर्ग महिला भी थीं, जोकि उज्ज्वला शर्मा का सहारा लेकर ही चल पा रही थीं। उज्जवला ने उनका संक्षिप्त परिचय दिया….

'संजीव जी ये मेरी मां हैं श्रीमती प्रभात शोभा पण्डित। करीब 85 साल की हो चुकी हैं। मेरे और तिवारी जी (एनडी) के बीच क्या रिश्ते थे? और क्या है पूरा किस्सा रोहित के जन्म का…और रोहित द्वारा अपने जैविक पिता के नाम की अदालतों में चल रही लड़ाई का….आपको मुझसे (उज्ज्वला) ज्यादा यह (प्रभात शोभा) ज्यादा खुलकर बतायेंगी…ये जो बतायेंगी वो मैं भी आपको नहीं बता पाऊंगी….मैं हो सकता है कि अपने अतीत के बारे में कुछ भूल जाऊं…मेरी मां को मेरे अतीत के बारे में मुझसे ज्यादा याद है।'

जब तक उज्ज्वला शर्मा ने मां प्रभात शोभा को अपने कंधों का सहारा देकर सोफे पर इत्तमिनान से बैठा नहीं दिया, वे लगातार मां के संबंध में ही मुझे "ब्रीफ" करती रहीं। बिना यह सोचे-देखे, कि मैं उनकी बात सुन भी रहा हूं या नहीं। उज्ज्वला शर्मा मुझसे कुछ और कहें, इससे पहले ही उनकी मां बोल पड़ीं….तो हां आप जानना चाहते हैं उज्ज्वला शर्मा, एनडी तिवारी के करीबी रिश्तों और फिर उस रिश्ते से जन्म लेने वाले रोहित शेखर के अतीत का सच। मैं बताती हूं। अपनी भी कमजोरियां-कमियां और अपनी बेटी की भी कमजोरियां-कमियां। और एनडी की चालाकियों की सच्ची कहानी।

श्रीमती प्रभात शोभा पंण्डित को पहली नज़र में देखा और फिर चंद मिनट उन्हें जब सुना, तो अपने मन ही में उनसे सवाल करने का इरादा छोड़ दिया। सोचा कि जो महिला 85-86 साल की उम्र में इस कदर जिंदादिली से बोलने का दम रखती हैं, तो वो मेरे सवालों में से ही सवालों को जन्म देने का भी दम-खम रखती होंगी। और उनसे सवाल करने का इरादा छोड़ देने में ही भलाई समझी। चुप्पी साधकर उन्हें सुनने लगा। करीब एक घंटे चले "इंटरव्यू" के दौरान कई लम्हे ऐसे भी आये, जब उज्ज्वला शर्मा की मां ने ही मुझे टोंका.."अरे आप तो चुपचाप मुझे ही सुने जा रहे हैं। आप तो कुछ पूछ ही नहीं रहे हैं।"

उनके इस सवाल का मैंने छोटा सा जबाब दिया…"मुझे आपकी मुंह-जुबानी सुनने में ही आनंद आ रहा है। और ऐसा कुछ आप छोड़ ही नहीं रही हैं, अपनी और अपनी बेटी के अतीत के बारे में, जिससे संबंधित मैं कोई सवाल करुं।" इसके पीछे मेरा मकसद सिर्फ इतना था, कि जब सब-कुछ बिना मांगे ही मिल रहा है, बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा झोली में आ रहा है, तो फिर बे-वजह बोलकर, आती हुई "खबर" को खुद ही वापिस भेजने की मूर्खता क्यों करुं?

करीब एक घंटे तक उज्ज्वला शर्मा की मां जिस तरह से अपने और अपनी बेटी के अतीत और उज्ज्वला शर्मा के एनडी तिवारी के संबंधों पर खुलकर बोलीं, तो ऐसा लगा कि उस दिन शायद मैं किसी का इंटरव्यू लेने नहीं गया था। या यूं कहूं कि गया तो इंटरव्यू लेने ही था, मगर सामने वाला मुझ पर भारी था…इसलिए चुप रहकर भी वो सब जानकारियां बटोर लाया, जो उज्ज्वला शर्मा-एनडी तिवारी के संबंधों के बाबत अब तक न तो किसी को पता थी, न अब आगे पता चल पायेंगी, श्रीमती प्रभात शोभा पण्डित की मुंह-जुबानी। क्यों अब यह भद्र महिला इस मायावी दुनिया को छोड़कर जा चुकी हैं। मुझ अदना से इंसान को एक ऐसा "इंटरव्यू" देकर, जिस इंटरव्यू में कोई सवाल किया न गया हो, और जबाब मिलते रहे हों।

अपने सबसे लंबे और जहां तक मुझे याद आता है, अपने आखिरी इंटरव्यू में श्रीमती प्रभात शोभा पण्डित ने जो कुछ बताया, अगर वो न बताना चाहतीं, तो शायद मैं उनके "जबाबों" के सवाल कम से कम इस जीवन में तो कभी भी तैयार नहीं कर पाता।

2 अगस्त सन् 1925 को लाहोर (पाकिस्तान) में जन्मीं श्रीमती प्रभात शोभा पण्डित को 31 जनवरी 2013 को गंभीर बीमारी के चलते दिल्ली के एक निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया था। 22 फरवरी 2013 को सुबह करीब साढ़े सात बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। श्रीमती शोभा पण्डित आर्य समाज के मशहूर नेता पंडित बुद्धदेव विद्यालंकार की बेटी, संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मान्यता प्राप्त वर्ल्ड कान्फ्रेंस फार रिलिजन एण्ड पीस के भारतीय अध्याय की संयोजक और अखिल भारतीय नशाबन्दी परिषद की अध्यक्ष  थीं।

लेखक संजीव चौहान की गिनती देश के जाने-माने क्राइम रिपोर्टरों में होती हैं. वे पिछले दो दशक से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. ये लेख इनके ब्‍लॉग क्राइम वॉरियर पर प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है. इनसे संपर्क patrakar1111@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

अतुल माहेश्‍वरी ने कहा- जाकर कानपुर में संपादकीय प्रभार संभालिए

घर से छोड़कर बार-बार बाहर जाने का एक लाभ मिला कि मुझे तमाम चीजों की अनायास जानकारी हो गई जिसके लिए लोगों को सालों किताबों में सिर खपाना पड़ता है। इमरजेंसी खत्म होने के बाद कलकत्ता से आनंदबाजार पत्रिका समूह ने हिंदी में अपना पहला प्रयोग किया साप्ताहिक रविवार निकाल कर। निकलते ही रविवार ने धूम मचा दी। हम लोग पूरा हफ्ता इंतजार करते कि रविवार कब आएगा। सुरेंद्र प्रताप सिंह और उदयन शर्मा स्टार बन चुके थे।

उन दिनों कानपुर में अर्जक संघ ने हड़कंप मचा रखा था। शंबूक वध के बहाने यह संघ पिछड़ों में अपनी साख मजबूत कर रहा था। इसके संस्थापक अध्यक्ष रामस्वरूप वर्मा ने ब्राह्मणों के खिलाफ एक समानांतर पौरोहित्य खड़ा कर दिया था। मैने एक स्टोरी लिखी अर्जक संघ उत्तर प्रदेश का डीएमके। अगले ही हफ्ते वह रविवार में छप गई। रविवार में छपने के बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। बस कुछ वर्षों की फ्रीलांसिंग, इसके बाद दैनिक जागरण फिर जनसत्ता और यहां से अमर उजाला तक का रास्ता मुझे कभी असहज नहीं प्रतीत हुआ।

स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी तब मेरठ में बैठते थे। मैं उनसे जाकर मिला तो उन्होंने सीधे कानपुर में जाकर संपादकीय प्रभार संभालने को कह दिया। यह थोड़ा मुश्किल काम था क्योंकि मैं उस शहर में संपादक बनकर नहीं जाना चाहता था जहां हर छोटा बड़ा आदमी मुझे जानता था। ज्यादातर राजनेता या तो मेरे साथ पढ़े हुए थे अथवा आगे पीछे थे। लेकिन किसी को पहचानने में अतुलजी मात नहीं खाते थे। बोले नहीं वहीं जाइए आप शुक्ला जी मुझे पूरी उम्मीद है आप खरे उतरेंगे।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के फेसबुक वॉल से साभार.

सहारा की आखिरी उम्‍मीद भी खत्‍म, सुप्रीम कोर्ट ने नहीं बढ़ाया समय

नई दिल्ली : अपने निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपए लौटाने के लिए कुछ और मिलने की सहारा समूह की अंतिम उम्मीद उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को खत्म कर दी। प्रधान न्यायाधीश अलतमस कबीर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सहारा समूह को और समय देने से इन्कार करते हुए फरवरी के प्रथम सप्ताह तक निवेशकों का धन लौटाने की न्यायिक आदेश का पालन नहीं करने के लिए उसे आड़े हाथों लिया।

इसी खंडपीठ ने सहारा समूह की दो कंपनियों को निवेशकों का धन लौटाने के लिये पूर्व में निर्धारित अवधि बढ़ाई थी। न्यायाधीशों ने सख्त लहजे में कहा,‘यदि आपने हमारे आदेशानुसार धन नहीं लौटाया है तो आपको न्यायालय में आने का कोई हक नहीं बनता है।’ उन्होंने कहा कि यह समय सिर्फ इसलिए बढ़ाया गया था ताकि निवेशकों को उनका धन वापस मिल सके।

सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय और इसकी दो कंपनियां सहारा इंडिया रियल इस्टेट कारपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेन्ट कारपोरेशन पहले से ही एक अन्य खंडपीठ के समक्ष न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही का सामना कर रही हैं। इस खंडपीठ ने निवेशकों का धन लौटाने के आदेश का पालन नहीं करने के कारण छह फरवरी को सेबी को सहारा समूह की दो कंपनियों के खाते जब्त करने और उसकी संपत्तियां कुर्क करने का आदेश दिया था।

सहारा समूह के मामले की आज सुनवाई शुरू होते ही उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एम कृष्णामूर्ति ने खड़े होकर प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ द्वारा इसकी सुनवाई करने पर आपत्ति की। उनका कहना था कि इस पीठ को मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि निवेशकों को धन लौटाने का आदेश दूसरी खंडपीठ ने दिया था।

कृष्णामणि ने कहा, ‘बार के नेता के रूप में मुझे यही कहना है कि इस अदालत की परंपरा का निर्वहन करते हुए इस खंडपीठ को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए और आदेश में सुधार के लिए इसे उसी पीठ के पास भेज देना चाहिए। इस मामले की सुनवाई करने की बजाय उचित यही होगा कि दूसरी खंडपीठ इसकी सुनवाई करे। नाना प्रकार की अफवाहें सुनकर मुझे तकलीफ हो रही है।’ प्रधान न्यायाधीश इस बात पर नाराज हो गये और उन्होंने कहा कि वह इस मामले के तथ्यों की जानकारी के बगैर ही बयान दे रहे हैं। उन्होंने कृष्णामणि को बैठ जाने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति कबीर ने कहा, ‘आपको कैसे पता कि इस मामले में क्या होने जा रहा है। यदि कुछ हो तब आप कहिये। कृपया अपना स्थान ग्रहण कीजिये।’ न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पिछले साल 31 अगस्त को सहारा समूह की दो कंपनियों को निवेशकों का करीब 24 हजार करोड़ रुपया तीन महीने के भीतर 15 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश दिया था। आरोप है कि कंपनियों ने नियमों का उल्लंघन करके अपने निवेशकों से यह रकम जुटाई थी।

लेकिन बाद में प्रधान न्यायाधीश कबीर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पांच दिसंबर को सहारा समूह को अपने करीब तीन करोड़ निवेशकों का धन लौटाने के लिए उसे नौ सप्ताह का वक्त दे दिया था। कंपनी को तत्काल 5120 करोड़ रुपए लौटाने थे। उस समय भी सेबी और निवेशकों के एक संगठन ने प्रधान न्यायाधीश से इस मामले को न्यायमूर्ति राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के पास भेजने का अनुरोध किया था लेकिन न्यायालय ने उनका यह आग्रह ठुकराते हुये निवेशकों के हितों ध्यान रखते हुये यह आदेश दिया था।

सहारा इंडिया रियल इस्टेट कापरेरेशन ने 31 मार्च, 2008 तक 19,400.87 करोड़ और सहारा हाउसिंग इंडिया कापरेरेशन ने 6380.50 करोड़ रुपए निवेशकों से जुटाये थे। लेकिन समय से पहले भुगतान के बाद 31 अगस्त को कुल शेष रकम 24029.73 करोड़ ही थी। सहारा समूह को इस समय करीब 38 हजार करोड़ रुपए का भुगतान करना पड़ सकता है जिसमें 24029.73 करोड़ मूलधन और करीब 14 हजार करोड़ रुपए ब्याज की राशि हो सकती है। सहारा समूह ने निवेशकों को धन नहीं लौटाने के अपना दृष्टिकोण सही बताते हुये कहा था कि न्यायालय के फैसले से पहले ही निवेशकों की अधिकांश रकम उन्हें लौटाई जा चुकी है। (एजेंसी)

नवीन सिन्‍हा बने लोकमत समाचार, दिल्‍ली में स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट

दैनिक लोकमत से खबर है कि नेशनल एडिटर के रूप में हरीश गुप्‍ता के ज्‍वाइन करने के बाद यहां ब्‍यूरो में एक और ज्‍वाइनिंग हुई है. अब तक ब्‍यूरोचीफ की जिम्‍मेदारी निभा रहे शिलेश शर्मा को पुणे भेजने के बाद ब्‍यूरो में नवीन सिन्‍हा को लाया गया है. माना जा रहा है कि नवीन को हरीश गुप्‍ता के कहने पर लोकमत समाचार, दिल्‍ली में स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट बनाया गया हैं. गौरतलब है कि लोकमत समाचार समूह ने हरीश गुप्‍ता को समायोजित करने के लिए नेशनल एडिटर का पद सृजित किया है.

जमानत रद्द होने पर हाईकोर्ट से फरार हो गया ‘हिमाचल आजकल’ का मालिक

: राजेश्वर सब्रवाल की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की पड़ोसी राज्यों में छापेमारी शुरू : करीब 22 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के आरोपी ‘हिमाचल आजकल’ न्यूज चैनल के मालिक राजेश्वर सब्रवाल की प्रदेश हाईकोर्ट ने सोमवार को अग्रिम जमानत खारिज कर दी। जमानत खारिज होते ही राजेश्वर सब्रवाल अदालत परिसर से शातिर अपराधियों को तर्ज पर फरार हो गया। नतीजन सोलन पुलिस हाथ मलती रह गई। हाईकोर्ट ने राजेश्वर सब्रवाल को 25 फरवरी तक अग्रिम जमानत दी थी, लेकिन पुलिस को उसने छानबीन में सहयोग नहीं दिया। यही कारण है कि हफ्ता भर पहले सोलन पुलिस ने हाईकोर्ट में सब्रवाल की जमानत खारिज करने के लिए अर्जी दाखिल की थी।

सोलन के एसएसपी का कहना है कि अग्रिम जमानत मिलने के बाद राजेश्वर सब्रवाल एक तरह से भूमिगत हो गया और उसने हाईकोर्ट के निर्देशों की हवेलना करते हुए छीनबीन में पुलिस को सहयोग नहीं दिया। उसके मोबाइल नंबर भी हमेशा बंद रहे। पुलिस राजेश्वर सब्रवाल के असली नाम को लेकर भी शंकित है। शिमला में परिचित लोग सब्रवाल को राजेश बख्शी और राजू बख्शी के नाम से जानते हैं, जबकि सेब के कारोबारियों में वह राजेश्वर सब्रवाल के नाम से जाना जाता है। सोलन पुलिस को आशंका है कि राजेश्वर सब्रवाल उर्फ राजेश बख्शी कहीं देश छोडक़र न भाग जाए, इसलिए देश के सभी हवाई अड्डों पर एतिहातन सूचना दे दी गई है। शिमला में बने उसके पासपोर्ट का नंबर भी हवाई अड्डों की सुरक्षा व्यवस्था संभालने वाली एजैंसियों को मुहैया करवा दिया गया है, ताकि वह देश छोडक़र न भाग सके।

क्या है पूरा मामला : सोलन जिला के परवाणू के आढ़ती चुनी लाल चौहान के साथ राजेश्वर सब्रवाल ने दो साल पहले करीब 46 करोड़ रुपए के सेब का कारोबार किया। चुनी लाल चौहान का कहना है कि सब्रवाल उर्फ बख्शी ने खुद को सेना का सेवानिवृत कर्नल बताया और कहा कि सेब की पूरी सप्लाई सेना में ही की जाएगी। शुरुआत में सेब की खरीद का धन चौहान को मिलता रहा। सब्रवाल ने 46 करोड़ रुपए में से करीब 24 करोड़ रुपए का भुगतान चौहान को कर दिया। जब विश्वास कामय हो गया तो चुनी लाल चौहान आंख बंद करके सब्रवाल को सेब मुहैया करवाता रहा। इस तरह करीब 22 करोड़ रुपए के सेब चौहान ने सब्रवाल को बेचे, जिसका भुगतान आज तक नहीं हुआ।

थककर चुनी लाल ने धन की उगाही के लिए सब्रवाल पर सख्त दबाव बनाना शुरु कर दिया। फलस्वरुप पहली किश्त के तौर पर सब्रवाल ने उसे 90-90 लाख रुपए के तीन चैक थमा दिए। बाद में यह तीनों चैक बाऊंस हो गए तो सब्रवाल ने तर्क दिया कि यह तीनों चैक चोरी हो गए थे। लेकिन हैरानी इस बात की है कि पुलिस में कथित तौर पर चोरी हुए चैकों का कहीं भी मामला दर्ज नहीं है। अंतत: चुनी लाल चौहन ने कसौली कोर्ट में राजेश्वर सब्रवाल  के खिलाफ मामला दर्ज किया। कुछ समय बाद प्रारंभिक सुनवाई में अदालत ने धोखाधड़ी के मामले में परवाणु पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के आदेश पारित किए। इससे पहले कि गैर जमानती धाराओं में पुलिस सब्रवाल को गिरफ्तार कर पाती, उसने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत हासिल कर ली जो आज पुलिस के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने रद्द कर दी। अब फरार राजेश्वर सब्रवाल की कभी भी गिरफ्तारी हो सकती है तथा उसके पिछले सभी राज उजागर हो सकते हैं।

कौन है यह सब्रवाल : राजेश्वर सब्रवाल आखिर कौन है, इसका पता लगाने के लिए अभी तक सोलन पुलिस भी सफल नहीं हो पाई है। पुलिस को अभी तक केवल इतना ही मालूम हुआ है कि सब्रवाल पहले जम्मू और बाद में नई दिल्ली में कारोबार करता था। जम्मु में वह सेब के साथ-साथ केसर और मंहगी कश्मीरी शालों का धंधा करता था। वहां भी कुछ गड़बड़ के चलते वह दिल्ली भाग आया और दिल्ली के कनॉट प्लेस में छोटा सा दफ्तर लेकर इवेंट मैनेजमेंट के धंधे में लग गया। इस धंधे में भी वह विवादास्पद हो गया और दिल्ली से भागकर शिमला पहुंचा। शिमला में सेब के धंधे के साथ-साथ फरवरी 2012 में राजेश्वर सब्रवाल ने ‘हिमाचल आजकल’ के नाम से एक न्यूज बुलेटिन भी आरंभ किया। शुरू में यह बुलेटिन दिशा चैनल पर चला, जो एक अध्यात्मिक चैनल था। तीन माह तक बुलेटिन दिशा चैनल पर चलता रहा, लेकिन धन के लेनदेन में विवाद के कारण दिशा पर बुलेटिन बंद हो गया।

कुछ समय बाद सब्रवाल ने मोहाली (पंजाब) के 7 सी न्यूज चैनल पर हिमाचल आजकल बुलेटिन को शुरु किया, जो कि विधानसभा चुनाव के बीच बंद हो गया। प्रदेश विधानसभा चुनाव 4 नवंबर 2012 को होने थे और हिमाचल आजकल बुलेटिन चुनाव प्रचार के मध्य 25 अक्तूबर को अचानक बंद हो गया। 7 सी के प्रबंध निदेशक सरदार जसबीर सिंह के अनुसार धन का भुगतान न करने के कारण 25 अक्तूबर को हिमाचल आजकल बंद कर दिया गया था। उसके बाद राजेश्वर सब्रवाल ने लुधियाना के गुलिस्तान न्यूज चैनल पर भी हिमाचल आजकल बुलेटिन को शुरु करने की कोशिश की, लेकिन ठीक एक महीने बाद धन का भुगतान न करने के कारण वहां भी सब्रवाल का बुलेटिन बंद हो गया।

हिमाचल आजकल न्यूज बुलेटिन की शुरुआत राजेश्वर सब्रवाल ने पत्रकार कृष्ण भानु को साथ लेकर शुरू की थी। कृष्ण भानु हिमाचल के जाने-माने पत्रकार हैं तथा वे मौजूदा मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेहद करीबी हैं। पूर्व मुख्यमंत्री प्रेमकुमार धूमल के साथ भी भानु के मधुर संबंध रहे। राजेश्वर सब्रवाल ने संभवत: इसलिए कृष्ण भानु को अपने साथ जोड़ा, ताकि संकट के समय वे काम आ सकें। लेकिन करीब 34 साल के पुराने अनुभवी पत्रकार कृष्ण भानु ने जल्द ही सब्रवाल को भांप लिया और अपनी टीम सहित हिमाचल आजकल को अलविदा कह दिया। कृष्ण भानु के हिमाचल आजकल छोड़ते ही बुलेटिन के बुरे दिन शुरू हो गए और भटकाव शुरु हो गया। अब हिमाचल आजकल में ताले जड़ गए हैं और पुलिस से बचने के लिए इस बुलेटिन के मालिक राजेश्वर फरार हो गए हैं।

यहां दिलचस्प यह है कि परवाणु के चुनीलाल चौहान इकलौते सेब आढ़ती नहीं है, जो सब्रवाल के शिकार बने हैं। उनके अलावा भी रोहड़ू, जुब्बल, कोटखाई और किन्नौर के दर्जनों सेब उत्पादकों के करोड़ों रुपए सब्रवाल के पास फंसे हुए हैं। ये सभी लेनदार भी सब्रवाल की तलाश कर रहे हैं।

आरपार कार्यक्रम के साथ ऑनएयर हुआ ‘विजन वर्ल्‍ड’ चैनल

समाचार चैनलों की भीड़ में एक और नाम शामिल हो गया है. पत्रकार सरफराज सैफी के नेतृत्‍व में 'विजन वर्ल्‍ड' चैनल को ऑन एयर कर दिया गया है. चैनल की लांचिंग एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर की जिम्‍मेदारी निभा रहे सरफराज सैफी की देखरेख में किया गया है.

चैनल मध्‍य प्रदेश-छत्‍तीसगढ़ के साथ राजस्‍थान को कवर करेगा. हालांकि उसका फोकस राष्‍ट्रीय खबरों पर भी रहेगा परन्‍तु प्रमुखता तीनों राज्‍यों के स्‍थानीय खबरों को दी जाएगी. चैनल के कार्यक्रम आरपार का प्रोमो भी जारी कर दिया गया है. कुछ दिन पहले ही चैनल का लोगो जारी किया गया था. चैनल का पंचलाइन ‘सच कहने का दम’ रखा गया है. चैनल के लिए कई दमदार कार्यक्रमों की रूपरेखा भी तैयार की गयी है. चैनल पर प्रसारित कार्यक्रम आरपार को सरफराज सैफी प्रस्‍तुत करेंगे. 

प्रशिक्षु आईपीएस के इशारे पर रायपुर में प्रेस फोटोग्राफरों से मारपीट

रायपुर। पुलिस द्वार एक हुक्का बार में छापे की कार्रवाई का कवरेज करने पहुंचे प्रेस फोटोग्राफरों के साथ प्रशिक्षु आईपीएस के इशारे पर क्राइम ब्रांच के एक सिपाही ने गाली-ग्‍लौज तथा मारपीट की। अधिकारी प्रेस फोटोग्राफरों पर कैमरे से खिंची गई फोटो डिलिट करने का दबाव बना रहे थे। फोटोग्राफरों में रायपुर प्रेस क्लब के महासचिव भी शामिल थे। घटना से नाराज पत्रकारों ने इसकी लिखित शिकायत सिविल लाइन थाने में करने के साथ ही आईजी जीपी सिंह को भी जानकारी दी।

इसके बावजूद आईजी ने कोई कठोर कार्रवाई नहीं कि केवल आरोपी सिपाही को लाइन हाजिर कर दिया, जबकि उसको उकसाने वाले प्रशिक्षु आईपीएस के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया। इससे पत्रकारों में रोष है और वे पूरे मामले को लेकर सीधे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मिलने की तैयारी में हैं। घटना रविवार की शाम शंकरनगर स्थित इंडियन चिल्ली की है। इंडियन चिल्ली सहित शहर के कुछ अन्य स्थानों पर हुक्काबार चलने की शिकायत पर क्राइम ब्रांच की टीम ने छापा मार कार्रवाई की। इसका नेतृत्व दो प्रशिक्षु आईपीएस अफसर कर रहे थे। टीम में क्राइम ब्रांच के निरीक्षक रमाकांत साहू भी शामिल थे।

पुलिस ने वाहवाही लुटने के लिए इस छापे की कार्रवाई की सूचना पत्रकारों को दी तथा उन्‍हें मौके पर बुलाया। सूचना के बाद राजधानी के लगभग सभी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रतिनिधि मौके पर पहुंच गए। फोटोग्राफरों ने जैसे ही फोटो खींचना शुरू किया, वहां मौजूद दो लोगों ने उन्हें घेर लिया और कैमरे से उनकी फोटो डिलिट करने का दबाव डालने लगे। उन दोनों की पहचान से अनजान प्रेस फोटोग्राफारों ने ऐसा करने से मना कर दिया। इस पर विवाद शुरू हो गया।

अभी बातचीत हो रही थी कि बीच में क्राइम ब्रांच का एक आरक्षक कूद पड़ा। सादे कपड़े में कार्रवाई में शामिल इस जवान ने हरिभूमि प्रेस के फोटोग्राफर व रायपुर प्रेस क्लब के महासचिव विनय शर्मा और नईदुनिया के फोटोग्राफर नरेंद्र बंगाले को धक्का तथा गाली देते हुए मारपीट की। क्राइम ब्रांच के अफसरों ने बाद में खुलासा किया कि फोटो डिलिट करने के लिए दबाव डाल रहे दोनों व्यक्ति प्रशिक्षु आईपीएस थे। घटना की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रतिनिधि मौके पर पहुंच गए। घटना के प्रति रोष व्यक्त करते हुए उन्होंने मामले की शिकायत क्राइम ब्रांच प्रभारी श्वेता सिन्हा और आईजी जीपी सिंह से की। जीपी सिंह ने मामले की जांच के बाद आगे की कार्रवाई करने की बात कही है। इसके बाद सिविल लाइन थाने में लिखित शिकायत भी दर्ज कराई गई।

क्राइम ब्रांच प्रभारी सिन्हा ने बताया कि घटना में शामिल क्राइम ब्रांच के आरक्षक अभिषेक को लाइन अटैच कर दिया गया है। उन्होंने प्रशिक्षु आईपीएस अफसरों के संबंध में कोई भी बात करने से मना कर दिया। नाराज पत्रकार अब इस मामले को लेकर मुख्‍यमंत्री रमन सिंह तक जाना चाहते हैं। आखिर सादे ड्रेस में कोई अधिकारी बिना अपना परिचय दिए कैसे किसी के साथ अकारण बदतमीजी कर सकता है।

दुर्घटना में सहारा समय के पत्रकार मनोज भोइर घायल

मुंबई से खबर है कि सहारा समय के वरिष्‍ठ पत्रकार मनोज भोइर एक सड़क हादसे में घायल हो गए, जबकि उनका पुत्र बाल बाल बच गया. उनके बाएं पैर में फैक्‍चर हुआ है. बताया जा रहा है कि मनोज अपने पांच साल के पुत्र को स्‍वीमिंग कराकर घर वापस लौट रहे थे कि वडाला रोड के पास उनका एक्‍सीडेंट हो गया. उनके पैर में काफी चोट आई. डाक्‍टरों ने जब उनके पैर का एक्‍सरे किया तो पैर में फ्रैक्‍चर होने की बात सामने आई. प्‍लास्‍टर करने के बाद डाक्‍टरों ने उन्‍हें छह सप्‍ताह आराम करने की सलाह दी है.

इस स्टिंग के कारण आईपीएस नवनीत कुमार राणा पर गिरी गाज! (देखें वीडियो)

: भड़ास पर संपूर्ण स्टिंग : स्टिंग से हुआ खुलासा- सपा सरकार में राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त केसी पांडेय कराता है पशु तस्करी : केसी पांडेय ने अपने आदमी आशुतोष पांडेय के जरिए तत्कालीन एसपी गोंडा नवनीत कुमारा राणा के पास भिजवाई थी रिश्वत की रकम : नवनीत कुमार राणा ने खुफिया कैमरे से पूरी बातचीत कर ली रिकार्ड : दो राउंड की मीटिंग के दौरान पशु तस्कर आशुतोष पांडेय ने उगले कई राज : खुफिया कैमरे में कैद है उन पुलिस अफसरों के नाम जो पशु तस्करी के रैकेट में शामिल हैं : दो राउंड की बातचीत के सारे टेप भड़ास पर अपलोड कर दिया गया है : सबसे नीचे है वीडियो लिंक : उसके पहले जान लें पूरे प्रकरण का ओरछोर, जो इस प्रकार है

यूपी सरकार ने गोरखपुर के कृष्ण चंद (केसी) पाण्डेय को उत्तर प्रदेश गन्ना विकास संस्थान का उपाध्यक्ष बनाते हुए राज्यमंत्री का दर्जा दिया लेकिन ये पांडेय जी पशु तस्करों के रैकेट के प्रमुख खिलाड़ी निकले. ये पशु तस्करों की राह आसान करने के लिए सरकारी मशीनरी को भ्रष्ट बनाते हैं. इन पांडेय जी ने गोंडा के तत्कालीन पुलिस कप्तान नवनीत कुमार राणा को भी रिश्वत लेने के लिए तैयार करने का प्रयास किया और इस प्रक्रिया में पांडेय जी की करतूत एक स्टिंग आपरेशन के जरिए जग जाहिर हो गई. पांडेय जी के खिलाफ गोंडा में पशु तस्करी में साथ देने का मुकदमा दर्ज हो चुका है.

ये पांडेय जी उर्फ यूपी सरकार में राज्यमंत्री के दर्जा प्राप्त केसी पांडेय अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं. 30 दिसम्बर को एसपी गोंडा व केसी पांडेय की रिकार्ड बातचीत के अनुसार जब पुलिस ने पशु तस्करों के खिलाफ कार्रवाई की तो पाण्डेय ने अपने कार्यकर्ता आशुतोष पांडेय के जरिए एसपी को एक लाख रुपये रिश्वत भिजवाई. कप्तान ने फोन पर पांडेय से जब यह कहा कि मैं तो पैसे नहीं लेता, आपसे किसने बताया कि मैं पैसे लेता हूं तो पांडेय का कहना था कि आप अपने आदमी हैं.

23 दिसंबर को तत्कालीन पुलिस अधीक्षक गोंडा नवनीत कुमार राणा के सीयूजी मोबाइल पर एक काल आई. काल करने वाले ने खुद को सपा संसदीय बोर्ड का मेंबर केसी पांडेय बताया. पांडेय ने एसपी से मिलने एक व्यक्ति को भेजने की बात कही. इसके बाद आशुतोष पाण्डेय नाम का व्यक्ति एसपी से मिला. आशुतोष ने एसपी से पशु तस्करी के लिए जाने वाले ट्रकों को न पकड़ने के एवज में घूस देने की पेशकश की.

29 की शाम आशुतोष पांडेय पुन: एसपी से मिलने आया. इसके बाद 30 दिसंबर को मीटिंग फिक्स हुई. इस दिन पूर्वाह्न 11 बजे आशुतोष पांडेय निवासी कांदला, शामली (पंचशील नगर) एसपी कैंप कार्यालय पहुंचा. उसने एसपी से केसी पांडेय की फोन पर बात कराई. इसके बाद एक लाख रुपये जेब से निकाल कर एसपी की मेज पर रख दिया और कहा कि हम 12 लाख रुपये महीना देंगे. जैसे ही उसने रुपये रखे सीओ सिटी पूर्णेदु सिंह, सिटी मजिस्ट्रेट एके सिंह व पुलिसकर्मियों ने उसे दबोच लिया. उसके साथ आए इब्राहिम व फिरोज खां निवासीगण कांदला, शामली व वाहन चालक सगीर अहमद निवासी सादुल्लानगर जिला बलरामपुर भी गिरफ्तार कर लिए गए. पुलिस की जांच व पूछताछ के दौरान आशुतोष पशु तस्कर सरगना माजिद का एजेंट निकला. माजिद पर पांच हजार का इनाम घोषित है. इस तरह जांच के दायरे में केसी पांडेय भी आए और पशु तस्करी में षडयंत्र रचने के आरोपी हो गए.

गोकशी के लिए रिश्वत देने के आरोप में गिरफ्तार आशुतोष पांडेय ने बताया कि वह गोरक्षा समिति मुजफ्फरनगर का प्रमुख रह चुका है और इन दिनों माजिद के लिए काम करता है. गोण्डा, बस्ती, संत कबीर नगर, गोरखपुर और कुशीनगर जनपद की पुलिस को पैसा देकर गायों से लदे ट्रकों को पास कराने की जिम्मेदारी उसी की होती है. इनमें गोण्डा जिले के थाना कोतवाली नगर के तीन पुलिस कर्मी भी शामिल हैं. जामा तलाशी के दौरान उसके पास से एक पर्ची बरामद हुई है, जिसमें इन जिलों के विभिन्न थानों पर 20 लाख रुपए दिए जाने का ब्योरा दर्ज है. जिले से पश्चिम बंगाल तक गोवंश की तस्करी पुलिस को लाइन देकर की जाती है. इसका खुलासा गोवंश तस्करों से पूछताछ के दौरान हुआ.

पुलिस को आशुतोष से एक पर्चा बरामद हुआ है, जिसमें गोण्डा से बिहार की सीमा से लगे कुशीनगर जिले तक विभिन्न थानों पर लाइन लेने वाले पुलिस कर्मियों के नाम दर्ज हैं. पुलिस को गुमराह करने के लिए तस्कर कंटेनर (लम्बे वाहनों) का इस्तेमाल करते हैं. यह खुलासा गिरफ्तार पशु तस्करों से पूछताछ के दौरान हुआ है. बताया जाता है कि कंटेनर में पशुओं को लादने से पहले उसमें तीन-चार फिट ऊंचा बालू डाल कर पुआल डाला जाता है, जिससे पशुओं के मूत्रत्याग करने के बाद कंटेनर से रिसाव न हो सके. उन्हें इंजेक्शन देकर बेहोश किया जाता है, जिससे वे भूख प्यास से रंभा न सकें. इसके बाद कंटेनर को ठीक से ढका जाता है. सड़क पर चेकिंग के दौरान पुलिस को यह लगता है कि इसमें गाड़ियां जा रही हैं, जबकि उनमें पशु लदे होते हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार ने गोंडा के पुलिस अधीक्षक नवनीत कुमार राणा का स्‍थानांतरण कर उन्हें मुख्यालय पुलिस महानिदेशक कार्यालय संबंद्ध कर दिया है. पशु तस्करी के मामले में सपा के एक नेता की संलिप्तता का स्टिंग आपरेशन सामने आने पर विवाद बढ़ने के बाद सरकार ने उन्हें वहां से हटाकर सीबीसीआईडी गोरखपुर के पुलिस अधीक्षक हरि नारायण सिंह को गोंडा का पुलिस अधीक्षक नियुक्त कर दिया है. उत्तर प्रदेश सरकार ने गन्ना शोध संस्थान के उपाध्यक्ष केसी पांडेय के पशु तस्करों के पक्ष में काम करने का मामला सामने आया था जिसमें राज्य सरकार की किरकिरी हुई और नवनीत कुमार राणा पर ही सरकार की गाज गिरी.

मामले के जांच अधिकारी पुलिस उपाधीक्षक सुखबीर सिंह राजधानी में केसी पांडेय को भी खोज रहे हैं. एसपी गोंडा को एक लाख रूपए घूस की पेशकश करने वाले आशुतोष पांडेय के साथ फेसबुक पर केसी पांडेय की फोटो पाए जाने के बाद यह पुष्ट हो गया है कि इन दोनों के बीच गहरे संबंध हैं, जिन्हें केसी पांडेय इनकार कर चुके हैं. डॉ केसी पांडेय की गिरफ्तारी की कोशिश की जा रही है. पशु तस्कर माजिद के खिलाफ उत्तर प्रदेश के कई जिलों में दर्जन भर से अधिक मुकदमे दर्ज बताए जा रहे हैं. माजिद के पास 18 टायर वाले करीब ढाई दर्जन ट्रक हैं, जिनका वह पशु तस्करी में उपयोग करता आया है.

गोवंश तस्कर मोहम्मद माजिद गिरोह के लोगों और उनके परिजनों की चल अचल संपत्तियों को गैंगस्टर एक्ट के तहत जब्त किए जाने की कार्रवाई की जा रही है, कोतवाली नगर की पुलिस उनके और परिजनों के नाम अर्जित संपत्तियों का लेखा जोखा जुटाने में जुट गई है. प्रभारी निरीक्षक सर्वदेव सिंह ने बताया कि जेल में बंद सात अभियुक्तों के विरूद्ध गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर एक्ट की धारा 14(1) के तहत परिसंपत्तियों को कुर्क किए जाने की कार्रवाई शुरू कर दी गई है. इन सबका विवरण संबंधित जिले के उप जिलाधिकारियों से मांगा गया है. राज्य के सभी संभागीय परिवहन अधिकारियों को पत्र लिख कर इनकी गाड़ियों का ब्योरा लिया गया है. जिला निबंधकों को पत्र लिख कर जमीन और मकान आदि के बैनामे के बारे में भी विस्तृत जानकारी मांगी गई है. इनके बैंक खातों का पता लगाने के लिए सभी बैंकों के प्रबंधकों को पत्र लिख गया है और उनसे इन खातों से लेनदेन को प्रतिबंधित करने का भी अनुरोध किया गया है.

केसी पांडेय के जेल में बंद आशुतोष पांडेय से कोई जान पहचान न होने संबंधी बयान जारी करने के बाद पुलिस ने दोनों के मोबाइल फोन से 25 से 30 दिसंबर 2012 के बीच करीब 150 बार बातचीत किए जाने की कॉल डिटेल में पुष्टि हुई है. इस पशु तस्करी गैंग का असर कई बड़ों पर पड़ रहा है.

एसपी गोंडा और अन्य पुलिस अफसरों के मनमाने तबादलों को सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में पीआईएल दायर कर चुनौती दी है. नूतन ठाकुर ने कहा है कि रिट याचिका 310/1996 (प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार) में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के क्रम में उत्तर प्रदेश सरकार ने 26 दिसंबर 2010 को शासनादेश जारी कर थानाध्यक्ष से ले कर फील्ड ड्यूटी में लगे सीओ, एडिशनल एसपी, एसपी, डीआजी और आईजी तक सभी अधिकारियों का न्यूनतम कार्यकाल दो वर्ष कर दिया था, कोई अधिकारी दो साल से पहले पांच कारणों से हटाया जा सकता है-विभागीय जांच, न्यायालय द्वारा सजा, भ्रष्टाचार के आरोप, अयोग्यता और व्यापक जनहित. ऐसे सभी मामलों में तबादले का स्पष्ट कारण लिखित रूप से अनिवार्यतः अंकित किया जाएगा. नूतन ठाकुर ने कहा है कि वर्तमान में इस शासनादेश का खुला उल्लंघन किया जा रहा है और राणा सहित तमाम मामलों में बिना कारण बताए मनमाने तबादले किये जा रहे हैं.

गोण्डा के तत्कालीन पुलिस कप्तान नवनीत कुमार राणा को रिश्वत देने की पेशकश करने वाले आशुतोष पाण्डेय ने खुद को उत्तर प्रदेश ब्राहमण युवजन सभा का सदर बताया. उसके पास से ब्राहमण युवजन सभा लिखे हुए लेटर पैड भी बरामद हुए जिन पर आशुतोष पाण्डेय सदर छपा हुआ था. आशुतोष पाण्डेय के साथ स्कार्पियो टैक्सी का ड्राइवर सगीर, मुजफ्फरनगर के कांदला का रहने वाला फिरोज खान और इब्राहीम नाम के तीन लोग भी पकड़े गए हैं.

गिरफ्तारी के बाद आशुतोष पाण्डेय ने पुलिस को जो कुछ बताया वह इंतहाई शर्मानाक है. उसने बताया कि जिबह करने के लिए वह गायों की काफी दिनों से स्मगलिंग कराता है. गायों से लदे उसके ट्रक बेरोकटोक निकलते रहे इसके लिए वह गोरखपुर, गोण्डा, सिद्धार्थनगर, कुशीनगर, बस्ती संतकबीरनगर समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश के तकरीबन सभी जिलों की पुलिस को हर महीने एक मोटी रकम देता है. उसने बताया कि गोण्डा कोतवाली के सीनियर इंस्पेक्टर डीएन सिंह, सिपाही ड्राइवर मनोज सिंह और एक सिपाही औरंगजेब को भी पैसा देता रहा है. गोण्डा के पुलिस कप्तान ने जो तहकीकात की तो कोतवाली पुलिस के जरिए रिश्वत लेने का मामला सच पाया गया. पुलिस कप्तान ने सीनियर इंस्पेक्टर डीएन सिंह और दोनो सिपाहियों मनोज सिंह व औरंगजेब को मोअत्तल कर दिया.

गोण्डा के तत्कालीन पुलिस कप्तान नवनीत कुमार राणा को गायों की स्मगलिंग करने वाले आशुतोष पाण्डेय के जरिये रिश्वत पेश किए जाने की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. पाण्डेय पहले तो तेइस दिसम्बर को नवनीत राणा से मिलने उनके दफ्तर पहुंचा था. पहली ही मुलाकात में उसने पुलिस कप्तान से यह पेशकश कर दी कि अगर गाय, बैल और बछड़ों से लदे उसके ट्रक जिले से बेरोक टोक गुजरने दिए जाएं तो वह हर महीने पुलिस कप्तान को दो लाख रूपए दे सकता है. उसने यह भी बताया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों की पुलिस को वह हर महीने एक मोटी रकम देता है. उसकी बात सुनकर पुलिस कप्तान को गुस्सा भी आया और वह हैरत में भी पड़ गए. उस वक्त तो उन्होंने पाण्डेय को वापस कर दिया लेकिन इस वाकए की इत्तेला अपने सीनियर अफसरान को भी दी.

कप्तान ने अपने घर पर सीसीटीवी कैमरे लगवाए, उसके बाद रिश्वत की पेशकश करने वाले आशुतोष पाण्डेय को बुलाया. तीस दिसम्बर को आशुतोष एक लाख रूपए बतौर पेशगी देने के लिए पुलिस कप्तान के घर पहुंचा तो उसकी सारी हरकतें सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई. पुलिस कप्तान ने फौरन ही उसे पकड़वा लिया, उसके साथ स्कार्पियो में फिरोज खान और इब्राहीम के अलावा ड्राइवर सगीर भी था. उन तीनों को भी पुलिस कप्तान ने गिरफ्तार करवा दिया.

आशुतोष पाण्डेय ने गोण्डा के पुलिस कप्तान को बताया कि अपने ट्रक पास कराने के लिए हर महीने वह सर्किल अफसर को डेढ़ लाख रूपए, कोतवाल और स्टेशन अफसर को एक-एक लाख रूपए और चैकी की पुलिस को पचास हजार रूपए देता है और देा लाख रूपए महीना उन्हें यानी एसपी को भी देगा. अपने बयान के मुताबिक वह पूर्वी उत्तर प्रदेश की पुलिस को पन्द्रह लाख रूपए महीने से ज्यादा की रिश्वत देता है. सवाल यह है कि अगर गायों का कोई ब्राहमण स्मगलर पुलिस को ही रिश्वत की शक्ल में पन्द्रह लाख रूपए महीना रिश्वत देता है तो वह कितने बड़े पैमाने पर गाय बैल और बछड़े कटवाता होगा.

वैसे तो पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में कुछ जरायम पेशा किस्म के मुसलमान भी गाय जिबह करने का काम करते हैं. लेकिन उनकी मदद उन्हीं के जेहन ब्राहमण तबके के कुछ जरायम पेशा लोग भी करते हैं. गोण्डा के तत्कालीन पुलिस कप्तान नवनीत कुमार राणा ने गाय कटवाने की साजिश में शामिल ब्राहमण तबके के लोगों को बेनकाब करके ठीक वैसा ही काम किया है जैसा महाराष्ट्र एटीएस के चीफ शहीद हेमंद करकरे ने मालेगांव बम धमाकों के आरएसएस से जुड़े हिन्दुत्ववादी दहशतगर्दों के चेहरे बेनकाब करके किया था. अगर उस वक्त हेमंत करकरे ने अपनी ईमानदारी का सुबूत देते हुए हिन्दुत्ववादी दहशतगर्दों के चेहरे बेनकाब ना किए होते तो सिर्फ मुस्लिम नौजवानों के माथे पर लगा दहशतगर्दी का कलंक कभी ना मिट पाता. गोण्डा और पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों में गौकुशी होती है, बड़ी तादाद में मुसलमान उसमें शामिल होते हैं यह सच है लेकिन यह भी एक तल्ख हकीकत है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में गाय, बछड़े और बैल कटवाने के मकसद में गायों को एक से दूसरी जगह पहुंचाने का काम ब्राहमण तबके के कुछ जरायम पेशा लोग ही करते हैं.


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पार्ट (एक)


पार्ट (दो)


टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित खबर…

UP IPS officer transferred for exposing minister's 'involvement' in cattle trafficking

Ashish Tripathi, TNN Feb 6, 2013

LUCKNOW: The Uttar Pradesh government has shunted out Gonda superintendent of police, Navneet Kumar Rana, who had conducted a sting operation which showed a senior Samajwadi Party leader offering bribe for releasing culprits caught for trafficking of cattle, including cow, for slaughter. After the matter came to light on February 2, the chief minister assured proper inquiry and action against traffickers but on Wednesday transferred the officer.

Newly appointed vice-chairman of UP Council of Sugarcane Research, KC Pandey, who is also SP's national secretary, enjoys the status of a minister of state as vice-chairman of the body. The Gonda superintendent of police, Navneet Kumar Rana, had alleged that the minister offered the bribe over phone. An FIR has been lodged in the case at City Kotwali of Gonda. But Pandey had described the charge as conspiracy against him.

On December 29, 2012, police seized a truck carrying 50 oxen in Khargapur, Gonda. Later, some people including one Ashutosh Pandey came to Rana and offered bribe for leaving the seized truck. Rana conducted a sting operation and recorded how traffickers offered him bribe. At the same time, Rana got a telephone call. The caller identified himself as KC Pandey and offered Rs 1 lakh bribe. The officer also recorded the conversation. Ashutosh was arrested.

On February 2, 2013, additional director general of police, law and order, Arun Kumar had said that the state government has taken the Gonda incident seriously and action is being taken against accused. On February 3, chief minister Akhilesh Yadav while replying to media queries had assured inquiry and action against culprits. However on Wednesday, instead of action against culprits, Rana was shunted out from Gonda and Pandey was given a clean chit.


प्रस्तुति-

यशवंत सिंह

एडिटर, भड़ास4मीडिया

संपर्क- yashwant@bhadas4media.com फोन: 09999330099

‘जागरण पंजाबी’ को हरियाणा तथा दिल्‍ली में लांच करने की तैयारी

जागरण प्रकाशन समूह अपने पंजाबी भाषा के अखबार 'जागरण पंजाबी' का विस्‍तार करने जा रहा है. अब यह अखबार पंजाब के बाहर के राज्‍यों में मौजूद पंजाबी भाषियों को लक्ष्‍य करके हरियाणा और दिल्‍ली में अखबार को लांच करने की योजना पर काम कर रहा है. फिलहाल इस अखबार का प्रकाशन लुधियाना और जालंधर यूनिट से किया जा रहा है. दोनों यूनिटों से 15 एडिशनों का प्रकाशन हो रहा है. फिलहाल प्रबंधन इसे हरिणाया में पहले लांच करने की तैयारी कर रहा है.

सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन हरियाणा के बाद अखबार को दिल्ली से लॉन्च करेगा. ताकि दिल्ली और एनसीआर के पंजाबी पाठकों तक अखबार की पहुंच बनाई जा सके. जागरण समूह ने इस अखबार की लांचिंग पंजाब में वर्ष 2011 के जून माह में की थी. अखबार प्रबंधन बड़े पंजाबी मार्केट को ध्‍यान में रखकर जागरण पंजाबी के विस्‍तार की योजना को मूर्त रूप देने में जुटे हुए हैं. संभावना है कि जल्‍द ही यह अखबार हरियाणा से लांच हो जाएगा क्‍योंकि हरियाणा में समूह के प्रिंटिंग यूनिट चल रहे हैं, जिसके चलते अतिरिक्‍त प्रयास करने की जरूरत नहीं है.

प्रबंधन का मानना है कि हरियाणा में दैनिक जागरण का मजबूत नेटवर्क है, लिहाजा इस नेटवर्क के सहारे ही वे पंजाबी अखबार को लांच करने के बाद जल्‍द से जल्‍द पंजाबी भाषियों पर अपनी पकड़ बना सकेंगे. नेटवर्क मजबूत होने के चलते उन्‍हें कंटेंट लेबल पर भी ज्‍यादा दिक्‍कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा. वे हरियाणा की बड़ी खबरों को पंजाबी के रिपोर्टरों के साथ हिंदी के रिपोर्टरों से कोआर्डिनेट कर बेहतर प्रजेंटेशन दे सकते हैं.

जनसंदेश टाइम्‍स में सैलरी लेट, कर्मचारी परेशान

: अपडेट : जनसंदेश टाइम्‍स की हालत फिर खराब है. खबर है कि कर्मचारियों को जनवरी माह का वेतन अब तक नहीं मिल पाया है. पिछले काफी समय से इस अखबार में कर्मचारियों की सैलरी लेट लतीफ आ रही है. जनवरी की सैलरी अब तक कर्मचारियों को नहीं मिली जबकि फरवरी महीना भी खतम होने जा रहा है. सैलरी की अनियमितता के चलते लोग इस अखबार के भविष्‍य को लेकर कयास लगा रहे हैं. इस अखबार के लखनऊ, गोरखपुर, कानपुर, बनारस तथा इलाहाबाद के कर्मचारियों को जनवरी का वेतन नहीं मिला है.

बनारस में प्रबंधन ने पहले ही कोर कमेटी गठित करके पूरा मामला उन्‍हीं के सुपुर्द कर दिया है. अखबार अपने लांचिंग के बाद से ही घाटे में चल रहा है. आमदनी से ज्‍यादा खर्च के चलते प्रबंधन परेशान है. तमाम यूनिटों में अखबार के कर्मचारियों को दो तरीके से सैलरी दी जाती है. कुछ कर्मचारियों को नकद रकम उपलब्‍ध कराई जाती है तथा कुछ लोगों की सैलरी सीधे उनके खाते में आती है. बताया जा रहा है कि अभी दोनों तरह से सैलरी पाने वाले कर्मचारियों को पैसा नहीं मिला है. जबकि कुछ दिन पूर्व ही बनारस एडिशन के एक वर्ष पूरा होने पर अखबार प्रबंधन ने लाखों रुपये खर्च किए थे, परन्‍तु अपने कर्मचारियों को देने के लिए उनके पास पैसे नहीं है.

बताया जा रहा है कि समय से सैलरी न मिलने के चलते सभी यूनिटों के कर्मचारी परेशान हैं. सूत्रों का कहना है कि कुछ लोग दूसरे संस्‍थानों में भी अपने लिए जगह ढूंढना शुरू कर चुके हैं. सैलरी आने के बारे में कर्मचारियों को कोई पुख्‍ता सूचना भी नहीं दी जा रही है, जिससे वे परेशान हैं. कुछ महीने पहले तक कर्मचारियों की सैलरी हर महीने की सात से दस तारीख के बीच तक आ जाती थी, पर अब ऐसा नहीं हो रहा है.

स्‍टाम्‍प पेपर पर एग्रीमेंट बनाकर दी पति के हत्‍या की सुपारी

देहरादून : आपने पहले सुना होगा कि पत्नी ने पति की हत्या करवाई, लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि पत्नी ने अपने पति की हत्या की सुपारी स्टैंप पेपर पर दी, कत्ल की सुपारी का एग्रीमेंट बना. जी हां, ये सच है.

मैं, श्रीमती रिंकू पत्नी सुरेंद्र सिंह, निवासी रेशम माजरी देहरादून, आज दिनांक 29 जनवरी 2013 को अपने पति की जान का सौदा चार लाख पचास हजार रुपए में तय किया है. यह रकम तय की गई है कि मेरे पति की मृत्यु के बाद मैं यह रकम अदा कर दूं. मैं अपने होशो हवास में यह सुपारी दे रही हूं, इस काम में किसी और का हाथ नहीं है. यह काम मैं अपने पति से परेशान होकर करवा रही हूं. इससे पहले कि वह मुझे और दुखी करे, उसका मर जाना ही ठीक है. यह स्टैंप पेपर इसलिए लिखा जा रहा है कि अगर मैं श्रीमती रिंकू तय की गई रकम सही समय पर न दूं या पूरी रकम जो तय हुई है वह न दूं, तो इसे बतौर सबूत समय आने पर कार्रवाई के लिए प्रयोग किया जा सके.

देहरादून पुलिस ने हत्या के आरोप में कुल पांच लोगों को गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार होने वालों में शामिल हैं मृतक सुरेंद्र सिंह की पत्नी रिंकू, मृतक का भतीजा अरुण, भतीजे का जीजा रोहित, भतीजे का समधि जोगिंदर और भतीजे का एक दोस्त. स्टैंप पेपर पर सुपारी देकर पति की हत्या करवाने वाली रिंकू को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं. उसका कहना है कि उसने जो किया सही किया और अपने बच्चों के भविष्य के लिए किया वर्ना उसका पति उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता.

आरोपी महिला रिंकू अपने परिवार के साथ देहरादून से कुछ दूर डोईवाला थाना क्षेत्र के रानीपोखरी इलाके में रहती है. 20 फरवरी को महिला ने अपने पति की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाने में दर्ज कराई. पुलिस को उसने बताया कि उनका पति तीन दिनों से गायब है लेकिन महिला के हाव भाव और उससे बातचीत के दौरान पुलिस को उसपर शक हुआ. पुलिस ने महिला के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगाया. उसकी कॉल डीटेल भी निकलवाई. कॉल डिटेल में उसे ये पता चला कि महिला पिछले कुछ दिनों से लगातार कुछ खास नंबरों पर बात कर रही है.

उसी रोज यानी 20 फरवरी को पुलिस को वहां के जंगलों से एक अधजला शव मिला जिसका सिर धड़ से अलग था. पुलिस का शक और बढ़ा. जब पुलिस ने सर्विलांस के नंबरों की पड़ताल की और महिला के भतीजे और उसके जीजा को हिरासत में लेकर पूछताछ की तो उन्होंने सारा सच उगल दिया. दरअसल मृतक सुरेंद्र सिंह की हत्या 17 फरवरी को ही कर दी गई थी. मृतक के भतीजे ने अपने जीजा के साथ मिलकर पहले उसे जमकर शराब पिलाई फिर उसे जंगलों में ले गए जहां पहले से दो लोग इंतजार कर रहे थे. वहां फिर उसे शराब पिलाई और फिर रस्सी से उसका गला घोट दिया. सुरेंद्र की हत्या के बाद उसके शव को जलाने की भी कोशिश की.

मृतक की पत्नी को जब ये पता चला कि शव अधजला रह गया है तो उसने शव की पहचान न हो सके इसलिए रोहित और जोगेंद्र से ये कहा कि शव से गर्दन को अलग कर के कहीं और फेंक दे और अधजले शव को कहीं जमीन में गाड़ दो. इस काम के लिए रोहित और अरुण गए भी लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए. महिला का आरोप है कि उसके अय्याश पति ने हाल ही में जिस घर में वो रहते हैं उसे 24 लाख में बेच दिया हालांकि उसकी मौजूदा कीमत 50 लाख रुपए है. आधे पैसे भी उसने बतौर पेशगी ले लिए और अय्याशी में उड़ा डाले. मकान के बाकी पैसे 20 फरवरी को मिलने थे. उससे पहले ही महिला ने पति की हत्या करवा दी.

लेकिन पुलिस को महिला के दावों पर शक है. पुलिस के मुताबिक महिला ने ही सारी प्लानिंग की और पति की हत्या को अंजाम दिलवाया. पुलिस ने गिरफ्तार किए गए लोगों की निशानदेही पर हत्या का हथियार और उसमें इस्तेमाल की गई गाड़ी भी बरामद कर ली है.

हमारा असल राष्ट्रीय चरित्र!

: बम विस्फोट की लगातार घटनाएं, पसरती अराजकता, बेलगाम भ्रष्टाचार इन सब के मूल में हैं, हमारा गड़बड़ चरित्र. उसूलहीन जीवन. पैसा और भोग के प्रति गुलामी. 1857 या आजादी की लड़ाई के दौर, कभी-कभार हमारे जीवन में रोशनी लेकर आते हैं. पर हम बार-बार अंधकार का ही वरण करते हैं. राष्ट्रीय जीवन का कोई क्षेत्र बचा रहा गया है, जहां चरित्र का तेज हो, आदर्श की आभा हो, देश के लिए कुछ कर गुजरने की जिद हो? :

खुद को धोखा देना आज हम भारतीयों का संस्कार है. राष्ट्रीय चरित्र. 1992-93 के बाद नियमित बम विस्फोट! आप रात में सड़क पर चलें, तो बलात्कार (वह भी दिल्ली में). मॉल में खरीदारी के लिए जायें तो बम विस्फोट. ट्रेनों-बसों में, एयरपोर्टों पर हाइ अलर्ट. अस्पताल या पूजा-इबादत की जगहों पर विस्फोट. बिजनेस हबों पर हमले. बेहतर शिक्षण संस्थाओं में बम विस्फोट. सिनेमा हॉल में विस्फोट. घर भी असुरक्षित. आदमी जीये, तो कहां जीये? इसलिए जरूरी है कि जनता सुनिश्चित कराये कि आगामी लोकसभा चुनाव अराजकता बनाम सुशासन पर लड़ा जाये.

कहावत है कि जान है, तो जहान है. महंगाई, भ्रष्टाचार जो जीवित समाज के मुद्दे हैं. आज भारतीयों के लिए मूल सवाल है कि क्या उनका जीवन अपने ही घर, शहर और देश में सुरक्षित है? दरअसल हम नागरिक भी कायर, बिके और आत्मा गिरवी रखे हुए लोग हैं.

1992 के मुंबई विस्फोटों में पता चला कि कस्टम के लोगों को पैसे (घूस) देकर भारतीय बंदरगाहों से वैध-कानूनी कारिडोर से विस्फोटक भारत लाये गये. दाऊद के लोगों द्वारा. तब प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा बनी वोरा कमिटी ने विस्फोटों के बारे में क्या रिपोर्ट दी? क्या एक भी सख्त कदम रिपोर्ट के अनुसार उठे? क्या जनदबाव बना? अब कहा जा रहा है कि नेपाल सीमा से चार लोग घुसे हैं, जिन्होंने हैदराबाद में विस्फोट किया है. पिछले वर्ष दिल्ली पुलिस ने आतंकी सैयद मकबूल को पकड़ा, तो पता चला कि रियाज भटकल के कहने पर दिलसुख नगर और कोर्णाक (जहां विस्फोट हुए) में उसने रेकी की थी. यह इलाका बिजनेस हब है. यहां आइटी कंपनियां हैं. शिक्षण संस्थाएं हैं. एक-डेढ़ किलोमीटर में 13 सिनेमा हॉल हैं. अत्यंत व्यस्त बाजार. इस तरह पूर्व सूचना के बाद भी विस्फोट. यह दुस्साहस और सीनाजोरी! यह भी खबर आयी है कि आतंकवादियों ने रेकी की.

इंडियन मुजाहिदीन के भटकल को चेन्नई में देखा गया. विस्फोट के बाद गृह मंत्री बताते हैं कि उन्होंने कई राज्यों को एक दिन पहले सूचना दी थी कि विस्फोट हो सकते हैं. यानी सूचना के बाद भी विस्फोट हुए. यह कहानी हर विस्फोट के बाद दोहरायी जाती है. क्या अपनी अकर्मण्यता, अयोग्यता और नाकाबिलीयत का ढिंढोरा पीटने के लिए? आखिर कितने विस्फोट इस मुल्क में होते रहेंगे? कब तक होंगे? अमेरिका या ब्रिटेन या चीन में एक घटना के बाद दूसरी क्यों नहीं हो पाती? कब तक भारत के शासक वर्ग का जीवन सुरक्षित रहेगा और जनता की बलि चढ़ती रहेगी? हम आम भारतीय भी इस स्थिति के लिए दोषी हैं.

क्या हमारे निजी जीवन में ‘कैरेक्टर’ (चरित्र, माफ कीजियेगा सेक्स अर्थ में नहीं) है? क्या हम मूलत: भ्रष्ट लोग हैं? बलशाली-ताकतवरों के सामने कायर. कमजोरों के सामने शेर. झूठे भी? अपनी बात, अपने वादे के प्रति लापरवाह-कैजुअल? जैसा समय, वैसे रुझान के हैं हम? ईमानदारी या ईमानदारों के प्रति हमारे मन में इज्जत है? या हम सिर्फ सत्ता-पद पूजक हैं? अतीत कहता है, गुलाम मानस, हमेशा सत्ता के चरणों पर नतमस्तक रहता है. हममें क्या वही रक्त या बीज है? हम आदतन या संस्कारवश चापलूस, चारण व रीढ़हीन हैं? हमारा इतिहास इसका प्रमाण है. हमारे बीच के लोग ही जयचंद-मीरजाफर संस्कृति के हैं. हम पराजय, पराधीनता और गुलामी की नींव क्यों रखते हैं?

निजी साहस दिखानेवाले कभी-कभार, कहीं-कहीं (पहले से बहुत कम) दिखते हैं. झलकते हैं. पर सार्वजनिक जीवन में क्यों अन्ना का आंदोलन मुकाम तक नहीं पहुंचता? बाबा रामदेव का अभियान नहीं टिक पाता? हाल के गुजरे दो दशकों में कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हो पाया. उबाल (यह आजकल दिल्ली में कभी-कभार दिखायी देता है) में स्थायित्व-कांटिन्यूटी (निरंतरता) क्यों नहीं है? एक कौम, देश या समाज के तौर पर हमारे उसूल क्यों नहीं हैं? हाल की कुछेक घटनाओं के संदर्भ में इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है.

अमेरिका महान कैसे : कोई मुल्क अपने देशवासियों के चरित्र, संकल्प और कनविक्शन (उसूल) से महान बनता है. फरवरी के दूसरे सप्ताह में अमेरिका में कैंपेन डिसक्लोजर रिपोर्ट (चुनाव प्रचार खर्च विवरण) सार्वजनिक हुई. 2008 में हिलेरी क्लिंटन, राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार थीं. पार्टी के अंदर. पार्टी में उनका मुकाबला बराक ओबामा से था. यह चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने बाजार से कर्ज लिया. यह कर्ज बढ़ कर पिछले वर्ष तक 2,50,000 डॉलर (लगभग 1.36 करोड़ रुपये) हो गया था. हिलेरी क्लिंटन, विदेश मंत्री बनीं. कानूनन इस पद पर रहते हुए, उनके लिए चंदा लेने की मनाही थी. स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण पिछले दिनों हिलेरी ने अपना पद छोड़ दिया है.

इसी बीच ओबामा को यह जानकारी मिली कि हिलेरी कर्ज में डूबी हैं. पिछले वर्ष के अप्रैल से चुपचाप ओबामा की टीम ने हिलेरी क्लिंटन के लिए चंदा एकत्र करना शुरू किया. अमेरिका में चंदा लेने के कानून सख्त हैं. अधिकतम कितना लेना है? एक बार जिससे ले चुके हैं, दोबारा उससे नहीं लेना है. इस तरह के अनेक सख्त प्रतिबंध हैं. ओबामा खुद अपने लिए चंदा वसूल चुके थे. बड़ी सावधानी से उनकी टीम ने 120 ऐसे लोगों को छांटा, जिनसे अनुरोध किया कि वे हिलेरी क्लिंटन की मदद करें. इससे न सिर्फ हिलेरी का कर्ज खत्म हुआ, बल्कि उस मद में 2,05,000 डॉलर (लगभग 1.11 करोड़ रुपये) सरप्लस फंड आया.

पार्टी में ओबामा की विरोधी थीं, हिलेरी. वह खुद राष्ट्रपति बनना चाहती थीं. राष्ट्रपति बनने पर ओबामा ने उन्हें अपना विदेश मंत्री बनाया. चुनाव लड़ने के लिए हिलेरी ने जो कर्ज लिया था, वह एकत्र किया और चुपचाप भुगतान करा दिया.

यह महज एक घटना नहीं है. राजनीतिक संस्कृति का प्रतिबिंब है. राष्ट्रीय चरित्र की झलक. अपने विरोधियों के प्रति उदारता, सम्मान और आदर, जिस कौम का चरित्र होता है, वहीं सामान्य जनजीवन में इस तरह की झलक मिलती है. वहीं आम नागरिक भी स्वाभिमानी, देशप्रेमी और उसूलों के साथ जीता है. भारत की तरह निर्थक और बेमतलब जीवन नहीं. 1960-70 के पहले की भारतीय राजनीति के अंतरंग प्रसंग पढ़ें. ऐसे उदाहरणों की बहुतायत है. गांधी युग और आजादी के लिए लड़नेवाले हिंसक -अहिंसक क्रांतिवीरों के धवल चरित्र, राष्ट्रीय पूंजी है. पर आज क्या स्थिति है? शायद ही कहीं भारत में अपने विरोधी के प्रति सम्मान, आदर और उदारता हो. हम खुद से छल करनेवाले और झूठ बोलनेवाले लोग हैं.

हमारे सार्वजनिक सरोकार, हमारा चरित्र बताते हैं : कई बार लगता है, इस मुल्क में अब भ्रष्टाचार या घोटालों की बात बंद होनी चाहिए. यह मान कर कि हम ऐसे ही हैं. सुधरने की बात तो दूर, हम और पतित होने के लिए बेचैन कौम हैं. पिछले दस दिनों से इटली में हुए 3600 करोड़ के हेलीकॉप्टर सौदे की बात सार्वजनिक बहस में है. इसमें दस फीसदी कमीशन की बात पुष्ट हो गयी है. पर याद रखिए, आठ-दस महीनों पहले यह बात सामने आयी, तब इसे हमने नकारा. आज किस मुंह से हम कह रहे हैं कि यह सही घटना है. चूंकि इटली में इसके दस्तावेज मिल गये, वहां संबंधित लोगों की गिरफ्तारी शुरू हो गयी. तब हमारे चेहरे से नकाब हटा. अब इस मामले में भारत की सेना के दो मामूली लोगों पर ठीकरा फूट रहा है. आजादी के बाद से ही रक्षा में कमीशन का मामला उजागर होता रहा. जीप स्कैंडल, बोफोर्स स्कैंडल.. अनेक स्कैंडल सामने आये. क्या इनमें से एक भी मामले में असल दोषी पकड़ा जा सका है? आज तक रक्षा सौदों में सीबीआइ किसी को पकड़ सकी है? फिर भी उसी सीबीआइ से जांच की बात!

जनरल वीके सिंह ने पत्र लिख कर रक्षा सौदों में दलाली का मामला उठाया था, तब वह पद पर थे. इस हेलीकॉप्टर डील की भी बात उठी थी. तब बात दबायी गयी. आज इटली से भंडा फूटा, तो हमारे यहां जांच कराने पर बवाल है. इटली में इसके मुजरिम पकड़े जा रहे हैं, पर भारत में बहस चल रही है. हाल में ईमानदार रक्षा मंत्री ने एक अनौपचारिक जांच करायी, हेलीकॉप्टर कमीशन मामले में. पर विभाग ने रिपोर्ट में सबको क्लीन चिट दिया है. हद है रिश्वत देनेवाला इटली में गिरफ्तार, पर पानेवाले हम निर्दोष! हथियार डीलर अभिषेक वर्मा की कारगुजारियां वर्षों से देश जान रहा है. एक दलाल के घर सेना के बड़े अफसर जाते हैं और वह दलाल बड़े नेताओं का प्रियपात्र होता है. दुनिया की सुंदरियों को वह एकत्र करता है. शराब की भव्य पार्टियां देता है. हथियार सप्लायरों को वह राजनेताओं से मिलाता है. इसी गैंग की एक विदेशी सुंदरी भारत के एक राज्यमंत्री से उनके दफ्तर में मिलती है.

खबर तो यह भी है कि इटली के हेलीकॉप्टर बिक्रेता, जब भारत में थे, तो वे एक अत्यंत बड़े राजनेता से मिले. खबर है कि दस्तावेज में ‘द फैमली’ को पैसा देने का उल्लेख है. यह ‘द फैमली’ कौन है? कोई उस राजनेता या ‘द फैमली’ का नाम बताने को तैयार नहीं. क्या यही इस मुल्क का चरित्र है? पश्चिम के देशों में ऐसा संभव है? क्या लार्ड कार्नवालिस ने सही कहा था कि ‘मेरा विश्वास या मानना है कि हिंदुस्तान का हर वाशिंदा वास्तव में भ्रष्ट है.’ बातचीत में दोहरापन क्या हमारी रगों में है? लार्ड कर्जन ने भी कहा था, ‘मेरा यकीन है कि मैं कोई झूठा दावा नहीं कर रहा या आक्रामक दावा नहीं कर रहा, कि सच का सर्वोच्च आइडियल किसी हद तक पश्चिमी विचार है. रुडयार्ड किपलिंग की धारणा भी ऐसी ही थी.

ब्रिटेन के आइसीएस ऑफिसर, सर माइक ल ओ डायर (रौल्ट एक्ट के प्रणोता) ने कहा था, ‘जिम्मेदार सरकार भारतीयों के लिए अर्थहीन है. इनके देशज संस्कार-भाषा में इस शब्द (रिस्पांसिबुल गर्वमेंट) का कोई पर्याय नहीं.’

बम विस्फोट की लगातार घटनाएं, पसरती अराजकता, बेलगाम भ्रष्टाचार इन सब के मूल में हैं, हमारा गड़बड़ चरित्र. उसूलहीन जीवन. पैसा और भोग के प्रति गुलामी. 1857 या आजादी की लड़ाई के दौर, कभी-कभार हमारे जीवन में रोशनी लेकर आते हैं. पर हम बार-बार अंधकार का ही वरण करते हैं. शासन चरित्र से चलता है, प्रताप से दौड़ता है, कन्विकशन (प्रतिबद्धता) से आभा पाता है. चोरी से नहीं चलता. मक्कारी से नहीं चलता. झूठ-षड्यंत्र से नहीं चलता. राष्ट्रीय जीवन का कोई क्षेत्र बचा रह गया है, जहां चरित्र का तेज हो, आदर्श की आभा हो, देश के लिए कुछ कर गुजरने की जिद हो? आज परचर्चा, परनिंदा और हर एक की धोती खोलने की आपसी प्रतिस्पर्धा है. खुद भोग में डूबने और आनेवाली पीढ़ियों के लिए देश लूट कर धन छोड़ जाने की धधकती आग जैसी बलवती इच्छा! यही हैं हम और यही है हमारा आज का राष्ट्रीय जीवन. माफ कीजिएगा, करोड़ों-करोड़ बेहतर ईमानदार और समर्पित लोग हैं, राजनीति से लेकर नौकरशाही तक में. पर राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा अब ऐसे लोग नहीं तय कर रहे. वे उदासीन, बाहरी और किसी हद तक बोझिल जीवन जी रहे हैं. अपनी ही धरती पर बेगाने.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा कुछ समय पहले प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.

सीरिया में घायल फ्रांसीसी प्रेस फोटोग्राफर की मौत

फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि सीरिया में पिछले महीने गंभीर रूप से घायल हुए फ्रांसीसी प्रेस फोटोग्राफर ओलीवर वोसिन का निधन हो गया है. मंत्रालय की एक प्रवक्ता ने कहा, ‘‘हम उनकी मौत की पुष्टि करते हैं.’’ वोसिन के सिर और बाह में चोट लगी थी. वह सीरिया के इदलिब शहर में विस्फोट में घायल हुए थे. तुर्की के एक अस्पताल में सर्जरी के बाद उनकी मौत हुई.

पीजे कुरियन के खिलाफ फेसबुक पर कमेंट करने वाले 111 पर केस

नई दिल्ली : सूर्यनेल्ली गैंगरेप केस में राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन के खिलाफ शिकायत दर्ज होने के बाद फेसबुक पर कुरियन का विरोध बढ़ता जा रहा है. कुरियन के खिलाफ फेसबुक पर आपत्तिजनक कमेंट करने के आरोप में केरल की साइबर पुलिस ने 111 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है. टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार की खबर पर कमेंट लिखने पर एक शख्स को पुलिस ने गिरफ्तार किया है जबकि कमेंट शेयर करने पर 110 लोगों पर केस दर्ज किया गया है.

आपको बता दें कि 1996 के सूर्यनेल्ली गैंगरेप केस में पीड़ित लड़की की ओर से कुरियन के खिलाफ दो दिन पहले ही कोट्टयम के चिंगावनम पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई गई थी, लेकिन इसके बाद फेसबुक पर कमेंट शेयर करना लोगों के लिए महंगा साबित हो रहा है. ग़ौरतलब है कि बजट सत्र की शुरुआत से एक दिन पहले यानी 20 फरवरी को पीजे कुरियन ने सांसदों को चिट्ठी लिखकर अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश की. कुरियन ने अपने पत्र में कहा कि उनके खिलाफ रेप का मामला झूठा है.

केरल महिला कांग्रेस चीफ बिंदु कृष्णा ने मुख्यमंत्री ओमेन चंडी से मिलकर इससे जुड़ी शिकायत दर्ज की थी. बिदु के मुताबिक कुरियन के खिलाफ़ कमेंट को कुल 2 हज़ार लोगों ने शेयर किया है और ये कमेंट उनकी मानहानि करते हैं. सूत्रों के मुताबिक इस मामले में कुछ लोगों से पूछताछ भी हुई है. मामला आईटी एक्ट के सेक्शन 66 के तहत दर्ज हुआ है. इसके मुताबिक नफरत फैलाने वाले या किसी की भावनाओं को आहत करने वाले संदेश पर 3 साल तक की सज़ा हो सकती है. सूर्यनेल्ली केस पर ही आज केरल हाईकोर्ट में सुनवाई भी होनी है.

विपक्षी पार्टियाँ जैसे बीजेपी और वामपंथी दलों का कहना है कि कुरियन के लिए यह ग़ैर-मुनासिब होगा कि वे महिला सुरक्षा और महिला अपराध से जुड़े नए कानून की बहस की अध्यक्षता करें. कुरियन के विरोधियों की मांग है कि कथित रेप मामले में कुरियन की छुट्टी की जाए. आरोप हैं कि साल 1996 में सूर्यानेल्ली में एक स्कूल छात्रा का अगवा किया गया और 40 दिन तक 42 लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया. पीड़ित महिला का आरोप है कि उन 42 बलात्कारियों में कुरियन भी शामिल थे.

अब पाकिस्‍तानी अखबार में लेख लिखकर मोदी को घेरा काटजू ने

नई दिल्ली। प्रेस काउंसिसल के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू ने अब पाकिस्तान के अखबार में लिखे लेख में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है। उन्होंने लेख में मोदी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन उनकी तुलना हिटलर से कर दी। काटजू अपने इस लेख से एक बार फिर बीजेपी के निशाने पर हैं। काटूज के इस लेख से आगबबूला बीजेपी ने कहा कि वह अब पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं। बीजेपी ने इसे राष्ट्रविरोधी लेख करार दिया है।

गौरतलब है कि जस्टिस काटजू ने इससे पहले भारत के ही एक राष्ट्रीय दैनिक में लेख लिखकर मोदी पर निशान साधा था। इसके बाद बीजेपी और काटजू के बीच ठन गई थी। राज्यसभा में बीजेपी नेता अरुण जेटली ने तो जस्टिस काटजू को बर्खास्त करने की मांग कर डाली थी। काटजू का यह ताजा लेख पाकिस्तान के अखबार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' में छपा है। लेख का हेडिंग है 'मोदी और 2002 का नरसंहार।' इस लेख में काटजू ने लिखा है, 'मोदी के समर्थक दावा करते हैं कि गुजरात में जो कुछ हुआ वह गोधरा में ट्रेन में 59 हिंदुओं की हत्या की तात्कालिक प्रतिक्रिया थी। मैं इस कहानी पर यकीन नहीं करता। पहली बात यह अभी भी रहस्य है कि गोधरा में क्या हुआ था। दूसरी बात जो लोग भी गोधरा कांड के दोषी थे, उनकी पहचान होनी चाहिए और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलने चाहिए। लेकिन इससे गुजरात के मुस्लिम समुदाय पर हमले को कैसे जायज ठहराया जा सा सकता है?'

काटजू आगे लिखते हैं, 'गुजरात की कुल आबादी में मुसलमान 9 पर्सेंट हैं। बाकी ज्यादातर हिंदू हैं। 2002 में मुसलमानों का नरसंहार किया गया, उनके घर जलाए गए और उन्हें कई तरीके से निशाना बनाया गया। 2002 में मुसलमानों की हत्या को तात्कालिक प्रतिक्रिया कहना नवंबर 1938 में जर्मनी के क्रिस्टालनाष्ट की घटना की याद दिलाता है। जब जर्मनी में पूरे यहूदी समुदाय पर हमला किया गया था। तब नाजी सरकार ने दावा किया था कि ये एक तात्कालिक प्रतिक्रिया थी। लेकिन सच्चाई यह थी कि नाजी शासन ने योजनाबद्ध तरीके से उन्मादी भीड़ का इस्तेमाल कर इस घटना को अंजाम दिया था। मैं भारत के लोगों से अपील करता हूं कि अगर वह वाकई भारत के बारे में चिंतित हैं तो इन बातों का ख्याल रखें।' (एनबीटी)

एयरटेल, टाटा एवं एसटेल पर दर्ज हुआ धोखाधड़ी का केस

नई दिल्ली : सीबीआई ने दिल्ली की एक अदालत में भारती एयरटेल, टाटा कम्युनिकेशन और सिंगापुर टेलीकम्युनिकेशंस (एसटेल) के खिलाफ एक मामला दर्ज किया है। वर्ष 2004 से कथित तौर पर अवैध रूप से अंतरराष्ट्रीय लंबी दूरी (आईएलडी) की सेवा उपलब्ध कराते हुए सरकार को करीब 48 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाने के लिए इन कंपनियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। इन तीन दूरसंचार कंपनियों पर भारतीय दंड संहिता के तहत आपराधिक षडयंत्र रचने और धोखाधड़ी करने के अलावा भारतीय टेलीग्राफ कानून के तहत दूरसंचार विभाग के लाइसेंस नियमों का उल्लंघन करने का मामला दर्ज किया गया है।

संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की एक शिकायत पर यहां की एक स्थानीय अदालत में एफआईआर दर्ज किया गया है। संपर्क किए जाने पर भारती एयरटेल ने कोई टिप्पणी नहीं की, जबकि टाटा कम्युनिकेशंस ने कहा कि वह अटकलों पर टिप्पणी नहीं करेगी। (एजेंसी)

सोनौली बार्डर पर एसएसबी की हिरासत में संदिग्‍ध कश्‍मीरी

महराजगंज : रविवार की सुबह लगभग छह बजे नेपाल के भैरहवा के रास्ते भारत आ रहे पाकिस्तानी महिला, उसके दो बच्चे एवं एक कश्मीरी युवक को सुरक्षा एजेंसियों ने पकड़ लिया। उनसे कड़ी पूछताछ की जा रही है। प्रारंभिक पूछताछ में युवक ने खुद को महिला का शौहर बताया है। पूछताछ में लगे अधिकारियों को अब तक जो बातें पता चली हैं उसके अनुसार पाकिस्तान एयर लाइंस से पाकिस्तानी महिला एलिजा (38) उसके बच्चे सुहेल (12) और नूर (8) एवं कश्मीरी नागरिक मुहम्मद रफी भट्ट (40) काठमांडू पहुंचे।

वहां से वे बस से भैरहवा होते हुए सुबह सोनौली बार्डर पर पहुंचे। वे दिल्ली जाने के लिए बस स्टैंड पर जाना चाहते थे। इसके लिए चारों नो-मैंस लैंड पर आ पहुंचे, जहां एसएसबी की महिला जवानों ने संदेह होने पर उन्हें पकड़ लिया। जवानों ने द्वितीय कमांडेंट अरविंद कुमार को उनके पकड़े जाने की सूचना दी, जिसके बाद एसएसबी के डीआइजी, एटीएस गोरखपुर, क्षेत्राधिकारी नौतनवा, कोतवाल सोनौली, चौकी प्रभारी सोनौली के अलावा कई सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों के अफसर पहुंचे। अधिकारियों ने डंडा हेड पर बने एसएसबी कैंप में उनसे घंटों पूछताछ की। संतोषजनक उत्तर न मिलने पर उन्हें रोक लिया गया। वे भारत आने के कारण भी नहीं बता सके। उनके पास भारत आने का वीजा भी नहीं था।

इस संबंध में डंडा हेड के द्वितीय कमाडेंट अरविंद कुमार ने बताया कि अभी पूछताछ हो रही है। महिला और व्यक्ति पति-पत्‍‌नी हैं और बच्चे उनके ही हैं। युवक अपने को काश्मीरी बता रहा है, जबकि महिला पाकिस्तानी है। पकड़े गए लोगों को डंडा स्थित कार्यालय पर रखा गया है। उधर एसपी महराजगंज दिलीप कुमार ने कहा कि मुझे इस बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। यह मामला सिविल पुलिस का नहीं है।

अरुण कुमार वर्मा की रिपोर्ट.

पत्रिका, ग्‍वालियर बना राजनीतिक का अखाड़ा, रिपोर्टरों में असंतोष

इन दिनों पत्रिका, ग्‍वालियर राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है। ग्वालियर में अखबार और संस्थान के लिए काम को छोड़कर बाकी सभी काम हो रहे हैं। हालात देखकर यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यदि जयपुर में बैठे वरिष्ठ अधिकारियों ने जल्द ध्यान न दिया तो ग्वालियर में पत्रिका कहीं नवभारत अखबार की राह पर न चला जाए। कार्यकारी रिपोर्टिंग प्रभारी प्रवीण मिश्रा का अहमदाबाद तबादला होने के बाद इंदौर से शैलेश दीक्षित को कार्यकारी चीफ रिपोर्टर बनाकर ग्वालियर पत्रिका भेजा गया है।

शैलेश को ग्वालियर भेजने के पीछे वरिष्ठों का तर्क था कि वो अखबार को अपने सुझाव और कार्यशैली से रिपोर्टिंग टीम में सामजस्य स्थापित कर भास्कर और नई दुनिया को मात देंगे। पर शैलेश के आने के बाद तो भी पत्रिका को कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है। पत्रिका न सिर्फ रोजाना नई दुनिया और भास्कर से खबरों के मामले में पिछड़ रहा है, बल्कि मौजूद खबरों में भी तथ्यों से काफी पीछे रहता है। अब तक भास्कर से कंप्टीशन करने वाला पत्रिका अब नई दुनिया को टक्कर देना तो दूर सामने खड़ा भी नहीं हो पा रहा है। पुष्टि के लिए यदि एक माह के तीनों अखबार देख लिए जाए तो बात अपने आप प्रमाणित हो जाएगी। वहीं भास्कर और नई दुनिया ने पत्रिका को अपनी मार्निंग मीटिंग और समीक्षा से बाहर कर दिया है।

शैलेश जयपुर और इंदौर भेजी जाने वाली रोजाना की समीक्षा रिपोर्ट में भी सही सूचना नहीं भेज रहे हैं। वैसे शैलेश पद में महज रिपोर्टर हैं, लेकिन स्टेट हेड अरुण चौहान का खास होने के चलते उन्‍हें ग्वालियर रिपोर्टिंग का जिम्‍मा सौंपकर भेजा गया है। इसके चलते वो ग्वालियर के रिपोर्टरों को डराने में इसका बखूबी इस्‍तेमाल कर रहे हैं। वे खुलेआम स्टाफ को देखलेने और तबादले की धमकी दे डालते हैं। इतना ही नहीं उन्‍होंने हाल ही में रिपोर्टिंग टीम और उनकी बीटों में भी बड़ा फेरबदल किया है, जिसमें काम करने वालों से प्रमुख बीट लेकर कथित दलाल पत्रकारों को भारी भरकम बीट सौंपी गई है, जबकि उन्हें रुटीन बीट में काम करने का अनुभव ही नहीं है। इसका सीधा असर रिपोर्टिंग पर पड़ रहा है।

दूसरी चर्चा यह भी है कि अरुण चौहान ग्वालियर के स्थानीय संपादक सिद्धार्थ भट्ट को पसंद नहीं करते हैं। इस वजह से भट्ट पर दवाब बनाने के लिए शैलेश को फ्री हैंड किया गया है। शैलेश के ग्वालियर आने के बाद न सिर्फ रिपोर्टिंग स्टाफ में भारी असंतोष है, बल्कि स्थानीय संपादक सिद्धार्थ भट्ट के भी पर कतर गए हैं। चीफ फोटोग्राफर महेश झा की झूठी शिकायत कर तबादला करवाने में भी उनका ही हाथ माना जा रहा है। शैलेश दीक्षित ग्वालियर भी दूसरी बार आए हैं। शैलेश इसके पहले नई दुनिया की लाचिंग टीम के हिस्सा थे। खैर, पत्रिका, ग्‍वालियर का समस्त स्टाफ जयपुर में बैठे वरिष्ठ अधिकारियों से सिर्फ एक ही निवेदन करता है कि एक बार ग्वलियर पत्रिका की समीक्षा करवाई जाए। ग्वालियर के स्टाफ में बेहद असंतोष व्याप्त है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

दैनिक जागरण के प्रिंट लाइन में बदलाव के बाद भी नहीं चेता उत्‍तराखंड सूचना विभाग

दैनिक जागरण, हल्‍द्वानी से जागरण का अवैध प्रकाशन लंबे समय से कर रहा था. वो देहरादून के रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर पर ही हल्‍द्वानी से अखबार का प्रकाशन कर रहा था. इस तरह वो हल्‍द्वानी को अलग संस्‍करण घोषित करते हुए इसके लिए अलग रेट पर विज्ञापन भी प्राप्‍त कर रहा था. यानी पूरी तरह गलत तरीके से सरकारी खजाने को चूना लगा रहा था. इस बात की जानकारी होते हुए भी राज्‍य का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग इस मामले में अंधा और बहरा बना हुआ था.

इस मामले को जब उत्‍तराखंड के पत्रकार एवं एक्टिविस्‍ट अयोध्‍या प्रसाद भारती ने कई मंचों से उठाना शुरू किया तो दैनिक जागरण प्रबंधन घबरा गया तथा उसने अपने प्रिंट लाइन में पुराने रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर को हटाकर आवेदित किए जाने की सूचना प्रकाशित करने लगा. पर इतना होने के बाद भी उत्‍तराखंड का सूचना विभाग अयोध्‍या प्रसाद द्वारा मांगी गई सूचना का सही उत्‍तर देने की बजाय गोल मोल तरीके से जवाब देकर मामले को निपटा दिया.

हालांकि जागरण ने अपने प्रिंट लाइन में चेंज करके खुद मान लिया कि वो हल्‍द्वानी में गलत तरीके से अखबार का प्रकाशन कर रहा था, इसके बाद भी उत्‍तराखंड सूचना विभाग ने उसको दिए जाने वाले विज्ञापन पर किसी प्रकार का रोक नहीं लगाया है, बल्कि अभी भी सरकारी विज्ञापन गलत तरीके से दैनिक जागरण को दिए जा रहे हैं. माना जा रहा है कि इसमें सूचना विभाग के वरिष्‍ठों की भी पूरी मिली भगत है. ऐसे ही मामले को लेकर पटना हाईकोर्ट ने हिंदुस्‍तान के खिलाफ जांच का आदेश दिया है.


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जागरण, हल्‍द्वानी के अवैध प्रकाशन का मामला : अयोध्‍या प्रसाद ने अपर निदेशक को लिखा पत्र

बिना रजिस्‍ट्रेशन के हल्‍द्वानी से अखबार निकाल रहा था दैनिक जागरण

दैनिक जागरण, हल्‍द्वानी में अखबार का अवैध प्रकाशन कर रहा है. बिना रजिस्‍ट्रेशन के यह अखबार देहरादून के रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर पर अखबार को प्रकाशित कर रहा है, जो पीआरबी एक्‍ट के तहत अवैध तथा गैरकानूनी है. इस बात का खुलासा पत्रकार एवं एक्टिविस्‍ट अयोध्‍या प्रसाद भारती द्वारा आरएनआई से मांगे एक सूचना से हुआ है. आरएनआई ने जानकारी दी है कि जागरण का उत्‍तराखंड में केवल देहरादून से रजिस्‍ट्रेशन है, जबकि हल्‍द्वानी में केवल प्रिंटिंग यूनिट है.

आरएनआई द्वारा दी गई सूचना से खुलासा हुआ है कि दैनिक जागरण उत्‍तराखंड में अवैध तरीके से स्‍वतंत्र तरीके से अखबार का प्रकाशन कर रहा है. इसी तरह के प्रकाशन के मामले में बिहार में हिंदुस्‍तान अखबार पर मामला चल रहा है. पटना हाई कोर्ट ने इसे गंभीर अपराध मानते हुए मुंगेर के एसपी तथा डीएम को तीन महीने में जांच पूरा करने का निर्देश दिया है. माना जा रहा है कि जागरण के इस फर्जीवाड़े पर जल्‍द कानूनी कार्रवाई हो सकती है. 

बरेली में हिंदुस्‍तान ने आयोजित किया ट्रेड फेयर

हिंदुस्‍तान अपने ब्रांडिंग के लिए नए-नए तरीके अपना रहा है. बरेली से खबर है कि यहां पर अपना ब्रांड मजबूत करने के लिए हिंदुस्‍तान अखबार 'इवेंट पैराडाइज' नाम के आर्गेनाइज के साथ मिलकर एक ट्रेड फेयर का आयोजन किया है. 24 फरवरी से 4 जनवरी तक चलने वाले इस फेयर को बरेली में राजकीय इंटर कॉलेज के मैदान पर लगाया गया है. इस ट्रेड फेयर में डेढ़ सौ से ज्‍यादा स्‍टाल लगाए गए हैं, जिसमें बुक से लेकर ऑटोमोबाइल तक के स्‍टाल लगाए गए हैं.

बताया जा रहा है कि हिंदुस्‍तान ने बरेली में अपनी ब्रांडिंग मजबूत करने के लिए यह प्रयोग किया है. प्रबंधन की सोच है कि इससे ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग अखबार के बारे में जाने और समझें. अखबार की दुनिया में यह पहली तरह का प्रयोग है. अब तक तमाम अखबार छोटे मोटे कार्यक्रम आयोजित कर उसके मीडिया पार्टनर बनते थे और कवरेज करते थे, परन्‍तु इस ट्रेड फेयर में हिंदुस्‍तान अखबार की सीधी भागीदारी है. माना जा रहा है कि इससे अखबार को सर्कुलेशन के अलावा मार्केट का भी फायदा मिलेगा. आईआरएस के आंकड़ों के अनुसार बरेली में हिंदुस्‍तान नम्‍बर एक के पायदान पर काबिज है.

वाह रे सीएम का सुधार, दागियों को मिल गई प्रोन्‍नति, ईमानदार हाशिए पर

मार्च 2012 के विधानसभा चुनाव के पहले जब समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं की राय से इतर दागी सांसद डीपी यादव के मामले पर सख्त रुक अपनाते हुए ये कहा था कि सपा में बाहुबलियों की कोई जगह नहीं है, तो लगा था कि यदि सपा की सरकार आई तो राज्य में सुशासन स्थापित होगा। पर परिणाम इसके ठीक विपरीत निकल रहे है।

मार्च 2012  से लेकर आज फरवरी 2013 हो गया पर सुशासन के नाम पर स्थापित होने वाली इस सरकार ने केवल कुशासन को ही स्थापित किया। चोरी, हत्या रेप, दंगा जैसे अपराध इस सरकार की लगभग एक साल के कार्यकाल की उप्लब्धि बन गए हैं। और बने भी क्यों न? कानून व्यवस्था के नाम पिछले एक साल से ये सरकार जो कुछ भी करती आ रही उसे सियासी भाषा में सिर्फ मीठे शब्दों का मायाजाल कहा जा सकता है।  

जहाँ एक तरफ सपा प्रमुख मुलायम सिंह प्रशानिक अधिकारियों की कार्यशैली पर तल्ख़ टिप्पणी करते हैं तो वहीं दूसरी ओर उन्हीं की पार्टी का युवा मुख्यमंत्री बेहतर कानून व्यवस्था के नाम पर ऐसे अधिकारियों को ला रहा है जो खुद कानून व्यवस्था के लिए एक सवालिया निशान हैं। अभी पिछले माह जनवरी में राज्य सरकार ने प्रशासनिक अधिकारियों की स्थानान्तरण और प्रोन्नति लिस्ट ये कहते हुए ख़ारिज कर दी थी कि इस लिस्ट में निचले स्तर काफी गड़बड़ी हुई लिहाजा अब नयी सिरे से लिस्ट बनेगी।

फरवरी माह में नई लिस्ट बनी और अधिकारियोंको प्रोन्नति और स्थानान्तरण भी मिला। इस क्रम में जो महत्वपूर्ण फेरबदल हुआ वो प्रदेश की राजधानी लखनऊ और गोंडा जिले में हुआ। दोनों ही जगह के पुलिस प्रमुख बदले गए। बदले तो कई जिलों के पुलिस प्रमुख गए लेकिन इन दोनों जिलों में हुआ फेरबदल सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय बना क्योंकि उस समय ये दोनों जिले एक खास कारण से चर्चा में थे। लखनऊ के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) राम कृष्ण चतुर्वेदी जहाँ जिले की बिगड़ती कानून व्यवस्था के लिए चर्चा का विषय बने हुए थे तो वही गोंडा के त्तकालीन पुलिस अधीक्षक (एसपी) नवनीत राणा एक गौ तस्कर केसी पाण्डेय, जो वर्तमान में राज्य मंत्री का दर्जा पाए हुए है, के विरुद्ध मोर्चा खोलने के कारण चर्चा के केंद्र बिंदु में थे।

लिहाजा फरवरी में आयी स्थानान्तरण लिस्ट में दोनों को हटाया गया। लखनऊ में राम कृष्ण चरुर्वेदी की जगह पर जे रवींद्र गौड़ को लाया गया और गोंडा में नवनीत राणा की जगह पर हरी नारायण को लाया गया, पर जब तक तक हरिनारायण एसपी गोंडा का चार्ज सँभालते एक बार फिर फेरबदल किया गया और आरपीएस यादव को एसपी गोंडा बना कर भेजा गया। यानी नवनीत राणा की जगह पर आरपीएस यादव ने एसपी गोंडा का चार्ज संभाला।

इन दोनों के स्थानातरण में जो खास बात रही वो ये कि एक को उसकी नाकामी के चलते युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रोन्नति देते हुए पुलिस उप-महानिरीक्षक कानपुर रेंज बना दिया और दूसरे को उसकी ईमानदारी के चलते पुलिस महानिदेशक कार्यालय से सम्बद्ध कर दिया। यानी युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की नजर में प्रदेश की स्वस्थ कानून व्यवस्था का मतलब निक्कमे अधिकारियों को प्रोन्नति देना और इमानदार अधिकारियों का पर कतरना है। अब बात करते हैं लखनऊ के वर्तमान पुलिस अधीक्षक जे रवींद्र गौड़ की। सन 2005 बैच के इस आईपीएस अधिकारी की विशेषता और महानता का अंदाजा केवल इस बात लगाया जा सकता है कि मात्र आठ साल की सर्विस में इनको प्रदेश की राजधानी का पुलिस प्रमुख बना दिया जाता है, जहाँ पुलिस का प्रमुख बनने के लिए तमाम आईपीएस अधिकारी अपनी पूरी सर्विस के दौरान प्रतीक्षारत रहते है और उनका मौका नहीं मिलता। वो भी उस परिस्थिति में जब इस आईपीएस अधिकारी के भी दामन बेदाग नहीं है।

10 फरवरी 2013 को एक अखबार में प्रकशित रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जे रवींद्र गौड़ पर फर्जी इनकाउंटर कर एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या का आरोप है। दरअसल 30 जुलाई 2007 को बरेली पुलिस ने दावा किया कि उसने बैंक डकैती करने जा रहे टाटा सूमो में सवार कुछ लोगों को फतेहगंज इलाके में रोकने की कोशिश की तो सूमो सवार बदमाशों ने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी फायरिंग में एक शख्‍स मारा गया, जिसकी पहचान मुकुल के रूप में हुई। वहीं पुलिस ने मुकुल के दो साथियों ड्राइवर विक्‍की शर्मा और पंकज की गिरफ्तारी दिखाई। साथ ही बताया कि चौथा शख्‍स मौके से भागने में सफल रहा। बाद में बताया कि भागने वाला शख्‍स प्रेम शंकर है। इसके बाद पुलिस ने पंकज, मुकुल और अन्‍य के खिलाफ तत्‍कालीन एएसपी जे रवींद्र गौड़ की शिकायत पर फतेहगंज पुलिस स्‍टेशन में हत्‍या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कराया। यही नहीं पुलिस ने उसके साथ में तीन कट्टे और एक रिवाल्‍वर की बरामदगी भी दिखाई। मामले में तीन लोगों को सबूतों के अभाव में अदालत से जमानत मिल गई। इस दौरान मुकुल के पिता बृजेंद्र कुमार गुप्‍ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली और इस इनकाउंटर को फर्जी बताया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2010 में जून में मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी। सीबीआई ने 23 जून को मामले में 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली, जिनमें 2005 बैच के आईपीएस अफसर जे रवींद्र गौड़ भी थे। अब सवाल उठता है कि 2005 बैच के आईपीएस अधिकारी जो 2007 तक अपर पुलिस अधीक्षक के पद पर रहा हो और जिस पर हत्या का आरोप रहा हो। कैसे मात्र आठ साल की सर्विस में प्रदेश की राजधानी का पुलिस प्रमुख बन गया? जवाब साफ़ है कि अब सत्ता के गलियारों में अधिकारियों का स्थानान्तरण योग्‍यता और ईमानदारी के दम पर नहीं अपितु सत्ता में बैठी सरकार के प्रति अधिकारी के समपर्ण से होता है। जिसकी एक बानगी गोंडा के वर्तमान एसपी आरपीएस यादव साहब भी है। जिनके आने के बाद से गौ तस्कर और मौजूदा राज्यमंत्री केसी पाण्डेय के विरुद्ध गौ तस्करी के मामले निवर्तमान पुलिस अधीक्षक नवनीत राणा द्वारा की जा रही जांच ख़त्म हो गयी है और उन्हें क्लीन चिट मिल गयी।

ऐसी स्थिति में अखिलेश सरकार का ये दावा कि राज्य की कानून व्यवस्था में सुधार के लिए ईमानदार अधिकारियों की तरजीह दी जाएगी एक छलावा लगता है, क्योंकि यदि ये दावा सही होता तो राजधानी का पुलिस प्रमुख एक दागी अधिकारी को बनाने की जगह पर अखिलेश सरकार किसी बेदाग और निष्पक्ष अधिकारी को लखनऊ का पुलिस प्रमुख बनाती, जिसके आने बाद जिले की कानून व्यवस्था सुधरती और अपराधियों को उनकी असली जगह जेल में पहुंचाया जाता।

लेखक अनुराग मिश्र स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. इनसे संपर्क मो -0938990111 के जरिए किया जा सकता है.

प्रेस परिषद की रिपोर्ट, काटजू और बिहार के एडिटर इन चीफ

बिहार में सत्तापक्ष द्वारा मीडिया को नियंत्रित किए जाने को लेकर भारतीय प्रेस परिषद की रिपोर्ट पर जांच समिति के अलावा बाकी सदस्यों की मुहर लगती उसके पहले ही वह मीडिया के हाथ लग गई। इस संबंध में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मानना है कि यह काम खुद परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू की मेल आईडी से किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि इस रिपोर्ट पर गंभीरता से बात होने के बजाय पूरा मामला समाचार चैनलों के अखाड़े में होने वाली रोजमर्रा की राजनीतिक बहसों में तब्दील हो गया। उसके बाद इस पूरे प्रकरण पर मीडिया के चरित्र को लेकर बात करने वाला कोई नहीं बचा।

सब इसे राजनीतिक मुद्दे में बदलने में लग गए। यह भारतीय प्रेस परिषद के लिए कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि लोकसभा चुनाव 2014 के पहले वह पेड न्यूज और राजनीतिक पार्टियों की ओर से मीडिया नियंत्रण के मामले पर मुस्तैदी से काम करता, रिपोर्ट जारी करता, खुद उसकी हास्यास्पद छवि बना दी गई। उसमें राजनीतिक पार्टियों सहित मुख्यधारा मीडिया ने भी जम कर सक्रियता दिखाई। यहां तक कि जांच समिति के सदस्य भी रिपोर्ट सार्वजनिक होने के पहले ही टीवी परिचर्चा में आने का लोभ संवरण नहीं कर पाए।

नतीजा, भारतीय प्रेस परिषद की रिपोर्ट और न्यायमूर्ति काटजू को लेकर एक के बाद एक आए राजनीतिक बयानों को मजबूती मिली। भारतीय प्रेस परिषद की छवि मीडिया को नियंत्रित करने वाली एक स्वायत्त संस्था के रूप में बने, इसके लिए जरूरी था कि इस संस्था से जुड़े लोगों पर किसी भी राजनीतिक दल या सत्ता प्रतिष्ठान के प्रभाव में काम करने के आरोप न लगे। लेकिन इस रिपोर्ट के आने से पहले ही मीडिया में बिहार के सत्तारूढ़ दल की तरफ से बयान आने शुरू हो गए और न्यायमूर्ति काटजू को कांग्रेस का आदमी बताया जाने लगा। इस रिपोर्ट के लीक होने के दौरान ही न्यायमूर्ति काटजू के गुजरात और मोदी को लेकर लिखे लेख पर तो राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने काटजू के परिषद अध्यक्ष पद से इस्तीफे की मांग तक कर डाली। यही नहीं, उन्हें कांग्रेसियों से भी बड़ा कांग्रेसी बताया।

यह पहली बार नहीं है जब अध्यक्ष पद पर रहते हुए न्यायमूर्ति काटजू पर कांग्रेसी होने के आरोप लगे और यह काम सिर्फ गैर-कांग्रेसी राजनीतिकों ने किया। न्यायमूर्ति काटजू ने 5 अक्तूबर, 2011 को अध्यक्ष पद संभाला और उसके पांच दिन बाद अखबारों के संपादकों को संबोधित करते हुए कहा कि मौजूदा मीडिया के काम करने का तरीका ठीक नहीं है। अब आम आदमी भी कहने लगा है कि मीडिया निरंकुश होने लगा है। अगर पत्रकार अपने मालिकों की सेवा करते हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं, लेकिन उन्हें जनता का भी ध्यान रखना होगा।

न्यायमूर्ति काटजू की इस बात को मुख्यधारा मीडिया ने उनकी तरफ से दी गई चुनौती के रूप में प्रसारित किया। फिर 30 अक्तूबर, 2011 को करन थापर के कार्यक्रम में दिए साक्षात्कार के बाद से तो मुख्यधारा मीडिया ने खुलेआम काटजू का विरोध शुरू कर दिया। यहीं से उनकी छवि कांग्रेस का आदमी बनाने के रूप में हुई। उस बातचीत में उन्होंने मौजूदा मीडिया को जनविरोधी और ज्यादातर पत्रकारों के बारे में ठीक राय न होने की बात कही थी। उन्हें बहुत कम पढ़ा-लिखा बताया था। उसी में उन्होंने भारत सरकार से प्रेस परिषद के लिए और अधिक अधिकारों की मांग की थी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी प्रेस परिषद के दायरे में लाने और इसका नाम मीडिया परिषद करने की बात कही थी।

न्यायमूर्ति काटजू की इन बातों का इस रूप में विरोध हुआ कि एक के बाद एक अखबारों और टीवी चैनलों ने उन्हें कांग्रेस का आदमी कहना शुरू कर दिया। एक अंग्रेजी अखबार ने तो अपनी खबर का शीर्षक दिया- ही डजंट डिजर्ब टू बी द चीफ आफ द परिषद- वे प्रेस परिषद के अध्यक्ष पद के काबिल नहीं हैं। एनबीए (न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जेएस वर्मा ने भारतीय प्रेस परिषद को ही भंग करने की बात कही थी। दिलचस्प है कि जब मीडिया न्यायमूर्ति काटजू का विरोध करते हुए उन्हें कांग्रेस का एजेंट बता रहा था, कांग्रेस सांसद और सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने उनके बयान को तूल देने का विरोध किया था।

उन्होंने यहां तक कहा था कि वे जो कुछ कह रहे हैं, नया नहीं है। इससे पहले न्यायमूर्ति जेएन राय ने भी इसी तरह के सुझाव दिए थे। इस पूरे मामले पर गौर करें तो गैर-कांग्रेसी राजनीतिकों से पहले मुख्यधारा मीडिया न्यायमूर्ति काटजू को कांग्रेस का आदमी साबित कर चुका है, जिसके पीछे उसके ऊपर उठाए गए सवाल का विरोध शामिल है। ऐसे में अगर वह अब दुबारा उनके लेख, टिप्पणी या रिपोर्ट को एक खास राजनीतिक संदर्भ में पेश कर रहा है तो आश्चर्य नहीं, क्योंकि उसने दो साल पहले ही तय कर लिया था कि अध्यक्ष के रूप में काटजू की छवि खराब करनी है। यह अलग बात है कि न्यायमूर्ति काटजू पिछले करीब दस साल से उसी अंग्रेजी अखबार में साहित्य, कला और मीडिया पर लेख लिखते आए हैं।

अगर बिहार में मीडिया की स्थिति पर प्रेस परिषद की रिपोर्ट बाहर न भी आती और मुख्यधारा मीडिया के प्रति चुप्पी बनी रहती तब भी यह सचाई छिपी नहीं रह गई थी कि वहां का मीडिया विज्ञापन और सरकारी लाभ की खातिर किनके इशारे पर काम करता है। यह सब हमारे बीच लगातार आ रहा था। सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग जानते हैं कि 2011 में फेसबुक पर नीतीश सरकार के खिलाफ टिप्पणी किए जाने पर डॉ. मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण को न केवल नौकरी से निकाल दिया गया, बल्कि उन्हें लगातार परेशान किया गया। उस दौरान मुख्यधारा मीडिया में लगभग चुप्पी बनी रही, लेकिन सोशल मीडिया पर लगातार खबरें आती रहीं। इस घटना के करीब एक महीने बाद 16 अक्तूबर, 2011 को उन टिप्पणियों को ‘बिहार में मीडिया कंट्रोल : बहुजन ब्रेन बैंक पर हमला’ शीर्षक से किताब की शक्ल में प्रकाशित किया गया। इसमें संकलित लेख इस बात की विस्तार से चर्चा करते हैं कि बिहार में दलित, पिछड़े वर्ग और मुसलमानों की आवाज को मुख्यधारा मीडिया सरकारी शह पर दबाने का काम करता है। इसी संदर्भ में प्रमोद रंजन की पुस्तक ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ वहां के पूरे मीडिया परिदृश्य को उभारती है।

इसी कड़ी में 14 अप्रैल, 2012 को ‘ओपन’ पत्रिका में धीरेंद्र के. झा की विशेष रिपोर्ट प्रकाशित हुई- ‘एडिटर इन चीफ आफ बिहार’। इसमें विस्तार से बताया गया कि बिहार के बड़े-बड़े अखबारों में, जिनके देश भर में संस्करण प्रकाशित होते हैं, जद (एकी) के खजांची विनय कुमार सिन्हा के घर आयकर छापे की खबर गायब रही। वह खबर लोग उन छोटे अखबारों के जरिए जान पाए, जिन्हें सरकारी विज्ञापनों से दूर रखा गया है। इन अखबारों को दबाने के लिए सरकार क्या-क्या नहीं करती, यह लंबी कहानी है। दूसरी तरफ ऐसे अखबारों की लंबी फेहरिस्त है, जो हमारी नजरों से नहीं गुजरते, लेकिन उनमें सरकारी विज्ञापन मौजूद होते हैं। ऐसे में सवाल है कि अब जबकि मुख्यधारा मीडिया इस रिपोर्ट को लेकर सिर्फ राजनीतिक माहौल बनाने में जुटा है, क्या वह खुद इसमें प्रमुखता से शामिल नहीं है! अगर इन रिपोर्टों, खबरों पर गौर करें तो यह स्पष्ट नहीं होने लगता है कि कॉरपोरेट मीडिया इस पूरे प्रकरण को अपने से काट कर सत्ता के गलियारों की गेंद बनाने में लगा है! उसमें उसके खुद के फंसने की पूरी संभावना है, क्योंकि जिस समय सरकार उनकी आवाज दबाने का काम कर रही थी, उस समय उसका विरोध करने के बजाय वर्ष के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री से नवाजने में मशगूल था। (साभार : जनसत्‍ता)

सेना के पीआरओ कर्नल अजय चौधरी 20 करोड़ की ड्रग्स के साथ अरेस्‍ट

: पांच अन्‍य भी पुलिस के हत्‍थे चढ़े : इंफाल : मणिपुर के चंदेल जिले में पुलिस ने आज सेना के कर्नल स्तर के पीआरओ और पांच अन्य व्यक्तियों को कथित रूप से 20 करोड़ रुपए मूल्य का अवैध मादक पदार्थ ले जाते वक्त गिरफ्तार कर लिया जिसकी तस्करी म्यामां की जानी थी। राज्य पुलिस ने यहां बताया कि मादक पदार्थ चंदेल जिले के पालेल में तीन वाहनों में पकड़ा गया। पुलिस ने बताया कि सेना के पीआरओ कर्नल अजय चौधरी, उनके सहायक आर के बाबलू, इंडिगो के सहायक प्रबंधक बृजेंद्र सिंह, हाउपो हाओकिप, मिंथांग बोंगेल और मिलन हाओकिप को हिरासत में ले लिया गया।

पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार किये गए लोगों से यहां से करीब 45 किलोमीटर दूर पालेल थाने में पूछताछ की गई। उनके खिलाफ पादक पदार्थ कानून की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। उन्हें थाउबल जिला स्थित काकसिंग पुलिस थाने ले जाया जाएगा।

सेना के प्रवक्ता कर्नल जगदीप दाहिया ने दिल्ली में कहा, ‘कर्नल अजय चौधरी को मणिपुर पुलिस ने सुबह पांच अन्य व्यक्तियों के साथ गिरफ्तार किया। हमें बताया गया है कि कुछ मादक पदार्थ बरामद किया गया।’ सेना ने वादा किया कि यदि कोई भी कर्मी मामले में लिप्त पाया जाता है तो उसके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

अजय चौधरी ने दावा किया कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि भेजे जा रहे माल में अवैध मादक पदार्थ है। उन्होंने कहा कि एक वरिष्ठ अधिकारी के भतीजे ने उनके साथ धोखा किया। उन्होंने यह साफ नहीं किया किया वह गिरफ्तार किये गए व्यक्तियों में से किसके बारे में यह बात कह रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘शनिवार को एक बहुत ही वरिष्ठ अधिकारी का भतीजा मेरे पास आया जिसे मैं जानता हूं। मैं उससे उसके स्थान पर दो या तीन बार मिला हूं। उसने कहा कि वह मोरे में बाजार करने के लिए आया है और मोरे के रास्ते में कुछ लोगों ने उसे परेशान किया।’ चौधरी ने कहा, ‘मैंने उससे पूछा वह क्या है, उसने कहा कि कुछ नहीं केवल कुछ चीजें हैं जिसका वह व्यापार करता है। कुछ बंडल होंगे जिन्हें मैं अपने कार में ले जाऊंगा। इसलिए आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। इसलिए मैंने कहा ठीक है।’

उन्होंने कहा कि उन्होंने इंडिगो के अपने एक मित्र से कहा और वह भी उनके साथ आने को तैयार हो गए ताकि वे मोरे में कुछ खरीदारी कर सकें। अधिकारी ने कहा कि उन्होंने जांच चौकी पर कमांडो को जांच करने दिया क्योंकि उन्हें कुछ गलत चीज होने का संदेह नहीं हुआ। उन्होंने कहा, ‘चूंकि वह एक मित्र है और किसी वरिष्ठ का रिश्तेदार है, आप कभी यह शक नहीं करेंगे कि वह ऐसा काम करेगा। जो भी हो इसमें मुझसे धोखा हुआ है।’

सेना प्रवक्ता दहिया ने कहा, ‘हम यह कहना चाहते हैं कि वह कानून के तहत दोषी पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।’ दहिया ने कहा, ‘जब हमसे औपचारिक रूप से सम्पर्क किया जाएगा तो हम प्रक्रिया में शामिल होंगे।’ पुलिस ने बताया कि मादक पदार्थ में रेस्पीफेड, ओमकॉप, हिलकोल्ड, पॉलीफेड और एक्टीडेन की गोलियां शामिल हैं जिनकी कीमत करीब 15 करोड़ रुपये है। ये मादक पदार्थ का पार्टियों में इस्तेमाल होता है, इसका दुरुपयोग होने की संभावना होती है क्योंकि इससे नशा होता है। (एजेंसी)

मीडिया का एक हिस्‍सा सड़ा हुआ है : नवीन जिंदल

नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने शनिवार को कहा कि जहां भारतीय मीडिया अत्यंत उज्‍जवल और शक्तिशाली है वहीं इसका कुछ हिस्सा ऐसा भी है जो 'सड़ा' हुआ है। जिंदल की कंपनी ने पिछले दिनों समाचार चैनल 'जी न्यूज' के खिलाफ कथित फिरौती का मामला दायर कराया था।

यहां एक सेमिनार में जिंदल ने कहा, "आज भारत के पास अत्यंत उज्‍जवल और शक्तिशाली मीडिया है। मैं मीडिया को उनके बेहतर काम के लिए श्रेय देना चाहूंगा। लेकिन हर जगह की तरह इसमें भी कुछ सड़े हुए तत्व हैं। मीडिया हमेशा सत्य को उद्घाटित करे, क्योंकि बहुत से मुद्दे पर आम आदमी को बहुत ज्यादा जानकारी नहीं होती और वे मीडिया के कहे पर विश्वास करते हैं।"

कांग्रेस नेता ने जोर देकर कहा, "यदि एक राजनेता के रूप में मैं कोई बात कहूं तो लोग यह कतई महसूस नहीं करेंगे कि मैं सही कह रहा हूं। यदि मैं नेता के रूप में कुछ कहूं तो लोग समझेंगे कि मैं अपना उत्पाद बेच रहा हूं। कोई टीवी पर कुछ बोले या एक अखबार में लेख लिखे तो लोग उसी पर भरोसा करते हैं।"

नरेंद्र मोहन को यह बात जंच गई और जागरण में यह परम्‍परा बंद हो गई

१९८० की जनवरी में जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी तब प्रिंटर पर खबरें आया करती थीं कि अमुक जिले के अमुक गांव में ऊँची जाति के लोगों ने नीची जाति के लोगों के साथ मारपीट की या उनके लिए गांव के रास्ते बाधित कर दिए। ऐसी खबरें देने वाले, लिखने वाले और डेस्क से सही करने वाले पत्रकार यह सोचकर खुश हो जाते कि हमने नीची जातियों की पीड़ा को हाई लाइट कर एक नेक काम किया।

एक दिन मैंने अपने चीफ सब से एक सवाल किया कि जो जाति एक नीच काम कर रही है उसे तो आप ऊंची जाति लिख रहे हो और जो पीडि़त हैं उन्हें नीच जाति, मुझे यह सिरे से ही गलत लगता है। यह सुनते ही हमारे चीफ सब बीके शर्मा हथेली पर तंबाखू मलते हुए चीखे कि आप बड़े महान हो तो सीधे मोहन बाबू से जाकर हमारी शिकायत करो। मैंने कहा कि इसमें शिकायत जैसी कोई बात नहीं है लेकिन हम इसे बदल तो सकते हैं। शर्मा जी बोले- तुम अपनी नौकरी करो ये सब बातें छोड़ो। और तुम्हें बड़ी क्रांति करनी है तो जाओ भैया मोहन बाबू के पास।

कानपुर में दैनिक जागरण के प्रधान संपादक और उसके मालिक नरेंद्र मोहन जी को उस समय लोग मोहन बाबू ही कहा करते थे। वे तब हर सोमवार को पूरे संपादकीय विभाग की बैठक करते और समस्याएं शेयर करते। बीके शर्मा द्वारा व्यंग्य में कही गई बात को मैंने सोमवार की बैठक में मोहन बाबू के सामने रखा और कहा कि यह तो गलत है। हमें ऊँची या नीची जाति लिखने के लोगों की जाति लिखना चाहिए। मोहन बाबू को यह बात जंच गई और वहां यह परंपरा बंद हो गई।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के फेसबुक वॉल से साभार. 

हिंदुस्‍तान से शरीफ नियाजी, नेशनल दुनिया से हरिशचंद्र, मुकेश एवं दुष्‍यंत का इस्‍तीफा

हिंदुस्‍तान, बरेली से खबर है कि शरीफ नियाजी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे सर्कुलेशन डिपार्टमेंट में डिप्‍टी मैनेजर के पद पर कार्यरत थे. शरीफ ने अपनी नई पारी बरेली में ही दैनिक जागरण के साथ शुरू की है. उन्‍हें मैनेजर बनाया गया है. शरीफ इसके पहले अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे थे. वे हिंदुस्‍तान की लांचिंग के समय इस अखबार से जुड़े थे.

नेशनल दुनिया से खबर है कि तीन वरिष्‍ठ लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया है. इस्‍तीफा देने वालों में हरिशचंद्र यादव, मुकेश कुमार एवं दुष्‍यंत कुमार शामिल हैं. मुकेश कुमार हेड लेआउट डिजाइनर के पद पर कार्यरत थे. तीनों लोग अखबार की लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए थे. ये लोग अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. 

अपडेटेड… ‘राज एक्सप्रेस’ अखबार वाले ला रहे हैं ‘राज टीवी’, भर्ती के लिए निकाला विज्ञापन

: (कुछ लोगों की शिकायत है कि राज टीवी का नीचे दिया गया विज्ञापन जूम नहीं हो रहा. शिकायत का समाधान कर दिया गया है. अब आप नीचे के विज्ञापन की तस्वीर पर क्लिक करेंगे तो विज्ञापन अलग विंडो में खुलेगा और फिर जूम होगा क्लिक करने पर) : अरुण सहलोत जो मध्य प्रदेश के बिल्डर हैं और राज एक्सप्रेस नामक अखबार चलाते हैं, अब एक न्यूज चैनल शुरू करने जा रहे हैं. राज टीवी नामक इस न्यूज चैनल में नियुक्ति के लिए विज्ञापन का प्रकाशन राज एक्सप्रेस अखबार में किया गया है. विज्ञापन देखकर पता चल रहा है कि इस चैनल में सैकड़ों मीडियाकर्मियों को रोजगार मिलेगा.

रोजगार कहना ही ज्यादा ठीक रहेगा क्योंकि अब आजकल कोई मीडिया में सरोकार के लिए नहीं आता, अपने ग्रुप को लाभ दिलाने की मंशा से आता है. अरुण सहलोत राज एक्सप्रेस अखबार के जरिए मध्य प्रदेश सरकार से टकराए, पर सरकार ने उनके दबाव में आने की जगह उनके समूह को ही नेस्तनाबूत करने का अभियान चला दिया जिससे अरुण सहलोत का काफी नुकसान हुआ.

अरुण सहलोत दिलेर किस्म के आदमी हैं, इसलिए सरकार की मार को झेल गए और अब भी मैदान में न सिर्फ तैनात हैं बल्कि मीडिया का एक्सपेंशन करने की तैयारी में है. देखना है कि राज टीवी के जरिए मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ के रीजनल चैनलों के मार्केट में अरुण सहलोत कितना दखल बना पाते हैं. उपर है राज टीवी का विज्ञापन, जिसका प्रकाशन राज एक्सप्रेस अखबार में किया जा चुका है. विज्ञापन पढ़ने में ना आए तो विज्ञापन की उपरोक्त तस्वीर के उपर क्लिक कर दें.

करन कश्यप आया और बोला कि यशवंत सिंह से सेटिंग हो गई है

आदरणीय, श्री यशवंत  सिंह, भड़ास4मीडिया, महोदय, सादर  अवगत कराना है कि दिनाक 4.2.13 को मैंने करन कश्यप हिंदुस्तान अख़बार मेरठ द्वारा मुझसे 2 लाख रूपये ठगने की शिकायत आपसे की जिसका प्रकाशन दिनांक 14.2.13 को आपने किया था. इसके लिए आपको धन्यवाद. इस बात की जानकारी होते ही करन कश्यप एक लड़के के साथ मेरे घर आ धमके और कहा  क्या उखाड़ लिया. मेरी यशवंत सिंह से सेटिंग हो गयी है.

मेरी माँ ने कहा- आप लोग मेरे घर कैसे आ गये तो मेरी माँ को गालियां देते हुए धक्का देकर गिरा दिया. मैंने कहा 100 नम्बर पर फोन कर रही हूँ तो करन ने मेरे हाथ से फोन छीन लिया तथा मेरे साथ दुर्व्यहार किया. अब मैं ज्यादा परेशान हूँ. सोच रही हूं कि मकान बदल दूँ. आप ही बताएं मैं क्या करूं. आसपास के  लोग शक की निगाह से देख रहे हैं. आपसे विनती है कि इस संकट की घड़ी में मेरी सहायता कर रास्ता बतायें कि अब मैं क्या करूं?

आपकी सहायता की प्रतीक्षा में

अस्मि सागर

गाजियाबाद


मूल खबर के लिए यहां क्लिक करें- अस्मि सागर की दास्तां

मेरे लिए यह राहत की बात है कि दिल्ली की उस लड़की की मौत हो गई – सूर्यानेल्ली की लड़की बोली

सूर्यानेल्ली में लगातार चालीस दिनों तक बयालीस वहशी धोखेबाज मर्दों ने बर्बरता की सारी हदें पार कर सूर्यानेल्ली की उस सोलह साल की बच्ची को जैसे चाहा रौंदा था और लगभग मर जाने के बाद उसके घर के आसपास फेंक दिया था। वह किसी तरह बच गई और आज तैंतीस साल की उम्र में भी वह अपने आसपास के अंधेरों का सामना करती हुई अपनी लड़ाई को अंजाम देने के लिए अपने बूते खड़ी है। अरुंधति राय ने नहीं भी कहा होता तो भी मैं ठीक वही कहता- हां, वह मेरी हीरोईन है, वह सबकी नायिका है।

फिलहाल हकीकत यह है कि दूरदराज के इलाकों में होने वाली ऐसी तमाम घटनाएं हमारी संवेदना को नहीं झकझोर पाती हैं। सवाल करने वाले कर रहे हैं कि क्या हम केवल तभी परेशान होते हैं जब कोई घटना देश की राजधानी में हो, हमारे अपने वर्ग से जुड़ी हो। वरना दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद इंडिया गेट के व्यापक आंदोलन से निकले संदेश के बीच इसी दौर में बिहार में सहरसा जिले के एक गांव में किसी दलित और मजदूर परिवार की आठ साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार करके बर्बरता की सारी हदें पार कर मार ही डाला जाता है… महाराष्ट्र के भंडारा में तीन नाबालिग बच्चियों से बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर कुंए में फेंक ही जाती है… और इस तरह की तमाम घटनाएं अपनी त्रासदी के साथ लगातार घट ही रही हैं। लेकिन हमारे भीतर कभी भी गुस्सा पैदा नहीं होता… किसी टीवी वाले को इन घटनाओं पर लोगों को आंदोलित करने की जरूरत नहीं पड़ती…  इंडिया गेट पर कभी शोक की मोमबत्तियां नहीं जलाई जातीं…!

केरल में सूर्यानेल्ली की यह लड़की किसी तरह जिंदा बच गई थी। अगर देश के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दफन कर दिए गए मुकदमे पर सवाल नहीं उठाया होता तो इसमें भी अदालतों ने चुपचाप सभी अपराधियों को पवित्र ब्रह्मचारी घोषित कर ही दिया था। इसके बावजूद इस देश की महान पार्टी कांग्रेस के एक महान और "पवित्र" सांसद पीजे कूरियन यह कह ही रहे हैं कि उनके खिलाफ सीपीएम झूठा प्रचार कर रही है। इस देश में सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी कूरियन का झंडा उठा कर कूद रही है… सत्ता की दावेदार एक पार्टी अपनी इस बात की फिक्र को दूर करने की फिराक में है कि उसके पूरे गिरोह के भगवा आतंकवाद के आरोप से मुक्त कर दिया जाए…। आगे क्या होगा, सभी अपराधी एक बार फिर से पवित्रीकरण की प्रक्रिया से गुजरेंगे या फिर सूर्यानेल्ली की लड़की पर ढाए गए जुल्म की सजा पा सकेंगे, यह हमारी व्यवस्था, अदालतों, राजनीतिक दलों के रुख पर निर्भर करेगा। लेकिन इसी के साथ राजधानी दिल्ली और ताकतवर मध्यवर्गीय संवेदनाओं से उपेक्षित ये तमाम घटनाएं एक बार फिर सचमुच की समाजी और इंसानी संवेदनाओं की परीक्षा की कसौटी पर भी गुजरेंगी…। रोजाना के अनगिनत ऐसे मामलों की तरह… । टाइम्स ऑफ इंडिया में सूर्यानेल्ली की लड़की की यह पीड़ा उसी के शब्दों में प्रकाशित हुई थी। अनुवाद करने की कोशिश मैंने ही की है। अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए जहां भी जरूरी लगे, एक बार इस लिंक ('टीओआई) पर क्लिक कर लीजिएगा, लेकिन पढ़िएगा जरूर…  -अरविंद शेष, माडरेटर, चार्वाक ब्लाग


मैं सचमुच अपने पहले प्यार का कत्ल कर देना चाहती थी… 

– सूर्यानेल्ली की लड़की-

आपने शायद कभी मेरा नाम नहीं सुना हो! मुझे उस पहचान के साथ नत्थी कर दिया है, जिससे मैं छुटकारा नहीं पा सकती- मैं सूर्यानेल्ली की लड़की हूं। पिछले सत्रह सालों से मैं इंसाफ पाने की लड़ाई लड़ रही हूं। कुछ लोग मुझे बाल-वेश्या कहते हैं तो कुछ पीड़ित। लेकिन किसी ने मुझे दामिनी, निर्भया या अमानत जैसा कोई नाम नहीं दिया। मैं कभी भी इस देश के लिए गर्व नहीं बन सकती! या उस महिला का चेहरा भी नहीं, जिसके साथ बहुत बुरा हुआ।

मैं तो स्कूल में पढ़ने वाली सोलह साल की एक मासूम लड़की भी नहीं रह सकी, जिसे पहली बार किसी से प्यार हो गया था। लेकिन उसी के बाद उसने अपनी जिंदगी ही गंवा दी। अब तैंतीस साल की उम्र में मैं रोज  °डरावने सपनों से जंग लड़ रही हूं। मेरी दुनिया अब महज उस काली घुमावदार सड़क के दायरे में कैद है जो मेरे घर से चर्च और मेरे दफ्तर तक जाती है।

लोग अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक मुझ पर तब तंज कसते हैं जब मैं उन चालीस दिनों को याद करती हूं, जब मैं सिर्फ एक स्त्री शरीर बन कर रह गई थी और जिसे वे जैसे चाहते थे, रौंद और इस्तेमाल कर सकते थे। मुझे जानवरों की तरह बेचा गया, केरल के तमाम इलाकों में ले जाया गया, हर जगह किसी अंधेरे कमरे में धकेल दिया गया, मेरे साथ रात-दिन बलात्कार किया गया, मुझे लात-घूंसों से होश रहने तक पीटा गया।

वे मुझसे कहते हैं कि मैं कैसे सब कुछ याद रख सकती हूं, और मैं हैरान होती हूं कि मैं कैसे वह सब कुछ भुला सकती हूं? हर रात मैं अपनी आंखों के सामने नाचते उन खौफ़नाक दिनों के साथ किसी तरह थोड़ी देर एक तकलीफदेह नींद काट लेती हूं। और मैं एक अथाह अंधेरे गहरे शून्य में बार-बार जाग जाती हूं जहां घिनौने पुरुष और दुष्ट महिलाएं भरी पड़ी हैं।

मैं उन तमाम चेहरों को साफ-साफ याद कर सकती हूं। सबसे पहले राजू आया था। यह वही शख्स था, जिसे मैंने प्यार किया था और जिस पर भरोसा किया था। और उसी ने मेरे प्यार की इस कहानी को मोड़ देकर मुझे केरल के पहले सेक्स रैकेट की आग में झोंक दिया। रोजाना स्कूल जाने के रास्ते में जिस मर्द का चेहरा मेरी आंखें तलाशती रहती थीं, वही उनमें से एक था जिसे मैंने शिनाख्त परेड में पहचाना था और अदालत के गलियारे में मेरा उससे सामना हुआ। उन दिनों… मैं सचमुच उसका कत्ल कर देना चाहती थी। हां… अपने उस पहले प्रेमी का…।

लगभग मरी हुई हालत में उन्होंने मुझे मेरे घर के नजदीक फेंक दिया। लेकिन मेरे दुख का अंत वहीं नहीं हुआ। मेरा परिवार मेरे साथ खड़ा था। मैंने यह सोच कर मुकदमा दायर किया कि ऐसा किसी और लड़की के साथ नहीं हो। मैंने सोचा कि मैं बिल्कुल सही कर रही हूं। लेकिन इसने मेरे पूरे भरोसे को तोड़ दिया। मेरे मामले की जांच के लिए जो टीम थी, वह मुझे लेकर राज्य भर में कई जगहों पर गई। उसने मुझे अनगिनत बार उस सब कुछ का ब्योरा पेश करने को कहा जो सबने मेरे साथ किया था। उन्होंने मुझे इस बात का अहसास कराया कि एक औरत होना आसान नहीं है, वह पीड़ित हो या किसी तरह जिंदा बच गई हो।

मेरे लिए यह राहत की बात है कि दिल्ली की उस लड़की की मौत हो गई। वरना उसे सभी जगह ठीक वैसे ही अश्लील सवालों से रूबरू होना पड़ता जो उसे उस खौफनाक रात को भुगतना पड़ा। इसकी वजह बताने के लिए उसे बार-बार मजबूर किया जाता। और अकेले बिना किसी दोस्त के वह अपनी ही छाया से डरती हुई जिंदगी का बाकी वक्त किसी तरह काटती।

मेरा भी कोई दोस्त नहीं। मेरे दफ्तर में कोई भी मुझसे बात नहीं करना चाहता। मेरे मां-बाप और कर्नाटक में नौकरी करने वाली मेरी बहन ही बस वे लोग हैं जो मेरी आवाज सुन पाते हैं। हां, कुछ वकील, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भी।

मैंने इन दिनों खूब पढ़ा है। फिलहाल केआर मीरा की एक किताब "आराचार" (द हैंगमैन) पढ़ रही हूं।

मेरे परिवार के अलावा कोई भी नहीं जानता कि मैं अपनी गिरती सेहत को लेकर डरी हुई हूं। लगातार सिर दर्द, जो उन चालीस दिनों की त्रासदी का एक हिस्सा है जब उन्होंने मेरे सिर पर लात से मारा था। मेरे डॉक्टर कहते हैं कि मुझे ज्यादा तनाव में नहीं रहना चाहिए। और मैं सोचती हूं कि सचमुच ऐसा कर पाना दिलचस्प है।

मेरा वजन नब्बे किलो हो चुका है। जब मैं अपनी नौकरी से नौ महीने के लिए मुअत्तल कर दी गई थी, उस दौरान मेरा ज्यादातर वक्त बिस्तर पर ही कटता था और इसी वजह से वजन भी बढ़ता गया। अब मैं कुछ व्यायाम कर रही हूं। पूरी तरह ठीक हो पाना एक सपना भर है। लेकिन कुछ प्रार्थनाएं मुझे जिंदा रखे हुए हैं।

भविष्य पर मेरा यह यकीन अब भी जिंदा है कि एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा। मैं हर सुबह और रात को प्रार्थना करती हूं। मैं नहीं पूछती कि फिर मुझे ही क्यों…! मैं उन दिनों भी उस पर भरोसा करती रही, जब मैं मुश्किल से अपनी आंखें खोल पाती थी या किसी तरह जिंदा थी। मैंने प्रार्थना की। मैं लैटिन चर्च से आती हूं जो कैथोलिक चर्च में सबसे बड़ा चर्च है। मगर पिछले सत्रह सालों से कहीं भी और किसी भी चर्च में मेरे लिए कोई प्रार्थना नहीं की गई। पवित्र मरियम को कोई गुलाब की माला अर्पित नहीं की गई और न ही कोई फरिश्ता अपने दयालु शब्दों के साथ मेरे दरवाजे पर आया।

लेकिन मेरा भरोसा टूटा नहीं है। इसने मुझे हफ्ते के सातों दिन चौबीसों घंटे चलने वाले टीवी चैनल देखने की ताकत बख्शी है, जहां कानून के रखवाले मुझे बाल-वेश्या बता रहे हैं, और कुछ मशहूर लोग इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि मेरे मुकदमा टिक नहीं पाएगा। यहां तक कि जब मैं दफ्तर में वित्तीय धोखाधड़ी के मामले में फंसाई गई हूं और मेरे माता-पिता बहुत बीमार चल रहे हैं, तब भी मैं खुद को समझाती हूं कि यह भी ठीक हो जाएगा… एक दिन..!!!