दिल्‍ली में महिला पत्रकार ने फांसी लगाकर आत्‍महत्‍या की

पूर्वी दिल्ली के शकरपुर में एक महिला पत्रकार ने फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली. पुलिस को कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है. महिला पत्रकार ने करीब एक वर्ष पहले ही एक व्यवसायी से प्रेम विवाह किया था. घटना शकरपुर थानांतर्गत गणेश नगर इलाके की है. पुलिस के अनुसार पत्रकार नेहा गुप्ता (30 वर्ष) अपने पति कपिल गुप्ता के साथ ए-74, गणेश नगर पार्ट-2, में रहती थी. करीब एक साल पहले नेहा ने कपड़ा कारोबारी कपिल गुप्ता से प्रेम विवाह किया था. कपिल का लक्ष्मी नगर में कपड़े का कारोबार है. नेहा एक न्यूज चैनल में पत्रकार थी.

पुलिस का कहना है कि बुधवार रात नेहा का शव उसके कमरे में पंखे के सहारे लटका मिला. पुलिस को घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ है. पुलिस को फिलहाल खुदकुशी के कारणों का पता नहीं लग सका है. पुलिस ने नेहा के पति को हिरासत में ले लिया है. नेहा का मायका इलाहाबाद में है और उसके पिता राम अवध त्रिपाठी को पुलिस ने सूचित कर दिया है. महिला पत्रकार के परिजनों के पहुंचने के बाद सारे मामले की जानकारी हो सकेगी. पुलिस ने शव को पीएम के लिए भेज दिया.

एनडीटीवी के पत्रकार को पीटने वाले विधायक अनंत सिंह के खिलाफ अरेस्‍ट वारंट

पटना। पटना की एक अदालत ने वर्ष 2007 में एनडीटीवी के तत्कालीन पत्रकार प्रकाश सिंह के साथ मारपीट के आरोप में मोकामा विधानसभा से जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) के बाहुबली विधायक अनंत सिंह समेत पांच अन्य के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने का निर्देश दिया है। न्यायिक दंडाधिकारी घनश्याम सिंह ने एक नवंबर 2007 को सचिवालय थाना क्षेत्र स्थित अनंत सिंह के आवास पर काजल हत्याकांड पर उनकी प्रतिक्रिया जानने पहुंचे एनडीटीवी के तत्कालीन पत्रकार प्रकाश सिंह के साथ मारपीट करने के मामले में यह आदेश दिया।

उन्होंने विधायक अनंत सिंह और उनके अन्य सहयोगी बिपिन सिंह, अमित कुमार, शिवशंकर और संजय कुमार के जमानती बांड आज खारिज करते हुए इन पांचों की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी किए जाने का निर्देश दिया। इस मामले में पुलिस ने 12 दिसंबर 2007 को अदालत के समक्ष आरोपपत्र पेश किया था। मामले के एक अन्य अभियुक्त मुकेश सिंह हैं जिनका जमानती बांड अदालत ने खारिज नहीं किया है। (भाषा)

नक्‍सलियों ने नहीं, टीन तस्‍करों ने की है पत्रकार नेमीचंद की हत्‍या!

जगदलपुर। बस्तर के सुकमा जिले में हुई पत्रकार नेमीचंद जैन की हत्या में अपना हाथ होने से नक्सलियों ने इनकार किया है. उन्‍होंने कूकानार व तोंगपाल क्षेत्र में पर्चा फेंककर कहा है कि इस हत्‍या में उनका हाथ नहीं है. पर्चा मिलने के बाद आशंका जताई जा रही है कि टीन तस्‍करों ने इस हत्‍या की घटना को अंजाम दिया है. पत्रकार की हत्‍या के बाद से इलाके में हड़कम्‍प है. डीजीपी रामनिवास ने इस मामले की जांच का जिम्मा सुकमा एसपी अभिषेक शांडिल्य को सौंपा है. उन्‍हें जांच जल्‍द से जल्‍द पूरी करके रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है.

गौरतलब है कि पत्रकार नेमीचंद की मंगलवार रात लेदा गांव के घुरवापारा चौराहे पर गला रेतकर हत्या कर दी गई थी. इस घटना में नक्‍सलियों का हाथ होने की आशंका पुलिस ने जताई थी. लेकिन नक्सलियों ने क्षेत्र में पर्चा फेंककर इस हत्‍या कांड में किसी भी तरह का हाथ होने से इनकार किया है, जिसके बाद अब जांच की दिशा बदल गई है. पुलिस नक्‍सलियों की बात को सच मान नही है क्‍योंकि नक्सली अपने द्वारा की गई किसी भी वारदात को खुलकर स्वीकार करते रहे हैं.

बताया जा रहा है कि जैन क्षेत्र में टिन की बढ़ती तस्करी के खिलाफ अक्‍सर अपनी कलम चलाते रहते थे. इसके चलते तस्‍करों का काम प्रभावित हो रहा था. बताया जा रहा है कि तस्‍कर उनसे नाराज रहते थे. इसलिए वे हमेशा टीन तस्‍करों के निशाने पर रहे. इसलिए पुलिस आशंका जता रही है कि इस घटना को अगर नक्‍सलियों ने अंजाम नहीं दिया है तो इसमें टीन तस्‍करों का हाथ हो सकता है. इसलिए जांच की दिशा अब इसी तरफ मुड़ गई है. पुलिस नेमीचंद के मोबाइल का कॉल डिटेल खंगाल रही है. पुलिस को भरोसा है कि कॉल डिटेल मिलने के बाद घटना को सुलझाने में मदद मिलेगी.

अमर उजाला से रिटायर हुए वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल

वरिष्‍ठ पत्रकार तथा अमर उजाला, मेरठ के संपादक रहे शंभूनाथ शुक्‍ला गुरुवार को रिटायर हो गए. उन्‍हें नोएडा स्थित कार्यालय में धूमधाम से विदाई दी गई. कुछ समय पहले ही प्रबंधन ने उन्‍हें मेरठ से नोएडा बुलाया था. वे पूरे साढ़े तीन दशक तक पत्रकारिता करते रहे और युवाओं के सामने हर रोज नई मिसाल पेश करते रहे. उन्‍होंने अपना करियर कानपुर में दैनिक जागरण से की. वे 19 साल तक जनसत्‍ता में कार्यरत रहे. चंडीगढ़ एवं कोलकाता के संपादक रहे. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद पिछले 11 सालों से अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे थे. उन्‍होंने अपने विदाई समारोह तथा जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को फेसबुक पर लोगों से शेयर किया है.

Shambhunath Shukla : आज जीवन के ५८ साल पूरे कर लिए। पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि हर समय कल से आज बेहतर रहा और आज से आने वाला कल। अतीत को ढोना गधे की तरह बोझ ढोना ही है। अतीत सिर्फ सबक लेने के लिए होता है। जिस घर और परिवार में पैदा हुआ वहां यह भरोसा तक नहीं था कि कल खाना भी बन पाएगा या नहीं। कहीं कोई सिफारिश नहीं, कहीं कोई कुछ बताने वाला नहीं। पूरे परिवार अथवा जानने वालों में कोई भी बड़ा आदमी नहीं। हर जगह लाइन लगाओ और नंबर आने पर पीछे धकेले जाओ। इसी माहौल ने लिखने और सोचने को विवश किया। अपनी हर पीड़ा को लिपिबद्ध किया और उससे सबक लिया। सीखने की इसी ललक के चलते मैं पत्रकार बन गया। पूरे ३५ साल तक अखबारों से जुड़ा रहा। शुरुआत कानपुर में दैनिक जागरण से की। तब वहां खुद नरेंद्र मोहन जी पत्रकारों की भर्तियां किया करते थे भले प्रशिक्षु के लिए हो या बड़े पदों के लिए। उन्होंने चयन किया और पूरे पांच साल वहां गुजारे। इसके बाद प्रभाष जी जनसत्ता में ले आए। १९ साल तक वहां रहा। जनसत्ता के कार्यकारी संपादक श्री ओम थानवी ने पहले चंडीगढ़ और फिर कोलकाता संस्करण का संपादक भी बनाया। इसके बाद के करीब ११ साल अमर उजाला में बिताए। यहां कानपुर, दिल्ली, लखनऊ के बाद मेरठ का संपादक रहा। आज वहां से अवकाश लिया तो विदाई समारोह में काफी भावुक हो गया। अमर उजाला में पहले स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी और उनके बाद मौजूदा प्रबंध निदेशक श्री राजुल माहेश्वरी से जो आत्मीयता और स्नेह मिला उन यादों ने मन भिगो दिया। खुद राजुल जी भी भावुक हो गए। अमर उजाला इसीलिए हिंदी पट्टी का सबसे सम्मानित और प्रतिष्ठित अखबार है क्योंकि वहां मालिक स्टाफ के लोगों का पूरा ख्याल रखते हैं।

एसबीआई ने कहा- सहारा की कंपनियों को कोई ऋण नहीं दिया

मुंबई : भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने गुरुवार को कहा कि सहारा समूह की कंपनियों को उसने कोई ऋण नहीं दे रखा है, बल्कि इन कंपनियों का 700-800 करोड़ रुपये एसबीआई के पास जमा है। सहारा समूह को ऋण आबंटन के बारे में पूछे जाने पर एसबीआई चेयरमैन प्रतीप चौधरी ने कहा, ‘मैं समझता हूं कि हमारी कुछ शाखाओं में उनकी (सहारा कंपनियों) जमाएं हैं। अगर इन्हें निकाला जाए तो ये करीब 700-800 करोड़ रुपये होंगी। लेकिन हमने उन्हें कोई ऋण नहीं दिया हुआ है।’

एसबीआई के एक अन्य अधिकारी ने कहा कि सहारा के खातों पर रोक लगाने के लिए सेबी या किसी अन्य प्रवर्तन एजेंसियों की ओर से उसके पास अभी तक कोई नोटिस या सर्कुलर नहीं आया है। उसने कहा, ‘यह (सेबी का नोटिस) आएगा। उन्हें नोटिस भेजने में दो-तीन दिन लगते हैं। जब यह आएगा हम कार्रवाई करेंगे।’ उल्लेखनीय है कि सेबी ने सहारा समूह की दो कंपनियों सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कारपोरेशन व सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कारपोरेशन तथा समूह के प्रमुख सुब्रत राय और तीन वरिष्ठ अधिकारियों के बैंक खातों पर रोक लगाने तथा परिसंपत्तियों को कुर्क करने का कल आदेश दिया। (एजेंसी)

sebi sahara

भद्दी टिप्‍पणी के बाद रवि व्‍यालार ने महिला पत्रकार से माफी मांगी

केन्द्रीय मंत्री व्यालार रवि द्वारा टीवी चैनल की एक महिला पत्रकार पर किए एक बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी ने तूल पकड़ लिया है। सुर्यनल्ली बलात्कार केस में फंसे राज्यसभा उपसभापति जे पी कुरियन पर सवाल पूछने पर रवि ने महिला के खिलाफ भद्दी भाषा का प्रयोग किया था। हालांकि भारी विरोध के बाद रवि ने महिला पत्रकार के खिलाफ अपशब्द का प्रयोग करने के लिए उससे तथा चैनल से माफी मांग ली है।

बकौल रवि, मुझे अपनी टिप्पणी के लिए खेद है। मैं अपनी टिप्पणी के लिए उस टीवी चैनल से पहले ही खेद जता चुका हूं जिसमें वह पत्रकार काम करती हैं। वहीं, भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष स्मृति ने महिला पत्रकार से भद्दी भाषा का उपयोग किए जाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए रवि से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा था। स्‍मृति ने कहा कि हम एक महिला पत्रकार के प्रति व्यलार के आचरण की भर्त्‍सना करते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए एक महिला पत्रकार को केवल इसलिए धमकाया, क्योंकि उसने अपने कार्य का निर्वहन करते हुए रवि से किसी मामले में सवाल किया।

उन्होंने आगे कहा कि रवि का आचरण गहरी चिंता की बात है। उन्होंने कहा कि मंत्री ने जब कैमरों के सामने महिला पत्रकार को डराया धमकाया है तो कैमरों की गैर मौजूदगी में उनका व्यवहार कैसा होता होगा। दरअसल, राज्यसभा के उप सभापति पी जे कुरियन के सेक्स स्कैंडल में नाम आने के सवाल पर व्यालार इतने बिफरे कि पत्रकार को यहां तक डाला कि क्या आपको कुरियन के खिलाफ कोई निजी परेशानी है? मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं कि ऐसा ही है। क्या आपके और कुरियन के बीच पूर्व में कभी कोई मामला हुआ है?

गौरतलब है कि पीजे कुरियन के खिलाफ सेक्स स्कैंडल का मामला इन दिनों सरगर्म है और कहा यहां तक जा रहा है कि इस मामले में उनकी कुर्सी तक जा सकती है। आरोप है कि राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर कुरियन ने मामले को रफा-दफा करा दिया था। बहरहाल, केरल में दिए गए इस बयान पर हंगामा बरपा है। वहां महिला पत्रकारों ने बाकायदा प्रदर्शन किया है और इस बारे में आगे की रणनीति के लिए बैठक भी हुई है।

बड़े नेताओं और यहां तक कि मंत्रियों की ओर से आपत्तिजनक बयान लगातार आ रहे हैं लेकिन परेशानी की बात ये है कि पार्टियां इनके खिलाफ शायद ही कभी कोई कार्रवाई करती। दबाव बढ़ता है तो खानापूरी के लिए पार्टी ऐसे बयानों को निजी बता देती है और नेता कह देता है कि उसके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। (पीएस)

समाचार प्लस राजस्थान की लॉन्चिंग जल्द, भर्ती शुरू

मीडिया जगत में बड़ी खबर है। उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड में रीजनल टीवी न्यूज़ चैनल के रूप में सफलता का परचम लहरा चुके ‘समाचार प्लस’ की लॉन्चिंग अब राजस्थान में होने जा रही है। “खबर वही जो हमने कही” की टैग लाइन के साथ शुरू हुए समाचार प्लस ने जनसरोकार से जुड़ी खबरों को हमेशा प्राथमिकता दी है और सच कहने की हिम्मत के साथ निरंतर बेलगाम होती नौकरशाही और गैर जवाबदेह बनते जा रहे राजनेताओं से सवाल पूछकर, उनके कारनामों को उजागर करके अपने आपको जनता के प्रवक्ता के रूप में पेश किया है।

उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड में जनता की आवाज बन चुके समाचार प्लस का आगाज अब राजस्थान में होने जा रहा है। चैनल के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार अतिशीघ्र समाचार प्लस राजस्थान की लॉन्चिंग प्रस्तावित है। चैनल के नोएडा सेक्टर-63 स्थित मुख्यालय में राजस्थान चैनल के लिए सभी तैयारियां लगभग पूरी कर ली गयी हैं। अब वहां भर्ती प्रक्रिया भी शुरू हो गयी है। राजस्थान के सभी जिलों में संवाददाताओं के अलावा ऐंकर, प्रोड्यूसर, एसोसिएट प्रोड्यूसर, असिस्टेंट प्रोड्यूसर, पैनल प्रोड्यूसर, वीडियो एडिटर, ग्राफिक्स, ट्रेनी आदि पदों पर भर्ती शुरू हो गयी है। चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ उमेश कुमार खुद सारी तैयारियों पर नजर रखे हुए हैं। अगर आप समाचार प्लस राजस्थान से जुड़ना चाहते हैं तो अपना बायोडाटा samacharplusraj@gmail.com पर ई-मेल करें। (प्रेस रिलीज)  

इंडिया टीवी से लंबी बढ़त के साथ छठे सप्‍ताह भी आजतक नम्‍बर एक

: सहारा को पछाड़ कर टॉप टेन में पहुंचा डीडी न्‍यूज : टैम ने छठवें सप्‍ताह की टीआरपी जारी कर दी है. इस सप्‍ताह नंबरिंग में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है. पर आजतक इस सप्‍ताह नम्‍बर वन होने के साथ इंडिया टीवी को बहुत ज्‍यादा पीछे छोड़ दिया है. इंडिया टीवी को इस सप्‍ताह 1.2 रेटिंग प्‍वाइंट का नुकसान हुआ है. इसके बाद भी ये चैनल दूसरे पायदान पर बना हुआ है. हालांकि एबीपी न्‍यूज इस चैनल के नजदीक पहुंच गया है. जी न्‍यूज इस बार भी चौथे पायदान पर काबिज है.

इसके बाद क्रमश: न्‍यूज24, आईबीएन7 एनडीटीवी इंडिया, पी7 न्‍यूज एवं तेज का नम्‍बर है. इस बार डीडी ने समय को पछाड़ते हुए टॉप टेन में अपना कब्‍जा जमा लिया है. बाकी सभी चैनल लगभग अपने पिछले ही पायदान पर खड़े हैं. ये सभी आंकड़े टीजी सीएस 15 प्‍लस श्रेणी के हैं. नीचे चैनलों की टीआरपी रेटिंग.
 
टीजी- सीएस 15प्लस
 
आजतक – 21.3,  इंडिया टीवी – 16.0, एबीपी न्यूज़ – 14.6, ज़ी न्यूज़ – 12.3,  न्यूज़ 24 – 7.9, आईबीएन7 – 7.4, एनडीटीवी इंडिया – 6.5, पी7 न्‍यूज – 4.2, तेज – 3.2, डीडी न्यूज़ – 3.0, समय – 2.1, लाइव इंडिया- 1.4

5 मार्च को सम्मानित होंगे ‘सद्भावना दर्पण’ के संपादक गिरीश पंकज

भोपाल। साहित्यिक पत्रिका ‘सद्भावना दर्पण’ के संपादक गिरीश पंकज को पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से 5 मार्च, 2013 को सम्मानित किया जाएगा। भोपाल के रवींद्र भवन में सायं 4 बजे आयोजित इस समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार विजयबहादुर सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्ववविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर, छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष श्यामलाल चतुर्वेदी (बिलासपुर), वरिष्ठ पत्रकार डा. हिमांशु द्विवेदी (रायपुर) मौजूद होंगे।

मीडिया विमर्श पत्रिका द्वारा प्रतिवर्ष साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले संपादकों को यह सम्मान प्रदान किया जाता है। इसके पूर्व यह सम्मान वीणा (इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज (गोरखपुर) के संपादक डा. विश्वनाथप्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण और अक्सर (जयपुर) के संपादक हेतु भारद्वाज को दिया जा चुका है। मीडिया विमर्श के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने यह जानकारी देते हुए बताया कि सम्मान के तहत ग्यारह हजार रुपए, शाल- श्रीफल, प्रतीक चिन्ह एवं मानपत्र देकर सम्मानित किया जाता है। इस सम्मान के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव, रमेश नैयर, डा. सुभद्रा राठौर, जयप्रकाश मानस एवं डा. श्रीकांत सिंह शामिल हैं। उन्होंने बताया कि सद्भावना दर्पण विगत 16 सालों से रायपुर से निरंतर प्रकाशित एक ऐसी पत्रिका है, जिसने विविध भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद प्रकाशित कर भाषाई सद्भभावना को स्थापित करने में उल्लेखनीय योगदान किया है।

गूंजेगा कबीर और सूफी राग : इस मौके पर पद्मश्री से अलंकृत छत्तीसगढ़ के जाने माने लोकगायक स्वामी जीसीडी भारती (भारती बंधु) कबीर और सूफी गायन प्रस्तुत करेंगे। श्री भारती बंधु को इसी साल पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा भारत सरकार ने की है। इस सत्र के मुख्य अतिथि पूर्व सांसद कैलाशनारायण सारंग होंगे।

भड़ास4मीडिया फिर टॉप पर, अंग्रेजी की दिग्गज वेबसाइटों को भी पछाड़ा

अपने जन्म के समय से ही देश के मीडिया जगत में हलचल मचाने वाली वेबसाइट भड़ास4मीडिया डाट काम bhadas4media.com ने एक बार फिर हिंदी-अंग्रेजी सभी मीडिया वेबसाइटों में नंबर वन की पदवी हासिल कर ली है. किसी भी हिंदी मीडिया वेबसाइट का भड़ास से कभी मुकाबला नहीं रहा. भड़ास बाकियों से कई गुना आगे रहा है और है. अंग्रेजी की कई स्थापित वेबसाइटों को पहले भी भड़ास ने पछाड़ा और फिर पछाड़ कर नंबर वन मीडिया वेबसाइट का स्थान हासिल कर लिया.

वेबसाइटों की रैंकिंग की आंकलन करने वाले एलेक्सा के आंकड़ों पर गौर करें तो भड़ास4मीडिया इस समय दुनिया भर की वेबसाइटों में पैंतीस हजार की पोजीशन पर है. अंग्रेजी की मीडिया वेबसाइट छत्तीस हजार से लेकर पचास हजार और एक लाख तक की पोजीशन पर हैं. हिंदी की मीडिया वेबसाइट एक लाख से ज्यादा से लेकर दो लाख और तीन लाख तक पर हैं. इस तरह भड़ास सबसे उपर है. जो वेबसाइट जितनी पापुलर होती है और जितनी ज्यादा देखी-पढ़ी व क्लिक की जाती है, उसकी रैंकिंग उतनी ही निखरती जाती है.

भड़ास के जरिए आम मीडियाकर्मी के दुख-दर्द को प्रकाशित करने और मीडिया हाउसों के घपलों-घोटालों का भंडाफोड़ करने के कारण कुछ मीडिया हाउसों ने साजिश रचकर पहले मुझे और फिर बाद में कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को गिरफ्तार कराया और जेल भिजवा दिया था. उन ढाई-तीन महीनों के दौरान भड़ास कुछ एक दिन के लिए बंद भी हुआ. कंटेंट अपडेशन का काम बुरी तरह बाधित हुआ. मीडिया हाउसों का मकसद किसी तरह भड़ास को बंद कराना था, इसलिए इसके संचालकों को प्रताड़ित कराया गया और जेल में लंबे समय तक रखवाया गया. उन दिनों भड़ास की रैंकिंग काफी नीचे गिरी. सत्तर पचहत्तर हजार के आसपास भड़ास की रैंकिंग गिरकर पहुंच गई थी. लेकिन जेल से छूटने के बाद अनिल और मैंने फिर से वही तेवर बरकरार रखा और मीडिया जगत को बता दिया कि बाजार के इस दौर में बिकाऊ लोगों की भीड़ के बीच कुछ ऐसी भी मिट्टी के बने होते हैं जो मुश्किलों से घबराने व टूटने की जगह ज्यादा निखरते हैं और दुगुने उत्साह के साथ अपने मिशन पर जुट जाते हैं.

कंटेंट इज किंग का नारा मीडिया का रहा है लेकिन दुर्भाग्य से मीडिया ही मार्केट इज किंग का अघोषित नारा अपनाकर कंटेंट को बेच खाने पर आमादा है. ऐसे दौर में सरोकारी पत्रकारिता की पताका फहराते हुए अनिल और मैंने हजारों मीडियाकर्मियों और शुभचिंतकों के दम पर भड़ास का झंडा बुलंद किए रखा और ऐसी ऐसी खबरों का प्रकाशन किया जिसका मीडिया हाउसों के अंदरखाने से बाहर आना असंभव था. इन खबरों के जरिए पूरे देश को भड़ास ने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र के बाकी स्तंभों जितना ही भ्रष्ट और अनैतिक है चौथा स्तंभ. मीडिया को पवित्र गाय मानने वालों की आंखें खोलने का काम भड़ास ने किया और न्यू मीडिया के आंदोलन को आगे बढ़ाया ताकि असली खबरें कारपोरेट व लुटेरों के हाथों में दम घोटने की बजाय ब्लागों, वेबसाइटों, सोशल मीडिया माध्यमों, मोबाइल आदि के जरिए जन-जन तक पहुंचे.

बाजारवाद के इस दौर में भड़ास ने अपने खर्चे व संसाधन के लिए किसी कारपोरेट के हाथों बिकने की बजाय आम मीडियाकर्मियों के बीच जाना पसंद किया और सौ रुपये से लेकर हजार रुपये, पांच हजार रुपये तक के चंदे इकट्ठे किए. कई शुभचिंतकों के दम पर जिन्होंने यदा-कदा लाख-दो लाख रुपये भी भड़ास को दिए, भड़ास की गाड़ी सरपट दौड़ती रही. निजी जिंदगी में तमाम दुखों और मुश्किलों के बावजूद मेरी और अनिल की जोड़ी ने भड़ास के आगे दुख नहीं आने दिया. रात-दिन, सोते-जागते भड़ास के साथ खुद को जोड़े रखा और पीआर जर्नलिज्म में तब्दील हो चुकी आज की पत्रकारिता को आइना दिखाते हुए ऐसी खबरों को साहस के साथ प्रकाशित किया जिसे मुख्यधारा की मीडिया ने दबा-छिपा रखा था. भड़ास की लोकप्रियता और तेवर का ही कमाल है कि आज यह वेबसाइट ढेर सारे कारपोरेट मीडिया हाउसों में प्रतिबंधित है. जैसे आलोचना से शख्सियत संवरती है, वैसे ही पाबंदी से उत्सुकता बढ़ती है, सो पाठक भी बढ़ते हैं. इसी कारण भड़ास दिनोंदिन लोकप्रिय होता गया.

वेबसाइटों की रैंकिंग का आंकलन करने वाले एलेक्सा के जरिए जो ताजा आंकड़े मिले हैं, वे बताते हैं कि भड़ास इन दिनों अपने चरम पर है. इसके आसपास कोई मीडिया वेबसाइट नहीं है. पीआर करने वाली अंग्रेजी वेबसाइटों, मीडिया मालिकों का गुणगान करने वाली अंग्रेजी वेबसाइटों, मार्केटिंग वालों की जय जय करने वाली और कंटेंट वालों की उपेक्षा करने वाली अंग्रेजी वेबसाइटों के पाठक बहुत तेजी से टूट रहे हैं और वे सभी भड़ास से जुड़ रहे हैं. इससे वाकई साबित होता है कि सच्चा और ओरीजनल कंटेंट ही किंग होता है, मुखौटों का वक्त ज्यादा लंबा नहीं होता.

जहां तक हिंदी मीडिया वेबसाइटों की बात है तो इसमें ज्यादातर निजी प्रयासों द्वारा कुछ पत्रकार साथियों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं. इन प्रयासों का जारी रहना और ऐसे प्रयासों का बढ़ना बेहद जरूरी है क्योंकि अगर भ्रष्ट सत्ता व लुटेरी कारपोरेट मीडिया ने मिलकर कभी भड़ास को नष्ट किया तो दूसरे मौजूद माध्यमों को आगे आने होगा और प्रखर पत्रकारिता की चुनौती को आगे बढ़ाना होगा. लेकिन उन वेबसाइटों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए और निंदा करनी चाहिए जो कारपोरेट जगह की शह पर संचालित है और इनका काम सिर्फ मीडिया हाउसों के मैनेजमेंट का गुणगान छापना होता है. वे अपना कर्तव्य मालिक या उनके गुलाम संपादक को फोन मिलाने और उनके मुखारबिंदु से टपके अनमोल शाश्वत वचन को छाप देना मानते हैं . उनके यहां आम मीडियाकर्मियों का दुख-दर्द, मीडिया में शोषण, मीडिया हाउसों की कुत्सित नीतियों के बारे में कुछ प्रकाशित नहीं होता. पर, बात वही है कि ये बाजार है, यहां हर तरह का माल हर समय उपलब्ध रहेगा. ऐसे में दायित्व ग्राहक का है कि वह अपने बौद्धिकता व चेतना के जरिए आकलन करे कि किसकी पालिटिक्स क्या है.

भड़ास की राजनीति बहुत साफ रही है, विजन स्पष्ट रहा है, शुरू से. बड़े मीडिया हाउसों, जिनका प्रसार व प्रसारण बहुत दूर दूर तक है, से कोई समझौता नहीं. उनके प्रति सख्त आलोचक का भाव भड़ास का हमेशा बना रहेगा. छोटे और नए मीडिया हाउसों को प्रोत्साहन देने का कार्य भड़ास हमेशा करता रहेगा ताकि मीडिया में एकाधिकार के खतरे को कम किया जा सके. इसी कारण भड़ास नई वेबसाइटों, छोटी मैग्जीनों, छोटे प्रयासों से शुरू हो रहे अखबारों आदि की खबरें प्रकाशित करता रहता है. हम आगे भी यही नीति अपनाएंगे.

हां, बस आपसे एक शिकायत जरूर रहेगी कि भड़ास को जिस तरह की मदद आप पाठकों से मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल रही. अगर चार सौ लोगों ने हजार-हजार रुपये रंगदारी या सब्सक्रिप्शन या चंदा या आर्थिक सपोर्ट के रूप में भड़ास को दे दिए तो यह पर्याप्त नहीं है. भड़ास का बहुत बड़ा पाठक वर्ग है. भड़ास आम मीडियाकर्मियों का पोर्टल है. इसलिए आप चाहें जैसे भी हों, जहां भी हों, जिस स्थिति में भी हों, आपको भड़ास के लिए एक छोटा सा हिस्सा अलग निकाल कर रखना चाहिए. अगर यह जिम्मेदारी आप नहीं निभाएंगे तो इसका असर भड़ास की सेहत पर पड़ेगा.

आप सभी ने देखा ही है कि किस तरह उधार मांगने के मुद्दे को रंगदारी से कनेक्ट कर दिया गया और लंबी चौड़ी फर्जी कहानी बनाकर हम लोगों को जेल भिजवाया गया. मुश्किल पड़ने पर पहले भी हम लोग उधार लेते रहे हैं और अब भी लेते हैं. लेकिन कल को अगर फिर कोई साथी उधार मांगने को रंगदारी मांगना बता दे तो इसे सिर्फ यही समझा जाना चाहिए कि भड़ास व इससे जुड़े लोगों को फंसाने के लिए किस स्तर की व्यूह रचना होने लगी है. इसलिए हम लोग अब निजी तौर पर उधार मांगने और लूज टॉक करने से भी बचने लगे हैं.

अगर भड़ास टीम आत्मिक रूप से भ्रष्ट व अनैतिक होती तो एक तो भड़ास शुरू ही नहीं होता, शुरू होता तो साल-दो साल में धमकियों-मुकदमों से बंद हो गया होता, या फिर अब जेल से लौटने के बाद भड़ास का संचालन हर हाल में बंद हो चुका होता. लेकिन ईमानदारी और संघर्ष के रास्ते तैयार हुए भड़ास को संचालित करने के लिए कभी भी अनैतिक समझौतों में हम लोग नहीं गए. भड़ास शुरू करते वक्त से ही पता था कि हम लोग किससे पंगा लेने जा रहे हैं और इसका अंजाम क्या क्या हो सकता है. इसी कारण पैसे के मामले में कभी भी भड़ास टीम ने अनैतिक रास्ता नहीं अपनाया, किसी भी प्रकार के प्रलोभन को पास फटकने नहीं दिया. कई तरह के आफरों को ठुकराया. जरूरत पड़ने पर इनसे उनसे उधार लेकर हम लोगों ने काम चलाया और ढेरों शुभचिंतक आम पत्रकार से लेकर संपादक स्तर तक के लोगों ने आर्थिक मदद दी. भड़ास के पास ढेरों ऐसे दुर्दिन झेल रहे पत्रकार आए जिन्हें कुछ पैसों की सख्त जरूरत थी, और भड़ास ने इन लोगों को बिना किसी प्रचार के चुपचाप आर्थिक मदद दी, बिना इस उम्मीद के कि वो लौटाएंगे या नहीं.

आखिर में सौ बात की एक बात, वो ये कि अगर जुबां में सच बोलने की ताकत है, कलम में सच लिखने की औकात है, दिल में नैतिक साहस है, दिमाग में भरपूर विचार हैं, विजन में प्रकृति और आम आदमी से प्यार है, आत्मा में अपने को लेकर ईमानदार किस्म का अहंकार और शरीर में रीढ़ सीधी है तो आपको अपना रास्ता बनाने से कोई नहीं रोक सकता. गिरते, पढ़ते, लड़ते, रोते, सीखते आप एक मशाल जला लेंगे जो ढेरों साथियों की राह को रोशनी से प्रशस्त कर देगी.

पैसे, सपोर्ट, संसाधन ये सब बहुत छोटी चीज है और जब आप शुरुआत करते हैं तो इनका बहुत मतलब भी नहीं होता. भड़ास की शुरुआत पहले एक ब्लाग के रूप में हुई और बाद में इसे तीस हजार रुपये में एक लैपटाप, डोमेन नेम, वेब टेंप्लेट, शेयर्ड सर्वर के जरिए भड़ास4मीडिया डाट काम के रूप में शुरू किया गया. अगर पैसा, सपोर्ट और संसाधन बड़ी बात होती तो आज ढेरों ऐसे लोग हैं जिनके पास यह सब कुछ है लेकिन उनका इस समाज, क्षेत्र, देश, दुनिया में कोई नामलेवा नहीं, उनका कहीं कोई योगदान नहीं, उनका कहीं कोई पाजिटिव काम नहीं. उनकी दुनिया सिर्फ खाने-पीने-हगने-मूतने-नाचने-सोने तक सीमित है.

हम देसज लोग, गंवई बैकग्राउंड के लोग, दुखों से भरपूर इश्क लड़ा चुके लोग, बड़े लोगों के दोगलापन से बेजार रह चुके लोग असल में कर्मठ होने के साथ-साथ धैर्यवान भी होते हैं. और, हम लोगों ने आम जन के बीच जीवन जिया होता है, सो आम जनता पर हम लोगों का पूरा भरोसा होता है. लोकतंत्र और इससे संबद्ध स्तंभों के होने का मकसद गांव-समाज-शहर के उस आखिरी आदमी की भलाई है, बेहतरी है, जिसे लोकतंत्र का ककहरा भी नहीं पता. इस कारण हमारे आप पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि हम कुछ ऐसा जरूर करें ताकि उस आम आदमी के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह कर लें जिसे हम हर रोज मुश्किलों में, संकटों में, दुखियारी हालात में देखते-पाते हैं. ऐसा जो कर पाएगा वही मीडिया वाला कहलाएगा वरना दलालों और दरबारियों के चंगुल में आ चुकी इस लोकतांत्रिक मंडी में मीडिया व मीडियावाले अब रंडी से ज्यादा कुछ नहीं हैं.

देर-सबरे, मशालें कई होंगी और एक सामूहिक रोशनी का उदगार होगा, यह भरोसा है. लक्षण दिखने लगे हैं. रास्ता बनने लगा है. बस, हम सबको अपने-अपने हिस्से की दौड़ लगानी है. तकनीक और चेतना के उन्नत होते जाने ने राह-काम आसान कर दिया है. लोगों में सच के प्रति, पारदर्शिता के प्रति, ईमानदारी के प्रति, लोकतांत्रिक होने के प्रति ललक बढ़ी है. इसे हम मीडिया वाले साथियों को और ज्यादा बढ़ाना है, उत्प्रेरित करना है, एक्सीलरेट करना है, गतिमान बनाना है. तभी हम अपने समय के मीडिया के सच्चे सिपाही और असली सारथी कहलाएंगे.

जय भड़ास

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

09999330099


Yashwant Singh Jail

सहारा को कोई सहारा नहीं मिलने वाला, सेबी आर्डर सहारा का डेड इंड : संदीप पारेख

वित्तीय मामलों के कानूनी विशेषज्ञ संदीप पारेख का एक इंटरव्यू सीएनबीसी-टीवी18 चैनल पर प्रसारित किया गया. मुद्दा था सेबी का आदेश और सहारा का भविष्य. संदीप पारेख ने साफ-साफ कहा कि उन्हें नहीं लगता कि अब सहारा समूह को कहीं से किसी तरह का कोई सहारा मिल पाएगा. उन्होंने सेबी के आदेश को सहारा का डेड इंड करार दिया. पूरी बातचीत इस तरह है…

SEBI order dead end for Sahara: Sandeep Parekh

Market regulator Securities and Exchange Board of India (SEBI) on Wednesday ordered freezing of bank accounts and attachment of all properties of two Sahara group firms and top executives, including Subrata Roy. This severe step against Sahara has been taken in the wake of the high-profile investor refund case involving over Rs 24,000 crore. According to Sandeep Parekh, (founder, Finsec Law Advisors) SEBI’s order is the dead end for Sahara and he sees no further relief for the group.

"SEBI's action is based out of a Supreme Court (SC) order which says that SEBI is supposed to attach bank accounts, properties, whatever is available. Beyond the Supreme Court there is only god to pray. SEBI order has kind of shown the mirror,” he told CNBC-TV18.

"Sahara is left with two alternatives now: 1) to attach properties, which they have in the Indian sub-continent 2) contempt of court. As last resort, Sahara can ask for time extension from the Supreme Court," he said.

Below is the verbatim transcript of his interview to CNBC-TV18

Q: SEBI has said that it has directed the freezing of bank accounts, of attaching properties of even attaching special purpose vehicle (SPVs). What do you make of this and were you surprised at all by this order?

A: I am surprised Sahara counsel has not seen the order. It is not based on some website, it’s a signed order. It is quite a bizarre assertion to say that. Just because something is upon a website it is not enforceable. If one goes by that logic all Supreme Court orders that one sees them on the website would have been not enforceable.

Q: You are categorically saying then that these properties and bank accounts have indeed been attached and have been frozen if one were to read the order that has been put up by SEBI?

A: Absolutely. No second opinion on that. It is based out of a Supreme Court order which says that SEBI is supposed to attach bank accounts, properties and whatever is available.

Beyond the Supreme Court there is only god to pray to. I don’t see any kind of further relief which can be available to Sahara. Its kind of dead end for them and the SEBI order has just shown the mirror. One cannott say that the mirror is causing me to be ugly.

Q: Are you surprised that the market regulator has gone after Sahara Group companies?

A: The prime factor is that the money has not been restricted to the two companies? They have gone to 100s of entities. One can trace and freeze that money and that’s what the Supreme Court order seems to suggest. I don’t think we can interpret a way outside the Supreme Court order.

Q: What kind of legal recourse do you believe is available now to Sahara post the SEBI order?

A: I would say two recourses, one is for SEBI to do all this work which they have done today. That is attach properties etc, whatever is in the domain of Indian sub-continent. I am sure SEBI can’t go to New York and attach properties.

The other option is contempt of court. These two are going parallel. I am not sure where they are going to land up.

Q: What can Sahara do in this situation because the SEBI order is fairly clear and we have seen what has happened in Supreme Court with the Supreme Court order. So, where does Sahara go, what can Sahara do now?

A: I think they can pray because beyond the Supreme Court there is not much in this country. They can apply to Supreme Court for extension of time but beyond that I don’t see much relief which is going to be available to them.


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सहारा का रीयल इस्टेट का धंधा चौपट होगा

सहारा समूह की लिस्टेड कंपनियों के भाव गिरे

सेबी के आर्डर पर सहारा की प्रतिक्रिया

सुब्रत राय के अलावा वंदना, रवि शंकर और अशोक के भी एकाउंट सीज, संपत्ति कुर्क होगी

सुब्रत राय की चल-अचल संपत्ति जब्त करने के निर्देश

सहारा समूह के सौ से ज्यादा बैंक एकाउंट और संपत्ति फ्रीज, सेबी ने की कार्रवाई


sebi sahara

एकाउंट और संपत्ति फ्रीज करने के सेबी के आर्डर पर ये है सहारा की प्रतिक्रिया

कल सेबी ने सहारा समूह की दो कंपनियों और सुब्रत राय समेत चार पदाधिकारियों के एकाउंट व संपत्ति फ्रीज करने के जो आदेश दिए, उस पर सहारा समूह ने अपनी लिखित प्रतिक्रिया भेजी है. पूरी प्रतिक्रिया यूं है…

As per Sahara, the total liability is not likely to exceed Rs. 5120 Crores, which amount has already been deposited with SEBI. As regards the instalments to be deposited with SEBI as per the order of the Hon'ble Supreme Court, Sahara has filed Interim Application before the Hon'ble Supreme Court interalia praying that Sahara be permitted to furnish security through a credible financial institution instead and in place of the payment of the balance instalments, since Sahara has already redeemed significant number of OFCD Holders and any further payments to SEBI would amount to double payment. The said Interim Application is pending and is likely to come up next week.

Further, today's order of SEBI for attachment of the assets is based on old facts and details of assets as of January, 2012. Since, then facts have changed in view of redemptions made by Sahara from time to time. This fact of redemption was known to SEBI. Hence, today's order does not take into account the changed facts and circumstances.

As per the order of the Hon'ble Supreme Court, the liability to refund the monies is of SIRECL and SHICL. Hence, attachment, of assets of the individuals by SEBI is incorrect. Whereas not only company has paid to SEBI enough amount which is much higher than outstanding liabilities of two companies, the fact also remains in the whole affair Sahara is genuinely concerned for investors. There are number of companies in India including Golden Forest Company where after Hon'ble Supreme Court's order to repay and the committee appointed (whose chairman was retired Chief justice of Delhi High Court) to repay was paid. But from 2004 till now, not a single investor has got back one rupee.


sebi sahara

सेबी के आदेश के बाद सहारा समूह की लिस्टेड कंपनियों के भाव गिरे

सेबी ने कल सहारा समूह की संपत्ति व एकाउंट फ्रीज करने के आदेश दिए और अगले ही दिन सहारा की लिस्टेड कंपनियों के शेयर धड़ाम से गिर गए. रायटर की खबर के मुताबिक सहारा समूह की दो कंपनी लिस्टेड हैं. इनका नाम है- सहारा हाउसिंग फिना कार्प और सहारा वन मीडिया एंड एंटरटेनमेंट लिमिटेड. सेबी के आदेश का असर सीधे तौर पर इन दोनों कंपनियों पर तो नहीं पड़ रहा है लेकिन लिस्टेड होने के कारण इनके शेयर नीचे गिर गए हैं. ऐसा बाजार में सहारा की प्रतिष्ठा धूमिल होने के कारण है. पूरी खबर इस तरह है…

Sahara Group's listed companies drop on SEBI order

Reuters Market Eye – Shares in Sahara Housingfina Corp (SAHR.BO) and Sahara One Media and Entertainment Ltd (SAHM.BO) slump after the SEBI ordered a freeze on the assets and bank accounts of two other companies belonging to Sahara Group.

Although Sahara Housingfina and Sahara One Media were not directly impacted by the order from the Securities and Exchange Board of India (SEBI) late on Wednesday, the two are the only listed companies of Sahara Group.

SEBI on Wednesday ordered the freeze of assets on Sahara India Real Estate Corp Ltd and Sahara Housing Investment Corp Ltd, saying they failed to heed a Supreme Court order to repay billions of dollars they had collected in outlawed bonds. * SEBI also ordered a freeze on all properties and bank accounts held in the name of Sahara Group's founder Subrata Roy.

Sahara Housingfina shares ended down 7.1 percent having fallen as much as 19 percent earlier. Sahara One ended up 0.4 percent after falling as much as 4.8 percent.

साभार- रायटर

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सहारा का देश भर में फैला रीयल इस्टेट का धंधा चौपट होगा

इंडियन एक्सप्रेस की वेबसाइट पर खबर है कि सेबी द्वारा सहारा की दो कंपनियों और कई लोगों के एकाउंट व संपत्ति फ्रीज किए जाने के बाद सहारा का पूरे देश भर में फैला रीयल इस्टेट का धंधा चौपट हो जाएगा. पूरी रिपोर्ट इस प्रकार है…

Sahara Group order could freeze real estate projects across India

Mumbai : The action by the Securities and Exchange Board of India (Sebi) against the Sahara group of companies brings a large number of real estate projects under the freeze.

The Sebi order is based on an affidavit filed on behalf of Sahara India Real Estate Corporation and Sahara Housing Investment Corporation to the Supreme Court where they had given details of the investment made from the monies generated through debentures.

Other than freezing the Aamby Valley development project spread over 707 acres, it also brings in its sweep 186 acres in Gurgaon. The order by Sebi's whole-time member Prashant Saran says, "The development rights are held by various Sahara group entities and purchased for a consideration of Rs 1,436 crore."

It also attaches between 90 to 95 per cent stake in a swathe of 64 projects in 64 towns across India, mostly under the name Sahara City Homes. The development rights in these projects were purchased by various Sahara companies for Rs 1,105 crore the order points out.

The Sebi order seeks attachment of all other movable and immoveable properties owned or held by the two companies with immediate effect. It has asked them not to "alienate, dispose or in any manner encumber the same".

The Sahara group has contested the regulator's order. In an email statement to The Indian Express, it notes "The total liability is not likely to exceed Rs 5,120 crore, which amount has already been deposited with Sebi. As regards the instalments to be deposited with Sebi as per the order of the Hon'ble Supreme Court, Sahara has filed interim application before the…. court interalia praying that Sahara be permitted to furnish security through a credible financial institution instead and in place of the payment of the balance instalments, since Sahara has already redeemed significant number of (debenture holders) and any further payments to Sebi would amount to double payment. The said interim application is pending and is likely to come up next week."

The apex court in August last year had asked Sahara group firms to refund the money with 15 per cent interest and had asked Sebi to facilitate the refund. However, the group in December 2012 was allowed to pay the money in three instalments, including an immediate payment of Rs 5,120 crore.

साभार- इंडियन एक्सप्रेस

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अमर उजाला के वरिष्‍ठ पत्रकार गोकुल पटेल का निधन

इलाहाबाद। करीब दो दशक से सक्रिय पत्रकारिता करने वाले अमर उजाला के पत्रकार गोकुल पटेल का निधन हो गया। वे 55 वर्ष के थे तथा पिछले कई साल से बीमार चल रहे थे। उन्‍हें ब्रेन ट्यूमर की बीमारी थी। 14 फरवरी को सुबह अचानक हालत बिगड़ने लगी। स्थानीय डॉक्टरों की सलाह पर परिजन उन्हें लखनऊ पीजीआई इलाज के लिए ले जा रहे थे। रायबरेली पहुंचते ही रास्ते में दोपहर साढ़े ग्यारह बजे उन्होंने दम तोड़ दिया।

स्वभाव से काफी विनम्र और मिलनसार गोकुल पटेल चहेतों के बीच गोकुल भाई के नाम से लोकप्रिय थे। दैनिक आज से पत्रकारिता शुरू करने वाले गोकुल भाई समय के साथ ही अपडेट होते रहे। इलाहाबाद से जनमोर्चा निकलने के बाद उन्होंने सोरांव से पत्रकारिता का मोर्चा संभाला। अमर उजाला का प्रकाशन इलाहाबाद से शुरू होने के बाद वे अमर उजाला के लिए सक्रिय तरीके से कार्य कर रहे थे। उनके निधन ने पत्रकारों को शोकाकुल कर दिया।

14 फरवरी की शाम करीब पांच बजे उनका अंतिम संस्कार फाफामऊ गंगातट पर किया गया। कई पत्रकार साथियों ने उन्हें नम आंखों से आखिरी विदाई दी। अशोक कुशवाहा की अध्यक्षता में पत्रकारों की श्रृद्धांजलि सभा हुई। सभा में राकेश शुक्ला, सुरेंद्र प्रताप नारायण पांडेय, राजीव ओझा, एसएस पांडेय, नागेश तिवारी, जियालाल गौतम, आदर्श तिवारी, हनुमान शुक्ला, रिजवान उल्ला, शिवकुमार पांडेय, शिवकुमार मौर्य, प्रदीप यादव समेत तमाम पत्रकार साथी मौजूद रहे।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

न्‍यूज नेशन में न्‍यूज हेड बने अजय कुमार

आजतक से पिछले दिनों इस्‍तीफा देने वाले एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर अजय कुमार ने अल्‍फा समूह का चैनल न्‍यूज नेशन ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें यहां पर न्‍यूज हेड बनाया गया है. अजय कुमार आजतक में पांच साल के कार्यकाल के बाद इस्‍तीफा दे दिया था. उनसे पहले अभिसार शर्मा भी आजतक से इस्‍तीफा देकर जी न्‍यूज पहुंच गए थे. चैनल के ऑन ए‍यर होने पर अजय कुमार ने ही पहला बुलेटिन पढ़कर इसकी शुरुआत की.  

अजय कुमार पिछले पांच सालों से आजतक से जुड़े हुए थे. वे दो पारी में आजतक को अपनी सेवा दे चुके हैं. प्रिंट मीडिया से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अजय कुमार पहली बार 1995 में आजतक ज्‍वाइन किया था. 2002 में यहां से इस्‍तीफा देने के बाद स्‍टार न्‍यूज चले गए. पांच साल यहां पर काम करने के बाद 2007 में वापस आजतक आ गए थे. तब से आजतक को ही अपनी सेवाएं दे रहे थे.

गाजीपुर स्थित दूसरा ताजमहल देता है पवित्र प्रेम की प्रेरणा

प्रेम का इतिहास लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, हीर-रांझा जैसे बेशुमार प्रमियों की अनूठी प्रेम दास्तां से भरा पड़ा है। इन अनूठी प्रेम कहानियों में मुमताज और शाहजहां की प्रेम दास्तां आज भी ताजमहल के रूप में दुनिया के सामने है। अपनी प्रेमिका मुमताज की याद में मुगल बादशाह शाहजहां ने ताजमहल की तामिर कराकर जहां अपने अनूठे प्रेम को अमर कर दिया वहीं गाजीपुर के एक मामूली किसान ने अपनी पत्नी की याद में भव्य मंदिर बना डाला है। जी हां, गाजीपुर के इस शाहजहां ने अपनी पत्नी की मौत के बाद उसकी स्मृति को अमर रखने के लिए न सिर्फ पत्नी मंदिर बनवा रखा डाला बल्कि बकायदा मंदिर में पत्नी की मूर्ति स्थापित कर अपने पवित्र प्रेम की मिशाल कायम की है।गाजीपुर का ये पत्नी मंदिर दूर दूर तक लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। ‘‘न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बन्धन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन’’ गाजीपुर के करण्डा क्षेत्र के एक मामूली किसान रामनाथ यादव की जिन्दगी में ये बात पूरी तरह खरी साबित हुई। जीवन के अन्तिम पड़ाव के करीब होने के बावजूद उनके जेहन में अपनी पत्नी की याद बनी रहीं और ये स्मृतियां हमेशा अमर रहें इसी ख्वाहिश के चलते उन्होनें अनूठा कदम उठा डाला। आज से करीब 17साल पहले रामनाथ की शरीकेहयात उनका साथ छोड़ भगवान को प्यारी हो गई। पत्नी सनजाफी देवी की मौत के बाद जिन्दगी की डगर पर अकेले खड़े रामनाथ ने प्रिय पत्नी की स्मृतियों को सहेजने का मन बना लिया। ऐसे में उनका प्रेम अमर रहे की बुनियाद पर उन्होने पत्नी मंदिर का निर्माण करवा डाला। मंदिर में तमाम देवी देवताओं की मूर्तियों के साथ मुख्य भवन में सनजाफी देवी की प्रतिमा भी स्थापित कर डाली तब से आज तक रामनाथ के परिवार वाले इस मंदिर में पूजा अर्चना करते आ रहे है। शाहजहां की तर्ज पर अपने गांव में पत्नी की याद में मंदिर का निर्माण कराने वाले रामनाथ के फैसले को पहले तो क्षेत्र के लोगों ने अजीब नजरों से देखा लेकिन उनके इस कदम में उनके तीनों लड़के उनके साथ खड़े रहे। 3मई1995 को पत्नी सनजाफी देवी के निधन के बाद अक्टूबर 1995 से शुरू हुआ मंदिर का निर्माण कार्य सितम्बर 1997 को खत्म हआ। मंदिर में बकायदा पत्नी की प्रतिमा स्थापित कर रामनाथ सनजाफी देवी की पूजा भी करते रहे। लेकिन लम्बी बिमारी के चलते लखनउ में उन्हे अपना स्थायी आशियाना बनाना पड़ा जहां सालभर भर पहले उनकी मृत्यु हो गई। बावजूद इसके उनकी गैर मौजूदगी में भी ये सिलसिला नही टूटा। अब गांव में रह रहे उनके पुत्र अपनी मां को देवी मानकर पूजा कर रहे है। प्रेम में एक दूसरे के लिए सबकुछ न्यौछावर कर देने की मिशाल नई नही है और एक दूजे के लिए अपना सबकुछ समर्पित करदेने की परम्परा भी न जाने कब से चली आ रही है। शायद रामनाथ भी प्रेम के उसी डगर के राही थे और पत्नी के निधन के बाद उनकी याद में मंदिर बनाकर उन्होने इस बात को सच साबित किया । ऐसे में रामनाथ का पवित्र प्रेम न जाने कितने ही प्रेमियों को पवित्रता और समर्पण की प्रेरणा देता रहेगा। फिलहाल शाहजहां की तर्ज पर अपनी प्रेयसी की स्मृतियों को अमर रखने की ख्वाहिश के साथ बनवाया गया यह पत्नी मंदिर सचमुच गाजीपुर के लोगों के बीच आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है और यही वजह है कि लोग रामनाथ के अमर प्रेम के कायल बनते जा रहे है।

सुशील खरे का द न्‍यूज से इस्‍तीफा, विवेक सिंह समाचार प्‍लस से जुड़े

सुशील खरे खबरिया चैनल द न्‍यूज से इस्‍तीफा दे दिया है. वे कुछ समय पहले ही इस चैनल के साथ स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट के रूप में जुड़े थे. उन्‍हें यूपी-उत्‍तराखंड की जिम्‍मेदारी दी गई थी. सुशील अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. वे इसके पहले हिंद वतन, सहारा, डायलॉग इंडिया मैगजीन, न्‍यूज नेटवर्क ऑफ इंडिया, समाचार प्‍लस चैनल को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

साधना न्‍यूज, लखनऊ से खबर है कि विवेक सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर रिपोर्टर के रूप में कार्यरत थे. विवेक ने अपनी नई पारी लखनऊ में ही समाचार प्‍लस चैनल के साथ शुरू की है. माना जा रहा है कि उन्‍हें गोविंद पंत राजू चैनल में लेकर आए हैं. उल्‍लेखनीय है कि राहुल तिवारी ने कुछ दिनों पहले इनपुट हेड प्रवीण साहनी से विवाद होने के बाद इस्‍तीफा दे दिया था.

Vayalar Ravi’s sexist comment to women scribe sparks controversy

Bengaluru: Another Union Minister has landed himself in a controversy for making sexiest remarks. Union Minister for Overseas Indian Affairs Vayalar Ravi was caught on camera asking a woman journalist of Mathrubhumi TV channel whether she had any personal experiences with Deputy Chairman of Rajya Sabha P.J. Kurien who is embroiled in the Suryanelli sex scandal.

When the reporter asked Ravi if the High Command still stood by Kurien in the sex scandal issue, the Minister shot back: "Do you have anything personal against Kurien? I am sure you do. Has something happened between you and him in the past?"

The remarks, made in Alappuzha, triggered a huge protest in Kerala. Women journalists in Kochi protested against Ravi’s defamatory comment to a woman journalist in Alappuzha. At a meeting held at Press Club on Tuesday, around 25 journalists alleged that Ravi’s behaviour showed lack of sensitivity needed for a leader of his stature. Later, Ravi apologised to the journalist.

Members of the Kerala chapter of the Network of Women in Media, India (NWMI) have condemned the comments made by Ravi.

The Minister’s words reveal that he considers the whole incident to be a joke. The posture, body language and statements were unbecoming of a man of his experience in public life as a people’s representative, the members said.

“We believe that if women journalists who have to ask questions and get reactions to current affairs are treated in this manner, then the plight of common women would be worse off,” they added.

Women journalists plan to petition President Pranab Mukherjee, Prime Minister Manmohan Singh, Congress president Sonia Gandhi and Chief Minister Oommen Chandy in the issue.

साभार- डेक्कन क्रानिकल

स्‍टार प्‍लस इस बार भी नम्‍बर वन, जी टीवी की रेटिंग प्‍वाइंट में बढ़त

इंडियन एंटरटेन्मेंट टेलीविजन के छठे सप्‍ताह की रेटिंग आ गई है. इस बार चैनल के पोजिशन में कोई बदलाव नहीं आया है, उनके रेटिंग प्‍वाइंट जरूर कम हो गए हैं. स्‍टार प्‍लस ने अपने नम्‍बर वन का स्‍थान मेंटेंन रखा है, लेकिन उसे रेटिंग अंकों का नुकसान हुआ है. इस बार स्टार प्लस 264 जीआरपी के साथ पहले स्‍थान है है, ज‍बकि पिछले सप्‍ताह इसकी जीआरपी 281 प्‍वाइंट थी. जीटीवी ने इस बार अपने रेटिंग प्‍वाइंट में 29 अंकों की बढ़ोतरी के साथ दूसरे स्‍थान पर काबिज है.

जी टीवी के इस सप्‍ताह 243 जीआरपी प्‍वाइंट हैं, जो पिछले 214 जीआरपी था. कलर्स छठवें सप्ताह भी तीसरे स्‍थान पर बना हुआ है. हालांकि इस सप्‍ताह उसे चार अंकों की मामूल हानि हुई है. उसकी 206 जीआरपी रेटिंग है, जो पिछले सप्‍ताह 210 जीआरपी थी. इस बार सोनी चैनल की लगातार गिरती रेटिंग रुकी है. इस सप्‍ताह उसे एक अंक का फायदा मिला है. वह इस सप्‍ताह भी चौथे स्‍थान पर काबिज है. इस बार इसकी जीआरपी 160 प्‍वाइंट है.

पांचवें स्‍थान पर मौजूद सब टीवी की रेटिंग भी लगातार गिर रही है. पिछले सप्‍ताह की इसकी जीआरपी 134 थी, जो गिरकर 132 जीआरपी पर पहुंच गई है. लाइफ ओके भी मामूली बढ़त के साथ 124 जीआरपी के साथ छठवें स्‍थान पर मौजूद हैं. पिछले सप्‍ताह इसकी जीआरपी 121 थी. स्‍टार उत्‍सव 51 जीआरपी के साथ सातवें स्‍थान पर मौजूद है. पिछले सप्‍ताह इसकी रेटिंग 52 जीआरपी थी.

हरि मृदुल को ‘वर्तमान साहित्‍य कमलेश्‍वर कहानी पुरस्‍कार’

अलीगढ़ : युवा कवि और कथाकार हरि मृदुल को वर्ष 2012 के लए प्रतिष्ठित ' वर्तमान साहित्‍य कमलेश्‍वर कहानी पुरस्‍कार' देने की घोषणा की गई है. इस पुरस्‍कार के लिए उनकी कहानी 'हंगल साहब, जरा हंस दीजिए' का चयन अखिल भारतीय स्‍तर पर हुई एक प्रतियोगिता में किया गया है. पुरस्‍कृत कहानी में फिल्‍मी दुनिया की चमक-दमक के पीछे की कालिमा का एक अनूठे शिल्‍प में बखान है. इस बार के निर्णायक थे प्रो. गंगा प्रसाद विमल, प्रो. सूरज पालीवाल और वरिष्‍ठ कथाकार प्रो. काजी अब्‍दुल सत्‍तार. 

उल्‍लेखनीय है कि प्रख्‍यात कहानीकार कमलेश्‍वर के परिवार की ओर से प्रतिवर्ष यह पुरस्‍कार दिया जाता है. 13 मार्च, 2013 को अलीगढ़ में आयोजित एक भव्‍य समारोह में हरि मृदुल को यह पुरस्‍कार प्रदान किया जाएगा. चर्चित साहित्यिक मासिक पत्रिका 'वर्तमान साहित्‍य' कमलेश्‍वर जी के नाम की अखिल भारतीय स्‍तर पर हर वर्ष एक कहानी प्रतियोगिता का आयोजन करती है. इस साल देश भर से सैकड़ों कहानियां प्राप्‍त हुई थीं.

पुरस्‍कृत कथाकार हरि मृदुल समकालीन साहित्‍य जगत की नामचीन हस्‍ती हैं. उनके अब तक दो कविता संग्रह 'सफेदी में छपा काला' और 'जैसे फूल हजारी' प्रकाशित हो चुके हैं. कहानी और बाल साहित्‍य में भी उनका काम लगातार ध्‍यान खिंचता रहा है. वे मूल रूप से उत्‍तराखंड के हैं. उन्‍होंने अपनी लोक भाषा कुमाऊंनी में भी कविता और गीतों की रचना की है. हरि मृदुल को अब तक महाराष्‍ट्र साहित्‍य अकादमी का प्रतिष्ठित संत नामदेव पुरस्‍कार, हेमंत स्‍मृति कविता सम्‍मान, कथादेश लघुकथा पुरस्‍कार और कादंबिनी लघुकथा पुरस्‍कार मिल चुके हैं. उनकी रचनाओं के अनुवाद अंग्रेजी, मराठी, असमी, नेपाली, पंजाबी, उर्दू और कन्‍नड़ भाषाओं में हुए हैं. इस समय हरि मृदुल दैनिक अमर उजाला के मुंबई ब्‍यूरो में स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट के पद पर कार्य कर रहे हैं. वे पिछले बीस वर्षों से मुंबई में हैं.

महिला पत्रकार से बेहूदगी की केंद्रीय मंत्री व्यालार रवि ने

दुष्कर्म के आऱोप में फंसे पीजे कुरियन के बचाव में एक केंद्रीय मंत्री व्यालार रवि ने महिला पत्रकार से ये बर्ताव किया है… इसके बाद क्या समझने को बचा रह जाता है… ''Union Minister for Overseas Indian Affairs Vayalar Ravi was caught on camera asking a woman journalist of Mathrubhumi TV channel whether she had any personal experiences with Deputy Chairman of Rajya Sabha P.J. Kurien who is embroiled in the Suryanelli sex scandal.''

टीवी जर्नलिस्ट Harshvardhan Tripathi के फेसबुक वॉल से.

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पत्रिका की घपलेबाजी : मजीठिया वेज बोर्ड से बचने के लिए प्‍लेसमेंट एजेंसी की तरकीब

अखबार प्रबंधन ने मान लिया है कि देर सबेर मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करना ही पड़ेगा इसलिए वे इसके तोड़ में जुट गए हैं. खबर है कि सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के खिलाफ याचिका दायर करने वाले राजस्‍थान पत्रिका ने मजीठिया बोर्ड लागू होने के संभावित डर को देखते हुए कर्मचारियों के साथ छल करना शुरू कर दिया है. खबर है कि राजस्‍थान पत्रिका अब अखबार में काम करने वाले लोगों को अपना कर्मचारी बनाने की बजाय प्‍लेसमेंट का कर्मचारी बताने पर तुल गया है.

सूत्रों का कहना है कि अखबार अब यह प्रचारित कर रहा है कि उसके यहां काम करने वाले कर्मचारी उसके अखबार के नहीं बल्कि प्‍लेसमेंट एजेंसी के कर्मचारी हैं. अखबार के तमाम नए पत्रकार तथा गैर पत्रकार कर्मचारियों को प्‍लेसमेंट एजेंसी पोर्टफोलियो का कर्मचारी साबित किया जा रहा है. खबर है कि जनवरी म‍हीने में इन लोगों की सैलरी भी प्‍लेसमेंट कंपनी पोर्टफोलियो कंपनी की ओर से ही दिए गए हैं. बताया जा रहा है कि राजस्‍थान पत्रिका प्रबंधन इस मामले के सहारे यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि उसके यहां काम करने वाले कर्मचारी प्‍लेसमेंट कंपनी से ठेके पर लिए गए हैं.

इस तरह की कार्रवाई करके अखबार प्रबंधन मजीठिया वेज बोर्ड देने की बाध्‍यता से बच सकता है. इसलिए ही वो अब अपने ज्‍यादातर कर्मचारियों को प्‍लेसमेंट एजेंसी के चेक ही थमा रहा है. गौरतलब है कि राजस्‍थान पत्रिका ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर पिछले साल जमकर छंटनी की थी. इसके अलावा दैनिक जागरण समेत तमाम अखबारों ने अपने पुराने कर्मचारियों से इस्‍तीफा मांग लिया था, जिसने इस्‍तीफा नहीं दिया उसका तबादला दूर दराज क्षेत्रों में कर दिया था. इस तरह की स्थिति पैदा होने के बाद कई लोग खुद इस्‍तीफा देकर चले गए थे.

‘टुनाइट विथ दीपक चौरसिया’ के साथ रीलांच होगा इंडिया न्‍यूज

इंडिया न्‍यूज के नेशनल चैनल की लांचिंग गुरुवार को स्‍क्रीन पर ही भव्‍य तरीके से होगी. किसी आयोजन की बजाय टीवी पर भी बड़े अतिथियों के साथ दीपक चौरसिया अवतरित होंगे. आठ बजे उनके कार्यक्रम टुनाइट विथ दीपक चौरसिया के साथ इंडिया न्‍यूज की रीलांचिंग की जाएगी. इस कार्यक्रम के साथ इस नेशनल चैनल पर पहली बार दीपक चौरसिया अवतरित होंगे. दीपक के साथ अन्‍ना हजारे, रविशंकर समेत कई बड़े लोगों के आने की संभावना है.

टीवी स्‍क्रीन पर दीपक चौरसिया का चेहरा दिखेगा तो इसके बदले लुक एवं कंटेंट के पीछे ग्रुप मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की भूमिका होगी. सूत्रों का कहना है कि राणा यशवंत ने इंडिया न्‍यूज का पूरा का पूरा लुक चेंज कर दिया है. हालांकि अब यह तो देखने के बाद ही पता चलेगा कि नए लुक को दर्शक कितना पसंद करते हैं, परन्‍तु कंटेंट में राणा यशवंत की झलक दिखने लगी है. सूत्रों का कहना है कि चैनल लांचिंग के बाद एक अलग फील देगा.

गौरतलब है कि दीपक चौरसिया एवं राणा यशवंत के साथ मनीष अवस्‍थी, आंचल आनंद, तान्‍या दवे, रवि शर्मा समेत कई बड़े लोगों ने चैनल ज्‍वाइन किया है. चैनल के लांचिंग की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि इंडिया न्‍यूज का कोई भी पुराना एंकर नेशनल चैनल पर एंकरिंग करता नहीं दिखेगा. इस चैनल को गंभीर और लोकप्रिय बनाने के लिए दूसरे बड़े चैनलों की एंकरों को लाया गया है. इसके अलावा खबरों के ट्रीटमेंट को लेकर भी तमाम निर्देश जारी किए गए हैं. भाषा, हेडलाइन के तरीकों पर भी व्‍यापक चर्चा और दिशा निर्देश जारी हो चुके हैं. इतना ही नहीं इस चैनल के प्रमोशन की भी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं. सूत्रों का कहना है कि चैनल का प्रमोशन एफएम रेडियो, सिनेमा घरों समेत तमाम जगहों पर किया जाएगा.

अल्‍फा समूह का ‘न्‍यूज नेशन’ चैनल हुआ ऑन एयर

: अजय कुमार बने न्‍यूज नेशन में न्‍यूज हेड : अल्‍फा समूह का चैनल न्‍यूज नेशन का सेटेलाइट टेस्‍ट रन शुरू हो गया है. चैनल का नया नाम रजिस्‍टर्ड होने के बाद प्रबंधन ने इसे टेस्‍ट रन पर लांच कर दिया है. इसकी ऑफिसियली लांचिंग कुछ दिनों बाद की जाएगी. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने चैनल का वेबसाइट भी लांच कर दिया है.

चैनल के टेस्‍ट लांचिंग के बाद पहला बुलेटिन अजय कुमार ने पढ़ा. अजय कुमार आजतक से इस्तीफा देने के बाद न्‍यूज नेशन से जुड़ गए हैं. उन्‍हें चैनल में न्‍यूज हेड की जिम्‍मेदारी दी गई है. गौरतलब है कि लम्‍बे समय से लांचिंग की तैयारियों में जुटे अल्‍फा समूह को हेडलाइंस टुडे की आपत्ति के बाद अपना नाम चेंज करना पड़ा था, जिसके चलते इसके लांचिंग में देरी हो गई थी. अब सेटेलाइट टेस्‍ट रन शुरू होने के बाद समझा जा रहा है कि जल्‍द ही इस चैनल की ऑफिसयिल लांचिंग कर दी जाएगी. प्रबंधन ने इसके लिए अभी दिन तय नहीं किया है. यह चैनल आजतक के वरिष्‍ठ पत्रकार शैलेश के नेतृत्‍व में लांच हो रहा है.   

दिल्ली से शीघ्र प्रकाशित होगी मासिक पत्रिका ‘कर्मभूमि संवाद’

: संपादकीय कार्यालय का उद्घाटन हुआ : उत्तराखण्ड के सवालों पर केंद्रित मासिक पत्रिका ‘कर्मभूमि संवाद’ शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही है। कल १३ फरवरी २०१३ को पत्रिका के संपादकीय कार्यालय का उद्घाटन हुआ। इस अवसर पर उत्तराखण्ड के सरोकारों से संबंध रखने वाले कई प्रतिष्ठित लोगों ने शिरकत की।

समारोह में उत्तराखण्ड की पूर्व सरकार में राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त पूरन चंद्र नैलवाल, हिंदी अकादमी दिल्ली के सचिव हरिसुमन बिष्ट, एनडीटीवी से संबद्ध वरिष्ठ पत्रकार सुशील बहुगुणा, पहली कुमाउंनी फिल्म ‘मेघा आ’ के निर्देशक जीवन सिंह बिष्ट, नेशनल दुनिया से संबद्ध वरिष्ठ पत्रकार केवल तिवारी, महेंद्र सिंह बनेशी, सतेंद्र त्रिपाठी, त्रिलोक रावत, पहाड़ के सवालों पर मुखर रहने वाले दिनेश जोशी, शिवचरण मुण्डेपी, दयाल पांडे, प्रेम सुंदरियाल, प्रदीप बेदवाल, कुमाउंनी कवि पूरन कांडपाल, दैनिक भास्कर से संबद्ध अलछेंद्र नेगी, श्यामलाल शर्मा, एडवोकेट अजय जोशी, न्यूज एक्सप्रेस से जुड़े अजय ढौंढियाल, गढ़वाल हितैषिणी सभा के राणाजी, पैसेफिक मॉल के जनरल मैनेजर बीएस रावत समेत अनेक लोग उपस्थित थे।

उत्तराखण्ड के प्रतिष्ठित पत्रकार चारु तिवारी के संपादन में यह पत्रिका निकलेगी। चारु तिवारी इससे पहले उत्तराखण्ड की प्रमुख पत्रिका ‘जनपक्ष आजकल’ के कार्यकारी संपादक रहे हैं। उससे पहले वे कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं से संबद्ध रहे हैं। अपनी धारदार लेखनी से वे उत्तराखण्ड के सवालों को उठाते रहे हैं। जनांदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। पत्रिका के प्रकाशक-मालिक राजेंद्र रौतेला हैं। उत्तराखण्ड के जाने-माने साहित्यकार क्षितिज शर्मा पत्रिका के एसोसिएट एडिटर हैं। हिंदी साहित्य जगत में उनकी कहानियां चर्चित रही हैं। उनके अलावा ‘कर्मभूमि संवाद’ में महेश पपनै, प्रेमा नेगी और दिलीप जीना भी जुड़ गये हैं।

उद्घाटन समारोह का शुभारंभ करते हुए पत्रिका के संपादक चारु तिवारी ने बताया कि पत्रिका का नाम कर्मभूमि संवाद रखने की प्रेरणा आजादी के समय में उत्तराखण्ड के प्रमुख और जुझारू पत्र रहे कर्मभूमि से मिली। कर्मभूमि उत्तराखण्ड के सवालों को प्रमुखता से उठाता था और लोगों की चेतना जगाने का काम करता था। पत्रिका के बारे में उन्होंने बताया कि यह उत्तराखण्ड के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, साहित्यिक विषयों पर केंद्रित होगी। इसके अलावा देश-विदेश की खबरों और साहित्य को विशेष स्थान दिया जायेगा। पत्रिका के सभी ७२ पृष्ठ रंगीन होंगे।

‘कर्मभूमि संवाद’ की भूमिका को आज की युवा पीढ़ी भी मानती है। इसी की मिसाल हैं युवा इंजीनियर राजेंद्र रौतेला। प्रकाशक-मालिक राजेंद्र रौतेला ने इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पत्रिका को प्रकाशित करने का दायित्व उठाया है। उद्घाटन समारोह में आये लोगों ने कर्मभूमि नाम की सार्थकता सिद्ध करने और चुनौतियों को स्वीकारने के लिए शुभकामनायें दीं और कहा कि यह पत्रिका उत्तराखण्ड के सवालों-सरोकारों को उठाने वाली प्रमुख पत्रिका बनकर उभरे।

प्रसार विभाग के खेल से नासमझ बने हुए हैं अमर उजाला के संपादक!

हल्द्वानी में अमर उजाला के संपादक सुनील शाह आजकल अखबार की अव्यवस्था के चलते काफी परेशान हैं। कुमाउं में अखबार के पाठक दिन-ब-दिन कम हो रहे हैं। ये अलग बात है कि प्रसार विभाग आंकड़ों की जुबानी संपादक को धोखे में रख कर बता रहा है कि बाजार में इतना अखबार जा रहा है… और अखबारों से ज्यादा! प्रसार विभाग सही कह रहा है। अखबार हर जिलों में खूब जा रहा है। लेकिन ये अखबार वितरकों के पास डम्प हो जाता है। पाठक तक नहीं पहुंच पाता है। इसके कई कारण हैं।

शुरुआत होती है हल्द्वानी से ही। यहां से कुमाउं को जाने वाली गाड़ियों के मालिकों से प्रसार वालों ने अपना कमीशन बांध रखा है। मतलब कम्पनी से गाड़ी मालिक से जो शर्तें तय होती हैं उनका कुछ प्रतिशत प्रसार के कारिंदें बड़ी ही सफाई से डकार जाते हैं। इससे गाड़ी मालिकों की फिर अपनी मनमानी शुरू हो जाती है। वो सवारी भर कर आराम से अपने गंतव्य स्थानों तक पहुंचते हैं। वहां फिर गाड़ी वालों की समाचार एजेंटों से तीखी नोक-झोंक हमेशा होती है। गाड़ी वाले ‘जो करना है कर लो’ की तर्ज पर उनकी बातों को अनसुना कर अखबार पटक चल देते हैं। प्रसार, गाड़ियों के बाद हॉकरों की मनमानी के साथ ही पाठकों तक सही वक्त तक अखबार ना पहुंचने पर पाठक कम होते चले गए हैं।

एजेंट बताते हैं कि महीने में प्रसार वाले उगाही के लिए जब उनके पास आते हैं तो उनका व्यवहार बहुत ही रूखा रहता है। उनकी कोई बात ही नहीं सुनते प्रसार वाले। बचे पेपर की वापसी नहीं लेते। प्रसार वालों का बोलने का तरीका इतना गंदा होता है कि लगता है जैसे वो नहीं हम चोर हों। विषेशकर तो पंत का। ना जाने उसने मैनेजमेंट को क्या घुट्टी पिला रखी है कि उसकी कारगुजारी किसी को दिखती ही नहीं। पंत के साथ ही सलमान का रवैया भी ठीक नहीं रहता है। इनलोगों के व्यवहार से ज्यादातर पुराने एजेंटों ने अमर उजाला से तौबा कर दी है। अमर उजाला के मैनेजमेंट को अखबार की पतली होती जा रही हालत के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है। कुछ जगहों में गुप-चुप ढंग से बिना सिक्योरिटी के ही हॉकरों को अखबार की एजेंसी दे रखी है।

 कुमाउं का बागेश्‍वर जहां पहले अमर उजाला को ही लोग जानते थे वहां अब अमर उजाला अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है। यहां के पत्रकार गणेश उपाध्याय को रानीखेत तथा रानीखेत के आनंद नेगी को बागेश्‍वर में भेज एक असफल प्रयोग भी करने की कोशिश की गई। गणेश उपाध्याय मैनेजमेंट को स्वास्थ्य का हवाला दे सशर्त इस्तीफा देकर घर बैठे हैं। उपाध्याय को उम्मीद है कि मैनेजमेंट उनकी समस्या को ध्यान में रख बागेश्‍वर में उनका स्थानांतरण कर देगा। लेकिन मैनेजमेंट के चुप रहने पर अब उपाध्याय सांध्य दैनिक से अपनी नई पारी की शुरुआत करने का मन बना रहे हैं।

बागेश्‍वर की पतली हालत से अखबार के संपादक भी थोड़ा बहुत रूबरू हो चुके हैं। इस सिलसिले में वो कई बार पहाड़ का दौरा भी कर चुके हैं। लेकिन हालात हैं कि उनके भी काबू में नहीं आ रहे हैं। संपादक जी ने अखबार का ढर्रा बदलने के लिए कई बार मन भी बनाया, लेकिन बात सिर्फ बातचीत तक ही सिमट कर रह जा रही है। कई लोगों का इंटरव्यू लेने के बाद बात मानदेय पर अटक कर खत्म हो जा रही है। प्रसार वाले संपादक को फिर एक नया सपना दिखा देते हैं कि देखो जल्द ही सब ठीक हो जाने वाला है।

संपादक प्रसार वालों के झूठे सपने में बह कर कुछ सामाजिक मुद्दों को अखबार में लाने की कवायद शुरू कर देते हैं और इंतजार में रहते हैं कि पाठक वर्ग की अच्छी प्रतिक्रिया सामने आएगी। लेकिन संपादक साहब अब आप ही बताइये कि जब पाठक तक अखबार ही नहीं पहुंच रहा हो तो प्रतिक्रिया कहां से आएगी! ये आपका देखा-जाना और महसूस किया मॉरीशस तो हैं नहीं कि जहां ईमानदारी है.. जेबें नहीं कटती.. चोरी नहीं होती.. रेत बिखरी ही रहती है। वहां रेत माफिया नहीं होता!!! संपादक जी मॉरीशस के लिए जो समझ, दर्द आपके दिलो-दिमाग में जागा वो समझ, दर्द आपका भारत के हल्द्वानी में आकर कहां गायब हो गया!!

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

दूरदर्शन लांच करेगा अपना अंग्रेजी न्‍यूज चैनल

दूरदर्शन भी अब अंग्रेजी चैनल लांच करने की योजना पर काम कर रहा है. यह चैनल इस साल जुलाई-अगस्‍त तक लांच कर दिए जाने की संभावना है. सूत्रों का कहना है कि इस चैनल को लांच करने की तैयारियां तेजी से चल रही है, इसके कंटेंट एवं लुक पर काम किया जा रहा है. दूरदर्शन अभी तक हिंदी न्‍यूज के साथ अंग्रेजी का भी बुलेटिन प्रसारित करता रहा है, परन्‍तु अब वह पूरी तरह से अंग्रेजी चैनल लाने की तैयारी कर रहा है.

अंग्रेजी चैनल की लांचिंग दूरदर्शन के महानिदेशक त्रिपुरारी शरण की देखरेख में हो रही है. उल्‍लेखनीय है कि डीडी न्यूज की शुरुआत नवम्बर, 2003 में हुई थी. इसके पहले यह दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर ही हिंदी-अंग्रेजी बुलेटिन के रूप में प्रसारित होता था. फिलहाल डीडी न्यूज पर हिंदी और अंग्रेजी समाचार बुलेटिन के अलावा व्यवसाय, खेल-कूद, स्वास्थ्य, कला और संस्कृति से संबंधित अनेक कार्यक्रमों का नियमित रूप से प्रसारण किया जाता है. डीडी न्यूज चैनल के दूरदर्शन समाचार केन्द्र द्वारा अलावा पूरे भारत में 23 रीजन न्यूज यूनिट भी हैं.

जी न्‍यूज में वापसी करेंगे वाशिन्‍द्र मिश्र!

वाशिन्‍द्र मिश्र के बारे में खबर आ रही है कि सहारा छोड़ने के बाद वे एक बार फिर से जी न्‍यूज में वापसी कर रहे हैं. हालांकि अभी आधिकारिक रूप से इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है कि वे कब फिर से अपनी पुरानी जिम्‍मेदारी संभालेंगे, लेकिन सूत्रों का कहना है कि जी न्‍यूज में उनकी वापसी हो चुकी है. गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही वाशिन्‍द्र मिश्र जी न्‍यूज यूपी-उत्‍तराखंड के हेड के पद से इस्‍तीफा देकर सहारा समूह से जुड़े थे. सहारा में उन्‍हें नेशनल चैनल का हेड बनाया गया था.

हालांकि कुछ दिनों में ही उन्‍होंने सहारा से इस्‍तीफा दे दिया था. क्‍योंकि सहारा के भीतर की व्‍यवस्‍था उन्‍हें रास नहीं आई थी. इसके बाद से ही वे जी न्‍यूज में वापसी के लिए प्रयासरत थे. खबर है कि रवि पराशर के सहारा जाने के बाद उनकी वापसी फाइनल हो चुकी है. बताया जा रहा है कि उन्‍हें फिर से उनके पुराने प्रोफाइल यानी यूपी-उत्‍तराखंड की जिम्‍मेदारी सौंपी जाएगी. 

‘विजयवाणी’ ने बेलगांव से लांच किया अपना दसवां प्रिंटिंग यूनिट

कन्‍नड़ में प्रकाशित होने वाला दैनिक अखबार 'विजयवाणी' ने कर्नाटक के बेलगांव से अपना दसवां एडिशन लांच कर दिया है. इस अखबार को संचालित करने वाली कंपनी वीआरएल ने पिछले तीन महीनों के भीतर इस अखबार के नौ प्रिंटिंग यूनिट लांच किए हैं. दसवां प्रिंटिंग सेंटर बेलगांव से शुरू किया गया है.

प्रबंधन की योजना इस अखबार को बेलगांव के आसपास के इलाकों में सर्कुलेट करने की है. इसे कर्नाटक के कृषि एवं इंडस्‍ट्रीयल हब में लांच करने के बाद पड़ोसी गोवा और महाराष्‍ट्र के कन्‍नड़ भाषी क्षेत्रों में भी विस्‍तारित किया जाएगा.

इटली के हेलीकॉप्टर अबकी उतरेंगे सीधे हमारी संसद में

हमारे पीएम सरदार मनमोहन सिंह भी सदा की तरह अपने होठों पर ताला लगाए बैठे हैं। बोले तो क्या बोले। बहुत दिनों बाद विपक्ष के हाथ फिर एक बार बड़ा हथियार आया है। हेलीकॉप्टर सौदे में दलाली का मुद्दा सरकार की मुसीबत बन गया है। मामला इटली से जुड़ा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सकते में तो हैं ही दुखी भी हैं। वैसे, जब से हेलीकॉप्टर सौदे में कमीशन की बात उछली है, नितिन गड़करी भी कोई कम दुखी नहीं है। उनका दुख यह है कि यह घोटाला महीने भर पहले सामने आ गया होता, तो उन पर लगे आरोप दब जाते और संघ उनको फिर से बीजेपी अध्यक्ष बनवाने में सफल हो जाता। लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता।

बहरहाल, हेलीकॉप्टर सौदे में दलाली मामले को बीजेपी दूसरा बोफोर्स घोटाला बता रही है। लेफ्ट भी लाल है। उसने सरकार को संसद में घेरने की चेतावनी दी है। बीजेपी सरकार से वैसे भी खार खाए बैठी है। अपना मानना है कि हेलिकॉप्टर खरीद घोटाले की जितनी गूंज अभी सुनाई दे रही है, उससे भी ज्यादा गड़गड़ाहट 21 फरवरी से शुरु हो रहे संसद के बजट सत्र में गूंजेगी। विपक्षी दलों ने रक्षा सौदे में दलाली के मुद्दे पर सरकार पर हमले की रणनीति ज़ाहिर कर दी है। सबसे ज्यादा आक्रामक बीजेपी है। दरअसल बीजेपी पिछले संसद सत्र से ही इस मुद्दे को उछाल रही है। बीजेपी नेता प्रकाश जावड़ेकर बता रहे थे कि उन्होंने संसद में 12 दिसंबर 2012 को सरकार से हेलीकॉप्टर सौदे में धांधली से जुड़ा सवाल पूछा था। जवाब मिला था कि सरकार को इस मामले में इटली में चल रही जांच की जानकारी है लेकिन किसी भी भारतीय एजेंसी से जांच की जरूरत नहीं है। इसके बाद 14 दिसंबर 2012 को प्रकाश जावड़ेकर ने रक्षा मंत्री एके एंटनी को बाकायदा चिट्ठी लिखी थी। जावड़ेकर ने अपनी उस चिट्ठी में बीजेपी की तरफ से सरकार से निश्चित वक्त में जांच की मांग भी की थी। और तथ्य के तौर पर कुछ दलालों की फोन की बातचीत और इटली की एक जांच में आए भारतीय नामों का जिक्र भी किया था। लेकिन सरकार ने इसे हवा में उड़ा दिया था।

पर, अब सरकार की बकरी डब्बे में आ रही है। सीधे सीधे सोनिया गांधी की तरफ उंगली करके तो नहीं पर मामले में जोर जोर से इटली – इटली चिल्लाकर निशाना उन्हीं पर है। बीजेपी का आरोप है कि तमाम जानकारी के बावजूद सरकार ने जानबूझकर कुछ नहीं किया। बीजेपी को राज्यसभा सांसद प्रकाश जावड़ेकर पहले भी कह रहे थे और अब तो कुछ ज्यादा ही चीख चीख कर कह रहे हैं कि हेलीकाप्टर सौदे में घोटाले की खबर शुरू से आ रही है। सारी दुनिया को जब पता चल गया था तो भारत की एजेंसियां क्यों नहीं जांच कर रही थी? वैसे अपना मानना है कि सरदारजी की सरकार ने नीति बना ली है कि मामले को जितना दबा सकते हो, दबाओ। इसीलिए बीजेपी ने जब जब संसद में ये मामला उठाने की कोशिश की, तो हर बार इसे दबा दिया गया। हालांकि कांग्रेस बैकफुट पर नहीं जाने का अभिनय कर रही है। पर जाना पड़ेगा। इटली की सरकार ने कार्रवाई की तो हमने भी मामला सीबीआई को सौंपकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया है। दिग्विजय सिंह पूछ रहे हैं कि अब और क्या कर सकते हैं? क्या एनडीए की सरकार होती तो बिना जांच के ही किसी को फांसी पर

निरंजन परिहार
चढ़ा देती? कांग्रेस कुछ भी कहे। लेकिन विपक्ष को हथियार मिल चुका है। इस बार भी संसद में सरकार को घेरने के साथ साथ विपक्ष कांग्रेस और श्रीमती सोनिया गांधी पर भी निशाना साधने से नहीं चूकेगा। मामला इटली से जुड़ा है और संसद इस बार भी जंग का मैदान बननेवाली है। लोकतंत्र में जंग हथियार सिर्फ जुबान में समाए होते है और मैदान अकसर सदन ही हुआ करते हैं। 

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

अफजल की फांसी छोड़ गई कुछ अनसुलझे सवाल!

हमारे देश की सरकार ने कल आतंक के पर्याय बने और देश की सम्प्रभुता संसद पर हमला करने वाले अफ़जल गुरु को तिहाड़ जेल में फॉंसी के फॅंदे पर लटका दिया। जैसा कि होता है कि इस घटना की पूरे राष्ट्र में प्रशंसा हो रही है और ऐसा ठीक भी है। हम इस देश के कानून व सर्वोच्च न्यायालय सहित राष्ट्रपति के निर्णय का सम्मान करते हैं और मेरा व्यक्तिगत तौर पर ऐसा मानना है कि राष्ट्र की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता से खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ ऐसा ही होना चाहिए। चाहे वो अफजल गुरु हो या कसाब और कोई और। लेकिन इस फॉंसी की घटना की हमारे देश में कुछ राजनैतिक पार्टियों द्वारा व कुछ संगठनों द्वारा निंदा भी की जा रही है और इस तरह यह फॉंसी अपने पीछे कई प्रश्न छोड़ कर गई है।

मैं अपनी बात शुरू करने से पहले एक महत्वपूर्ण बात पर आप सब का ध्यान दिलाना चाहूंगा कि अफजल गुरु व कसाब में एक महत्वपूर्ण फर्क है कि कसाब पाकिस्तानी नागरिक था और अफजल गुरु भारत का ही एक नौजवान था। कसाब को जन्मजात ही इस देश व इस देश की व्यवस्था की नफरत ने पाला था, लेकिन अफजल गुरु ने इस देश की व्यवस्था, यहां के लोकतंत्र व यहां के स्वतंत्रता दिवस को स्वीकार किया था, तो फिर ऐसा क्या था जिसने अफजल गुरु को कसाब की श्रेणी में ला खड़ा किया।

जैसा कि मैंने इंटरनेट पर पढ़ा कि अफजल गुरु अपनी स्कूल में स्वतंत्रता दिवस की परेड का नेतृत्व करता था लेकिन एक दिन उसने देखा कि सीमा पर तैनात जवान राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर उसके गांव में किसी तरह का अत्याचार कर रहे हैं और वहां से अफजल गुरु की मानसिकता में बदलाव आया। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का एक नौजवान धीरे धीरे इस देश की व्यवस्था से नाराज होता गया और उसका यह सफ़र संसद पर हमले पर जाकर सामने आया, और अंततः उसके दिल में उपजी इस नकारात्मक भावना ने उसे फॉंसी पर लटकने को मजबूर कर दिया।

क्या इस देश में अफ़जल गुरु एक ऐसा अकेला आदमी था जो इस व्यवस्था से नाराज था, नहीं ऐसा नहीं है अन्ना के आंदोलन में उपजी भीड़, केजरीवाल की आम आदमी की पार्टी से जुड़े नौजवान, दिल्ली रेप केस के मामले में सोसल मीडिया के माध्यम से इंडिया गेट पर इकट्ठा हुई भीड़ ऐसे ही व्यवस्था से नाराज नौजवानों की आवाज है, जो शायद सत्ता कि सिंहासन पर बैठे हुक्मरानों को सुनाई नहीं दे रही और अगर सुनाई दे भी रही है इसका अहसास हो नहीं पा रहा है। समय समय पर पूरे देश में उग्र व असंतुष्ट युवा जो आज भी सड़कों पर टायर जलाता है, पुलिस से पानी की बौछारें सहन करता है, लाठियां खाता है, कुछ समय के लिए गिरफ्तारी देता है, क्या ऐसे नौजवान नहीं है जिसमें अफज़ल जैसे युवा की मानसिकता होगी।

आज हमारी इस व्यवस्था से और इस तंत्र से पूरा देश नाराज है, पूरे देश में इस व्यवस्था व तंत्र को लेकर आवाज उठ रही है। ऐसे में किसी युवा का भटक जाना कोई बड़ी बात नहीं है। अफजल गुरु के साथ गलत ये हुआ कि उसकी इस सोच का पड़ोसी देश ने फायदा उठाया, चूंकि वह सीमांत प्रांत का रहने वाला था तो इसके दिल में अवयवस्था से उपजे बीज को पड़ोसी देश ने पानी दिया और धार्मिक कट्टरता की खाद से पल्लिवत व पुष्पित किया। और दोस्तों धर्म मनुष्य के रग रग में व्याप्त हैं, तो ऐसे में किसी युवा को यह बताना कि तुम्हारी सारी नाराजगी धर्म के रास्ते दूर हो जाएगी जरूर उस युवा को एक दिशा प्रदान करती है। अब यह दिशा सही है या गलत ऐसी सोचने की शक्ति युवा मन की नहीं हो सकती। अफजल ने जो किया निश्चित तौर पर वो गलत था और राष्ट्र विरोधी था।

तो क्या राज्य की सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वो ऐसी व्यवस्था कायम करे कि कोई अफजल पैदा ही न हो, सिर्फ किसी को फांसी पर लटका देने से युवाओं का आक्रोश या व्यवस्था दुरुस्त नहीं हो जाएगी। राज्य की यह जिम्मेदारी है वो ऐसा माहौल पैदा करें कि युवाओं में असंतोष हो ही नहीं और ऐसा क्यों होता है कि हमारा पड़ोसी राष्ट्र हमारे युवाओं को बरगलाने में सफल हो जाता है, क्यों कोई युवा किसी के बहकावे में आ जाता है क्या इस मूल प्रश्न पर सोचना राज्य की जिम्मेदारी नहीं है। हमारे संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में राज्य को भी जिम्मेदार ठहराया गया है।

मेरा इस आलेख के माध्यम से यह कहने का मतलब है कि राज्य में ऐसी व्यवस्था हो जो कि हमारी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोक का तंत्र है, यह अहसास दिलाए। जनता को लगे कि जनता का जनता के लिए और जनता के द्वारा राज हो रहा है। व्यवस्था अपनी लगे, खुद की बनाई लगे। सिर्फ दण्ड देना ही अपराध समाप्त करने की निशानी नहीं है, इससे तो अपराधी समाप्त होता है। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। तो अपराधी को सजा मिले इससे ज्यादा जरूरी यह है कि अपराध मूल से नष्ट हो ऐसी व्यवस्था कायम हो।

लेखक श्‍याम नारायण रंगा 'अभिमन्‍यु' पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं तथा बीकानेर के रहने वाले हैं. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 9950050079 के जरिए किया जा सकता है.

जांच से बौखलाया हिंदुस्‍तान प्रबंधन मुंगेर के डीएम-एसपी को निपटाने में जुटा!

मुंगेर। पटना उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति माननीय अंजना प्रकाश के आदेश के आलोक में विश्वस्तरीय 200 करोड़ के दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन फर्जीवाड़ा में पुलिस कार्रवाई की रफ्तार से परेशान अखबार के नामजद अभियुक्तगण बिहार के सीएम नीतीश कुमार और डीजीपी अभ्यानन्द को निशाने पर ले चुके हैं।  नामजद अभियुक्तों की शह पर जिलावार अवैध संस्करण और विज्ञापन फर्जीवाड़ा में फंसे अन्य हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों का प्रबंधन और संपादकीय समूह भी मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक को बदनाम करने में जुट गया है।

दैनिक हिन्दुस्तान और अन्य हिन्दी अखबार अपने पटना के संस्करणों में मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक और सरकार से जुड़ी खबरों को कुछ विशेष ढंग से प्रकाशित कर रहे हैं। साथ ही राज्य के दर्जनों जिलों में प्रकाशित हो रहे अवैध संस्करणों में भी छोटी-छोटी घटनाओं को काफी बढ़ा-चढ़ाकर प्रकाशित किया जा रहा है। दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन फर्जीवाड़ा से जुड़े पटना उच्च न्यायालय के 17 दिसंबर 2012 के ऐतिहासिक आदेश के बाद की तिथियों के 38 जिलों के जिलावार संस्करणों की समीक्षा करने पर अखबार प्रबंधन और संपादकीय समूह का षडयंत्र अपने-आप ही उजागर हो जायेगा।  अवैध संस्करण और विज्ञापन फर्जीवाड़ा में लिप्त अखबारों की कोशिश जनता को इन दिनों यह बताने की हो रही है कि ''बिहार में जंगल राज पुनः लौट आ रहा है''।

उदाहरण के तौर पर 1 फरवरी को मुंगेर में घटित घटना को लें। एक अल्पसंख्यक छात्रावास के नामकरण को लेकर घेराव, प्रदर्शन और जुलूस का आयोजन किया गया। दिनभर जमकर नारेबाजी होती रही। छिटपुट पथराव की घटना घटी। तीन व्यक्तियों को मामूली चोटें आईं। इस खबर को अभियुक्तों ने दैनिक हिन्दुस्तान के मुंगेर संस्करण में प्रथम पृष्ठ पर पूरे आठ कालम में काफी उत्तेजक रूप में प्रस्तुत किया। अखबार के प्रकाशित खबर के शीर्षक और कवरेज के स्वरूप से कोई पाठक अंदाजा लगा सकता है कि आखिर अखबार मुंगेर जिले में क्या चाहता है? अमन-चैन या और कुछ?

प्रकाशित समाचार को पूरी दुनिया के समक्ष इस समाचार के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे पाठक कुछ अपनी राय कायम कर सकें। दैनिक हिन्दुस्तान हर क्षण ऐसे मौके की तलाश में है जिससे जिला पदाधिकारी कुलदीप नारायण और पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन को ‘‘अक्षम‘‘  साबित किया जा सके और प्रदेश सरकार इन दोनों अफसरों को मुंगेर से बाहर कर सके।

जिलाधिकारी कुलदीप नारायण और पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन ने हिंदुस्तान प्रबंधन को नाकों चने चबवा रखा है। हिंदुस्तान की मालकिन से लेकर प्रधान संपादक और अन्य कई लोग विज्ञापन घोटाले में फंसे हुए हैं। ऐसे में हिंदुस्तान अखबार इन अफसरों से बदला लेने पर उतारू है।

मुंगेर के जिलाधिकारी कुलदीप नारायण और पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन की रिपोर्ट के कारण ही पटना उच्च न्यायालय में  विश्वस्तरीय 200 करोड़ के दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन फर्जीवाड़ा में शोभना भरतिया सहित सभी नामजद अभियुक्तगण मुकदमा हार गए थे। इन अफसरों की रिपोर्ट पर पटना उच्च न्यायालय ने संतोष प्रकट किया। इस कारण से दैनिक हिन्दुस्तान जिला प्रशासन की छवि को धूमिल करने का हर संभव प्रयास कर रहा है। 

अभियुक्तों की गिरफ्तारी किसी समय हो सकती है : पटना उच्च न्यायालय के 17 दिसंबर के इस फैसले के बाद मुंगेर कोतवाली कांड संख्या-445/2011 के नामजद अभियुक्त श्रीमती शोभना भरतिया (अध्यक्ष, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली), अमित चोपड़ा (पूर्व प्रकाशक, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली), शशि शेखर (प्रधान संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली), अवध कुमार श्रीवास्तव उर्फ अकू श्रीवास्तव (पूर्व संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान, पटना संस्करण, पटना) और बिनोद बंधु (पूर्व स्थानीय संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान, भागलपुर संस्करण, भागलपुर) के गर्दन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है। बिहार पुलिस अब नामजद अभियुक्तों को किसी भी क्षण गिरफ्तार कर सकती है। सभी नामजद अभियुक्त भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420/471 और 476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8 (बी), 14 और 15 के अन्तर्गत आरोपित हैं।

मुंगेर से श्रीकृष्‍ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नं. -09470400813 के जरिए किया जा सकता है.


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लाइव इंडिया समूह की मासिक पत्रिका ‘लाइव इंडिया’ लांच

लाइव इंडिया न्‍यूज चैनल का संचालन करने वाली कंपनी समृद्ध जीवन फूड लिमिटेड समूह ने अपने करेंट अफेयर्स पत्रिका 'लाइव इंडिया' की लांचिंग 13 फरवरी को दिल्‍ली के होटल संग्रीला में किया. लांचिंग कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद, सीपी जोशी, पवन बंसल, दिल्‍ली के राज्‍यपाल तेजिंदर खन्‍ना, सिक्किम के राज्‍यपाल बीपी सिंह, जयदू अध्‍यक्ष शरद यादव, भाजपा प्रवक्‍ता रविशंकर प्रसाद, पीसीआई अध्‍यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू, अहमद पटेल, आस्‍कर फर्नांडीज, मोहन प्रकाश, पूर्व क्रिकेटर एवं सांसद अजहरुद्दीन शामिल हुए.

पत्रिका के प्रधान संपादक डा. प्रवीण तिवारी ने मौजूद लोगों को पत्रिका के सोच एवं सरोकार के बारे में विस्‍तार से बताया. 80 पेज के इस मैगजीन में खबर के हर पहलू को समायोजित करने की कोशिश की गई है. इस पत्रिका को पॉजिटिव एप्रोच के साथ लांच किया गया है. कंपनी के सीएमडी महेश मोतेवार ने मीडिया कंपनी के बारे में विस्‍तार से जानकारी दी. सुप्रीया कर्णसे ने मैगजीन को लांच करने के कारणों पर विस्‍तार से प्रकाश डाला.

इस मौके पर नौ युवाओं को लाइव इंडिया यंग एचिवर अवार्ड प्रदान किया गया. कंपनी अब यह अवार्ड प्रत्‍येक साल कुछ अलग और नया करने वाले युवाओं को प्रदान करेगी. आईआईएम पास आउट इरफान आलम, युवा लेखिका निकिता सिंह, पहली महिला मेट्रो ड्राइवर प्रिया सचान, युवा वैज्ञानिक शैलश खरगवाल, सीए टॉपर प्रेमा जयकुमार, युवा आईएएस गोविंद जायसवाल, क्रिकेटर उन्‍मुक्‍त चंद ठाकुर, बैडमिंटन प्‍येयर पीबी संधू तथा विकलांग खिलाड़ी राजकुमार तिवारी को उनके उत्‍कृष्‍ट कार्यों को देखते हुए यह पुरस्‍कार प्रदान किया गया.

इरफान आईआईएमसी से निकलने के बाद रिक्‍शावालों के बीच काम कर रहे हैं, जबकि निकिता मात्र 22 साल की उम्र में कई किताबों की लेखिका बन चुकी हैं. प्रेमा जयकुमार गरीबी के बीच सीए जैसी परीक्षा में टॉप किया है. ऐसे ही हालातों के बीच रहने वाले गोविंद जायसवाल आईएएस चुने गए हैं. दोनों के पिता क्रमश: ऑटो तथा रिक्‍शा चालक हैं. वहीं राजकुमार तिवारी ने विकलांग वर्ग के खेल में भारत को स्‍वर्ण पदक दिलाया है. प्रबंधन इसी तरह की दुरुह परिस्थितियों से निकल कर अच्‍छा करने वाले युवाओं को प्रत्‍येक वर्ष यंग एचिवर अवार्ड प्रदान करेगा.

सारा कार्यक्रम लाइव इंडिया के एडिटोरियल हेड सतीश के सिंह के नेतृत्‍व में आयोजित हुआ. बताया जा रहा है कि पत्रिका को अभी मासिक लांच किया गया है, परन्‍तु इसे जल्‍द ही पाक्षिक और उसके बात साप्‍ताहिक किया जाएगा. इसके लिए लाइव इंडिया अच्‍छे और युवा पत्रकारों की तलाश कर रहा है. गौरतलब है कि इस पत्रिका को डा. तिवारी के अलावा उनकी टीम के पंकज शर्मा एसोसिएट एडिटर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. भरत श्रीवास्‍तव, अमित कुमार गौर, सुनील कुमार एवं विशाल जैन सहयोगी हैं.

कार्यक्रम में वरिष्‍ठ पत्रकार जयशंकर गुप्‍ता, एनके सिंह, अजीत अंजुम, उर्मिलेश भट्ट, सुरेश बाफना, सुधीर तैलंग, श्रीवर्धन त्रिवेदी समेत तमाम लोग मौजूद रहे. कार्यक्रम का संचालन वरिष्‍ठ पत्रकार देबांग ने किया. लाइव इंडिया चैनल की टीम में शामिल शादाब सिद्दीकी, कुमार गौरव, अखिलेश राय, तरुण कालरा, सुमित चौधरी ने भी इस आयोजन को सफल बनाने में अपना सक्रिय योगदान दिया.

दिवंगत पत्रकारों को किया गया याद, अब 10 फरवरी को मनेगा ‘पत्रकार श्रद्धांजलि दिवस’

नई दिल्ली : भारत में सम्भवतः पहली बार ऐसा हुआ है कि पत्रकारों के लिए पत्रकारों द्वारा कोई श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया हो. ऐसा पहली बार न्यूज़ पेपर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के तत्वाधान में १० फरवरी को किया गया. एसोसिएशन के संस्थापक डॉ. एम. आर गौड़ जी की दूसरी पुण्य तिथि पर नई दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान में देश कई गणमान्य पत्रकारों ने डॉ. गौड़ को श्रद्धांजलि दी और उनके साथ पिछले दिनों दिवंगत कई पत्रकारों के व्यकित्व और कृतित्व को भी याद किया गया.

इसकी पहल की थी एसोसिएशन के महासचिव विपिन गौड़  ने. जिसमें शरीक हुए देश के कई जाने माने पत्रकार बंधू और बांधव. वरिष्ठ पत्रकारों में सुनील डांग, कुमार राकेश, संजीव चौहान, प्रो दिलीप कुमार, कनाडा से आये रूबी बेदी, इन्दर बेदी के अलावा दिल्ली के कई मीडिया संस्थानों के सैकड़ों की संख्या में विद्यार्थियों ने इस सभा में शिरकत की. इस दिवस को “पत्रकार श्रद्धांजलि दिवस“ के तौर पर प्रति वर्ष मनाने का निर्णय किया गया. इस एक प्रस्ताव भारत सरकार और दिल्ली सरकार को भी सूचनार्थ भेजे जाने पर आम सहमति बनी.

इस सभा में पत्रकार स्वर्गीय सचिन विजय सिंह (निर्देशक, जेल डायरी न्यूज़ एक्सप्रेस), स्वर्गीय रवि भारती (संवादाता आजतक), स्वर्गीय राघवेन्द्र मुद्गल (न्यूज़ एक्सप्रेस), स्वर्गीय कमल शर्मा (संवादाता आजतक), स्वर्गीय प्रदीप राय (जी न्यूज) व अन्य सभी उन दिवंगत पत्रकारों को भी याद किया गया, जिनके बारे में सभा को आजतक पूरा विवरण कई कारणों से नहीं मिल सका. दिवंगत पत्रकारों के परिवारवालों को शाल और सम्मान पत्र से सम्मानित किया गया. इस सभा के दुसरे सत्र में “पत्रकारिता और लोकतंत्र में महिलाओ की भूमिका”विषय पर एक गोष्ठी का भी आयोजन किया गया. जिसमें मुख्य वक्ताओं के अलावा दिल्ली के कई मीडिया संस्थानों के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया और अपने अपने विचार रखे.

वरिष्ठ पत्रकार और डे आफ्टर समूह के प्रधान सम्पादक श्री सुनील दांग ने कहा कि भारत एक ऐसा देश है, जहाँ मीडिया की अलग पहचान है. देश मे कई स्वनामधन्य पत्रकार है जिन्होंने देश में पत्रकारिता में एक बड़े पैमाने पर विशव के सामने रखा है, उन्हें मेरा शत शत नमन है. श्री डंग ने पत्रकारिता में महिलाओं के योगदान की भी सराहना की, जिन भारत को गर्व है. श्री डंग ने पत्रकारिता को समाज सेवा का सबसे बेहतर माध्यम बताया. देश में राजनीति, संसद, प्रशासन सहित वैदेशिक मामलों पर गहरी पकड़ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार कुमार राकेश ने पत्रकारिता में सच की ताक़त को विश्व की असीम ताक़त बताया. उन्होंने कहा कि आज की पत्रकारिता पूर्व की तुलना में काफी बदल गयी लगती है, तथाकथित बाजारवाद के नाम पर सच्ची पत्रकारिता का गला घोंटा जा रहा है.

उन्होंने कहा कि सच सदैव खरा है. पहले भी था और भविष्य में भी रहेगा. सच से बड़ा कोई नहीं. श्री राकेश ने अपने युवा साथियों से अपील की वे इस पेशे को अन्य पेशों की तरह न लेकर समाज के सर्वांगीण विकास से जोड़कर देखे. उन्होंने कहा कि-आज समाज को कुछ स्वार्थपरक तत्वों ने जिस खतरनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया है. वह चिंता की बात है. उसे उस दशा से बाहर निकालने के लिए हम सबको एक नए सिरे से बहुत काम करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि सच्चाई का कोई विकल्प नहीं हो सकता. महिला पत्रकारों के योगदान की चर्चा करते हुए श्री राकेश ने कहा कि देश में कई स्वनामधन्य महिला पत्रकारों ने राष्ट्र हित में सराहनीय कार्य किये हैं, जिनमें सुचेता दलाल, सीमा मुस्तफा, सरोज नागी, चित्रा सुब्रह्मण्यम, ओल्गा टेलिस जैसों के अप्रतिम योगदान को नहीं भुलाया जा सकता.
 
अपराध पत्रकारिता को समाज से जोड़ कर उसे नई परिभाषा देने वाले वरिष्ठ पत्रकार संजीव चौहान ने कहा कि आज का मीडिया, मीडिया नहीं "बाजार" बनता जा रहा है. पत्रकारिता उद्देश्यों से भटक रही है. कोई भी मीडिया हाउस अब मालिक उसमें झोंकी हुई रकम को मुनाफे के साथ वापस पाने के लिए "मीडिया-हाउस" खोलता है. ऐसी पत्रकारिता जो मुनाफे के उद्देश्य से शुरु होती हो, उसका भविष्य क्या होगा, कहने की जरुरत नहीं है. सब कुछ हाल-फिलहाल सबके सामने है. श्री चौहान ने कहा कि अब पत्रकार और पत्रकारिता की जरुरत मीडिया-हाउस को कम होने लगी है. उन्होंने आगे कहा कि पत्रकार वही है, जिसकी जेब में खबर है. बाकी सब पद व्यर्थ के हैं. पत्रकार और खबर ही एक दूसरे के पूरक होते हैं.

श्री चौहान के मुताबिक जरुरी नहीं है कि किसी चैनल का प्रमुख या फिर किसी अखबार का संपादक बहुत अच्छा पत्रकार भी हो. ये सब भी आज के बाजारवाद से साफ जाहिर है. मौजूदा मीडिया में आज तमाम ऐसे नाम हैं, जिन्हें अपनी की हुई शायद ही कोई ऐसी खबर याद हो, जिससे देश-समाज का भला हुआ हो. या उनकी खबर सुर्खियों में रही हो, लेकिन "जुगाड़" के सहारे आज वे भी संपादक/ चैनल हेड बने बैठे हैं.

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफ़ेसर डॉ. दिलीप कुमार ने अपनी लोक प्रिय शैली में छात्रों को पत्रकारिता के कई गुर बताये और पत्रकारिता के सामाजिक योगदन पर भी प्रकाश डाला. युवा पत्रकार और एसोसियेशन के महासचिव विपिन गौड़ ने युवाओं को देश की ताक़त बताया. उन्होंने सभी साथियों से अपील कि महात्मा गाँधी की एकमात्र पसंदीदा पुस्तक “गीता” के आदर्शों को जीवन से जोड़कर देखे. गीता में बड़ी शक्ति है. क्योंकि उस महान ग्रन्थ में कर्म को प्रधानता दी गयी है. कर्म ही जीवन है. श्री गौड़ ने इस महान दिवस को “पत्रकार श्रंद्धांजलि दिवस” घोषित किये का प्रस्ताव किया, जिसे सभा ने में सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया.

दिल्‍ली पुलिस ने कोर्ट से कहा – जारी रखा जाए मीडिया प्रतिबंध

नई दिल्ली : दिल्ली पुलिस ने दिल्ली उच्च न्यायालय से 16 दिसंबर,12 के सामूहिक दुष्कर्म के मुकदमे की सुनवाई की मीडिया रिपोर्टि पर लगे प्रतिबंध को जारी रखने का आग्रह किया है। दक्षिण दिल्ली की एक त्वरित अदालत में सुनवाई के दौरान मीडिया को भी मौजूद रहने की अनुमति देने के लिए दायर एक याचिका का विरोध करते हुए पुलिस के वकील दयान कृष्ण ने कहा, "दुष्कर्म के हर मामले की सुनवाई `गोपनीय` रहनी चाहिए।"

कृष्ण ने कहा कि मुकदमे में कई गवाह हैं। उनके हित में मुकदमे की सुनवाई बंद कमरे में होनी चाहिए। कृष्णा ने कहा, "इस मुकदमे में आरोपपत्र दायर हो चुका है। हमारे पास 80 गवाह हैं। अभी तक 11 गवाहों की गवाही हो चुकी है। रोजाना आधार पर सुनवाई हो रही है।" न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने कृष्णा से पूछा कि क्या किसी अधिकृत पत्रकार को न्यायलय की कार्यवाही की रिपोर्ट करने की अनुमति दी सकती है। इसपर कृष्णा ने नाकारात्मक उत्तर दिया। इस मुद्दे पर अगली सुनवाई 28 फरवरी को होगी। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दोषियों को कोर्ट में लाने में हो रही परेशानी को देखते हुए 7 जनवरी को मुकदमे की बंद कमरे में सुनवाई का आदेश दिया था। कोर्ट ने बिना उसकी अनुमति से मुकदमे से जुड़े किसी भी समाचार को प्रकाशित नहीं करने का भी आदेश दिया था। (एजेंसी)

घाटी में फिर शुरू हुआ अखबारों का प्रकाशन

: सीएम ने कहा- प्रशासन ने नहीं लगाया था प्रतिबंध : श्रीनगर : मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने वादी में अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के बाद अखबारों के प्रकाशन और बिक्री पर किसी तरह की पाबंदी से इन्कार किया है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा होता तो किसी स्थानीय अखबार का ऑनलाइन संस्करण भी जारी नहीं होता। इस बीच अफजल के फांसी के बाद बुधवार को पहली बार पाठकों के पास अखबार पहुंचा। अफजल गुरु को फांसी के बाद वादी में हालात को काबू रखने के लिए प्रशासन ने शनिवार की रात से ही श्रीनगर में प्रकाशित होने वाले सभी अखबारों को कथित तौर पर बंद करा दिया था।

प्रशासन कुछ छपे अखबारों को जब्‍त भी करा लिया था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि यहां किसी तरह की अप्रिय स्थिति उत्‍पन्‍न ना हो सके। स्थिति के लगभग सामान्य हो जाने और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया तक यह मामला पहुंच जाने के बाद प्रशासन ने मंगलवार की शाम स्थानीय अखबारों के प्रकाशन पर लगी अनाधिकृत रोक को हटा लिया। बुधवार को कई स्थानीय अखबार सुबह पाठकों के हाथ में पहुंचे। इन अखबारों का प्रकाशन शनिवार से ही बंद था।

इधर, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला जो शनिवार को गुरु को फांसी के बाद से ही ट्विटर पर सक्रिय नहीं थे, वे भी बुधवार को यहां उपस्थित हुए तथा अखबारों पर लगाए गए प्रतिबंध को मनगढ़ंत बताया।  उन्होंने ट्विटर पर कहा कि सरकार ने अखबारों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था। अखबार मालिकों और संपादकों ने खुद ही अखबारों का प्रकाशन बंद करने का फैसला किया था, क्योंकि उनका मानना था कि क‌र्फ्यू के चलते वह अखबार बांट नहीं पाएंगे। उमर  ने कहा कि अगर सरकार ने प्रतिबंध ही लगाना होता तो वह अखबारों के ऑनलाइन संस्करण पर भी लगाती। लेकिन किसी भी अखबार का ऑनलाइन संस्करण प्रभावित नहीं हुआ है।

पत्रकार बनकर ब्‍लैकमेल करने के आरोपियों को 20 तक जेल

रायपुर। सेजबहार हाउसिंग बोर्ड कालोनी में पत्रकार बनकर वसूली करने के आरोपी राहुल ठाकुर, सूरज सोनी, विनायक गुप्ता की न्‍यायिक हिरासत कोर्ट ने 20 फरवरी तक बढ़ा दी है. रिमांड खतम होने के बाद पुलिस ने इन्‍हें कोर्ट में पेश किया था. मुख्‍य आरोपी राहुल ठाकुर ने अपने अधिवक्‍ता के जरिए न्‍यायालय में जमानत के लिए आवेदन किया था, परन्‍तु कोर्ट ने परिस्थितियों और साक्ष्‍यों को देखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया.

पुलिस ने इन तीनों आरोपियों को उस समय गिरफ्तार किया था जब वे पत्रकार बनकर एक छात्र न्‍याय मिश्रा से दस हजार की वसूली की तथा 50 रुपये और मांग रहे थे. आरोपियों ने छात्र की दोस्‍त के साथ सेजबहार कालोनी में फोटो खिंचकर उसे ब्‍लैकमेल कर रहे थे.

सुब्रत राय के अलावा वंदना भार्गव, रवि शंकर दुबे और अशोक राय चौधरी के भी एकाउंट सीज, इन सभी की संपत्ति कुर्क होगी

नई दिल्ली: सेबी के निर्देश के मुताबिक सहारा ग्रुप के चैयरमेन सुब्रतो रॉय के साथ ही कंपनी के 3 बड़े अधिकारियों के भी खाते भी फ्रीज होंगे। इन खातों में उसकी चल और अचल संत्तियां दोनों शामिल रहेंगी। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने जिन संपत्तियों को कुर्क करने का आदेश दिया है, उसमें सहारा समूह की कंपनी आंबी वैली की जमीन शामिल है। पुणे के समीप आंबी वैली परियोजना में रिजार्ट विलेज स्थापित किया गया है। इसमें दिल्ली, गुड़गांव, मुंबई तथा देश के विभिन्न स्थानों पर समूह की परियोजनाओं के विकास के अधिकार भी शामिल हैं।

इसके अलावा सेबी ने आंबी वैली में इक्विटी शेयर, म्यूचुअल फंड, बैंक तथा डिमैट खातों तथा सभी बैंकों की शाखाओं में जमा पैसे को जब्त करने का भी आदेश दिया है। सेबी ने सभी बैंकों से उन खातों में जब्त जमा राशि सेबी-सहारा रिफंड खाते में हस्तांरित करने को कहा है। जिन अधिकारियों के बैंक खातों पर रोक और संपत्ति की कुर्की के आदेश दिए गए हैं, उनमें सुब्रत राय और निदेशक वंदना भार्गव, रवि शंकर दुबे तथा अशोक राय चौधरी शामिल हैं। फैसला तत्काल प्रभाव से लागू करने का आदेश है।

सेबी ने शीर्ष अधिकारियों को 21 दिन के अंदर अपनी सभी चल और अचल संपत्ति का ब्योरा जमा करने को कहा है और इसी अवधि में वे उनकी बेच-खरीद नहीं कर सकते हैं और न ही उन पर कोई कर्ज ले सकते हैं। बाजार नियामक के आदेश में दोनों कंपनियों को भी निर्देश है कि वे अपनी किसी भी संपत्ति का किसी भी तरीके से अब कोई सौदा न करे। इन कंपनियों को भी चल और अचल संपत्ति की सूची जमा करने के लिए 21 दिन का मौका दिया गया है। सेबी ने कहा कि उसने रिजर्व बैंक तथा प्रवर्तन निदेशालय को इस कार्रवाई की सूचना दे दी है।

नियामक ने कहा है कि वह सहारा समूह की अन्य कंपनियों, किसी विशेष प्रायोजन कंपनी और पार्टनरशिप फर्म में इन दोनों कंपनियों (एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल) के निवेश का पूरा ब्योरा प्राप्त होने के बाद जब्त संपत्ति की बिक्री का आदेश उचित समय पर करेगा। सेबी के दोनों आदेश 160 पृष्ठों के हैं। दोनों आदेशों पर सहारा से टिप्पणी मांगी गई थी लेकिन कंपनी की तरफ से अब तक कोई जवाब नहीं आया।

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने राय को 24 हजार करोड़ जमा करवाने को कहा था जिसे वो जमा नहीं करवा पाए थे। सेबी ने यह भी आदेश दिया है कि सहारा ग्रुप के चैयरमेन सुब्रतो रॉय और अन्य 3 की तमाम चल और अचल संपत्तियां अटैच की जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने गत माह सहारा ग्रुप की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी। सहारा ने निवेशकों का 24 हजार करोड़ रुपए लौटाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पुनर्विचार करने के लिए याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दे रखा है कि सहारा ग्रुप निवेशकों के 24 हजार करोड़ 15 फीसदी ब्याज के साथ लौटाए।

सेबी ने सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कारपोरेशन लि़ (एसएचआईसीएल) और सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कारपोरेशन लि़ (एसआईआरईसीएल) के खिलाफ दो अलग-अलग आदेश जारी करते हुए कहा कि इन कंपनियों ने बांडधारकों से क्रमश: 6380 करोड़ रुपये तथा 19,400 करोड़ रुपये जुटाए थे। धन जुटाने में अनेक अनियमितताएं बरती गईं। सेबी ने आज अपने आदेश में कहा कि इनमें से किसी कंपनी ने बाकी की किस्तें नहीं जमा कराई हैं इसलिए उसे न्यायालय के आदेशानुसार यह कार्रवाई करनी पड़ी है।

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जी न्‍यूज से रवि पराशर का इस्‍तीफा, सहारा नेशनल के हेड बनेंगे

जी न्‍यूज से बड़ी खबर आ रही है. वरिष्‍ठ पत्रकार रवि पराशर ने चैनल से इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर न्‍यूज रूम इंचार्ज की जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. रवि अपनी नई पारी सहारा समूह के साथ शुरू कर रहे हैं. खबर है कि उन्‍हें नेशनल चैनल का हेड बनाया जा रहा है. उनकी नियुक्ति वाशिन्‍द्र मिश्र के स्‍थान पर की जा रही है. वे पिछले बारह सालों से जी न्‍यूज को अपनी सेवाएं दे रहे थे. इसके पहले भी वे कुछ संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

इधर, रवि सहारा ज्‍वाइन करने जा रहे हैं. उधर, सहारा समूह के खाते सीज हो गए हैं. उल्‍लेखनीय है कि जी न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर वाशिन्‍द्र मिश्र भी राष्‍ट्रीय सहारा गए थे, परन्‍तु वहां की परिस्थितियों से आजिज आकर वे कुछ ही दिनों में इस्‍तीफा देकर चले गए. अब रवि सहारा समूह के साथ कितना समय निबाह कर पाते हैं यह देखने वाली बात होगी.

मशहूर फोटो जर्नलिस्ट प्रमोद पुष्करणा ने सेलरी एरियर के लिए अरिंदम चौधरी को लिखा पत्र

प्रमोद पुष्करणा देश के जाने-माने फोटो जर्नलिस्ट हैं. वे अरिंदम चौधरी की मीडिया कंपनी में कार्यरत हैं. प्लानमैन मीडिया नामक अरिंदम चौधरी की मीडिया कंपनी में इन दिनों काफी उथल-पुथल चल रहा है. यहां कार्यरत मीडियाकर्मियों का हाल बुरा है. सेलरी के लिए सबको झेलना पड़ रहा है. छंटनी का सिलसिला जारी है. चर्चा तो यहां तक है कि अरिंदम चौधरी अब अपनी मीडिया कंपनी बंद करने की तैयारी में हैं. वे मीडिया कंपनी के अपने बहुत खास लोगों को भी साइडलाइन करने की तैयारी कर चुके हैं.

प्लानमैन मीडिया में कार्यरत प्रमोद पुष्करणा ने अपने सेलरी एरियर के लिए अरिंदम चौधरी को पत्र लिखा है. ऐसा नहीं है कि उन्होंने पहली बार पत्र लिखा है. वे कई बार एप्रोच कर चुके हैं पर उन्हें कोई जवाब नहीं मिल रहा. आखिरकार उन्होंने अपनी पीड़ा व पत्र को अपने फेसबुक वॉल पर प्रकाशित कर सार्वजनिक कर दिया है. देखना है कि अरिंदम चौधरी अपने मीडियाकर्मियों का हक देते हैं या चुप्पी साधे हुए डकार जाते हैं. नीचे वो पोस्ट है जिसे प्रमोद पुष्करणा ने अपने फेसबुक वॉल पर प्रकाशित किया है….

प्रमोद पुष्करणाPramod Pushkarna : Planning to take on Planman Media to recover salary arrears! Am not the only journalist whom Arindham Chaudhary who can hardly manage his companies' financial affairs though he dares to dare youth to "dare to dream beyond the IIMs".

Would like to share some of my letters to IIPM/Planman Media with friends and colleagues, particularly those in the Planman media, and like me, are struggling to get their salary and arrears that invariably run into many, many months! Here goes my New Year Letter to Arindam Chaudhary. Long, but do read…

Dear Arindam,

At the outset, let me wish you a very happy new year, albeit a bit late. But who can appreciate and pardon the delay more than you? I am still awaiting the release of my salary arrears from August 2012 onwards! As are many others who worked with me at The Sunday Indian.

I write this mail to you in the hope that you, as the man at the helm of affairs, and whose smiling face shows up from countless ads all over the country, can be more helpful than others in Planman.

I have been corresponding with Sandeep from October onward, without any worthwhile response, and lately with no response whatsoever. I have even begun to wonder whether he updates you about the state of affairs in the organization– or disorganization, whatever you would
choose to call it. This is of course presuming that you are so caught up in other motivational assignments/PIL/films/Formula racing etc that you have missed seeing the reality in TSI.

In fact Sandeep had the audacity to suggest that I was working for two establishments at a time when I was right there in office, for everyone to see ! How I would really like to be a Mr India !

Employees totally dependent on monthly salaries to pay rent,EMIs,medical bills, school fees, and even feed themselves and their family, are in a pathetic state. I have personally loaned some of them money for fees as I am committed to educating children.

On two occasions, we were given salaries in 12 installments, which means 11 out of 12 of them were delayed payments of payments already delayed. More importantly, a person getting about 36,000 rupees can hardly pay rent, fees etc etc with 3000 rupees ! I would really like you to try and understand this sad state of affairs.

What surprises me even the more is that you run management schools where students are taught financial management, good HR practices etc. Are you teaching and doing the wrong thing, or are the lessons you learnt failing you in the fast changing world?

Anyway, all I am interested is that I, along with my colleagues, get our full salaries at the earliest. The date of payment is constantly being delayed, and your top management staff have forgotten the courtesy and good practice of a reply. I hope it is not too much to expect one from you.

You started out with great dreams. And like King Fisher's Vijay Mallya, you are floundering. But now you would perhaps do well to customize them in keeping with the global reality.

I hope you read this full mail, and thank you if you did that.

फ़ैज़ के जन्म दिवस पर विशेष : इंकलाब का शायर या मुहब्बत का?

फ़ैज़ अहमद फैज़ की जन्मशती पिछले साल मनायी गई। फैज़ इस महाद्वीप के ऐसे कवि रहे हैं जो भाषा व देश की दीवारों को तोड़ते हैं। वे ऐसे शायर हैं जिन्होंने अपनी शायरी से लोगों के दिलों में जगह बनाई। हमारे अन्दर इंकलाब का अहसास पैदा किया तो वहीं मुहब्बत के चिराग भी रोशन किये। दुनिया फ़ैज़ को इंकलाब के शायर के रूप में जानती है लेकिन वे अपने को मुहब्बत का शायर कहते थे। इंकलाब और मुहब्बत का ऐसा मेल विरले ही कवियों में मिलता है। यही कारण है कि फ़ैज़ जैसा शायर मर कर भी नही मरता। वह हमारे दिलों में धड़कता है। वह उठे हुए हाथों और बढ़ते कदमों के साथ चलता है। वह हजार हजार चेहरों पर नई उम्मीद व नये विश्वास के साथ खिलता है और लोगों के खून में नये जोश की तरह जोर मारता है।

फ़ैज़ उर्दू कविता की उस परंपरा के कवि हैं जो मीर, गालिब, इकबाल, नज़ीर, चकबस्त, ज़ोश, फ़िराक, मखदूम से होती हुई आगे बढ़ी है। यह परंपरा है, आवामी शायरी की परंपरा। उर्दू की वह शायरी जो माशूकों के लब व रुखसार ;चेहराद्ध, हिज्र व विसाल ;ज़ुदाई-मिलनद्ध, दरबार नवाजी, खुशामद और केवल कलात्मक कलाबाजियों तक सीमित रही है, इनसे अलग यह परंपरा आदमी और उसकी हालत, अवाम और उसकी जिन्दगी से रू ब रू होकर आगे बढ़ी है। फ़ैज़ इस परंपरा से यकायक नहीं जुड़ गये। उन्होंने अपनी शुरुआत रूमानी अन्दाज में की थी तथा ‘मुहब्बत के शायर’ के रूप में  अपनी इमेज बनाई थी।

1930 के बाद वाले दशक के दौरान फैली भुखमरी, किसानों-मजदूरों के आंदोलन, गुलामी के विरुद्ध आजादी की तीव्र इच्छा आदि चीजों ने हिंदुस्तान को झकझोर रखा था। इनका नौजवान फ़ैज़ पर गहरा असर पड़ा। इन चीजों ने उनकी रुमानी सोच को नए नजरिये से लैस कर दिया। नजरिये में आया हुआ बदलाव शायरी में कुछ यूँ ढ़लता है:

‘पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से

लौट आती है इधर को भी नजर क्या कीजे

अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी गम है जमाने में मुहब्बत के सिवा

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग’

इस दौर में फ़ैज़ यह भी कहते हैं –

‘अब मैं दिल बेचता हूं और जान खरीदता हूं’।

फ़ैज की शायरी में आया यह बदलाव ‘नक्शे फरियादी’ के दूसरे भाग में साफ दिखता है। हालत का बयान कुछ इस कदर होता है:

‘जिस्म पर क़ैद है, जज़्बात पर जंजीरें हैं

फिक्र महबूस ;बन्दीद्ध है, गुफ्तार पे ता’जीरे ;प्रतिबंधद्ध हैं’

साथ ही यह विश्वास भी झलकता है – ये स्थितियां बदलेंगी, ये हालात बदलेंगे। शायर कहता है:

‘चन्द रोज और मिरी जान ! फकत चंद ही रोज

जुल्म की छांव में दम लेने पे मजबूर हैं हम

…लेकिन अब जुल्म की मी’याद के दिन थोड़े हैं

इक जरा सब्र, कि फरियाद के दिन थोड़े हैं।’

फ़ैज़ का यह विश्वास समय के साथ और मजबूत होता गया। कविता का आयाम व्यापक होता गया। कविता आगे बढ़ती रही। यह जनजीवन और उसके संघर्ष के और करीब आती गई। इस दौरान न सिर्फ फ़ैज़ की कविता के कथ्य में बदलाव आया, बल्कि उनकी भाषा भी बदलती गयी है। जहां पहले उनकी कविता पर अरबी और फारसी का प्रभाव नजर आता था, वहीं बाद में उनकी कविता जन मानस की भाषा, अपनी जमीन की भाषा के करीब पहंुचती गई है। ऐसे बहुत कम रचनाकार हुए हैं, जिनमें कथ्य और उसकी कलात्मकता के बीच ऐसा सुन्दर संतुलन दिखाई पड़ता है। फ़ैज़ की यह चीज तमाम कवियों-लेखकों के लिए अनुकरणीय है, क्योंकि इस चीज की कमी जहां एक तरफ नारेबाजी का कारण बनती है, वहीं कलावाद का खतरा भी उत्पन्न करती हैं।

फ़ैज़ की खासियत उनकी निर्भीकता, जागरुकता और राजनीतिक सजगता है। फ़ैज़ ने बताया कि एक कवि-लेखक को राजनीतिक रूप से सजग होना चाहिए तथा हरेक स्थिति का सामना  करने के लिए उसे तैयार रहना चाहिए। अपनी निर्भीकता की वजह ही उन्हें पाकिस्तान के फौजी शासकों का निशाना बनना पड़ा। दो बार उन्हें गिरफ्तार किया गया। जेलों में रखा गया। रावलपिंडी षडयंत्र केस में फँसाया गया। 1950 के बाद चार बरस उन्होंने जेल में गुजारे। शासकों का यह उत्पीड़न उन्हें तोड़ नहीं सका, बल्कि इस उत्पीड़न ने उनकी चेतना, उनके अहसास तथा उनके अनुभव को और गहरा किया। फ़ैज़ की कविताओं पर बात करते समय उनके उस पक्ष पर भी, जिसमें उदासी व धीमापन है, विचार करना प्रासंगिक होगा। यह उदासी व धीमापन फ़ैज़ की उन रचनाओं में उभरता है जो उन्होंने जेल की चहारदीवारी के अन्दर लिखी थीं। एक कवि जो घुटन भरे माहौल में जेल की सींकचों के भीतर कैद है, उदास हो सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या कवि उदास होकर निष्क्रिय हो जाता है ? धीमा होकर समझौता परस्त हो जाता है ? फ़ैज़ जैसा कवि हमेशा जन शक्ति के जागरण के विश्वास के साथ अपनी उदासी से आत्म संघर्ष  करता है और यह आत्म संघर्ष फ़ैज़ की कविताओं में भी दिखाई देता है। फ़ैज़ उन चीजों से, जो मानव को कमजोर करती हैं, संघर्ष करते हुए जिस तरह सामने आते है, वह उनकी महानता का परिचायक है। वे कहते हैं –

‘हम परवरिशे-लौहो कलम करते रहेंगे/जो दिल पे गुजरती है रक़म करते रहेंगे।’

या और भी:-

‘मता-ए-लौह-औ कलम छिन गई तो क्या गम है/कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उँगलियाँ मैंने/जबाँ पे मुहर लगी है तो क्या रख दी हैं/हर एक हल्का-ए-जंजीर में जुबाँ मैंने’

इन पंक्तियों में एक कवि के रचना कर्म की सोद्देश्यता झलकती है।

वैसे फ़ैज़ ने ‘मुहब्बत के शायर’ के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। इस नजरिये से हम उनकी पूरी कविता यात्रा पर गौर करें तो पायेंगे कि फ़ैज़ का यह रूप अर्थात मुहब्बत के एक शायर का रूप समय के साथ निखरता गया है तथा उनके इस रूप में और व्यापकता व गहराई आती गई है। शुरुआती दौर में जहां उनका अन्दाज रूमानी था, बाद में समय के साथ उनका नजरिया वैज्ञानिक होता गया है। जहाँ पहले शायर हुस्न-ओ-इश्क की मदहोशियों में डूबता है, वहीं बाद में सामाजिक राजनीतिक बदलाव की आकांक्षा से भरी उस दरिया में डूबता है, जिस दरिया के झूम उठने से बदलाव का सैलाब फूट पड़ता है। जहाँ पहले माशूक के लिए चाहत है, समय के साथ यह चाहत शोषित पीड़ित इन्सान के असीम प्यार में बदल जाती है। इसी अथाह प्यार का कारण है कि दुनिया में जहां कहीं दमन-उत्पीड़न की घटनाएं घटती हैं, फ़ैज़ इनसे अप्रभावित नहीं रह पाते हैं। वे अपनी कविता से वहाँ तुरन्त पहुँचते हैं। जब ईरान में छात्रों को मौत के अंधेरे कुएँ में धकेला गया, जब साम्राज्यवादियों द्वारा फिलस्तीनियों की आजादी पर प्रहार किया गया, जब बेरूत में भयानक नर संहार हुआ – फै़ज़ ने इनका डटकर विरोध किया तथा इन्हें केन्द्रित कर कविताएँ लिखीं। इनकी कविताओं में उनके प्रेम का उमड़ता हुआ जज़्बा तथा उनकी घृणा का विस्फोट देखते ही बनता है। जनता के इसी अथाह प्यार के कारण ही फ़ैज़ अपने को ‘मोहब्बत का शायर’ कहते थे, जब कि सारी दुनिया उन्हें इंकलाब के शायर के रूप में जानती है। दरअसल, फ़ैज़ के मोहब्बत के दायरे में सारी दुनिया समा जाती है। उनका इंकलाब मुहब्बत से अलग नहीं, बल्कि उसी की जमीन पर खड़ा है। उनकी कविता में मुहब्बत नये अर्थ, नये संदर्भ में सामने आती है जिसमें व्यापकता व गहराई है।

लेखक कौशल किशोर से संपर्क  08400208031 के जरिए किया जा सकता है.
 

यूपी में सिर्फ पत्रकार ही क्यों, अधिकारी क्यों न खाली करें मकान?

: नियम सबके लिये बराबर होने चाहिये : इन दिनो यूपी में संकट मंडराने का भय अगर किसी के ऊपर आता दिखाया जा रहा है तो वह है पत्रकार बिरादरी। मामला है सरकारी मकान व पत्रकारपुरम् में लिये गये भूखण्डों मे आलीशान मकान तथा व्यवसाय करने का। कुछ अपने ही पत्रकार भाई दूसरों के उकसावे में आकर अपनी ही जमात की जांघ को खोलने व नंगा करने में लगे हैं। मैं यह नहीं कहता कि आप गलत लोगों के खिलाफ मुहिम न चलायें या फिर उन लोगों को चिन्हित न करें। लेकिन खबर के दूसरे पहलू को भी सामने लाने का भी प्रयास होना चाहिये।

सिर्फ लोकप्रियता पाने व खुद उस श्रेणी में अपने आपको लाभ पाने की लालसा लिये तथा कुंठाग्रस्त होकर दूसरे के उकसावे में आकर अभियान चलाने से बचना चहिये। इस तरह की हरकतों का हमारे बिरादरी को डटकर विरोध करना चाहिये क्योकि इस पर पूरी पत्रकार बिरादरी बदनाम होती है।

यूपी की पत्रकारिता में एकजुटता न होना तथा कुछ वरिष्ठ पत्रकारों की हर सरकार में चापलूसी तथा आईएएस को जा-जाकर अपनी राय देकर दूसरों का नुकसान करने की मानसिकता ने ही आज यूपी के पत्रकारों की जो हालत कर दी है उसको बयान नहीं किया जा सकता। मेरा मानना है कि आज जो हालात उभर रहे हैं उसके लिये कुछ लोग पूरी तरह से स्वयं जिम्मेदार हैं। मैं इस बात का हिमायती हूं कि अगर कोई पत्रकार गल्ती करता है और दागी है तो आप उसे चिन्हित अवश्य करें लेकिन अपने फोरम में, न कि दूसरों को बढ़ावा देने के लिये अपनी जांघ को खोलने का व उसे नंगा करने का प्रयास करें, यह नहीं होना चाहिये, मैं इसका समर्थन नहीं करता।

मैं हर उस गलत बात का सबसे पहले डटकर विरोध करता हूं जो गलत है। लेकिन एक घटना से पूरी बिरादरी को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। हम स्पष्ट रूप से बात करना चाहते हैं। वर्तमान में सपा की अखिलेश सरकार में पत्रकारों को जो बदनाम करने का कुचक्र पीछे से चलवाया जा रहा है वह पूरी तरह से सही नहीं है। हर पत्रकार गलत नहीं है जिसने नियमों का उल्लघंन किया है उसे नियम के दायरे में बांधना किसी भी लोकप्रिय सरकार का काम नहीं है। नियम बनाये जाये लेकिन सभी के लिये बराबर तौर पर। अगर नियम बनते हैं तो इसका शिकार खाली पत्रकारों ही क्यों हो? अगर आप नियम-कानून की बात करते हैं तो नियम कानून सभी के लिये बराबर हैं।

पत्रकारों को मकान से बेदखल करने या उनके खिलाफ कानून व नियम बनाने से समाज पूरी तरह से साफ सुथरा नहीं हो जायेगा। हमे अगर समाज से भ्रष्टाचार को मिटाना है और नियम कानून का कड़ाई से पालन कराना है तो फिर पत्रकारों के साथ-साथ समाज के हर उन अंगों में बैठे लोगों पर भी निगाहें डालनी होगी जो समाज के सबसे बड़े भेड़िये हैं। सरकार को गलत राय देकर सदैव अपना उल्लू सीधा करने वाले नौकरशाहों व नेताओं तथा राज्य कर्मचारियों व न्यायालयों में बैठे जजों को भी इस दायरे में लाना होगा कि अगर पत्रकारों के लिये नियम बनाये जायेगें तो उनके लिये भी नियम के अनुसार कार्यवाही होगी।

राजधानी लखनऊ में सरकारी कालोनियों में सिर्फ पत्रकार ही नहीं रहते हैं। इन कालोनियों में बड़े-बड़े विभागों के ब्यूरोक्रेट आईएएस, पीसीएस व आईपीएस तथा पीपीएस अधिकारी भी निवास करते हैं। जिनके शहर के मुख्यालयों में बड़ी आलीशान कोठीयां मौजूद हैं। जिनका ब्यौरा मैरे पास मौजूद है। वह अपने मकान किराये पर व किसी बड़ी कंपनी को लीज पर दिये हुये हैं और सरकारी कालोनियों में कब्जा किये हुये हैं। साथ ही मुख्यालयों से बाहर तैनाती में हैं लेकिन सरकारी मकान कब्जा किये रहते हैं कि अगर जिलों से हटाये गये तो फिर राजधानी में काबिज हो जायेंगे। क्या वह नियम विपरीत नहीं है?

इसके अलावा सरकार क्या उन सचिवालय कर्मियों की कोई लिस्ट तैयार करवायेगी जो सरकारी मकान में रहते है और शहर में अपनी कोठियां किराये पर चला रहे है। सरकार क्या उन जुडीशियल कर्मचारी व जजों की भी सूची तैयार करवायेगी जो बड़ी-बड़ी कोठियां सरकार से लिये हुए है या फिर लेने की फिराक में है। मैरा स्पष्ट रूप से इस खबर को लिखने का एक मात्र मकसद यही है कि नियम सभी के लिये बराबर होना चाहिये मै जब से पत्रकारिता में आया हूं तब से मैं उन लोगों को अपने बिरादरी मे चिन्हित करने का काम कर रहा हूं जो पत्रकारिता के नाम पर काले कारनामे कर रहे हैं लेकिन पत्रकारों को इस संकट में फसाने को कुचक्र रचने का प्रयास सरकार के कुछ अधिकारी क्यों करने में लगे है या फिर सामने न आकर कुछ पत्रकार भाईयों को ही आगे किये हुए है इसको मुख्यमंत्री अखिलेश जी को भी समझना होगा।

मेरा किसी को बचाने का इरादा नहीं है लेकिन बेबाक रूप से यही कहना है कि अगर कोई हमारे बीच का चेहरा नियम कानून के विपरीत कार्य कर रहा है तो उसे हम अपने फोरम में चिन्हित करके उसे चिन्हित करने का काम व नियम कानून के दायरे में उसे लाने की वकालत कर सकते है। लेकिन किसी सरकार को बदनाम करने की नियत से इस पर कार्यवाही करने का भय दिखाने का अधिकार नहीं है। मै दावे के साथ यह कह सकता हूं कि अखिलेश सरकार को पत्रकारों के बीच बदनाम करने की कोई साजिश कुचक्र रच रहा है। उसमें चाहे अधिकारी शामिल हो या फिर हमारे कुछ साथी इस पर आगे पूरी तरह  पारदर्शिता से काम होना चाहिये। क्योंकि जब-जब सपा की सरकार सत्ता में आई है तभी ऐसी बाते उड़ाई जाती है कि पत्रकारों के खिलाफ सरकार फला काम कर रही है। इस तरह की सोच न तो मुलायम सिंह की सत्ता में रहकर थी और न ही युवा सांस्कारिक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की है।

सपा की ही सरकार में पूरी तरह से पत्रकारों को लोकतंत्र में बोलने का अधिकार मिला है। इसके पूर्व पांच वर्ष की मायावती सरकार में किस तरह से अघोषित आतंक पत्रकारों के ऊपर रहा है इसको हमारे साथियों को भी समझना होगा। मुझे पूरी उम्मीद है कि कोई ऐसा काम इस सरकार में नहीं होगा जिससे सरकार की व पत्रकारों के बीच कटुता फैलने का काम हो। मेरा तो सिफ यही कहना है कि अगर नियम बने तो सबके लिये बराबर से। अगर पत्रकारों के खिलाफ कोई नियम बनते है तो इसका डटकर विरोध किया जायेगा। नियम के दायरे में वह लोग भी लाये जाये जो आईएएस व आईपीएस वर्ग तथा सचिवालय कर्मीयों व अधिकारियों के वर्ग से आते है। तभी नियम बनाने में पारदर्शिता देखी जा सकती है।

वैसे तो लोकतंत्र में बोलने व राय देने का सभी को अधिकार है। उसपर हम कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। लेकिन सिर्फ पत्रकारों पर भय दिखाने से कोई काम नहीं बनने वाला है। मेरा सदैव यह भी मानना है कि सभी पत्रकारों को समाज में गंदी निगाहों से नहीं देखा जाना चाहिये कुछ गिने-चुने पत्रकार होगें तो उन्है चिन्हित करने का काम हम स्वंय करेगें न कि सरकार में बैठे नौकरशाह। उनकी इस मंशा को मुख्यमंत्री को समझना होगा कि कहीं उनसे कोई गलत काम तो नहीं अजांम दिलाने का किया जा रहा है जिससे समाज मे सरकार और पत्रकारों के बीच टकराव पैदा किया जा सके और अपना उल्लू सीधा करने का व वाहबाही लूटने का श्रेय लिया जाये। लेकिन मै अपने पत्रकार भाईयों से यह भी आग्रह करूंगा कि अब हमे  खुद बैठ कर इस तरह के सामने आ रहे मामलों को लेकर गंभीर आत्ममंथन करना होगा कि आज इस तरह की स्थित क्यों उत्पन्न हो रही है और इसका फायदा आखिर कौन उठाना चाहता है।

लेखक प्रभात त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं.

अपराधी डीएसपी मोहकम सिंह नैन की संपत्ति राजसात की जाए

भोपाल : जन न्याय दल ने गैरकानूनी तरीके से अफसरों की गिरफ्तारी करने के अपराध में सजा भोग रहे लोकायुक्त पुलिस के बर्खास्तशुदा डीएसपी मोहकम सिंह नैन की संपत्ति राजसात करने की मांग की है। यह अफसर जिला अदालत के फैसले के बाद इन दिनों जेल की सजा भुगत रहा है। जन न्याय दल ने आज इस सबंध में लोकायुक्त जस्टिस पी.पी.नावलेकर को दिए ज्ञापन के हवाले से कहा है कि मध्यप्रदेश के धनवान अफसरों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के फर्जी प्रकरण बनाने में माहिर इस अफसर की दौलत भी करोड़ों रुपयों की है। इस दौलत को उसने अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के नाम पर विभिन्न कारोबारों में लगा रखा है।

पुलिस के इस अफसर ने राजनेताओं को भरमाने के लिए उनके विरोधियों को निशाना बनाया और इसकी आड़ में अन्य अफसरों को धमकाकर बेहिसाब दौलत कमाई है। पूर्व लोकायुक्त जस्टिस रिपुसूदन दयाल के इशारों पर काम करने वाले इस अपराधी अफसर की छवि लोकायुक्त संगठन में खौफ का पर्याय बन गई थी। अब भोपाल की जिला अदालत ने वाणिज्यकर विभाग में डिप्टी कमिश्नर रहे स्व.ऋषभ कुमार जैन की गैरकानूनी गिरफ्तारी के सिलसिले में मोहकम सिंह नैन को पांच साल की जेल की सजा सुनाई है।

जन न्याय दल के प्रदेश प्रवक्ता आलोक सिंघई ने अपने ज्ञापन में कहा है कि इस अफसर के खिलाफ इस तरह की शिकायतें पहले भी तत्कालीन लोकायुक्त महोदय को मिलती रहीं थीं। ताजा फैसले से ये साफ हो गया है कि तत्कालीन लोकायुक्त महोदय ने उन शिकायतों को हमेशा नजरंदाज किया और अपने अधीन काम करने वाले अपराधी अफसर पर अंकुश न लगाकर अपने दायित्वों में गंभीर लापरवाही की।

लोकायुक्त जस्टिस पी.पी.नावलेकर को भेजे ज्ञापन में जन न्याय दल ने अनुरोध किया है कि इस अपराधी अफसर के समूचे कार्यकाल में हुईं समस्त कार्रवाहियों की जांच किसी न्यायिक अधिकारी से करवाई जाए। जन चर्चाओं में ये बार बार कहा जा रहा है कि पूर्व डीएसपी मोहकम सिंह नैन ने अधिकारियों के भयादोहन से करोड़ों रुपयों की दौलत जुटाई है। इसलिए लोकायुक्त महोदय से अनुरोध किया गया है कि श्री नैन की सभी घोषित और अघोषित संपत्तियों की जांच कराई जाए और उस पर मध्यप्रदेश विशेष न्यायालय अधिनियम के तहत मुकदमा चलाकर उसकी सभी अवैध संपत्तियां राजसात करने की कार्रवाई की जाए।

आलोक सिंघई पत्रकार
प्रदेश प्रवक्ता
जन न्याय दल, मध्यप्रदेश
9425376322
 

सीएम बहुगुणा जी, हम नेटवर्क10 वालों को बकाया सैलरी दिला दो

19 जनवरी को नेटवर्क10 का एक साल पूरा हो गया और 15 फरवरी को हमारे यहां एक साल की उपलब्धियों का जश्न मनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा इस मौके पर आ रहे हैं वो हमारे चैनल में आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे। यशवंत जी, मैं चैनल के एक साल के मौके पर भड़ास के माध्यम से सीएम साहब, तमाम पत्रकारों और अपने बास लोगों को ये कहना चाहूंगा कि चैनल शुरू होने के 4 महीने तक सब ठीकठाक रहा। तनख्वाह टाईम पर मिली। फोन, गाड़ी, घर छोड़ने की सुविधा सब मिली।

मगर उसके बाद से ना तो कभी तनख्वाह ठीक से मिली ना कभी पूरी मिली। फोन बंद कर दिए गए। गाड़ी की सुविधा समाप्त कर दी गई आदि आदि। पिछले तीन महीने की तनख्वाह अभी तक नहीं दी गई। टुकड़े टुकडे में तनख्वाह मिलती है लगता है भीख मिल रही है। कभी 2 हजार तो कभी तीन हजार वो भी उन लोगों को जो पाण्डेय जी लोगों के खास हैं। ऐसा नहीं है कि चैनल पैसा नहीं कमा रहा है। पैसा काफी आ रहा है मगर जा पता नहीं कहां रहा है। हमें तो तनख्वाह तक नहीं मिल रही है। 15 फरवरी को मुख्यमंत्री जी नेटवर्क 10 के उद्घाटन कार्यक्रम में आ रहे हैं। मेरी तो उनसे यही गुहार है कि सीएम साहब हमें हमारी पिछले तीन महीने की तनख्वाह दिला दो बस, प्लीज बहुगुणा जी।

नेटवर्क10 के एक कर्मचारी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मीडिया पर सेंसरशिप लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक : लालू

पटना : प्रेस परिषद के जांच दल द्वारा बिहार में प्रेस पर अघोषित सेंसरशिप की रपट दिए जाने पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने कहा कि मीडिया पर सेंसरशिप लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। उन्होंने इस पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार के लोगों को चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए।

पटना में बुधवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए प्रसाद ने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार पत्रकारों की जो स्थिति सरकार द्वारा बनाई गई है, वह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। उन्होंने कहा कि यहां सरकार द्वारा कैसे मजदूरों, किसानों और युवाओं की बातों को दबाया जाता रहा है, यह रिपोर्ट से साबित हो गई है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट के बाद सरकार के लोग मुंह दिखाने लायक नहीं हैं। लालू ने कहा कि वह पहले भी कहते रहे हैं कि यहां अखबारों में लोगों की आवाज को कम स्थान मिल रहा है।

उन्होंने कहा कि वह पूरी रिपोर्ट मंगवा कर अध्ययन करेंगे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के लिए यह स्थिति विस्फोटक और घातक है। वह इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाएंगे। उल्लेखनीय है कि प्रेस की आजादी के हनन की शिकायतों की जांच के लिए प्रेस परिषद का तीन सदस्यीय दल पिछले दिनों बिहार आया था। दल ने यहां से लौटकर अपनी रपट प्रेस परिषद को सौंप दी है। (एजेंसी)

सुब्रत राय का भी बैंक एकाउंट फ्रीज, सहाराश्री की चल-अचल संपत्ति जब्त करने के आदेश

सहारा समूह की दो कंपनियों के सौ से ज्यादा बैंक एकाउंट और संपत्ति फ्रीज किए जाने के क्रम में जानकारी मिली है कि सेबी ने सहारा के मुखिया सुब्रत रॉय सहारा के बैंक अकाउंट को भी सीज कर दिया है. सुब्रत राय की चल और अचल संपत्ति जब्त करने का भी आदेश सेबी ने दिया है. उल्लेखनीय है कि करोड़ों लोगों को नियमों के खिलाफ जाकर लोन देने के मामले में सेबी ने सहारा ग्रुप के 100 से ज्यादा अकाउंट फ्रीज कर दिए हैं.

बताया जाता है कि सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन ने 13 मार्च 2008 को 19 हजार चार सौ करोड़ रुपये और सहारा मुश्किल में सहाराश्री का साम्राज्य!हाउसिंग इंडिया कॉरपोरेशन ने 6 हजार 380 करोड़ रुपये एकत्र किए थे. लेकिन समय से पहले वापस ले लिए गए निवेश के बाद इन कंपनियों पर 31 अगस्त को निवेशकों का कुल 24 हजार 029 करोड़ रुपये बकाया था. इस समूह को करीब 38 हजार करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ सकता है जिसमें 24 हजार करोड़ रुपये मूल धन और करीब 14 हजार करोड़ रुपये ब्याज शामिल है.

सहारा ग्रुप की दो कंपनियों सहारा हाउसिंग और सहारा रियल इस्टेट के निवेशकों ने नियामक संस्था सेबी के समक्ष शिकायत की थी कि उनके द्वारा निवेश किया गया पैसा समय पर उन्हें नहीं मिल रहा. ये केस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को एक समय-सीमा के भीतर तीन करोड़ निवेशकों के 24 हजार करोड़ रुपये 15 फीसदी ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया. सहारा इस मामले में टालमटोल करता रहा. आखिरकार 5 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को आदेश दिया कि वो सहारा ग्रुप के अकाउंट फ्रीज करने के लिए स्वतंत्र है जिसपर अमल करते हुए सेबी ने ये कड़ा कदम उठाया है.

मूल खबर भी पढ़ें- सहारा समूह के सौ से ज्यादा बैंक एकाउंट और संपत्ति फ्रीज, सेबी ने की कार्रवाई


sebi sahara

यूपी में हो रही घटनाओं के लिए ‘ब्रेकिंग न्यूज’ जिम्मेदार : अखिलेश यादव

बाराबंकी में समाजवादी पार्टी के विधायक रामगोपाल रावत की सुपुत्री के विवाह कार्यक्रम में पहुचे उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश में हो रही घटनाओं के पीछे टी वी और अखबार की ब्रेकिंग न्यूज़ को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि ब्रेकिंग न्यूज़ बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जाता है लेकिन जब कोई कार्यवाही सरकार की तरफ से की जाती है तो वो अखबार में नहीं छपती.

विपक्ष द्वारा उत्तर प्रदेश में बिगडती कानून ब्यवस्था पर उठाये जा रहे सवालों पर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री में कहा की कानून व्यवस्था पर लगातार उन्हें काम करना पड़ेगा. कानून ब्यवस्था में सुधार के लिए मीडिया का भी सहयोग जरूरी है. उन्होंने कहा कि जब कोई घटना हो जाती है तो अखबार और टीवी वाले बढचढ कर दिखाते हैं. उदहारण के तौर पर जौनपुर का पंडित मर्डर केस. उन्होंने कहा कि जौनपुर के एक पंडित जी का मर्डर हुआ. घटना हुई. आपने बढ़ा चढ़ा कर लिख दिया कि रिश्तेदार थे, परिचित थे, नेता जी के परिवार के थे, और हमारे थे. जिन्होंने घटना की, उनके खिलाफ कार्यवाही हुई तो आप बताओ किसी अखबार में खबर छपी? इसी तरह और भी घटनाओं का उदाहरण दे सकते हैं.
 

सहारा समूह के सौ से ज्यादा बैंक एकाउंट और संपत्ति फ्रीज, सेबी ने की कार्रवाई

सहारा समूह को बड़ा झटका लगा है. खबर है कि बाजार नियामक सेबी (दी सेक्यूरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया) ने आज सहारा समूह की दो कंपनियों के सौ से ज्यादा बैंक एकाउंट को फ्रीज कर दिया है और लेन-देन पर रोक लगा दी है. इन दोनों कंपनियों की गैर-नगदी संपत्तियों को भी फ्रीज किया है.

उल्लेखनीय है कि इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को यह अधिकार दे दिया था कि वह सहारा की लेटलतीफी और निवेशकों को पैसे लौटाने में टाल-मटोल को देखते हुए समूह की संबंधित कंपनियों के एकाउंट को फ्रीज कर सकता है. जिन दो कंपनियों की संपत्तियों और बैंक एकाउंट को फ्रीज किया गया है, उनके नाम हैं- सहारा इंडिया रीयल इस्टेट कार्पोरेशन (एसआईआरईसी) और सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कार्पोरेशन (एसएचआईसी).

कोर्ट ने इन दोनों कंपनियों द्वारा जनता से उगाहे गए चौबीस सौ करोड़ रुपये को जनता को पंद्रह फीसदी ब्याज समेत लौटाने का आदेश दिया था. पर सहारा इसे लौटाने से बचता रहा है और पैसा लौटाना न पड़े, इसके लिए नित नए बहाने बनाता रहा है. बताया जा रहा है कि ग्रुप की दो कंपनियों के एकाउंट और संपत्ति के फ्रीज हो जाने से सहारा समूह को बड़ा झटका लगा है. मार्केट में इस समूह की साख काफी प्रभावित हुई है.

सहारा समूह भरसक कोशिश करेगा कि बड़े अखबार और न्यूज चैनल एकाउंट व संपत्ति फ्रीज होने की खबर न दिखाएं क्योंकि पहले भी सहारा दूसरे मीडिया हाउसेज को बड़े बड़े विज्ञापन देकर अपने से संबंधित नकारात्मक खबरों को प्रकाशित-प्रसारित न होने देने की कवायद करता रहा है.

sebi sahara

छत्‍तीसगढ़ में नक्‍सलियों ने पत्रकार की हत्‍या की

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में संदिग्ध नक्सलियों ने पत्रकार की गला रेतकर हत्या कर दी है. सुकमा जिले के पुलिस अधीक्षक अभिषेक सांडिल्य ने दूरभाष पर बताया कि जिले के तोंगपाल थाना क्षेत्र में संदिग्ध नक्सलियों ने पत्रकार नेमी चंद जैन (45 वर्ष) की गला रेतकर हत्या कर दी है. सांडिल्य ने बताया कि पुलिस को आज सूचना मिली कि तोंगपाल से चार किलोमीटर दूर लेडा गांव के पास सड़क में जैन का शव पड़ा हुआ है.

सूचना के बाद पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लिया और मामले की छानबीन शुरू की है. पुलिस अधिकारी ने बताया कि जैन हिंदी समाचार पत्र हरिभूमि और दैनिक भास्कर से जुड़े हुए थे. जैन के परिजनों के मुताबिक वे मंगलवार को करीब के नामा गांव स्थित बाजार के लिए निकले थे. शाम को जब वह वापस लौट रहे थे तब नक्सलियों ने उसकी हत्या कर दी. सांडिल्य ने बताया कि पुलिस को शव के करीब से एक पर्चा भी बरामद हुआ है जिसमें जैन पर पुलिस का मुखबीर होने का आरोप लगाया गया है.

उन्होंने बताया कि पुलिस को शक है कि नक्सलियों की आड़ में जैन की हत्या अन्य अपराधियों ने की है तथा घटनास्थल पर पर्चा डाला गया है. पुलिस अधिकारी ने बताया कि पुलिस को जैन से कुछ लोगों के विवाद की भी जानकारी मिली है. पुलिस संदिग्ध आरोपियों से पूछताछ कर रही है. (सहारा)

राडिया टेप की जांच मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई, आईटी और ईडी से मांगे नाम

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने औद्योगिक घरानों के लिये संपर्क सूत्र का काम करने वाली नीरा राडिया के टैपिंग की गयी टेलीफोन वार्ता के तथ्यों की छानबीन के लिये केन्द्रीय जांच ब्यूरो, आय कर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के नाम मांगे हैं। न्यायालय को इन अधिकारियों के नाम कल तक मुहैया कराने है ताकि रिकार्ड की गयी वार्तालाप की जांच करके आपराधिक तथ्यों का पता लगाने के लिये अधिकारियों का दल बनाया जा सके।

न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी और न्यायमूर्ति एस जे मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि नीरा राडिया के विभिन्न नेताओं, कापरेरेट घरानों के प्रमुख व्यक्तियों तथा दूसरे लोगों के साथ टेलीफोन वार्ता से संबंधित इन टेप के तथ्यों की जांच के लिये दल गठन करने के बारे में 21 फरवरी को आदेश दिया जायेगा।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘अतिरिक्त सालिसीटर जनरल (हरेन रावल जो जांच ब्यूरो का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं) तीनों संस्थाओं (सीबीआई, आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय) के अधिकारियों की सूची कल उपलब्ध करायेंगे।’’ न्यायालय ने रावल से कहा कि वह जांच एजेन्सी के पांच अधिकारियों के भी नाम उपलब्ध करायें। रावल का तर्क है कि इस दल में सिर्फ सीबीआई के सदस्यों को ही शामिल किया जाये क्योंकि दूसरी एजेन्सियों को शामिल करने से काम मुश्किल हो जायेगा।

गैर सरकारी संगठन सेन्टर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटीगेशंस के वकील प्रशांत भूषण ने इसका विरोध करते हुये कहा कि पहले भी 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के बाद करीब दो साल तक सीबीआई ने कुछ नहीं किया था। भूषण ने कहा, ‘‘मेरा सुझाव है कि एक ऐसा दल हो जिसमें सीबीआई, आय कर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों को शामिल किया जाये और इसके निगरानी की जिम्मेदारी सेवानिवृत्त न्यायाधीश जैसे किसी स्वतंत्र व्यक्ति को सौंपी जाये या उसे इसका मुखिया बनाया जाये।’’

इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने जांच एजेन्सी को चेतावनी दी कि टेलीफोन वार्ता का एक भी अंश मीडिया में लीक होने को बहुत ही गंभीरता से लिया जायेगा। न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘इसके अंश लीक किये जाने पर हम बहुत कड़ा रुख अपनायेंगे। अभी भी कुछ लोग हैं जो मीडिया को कुछ न कुछ लीक कर रहे हैं। आप इसे पसंद करें या न करें लेकिन लीक तो हो ही रहा है। मीडिया में चर्चा होती है और कभी कभी सजा भी हो जाती है। बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में हमारी अलग व्याख्या है।’’ इस पर रावल ने कहा, ‘‘अभी तक ऐसा कुछ भी प्रतिकूल सामने नहीं आया है जिससे यह कहा जाये कि हमने हमारा कर्तव्य नहीं निभाया है। हमारा विश्लेषण (टेप) न्यायालय के सामने आने दीजिये। इस न्यायालय के समक्ष यह हमारी परीक्षा होगी।

इस बीच, न्यायालय ने 2जी स्पेक्ट्रम मामले में अब तक की जांच के बारे में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश जांच एजेन्सी को दिया है। अतिरिक्त सालिसीटर जनरल का कहना था कि इन टेलीफोन वार्ता के अंशों को अलग अलग करने की आवश्यकता है। न्यायालय ने इससे पहले कहा था कि उसने टेलीफोन वार्ता के कुछ अंशों का अवलोकन किया है। इनमें से कुछ चूंकि हानिरहित हैं, इसलिए सावधानी से इनकी जांच की आवश्यकता है ताकि इनमें आपराधिकता के तथ्य का पता लगाया जा सके। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि छानबीन सिर्फ उन्हीं वार्तालाप तक सीमित रहेगी जो आपराधिकता से संबंधित है और न्याय के हित में है।

रतन टाटा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे का कहना था कि वार्तालाप के लिपिबद्ध मसौदे की जांच में अत्यधिक सावधानी बरती जानी चाहिए। नीरा राडिया की टेलीफोन वार्ता की रिकार्डिग वित्त मंत्री को 16 नवंबर, 2007 को मिली शिकायत के आधार पर की गयी थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि नौ साल के भीतर राडिया ने 300 करोड़ रुपए का साम्राज्य खड़ा कर लिया है। सरकार ने 20 अगस्त, 2008 से 60 दिन और फिर 19 अक्तूबर से साठ दिन वार्ता रिकार्ड करने के बाद आठ मई के नये आदेश के तहत 11 मई 2009 से साठ दिन और उसके टेलीफोन टैप किये थे। (एजेंसी)

न्यूज चैनलों का लाइसेंस रिश्वत के बिना मिलना नामुमकिन है : गोपाल शर्मा

: इंटरव्यू : गोपाल शर्मा : पत्रकार ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े संपादकों की भूमिका भी अब दलालों की सी ही हो गई है या बना ली गई है…. नीरा राडिया, प्रभु चावला  व जी वालों के खुलासे के बाद तमाम परिदृश्य और भी स्पष्ट हो गया है…. वास्तविक पत्रकारिता कर समाज सेवा की इच्छा रखने वाले पत्रकारों के जज्बे की भ्रूण हत्या करने के लिए आज संपादक रूपी प्राणी पूंजीपतियों के हाथों  हत्यारे का रूप धर चुका है…. बाहर से चकाचैंध भरा मीडिया जगत अन्दर से बेहद खोखला हो चुका है… यहां वेतन को मानदेय कहा जाता है और मानदेय ऐसे दिया जाता है कि उससे ही  पत्रकारों का सबसे अधिक अपमान होता है… मीडिया की डिग्री व डिप्लोमा कर सुनहरे भविष्य का सपना संजोए लोग दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं… मीडिया में महाक्रान्ति की आवश्यकता है…. :

गोपाल शर्मा चंडीगढ़ में रहते हुए मीडिया के कई मोर्चों पर सक्रिय हैं. वे प्रिंट एण्ड इलेक्ट्रानिक मीडिया ग्रुप के संपादक हैं. लाईव टुडे व हिमाचल आजकल के सलाहाकार हैं. साथ ही न्यूज़ लाईव नाऊ के निदेशक हैं. एक मुलाकात के दौरान उन्होंने विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय प्रकट की. उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं. जैसे ये कि टीवी चैनल के लिए लाइसेंस फ्री कर देना चाहिए क्योंकि पैसे देकर लाइसेंस लेने के कारण मीडिया में भ्रष्टाचार बढ़ गया है. पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंश–

अपने जीवन और करियर के बारे में विस्तार से बताएं?

उत्तराखंड के जिला टिहरी में मेरा जन्म स्थान है। टिहरी डैम के विस्थापितों में शामिल होने के कारण विस्थापन का दंश बालपन से ही झेलते आए। सुंदर लाल बहुगुणा जी के साथ तुतलाती जुबान ने कब से बांध विरोधी नारे लगाने शुरू किए पता ही नहीं चला। उम्र बढ़ती गई ग्रेजुएशन हेमंती नंदन बहुगुणा, गढ़वाल, विश्व विद्यालय से की। आईटीआई का टापर भी रहा। मनमुक्ता पत्रकारिता संस्थान से पत्रकारिता का प्रशिक्षण हासिल किया। कुछ-कुछ महीनों के लिए कई छोटी-मोटी नौकरियां भी की किंतु 23 साल की उम्र तक जीवन किस ओर जा रहा है मैं खुद भी न जान पाया। 1995 में काम के सिल-सिले में मनाली आ गया। बचपन से लिखने का  शौक था कई साप्तहिक, मासिक पत्र-पत्रिकाओं के पत्र कालम में छपा चुका था, यहां लेखन को अनुकूलता मिली। कुछ पत्रकारों से मित्रता हो गई और मैं भी जालंधर से प्रकाशित उत्तम हिंदू का अवैतनिक पत्रकार बन गया।

दो साल तक पत्रकारिता की और अंत में अखबार ने ज्यादा खबरें भेजने की सज़ा यह दी कि मेरी फैक्स आथरटी छिन गई। तब दूर संचार विभाग एक पेज फैक्स भेजने के 32 रूपए चार्ज करता था। मैं नियमित 10 से अधिक खबरें भेजता था। 320 रूपए रोज का बिल चुकाने से अखबार ने हाथ खड़े कर दिए और मेरी यह अवैतनिक नौकरी जाती रही। 29 दिसंबर 1997 को दिव्य हिमाचल लांच हुआ। लांचिंग से पूर्व हुई पत्रकारों की फौज में मुझे तत्कालीन मुख्य संपादक श्री बी.आर.जेतली जी ने कुल्लू से बतौर जिला संवाददाता नियुक्त कर दिया। 1000 रूपए का परिश्रमिक तय हुआ। अवैतनिक से  अब मैं 1000 रूपए का वैतनिक संवाददाता बन चुका था। खूब मेहनत की बिना शिकवा-शिकायत किए यहां दिव्य हिमाचल को शीर्ष पर पहुंचाया। इस मेहनत से संपादक भी प्रभावित हुए और सर्कुलशन वाले भी विज्ञापनों की  भी कुल्लू से गंगा बहने लगी। पहली बार किसी समाचार पत्र में कुल्लू से 4.5 लाख रूपए का सप्ल्लिमेंट प्रकाशित हुआ। और यहीं से कमीशन की लेन-देन पर समाचार पत्र से संबंध बिगड़ गए।

13 जनवरी 2001 को अमर उजाला बतौर जिला संवाददाता ज्वाइन किया और 2005 तक अमर उजाला को अपनी सेवाएं दी। रामपुर के लिए तबादला होते ही मैंने अमर उजाला को भी अलविदा कह दिया। उसके बाद सोचा अपना ही कुछ किया जाए। हैलो हिमाचल की नींव रखी किंतु कई पार्टनर होने के कारण सामंजस्य न बैठ सका। इसके बाद प्रिंट एण्ड इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क का गठन किया और एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। यह पत्रिका आज भी कुशलता से संचालित हो रही है।

पत्रिका के साथ-साथ न्यूज़ टुडे में बतौर हिमाचल के लिए निदेशक नियुक्त हुआ तथा 5 साल तक इस संस्थान से जुड़ा रहा। 2010 में लाईव टुडे में बतौर मुख्य संपादक कार्यभार संभाला। हाल ही में मुझे हिमाचल के लिए एक नया चैनल स्थापित करने की परियोजना पर कार्य करने का आफर मिला है जो कि अभी विचाराधीन है। पिछले 14 सालों से एक स्वयं सेवी संस्था से भी महासचिव के रूप में जुड़ा हूं. इस संस्था के माध्यम से हम अनाथ बच्चों का लालन-पालन करते हैं। 35 अनाथ बच्चों को हम यथा सामार्थ डीपीएस जैसे अच्छे स्कूलों में तालीम दिलवा रहे हैं । हालांकि जो भी हम करना चाहते हैं उसका अभी एक प्रतिशत भी हम नहीं कर पाए किंतु प्रयास अविरल जारी है। हमारी एक एनजीओ आवारा कुत्तों पर काम कर रही है। इसके तहत हम कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए उनकी नसबंदी करवा रहे हैं ताकि कुत्तों को निर्ममता से मौत के घाट उतारने की प्रवृति पर रोक लगाई जा सके। जख्मी कुत्तों के ईलाज के लिए हम विशेष इंतजाम कर रहे हैं। बिना किसी सरकारी मदद के चलाई जा रही यह दोनों एनजीओ समाज सेवा के क्षेत्र में हमारा छोटा सा प्रयास है।

क्या आप वो सब कर पाए हैं, जो करना चाहते थे। यानि करियर और जीवन का लक्ष्य क्या क्या है?

दरअसल मैं मीडिया के वर्तमान स्वरूप से बिल्कुल संतुष्ट नहीं हूं। प्रमुखतयः विजुअल मीडिया से क्योंकि प्रिंट मीडिया में तो फिर भी शोषण और पेड न्यूज़ दो बड़ी और गंभीर समस्याओं पर खूब माथा पच्चीसी चल रही है किंतु विजुअल मीडिया की समस्या की तो अभी असली जड़ ही ढूंढी जानी बाकी है। अधिकांश विजुअल मीडिया आज अपराधियों के चंगुल में है। दो गोपाल शर्मानम्बर के कथित कारोबारी इस मीडिया का सरकार की कुछ अपराध संरक्षण नीतियों के कारण खूब फयदा उठा रहे हैं। अपराधियों की मीडिया में दखल के कारण इसमें पत्रकारों के रूप में भी अब अपराधी मानसिकता के लोग घुस आए हैं और पत्रकारिता का ककहरा न जानने के बावजूद नेताओं व अपराधी मालिकों के बीच कड़ी का काम कर यह मीडिया व राजनीति दोनों में प्रदूषण फैला रहे हैं।

हम इस गंदगी को जड़ से मिटाने के लिए एक नया प्रयोग कर रहे हैं। हम मीडिया में एक संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं। इसमें हमारी प्रमुख मांग है कि प्रिंट मीडिया के पंजीकरण की भांति मीडिया पोर्टल व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पंजीकरण निःशुल्क किया जाए क्योंकि विजुअल मीडिया का लाइसेंस आज रिश्वत के बिना मिलना नामुमकिन है जो कि 30 से 35 लाख में मिलता है और मिलते ही उसकी कीमत 3 करोड़ हो जाती है। यदि लाइसेंस की यह प्रणाली प्रिंट मीडिया की भांति निःशुल्क हो जाती है तो पत्रकारिता की मर्यादा को समझने वाले लोगों को मीडिया समूह खड़ा करने के लिए लालाओं का मुंह नहीं देखना पड़ेगा। यानि कोई भी पत्रकार मामूली सी पूंजी से एक विश्व स्तर का चैनल खड़ा कर सकता है। इससे गुणवत्ता भी आएगी और लोगों की समस्याओं को मंच भी सहजता से मिल सकेगा। आपको हैरानी होगी कि आज हमारे पास ऐसी तकनीकी मौजूद है कि यदि सरकार चाहे तो हम नाममात्र की पूंजी से यह सब सहजता से कर सकते हैं और मीडिया का पूरा का पूरा परिदृश्य बदल सकता है। पत्रकारों का शोषण पूरी तरह समाप्त हो सकता है। खबरों की खरीदफरोख्त एवं मीडिया में कुछ लोगों का एकाधिकारवाद समाप्त हो सकता है।

मीडिया को भ्रष्टाचार की गर्त से निकालने के लिए जरूरी है कि मीडिया की शक्तियों का विकेंद्रीकरण किया जाए। एक ऐसा मीडिया प्रसव पीड़ा झेल रहा है जिसके जन्म की सुगम पृष्ट भूमि यदि हम तैयार कर पाए तो वह निश्चित तौर पर सूचना तकनीकि की कोख से जन्मा अवतार होगा। किंतु सरकार कंस की भांति कृष्ण की भांति अपनी मृत्यु के भय से इसे मिटाने पर आमादा न रहे बल्कि इसकी किल्कारियों को सहज गूंजने दे। यदि हम इस लड़ाई को जीत पाए तो मीडिया जगत को दिया गया यह योगदान सदियों तक याद रखा जाने लायक होगा।

अगर कहा जाए कि आप अपनी पांच अच्छाइयां और पांच बुराइयां बताइएए तो क्या क्या गिनाएंगे?

मैं कपटी लोगों से नफरत करता हूं। क्रांति के मार्ग में बाधक शांति के पुजारियों को देशद्रोही मानता हूं। नेताओं की चम्चागिरी करने वालों को सबसे निकृष्ट प्राणी मानता हूं। झूठ से नफरत, छल से नफरत, कपट से नफरत करता हू। खूबी तो कोई भी नज़र नहीं आती।

पत्रकारिता के स्तर में घनघोर पतन हुआ है, क्या यह सच है? अगर हां तो किस तरह से और इसका असर क्या होगा? इसे ठीक कैसे किया जा सकता है?

पत्रकारिता के घनघोर पतन का कारण है इसमें गलत लोगों का प्रवेश जिन्होंने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। अपराधी बड़े-बडे अपराध कर बचने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करते हैं । मीडिया के कारण वे अधिकारियों व नेताओं तक सहज़ पहुंच बनाते हैं व अपने अपराधों पर पर्दा डालने का खाका तैयार करते हैं। इसमें पत्रकारों की भूमिका भी है अब अब पूरी तरह दलालों की सी हो गई है।

यह कहना ज्यादा न्यायोचित होगा कि पत्रकार ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े संपादकों की भूमिका भी अब दलालों की सी  ही हो गई है या बना ली गई है। नीरा राडिया, प्रभु चावला  व जी वालों के खुलासे के बाद तमाम परिदृश्य और भी स्पष्ट हो गया है। वास्तविक पत्रकारिता कर समाज सेवा की इच्छा रखने वाले पत्रकारों के जज्बे की भ्रूण हत्या करने के लिए आज संपादक रूपी प्राणी पूंजीपतियों के हाथों  हत्यारे का रूप धर चुका है। बाहर से चकाचैंध भरा मीडिया जगत अन्दर से बेहद खोखला हो चुका है। यहां वेतन को मानदेय कहा जाता है और मानदेय ऐसे दिया जाता है कि उससे ही  पत्रकारों का सबसे अधिक अपमान होता है। मीडिया की डिग्री व डिप्लोमा कर सुनहरे भविष्य का सपना संजोए लोग दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। मीडिया में महाक्रान्ति की आवश्यकता है। मीडिया की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है।

आपको अपने करियर और जीवन में क्या कुछ सीखने को मिला जिसे आप हम सभी से बांटना चाहते हैं।

मीडिया यदि ठीक प्रकार से अपनी भूमिका निभाए तो देश उन्नति न करे, ऐसा हो ही नहीं सकता किंतु मीडिया का वर्तमान स्वरूप किसी भी दृष्टि से देश के हित में नहीं है। जितना बड़ा मीडिया समूह है वह उतनी ही बड़ी सौदेबाजी में संलिप्त हैं। बड़े-बड़े समाचारों या बड़े खुलासों में हर छण बदलते मीडिया के सुरों से मीडिया में व्यप्त भ्रष्टाचार को वांचा जा सकता है।

ऐसी कोई बात जो कहना चाहते हों मीडिया इंडस्ट्री के लोगों से पर अब तक कह न पाए हों?

यही कि हर मीडियाकर्मी मीडिया को गर्त में जाने से बचाने के लिए अपनी भूमिका निभाए। झूठ को बेनकाब करने के जज्बे का बेखौफ पालन करे। न डरे, न झिझके, न झुके, बस मीडिया को लोकतंत्र का सर्वोच्च स्तंभ बनाए रखने के लिए संकल्पित रहे।

गोपाल शर्मा से संपर्क 08054310441 के जरिए किया जा सकता है.


आपमें से भी कोई अगर यह मानता है कि उसे अपनी बात, अपना करियर, अपनी सोच, अपना इंटरव्यू भड़ास पर प्रकाशित कराना चाहिए तो आपका स्वागत है.  भड़ास ने स्थापित व नामचीन लोगों का इंटरव्यू प्रकाशित करने की जगह देश के कोने-कोने में सक्रिय मीडियाकर्मियों की बातों, अनुभवों, करियर, सोच को प्रकाशित करने को तरजीह दिया है. आपको करना बस इतना है कि आप नीचे दिए गए सवालों के जवाब भेज दें. अगर लगता है कोई बात इन सवालों से कवर नहीं हो पा रहा तो सवाल अपनी तरफ से क्रिएट कर सकते हैं. साथ में एक तस्वीर भी भेजें. जवाब और तस्वीर मेरी निजी मेल आईडी पर भेजें जो यूं है:  yashwant@bhadas4media.com

सवाल यूं हैं-

-अपने जीवन और करियर के बारे में विस्तार से बताएं.

-क्या आप वो सब कर पाए हैं, जो करना चाहते थे… यानि करियर और जीवन का लक्ष्य क्या क्या है?

-अगर कहा जाए कि आप अपनी पांच अच्छाइयां और पांच बुराइयां बताइए, तो क्या क्या गिनाएंगे.

– मीडिया में काम के दौरान कोई ऐसा अनुभव जिससे आप काफी दुखी हुए हों और कोई ऐसा अनुभव जिससे आपको काफी तसल्ली-खुशी मिली हो?

-पत्रकारिता के स्तर में घनघोर पतन हुआ है, क्या यह सच है, अगर हां तो किस तरह से और इसका असर क्या होगा, इसे ठीक कैसे किया जा सकता है…

-आपको अपने करियर और जीवन में क्या कुछ सीखने को मिला जिसे आप हम सभी से बांटना चाहते हैं…

– आपकी अपनी लाइफस्टाइल कैसी है? खान-पान, सुनने-पढ़ने में क्या पसंद है? शौक क्या है?

-आप जीवन में किससे सबसे ज्यादा प्रभावित रहे और क्यों? आपके रोल माडल कौन हैं?

-आपने जीवन या करियर में कुछ ऐसा किया है जिसका आपको प्रायश्चित करने का दिल करता है?

-ऐसी कोई बात जो कहना चाहते हों, मीडिया इंडस्ट्री के लोगों से, पर अब तक कह न पाए हों..

माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पूर्व विद्यार्थी समागम 16 फरवरी को

भोपाल : माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा पूर्व विद्यार्थी समागम का आयोजन शनिवार, 16 फरवरी, 2013 को किया जा रहा है। उक्त आयोजन एम.पी.नगर स्थित विश्वविद्यालय परिसर में प्रातः 10.00 बजे प्रारंभ होगा। यह आयोजन विश्वविद्यालय के पूर्व विद्यार्थी एवं वर्तमान विद्यार्थियों के बीच मुलाकात एवं अपने अनुभव साझा करने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है।

इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के पूर्व एवं वर्तमान विद्यार्थियों के अतिरिक्त विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त अध्यापकगण, अधिकारीगण एवं पूर्व कुलपति शामिल होंगे। आयोजन के मुख्य अतिथि मध्यप्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा एवं जनसंपर्क मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा होंगे। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार श्री राहुल देव होंगे। इसके अतिरिक्त वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र, श्री रामशरण जोशी, डा. नंदकिशोर त्रिखा, श्री संजय सलिल, श्री मनोज मनु एवं श्री ओंकारेश्वर पांडे भी कार्यक्रम में शामिल होंगे।

पत्रकारिता विश्वविद्यालय अपने स्थापना काल से ही पत्रकारिता एवं संचार की विभिन्न विधाओं में पाठ्यक्रम संचालित कर रहा है। विश्वविद्यालय द्वारा पत्रकारिता, जनसंचार, जनसंपर्क, प्रसारण पत्रकरिता, इलेक्ट्रानिक मीडिया, कम्प्यूटर, प्रबंधन तथा पुस्तकालय विज्ञान के पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इन पाठ्यक्रमों से उत्तीर्ण विद्यार्थी आज देश-विदेश में प्रतिष्ठित संस्थाओं में उच्च पदों पर कार्यरत हैं। इन सभी विद्यार्थियों को कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया है। ये विद्यार्थी वर्तमान विद्यार्थियों को मीडिया, संचार एवं कम्प्यूटर के क्षेत्र की चुनौतियों से अवगत करायेंगे।

साथ ही उन्हें भविष्य की तैयारी के लिए कुछ सुझाव भी देंगे। कार्यक्रम तीन सत्रों में संपन्न होगा। प्रथम सत्र उद्घाटन सत्र होगा। द्वितीय सत्र में पूर्व विद्यार्थी एवं वर्तमान विद्यार्थी विभागवार एक साथ बैठकर विमर्श करेंगे। तृतीय सत्र समापन सत्र होगा। इसके उपरांत सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जायेगा। इस संबंध में विस्तृत जानकारी के लिए विश्वविद्यालय की वेबसाइट www.mcu.ac.in पर लागआन किया जा सकता है या www.mcualumni13@gmail.com पर मेल किया जा सकता है अथवा 9893598888 पर संपर्क किया जा सकता है।

प्रेस विज्ञप्ति
(डा. पवित्र श्रीवास्तव)
प्रभारी जनसंपर्क


Journalism University organising an Alumni Meet on 16th February

Bhopal : Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism & Communication is organising on Alumni Meet on 16 February 2013. The programme is scheduled to begin at 10.00 AM at University campus situated at M P Nagar, Zone I. This programme has been organised to meet and exchange experiences of the old & new students. Apart from ex-student and the present students, the ex-employees, ex-officers and ex-vice chancellor will also participate in the meet.

The chief guest of the meet is honorable Shri Laxmikant Sharma, the Higher education and Public Relations Minister of the M.P. Govt. The keynote speaker is senior journalist Shri Rahul Dev. The Ex-vice chancellor of the university Shri Achutanand Mishra, Shri Ramsharan Joshi, Dr. Nandkishore Trikha, Shri Sanjay Salil, Shri Majoj Manu & Shri Omkarashwar Pandey are also among the senior journalist to felicitate the occassion.

The university has been running various courses in the field of journalism and communication since its inception. University runs Journalism, Mass Communication, Broadcasting Journalism, Electronic Media, Computer, Management & Library Science courses. The ex-students of these courses are working at leading positions in the national & international organisations.

All these students are invited for the meet. These students will brief the new student with the new challenges of the various streams and give suggestions on their preparations for the future in the industry. The event is divided in three sessions. First session is inaugural session second session is devoted to departmental exchange of thoughts. Third is concluding session. After which there will be some cultural performances for entertainment also.

To know more details log in to the university website www.mcu.ac.in or email at- www.mcualumni13@gmail.com & contact phone no. 9893598888.

Press Release
(Dr. Pavitra Shrivastava)
Head Public Relation

एसपी साहब! वर्दी को संदेह से उबारिए

महराजगंज  पुलिस विभाग के उच्चाधिकारी जितना भी वर्दी पर दाग लगने से बचाने के लिए कड़े निर्देश जारी कर दें पर इसका असर महकमें के नीचले पायदान पर आते आते बेअसर साबित होता है। उच्चाधिकारी अवैध शराब की बिक्री पर कभी तो इतना कड़ा निर्देश देते हैं  कि ऐसी शिकायतें मिलने पर थाना प्रभारी नपते । पर जमीनी हकीकत बिल्कुल विलोम ही है। इस पर नियंत्रण के बजाय वर्दी बकायदे इस कारोबार में शामिल हो गई है। इसका खुलासा निचलौल थानाक्षेत्र के सीमावर्ती शीतलापुर चौकी पर तैनात एक सिपाही द्वारा नेपाली शराब को चौकी से परागपुर गांव तक पहुंचाने के लिए सारी हदें पार किए जाने से हुआ है। सिपाही ने शराब न पहुंचाने पर उक्त टैम्पो चालक की पिटाई तक कर दी।

बता दें कि निचलौल थानाक्षेत्र के ग्राम करमहिया टोला अमड़ी निवासी हसमुद्दीन अंसारी पुत्र रफीक अंसारी ने बीते 11 फरवरी को सीओ निचलौल को शिकायती पत्र देकर अवगत कराया था कि आठ फरवरी की रात में 12 बजे के करीब शीतलापुर चौकी के एक सिपाही ने उसके घर आकर उसे अपना टैम्पो नेपाली शराब की तीस पेटी चौकी से परागपुर गांव तक पहुंचाने का दबाव बनाने लगा।

टैम्पो चालक द्वारा शराब लादकर पहुंचाने से इंकार किया तो उक्त सिपाही ने उसे गाली गुप्ता देते हुए उसकी पिटाई कर दिया। इतना ही नहीं उसकी पत्नी द्वारा विरोध किए जाने पर उसे भी सिपाही ने थप्पड़ से पिटाई कर दिया। पीड़ित का यह भी आरोप है कि सिपाही द्वारा अगले दिन अमड़ी पुल पर भी दुर्व्यवहार करते हुए टैम्पो को सीज करने की धमकी दी गई। इस पूरे प्रकरण से इस बात का खुलासा हो रहा है कि सीमावर्ती चौकियों पर तैनात सिपाही भी नेपाली शराब की तस्करी करा रहे हैं।

इनके द्वारा नेपाल से सीमा तक कैरियरों से नेपाली शराब मंगाकर निचलौल से सटे गांवों परागपुर, सिरौली, ओड़वलिया, बैदौली, टिकुलहियां आदि गांवों तक पहुंचाई जा रही है। इन गांवों में दुकानों पर नेपाली शराब की बिक्री जोरों पर चल रही है। सिपाहियों द्वारा थोक मात्रा में नेपाली शराब को पहुंचाकर अच्छा खासा साइड बिजनेस किया जा रहा है।

इस संबंध में पूछे जाने पर सीओ निचलौल रविन्द्र कुमार वर्मा ने बताया कि इस तरह का मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। यदि ऐसा है तो यह गंभीर मामला है। इसकी जांच की जाएगी

महराजगंग से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट

गाजीपुर समेत पूरे वाराणसी मंडल में दैनिक जागरण नं. वन

उ.प्र.के प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों की प्रसार संख्या के मुताबिक वाराणसी मंडल में 2 लाख 25 हजार प्रतियों की प्रसार संख्या के साथ दैनिक जागरण नंबर वन बना हुआ है। अमर उजाला की वाराणसी मंडल मे प्रसार संख्या 2 लाख के करीब चल रही है, जबकि हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान 1 लाख 60 हजार प्रतियों की प्रसार संख्या के साथ तीसरे स्थान पर है।

ये आंकड़े तीनो समाचार पत्रों के वाराणसी संस्करण के तहत 9 जिलों वाराणसी, आजमगढ़, जौनपुर, चन्दौली, मिर्जापुर, सोनभद्र, गाजीपुर, बलिया, मऊ मे प्रतिदिन कुल प्रतियों की प्रसार संख्या पर आधारित हैं। गाजीपुर मे प्रतिदिन दैनिक जागरण 30 हजार, अमर उजाला 25 हजार जबकि हिन्दुस्तान 15 हजार प्रतियों की प्रसार संख्या रखते है।

जनसंदेश टाइम्‍स के कर्मियों को पुलिस ने घंटों बैठाया थाने में

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस से खबर है कि एक व्‍यक्ति को बिना वजह पीट दिए जाने के चलते पुलिस अखबार को दो कर्मचारियों को पकड़कर थाने ले गई तथा घंटों बैठाए रखा. बाद में समझौता हो गया, जिसके बाद पुलिस ने दोनों को छोड़ दिया. खबर के अनुसार जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस के कार्यालय में एक बैंक भी शाखा भी खुली है. इसी बैंक में पास में रहने वाले डा. दुर्गाचरण के भाई, जो पैरों से कमजोर हैं, अपने स्‍कूटर से आए तथा पास में ही उसे खड़ी करके बैंक जाने लगे.

वे धीरे-धीरे पांच छह सीढ़ी चढ़े होंगे कि अखबार के गार्ड ने उनसे स्‍कूटर वहां से हटाने को कहा. इस पर उन्‍होंने अपनी परेशानी का हवाला देते हुए कहा कि बस दस मिनट में वे बैंक से काम करके चले जाएंगे. इतने में गार्ड अड़ गया तथा उनसे बदतमीजी करने लगा. इस दौरान अखबार के एक दो कर्मचारी भी चले आए. इसके बाद विवाद बढ़ गया तथा अखबार के कर्मचारी उन पर टूट पड़े उनके साथ जमकर मारपीट की गई. उनकी पत्‍नी बचाने आई तो उनके साथ भी बदतमीजी की गई.

इस दौरान वहां पर भीड़ लग गई. किसी ने पुलिस को सूचना दे दी. मौके पर पहुंची पुलिस मारपीट करने वाले अखबार के कर्मचारियों को पकड़कर थाने ले गई. तीन से चार घंटे तक पुलिस सभी को थाने में बैठाए रखा. बाद में अखबार के लोग अपने सारे घोड़े दौड़ाने के बाद थकहार गए तो डाक्‍टर के पास पहुंचे. बताया जा रहा है कि डाक्‍टर के भाई ने बाद में आसपास के लोगों के समझाने तथा पुलिस द्वारा भी पचड़े में न पड़ने की सलाह के बाद समझौता कर लिए.

हालांकि इस घटना से अखबार की छवि को भी धक्‍का लगा. नाम ना छापने की शर्त पर पास में रहने वाले एक व्‍यक्ति ने बताया कि अखबार के लोग खुद को तीसमार खां समझते हैं. अपने वाहन सड़क पर ही खड़ा कर देते हैं. सामने पार्किंग के लिए तनिक भी जगह नहीं है. बिल्डिंग के बेसमेंट में पार्किंग है, लिहाजा बहुत कम लोग बेसमेंट में अपनी गाडि़यां पार्क करते हैं, जिसके चलते यहां हमेशा जाम की स्थिति बनी रहती है. ये घटना भी इसी जाम के चलते हुई क्‍योंकि हर कोई पार्किंग के भीतर वाहन नहीं खड़ा कर सकता. इस संदर्भ में अखबार में कार्यरत विजय विनीत से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, परन्‍तु उन्‍होंने एसएमएस का कोई जवाब नहीं दिया.

सीएम अखिलेश के ‘मुलायम’ गाडफादर

मुलायम सिंह यादव सपा के मुखिया के साथ-साथ एक अच्छे आलोचक भी हैं। वह अखिलेश सरकार के लिए एक कुशल सारथी, रणनीतिकार, सलाहकार तो हैं ही, वहीं ‘गाडफादर‘ भी हैं। खामियों को उजागर करते हैं। अच्छी बातों को सरकार सामने रखते हैं। उनकी लोकसभा चुनावों के लिए समीक्षाएं एवं सरकार, संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच ललकार और लताड़ यही जाहिर करती है कि उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति काफी फिक्रमंद हैं। उनकी चिंता वाजिब है।

जिस तरह विधानसभा चुनाव में उन्होंने अखिलेश को रथ पर बैठाकर पूरे प्रदेश की कई बार परिक्रमा करवाई। उन्हें जन-जन से रूबरू होने का मौका मिला और जनता जनार्दन ने सिर आंखों पर बैठाया, इससे अखिलेश के प्रतिद्वंद्वी हैरान रह गये। प्रदेश की पहले-पहल मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले अखिलेश यादव का तजुर्बा भले ही विधानसभा में कतई न रहा हो, लेकिन पिता का साया उनके सिर पर आज भी मौजूद है, जिसी बदौलत आज तक किसी ने भी उन पर अंगुली नहीं उठायी है। सपा मुखिया दूसरे नेताओं की नाई अखिलेश को भी खरी-खोटी सुनाते हैं, जिससे मंत्री-संत्री भी अपने को ‘अपडेट‘ कर लेते हैं। ब्यूरोक्रेट में इसकी सुगबुगाहट शुरू हो जाती है।

सपा सुप्रीमो सरकार को दिशा निर्देश देते रहते हैं। सरकार की दिशा परखते हैं। विपरीत दिशा देखकर वे सरकार के मंत्रियों और ब्यूरोक्रेट को समझाते हैं, बुझाते हैं। नहीं मानने पर उनका बोरिया-बिस्तर भी बंधवा देते हैं। सपा सुप्रीमो अखिलेश के सुरक्षाकवच और पीछे-पीछे चलने वाली टीम पर भी वह विहंगम दृष्टि फेरते देखा जाते हैं। वह अखिलेश सरकार की निगहबानी के लिए प्रदेश के मुख्य वक्ता राजेन्द्र चौधरी का तीसरी आंख की तरह प्रयोग करते हैं। भूल-चूक और गलतियां सही करने का जिम्मा चौधरी के पास डालने वाले धरती पुत्र अपने घर परिवार की भी योजनागत तरीके से निगरानी रखते हैं। वह दुश्मन की निगाह को पहचानते हैं। कौन तीर कब चलाना है वह अच्छी तरह जानते हैं। मौका मिलने पर वह पटकनी देते हैं। हालांकि वह नरम दिल इंसान हैं। मुसीबत में भी वह साहस का परिचय देते हैं। उनके सामने ऐसे-ऐसे मौके आये, जहां बैलेट के साथ-साथ बुलेट का सामना करना पड़ा। उनके पास शत्रु दल का यदि कोई आया तो दया भावना के साथ उसको फौरन मित्र बनाकर त्वरित फैसला लेने में हिचक नहीं रखते है।

अपनी टीम में आने के बाद वह उसे दरकिनार नहीं करते, परिवार से ज्यादा प्रेम मुलायम सिंह का प्रमुख अस्त्र है। यह एक समुद्र मंथन जैसा वे अपने किले को दूसरों पर छोड़ना पसंद नहीं करते हैं। वह हर गतिविधि पर अपनी पैनी निगाह रखते हैं। शायद वह सोचते हैं कि अगर निगरानी में कोई चूक हो गयी तो उन्हें विरोधी छोड़ेंगे नहीं। इससे पहले खुद को चुस्त और दुरूस्त रखना पड़ेगा। अपने को इक्कीस रखने वाले धरती पुत्र पीछे नहीं हटते। अपने कार्यकर्ताओं और मंत्रियों की कुछ गलतियों के कारण उन्हें हानि उठानी पड़े, अतः वह पहले ही उन्हें समय-समय पर चेताने में कतई कोताही नहीं बरतते हैं। वे अपने दूसरे नंबर के सेनापति को कतई नजरंदाज नहीं कर सकते चाहे वह प्रगाढ़ सेनापति और दाहिने हाथ बेनी प्रसाद वर्मा रहे हों, या अमर सिंह और अब पुत्र अखिलेश यादव। अखिलेश के साथ उनका दोहरा रिश्ता है, कहीं वह उनके पिता है तो कई मौकों पर गॉड फादर। इतिहास उठा कर देखा जाये तो ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्हें अच्छा गॉड फादर मिल गया और वह सफलता की सीढ़ी चढ़ते गये। अखिलेश भी उन्हीं खुशनसीबों में से एक हैं।

बहरहाल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने गाडफादर के निर्देशों को पालन कराने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। वे ब्यूरोक्रेट पर चाबुक चलाने के लिए पूरी तरह तैयार खड़े हैं। इन 11 महीनों के दरम्यान उन्होंने अपने गाडफादर से बहुत कुछ सीखा और पाया है। वह सरकार चलाने की नब्ज को पहचानने लगे हैं। वह गाडफादर के पदचिन्हों पर चलने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अफसर, मंत्री और पार्टी के कुछ नेता कहीं न कहीं कुछ गुल खिला ही देते हैं। जिसके कारण गाडफादर को गुस्सा आता है। वह गाडफादर को पलटकर कोई जवाब तो नहीं देते, लेकिन उनकी बातों को अमल जरूर करते हैं। वह राज्य में दस फीसदी जीडीपी दर हासिल करने के लिए बड़े बदलाव लाना चाहते हैं। कानून व्यवस्था में सुधार के लिए वह हर कदम उठा रहे हैं। जिससे आने वाले लोकसभा चुनाव तक उनकी सरकार की एक अच्छी छवि बन सके। उद्योग धंधों को बढ़ाने के लिए उन्होंने काफी प्रयास किया है। बीस लाख वाले राज्य में युवाओं की अच्छी संख्या प्रदेश के विकास का स्रोत मानते हैं। अब देखना यह है कि ‘गाडफादर‘ की कसौटी पर मुख्यमंत्री कितना और खरे होकर निकलते है। अखिलेश का यह नसीब है कि विपक्षियों के लिए तेजतर्रार सपा प्रमुख मुख्यमंत्री के लिये हमेशा ‘मुलायम’ रहते हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं

इंटरव्यू (कहानी)

वो बोले, "ठीक है, आपका सीवी हमारे पास है…वी विल कांटेक्ट यू वेनएवर नीडेड"

वो इस जुमले का मतलब ठीकठाक समझता था, लेकिन उसे ये समझ नहीं आ रहा था कि उससे चूक कहां हो गई…उसका इंटरव्यू तो अच्छा ही गया था, फिर ऐसा क्यों कहा?

वो चौथी मंज़िल से सीधे नीचे पहुंचा और रिसेप्शनिस्ट को एक मुस्कान दे कर सीधे बाहर चला आया, भूख उसके पेट में रनडाउन सी ऊपर नीचे हो रही थी। पर्स में 40 रुपए पड़े थे और जेब में 5 का एक सिक्का…”चाय भी 7 रुपए की हो गई है, फिर बस का किराया होगा 10 रुपए…” 45 में 17 घटा कर उसने 6 रुपए की सिगरेट जोड़ी और देखा कि 22 रुपए बचेंगे। वो तेज़ी से छोले कुल्चे वाले की ओर बढ़ा, उसे 10 का नोट दिया और इधर उधर देखने लगा।

सामने से तभी वो लड़का दिखा, जो रिसेप्शन पर उससे टिकटैक का मतलब पूछ रहा था…वो उसे देख कर मुस्कुराया और बोला, "कैसा रहा…"

"सैलरी पूछ रहे थे…मैंने बताई…और फिर पूछा कि कब से ज्वाइन कर सकते हैं…देखो शायद मंडे से ज्वाइन करना होगा…रिपोर्टिंग पर…"

उसका चेहरा उतर गया था, कुल्चे आ गए थे और कुल्चे के नीचे किसी शशि कुमार का सीवी, उसे रखने के कागज़ की तरह इस्तेमाल किया गया था…फिल्म सिटी में ये कोई नया नज़ारा नहीं था, वो ऐसी कहानियां सुन चुका था, जब कई लोगों ने अपने ही सीवी के पन्ने पर ब्रेड पकौड़ा या समोसा खाया था। हालांकि ये उसका सीवी नहीं था, लेकिन उसे लगा कि जैसे उसका ही सीवी हो…उसने कुल्चे को देखा, और फिर तेज़ी से खाना शुरु किया, कुल्चे खत्म होते होते चाय पीने का उसका मन जाता रहा था…आंखों में आंसू ढुलकने से पहले उसने सिगरेट खरीदी, सुलगाई और ढुलकते सूरज को देखने लगा। उसे लगा कि जब इस बेवकूफ को नौकरी पर रख रहे हैं, तो उसे भी देर सवेर बुला ही लेंगे…हालांकि वो "वी विल कांटेक्ट यू वेनएवर नीडेड" के जुमले का मतलब जानता था…

घर के लिए बढ़ते वक़्त उसने तय किया कि आज बस से नहीं जाएगा…तो एक और सिगरेट पी सकता है, तब भी 4 रुपए बचेंगे। एक सिगरेट और खरीद कर ऊपर वाली जेब में डाली और चलते चलते सोचने लगा कि आखिर उस से इंटरव्यू में क्या गलती हुई…बल्कि उसने तो सारे सवालों के सही जवाब दिए थे…उसकी कॉपी देख कर चेक करने वाले प्रोड्यूसर ने कहा था, "सर, ब्रिलिएंट कॉपी है…ऐसी कॉपी लिखने वाला कोई रिपोर्टर तो छोड़िए, प्रोड्यूसर भी नहीं है डेस्क पर…बढ़िया…बहुत बढ़िया…" वो बाहर बैठा सुन रहा था, उसे लगा कि इस बार नौकरी मिल ही जाएगी, फिर क्यों…

वो याद कर रहा था…"क्यों सरनेम कुमार ही है क्या…असल में भी"

"नहीं सर, वो वैसे तो शुक्ल है….लेकिन.."

"लेकिन क्या…फिर लिखते क्यों नहीं…मेरा भी झा है, मैं तो लिखता हूं"

"नहीं सर, वो दरअसल…मैं जाति को नहीं मानता सो जाति का नाम भी हटा दिया…"

साथ बैठा गंजा आदमी बोला

"ओह…सीम्स इट चेंजेस समथिंग…कास्ट इज़ अ ट्रुथ, मे बी इट इज़ बिटर फॉर यू, बट इफ़ इट इज़ देअर, इट इज़ देयर…वैसे भी यू वोंट गेट रिज़र्वेशन ईवेन इफ़ यू रिमूव योर सरनेम…"
तीसरा मोटी मूंछों और खिचड़ी बालों वाला शख्स बोला,

“काजी…कामरेड हैं का?”

“हां जी, फुलटाइमर भी रहा हूं…”

“हां तो, तो क्या आ गई क्रांति…हाहाहाहाहा”

तीनों की हंसी पर वो भी मजबूरी में हंसने लगा…और फिर अगला सवाल आया, “भारत में पहला कम्युनिस्ट सीएम कौन था?”

“जी, ई एम एस नम्बूदरीपाद…”

“अच्छा….तो फिर ज्योति बसु कौन थे?” (तीनों मुस्कुराए…)

“जी सर…वो तो पश्चिम बंगाल में सीएम थे, लेकिन नम्बूरीपाद केरल में सीएम थे, देश के पहले नॉन कांग्रेस सीएम, सीपीएम के बड़े नेता थे…”

“मालूम है बड़े नेता थे, लेकिन पहले कम्युनिस्ट सीएम ज्योति बसु थे कामरेड…इतना भी नहीं पता है…”

“पक्का है सर, सौ फीसदी…आप गूगल कर लें…”

“हाहाहाहाहा…अब पत्रकार गूगल के भरोसे रहेगा तो हो चुका…कई साल रिपोर्टिंग की है हमने…”

“सर लेकिन मैं कन्फ़र्म हूं…नम्बूदरीपाद 1957 में सीएम बन गए थे, जबकि ज्योति बसु… ”

“चलिए आपको गूगल ही दिखा देते हैं…”

पहला वाला शख्स मुस्कुराया और गंजा आदमी अपने लैपटॉप गूगल करने लगा…लेकिन 15 सेकेंड बाद ही उसका चेहरा अजीब सा हो गया…

“नम्बूदरीपाद का पूरा नाम क्या था…”

“सर…एलमकुलम मनक्कल संकरन नम्बूदरीपाद…वैसे”

“चुनाव कहां से लड़ते थे…”

“कोझिकोड सर…”

“कितनी बार सीएम बने…”

“सर पहली बार 1957 से 1959, दूसरी बार 1967 से 69…”

“अभी कहां है…”

“सर…1998 में देहांत हो गया…1909 में पैदा हुए थे शायद…”

तीनों के चेहरे पर गंभीरता थी…गंजा और खिचड़ी बाल वाला कुछ खिसियाए से लग रहे थे, तीनों चुप थे…फिर खिचड़ी बाल वाला शख्स बोला…

“सिविल सर्विस क्यों नहीं टाइप किया…”

“सर…वो जर्नलिज़्म करना था…”

“कहां रहते हो…”

“सर, पांडवनगर…”

तीनों ने एक दूसरे को देखा, चेहरे पर अजीब से वितृष्णा के भाव थे…

"ठीक है, आपका सीवी हमारे पास है…वी विल कांटेक्ट यू वेनएवर नीडेड"

उसे समझ आ गया था, कि उससे गलती कहां पर हुई थी…

इस कहानी के लेखक युवा और तेजतर्रार पत्रकार मयंक सक्सेना हैं. मयंक जी न्यूज, सीएनईबी, सीवीबी, न्यूज24 समेत कई न्यूज चैनलों में काम कर चुके हैं. फिल्म, टीवी, थिएटर के लिए भी लिखते पढ़ते रहते हैं. मयंक सामाजिक मुद्दों और सुधारवादी आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और नेतृत्वकारी भूमिका में रहते हैं. मयंक से संपर्क 09310797184 के जरिए किया जा सकता है. मयंक रचित चंपादक सीरिज पढ़ने के लिए आप इस पर क्लिक करें- चंपादकजी कहिन

दो कार्टून, एक फोटो और एक गाना… जय हो

बेतुक में भी तुक हो जाता है. अब यही देखिए. गाने के साथ कार्टून और फोटो देने का क्या मतलब. वह भी तब जब कार्टून का फोटो से कोई लेना देना न हो और फोटो व कार्टून का गाने से कोई गुणा-गणित न हो. तीनों को एक जगह मिलाकर देने से बेतुकापन ही तो साबित होता है. लेकिन यह बेतुकापन कई बार जीवन के लिए जरूरी होता है क्योंकि जो कुछ सिस्टमेटिक दिखता है, उसमें रुटीन-सा और बासी-सी बदबू आती है, और बेतुकपने में कई बार स्पार्क, नयापन, सोंधी महक होती है. तो, लीजिए, इस बेतुकपने का आनंद उठाइए… – यशवंत


(देखें कार्टून)



Main to piya se naina laga aayi re… (Hazrat Amir Khusro)

Ustad Shujaat Hussain Khan की आवाज़…

अन्य गीत व टेप के लिए यहां क्लिक करें- MP3

(सुनें)

वाह भई वाह, एक और घोटाला…. कफ़न, कोयला, खेल, पनडुब्बी, चारे के बाद अब हवाई घोटाला!

 

लूटने में लगी है ये घटिया सियासत, और हिंदू – मुस्लिम के मुद्दे, उंची जाति, निचली जाति पर बिकने के लिये मजबूर है इस मुल्क की भोली भाली आवाम। और अब इन घोटालों में सियासत ने आसमान को भी नही छोड़ा है, ताज़ा तरीन मामले में अति विशिष्ट हेली काप्टर की खरीद के मामले में धांधले बाज़ी पकड़ में आई है। जानकारी के अनुसार, सीधे आरोप पूर्व वायु सेना प्रमुख एसपी त्यागी पर लगाये गये हैं, उन पर आरोप है कि उन्होंने हेलीकाप्टर बनाने वाली कंपनी को फ़ायदा पहुंचाने के लिये टेण्डर में फ़ेर बदल करे हैं। और इसकी एवज में उन्हें और उनके कुछ संबंधियों को रिश्वत दी गई है।
जहां पहले इस हेलीकाप्टर के उड़ान सीमा १८,००० फ़ुट निर्धारित की गई थी, बाद में इसे बदल कर १५,००० फ़ुट कर दिया गया। जानकारों की माने तो इस हेलीकाप्टर में ६ फ़ुट लंबे एसपीजी के जवान बंदूक ले कर खड़े नही हो सकते थे। वहीं एसपी त्यागी की माने तो ये सारे फ़ेरबदल सन २००३ में किये गये थे, जबकि वो वायु सेनाध्यक्ष नही थे। उन्होंने ये भी कहा कि एयर हेडक्वार्टर को फ़ेरबदल करने का कोई अधिकार ही नहीं है, ये सारे बदलाव यदि किये भी जाते हैं, तो ये रक्षा मंत्रालय के माध्यम से होते हैं।
 
बहरहाल, अभी तो ये मामला गर्म है, मीडिया की मंडी में काफ़ी उंचे भाव पर बिक रहा है, लेकिन देखना ये है कि ये मामला कितने दिनों के बाद कफ़न मामले की तरह दफ़न होगा। आजादी से अब तक देश में काफी बड़े घोटालों का इतिहास रहा है। प्रस्तुत है भारत में हुए बड़े घोटालों का संक्षिप्त विवरण-
 
जीप खरीदी (१९४८) : आजादी के बाद भारत सरकार ने एक लंदन की कंपनी से २००० जीपों को सौदा किया। सौदा ८० लाख रुपये का था। लेकिन केवल १५५ जीप ही मिल पाई। घोटाले में ब्रिटेन में मौजूद तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन का हाथ होने की बात सामने आई। लेकिन १९५५ में केस बंद कर दिया गया। जल्द ही मेनन नेहरु कैबिनेट में शामिल हो गए।
 
साइकिल आयात (१९५१) : तत्कालीन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के सेक्रेटरी एस.ए. वेंकटरमन ने एक कंपनी को साइकिल आयात कोटा दिए जाने के बदले में रिश्वत ली। इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा।
 
मुंध्रा मैस (१९५८) : हरिदास मुंध्रा द्वारा स्थापित छह कंपनियों में लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के १.२ करोड़ रुपये से संबंधित मामला उजागर हुआ। इसमें तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी, वित्त सचिव एच.एम.पटेल, एलआईसी चेयरमैन एलएस वैद्ययानाथन का नाम आया। कृष्णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा और मुंध्रा को जेल जाना पड़ा।
 
तेजा ऋण : १९६० में एक बिजनेसमैन धर्म तेजा ने एक शिपिंग कंपनी शुरू करने के लिए सरकार से २२ करोड़ रुपये का लोन लिया। लेकिन बाद में धनराशि को देश से बाहर भेज दिया। उन्हें यूरोप में गिरफ्तार किया गया और छह साल की कैद हुई।
 
पटनायक मामला : १९६५ में उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया। उन पर अपनी निजी स्वामित्व कंपनी 'कलिंग ट्यूब्स' को एक सरकारी कांट्रेक्ट दिलाने केलिए मदद करने का आरोप था।
 
मारुति घोटाला (अपुष्ट) : मारुति कंपनी बनने से पहले यहां एक घोटाला हुआ जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम आया। मामले में पैसेंजर कार बनाने का लाइसेंस देने के लिए संजय गांधी की मदद की गई थी।
 
कुओ ऑयल डील : १९७६ में तेल के गिरते दामों के मददेनजर इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने हांग कांग की एक फर्जी कंपनी से ऑयल डील की। इसमें भारत सरकार को १३ करोड़ का चूना लगा। माना गया इस घपले में इंदिरा और संजय गांधी का भी हाथ है।
 
अंतुले ट्रस्ट : १९८१ में महाराष्ट्र में सीमेंट घोटाला हुआ। तत्कालीन महाराष्ट्र मुख्यमंत्री एआर अंतुले पर आरोप लगा कि वह लोगों के कल्याण के लिए प्रयोग किए जाने वाला सीमेंट, प्राइवेट बिल्डर्स को दे रहे हैं।
 
एचडीडब्लू दलाली (१९८७) : जर्मनी की पनडुब्बी निर्मित करने वाले कंपनी एचडीडब्लू को काली सूची में डाल दिया गया। मामला था कि उसने २० करोड़ रुपये बैतोर कमिशन दिए हैं। २००५ में केस बंद कर दिया गया। फैसला एचडीडब्लू के पक्ष में रहा।
 
बोफोर्स घोटाला : १९८७ में एक स्वीडन की कंपनी बोफोर्स एबी से रिश्वत लेने के मामले में राजीव गांधी समेत कई बेड़ नेता फंसे। मामला था कि भारतीय १५५ मिमी. के फील्ड हॉवीत्जर के बोली में नेताओं ने करीब ६४ करोड़ रुपये का घपला किया है।
 
सिक्योरिटी स्कैम (हर्षद मेहता कांड) : १९९२ में हर्षद मेहता ने धोखाधाड़ी से बैंकों का पैसा स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया, जिससे स्टॉक मार्केट को करीब ५००० करोड़ रुपये का घाटा हुआ। 
 
इंडियन बैंक : १९९२ में बैंक से छोटे कॉरपोरेट और एक्सपोटर्स ने बैंक से करीब १३००० करोड़ रुपये उधार लिए। ये धनराशि उन्होंने कभी नहीं लौटाई। उस वक्त बैंक के चेयरमैन एम. गोपालाकृष्णन थे।
 
चारा घोटाला : १९९६ में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और अन्य नेताओं ने राज्य के पशु पालन विभाग को लेकर धोखाबाजी से लिए गए ९५० करोड़ रुपये कथित रूप से निगल लिए।
 
तहलका : इस ऑनलाइन न्यूज पॉर्टल ने स्टिंग ऑपरेशन के जारिए ऑर्मी ऑफिसर और राजनेताओं को रिश्वत लेते हुए पकड़ा। यह बात सामने आई कि सरकार द्वारा की गई १५ डिफेंस डील में काफी घपलेबाजी हुई है और इजराइल से की जाने वाली बारक मिसाइल डीलभी इसमें से एक है।
 
स्टॉक मार्केट : स्टॉक ब्रोकर केतन पारीख ने स्टॉक मार्केट में १,१५,००० करोड़ रुपये का घोटाला किया। दिसंबर, २००२ में इन्हें गिरफ्तार किया गया।
 
स्टांप पेपर स्कैम : यह करोड़ों रुपये के फर्जी स्टांप पेपर का घोटाला था। इस रैकट को चलाने वाला मास्टरमाइंड अब्दुल करीम तेलगी था।
 
सत्यम घोटाला : २००८ में देश की चौथी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स के संस्थापक अध्यक्ष रामलिंगा राजू द्वारा ८००० करोड़ रूपये का घोटाले का मामला सामने आया। राजू ने माना कि पिछले सात वर्षों से उसने कंपनी के खातों में हेरा फेरी की।
 
मनी लांडरिंग : २००९ में मधु कोड़ा को चार हजार करोड़ रुपये की मनी लांडरिंग का दोषी पाया गया। मधु कोड़ा की इस संपत्ति में हॉटल्स, तीन कंपनियां, कलकत्ता में प्रॉपर्टी, थाइलैंड में एक हॉटल और लाइबेरिया ने कोयले की खान शामिल थी।
 
बोफर्स घोटाला : ६४ करोड़ रु. मामला दर्ज हुआ – २२ जनवरी, १९९०। सजा – किसी को नहीं। वसूली – शून्य
 
एच.डी. डब्ल्यू सबमरीन : ३२ करोड़ रु.। मामला दर्ज हुआ – ५ मार्च, १९९०।  (सीबीआई ने अब मामला बंद करने की अनुमति मांगी है।) सजा – किसी को नहीं। वसूली – शून्य। (१९८१ में जर्मनी से ४ सबमरीन खरीदने के ४६५ करोड़ रु. इस मामले में १९८७ तक सिर्फ २ सबमरीन आयीं, रक्षा सौदे से जुड़े लोगों द्वारा लगभग ३२ करोड़ रु. की कमीशनखोरी की बात स्पष्ट हुई।)
 
स्टाक मार्केट घोटाला– ४१०० करोड़ रु.। मामला दर्ज हुआ – १९९२ से १९९७ के बीच ७२। सजा – हर्षद मेहता (सजा के १ साल बाद मौत) सहित कुल ४ को। वसूली – शून्य (हर्षद मेहता द्वारा किए गए इस घोटाले में लुटे बैंकों और निवेशकों की भरपाई करने के लिए सरकार ने ६६२५ करोड़ रुपए दिए, जिसका बोझ भी करदाताओं पर पड़ा।)
 
एयरबस घोटाला– १२० करोड़ रु.। मामला दर्ज हुआ – ३ मार्च, १९९०। सजा – अब तक किसी को नहीं। वसूली – शून्य। (फ्रांस से बोइंग ७५७ की खरीद का सौदा अभी भी अधर में, पैसा वापस नहीं आया)।
 
चारा घोटाला– ९५० करोड़ रुपए। मामला दर्ज हुआ – १९९६ से अब तक कुल ६४। सजा – सिर्फ एक सरकारी कर्मचारी को। वसूली – शून्य (इस मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव हालांकि ६ बार जेल जा चुके हैं)।
 
दूरसंचार घोटाला-१२०० करोड़ रुपए। मामला दर्ज हुआ – १९९६। सजा – एक को, वह भी उच्च न्यायालय में अपील के कारण लंबित। वसूली – ५.३६ करोड़ रुपए। (तत्कालीन दूरसंचार मंत्री सुखराम द्वारा किए गए इस घोटाले में छापे के दौरान उनके पास से ५.३६ करोड़ रुपए नगद मिले थे, जो जब्त हैं। पर गाजियाबाद में घर (१.२ करोड़ रु.), आभूषण (लगभग १० करोड़ रुपए) बैंकों में जमा (५ लाख रु.) शिमला और मण्डी में घर सहित सब कुछ वैसा का वैसा ही रहा। सूत्रों के अनुसार सुखराम के पास उनके ज्ञात स्रोतों से ६०० गुना अधिक सम्पत्ति मिली थी।)
 
यूरिया घोटाला– १३३ करोड़ रुपए। मामला दर्ज हुआ – २६ मई, १९९६। सजा – अब तक किसी को नहीं। वसूली – शून्य। (प्रधानमंत्री नरसिंहराव के करीबी नेशनल फर्टीलाइजर के प्रबंध निदेशक सी.एस.रामाकृष्णन ने यूरिया आयात के लिए पैसे दिए, जो कभी नहीं आया।)
 
सी.आर.बी– १०३० करोड़ रुपए। मामला दर्ज हुआ – २० मई, १९९७। सजा – किसी को नहीं। वसूली – शून्य (चैन रूप भंसाली (सीआरबी) ने १ लाख निवेशकों का लगभग १ हजार ३० करोड़ रु.
डुबाया और अब वह न्यायालय में अपील कर स्वयं अपनी पुर्नस्थापना के लिए सरकार से ही पैकेज मांग रहा है।)

केपी– ३२०० करोड़ रुपए। मामला दर्ज हुआ – २००१ में ३ मामले। सजा – अब तक नहीं। वसूली – शून्य (हर्षद मेहता की तरह केतन पारेख ने बैंकों और स्टाक मार्केट के जरिए निवेशकों को चूना लगाया।)
 
हो सकता है, कि कुछ घोटाले इस बड़ी लिस्ट से छूट गये हों…
 
लेखक अंकित माथुर मीडिया से जुड़े रहे हैं. ब्लागिंग में सक्रिय हैं. आईटी फील्ड में गुड़गांव में कार्यरत हैं.

 

17 फरवरी के IIMC पूर्व छात्र सम्मेलन में छात्रावास के मुद्दे को पुरजोर तरीक से उठाएं

प्रिय साथियों, सप्रेम याद, जैसा कि आप सबों को ज्ञात है कि आगामी 17 फरवरी, तारीख गुरूवार को भारतीय जनसंचार संस्थान ( INDIAN INSTITUTE OF MASS COMMUNICATION) के नई दिल्ली स्थित मुख्य परिसर में आईआईएमसी पूर्व छात्र सम्मेलन 2013 का आयोजन IIMC Alumni Association के जानिब किया जा रहा है. पत्रकारिता का मक्का कहा जाने वाले इस संस्थान में पूर्व अग्रज साथियों का यह प्रयास सराहनीय है, क्योंकि इसी बहाने मुद्दतों बाद हम और आप अपने वरिष्ठ मित्रों, सहपाठियों और अनुज बंधुओं के साथ चंद घंटे व्यतीत करते हैं. इसी बहाने हम और आप अपने पत्रकारीय अनुभवों से नवांकुर पत्रकारों रूबरू कराते हैं. इसी बहाने हम और आप पत्रकारिता के समक्ष पैदा होने वाली चुनौतियां और उससे पार पाने की तरकीबों पर चर्चा करते हैं.

इसी बेहतरीन बहाने के जरिए हम लोग पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान का एकमात्र मरकजृ ( केंद्र) के परिसर में अपने इस महापरिवार को एकजुट और प्रभावी बनाने पर सार्थक बहस करते हैं. आईआईएमसी से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त करने वाले सभी पत्रकार साथी इस सालाना जलसे का शिद्दत से इंतज़ार करते हैं. हालांकि 17 फरवरी को होने वाले इस अल्युमिनाई मीट में मैं एक मसले पर मंच सभागार में चर्चा करना चाहता हूं. मेरा मानना है कि पूर्व छात्र संघ यानि अल्युमिनाई एसोसिएशन का पहला और अहम मकसद होना चाहिए वहां पढ़ने वाले छात्रों का अधिक से अधिक लाभ कैसे मिले ?

जैसा कि आप सभी साथी जानते हैं कि आज की तारीख में आईआईएमसी की शाखा नई दिल्ली के अलावा ढेंकनाल और अमरावती के अतिरिक्त कुछ अन्य प्रदेशों में है. यहां पढ़ने वाले सभी छात्र-छात्राओं को सुसज्जित छात्रावास की सुविधा प्राप्त है, लेकिन बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आईआईएमसी के मुख्य परिसर नई दिल्ली में छात्राओं को हॉस्टल की सुविधा प्राप्त है, लेकिन यहां दाखिला पाने वाले छात्रों को इस सुविधा से महरूम रखा गया है. हालांकि कुछ दशक पहले आईआईएमसी, दिल्ली के छात्रों को भी हॉस्टल की सुविधा मुहैया कराई जाती थी, लेकिन इसे किस वजह से बंद किया गया, इसका सही जवाब किसी के पास नहीं है.

आखिर ऐसी कौन सी वजह है कि नई दिल्ली आईआईएमसी परिसर में पढ़ने वाले छात्र पड़ोस के मुनिरिका, बेर सराय, कटवारिया सराय या दीगर जगहों में सीलन और तंग कमरों में अपना जीवन व्यतीत करें. साथ ही पूरे 1 साल के पाठ्यक्रम के दौरान जेएनयू के पूर्वांचल, नर्मदा, झेलम, पेरियार और कावेरी जैसे छात्रावासों की कैंटीन में खानाबदोश की तरह अपना उदरपूर्ति करते रहें. मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि मैं आईआईएमसी में पढ़ने के दौरान शाम का खाना और सुबह का नाश्ता जेएनयू के विविध छात्रावास में करता था.

मुझे पता है मेरे से पूर्व कई बैच और मौजूदा बैच के छात्र भी जेएनयू के छात्रावासों में शाम का भोजन करते होंगे, जबकि हमारे यहां पढ़ने वाले विदेशी छात्रों को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस छात्रावास की सुविधा प्राप्त है. बहरहाल, मैं आईआईएमसी एल्युमिनाई एसोशिएसन से जुड़े साथियों से यह आग्रह करना चाहता हूं कि वे 17 फरवरी को होने वाले पूर्व छात्र सम्मेलन में छात्रावास के मुद्दे को पुरजोर तरीक से उठाएं. मैं 17 फरवरी को अल्युमिनाई मीट में जरूर मौजूद रहूंगा और नई दिल्ली स्थित आईआईएमसी के मुख्य परिसर में छात्रों को हॉस्टल से महरूम करने संबंधी मुद्दे पर बेशक सवाल करूंगा. उम्मीद है अन्य साथियों का भी सहयोग मिलेगा.

आपका
अभिषेक रंजन सिंह
पूर्व छात्र आईआईएमसी

‘स्टार इंडिया न्यूज’ की चर्चा : क्या ‘स्‍टार’ और ‘इंडिया न्‍यूज’ के बीच समझौता हो गया?

इंडिया न्‍यूज में एक बड़ी कानाफूसी चल रही है. कहा जा रहा है कि इस चैनल से बड़े नाम ही नहीं जुड़े हैं बल्कि अब यह चैनल भी सचमुच बड़ा होने जा रहा है. नाम के साथ भी और ब्रांड के साथ भी. दीपक चौरसिया के आने के बाद से ही जिस बात के कयास लगाए जा रहे थे, वो सही साबित होने लगा है. मीडिया मुगल रुपर्ट मर्डोक के स्‍टार समूह इंडिया न्‍यूज से टाइअप कर लिया है. हालांकि अभी कोई अधिका‍री इस बात को अभी आधिकारिक रूप से स्‍वीकार नहीं कर रहा है, पर तय माना जा रहा है कि स्‍टार ने इंडिया न्‍यूज के साथ समझौता कर लिया है.

भड़ास ने भी इस बात की सूचना बहुत पहले दी थी कि स्‍टार समूह इंडिया न्‍यूज से समझौता कर सकता है. स्‍टार ने जब आनंद बाजार पत्रिका समूह के एमसीएमएस से खुद को अलग किया था, तभी से अंदाजा लगाया जा रहा था कि वो इतनी जल्‍दी अपने ब्रांड को खतम नहीं होने देगा. संभावनाएं बहुत पहले ही जताई जा रही थीं, पर दीपक चौरसिया ने एबीपी न्‍यूज छोड़कर इंडिया न्‍यूज ज्‍वाइन किया तो इस बात को और अधिक बल मिलने लगा था. इस डील में दीपक चौरसिया की भी महत्‍वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है, क्‍योंकि दीपक स्‍टार न्‍यूज के साथ लंबे समय तक रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि इस डील के लिए कंपनी के एमडी कार्तिकेय शर्मा भी लंदन जाकर स्‍टार समूह से बात की थी. उसी प्रस्तावित लोगोदौरान कई मुद्दों पर समझौता हो गया था. वैसे दीपक के बाद राणा यशवंत, मनीष अवस्‍थी, आंचल आनंद समेत जब कई जमे जमाए चैनल से इंडिया न्‍यूज ज्‍वाइन किया तो उसी दौरान यह तय माना जा रहा था कि ये अनुभवी पत्रकार कोई छोटा गेम नहीं खेलेंगे. इसके बाद जब कई वरिष्‍ठ पत्रकार बड़े चैनलों को छोड़कर कभी अछूत माने जाने वाले इंडिया न्‍यूज की तरफ जाने लगे तब लगने लगा कि कुछ अलग होने जा रहा है. अब स्‍टार के जुड़ने की बात सामने आने के साथ यह तक हो गया है कि इन लोगों ने अपने करियर को लेकर कोई रिस्‍क नहीं लिया है.  

स्‍टार के इंडिया न्‍यूज के जुड़ने के साथ ही तय हो गया कि अब यह चैनल बड़े और जमे जमाए चैनलों के लिए हर स्‍तर पर खतरा बनने जा रहा है. आर्थिक रूप से सक्षम चैनल अब पत्रकारिता और ब्रांड नामों के लिहाज से भी अन्‍य चैनलों के टक्‍कर में खड़ा हो गया है. अभी नेशनल चैनल लांच नहीं हुआ है इसके बावजूद इसे गंभीर चैनलों की श्रेणी में माना जाने लगा है. दोनों समूह के संयुक्‍त चैनल का नाम 'स्‍टार इंडिया न्‍यूज' कर दिया गया है. इसका लोगो भी तैयार कर लिया गया है, परन्‍तु अभी इसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है. संभावना है कि लांचिंग के दिन ही यह धमाका किया जाएगा.

हालांकि इस बारे में इंडिया न्‍यूज का कोई भी अधिकारी ऑफिसियली या अनऑफिसियली कुछ बोलने को तैयार नहीं है. साथ ही स्‍टार के साथ समझौते की बात से इनकार भी किया जा रहा है, परन्‍तु जिस तरीके से तैयारियां चल रही हैं उससे स्‍टार से समझौते की कयासों को बल मिल रहा है. (कानाफूसी)

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सहारा के पत्रकार बने हरकारा, द्वारे द्वारे पहुंचा रहे कार्ड और क्यूशाप के सामान

सहारा की नौकरी बड़ी बुरी. खासकर पत्रकार की. लखनऊ वालों के दिल से पूछिए. महीने दो महीने पर उन्हें कोई न कोई कार्ड या सामान थमा दिया जाता है और कह दिया जाता है कि सारे विधायकों और अफसरों के यहां पहुंचा दीजिए. सु्ब्रत राय सहारा का जन्मदिन हो या उनके बेटों-नाती-पोतों की, हर मौके के निमंत्रण को बांटने का जिम्मा पत्रकारों को दे दिया जाता है.

बेचारे पत्रकार, आधुनिक जमाने के नाई की भूमिका में भी वे गर्व के साथ यहां वहां कार्ड बांटते खुश दिखने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन असल में उनका दिल रो रहा होता है. उन्हें लगता है कि वे तो कलम का काम करने के लिए यहां आए थे लेकिन उन्हें तो कुछ और ही करना पड़ रहा है. ताजा मामला है सहारा की नून-तेल की नई खुली दुकान क्यूशाप के सामान बांटने की.

सुब्रत राय सहारा के दिमाग में जोरदार खयाल आया कि क्यूं न क्यूशाप के सामान फ्री में विधायकों अफसरों तक पहुंचा दिया जाए ताकि वे लोग एक बार इसका इस्तेमाल करके इससे प्रभावित हों और इसी बहाने सहारा से उनका पीआर भी ठीकठाक हो जाएगा. तो, इस काम में लगा दिया गया पत्रकारों को. नूनतेलदालचावलम् नामक भांति भांति के पदार्थम से लैस गठरी को पीठ पर लादे सहारा के पत्रकार खटखटाने लगे नेताओं अफसरों का दरवाजा. एक तो पत्रकार, उपर से लादे हुए माल… नेताओं अफसरों को लग रहा कि कहीं ये स्टिंग तो नहीं कर रहे, कुछ दे दाकर फंसा तो नहीं रहे…

सो पहले पहल तो सभी इन पत्रकारों को दुरदुराते हुए नजर आते हैं… लेकिन जब पत्रकार सहारा श्री उर्फ सुब्रत राय सहारा का पत्र उन्हें थमाते हैं कि देखिए सहाराश्री ने क्या लिखा है, तब जाकर नेताओं अफसरों की सांस में सांस आती है और उनके चेहरे पर रौनक आ जाती है, दो कारणों से, कि देखो बेचारा पत्रकार, कैसे कर रहा उनका मनुहार और फ्री में दे रहा सहारा का सामान. दूसरे, कि ऐसे पत्रकार अगर हैं तो डरने की जरूरत नहीं क्योंकि ये उल्टी खबर तो लिख ही नहीं सकते, आखिर इन्हें सहारा और सहाराश्री का पीआर जो मेनटेन रखना है. नीचे वो पत्र है, जो सहारा के क्यूशाप के सामान के साथ नेताओं-अफसरों को दिया जा रहा है…

दैनिक भास्कर का कनाट प्लेस का आफिस बंद, कई पत्रकारों की छंटनी

दैनिक भास्कर अखबार से खबर है कि दिल्ली के कनाट प्लेस में जो अखबार का एक विशेष आफिस खोला गया था, उसे अब बंद कर दिया गया है. यहां कार्यरत करीब दर्जन भर पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया है. सूत्रों के मुताबिक निकाले गए लोगों में कई लोग फीचर पेजों से संबद्ध थे और कई लोग रोहित शरण की टीम के थे जिन्हें रोहित शरण अपने समय में काफी सेलरी पर दूसरे अंग्रेजी अखबारों से लेकर आए थे.

भास्कर प्रबंधन की यह नीति है कि अंग्रेजी अखबारों से पत्रकारों को गाजे-बाजे और हाई-फाई सेलरी के साथ ले आओ और कुछ समय बाद ही उन्हें निपटा दो. यतीश राजावत और रोहित शरण इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं. रोहित शरण के आने के बाद कनाट प्लेस पर आफिस खोला गया और कई पत्रकारों को यहां लाया गया.

फीचर पेजों का काम भी यहां लाया गया. इन पेजों से जुड़े पत्रकारों का भी यहां ट्रांसफर कर दिया गया. अब सूचना है कि सभी को निकाल बाहर किया गया है. फीचर पेजेज को दिल्ली से शिफ्ट कर दिया गया है. इस छंटनी और आफिस बंदी के बारे में आधिकारिक जानकारी नहीं मिल पाई है. अगर आपको कुछ पता हो तो bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज दें. (कानाफूसी)

बाड़मेर में मिग गिरने से दहशत, पायलट सुरक्षित

बाड़मेर। बाड़मेर वायुसेना स्टेशन से नियमित उड़ान के लिए उड़ान भरने के बाद एक मिग 27 लड़ाकू विमान मात्र 2 मिनट बाद ही आनानियों की ढाणी नामक स्थान पर गिर गया और इस दुर्घटना की भीषणता इतनी जबरदस्त थी कि इलाके में करीब एक किलोमीटर तक का इलाका वायुयान के टुकड़ों से अट गया। दरअसल मंगलवार दोपहर के बाद वायुसेना का एक विमान दुर्घटनाग्रस्त होक्रर उत्तरलाई व बांद्रा के बीच स्थित गांव बांद्रा के रहवासी क्षेत्र में जा गिरा। जैसे ही यह विमान हादसा हुआ चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल हो गया। 

वायुसेना स्टेशन उत्तरलाई से मिग 27 विमान नियमित उड़ान पर उड़ा ही था, कि कुछ ही देर बाद तकनीकी खराबी के चलते दुर्घटनाग्रस्त होकर एक खेत में गिर गया। घटना की जानकारी मिलते ही एयरफोर्स, जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन के आला अधिकारी मौके पर पहुंचे। घटना के बाद विमान का मलबा एक किमी. के क्षेत्र में बिखर गया। इस घटना में इलाके में स्थित एक रहवासी मकान में वायुयान के कुछ हिस्से जा टकराए जिसके कारण मकान के एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया और पत्थर आदि उछलने के कारण दो बच्चे व एक महिला चोटिल हुई, जिनको एम्बुलेंस 108 की सहायता से राजकीय चिकित्सालय लाया गया। यहाँ घटना के प्रत्यक्षदर्शी ग्रामीणों ने बताया कि अकस्मात हुए इस हादसे के कारण इलाके में रहने वाले ग्रामीण भयभीत हो गए हैं और इसके कारण लोग काफी डरे हुए हैं।
 
घटना के बाद एयरफोर्स के अधिकारियों के अलावा बाड़मेर जिला कलेक्टर भानू प्रकाश एटरू, जिला पुलिस अधीक्षक राहुल बारहठ, केयर्न एनर्जी के अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और स्थितियों का जायजा लिया। ये तो गनीमत रही कि ये हादसा नागाणा से कुछ दूर हुआ अन्यथा कुछ ही किमी. की दूरी पर आगे केयर्न एनर्जी का तेल उत्त्पादन पॉइंट मगला है, अगर इस क्षेत्र में वायुयान दुर्घटनाग्रस्त हो जाता तो बड़ी तबाही मचा सकता था। घटना की सूचना के बाद केयर्न के अधिकारी भी सतर्क हुए और मौके पर पहुंचे। मिग 27 में सवार पायलट सुरक्षित बच गया। घटना के बाद एयरफोर्स ने चारों तरफ के एरिये को कवर कर सुरक्षित कर दिया। मौके पर पहुंचे जिला पुलिस अधीक्षक राहुल बारहठ ने घटना के बारे में जानकारी देते हुए इससे हुए नुकसान के बारे में बताया।  
 
मिग 27 दुर्घटनाग्रस्त होने से बांद्रा गांव में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। घटना की सूचना जैसे ही ग्रामीणों को लगी, तो भारी संख्या में ग्रामीण मौके पर एकत्रित हो गए। वहीं मौके पर एयरफोर्स के अधिकारी मौके की स्थिति का जायजा लेकर घटना के कारणों की तलाश में जुट गए। हालांकि इस क्षेत्र में मिग विमान हादसा होना नई बात नहीं है, इस तरह के हादसे पूर्व में भी हो चुके है। लेकिन उडऩ ताबूत कहे जाने वाले मिग के कई विमानों को अपडेट करने की अभी तक कोई भी पहल नहीं की गई है।
 
बाड़मेर से दुर्गसिंह राजपुरोहित की रिपोर्ट. 

रायपुर से जोर-शोर से शुरू हुआ सांध्य दैनिक जनदखल का प्रकाशन बंद

एनडीटीवी में काम कर चुके पत्रकार रीतेश कुमार साहू ने बड़े अरमान और सपनों के साथ रायपुर से एक सांध्य दैनिक 'जनदखल' का प्रकाशन शुरू किया था. पर यह सपना अब टूट चुका है. अखबार का प्रकाशन बंद कर दिया गया है. करीब दो दर्जन लोग बेरोजगार हो चुके हैं. कहा तो ये गया है कि पांच छह महीने बाद फिर से यह अखबार शुरू होगा लेकिन जानने वाले जानते हैं कि बंद हो चुका यह अखबार अब नहीं शुरू होने वाला.

अखबार के लांचिंग के वक्त इससे जुड़े रहे देशपाल सिंह पंवार कबका यह अखबार छोड़ चुके हैं. जनदखल अखबार ने पहले ही अंक से छत्तीसगढ़ सरकार पर प्रहार शुरू कर दिया था. इसका छत्तीसगढ़ में जमकर स्वागत किया गया. आरकेएस इम्प्रैसिव मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले पहली बार दस्तक देते ही 'जनदखल' ने अपने नाम के मुताबिक जनता के दिलों को झकझोरने की कोशिश की. जिस राज्य में सारा मीडिया सत्ता के गुणगान करने में मस्त रहा हो वहां जनदखल ने पहले दिन से ही रमन सरकार की बैंड बजाने का काम शुरू कर दिया था.

इसके कारण जनदखल को कई तरीके के सरकारी मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा. अखबार के प्रवेशांक के अवसर पर संपादक देशपाल सिंह पंवार, प्रबंध संपादक रीतेश साहू, खेल संपादक कमलेश गोगिया, सह संपादक संजय खरे, फीचर संपादक मिस जुलेखा जबीं, फोटो एडिटर प्रदीप ढढ़सेना, चीफ रिपोर्टर संजय पांडेय समेत जनदखल का सारा परिवार मौजूद था. लेकिन बंद होते वक्त कौन कहां है, यह किसी को नहीं पता.

उधर कुंभ हादसा, इधर बेनी बाबू के जन्‍मदिन पर डांस

बाराबंकी। बेनी बाबू का जन्मदिन हर वर्ष 11 फरवरी को चर्चा में रहता है। अबकी बार पहले से ही बाबू जी के विदेश में रहने की वजह से बड़े कार्यक्रम का आयोजन रद्द कर दिया गया। सिर्फ गरीबों की शादियां कराने का फैसला हुआ। बेनी बाबू आये। साथ में नये कांग्रेसियों को भी लाये। मंच पर बैठे कुंभ के हादसे को लेकर दुख जताया और कार्यकर्ताओं व अपने लोगों से जन्मदिन सादगी से मनाने का एलान भी किया। लेकिन अफसोस कि उसी कार्यक्रम में जमकर डिस्को डांस हुआ। बेनी के चहेतों ने जन्मदिन पर खूब नाचा और खुशियां मनायी।

वैसे हर वर्ष कभी केक काटने पर, कभी कार्यक्रम में आंधी आने पर, कभी मौजूदा जैदपुर के सपा विधायक रामगोपाल रावत जो उस वक्त बेनी बाबू के साथ हुआ करते थे, जन्मदिन पर ठुमका लगा चुके हैं। इस चर्चित कार्यक्रम पर सभी की नजर थी। बेनी की बेलगाम जबान पर निकलने वाले अल्फाजों को सुनने के लिए भी मीडिया बेताब थी। लेकिन यहां पर एलान हुआ इलाहाबाद के कुंभ मेले में गत दिनों हुए दर्दनाक हादसे से दुखी होकर जहां विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं ने अपने कई कार्यक्रम रद्द कर दिये थे। वहीं इस कार्यक्रम को भी सादगी से मनाया जायेगा। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल बरखिलाफ केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के जन्मदिन समारोह पर डिस्को का रंगारंग कार्यक्रम हुआ और जमकर हुड़दंग भी देखने को मिला। जिसमें नाचने वालियां भी दिल्ली से आयी थी। सूत्रों की अगर मानी जाये तो यह इन्तजाम स्टील अथार्टी ऑफ इण्डिया के कुछ चम्मच किस्म के अधिकारियों द्वारा डांसर बुलाकर डांस कराने का कार्यक्रम आयोजित किया गया था।
 
जानकारी के अनुसार 11 फरवरी को केन्द्र की सरकार के केन्द्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा का 73वां जन्मदिन था। इस अवसर पर जनपद के उनके चहेते लोगों ने एक समारोह श्रीराम वाटिका में आयोजित कर रखा था। पहले तो यहां पर गरीब कन्याओं का विवाह कार्यक्रम सम्पन्न हुआ और केन्द्रीय इस्पात मंत्री ने खुद इन सभी वर-वधुओं को आशीर्वाद भी दिया। लेकिन उस कार्यक्रम के बाद उसी मंच पर शुरू हो गया डिस्को का कार्यक्रम। कई नृत्यकियों ने मंच पर खुलेआम डांस किया और तड़क-भड़क वाले गाने भी गाये। उस समय केन्द्रीय इस्पात मंत्री यह भूल गये थे कि उन्होंने इलाहाबाद में कुंभ के दौरान रेलवे स्टेशन पर जो घटना घटी है, उसी के शोक में सादगीपूर्ण ढंग से जन्मदिन मनाने की घोषणा कर रखी थी। 
 
कुल मिलाकर इस रंगारंग कार्यक्रम में जरूर कुछ उनके आलोचकों ने यह कहकर आलोचना की कि बेनी बाबू का पुराना वाला जलवा अब नजर नहीं आता। इसलिए भीड़ बटोरने के लिए खातिर उन्होंने अपने कार्यक्रम स्थल पर डिस्को डांस का कार्यक्रम कर रखा था। वैसे बेनी प्रसाद वर्मा के जन्मदिन पर इस बार वास्तव में वह भीड़ नहीं दिखायी दी थी जो उनके पिछले कार्यक्रमों में देखने को मिलती थी। इसकी वजह क्या है यह तो खुद ही जानें। वैसे आम लोगों का कहना है कि कांग्रेस का जनाधार पूरे प्रदेश में लगभग खत्म हो चुका है तो अकेले बेनी बाबू का ही कितना जनाधार बचा है। वहीं श्रीराम वाटिका के वीरेन्द्र सिंह ने कहा कि डांस का कार्यक्रम बाबू जी के आने से पहले हुआ। बाद में जाने के बाद हुआ। वह भी इसलिए हुआ कि शादियों की खुशी का मामला था। इसलिए यह आयोजन हुआ। बाबू जी के सामने कोई भी आक्रेस्टा या डांस नहीं हुआ।
 
वहीं समाजवादी पार्टी के जिला महासचिव और स्थानीय जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन तथा उत्तर-प्रदेश को-आपरेटिव बैंक लि. लखनऊ के नवनिर्वाचित ‘‘मेम्बर-बोर्ड ऑफ डायरेक्टर’’ धीरेन्द्र कुमार वर्मा ने कहा कि अपने पुत्र की लगातार हार, समाप्त हो चुकी साख, आगामी लोकसभा चुनाव में सुनिश्चित हार की आशंका से उबर नहीं पा रहे बेनी बाबू। उन्होंने कहा कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव पर परिवारवाद का आरोपी बेनी बाबू की कुत्सित मानसिकता का परिचायक है। उन्हें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आज देश और प्रदेश में उनकी जो भी पहचान है वह इन्हीं मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार की देन है। चौधरी चरण सिंह की बात करने वाले बेनी बाबू को शायद यह एहसास नहीं है कि जब वे कांग्रेस में गये होंगे तो किसान नेता चौधरी चरण सिंह की आत्मा कर क्या गुजरी होगी।
 
उन्होंने कहा कि सपा से अलग होने के बाद निरन्तर बेनी बाबू सपा मुखिया के बारे में गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी करते रहे किन्तु बड़े दिल के मालिक मुलायम सिंह यादव ने आज तक कुछ भी नहीं कहा। फिर भी बेनी बाबू आये दिन अनाप-शनाप बयानबाजी करने से बाज नहीं आते जिस सपा को खत्म हो जाने की बात वे करते थे, उनके ही जिले में वहीं सपा सभी छहों सीटों पर भारी बहुमत से विजयी हुई और बेनी बाबू के सभी उम्मीदवारों की छहों सीटों पर हालत पतली हो गयी तथा उनके पुत्र दरियाबाद में तीसरे स्थान पर पहुंच गये। दूसरी ओर सपा मुखिया की राजनैतिक पाठशाला में राजनीति का ककहरा पढ़ने वाले युवा अरविन्द सिंह गोप के रूप में जनपद की उर्वरा धरती ने नया समाजवादी नेतृत्व भी दिया, जिनको मुलायम सिंह यादव का पूरा आशीर्वाद मिला और जनपद के सभी समाजवादी एकजुट होकर उनके पीछे हो लिये।
 
बाराबंकी से रिजवान मुस्‍तफा की रिपोर्ट. 

बाराबंकी में सपा विधायक के भाई पर हत्या कर फरार होने का आरोप

 

बाराबंकी। कोतवाली नगर अन्तर्गत बाराबंकी सदर विधायक के भाई ने एक 16 वर्षीय युवक को पीट-पीटकर मार डाला और लाश को तालाब में फेंक दिया। ऐसा कहना मृतक के पिता का है। इस संबंध में कोतवाली में एफआईआर के लिए तहरीर दी गयी। लेकिन देर रात तक पुलिस जांच में जुटी रही। आरोपी फरार बताया जा रहा है। पुलिस ने लाश का पंचनामा भर पोस्टमार्टम के लिए भेजा। जहां तीन डाक्टरों के पैनल ने मृत्यु का कारण डूबने से बताया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार कोतवाली नगर क्षेत्र के ग्राम मोहारी का पुरवा मजरे बड़ेल निवासी रामपाल नाई का 16 वर्षीय पुत्र बबलू गांव के ही बहादुर कैटर्स के मालिक के साथ में खाना बनाने और अन्य काम करता था। 28 जनवरी की दोपहर वह गांव के ही धर्म मिस्त्री की लड़की की शादी में काम करने गया था। उसके बाद से वह घर वापस नहीं लौटा। चर्चा यह है कि बारात के समय बबलू का विवाद बाराबंकी सदर के विधायक धर्मराज यादव उर्फ सुरेश के भाई धर्मेन्द्र यादव से हो गया था। उसी के बाद से बबलू वहां से लापता हो गया। जब देर रात तक बबलू घर नहीं पहुंचा तो उसके पिता रामपाल और भाई दीपू और घर के अन्य सदस्य बबलू की तलाश में पहले कैटर्स मालिक से बात की और वहां पता चला कि बबलू घर जा चुका है। लेकिन कई दिनों तक बबलू की तलाश उसके परिजन करते रहे। लेकिन कहीं पर भी बबलू का पता नहीं चला। आखिरकार मजबूर होकर तीन फरवरी को मृतक के भाई दीपू ने कोतवाली नगर में आकर अपने भाई की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवायी। उसके बाद भी वह अपने भाई की तलाश करता रहा। इधर कोतवाली प्रभारी ने सिर्फ गुमशुदगी दर्ज करने के बाद यह पता लगाने का प्रयास नहीं किया कि आखिर बबलू कहां गया।
 
मंगलवार की सुबह ग्राम मोहारी का पुरवा के पास स्थित एक तालाब में ग्रामीणों ने एक लाश देखी। ग्रामीणों ने इसकी सूचना कोतवाली प्रभारी को दी। घटना की सूचना मिलते ही कोतवाली प्रभारी संतोष सिंह मौके पर पहुंच गये और लाश को बाहर निकलवाया तो उसकी शिनाख्त गांव के ही बबलू के रूप में की गयी। लाश को देखने से लग रहा था कि किसी ने बबलू को बेहरमी से पीटा है। क्योंकि उसके शरीर की चमड़ी उधड़ी हुई थी। इतना ही नहीं अन्य कई स्थानों पर चोटों के निशान थे। कोतवाली प्रभारी ने इस घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दी। वहीं दूसरी तरफ बबलू की लाश देखने के बाद से ही उसका पिता रामपाल और भाई दीपू रो-रोकर चिल्लाने लगा कि सपा विधायक के भाई धर्मेन्द्र ने उसके लड़के की हत्या कर दी है। इसके बाद सैकड़ों ग्रामीणों ने कोतवाली प्रभारी को घेर लिया। किसी तरह से लाश का पंचनामा भरकर प्रभारी निरीक्षक ने पोस्टमार्टम के लिए भेजा और बाद में मृतक के पिता की तहरीर पर कार्यवाही शुरू कर दी। इस संबंध में कोतवाली प्रभारी का कहना है कि लाश का पोस्टमार्टम होने के बाद भी यह पता चलेगा कि हत्या की वजह क्या है। इतना ही नहीं जांच के उपरान्त ही कोई अन्य कार्यवाही की जायेगी। वहीं आक्रोशित लोगों ने यह भी कहा कि सपा सरकार को बदनाम करने का सपा विधायक और उनके परिजन कोशिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और नेता मुलायम सिंह यादव जी इनकी हरकतों पर लगाम लगायें।
 
घटना में मेरे भाई का हाथ नहीं : विधायक
 
बाराबंकी। बाराबंकी सदर विधायक धर्मराज यादव उर्फ सुरेश ने कहा कि इस घटना में मेरे भाई का कोई हाथ नहीं है। यह सिर्फ मेरी राजनैतिक छवि को धूमिल करने की साजिश मेरे विरोधियों पार्टियों द्वारा रची जा रही है। उन्होंने आगे बताया कि जिस समय की घटना बतायी जा रही है। उस दिन तो मेरा भाई मोहारी का पुरवा गया ही नहीं था। उन्होंने कहा कि इस साजिश में एक कांग्रेसी नेता की विशेष भूमिका नजर आ रही है। वैसे जांच के बाद सारी हकीकत सामने आ जायेगी कि कौन कितना दोषी है।
 
सत्ता में क्यों बन गये धर्मेन्द्र व सुरेश हिटलर!
 
बाराबंकी। जबसे सपा सरकार ने प्रदेश में सत्ता संभाली है और बाराबंकी सदर सीट पर पहले बसपा में रहे बाद में सपा से टिकट पाकर सुरेश यादव ने विधायकी जीत ली। उसके बाद से लगातार सुरेश यादव और उनके भाई धर्मेन्द्र यादव चर्चा में रहे। कभी ओवर ब्रिज पर मामूली कार आगे निकाले के मामले में मां-बेटों को सरेआम पीटकर पुल से लटकाने का मामला रहा हो या अभी बड़ेल और ओबरी की ग्राम्य समाज की जमीन पर बने सैकड़ों मकान बुल्डोजर से गिराने का हिटलरशाही मामला हो। हर मामले में इन लोगों का नाम चर्चा में रहा। लेकिन सत्ता की धमक होने के कारण कभी भी स्थानीय प्रशासन ने इन पर हाथ डालने का प्रयास नहीं किया। शायद इसी का नतीजा है कि इन लोगों के हौसले बढ़े रहे और आज तो मोहारी का पुरवा में हुई घटना से पूरी समाजवादी पार्टी की छीछालेदर हो गयी।
 
बाराबंकी से रिजवान मुस्‍तफा की रिपोर्ट.

मीडिया मालिकों व नीतीश सरकार के अवैध संबंधों पर काटजू की जांच टीम खामोश

भारतीय प्रेस परिषद की तीन सदस्यीय टीम बिहार में पत्रकारिता के गिरते स्तर पर रपट तैयार करने में या तो गच्चा खा गई है या फिर जानबुझकर वहां से प्रकाशित होने वाले अखबारों की लोभ प्रवृति, लूट खसोट और व्यापक पैमाने पर पत्रकारों के छुपे उत्पीड़न से मुंह चुरा रही है। प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्केण्डय काटजू को भेजी गई अपनी रपट में एकतरफा रुख अख्तियार करते हुये जांच टीम बिहार में पत्रकारिता की ‘डुबती लुटिया’ के लिए सीधे तौर पर नीतीश सरकार पर उंगली उठाते हुये सरकार की विज्ञापन नीति को बिहार में पत्रकारिता की धार को कुंद करने के लिए जिम्मेदार ठहरा रही है। जबकि इसका दूसरा महत्वपूर्ण पहलू खुद अखबार संचालकों के नजरिये और व्यवहार में आया बदलाव है।

जांच टीम ने अपनी रपट में इस हकीकत को उन्होंने पूरी तरह से अनदेखी की है कि अधिक से अधिक सरकारी विज्ञापन हासिल करने की ‘हवस’ में बिहार से निकलने वाले तमाम तथाकथित बड़े अखबारात सरकारी धुन पर ‘मुजरा’ करने की मानसिकता लंबे समय से अख्तियार किये हुये हैं, और इसी मानसिकता के तहत अपने ‘बाजारू व्यवहार’ से अधिक से अधिक सरकारी विज्ञापन भी गड़प रहे हैं।

अखबारों द्वारा सरकारी खजाने की लूट खसोट का आलम यह है कि एक विज्ञापन को कई-कई महीनों तक छापा जा रहा है। यहां तक कि किसी कार्यक्रम विशेष के खत्म हो जाने के बाद भी उस कार्यक्रम विशेष से संबंधित विज्ञापन छप रहे हैं। इनका अंदाज कुछ ऐसा है-‘पत्रकारिता जाये चुल्हे में, मौका है, माल पीटो।’ सनद रहे कि कुछ अरसा पहले बिहार में पत्रारिता पर अघोषित पाबंदी की शिकायत आने पर जस्टिस काटजू ने अपनी तरफ से पहल करते हुये बिहार में प्रेस की स्वतंत्रता की जांच करने के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया था।

जांच कमेटी ने अपनी रपट में बिहार में ‘आपातकाल’ जैसी स्थिति होने की बात स्वीकारी है। इस आधार पर काटजू कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में प्रेस को अघोषित रूप से सरकारी प्रवक्ता की भूमिका में खड़ा कर दिया है। रपट में कहा गया है कि सूबे में पत्रकारों को बहरा और लाचार करके पूरी तरह से दबा दिया गया है। रपट के मुताबकि अखबारात सूबे में अपहरण, अपराध, हत्या, सत्ताधारी नेताओं और उनके गुर्गों द्वारा भूमि कब्जा और भूमि माफियाओं की खबरों की या तो पूरी तरह से अनदेखी कर रहे हैं या फिर उन्हें बेहद कम स्थान दे रहे हैं। बिहार में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को बुरी तरह से कुचल दिया गया है।

इतना ही नहीं विरोध प्रदर्शन और जन समस्या से संबंधित खबरों की भी पूरी तरह से अनदेखी की जा रही है। सरकारी नुमाइंदों से अवांछित प्रश्न पूछने की हिमाकत पत्रकार नहीं कर पा रहे हैं। जांच कमेटी बिहार में पत्रकारिता के वर्तमान परिदृश्य को  पकड़ने में कामयाब रही है, जिसे कोई ‘कमाल’ नहीं कहा जा सकता। बिहार का एक अदना सा पाठक भी इस बात को अच्छी तरह से समझ रहा है कि असली खबरों को अखबारी पन्नो से दूर रखा जा रहा है। यदि खबरें दी भी जा रही हैं तो अंदर के पन्नो पर, वो भी सार संक्षेप में। इस लिहाज से देखा जाये तो इस हकीकत तक पहुंचने के लिए जांच टीम को कुछ खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी होगी। और इस हकीकत को उकेरने के लिए भारी भरकम जांच की भी जरूरत नहीं थी।

जांच टीम द्वारा बिहार में पत्रकारिता की स्थिति पर जो अहम बिंदू सामने आया है वह है पत्रकारों द्वारा सरकारी नुमाइंदों से अवांछित प्रश्न पूछने की हिम्मत न जुटा पाना। सवाल उठता है कि बिहार में पत्रकार प्रश्न पूछने के अपने मौलिक अधिकार से भी वंचित क्यों हैं? और उससे भी अहम सवाल यह है कि प्रश्न पूछने के उनके अधिकार से वंचित करने के लिए बिहार में कौन सा मैकेनिज्म काम कर रहा है? इस पूरे मामले पर से ‘रूमानियत’ अंदाज में घूंघट उठाने के बजाय जांच टीम ने सिर्फ सरकार पर ही हथौड़ा चलाने का काम किया है। मानो उस पर पहले से ही यह दबाव था कि पूरा ठीकरा नीतीश सरकार के सिर पर फोड़ना है।

यह सहज सी बात है कि दुनिया की कोई भी सरकार नहीं चाहती है कि उसकी मुखालफत वाली खबरें छपे। इस तरह की खबरों को रोकने के लिए  वह हर हथकंडे का इस्तेमाल करती रही थी, करती रही है और करती रहेगी। यह खबरनवीसों का काम है कि जनहित की खबरों के साथ वे किसी भी तरह का समझौता न करते हुये तथ्यों पर आधारित ठोस खबरें लोगों तक पहुंचाएं। सरकारी नुमाइंदों से तल्ख प्रश्न करना इसी प्रक्रिया का एक हिस्सा है। सूबे में पत्रकारों को उनकी असली भूमिका से ही महरूम कर दिया गया है। और इसके लिए सिर्फ सरकार को ही जिम्मेदार ठहराना जांच टीम की नीयत पर शक पैदा करता है। अखबारात के मालिकान और संचालक भी बहुत हद तक इसके लिए जिम्मेदार हैं। ताली एक हाथ से नहीं बजती और यहां तो पूरा मुजरा चल रहा है।

यदि बेबाक शब्दों में कहा जाये तो अखाबारात के मालिकानों और नीतीश सरकार के बीच ऊंचे स्तर पर ‘अवैध संबंध’ स्थापित हो चुका है। और यह रिश्ता पूरी तरह से कारोबारी है। जब कोई ‘ओरिजनल खबरनवीस’(सूबे ड्पलीकेट खबरनवीस इतनी अधिक संख्या में विचरण कर रहे हैं कि खबनवीसी का परिभाषा ही बदल गया है) थोड़ा सा भी फुदकने की कोशिश करता है तो उनका पंख मड़ोड़ दिया जाता है। सरकारी ओहदों पर बैठे लोग सीधे अखबारों के मालिकानों को फोन लगा कर खबरनवीस के हाथ में मोबाइल थमा देते हैं और दाल-रोटी छिनने के डर से वहे तुरंत अपनी औकात में आकर प्रश्न पूछना भूल जाता है। जांच टीम ने बिहार में पत्रकारिता के इस मैकेनिज्म पर रोशनी डालने से परहेज किया है।

इस मैकेनिज्म को बिना छुये ही जांच टीम समस्या के समाधान के तौर पर बिहार में विज्ञापन नीति को निर्धारित करने के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी का गठन करने की मांग है, जो एक निश्चत गाइडलाइन के आधार पर सरकारी विज्ञापनों का वितरण करेगी। अब कागज पर यह गाइडलाइन क्या होगा अभी कह पाना मुश्किल है। लेकिन व्यवहारिकता यही कहती है कि इसमें भी बड़े अखबारात ‘लायन शेयर’ हड़पने में कामयाब रहेंगे। और ‘लायन शेयर’ गड़पने के बावजूद ये जनहित की खबरों के प्रति ईमानदारी बरतेंगे इसमें शक ही है, क्योंकि एक अरसा गुजर जाने के बाद सरकार के साथ इनकी यारी कुछ गहरी हो चली है।

जांच टीम का कहना है कि निजी व्यवसायिक विज्ञापनों के अभाव में बिहार की पूरी मीडिया इंडस्ट्री मुख्यरुप से सरकारी विज्ञापनों पर ही निर्भर है। ऐसी स्थिति में सरकार स्वाभाविक तौर पर एक पक्षीय हो जाती है। इसी का फायदा उठाकर बिहार सरकार मीडिया का बांह मरोड़ रही है। जांच टीम इस पूरे मामले को एक तरफा अत्याचार के रूप में चित्रित कर रही है, जबकि यहां मामला दो तरफा मोहब्बत की है। असल मसला है वहां पत्रकारों को अखबारात के अंदर पत्रकार बनाये रखने का।

बिहार में कई उम्दा पत्रकार सड़कों की धूल फांक रहे हैं, क्योंकि वे अखबारात के वर्तमान ‘माल बटोरो’ पालिसी के लिए मुफीद नहीं है। वे खबरों की बात करते हैं, जबकि अखबारात को अधिक से अधिक विज्ञापन लाने वाले प्रबंध संपादकों की जरूरत है। ये तथाकथित प्रबंध संपादक विज्ञापन बटोरने के चक्कर में न सिर्फ खबरों को ‘किल’ करते हैं बल्कि खबर पकड़ने वाले ओरिजन खबरचियों को हर तरह से हतोत्साहित भी करते हैं। ये भूल जाते हैं कि अखबारात की विश्वसनीयता का एक मात्र आधार जनहित वाली खबरें ही होती हैं। यह सौ फीसदी सच है कि कोई भी पाठक विज्ञापन देखने के लिए अखबार नहीं खरीदता है।

बेहतर होगा कि बिहार में अच्छे पत्रकारों को प्रोत्साहित करने की नीति को न सिर्फ सांचे में ढाला जाये बल्कि उस पर फौरी तौर पर अमल करने की भी पुख्ता व्यवस्था भी की जाये। बेहतर पत्रकारों को ‘सुरक्षित जोन’ में होने का असहसास करना भी जरूरी है। इसके लिए काम के बुनियादी माहौल को दुरुस्त करने की जरूरत है, जिसमें आर्थिक सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य और बीमा भी शामिल है। विगत में बिहार बेहतर पत्रकारिता का गढ़ रहा है। यहां से निकले कई उम्दा पत्रकार आज भी राष्ट्रीय पत्रकारिता में अपनी चमक बिखेर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से बिहार में पत्रकारों की नई पौध बेहतर खाद पानी के अभाव में ‘जेहनी प्रदूषण’ और ‘बौद्धिक कुपोषण’ का शिकार हो रही है।

यह दुर्भाग्य की बात है कि जांच टीम इस हकीकत को चिन्हित करने में पूरी तरह से नाकाम रही है। अब चिंता का विषय सिर्फ बिहार की खस्ताहाल पत्रकारिता ही नहीं है, बल्कि विगत में सूबे में उम्दा पत्रकारों को  निर्मित करने वाली वह सहज प्रक्रिया भी है जो बुरी तरह से चरमरा कर चूं चूं कर रही है। अब इस मैकेनिज्म से सिर्फ ‘चूं चूं’ पत्रकार ही निकलेंगे। और ऐसे ‘चूं चूं पत्रकारों’ को अपनी धुन पर नचाते रहना मीडिया मालिकों के साथ-साथ सरकार के लिए भी सहज होगा।

लेखक आलोक नंदन वरिष्ठ पत्रकार हैं. दिल्ली, मुंबई समेत कई शहरों में कई मीडिया माध्यमों में काम करने के बाद इन दिनों पटना में हैं और तेवरआनलाइन डाट काम के जरिए अपने तेवर को बरकरार रखे हुए हैं. उनका यह लिखा उनकी वेबसाइट से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

बिहार में इमरजेंसी जैसी प्रेस सेंसरशिप… स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता कर पाना संभव नहीं – प्रेस परिषद

नई दिल्ली। प्रेस परिषद की एक जांच टीम ने बिहार की नीतीश सरकार पर करारा हमला बोला है। उसने आरोप लगाया है कि राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता करना संभव नहीं है। उसे इमरजेंसी जैसी सेंसरशिप का सामना करना पड़ रहा है। उसका भविष्य खतरे में है। विज्ञापन का भय दिखाकर प्रेस को सरकार का अघोषित मुखपत्र बनाने की कोशिश हो रही है। इस स्थिति से उबरने के लिए जांच दल ने दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए विज्ञापन जारी करने के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी के गठन की वकालत की है।

प्रेस स्वतंत्रता के हनन की शिकायतों की जांच के लिए परिषद की एक टीम पिछले दिनों बिहार गई थी। उसने वहां से लौट कर अपनी रिपोर्ट प्रेस परिषद को सौंप दी है। रिपोर्ट में कहा गया है, इमरजेंसी के दिनों में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर जैसी सेंसरशिप लगी हुई थी, वह स्थिति वर्तमान में नीतीश सरकार के कार्यकाल में देखने को मिल रही है। मौजूदा हालात में ज्यादातर पत्रकार घुटन महसूस कर रहे हैं। स्वतंत्रतापूर्वक काम करने में वह खुद को असहाय पा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार सरकारी खौफ के चलते आंदोलन, प्रदर्शन, प्रशासन की कमियों को उजागर करने वाली और जनसमस्याओं से जुड़ी खबरों को अखबारों में स्थान नहीं मिल पा रहा है। सरकार के दबाव के कारण भ्रष्टाचार उजागर करने वाली खबरों को जगह नहीं पा रही है। कवरेज में विपक्ष की अनदेखी कर सत्तापक्ष की मनमाफिक खबरों को तरजीह दी जा रही है।

जांच दल ने कहा है कि बिहार का समूचा मीडिया उद्योग सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर रहता है। औद्योगिक रूप से पिछड़ा राज्य होने के कारण यहां पर अखबारों को निजी क्षेत्र का विज्ञापन नहीं मिलता है। सरकार, मीडिया की इसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए उसे अपने इशारे पर चलने के लिए मजबूर करती है। तीन सदस्यीय जांच टीम ने कहा है कि मीडिया के ऊपर इस तरह के अप्रत्यक्ष नियंत्रण से लोगों के सूचना हासिल करने का अधिकार बाधित हो रहा है। इससे अनुच्छेद 19 [1] के तहत प्रदत्त संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। परिषद के अनुसार विज्ञापनों पर सरकार का एकाधिकार होने के कारण ही मीडिया को सरकारी मुखपत्र बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

नेशनल दुनिया से धनंजय, रास बिहारी समेत आधा दर्जन का संबंध समाप्‍त

: आलोक मेहता के नजदीकी प्रबंधन के निशाने पर : नेशनल दुनिया में मेहतावादियों के लिए अब कोई जगह नहीं है. उनके खास लोगों का प्रबंधन लगातार फाइनल सेटेलमेंट करता जा रहा है. इसके साथ यह भी साबित हो गया कि इस अखबार से आलोक मेहता का दौर खतम हो चुका है. अखबार से आलोक मेहता के नजदीकी माने जाने वाले छह लोगों का बोरिया बिस्‍तर बांध दिया गया है. ठीक उसी तरह जैसे पिछले साल फरवरी में नईदुनिया से आलोक मेहता ने छंटनी की थी.  

प्रबंधन ने स्‍वास्‍थ्‍य संपादक धनंजय, मेट्रो एडिटर रहे रास बिहारी, अशोक किंकर, मनमोहन लोहानी, कोलाकाता से दीपक रस्‍तोगी तथा पटना से राघवेंद्र को हटा दिया है. इन लोगों का हिसाब-किताब फाइनल कर दिया गया है. ये लोग आलोक मेहता के नजदीकी माने जाते थे तथा नईदुनिया और नेशनल दुनिया दोनों की लांचिंग टीम में उनके साथ थे. इसके अलावा खबर आ रही है कि लखनऊ से योगेश मिश्रा ने खुद नेशनल दुनिया में काम करने से मना कर दिया है. उन्‍होंने आगे अखबार के साथ कांटीन्‍यू कर पाने में असमर्थता जता दी है. माना जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में मेहता के कुछ और नजदीकियों पर गाज गिरेगी. 
 
इसमें सबसे आश्‍चर्य की बात यह है कि एडिटोरियल डाइरेक्‍टर आलोक मेहता सारा दायित्‍व छीने जाने तथा अपने लोगों को हटाए जाने के बाद भी नेशनल दुनिया के साथ जमे हुए हैं. अपने लोगों के हटाए जाने का विरोध भी नहीं कर रहे हैं. अमूमन इस तरह की स्थितियों में पड़ने वाले बड़े पत्रकार इसे अपनी बेइज्‍जती तथा जाने का संकेत मानते हुए इस्‍तीफा दे देते हैं, परन्‍तु मेहता जी एवं विनोद अग्निहोत्री को पत्रकारिता की लक्ष्‍मण रेखा की याद अब तक नहीं आई है.

जागरण में फिर छंटनी शुरू, नोएडा में दो लोगों से मांगे गए इस्‍तीफे

दैनिक जागरण में एक बार फिर छंटनी की तलवार चलनी शुरू हो गई है. इधर, कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई हो रही है तो दूसरी तरफ जागरण में एक बार फिर कत्‍लेआम करने की तैयारी चल रही है. पिछले दिनों बरेली में दो लोगों को निकाले जाने का फरमान सुनाया गया था तो अबकी दो लोग नोएडा में शिकार बनने वाले हैं. बताया जा रहा है कि टीपी कम्‍युनिकेशन में दो दशक से कार्यरत गिरीश मिश्रा एवं विजय कोहली को प्रबंधन ने इस्‍तीफा देने का फरमान सुनाया है. 

हालांकि अभी किसी ने इस्‍तीफा नहीं दिया है. गिरीश मिश्र ने इस्‍तीफा देने से मना कर दिया है तो विजय कोहली मेडिकल पर चल रहे हैं. बीस सालों से ज्‍यादा की सेवा देने के बाद निकाले जाने के फरमान से दोनों लोग हतप्रभ हैं. विरोध के बाद इस मामले को प्रबंधन ने कुछ दिन के लिए टाल दिया है, पर सूत्रों का कहना है कि इन लोगों का हिसाब फाइनल कर दिया गया है. प्रबंधन इनसे किसी भी कीमत पर इस्‍तीफा लेगा. 
 
इन लोगों को बताया गया है कि अब इनका विभाग बंद किया जा रहा है, इसलिए इनकी जरूरत अब संस्‍थान को नहीं है. खबर है कि यह सब कुछ मजीठिया वेज बोर्ड के लागू होने के अंदेशे को देखते हुए किया जा रहा है. गौरतलब है कि इसके पहले भी दैनिक जागरण पिछले साल अपने पूरे संस्‍थान में सैकड़ों लोगों की छंटनी कर चुका है, जबरिया नौकरी से निकाल चुका है. कई लोग इसके खिलाफ लेबर कोर्ट एवं अन्‍य सक्षम अदालतों में मुकदमा दायर कर रखा है. 

मजीठिया वेज बोर्ड : टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने अपना पक्ष रखा, बहस आज भी जारी

सुप्रीम कोर्ट में पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए न्यायमूर्ति मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ दायर याचिका पर बहस बुधवार को भी जारी रहेगी. मंगलवार को टाइम्‍स ऑफ इंडिया के प्रबंधन ने कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा. टीओआई की तरफ से वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता पीपी राव ने बहस की तथा प्रबंधन का पक्ष कोर्ट के सामने रखा. आज और कल यानी गुरुवार तक कोर्ट में प्रबंधन अपना पक्ष रखेगा. माना जा रहा है कि यह सुनवाई अगले सप्‍ताह तक चल सकती है.

 गौरतलब है कि मजीठिया वेज बोर्ड पर स्‍टे के लिए आनंद बाजार पत्रिका, बेनेट कोलमैन, इंडियन न्‍यूज पेपर सोसाइटी, यूनाइटेड न्‍यूज ऑफ इंडिया, प्रिंटर्स मैसूर प्राइवेट लिमिटेड, राजस्‍थान पत्रिका, ट्रिब्‍यून ट्रस्‍ट, पीटीआई, जागरण प्रकाशन लिमिटेड, एक्‍सप्रेस प्रकाशन (मदुरई) तथा इंडियन एक्‍सप्रेस ने याचिका दायर कर रखी है. पिछले सप्‍ताह से जारी बहस में आनंद बाजार पत्रिका समेत कई मीडिया संस्‍थानों की बहस पूरी हो चुकी है. इस संस्‍थानों की तरफ से वरिष्‍ठ अधिवक्‍ताओं ने अपना अपना पक्ष रखा. 
 
मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में माननीय जज आफताब आलम और रंजना प्रकाश देसाई की डबल बेंच के समक्ष चल रहा है. अखबारों के प्रबंधन की तरफ से बहस खतम होने के बाद सरकार की तरफ से अपना पक्ष रखा जाएगा. समझा जा रहा है कि फाइनल बहस खतम होने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अपना फैसला सुनाएगा. मजीठिया वेज बोर्ड पर स्‍टे के लिए याचिका दायर करने वाले सभी संस्‍थानों की कोशिश है कि इस मामले को लंबा खिंचा जा सके. इसके लिए इन संस्‍थानों ने कई वरिष्‍ठ वकीलों को अपने पक्ष से खड़ा कर रखा है. 
 
उल्‍लेखनीय है कि बीते साल 21 सितंबर को सुनवाई करते हुए कोर्ट ने आठ जनवरी की तिथि तय की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए इसे 5 फरवरी तय किया गया था. कोर्ट ने प्रबंधन को कर्मचारियों को अंतरिम व्यवस्था के रूप में अतिरिक्त भुगतान करने पर विचार का सुझाव भी दिया था. परन्‍तु प्रबंधकों ने ऐसा नहीं किया. सरकार ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के बारे में 11 नवंबर, 2011 को अधिसूचना जारी की थी. 

जी न्‍यूज की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नवीन जिंदल और केंद्र से मांगा जवाब

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने जी टेलीविजन के खिलाफ दर्ज तीन प्राथमिकी निरस्त करने के लिये दायर याचिका पर आज केन्द्र सरकार और कांग्रेस सांसद नवीन जिन्दल से जवाब तलब किया है। जी समूह और उसके संपादकों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने ये प्राथमिकी दर्ज की हैं। इनमें जिंदल को आवंटित कोयला ब्लाक से संबंधित खबरें प्रसारित नहीं करने की एवज में कथित रूप से धन की मांग करने के आरोप में दर्ज प्राथमिकी भी शामिल है।

प्रधान न्यायाधीश अलतमस कबीर, न्यायमूर्ति अनिल आर दवे और न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन की खंडपीठ ने दिल्ली पुलिस को भी नोटिस जारी करके इन आरोपों पर जवाब मांगा है कि कथित रूप से जिंदल के इशारे पर उसने जी न्यूज के संपादकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करके आपराधिक कार्यवाही शुरू की है। न्यायालय ने जिंदल स्टील और पॉवर लि को भी नोटिस जारी किया है। नवीन जिंदल इसके अध्यक्ष हैं। जी की याचिका पर इन सभी को दो सप्ताह के भीतर नोटिस के जवाब देने हैं। न्यायालय इस याचिका पर अब चार सप्ताह बाद सुनवाई करेगा। जी समूह ने उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाने का भी अनुरोध किया है।
 
न्यायलय ने जी समूह की एक अन्य याचिका पर भी इन सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किये हैं। इस याचिका में जी न्यूज के कार्यक्रम में 16 दिसंबर के सामूहिक बलात्कार की घटना के चश्मदीद गवाह और हादसे की शिकार लड़की के मित्र की पहचान जाहिर करने के मामले में केन्द्र द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी करने पर सवाल उठाया गया है। केन्द्र सरकार ने कारण बताओ नोटिस जारी करके पूछा था कि उसका लाइसेंस क्यों न रद्द कर दिया जाये। जी समूह और इसके संपादक सुधीर चौधरी तथा समीर अहलूवालिया की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और मनिन्दर सिंह ने आरोप लगाया कि दो अक्तूबर, 2012 और चार तथा 15 जनवरी को रद्द की गयी प्राथमिकी जिंदल और दिल्ली पुलिस के बीच हुयी ‘साजिश’ का नतीजा है। साल्वे और सिंह ने यह मामला दिल्ली पुलिस से लेकर किसी अन्य जांच एजेन्सी को स्थानांतरित करने का भी अनुरोध किया।
 
पहली प्राथमिकी जी समूह के सपांदकों द्वारा जिंदल की कंपनी से कथित रूप से उगाही के प्रयास से संबंधित स्टिंग आपरेशन के बारे में है। इस मामले में चौधरी और अहलूवालिया को 27 नवंबर से 17 दिसंबर तक जेल में रहना पड़ा था। दूसरी प्राथमिकी जी के एक कार्यक्रम प्रसारण में सामूहिक बलात्कार की शिकार लड़की के मित्र और चश्मदीद गवाह की पहचान सार्वजनिक करने के मामले में दर्ज की गयी है। तीसरी प्राथमिकी जिंदल स्टील एंड पॉवर लि की शिकायत पर दर्ज की गयी है। इसमें आरोप लगाया गया है कि कोयला ब्लाक आवंटन पर कार्यक्रम के प्रसारण में सीएजी की रिपोर्ट के अनुलग्नकों के रूप में मनगढंत दस्तावेज दिखाये गये हैं। साल्वे ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने कथित रूप से जिंदल के इशारे पर ‘झुकाव वाली जांच’ की जिन्होंने सरकार में सत्तारूढ़ दल से अपने राजनीतिक संबंधों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, ‘‘चार महीने से किसी न किसी बहाने से याचिकाकर्ता के खिलाफ तीन प्राथमिकी दर्ज की गयी हैं। इसके अलावा जी न्यूज लि़.को जिंदल के नियंत्रण और प्रबंधन वाली जेएसपीएल कंपनी की शिकायतों के आधार पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से नोटिस भी मिले हैं।’’ 
 
साल्वे ने कहा कि जेएसपीएल ने भारतीय प्रेस परिषद में भी एक शिकायत दायर की थी जिसमें पूर्व प्रधान न्यायाधीश जे एस वर्मा की अध्यक्षता वाली न्यूज ब्राडकास्टिंग स्टैण्डर्ड अथॉरिटी का जिक्र था। उन्होंने कहा कि इस संस्था के अध्यक्ष ने इस तथ्य का संज्ञान लिया था कि जिंदल ने इस मामले की सुनवाई से पहले टेलीफोन पर उनसे संपर्क करने का प्रयास किया था। न्यायमूर्ति वर्मा ने उनकी ओर से बिना शर्त लिखित माफी स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि पहली प्राथमिकी तो कपटपूर्ण तरीके से दर्ज की गयी थी। इसमें पुलिस की दुर्भावना का इसी तथ्य से पता चलता है कि उसने एक ऐसे अपराध की कूट रचना की जो भारतीय दंड संहिता में ही नहीं है।
 
याचिका में कहा गया है कि इस प्राथमिकी और जनता के दायरे में उपलब्ध दस्तावेज एक साथ पढ़ने से पता चलता है कि यह याचिकाकर्ता के न्यूज चैनल को धमकाने का एक और प्रयास है। याचिका के अनुसार गंभीर किस्म के आरोप लगाये गये हैं जिनके आधार पर दिल्ली पुलिस यह कार्यक्रम तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल लोगों को हिरासत में लेने की मांग करते हुये एक बार फिर इनका उपयोग करेगी। (एजेंसी)

”मीडिया में विज्ञापन देने के अपने अधिकारों का दुरुपयोग करती है सरकार”

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह का कहना है कि यह एक सर्व-विदित तथ्य है कि सरकार मीडिया को प्रभावित करने के लिए विज्ञापन देने के अपने अधिकारों का दुरुपयोग करती है। अखबारों की भूमिका विषय पर आयोजित एक परिचर्चा में सिंह ने कहा कि प्रेस परिषद के एक अध्यक्ष ने एक दफा कहा था कि मीडिया को प्रभावित करने के लिए सरकार विज्ञापन देने के अपने अधिकार का दुरुपयोग करती है। यह एक सर्व-विदित तथ्य है, हमें इसे स्वीकार करने के लिए किसी खुफिया तंत्र की जरूरत नहीं है।

भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे सिंह ने कहा कि विपक्षी दल प्रेस की आजादी की बातें करते हैं लेकिन जब उन्हें सत्ता में आने का मौका मिलता है तो वे इसे भुला देते हैं। सीबीआई के पूर्व निदेशक ने कहा कि देश भर में करीब 13 लाख अखबार प्रकाशित होते हैं और इनमें से केवल कुछ ही अच्छे हैं, बाकी तो सिर्फ सरकारी विग्यापन पाने के लिए चलाए जा रहे हैं।
 
सिंह ने कहा, समस्या उस वक्त पेश आती है जब कोलकाता से प्रकाशित होने वाले किसी अखबार के संपादक के खिलाफ कश्मीर में मामला दर्ज होता है। इसका मतलब है कि संपादक को मुकदमे के सिलसिले में इतनी दूर जाना पड़ेगा । किसी सरकार ने यह नहीं सोचा कि इसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए। वहीं, पूर्व न्यायाधीश ओ पी वर्मा ने कहा कि किसी अखबार का प्रसार तभी बढ़ता है जब वह सभी खबरें देता है और अपनी विश्वसनीयता बनाए रखता है। (पीएस)

एक पत्रकार को इलाज के लिए आर्थिक मदद की दरकार

: पत्रकारों ने दो घंटे में इकट्ठा किए पचास हजार : गुवाहाटी। नवोदित पत्रकार तथा बंगला दैनिक सकालबेला के संवाददाता सफर अहमद गंभीर रूप से बीमार हैं। उन्हें आर्थिक मदद की जरूरत है। पैसे की कमी इस ईमानदार और मिलनसार पत्रकार के इलाज में बाधा बन रही है। असम साहित्य सभा की रिपोर्टिंग करने बरपेटा गए सफर वहां पीलिया रोग से ग्रसित हो गए। वे फिलहाल दिसपुर पोलिक्लीनीक अस्पताल में वेंटिलेटर पर जीवन जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 

सफर की बीमारी की खबर मिलते ही आज यहां के पत्रकारों ने अपने बीच में धन संग्रह का अभियान चलाया तो कई संगठन भी आगे बढ़ कर आ गए। जिसमें हिंदी दैनिक प्रात: खबर के मालिक की संस्था सत्यम फाउंडेंशन भी शामिल रहा। सत्यम फाउंडेशन की ओर से 21 हजार रुपए की नगद मदद दी गई। गुवाहाटी प्रेस क्लब की ओर से भी सफर की मदद के लिए पत्रकारों और सामाजिक संगठनों से अपील की गई है। इच्छुक व्यक्ति मदद की राशि गुवाहाटी प्रेस क्लब में जमा करा सकते हैं। 
 
अन्यथा उनके परिजनों को सीधे मदद दे सकते हैं या फिर सफर के भाई के यूनियन बैंक खाता संख्या -467502011020166 में राशि जमा करवा सकते हैं। मदद के लिए मोबाइल नम्बर- 8011745999, 03612630963 पर संपर्क किया जा सकता है। इधर सफर की अवस्था को देखते हुए पत्रकारों ने ग्रुप मेडिक्लेम बीमा कराने का फैसला किया है। जिसमें कोई भी पत्रकार शामिल हो सकता है।  
 
गुवाहाटी से नीरज झा की रिपोर्ट.

आजतक से गिरिजेश मिश्र का इस्‍तीफा, इंडिया न्‍यूज में ईपी बने

आजतक से खबर है कि सीनियर प्रोड्यूसर गिरिजेश मिश्र ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपनी नई पारी इंडिया न्‍यूज के साथ शुरू करने जा रहे हैं. गिरिजेश को इंडिया न्‍यूज में एक्‍जीक्‍यूटिव प्रोड्यूसर बनाया गया है. वे चैनल में स्‍पेशल प्रोग्राम की जिम्‍मेदारी देखेंगे. मूल रूप से गोरखपुर के रहने वाले गिरिजेश ने करियर की शुरुआत वहीं पर दैनिक जागरण से की थी. इसके बाद वे गोरखपुर में ही राष्‍ट्रीय सहारा से भी जुड़े रहे. उसके बाद वे कोलकाता के पहले हिंदी बुलेटिन खास खबर आज की लांचिंग कराई. इसके बाद दैनिक जागरण, अंबाला पहुंचे गए. फिर जी न्‍यूज होते हुए आजतक पहुंचे थे. 

8 फरवरी को बुक स्‍पीड पोस्‍ट 11 फरवरी को क्‍यों मिला?

नई दिल्ली: संसद पर हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को फांसी दिए जाने की जानकारी उसके परिवार वालों को स्पीडपोस्ट के जरिये दिए जाने पर विवाद चल रहा है। इस बीच एनडीटीवी इंडिया ने स्पीडपोस्ट की वेबसाइट पर जाकर पड़ताल की तो पता चला कि यह स्पीडपोस्ट 7 और 8 फरवरी की मध्यरात्रि 12 बजकर 7 मिनट पर जीपीओ, नई दिल्ली में बुक कराया गया था। 8 फरवरी की सुबह 3 बजकर 19 मिनट पर इसे श्रीनगर के थैले में डाल दिया गया और 5 बजकर 51 मिनट पर इसे पालम के लिए भेज दिया गया।

यह बैग 7 बजकर 39 मिनट पर पालम पहुंचा, जहां से 10 बजकर 29 मिनट पर इसे श्रीनगर के लिए डिस्पैच कर दिया गया। भारतीय डाक की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह बैग 10 फरवरी को दोपहर 1 बजकर 3 मिनट पर श्रीनगर में रिसीव किया गया और फिर इसे 4 बज कर 52 मिनट पर सोपोर के लिए रवाना किया गया। अंतत: यह स्पीडपोस्ट 11 फरवरी की सुबह 11 बजकर 2 मिनट पर अफजल के परिवार को मिला।

इस ब्योरे में ध्यान देने वाली बात यह है कि जब 8 फरवरी की सुबह साढ़े दस बजे ही इस स्पीडपोस्ट को श्रीनगर के लिए डिस्पैच कर दिया गया था, तो फिर यह उसी दिन श्रीनगर क्यों नहीं पहुंचा…? इतना ही नहीं, 9 फरवरी को यह स्पीडपोस्ट कहां-किस हाल में था, इसका कोई ब्योरा नहीं है। मतलब 8 तारीख की सुबह से 10 तारीख की दोपहर तक स्पीडपोस्ट कहीं दबा पड़ा था। 10 तारीख को रविवार होने के बावजूद जब इस स्पीडपोस्ट को उसके गंतव्य की तरफ आगे बढ़ाया गया था, तो यह काम 8 और 9 तारीख को भी किया जा सकता था।

9 तारीख को अफजल गुरु को फांसी दे देने के बाद से श्रीनगर में कर्फ्यू लगा दिया गया था, और अगर इस वजह से 9 तारीख को चिठ्ठी आगे नहीं बढ़ी तो फिर कर्फ्यू तो 10 तारीख को भी जारी रहा था। दिल्ली से चिट्ठी चलने और श्रीनगर में रिसीव होने में 48 घंटे से ज़्यादा का अंतर है। इतना ही नहीं, जेल प्रशासन के जिस लेटरहेड पर इस चिट्ठी को लिखा गया है, उस पर 6 फरवरी की तारीख लिखी गई है। अफजल को फांसी दिए जाने या न दिए जाने के विवाद से दूर स्पीडपोस्ट के इस मामले का संबंध परिवार वालों को समय पर सूचना नहीं मिलने से है। साथ ही इस तरफ ध्यान दिलाए जाने से भी कि आखिर 48 घंटे तक स्पीडपोस्ट कहां दबा रहा…?

लेखक उमाशंकर सिंह की यह रिपोर्ट एनडीटीवी न्यूज चैनल पर प्रसारित हो चुकी है. इस रिपोर्ट का प्रकाशन एनडीटीवी की वेबसाइट पर भी किया गया है. वहीं से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

सहारा समूह ने कैसे खरीदा लंदन का ग्रोवनर हाउस?

रियल एस्टेट, हॉस्पिटैलिटी और रिटेल कारोबार में दखल रखने वाले लखनऊ के सहारा इंडिया परिवार ने विदेश में कई बैंक खाते खोले और मॉरीशस व ब्रिटेन में कंपनियां शुरू कीं। और यह सब हुआ भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा समूह की दो कंपनियां- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्प (एसआईआरईसीएल) और सहारा हाउसिंग इन्वेस्ट कॉर्प (एसएचआईसीएल) के खिलाफ जांच कार्रवाई प्रक्रिया शुरू करने के बाद। इन बैंक खातों का ब्योरा और इन्हें चलाने वाली कंपनियों के अलावा इनके बीच होने वाले रकम हस्तांतरण का पूरा विवरण एक विदेशी वित्तीय खुफिया इकाई (एफआईयू) ने अपनी भारतीय समकक्ष के साथ साझा की रिपोर्ट में दिया है। 

संदेहास्पद वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने, उसके विश्लेषण और फिर उस जानकारी को प्रवर्तन एजेंसियों व विदेशी एफआईयू के साथ साझा करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय एजेंसी एफआईयू इंडिया की है। इस रिपोर्ट, जिसे बिजनेस स्टैंडर्ड ने भी देखा है, में खुफिया एजेंसियों ने दो कंपनियों द्वारा विदेश में कुछ बैंक खाते चलाने का जिक्र किया है। ये कंपनियां हैं 10 अक्टूबर 2010 को मॉरीशस में पंजीकृत ऐंबी वैली (मॉरीशस) और ब्रिटेन में 22 नवंबर 2010 को पंजीकृत कराई गई ऐंबी हॉस्पिटैलिटी सर्विसेज (यूके)। एफआईयू की रिपोर्ट के अनुसार, इन कंपनियों ने क्रमश: 4 फरवरी 2012 और 11 फरवरी 2011 को यूबीएस एजी के साथ खाते खोले। दिसंबर 2010 में सहारा द्वारा खरीदे गए लंदन के ग्रोवनर होटल सौदे की खातिर 47 करोड़ पाउंड की रकम के हस्तांतरण में इन खातों ने भी भूमिका निभाई थी। 
 
ऐंबी वैली मॉरीशस के यूबीएस खाते (संख्या- 539469)के बारे में सहारा समूह के प्रवक्ता अभिजित सरकार ने ईमेल के जरिये भेजी अपनी प्रतिक्रिया में कहा, 'यह खाता दिसंबर 2010 में ग्रोवनर हाउस होटल के अधिग्रहण के बाद मार्च 2011 में खोला गया था।' उनके अनुसार यह खाता ग्रोवनर हाउस होटल के अधिग्रहण के दौरान हुए परिचालन खर्च के भुगतान और उसकी सहायक कंपनियों में निवेश के लिए खोला गया था। 
 
होल्डिंग ढांचे को समझाते हुए सरकार कहते हैं, 'यहां इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि ग्रोवनर हाउस होटल के अधिग्रहण के समय ऐंबी वैली (एवीएल) में सुब्रत रॉय सहारा की 75.79 फीसदी हिस्सेदारी थी न कि 100 फीसदी, जैसी कि अफवाहें फैलायी जा रही हैं। ऐंबी वैली मॉरीशस में एवीएल की 99.99 फीसदी हिस्सेदारी है, तो इसलिए एवीएल में हिस्सेदारी के अनुसार सुब्रत रॉय सहारा की भी इसमें बहुलांश हिस्सेदारी हुई। लेकिन उनके पास एवी(एम)एल की 100 फीसदी हिस्सेदारी नहीं है।'
 
सरकार ने बताया कि अभी मॉरीशस स्थित इस कंपनी में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष होल्डिंग के जरिये सुब्रत रॉय की हिस्सेदारी घटकर 43.55 फीसदी रह गई है। पुराने दस्तावेज पर नजर डालें तो पता चलता है कि जनवरी 2010 में किसी रोशनलाल द्वारा की गई शिकायत के बाद सेबी ने आंशिक संपूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर्स (ओएफसीडी) जारी करने के मामले का ब्योरा मंगाना शुरू कर दिया था। इसके बाद  नियामक सेबी ने कई बार कंपनियों से ओएफसीडी निर्गम का ब्योरा प्राप्त करने की कोशिश की लेकिन असफल रहा।
 
इस दौरान ओएफसीडी के जरिये कई करोड़ रुपये जुटाए गए और उन्हें किसी अन्य जगह निवेश किया गया। जनवरी 2012 में बिज़नेस स्टैंडर्ड ने छापा था कि किस तरह सेबी के जांच दायरे में आई इन दोनों कंपनियों ने 2009-10 में ऐंबी वैली में 6,687 करोड़ रुपये का निवेश किया था। वित्त वर्ष 2009-10 के लिए उपलब्ध कराई गई वित्तीय जानकारी के अनुसार एसआईआरईसीएल ने 30 जून 2010 को ऐंबी वैली के 23.4 करोड़ इक्विटी शेयर खरीदने के लिए 5,328 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इसी तरह एसएचआईसीएल ने भी ऐंबी वैली के 1.9 करोड़ शेयर खरीदने के लिए 553 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इस इक्विटी निवेश के अलावा एसएचआईसीएल के पास  ऐंबी वैली के 806 करोड़ रुपये मूल्य के 800 परिवर्तनीय डिबेंचर्स भी हैं। 
 
कई बार कोशिश करने के बाद भी जानकारी प्राप्त करने में असफल रहने पर सेबी ने 16 अगस्त 2010 को जारी अपने आदेश में जांच शुरू करने की बात कही। सेबी ने आदेश में कहा, 'सेबी का पास यह मानने के लिए पर्याप्त वजह है कि एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल द्वारा जारी ओएफसीडी निवेशकों या प्रतिभूति बाजार के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं और मुमकिन है कि प्रतिभूति बाजार से जुड़े किसी मध्यस्थ या व्यक्तियों ने सेबी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किया हो।'
 
इसके बाद सेबी अधिनियम की धारा 11सी के तहत 30 अगस्त और 23 सितंबर 2010 को समन जारी किए गए थे। सहारा ने 13 सितंबर और 30 सितंबर को प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इस बारे में कंपनी मामलों के मंत्रालय से विस्तृत जानकारी मांग सकता है, जो उसके अनुसार कंपनी का नियामक है। समूह ने क्षेत्राधिकार का हवाला देते हुए सेबी से समन वापस लेने के लिए कहा।  हालांकि लंदन स्थित ग्रोवनर हाउस होटल आधिकारिक तौर पर मार्च 2010 से ही बिक्री के लिए उपलब्ध है लेकिन सहारा ने इसके अधिग्रहण की कोशिश 6 महीने बाद ही शुरू की। सेबी को जवाब देने के 10 दिन बाद 10 अक्टूबर 2010 को ऐंबी वैली (मॉरीशस) का पंजीकरण कराया गया। 28 अक्टूबर 2010 को ऐंबी वैली लिमिटेड ने मॉरीशस की कंपनी का अधिग्रहण कर लिया।
 
पांच दिन बाद 3 नवंबर 2010 को सहारा समूह के मुख्य वित्त अधिकारी डी जे बागची ने सेबी के पूर्ण कालिक सदस्य के एम अब्राहम से बातचीत की, जो सहारा के खिलाफ जांच की अगुआई कर रहे थे। 24 नवंबर 2010 को जारी अंतरिम आदेश व कारण बताओ नोटिस में अब्राहम ने कहा, 'इस बैठक में कंपनी के प्रतिनिधि को सेबी को जल्द से जल्द पूरी और सही जानकारी उपलब्ध कराने की जरूरत से वाकिफ करा दिया गया था। लेकिन कंपनी के प्रतिनिधि ने जानकारी उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रतिबद्घता नहीं जताई।' इसके बाद ही सेबी और सहारा की कानूनी लड़ाई शुरू हुई। 
 
आदेश जारी करने के चार दिन पहले इस अधिग्रहण से जुड़े एक और महत्त्वपूर्ण चरण को अंजाम दिया गया। एसआईआरईसीएल द्वारा दी गई जानकारी से संकेत मिलता है कि एसआईआरईसीएल के पास यह रकम ओएफसीडी भुनाने से आई थी। 30 जून 2010 को समाप्त वित्तीय वर्ष के लिए एसआईआरईसीएल द्वारा 30 नवंबर को जारी बहीखाते के अनुसार इन रकम के स्रोत में महज तीन बड़े आइटम थे। कंपनी के पास 90.12 करोड़ रुपये की साझा पूंजी थी, 1,710 करोड़ रुपये का भंडार और अधिशेष और करीब 13,245 करोड़ रुपये के असुरक्षित ऋण थे। बहीखाते के शेड्यूल 3 में दिखाया गया कि 'असुरक्षित ऋण' में 11,921 करोड़ रुपये के ओएफसीडी, 36.4 करोड़ रुपये मूल्य की ओएफसीडी आवेदन रकम, लंबित आवंटन और इस पर प्राप्त 1,286 करोड़ रुपये का ब्याज। 
 
एसआईआरईसीएल ने 20 नवंबर 2010 को एक सौदा किया, जिसके तहत 'वह संयुक्त उपक्रम लेनदेन के लिए सहारा इंडिया कॉमर्शियल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को कुछ रकम मुहैया कराएगी, जिससे एसआईसीसीएल परियोजनाओं के निर्माण और विकास के लिए जमीन अधिग्रहण कर सके।'
 
दस दिन बाद इस रकम का कुछ हिस्सा ऐंबी वैली को ऋण के तौर पर दिया गया, जिसने अपनी मॉरीशस इकाई के जरिये इस रकम को भेजा और ग्रोवनर हाउस खरीदने में इस्तेमाल किया। सरकार के अनुसार, 'एसआईसीसीएल को अपनी खातिर तुरंत रकम की दरकार नहीं थी इसलिए एसआईसीसीएल ने एसआईआरईसीएल से मिली रकम का कुछ हिस्सा एवीएल को उसके हॉस्पिटैलिटी कारोबार के विस्तार की खातिर एक कारोबारी विकास लेनदेन के जरिये दिया। इस लेनदेन के लिए करार 30 नवंबर 2010 को किया गया।' इस करार के अनुसार एसआईसीसीएल ने एवीएल को 3,859.52 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान किया। इसके बाद इस रकम को तरजीही शेयर में तब्दील कर दिया गया। सहारा के अनुसार, 'यह मान लेना गलत होगा कि एसआईसीसीएल द्वारा एवीएल को कारोबार विकास के लिए दी गई पूरी रकम महज एसआईआरईसीएल से हस्तांतरित रकम से निकाली गई थी। एसआईसीसीएल के पास खुद की भी पूंजी थी, जिसका हस्तांतरण उसने एवीएल को किया।'
 
13 दिसंबर 2010 को एवीएल ने अपनी मॉरीशस इकाई के साथ एक ऋण समझौता किया। इसके बाद 24 दिसंबर 2010 को 47 करोड़ पाउंड की रकम एवी(एम)एल को भेज दी गई थी और 31 दिसंबर 2010 तक ग्रोवनर सहारा की झोली में था। सहारा समूह ने कहा कि 24 नवंबर को जारी सेबी के अंतरिम आदेश पर 13 दिसंबर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्थगनादेश दिया था और जब यह रकम विदेश भेजी गई तो यह स्थगनादेश प्रभावी था। 
 
प्रवक्ता ने कहा, 'गौरतलब है कि कथित भुगतान में स्वत: निवेश के तहत विदेश में प्रत्यक्ष निवेश के लिए फेमा (विदेशी मुद्रा विनिमय प्रबंधन अधिनियम) द्वारा जारी सभी दिशानिर्देशों का पालन किया गया था क्योंकि तब एवीएल या उसके प्रवर्तकों और निदेशकों के खिलाफ फेमा के नजरिये से किसी तरह की जांच (किसी भी जांच एजेंसी या प्रवर्तन एजेंसी या फिर नियामकीय संस्था)नहीं की जा रही थी। एवी(एम)एल परिचालन कारोबार से जुड़ी है और विदेशी हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में निवेश करती है। एवी(एम)एल ने इस ऋण के जरिए ग्रोवनर हाउस होटल सौदा पूरा किया और अन्य हॉस्पिटैलिटी संपत्तियां खरीदीं।'
 
सहारा समूह ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस पूरी प्रक्रिया के किसी भी चरण में एक भी नियामकीय या कानूनी जरूरत का उल्लंघन नहीं किया गया है। समूह ने कहा कि रकम का लेनदेन संबंधित कंपनियों के लक्ष्य के अनुसार ही था और रकम के हस्तांतरण या उसके इस्तेमाल में किसी भी तरह का कुछ भी गैर-कानूनी नहीं है। एवी(एम)एल ने सहायक कंपनियां स्थापित कर इक्विटी शेयर, तरजीही शेयर और ऋण के रुप में उनमें निवेश किया। प्रवक्ता ने कहा, ' स्टेप डाउन सहायक कंपनियां स्थापित करना 7 जुलाई 2004 को जारी रिजर्व बैंक की अधिसूचना संख्या 120/आरबी-2004 के अनुसार ही है, जिसमें समय के साथ बदलाव होते रहते हैं और ऐसी स्टेप डाउन कंपनियां से जुड़ी हर जानकारी एवीएल द्वारा नियुक्त आधिकारिक डीलरों के जरिये आरबीआई को दे दी गई है।' जून 2011 में सेबी ने एक अंतिम आदेश जारी किया, जिसमें उसने एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल को ओएफसीडी के जरिये जुटाई गई रकम लौटाने का निर्देश दिया। सहारा ने इसके खिलाफ प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (सैट) में याचिका दायर की। 18 अक्टूबर 2011 को सैट ने सहारा की याचिका खारिज कर दी। 
 
एफआईयू की रिपोर्ट के अनुसार सैट के आदेश के तुरंत बाद नए लेनदेन हुए। विदेशी एजेंसी ने कहा, 'खुफिया जांच में सामने आया कि 21 अक्टूबर 2011 और 28 नवंबर 2011 को ऐंबी वैली (मॉरीशस) को सहारा ग्रोवनर हाउस हॉस्पिटैलिटी लिमिटेड, जिसका खाता बैंक ऑफ चाइना में है, से खासी रकम प्राप्त हुई।' इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐंबी वैली (मॉरीशस) ने प्रायोजन एडवांस के तौर पर फोर्स इंडिया फॉर्मूला वन टीम को 50 लाख पाउंड का भुगतान भी किया। 30 मार्च 2012 को जारी एफआईयू रिपोर्ट में आगे संकेत है कि ऐंबी वैली (मॉरीशस) की मंशा अपने विभिन्न बैंक खातों में भारी भरकम रकम का हस्तांतरण करने की थी। रिपोर्ट में कहा गया है, 'खुफिया जांच में संकेत मिले कि ब्रिटेन के एक वित्तीय संस्थान में ऐंबी वैली (मॉरीशस) लिमिटेड के नाम पर खाता है और इसका नियंत्रण सुब्रत रॉय करते हैं। खाताधारक 80 लाख पाउंड का हस्तांतरण इस खाते से एसजी हैमब्रॉस बैंक (चैनल आइलैंड्स) लिमिटेड में करना चाहता था।' विदेशी एफआईयू ने कहा कि कंपनी की मंशा बैंक ऑफ चाइना में मौजूद खाते में और 19 करोड़ पाउंड का हस्तांतरण करने की थी। न्यूयॉर्क स्थित एक होटल के अधिग्रहण की खातिर अन्य कंपनी फिडेलिटी नैशनल टाइटल कंपनी के पास भी रकम रखी गई थी। 
 
31 अगस्त 2012 को उच्चतम न्यायालय ने सैट व सेबी का आदेश बरकरार रखा। न्यायालय ने एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल को आदेश दिया कि कंपनियां 2.96 करोड़ निवेशकों से जुटाई गई 24,029 करोड़ रुपये की रकम 15 फीसदी ब्याज के साथ उन्हें लौटाएं। निवेशकों की पहचान की जांच करने के बाद उन्हें रकम लौटाने की जिम्मेदारी सेबी को सौंपी गई। नवंबर 2012 में सहारा ने 4,000 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम खर्च कर न्यूयॉर्क में दो होटलों का अधिग्रहण किया। दिसंबर 2012 में समूह ने अखबारों में विज्ञापन के जरिये घोषणा की कि उसे ओएफसीडी निवेशकों को महज 2,620 करोड़ रुपये चुकाने हैं। अभी तक समूह ने निवेशकों को भुगतान के लिए 5,120 करोड़ रुपये जमा किए हैं, जिसमें अंतर की भरपाई के लिए अतिरिक्त 2,500 करोड़ रुपये भी शामिल हैं। (बीएस)

 

अमिताभ ठाकुर ने सीआरपीएफ-आरपीएफ एवं पीएसी में मौजूद कई प्रावधानों को कोर्ट में दी चुनौती

 सुरक्षा बलों में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार एवं समानता समेत तमाम समाजिक मुद्दों पर कानूनी तरीके से लड़ने-भिड़ने वाले आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर समानता के लिए एक और लड़ाई छेड़ दी है. उन्‍होंने हाई कोर्ट लखनऊ बेंच में दो अलग-अलग याचिका दायर कर सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स एक्‍ट एवं रेलवे प्रोटेक्‍शन फोर्स एक्‍ट तथा दूसरे में प्रोविंसियल आर्म्‍ड कॉस्‍टेब्‍लरी एक्‍ट के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है. इन याचिकाओं में श्री ठाकुर ने कहा है कि इन अधिनियमों में कई ऐसे प्रावधान हैं, जो विभेदकारी प्रतीत होते हैं, इसलिए विधिविरुद्ध घोषित किए जाने चाहिए. 

उन्‍होंने कहा है कि ये सभी बल भारतीय सेना की तर्ज पर बने हैं तथा आर्मी एक्‍ट 1950 में भारतीय सेना में कार्यरत सभी कर्मी अपने आपराधिक दायित्वों के लिए समान रूप से जिम्मेदार माने गए हैं. श्री ठाकुर ने याचिका में कहा है कि इसी प्रकार बोर्डर सेक्युरिटी फ़ोर्स (बीएसएफ), इंडो तिब्बत बोर्डर पुलिस (आईटीबीपी) तथा सीमा सुरक्षा बल (एसएसबी) में भी सभी कर्मी अपराधिक कृत्यों और अकृत्यों के लिए समान रूप से उत्तरदायी माने गए हैं. लेकिन सीआरपीएफ एक्ट, आरपीएफ एक्ट तथा पीएसी एक्ट में इस सम्बन्ध में वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों में अंतर किया गया है. इन बलों में अधीनस्थ कर्मियों को अवकाश से अनुपस्थित रहने, अपने नीचे के अधिकारियों से दुर्व्यवहार करने, वरिष्ठ अधिकारियों से दुराचरण करने से ले कर अन्य कार्यों के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार बनाया गया है, जबकि वरिष्ठ अधिकारियों को इससे मुक्त रखा गया है. 
 
याचिका में अमिताभ ठाकुर ने कहा है कि यह भेदभाव किसी भी तर्क पर आधारित प्रतीत नहीं हो रहे हैं, अत: अनुच्‍छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार के विपरीत है. याचिका पर सुनवाई गुरुवार 14 फरवरी को होगी. अमिताभ ठाकुर के अधिवक्‍ता अशोक पाण्‍डेय हैं. 

इंडिया न्‍यूज पहुंचे मनोज वर्मा, अरुण जैन एवं विवेक प्रकाश

इंडिया न्‍यूज से जुड़ने वालों की संख्‍या लगातार बढ़ती जा रही है. एबीपी न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर दो लोगों ने अपनी नई पारी इंडिया न्‍यूज के साथ शुरू की है. मनोज वर्मा एवं अरुण जैन ने इंडिया न्‍यूज में ज्‍वाइन किया है. ये लोग संपादकीय में अपनी जिम्‍मेदारी निभाएंगे. मनोज एवं अरुण लंबे समय से इस चैनल के साथ जुड़े हुए थे. माना जा रहा है कि कुछ और लोग एबीपी न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर इंडिया न्‍यूज जा सकते हैं. 

अल्‍फा समूह के चैनल न्‍यूज नेशन से विवेक प्रकाश ने इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने अपनी नई पारी इंडिया न्‍यूज के साथ शुरू की है. उन्‍हें एईपी बनाया गया है. वे न्‍यूज24 से इस्‍तीफा देकर न्‍यूज नेशन पहुंचे थे. वे महुआ समेत कई चैनलों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 

महराजगंज जिले में अमर उजाला हुआ नंबर वन

 

महराजगंज। अमर उजाला ने पाठकों को बाधते हुये अपना सर्कुलेसन भी बढा़ लिया है। मात्र कम समय में जिले में अमर उजाला के अखबार की प्रतियां 11800 से 12000 के बीच हैं। वहीं दैनिक जागरण का 8400 से 8800 के बीच हैं। हिन्दुस्तान 7400 से 7800 के बीच बिक रही है। वहीं सहारा 5500 से 5800 के बीच है। जबकि साल भर के अंदर शुरू हुयी जनसंदेश 2000 से 2200 के बीच है। महराजगंज जनपद में दैनिक जागरण का गढ़ रहा है। परन्तु अपने कुप्रबन्धक के चलते जिले में नंबर दो हो गया। वहीं बताया जाता है कि अमर उजाला के ब्यूरो प्रभारी का व्यक्तिगत संबन्ध अच्छा होने से अमर उजाला अचानक जिले में नंबर वन हो गया।    

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस ने ‘पत्र’ का फर्जीवाड़ा बंद किया

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस ने संपादकीय पेज पर 'पत्र' कॉलम में किया जाने वाला फर्जीवाड़ा बंद कर दिया है. अब यहां से कुछ नए पत्र तथा दूसरे जगह से आने वाले पत्रों को उसी नाम पते से प्रकाशन कर रहा है. इसके साथ ही अखबार ने स्‍थानीय स्‍तर पर पाठकों से पत्र भेजने के लिए सूचना प्रकाशित की है. यह सारे बदलाव भड़ास पर खबर आने के बाद किए गए हैं. इस बदलाव से कम से कम अब पाठक गलत सूचना नहीं पा सकेंगे. 

सूत्रों का कहना है कि कुछ लोग पाठकों को धोखा देने के लिए अखबार के खिलाफ पीसीआई को शिकायत करने की तैयारी भी कर रहे हैं. क्‍योंकि जनसंदेश टाइम्‍स द्वारा किया गया काम पाठकों के साथ धोखेबाजी होने के साथ ही नैतिक रूप से भी गलत था. कम से कम किसी भी अखबार से इस तरह की भ्रामक या गलत काम की अपेक्षा नहीं की जाती है. लोग अखबारों पर आज भी आंख बंद करके विश्‍वास करते हैं, परन्‍तु जनसंदेश टाइम्‍स के कुछ लोग आंख बंद करके पाठकों को धोखा दे रहे थे. 
 
गौरतलब है कि जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस सभी एडिशनों के लिए लखनऊ से तैयार होने वाले पेज पर छेड़छाड़ करते हुए फर्जी तरीके पत्र लिखने वाले व्‍यक्ति का नाम तो ज्‍यों का त्‍यों प्रकाशित कर रहा था, परन्‍तु जगह का नाम बदल दे रहा था. अन्‍य एडिशन में संपादकीय का सेंट्रल पेज बिना किसी बदलाव के लगाया जाता था पर बनारस एवं इलाहाबाद में छेड़छाड़ करके गलत सूचनाएं दी जाती थीं. खैर, देर से ही जनसंदेश टाइम्‍स के संपादकीय टीम को अकल आ गई है और उन्‍होंने स्‍थानीय स्‍तर पर पत्र कॉलम के लिए पाठकों से पत्र मांगना शुरू कर दिया है.
 
नीचे जनसंदेश टाइम्‍स में हुए बदलाव को देखने के लिए फोटो पर क्लिक करें. उसके नीचे भड़ास पर प्रकाशित संबंधित खबर.  
 


तथ्य देने व तर्क शक्ति बढ़ाने में टीवी स्टूडियो की बड़ी भूमिका

: बदल रहा है जन-धरातल पर संवाद का विषय : हैबर मास के जन धरातल (पब्लिक स्फीयर) के सिद्धांत और मीडिया की भूमिका की इस अवधारणा को, कि प्रजातंत्र में मास मीडिया का मूल कार्य मुद्दों पर परस्पर-विरोधी विचारों को सामने ला कर एक बाज़ार खड़ा करना होता है, अगर मिला कर देखा जाये तो आज भारत के न्यूज़ चैनलों में होने वाले डिस्कशन एक बड़ा कार्य कर रहे हैं. शायद यही वज़ह है कि इंडिया गेट पर अब भावनात्मक मुद्दे “मंदिर-मस्जिद” की जगह गैर-राजनीतिक लेकिन जन-हित के मुद्दों मसलन भ्रष्टाचार और बलात्कार ने ले ली है.

राजनीति-शास्त्र का एक सिद्धांत है कि अर्ध-शिक्षित अथवा अशिक्षित समाज में भावनात्मक मुद्दे पर आया जन-उबाल कई बार संवैधानिक व्यवस्था पर भारी पड़ जाता है और शासन के पूरी प्रजातान्त्रिक स्वरुप को हाइजैक कर लेता है. सन १९९२ में ढांचा का गिरना उसी का नतीजा रहा है. लेकिन पिछले २० सालों में शिक्षा के विस्तार, प्रति-व्यक्ति आय में बढ़ोत्तरी और परिणाम –स्वरुप उपजी बेहतर समझ ने स्थिति बदल दी है.
 
जन-अभिरूचि में इस परिवर्तन को एक शुभ संकेत मानते हुए आज चैनलों में प्राइम टाइम में ना तो बाबा रहते हैं ना हीं भूत. तात्कालिक जन मुद्दे पर घंटों बहस की जाती है, जिसमें ना केवल विषय के जानकार अपनी राय देते है बल्कि राजनीतिक पार्टियों के लोग अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं. चूंकि भारत में प्रजातंत्र द्वंदात्मक या यूँ कहें कि प्रतिस्पर्धी अवधारना पर आधारित है, लिहाज़ा कई बार दो पार्टियों के प्रतिनिधि एक–दूसरे से झगड़ते दिखाई देते है और कई बार उनकी कोशिश एक-दूसरे को नीचा दिखने की होती है, लिहाज़ा डिस्कशन की सार्थकता बेमानी सी दिखने लगाती है. कई बार यह भी प्रयास होता है कि टीवी चैनलों के एंकर या विशेषज्ञों पर आक्षेप कर के उनकी निष्पक्षता को कटघरे में लाया जाये.
 
ऐसी स्थिति खासकर तब आती है जब किसी मुद्दे पर किसी राजनीतिक दल की कथनी और करनी में अंतर को ले कर कोई एंकर सवाल करता है या कोई विशेषज्ञ कोई तथ्य प्रस्तुत करता है. उदाहरण के तौर पर अगर समाजवादी पार्टी के इस वक्तव्य को कि वह खुदरा व्यापार में एफ़डीआई नहीं लाने देगी और संसद में मतदान के दौरान उसके बहिष्कार को लेकर सवाल हो तो हमले प्रश्न करने वाले पर हो जाता है. उसी तरह अगर भारतीय जनता पार्टी को यह हकीकत बताई जाती है कि पिछले २३ सालों में हुए सात आम चुनावों में पार्टी को मिले मत-प्रतिशत से साफ़ हो जाता है कि वह हिन्दू समाज (अगर ऐसा कोई समाज गलती से है भी तो) का रहनुमा नहीं है और हिन्दुओं के लिए मंदिर कोई मुद्दा नहीं है तो लाज़मी है कि जवाब के रूप में एंकर या विशेषज्ञ पर हमला ही हो सकता है.
 
यह सही है कि टीवी चैनलों पर संवाद की प्रक्रिया अभी अपेक्षाकृत नयी विधा है और अभी डिस्कशन के पैरामीटर्स और बेहतर करना जरूरी है. लेकिन इससे बड़ी जरूरत है प्रतिभागियों में उस भाव की जिसमें परस्पर विरोधी तर्क-वाक्यों को सहजतापूर्वक और बेबाकी से आत्मसात की जाए. ब्रिटेन की संसद में ऐसी परंपरा रही है कि जब कोई बड़े से बड़ा नेता बोल रहा हो और कोई संसद सदस्य अचानक खड़ा हो कर कुछ कहना चाहे तो पहला वक्ता बाद वाले वक्ता के सम्मान में बैठ जाता है. लेकिन ऐसा दूसरे वक्ता तभी करता है जब कोई बहुत हीं अपरिहार्य स्थिति हो. कहने का मतलब यह कि संवाद में एक-दूसरे के तर्क वाक्यों का सम्मान करने की भावना होनी चाहिए ना कि “बोलती बंद कर दी” का विजयी भाव.  ना ही प्रतिभागी की दिलचस्पी अपनी बात तार्किक रूप से रखने में कम और अपने दूर बैठे नेता को खुश करने में ज्यादा होनी चाहिए. ऐसा करने वाले पार्टियों के प्रतिभागी शायद यह भूल जाते हैं कि वह जाने-अनजाने अपनी ही पार्टी और नेता का नुकसान कर देते हैं.
 
कई बार विशेषज्ञ भी अपने तर्क-वाक्य तथ्यों पर आधारित कम करते है और अपने विचार ज्यादा. यही वह क्षण होता है जब उसके और राजनीतिक प्रतिभागी के बीच अंतर ख़त्म हो जाता है. अगर कोई विशेषज्ञ यह कह रहा हो कि मंदिर आम भारतीयों का या खासकर हिन्दुओं का मुद्दा नहीं रहा या अगर रहा भी तो उसका राजनीतिक लाभ नहीं लिया जा सकता लिहाज़ा तो उसे पिछले सात आम चुनावों के आंकड़ों से सिद्ध करना होगा. भारत में विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग है जो राजनीतिक संवादों में तथ्य-आधारित निष्कर्ष से ज्यादा अपने विचार परोसता है.
 
चूँकि अचानक जन-अभिरूचि देश में गंभीर व वास्तविक मुद्दों पर ज्यादा बढ़ गयी है जिसकी वज़ह से सभी बड़े चैनल स्टूडियो डिस्कशन करने लगे हैं इसलिए राजनीतिक पार्टियों के लिए भी अपेक्षित है कि वह अपने उन्हीं प्रतिनिधि को भेजें, जिनमें विषय को लेकर समझ हो या जो केवल नेता-वंदना या गले की ताक़त का सहारा ना लेकर अपनी बात को प्रभावी ढंग से रखें. बहरहाल एक बात साफ़ है इस तरह के संवाद के लिए मंच उपलब्ध करा कर भारतीय खबरिया चैनलों ने प्रजातंत्र को मजबूती देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है और इसीका नतीजा है कि अब औसत शिक्षित व्यक्ति को भी मालूम हो गया है कि देश में भ्रष्टाचार उसको तबाह कर रहा है कि मंदिर का ना बनाना. यही वजह है कि देश के अधिकांश मुसलमानों ने स्पष्ट रूप से कहा “विश्वरूपम फिल्म में क्या है, क्या नहीं हम बगैर देखे कैसे कह सकते है” या “इस्लाम इतना कमज़ोर नहीं है कि किसी फिल्म के कुछ अंशों से असर पड़े” या “अगर आतंकवादी धर्म का सहर लेता है और इसे फिल्म में दिखाया गया है तो गलत क्या है”. ध्यान रहे कि यह कहने वाले ज्यादातर युवा मुसलमान थे.
 
देश में सन २००९ के चुनाव से अगले चुनाव की बीच कोई दस करोड़ नए लोग मतदाता –सूची में शामिल हो रहे हैं. यह सब 

युवा हैं और इन्हें रोजगार चाहिए न कि मंदिर-मस्जिद. लिहाज़ा चैनलों पर आज मुख्य बहस सार्थक और वास्तविक जन सरोकार के मुद्दें है. इसका लाभ यह रहा है कि सरकारें अब “कुछ भी करके निकलने“ की स्थिति में नहीं रहीं और उन्हें संसद में नहीं तो चैनलों पर जवाब देना ही होगा.
 
लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

मेरा विभाग नहीं, हादसे के लिए चैनल जिम्‍मेदार : आजम

अपने बयानों को लेकर हमेशा विवाद में रहने वाले नगर विकास मंत्री आजम खान ने फिर अनोखा बयान दिया है. महाकुम्भ के हादसे के लिये उन्‍होंने मीडिया को जिम्मेदार बताया. आज़म खान ने कहा कि अगर दुर्घटना के लिये उनका विभाग कुसूरवार हो तो वह मंत्री पद से त्यागपत्र देने का तैयार हैं. खां सोमवार की शाम सम्भल के चंदौसी में संवाददाताओं से कहा कि कुम्भ मेलार्थियों में हुई भगदड़ के लिये मेरा विभाग जिम्मेदार नहीं है. 

उन्‍होंने कहा कि पूरी गलती ब्रेकिंग न्यूज चलाकर सनसनी फैलाने वाले उस समाचार चैनल की है, जिसने नाले में गिरने से दो लोगों की मौत की खबर को मेले में हुई भगदड़ की खबर बता दिया. जिसके बाद टेलीविजन चैनल की उस खबर से घबराकर बड़ी संख्या में लोग रेलवे स्टेशन पर पहुंच गये और वहां अचानक भीड़ बढ़ गयी. रेलवे स्टेशन पर भी ट्रेनों के बारे में जानकारी देने की घोषणा की सही व्यवस्था नहीं थी, जिससे यात्रियों में भ्रम की स्थिति बनी.
 
उन्‍होंने कहा कि अगर इस मामले में उनके विभाग की कोई भी गलती या गड़बड़ी सामने आती है तो वे इस्‍तीफा दे देंगे. उल्‍लेखनीय है कि रविवार को मौनी अमावस्‍या के दिन इलाहाबाद रेलवे स्‍टेशन पर मची भगदड़ में 36 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी. जिसके बाद उन्‍होंने इस घटना की नैतिक जिम्‍मेदारी लेते हुए मेला प्रभारी पद से इस्‍तीफा दे दिया था. 

एडेले का ग्रेमी अवार्ड लेने वाले पत्रकार को जेल!

ग्रेमी पुरस्कार समारोह में मंच पर पहुंचने और गायिका एडेले की ओर से पुरस्कार लगभग लेने ही वाले एक पत्रकार को जेल भेज दिया गया है. इस वाकये का सीधा प्रसारण हुआ लेकिन कुछ ही लोगों की नजर में यह आया क्योंकि जेनिफर लोपेज ने बहुत ही चतुराई से इस स्थिति को संभाल लिया और एडेले की जिंदगी के इस बेशकीमती क्षण को एक पत्रकार द्वारा हाईजैक होने से बचा लिया.

यूक्रेन के टीवी प्रस्तोता सीडियक को इस तरह के वाकयों को अंजाम देने के लिए पहले से ही जाना जाता है. मई में मॉस्को में ‘मेन इन ब्लैक 3’ के प्रीमियर के दौरान विल स्मिथ को चूमने पर इस पत्रकार को थप्पड़ झेलना पड़ा था. ग्रेमी पुरस्कार समारोह के दौरान यह स्थिति उस समय आई जब लोपेज बेहतर पॉप गाने की प्रस्तुति के लिए एडेले को सम्मानित करने वाली थीं. तभी एक आदमी माइक के नजदीक आया.
 
हॉलीवुड रिपोर्टर की खबर के अनुसार सीडियक ने एडेले के मंच पर चढ़ने से पहले लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘यह पुरस्कार हासिल करना सम्मान की बात है. आई लव यू, एडेले.’’ लेकिन लोपेज ने इस शख्स को हैरत से देखा और मंच से नीचे का रास्ता दिखाया. 24 साल के सीडियक ने कहा कि वह स्टेपल्स सेंटर के अति सुरक्षा वाले इलाके में पहुंचकर दंग था. (सहारा)

श्रीनगर में अखबारों के प्रकाशन एवं वितरण पर रोक

श्रीनगर : केबल टीवी, एसएमएस, मोबाईल और इंटरनेट सेवाओं को ठप करने के बाद प्रशासन ने वादी में अगले आदेश तक स्थानीय अखबारों के प्रकाशन व वितरण पर भी तथाकथित रोक लगा दी है। अधिकारिक तौर पर आदेश जारी नहीं किया गया है, लेकिन वादी में रविवार को प्रशासन ने किसी भी अखबार का वितरण नहीं होने दिया।

नागरिक या पुलिस प्रशासन ने स्थानीय अखबारों के प्रकाशन व वितरण पर रोक पर कुछ भी कहने से इंकार किया है। लेकिन दबे मुंह संबंधित अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इसका आदेश ऊपर से ही आया है ताकि कश्मीर में हालात को बिगड़ने से बचाया जा सके। यह कदम एहतियातन उठाया गया है, क्योंकि हमने वर्ष 2010 में वादी में हुए हिंसक प्रदर्शनों के दौरान कई बार पाया कि लोगों को सड़क पर लाने में, अफवाहों को हवा देने में अखबारों की भी भूमिका रही है।
 
शनिवार रात को 11 बजे पुलिस ने अखबारों के प्रकाशन व उनके वितरण को रुकवाने का ऑपरेशन शुरू किया, जो रविवार तड़के तक जारी रहा। कश्मीर के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ग्रेटर कश्मीर के प्रिंटर पब्लिशर राशिद मखदूमी ने बताया कि हम अपने अखबार को अंतिम रूप दे रहे थे कि अचानक पुलिस आ गई। पुलिस अधिकारियों ने हमें कहा कि अखबार नहीं छपेगा, अगर छपेगा तो वह उसे वितरित नहीं होने देंगे। इसके बाद हमने अखबार को नहीं छापा, अलबत्ता हमारा ऑनलाइन एडिशन ही जारी हुआ है।
 
कश्मीर रीडर अखबार के संपादक शौकत मौटा ने कहा, हमारा अखबार छप चुका था, लेकिन पुलिस ने उसे लालचौक में हमारे एजेंट के पास से जब्त कर लिया। एक भी प्रति कहीं नहीं जा पाई है। पुलिस ने कार्यालय के लिए भी एक प्रति नहीं छोड़ी। हमें चार दिनों तक अखबार न छापने की हिदायत की गई है।
 
वादी के प्रमुख न्यूज पेपर वितरक जनता न्यूज एजेंसी के अनुसार, उन्हें रात को ही पुलिस ने सूचित किया था कि कोई अखबार नहीं बांटा जाए। इसलिए हमने अपने तौर पर भी सभी अखबार वालों को सूचित किया कि हम अखबार नहीं ले पाएंगे और न बंटवा सकेंगे। यहां यह बताना असंगत नहीं होगा कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शनिवार को अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के बाद मीडिया के साथ बातचीत में लोगों से संयम बनाए रखने और मीडिया से विशेषकर न्यूज चैनलों से आग्रह किया था कि वह किसी भी समाचार को महज सुनी सुनाई बात पर न प्रसारित करें, उसके प्रसारण से पूर्व सभी तथ्य जांच लें। (जागरण)

छंटनी से नाराज बीबीसी के पत्रकार करेंगे 24 घंटे की हड़ताल

लंदन। प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन (बीबीसी) में आर्थिक तंगी के कारण जोरों से चल रही कर्मचारियों की छंटनी के विरोध में पत्रकार अगले सप्ताह राष्ट्रीय स्तर पर एक दिन की हड़ताल करेंगे। राष्ट्रीय पत्रकार यूनियन एन यू जे ने इसकी जानकारी दी। यूनियन ने एक बयान में कहा कि एन यू जे के सदस्य बीबीसी में छंटनी के विरोध में 18 फरवरी को विरोध-प्रदर्शन करेंगे।

यूनियन महासचिव मिशेल स्टेनीस्ट्रीट ने कहा कि बीबीसी जनता के पैसे का दुरूपयोग छंटनी पर कर रही है, जबकि संस्थान के पुनरूत्थान के लिए उसे रोजगार के अवसर तलाशने चाहिए। इस बीच बीबीसी ने पत्रकारों के इस कदम पर दुख जताते हुए कहा है कि वह यूनियन के सदस्यों को उनका जायज हक देने के लिए हर संभव कदम उठाएगी। (एजेंसी)

सिद्धार्थ श्रीवास्‍तव का आई नेक्‍स्‍ट से इस्‍तीफा, हिंदुस्‍तान जाएंगे

आई नेक्‍स्‍ट, गोरखपुर से खबर है कि सिद्धार्थ श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. विकास वर्मा के जाने के बाद सिद्धार्थ ही अखबार की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. सिद्धार्थ का जाना आई नेक्‍स्‍ट के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. खबर है कि वे अपनी नई पारी हिुदुस्‍तान, नोएडा के साथ शुरू करने जा रहे हैं. उन्‍हें डीएनई बनाए जाने की चर्चा है. 

सिद्धार्थ ने अपने करियर की शुरुआत गोरखपुर में स्‍वतंत्र चेतना अखबार से की थी. इसके बाद राष्‍ट्रीय सहारा, आज, दैनिक जागरण तथा अमर उजाला को कई जगहों पर सेवाएं देने के बाद आई नेक्‍स्‍ट से जुड़े थे. इन्‍हें आई नेक्‍स्‍ट की रीढ़ माना जाता था. वैसे भी गोरखपुर में प्रबंधन के लगातार हस्‍तक्षेप से कई लोग जा चुके हैं. आई नेस्‍क्‍ट में अभी किसी को जिम्‍मेदारी नहीं सौंपी गई है. 

जनवाणी एकादश ने प्रशासन को आठ विकेट से हराया

 

सहारनपुर स्थित अम्बेडकर स्पोर्ट्स स्टेडियम मे खेले गये मैत्रीपूर्ण क्रिकेट मैच में दैनिक जनवाणी एकादश ने प्रशासन एकादश को आठ विकेट से पराजित किया। बीस ओवरों के सीमित मुकाबले में प्रशासन एकादश ने टास जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया। सलामी बल्लेबाज राजीव पाठक और मनोज ने कई शानदार स्ट्रोक्स लगाये। दुर्भाग्यवश मनोज 19 रन के निजी स्कोर पर रन आउट हो गये, जबकि राजीव पाठक को 33 रन के निजी स्कोर पर गेंदबाज सन्नी ने क्लीन बोल्ड कर दिया। 
इसके बाद बल्लेबाज अखंड प्रताप सिंह और नीरज शुक्ला ने स्कोर तेजी के साथ आगे बढ़ाया। अखंड प्रताप एक रन चुराने के प्रयास में 34 रनों के निजी स्कोर पर रन आउट हो गये जबकि नीरज शुक्ला 22 रन बनाकर आउट हुए। प्रशासन एकादश ने चार विकेट के नुकसान पर 135 रन बनाते हुए जनवाणी एकादश को 136 रन का विजयी लक्ष्य दिया।
 
ओपनर संजय यादव के ताबड़तोड़ नाबाद 68 रन और सन्नी के 45 रन की बदौलत जनवाणी एकादश ने प्रशासन एकादश के हाथों से मैच निकाल लिया। बल्लेबाज मशकूर 8 रन बनाकर नाबाद रहे। जनवाणी एकादश के बल्लेबाज सन्नी को शानदार प्रदर्शन पर मैन ऑफ दी मैच घोषित किया गया, जिन्होंने बल्लेबाजी के साथ-साथ गेंदबाजी में भी अपने जोहर दिखाये। संजय यादव को सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज, प्रशासन एकादश के अब्दुल अहद को सर्वश्रेष्ठ क्षेत्ररक्षक घोषित किया गया। अम्पायर ज्योति बरूआ और मौ0 आतिफ रहे जबकि स्कोरर की भूमिका तनवीर अहमद ने निभाई। कमेंटेटर रंगकर्मी संदीप शर्मा रहे।
 
इसके अलावा क्षेत्रीय क्रीडा अधिकारी संतोश रावत, ताइक्वांडो कोच कल्पना कमल, टीटी कोच अश्वनी त्यागी, एथलेटिक्स कोच लाल धर्मेंद्र प्रताप, जूडो कोच काशीनरेश यादव, क्रिकेट कोच अब्दुल अहद, जनवाणी एकादश के मैनेजर व ब्यूरो चीफ पवन शर्मा, मार्केटिंग हेड कोमल टंडन, राजकुमार साथी, विक्रांत जैन, शाहकार खान, महेश शिवा, शशांक मिश्रा, उमेश शर्मा, चंद्रशेखर शर्मा, ब्रजमोहन मोंगा, एच शंकर शुक्ल, बीएम कश्यप, शौकीन, संजय सिंह, नीरज अग्रवाल और कमल शर्मा आदि मौजूद रहे।

Boycott Killer Coke, Boycott IIMC Alumni Meet

Friends, It is disgusting to note that the proposed IIMC Alumni Meet 2013 scheduled for Feb 17 in IIMC, Delhi campus has sought the sponsorship/partnership of corporates such as Coca-Cola, HCL and Iffco-Tokio, that is evident in its newly revealed logo and poster last day.

We have witnessed such attempts in the past too, one of those failed thanks to some dissenting voices, but this time it seems there is an alround consent on the name of Coca-Cola among office bearers of the association, barring a few ex-students who have registered their dissent on my facebook post last night. It is very important at this moment to recollect the crimes of Coca-Cola so as to put this dissent into larger perspective.

India

Of the 200 countries where Coca-Cola is sold, India reportedly has the fastest-growing market, but the adverse environmental impacts of its operations there have subjected The Coca-Cola Co. and its local bottlers to a firestorm of criticism and protest. There has been a growing outcry against Coca-Cola's production practices throughout India, which are draining out vast amounts of public groundwater and turning farming communities into virtual deserts. Suicide rates among Indian farmers whose livelihoods are being destroyed are growing at an alarming rate. Every day for years there has been some form of protest, from large demonstrations to small vigils, against Coca-Cola's abuses in India. One target of protest has been the Coca-Cola bottling plant in Plachimada, Kerala, which has remained shut down since March 2004 as a result of the community-led campaign in Plachimada challenging Coca-Cola's abuse of water resources.

The International Environmental Law Research Centre issued a report in 2007 that stated, in part, "The deterioration of groundwater in quality and quantity and the consequential public health problems and the destruction of the agricultural economy are the main problems identified in Plachimada. The activity of The Coca Cola Company has caused or contributed a great deal to these problems…The availability of good quality water for drinking purposes and agriculture has been affected dangerously due to the activity of the Company. Apart from that, the Company had also polluted the agricultural lands by depositing the hazardous wastes. All these points to the gross violation of the basic human rights, that is, the right to life, right to livelihood and the violation of the pollution control laws."

Columbia

Lawsuits were filed in the United States in 2001 and 2006 by the United Steelworkers of America and the International Labor Rights Fund on behalf of SINALTRAINAL, several of its members who were falsely imprisoned and the survivors of Isidro Gil and Adolfo de Jesus Munera, two of its murdered officers. The lawsuits charged Coca-Cola bottlers "contracted with or otherwise directed paramilitary security forces that utilized extreme violence and murdered, tortured, unlawfully detained or otherwise silenced trade union leaders." The lawsuits and campaign were developed to force Coca-Cola to once and for all end further bloodshed, compensate victims and provide safe working conditions.

Guatemala

On February 25, 2010, another human rights abuse lawsuit against Coca-Cola was filed in the Supreme Court of the State of New York and later moved to federal district court. "This case involves a campaign of violence – including rape, murder, and attempted murder – against trade unionists and their families at the behest of the management of Coca-Cola bottling and processing plants in Guatemala."

Turkey

In Turkey, in 2005, 105 workers at a Coca-Cola bottling plant in Istanbul joined a union and were terminated. They organized a lengthy sit-down strike in front of the main offices of Coca-Cola in Turkey. After several weeks of protesting, Coca-Cola workers entered the building to demand their reinstatement. While leaders of the workers were meeting with senior management for the company, the company ordered Turkish riot police to attack the workers who were by all accounts peacefully assembled, many with their spouses and children. Nearly two hundred of them were beaten badly and many required hospitalization. Lawsuits are pending.

China

In China: Based on undercover investigations at several Coke plants, Chinese press reported in December 2008 that Coke employees are "involved in the most dangerous, intense and tiresome labor, work the longest hours, but receive the lowest wages and face arrears and even cutbacks in their pay." One investigator claimed that Coke violated Chinese labor laws and reported that workers "often worked 12 hours per day for an entire month without a single day off."

In a report, "Violence in Coca-Cola's Labor Subcontracting System in China," it was revealed:

"On the 12 August 2009, a labor dispatch company hired by Coca-Cola's designated Hangzhou-based bottling plant was discovered to have threatened two university student-workers who asked for their own and their two other fellow workers' back pay upon their resignation. Xiao Liang, 24, was beaten up by two managers at the labor dispatch company's office, resulting in serious wounds over his left eye, left hand, and right ear. Xiao Xu sent Xiao Liang to the Dongfang Hospital immediately after police arrived on the scene. Xiao Liang was later diagnosed with a ruptured eardrum, resulting in compromised hearing capacity…"

BBC News (5/21/07) reported that Coca-Cola has been accused of benefiting from prison labor in China.

Much details could be found on www.killercoke.org

In this context I would like to give a boycott call for the scheduled IIMC Alumni Meet 2013 and request others who are/have been associated with IIMC directly or indirectly whatsoever to clear their positions categorically (approve the involvement of Coca-Cola or disapprove) with respect to the involvement of Coca-Cola in this event.

More so, I would appeal to the larger journalist fraternity and IIMC faculty to disapprove of this event and endorse the boycott call.

Regards,

Abhishek Srivastava

IIMC HJ (2002-03)

”बच्‍चा जब कुछ नहीं बोलता है तब मां सब कुछ समझ जाती है”

गाजीपुर। जन्म के समय प्रत्येक मनुष्‍य जब संसार में आता है तो सहज और सरल होता है। किन्तु जैसे जैसे वह बड़ा होता है उसमें बुराई भरने लगती है, जिससे वह मूल स्वभाव में नहीं रह जाता है। अवधूत भगवान राम के जीवन पर प्रकाश डालते हुए उदयप्रताप स्वायत्तशासी महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डा. मधु सिंह ने उनके बारे में बताते हुए कहा कि गुण्डी ग्राम मैंने जा करके देखा है जहां बाबा बैठा करते थे और घण्टों स्थापित शिव मंदिर में पूजा करते थे। 

आज आवश्‍यकता इस बात की है कि बाबा की बतायी बातें उनकी सिद्धान्तों, संदेशों पर हम चले। अवधूत भगवान राम के इस बाल दिवस की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 16 साल की अवस्था में आज के ही दिन इलाहाबाद के कुंभ में मां अन्नपूर्णा ने इन्हें कुछ खाने को दिया, तब से ये समाज को सब कुछ बांटते रहे। तभी से यह दिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज के विषम परिस्थियों में बच्चों की अहम भूमिका है इनके पहले गुरु माता-पिता हैं। बच्चा जब कुछ नही बोलता है तब मां सब कुछ समझ जाती है किन्तु बच्चे के बड़े हो जाने पर जब मां समझाने लगती है तो बच्चा नही समझता है और उसमें बुराई भरने लगती है।
 
यह व्याख्यान अघोर सेवा मण्डल, दिलदारनगर गाजीपुर के तत्वाधान में परम पूज्य अघोरेश्‍वर अवधूत भगवान राम जी का अनन्य दिवस बाल दिवस के रूप में परम्परागत अघोर वातावरण में जनपद के लंका मैदान में मनाया गया। विशिष्‍ट अतिथि डा. राजनरायण सिंह संस्कृत पीजी कालेज गाजीपुर ने कहा कि घोर के बाद ही अघोर आता हैं। सौम्य रूप ही अघोर है आप ने कहा कि गुरु के ज्ञान को ही ग्रहण करें, अक्षर ज्ञान को नहीं, क्योंकि अक्षर ज्ञान से साक्षर होने से बात ज्यादे हाहाकार मचा है। आपने अघोर, वाम मार्ग को ही वास्तविक बताते हुए कहा कि प्राण तत्व ही औघड़ एवं अघोर है। वक्ताओं में ओमकार सिंह प्रधानाचार्य सुहवल इण्टर कालेज, हथियाराममठ से जुड़े गजराज सिंह, डा. त्रिलोकी नाथ सिंह, वरिष्‍ठ पत्रकार विजय कुमार आदि रहे। 
 
इस अवसर पर विभिन्न विद्यालयों के छात्र छात्राओं द्वारा विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गये और प्रतिभागी बच्चों को पुरस्कृत किया गया। जिसमें नृत्य एवं गायन में स्व. जगदीश नारायण बाल विद्या मंन्दिर, चुरामनपुर को प्रथम, गौरी शंकर पब्लिक स्कूल को द्वितीय, कान्ती मेमोरियल ददरीघाट को तृतीय, अवधूत भगवान राम पब्लिक स्कूल को चतुर्थ स्थान प्राप्त हुआ। एकल में अवधूत भगवान राम प्रथम, कांती मेमोरियल द्वितीय, लूदर्स कान्वेन्ट स्कूल तृतीय, स्व. जगदीश नारायण बाल विद्या मंदिर चतुर्थ स्थान प्राप्त किया। कार्यक्रम के अन्त में अतिथियों को स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया। संस्था के उपाध्यक्ष एवं वरिष्‍ठ अधिवक्ता रणजीत सिंह ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। संचालन रामाश्रय सिंह ने किया।
 
राष्‍ट्रीय सेवा योजना शिविर से लोगों को किया जागरूक
 
गाजीपुर। जनपद में राष्ट्रीय सेवा योजना की डॉ. राम मनोहर लोहिया डिग्री कालेज अध्यात्मपूरम् ढोटारी गाजीपुर, इकाई के सिसई तौफिर में 5 फरवरी से 11 फरवरी तक चलने वाले सात दिवसीय में शनिवार को छात्र-छात्राओं द्वारा अमवॉ सती माई मार्ग की साफ-सफाई तथा वहा की लोगों को पर्यावरण व स्वछता पर विशेष ध्यान देने के साथ ही खुले में शौच न करने के लिए जागरुक किया। संध्याकलीन विचार गोष्ठी में श्री गॉधी इन्टर कालेज ढोटारी के प्रधानाचार्य छविनाथ मिश्रा ने कहा कि शिक्षा अर्जन का उदेश्य पहले ज्ञान प्राप्त करना होना चाहिए। बदलती परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा का ज्ञान और कौशल प्राप्त करने के साथ ही रोजगारपरक होना आवश्यक है। कार्यक्रम अधिकारी डॅा. दिग्विजय उपाध्याय ने छात्रों को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में धीरेद्र प्रताप सिहं, हरिशकंर सिंह, प्रमोद सिंह, पवन गुप्ता, इदल राय, उपेन्द्र भार्गव, कमलेश यादव, शिव कुमार इत्यादि थे। कार्यक्रम का सफल सचांलन डॉ. सजंय श्रीवास्तव ने किया।

‘गाजीपुर गौरव रत्‍न’ से सम्‍मानित हुए सांसद

गाजीपुर। वैसे से नेताओं को आम आदमी जन समस्याओ से त्रस्त आकर खरी-खोटी सुनाता रहता है पर ऐसा कम ही होता है जब उनके विकास कार्यों को लेकर जहा उन्हें सम्मानित किया जाता हो। जी हां ऐसे ही गाजीपुर के सांसद राधे मोहन सिंह भी है। जिन्हें उत्कृष्‍ट विकास कार्यों के लिए शहर के गणमान्य व्यक्तियों ने ‘गौरव रत्न’ से सम्मानित किया। यह सम्मान उन्हें शहर के बहुत प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान सरस्वती विद्या मन्दिर के 35वें वार्षिकोत्सव पर दिया गया। 

कार्यक्रम के शुभारम्भ मुख्य अतिथि सांसद राधेमोहन सिंह ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्पर्ण व दीप प्रज्जवल कर किया। इस दौरान विद्यालय के प्रबन्धक व अधिवक्ता बालेश्‍वर सिंह ने सांसद को अभिनन्दन पत्र एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। सम्मान समारोह के इस क्रम में एमएएच इन्टर कालेज के प्रबन्धक वारिस हसन खां ने कहा कि सेना की भर्ती प्रक्रिया जनपद में शुरू करके सांसद ने पूर्वांचल के ऊर्जावान युवकों को भटकने से बचाया है। उनके इस प्रयास से जहां हजारों बेरोजगार नौजवानों को नौकरियों मिली है, वहीं उनमें देश प्रेम की भावना प्रबल हुई है। 
 
कार्यक्रम के दौरान वरिष्‍ठ अधिवक्ता रामपूजन सिंह ने सांसद के प्रयास से 50 करोड़ की लागत से बन रहे रौजा रेलवे ओवरब्रिज की प्रक्रिया पर संतोष जताते हुए बताया कि इससे जनपद की यातायात व्यवस्था सुदृढ़ हो जायेगी। सांसद ने सम्मान समारोह में सम्बोधित करते हुए कहा कि पिता का पोषण, मां का पालन और गुरु की शिक्षा से जो संगम बनता है, उससे संस्कार की उत्पत्ति होती है और यही संस्कार प्रत्येक मनुष्‍य को उंचाइयों की ओर ले जाता है। इस कार्यक्रम के दौरान जिले के समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष सुदर्शन यादव ने सांसद द्वारा किये गये विकास कार्यों पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा कि उनका यह प्रयास अनवरत जारी रहेगा।
 
वार्षिकोत्‍सव पर विद्यालय के बच्चों ने रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत कर लोगों को मंत्रमुग्ध किया, वहीं सांसद ने हाईस्कूल व इण्टरमीडिएट के बोर्ड परीक्षा में मेधावी प्रदर्शन करने पर छात्राओं को पुरस्कृत कर उन्हें प्रोत्साहित किया। जिसमें सम्मान समारोह के इस कार्यक्रम में जंगीपुर के पूर्व प्रार्चाय एवं शिक्षाविद बच्चन सिंह, वरिष्‍ठ अधिवक्ता रामसूरत सिंह, कलेक्ट्रेट बार के अध्यक्ष सिद्धनाथ राय, पूर्व अध्यक्ष बन बिहारी सिंह, पूर्व अध्यक्ष पारसनाथ सिंह, अधिवक्ता योगेन्द्र सिंह, प्रधानाचार्य सुरेश सिंह, पूनम सिंह, उद्यमी प्रदीप सिंह, उद्यमी उमेश सिंह गहमरी, डा. संजीव सोमवंशी सहित जनपद के सैकड़ों गणमान्य लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार संघ के अध्यक्ष राजेश दूबे व अध्यक्षता डा. अशोक कुमार चटर्जी ने किया।

डा. कृष्‍ण कुमार रत्‍तू को प्रतिष्ठित राष्‍ट्रीय चाणक्‍य जनसंचार पुरस्‍कार

 

चंडीगढ़ : राष्ट्रीय जन-संचार काउंसिल (पीआरसीआई) ने अपना प्रतिवर्ष दिया जाने वाला प्रतिष्ठित राष्ट्रीय चाणक्य जन संचार पुरस्कार इस वर्ष देश के जाने माने मीडिया विशेषज्ञ एवं लेखक डॉ. कृष्ण कुमार रत्तू को देने की घोषणा की है। ‘क्म्यूनिकेटर ऑफ द ईयर-२०१३’ मीडिया, संचार, साहित्य क्षेत्र के लिए दिए जाने वाला यह पुरस्कार देश की जानी-मानी हस्तियों को दिया जाता है। हैदराबाद में सातवीं भारतीय जनसंचार क्म्यूनिकेशन कनक्लेव के महत्वपूर्ण समारोह में यह पुरस्कार २२ फरवरी को देश के मुख्य चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा प्रदान करेंगे। 

इस कनक्लेव में भाषा, जनसंचार, जनसंपर्क व साहित्य से जुड़े देश के पांच सौ से ज्यादा विशेषज्ञ इसमें शामिल होंगे। उल्लेखनीय है कि डॉ. के.के रत्तू को इससे पहले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई जाने माने पुरस्कार मिल चुके हैं। हाल ही में पंजाब और हरियाणा साहित्य अकादमियों की ओर से शीर्ष पुरस्कार पुरस्कार मिले हैं। उन्होंने दो दर्जन से ज्यादा हिंदी और पंजाबी की किताबें भी लिखी हैं। इनमें से कुछ देश के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल है। डा. रत्तू इस समय चंडीगढ़ दूरदर्शन के प्रमुख के तौर पर कार्यरत हैं। इससे पहले वह जयपुर दूरदर्शन (राजस्थान) में थे। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर के चाणक्य पुरस्कार के लिए उनका घोषित होने पर उन्होंने राष्ट्रीय जन-संचार काउंसिल का आभार जताया। 

सिद्धांतों और सिंहासन के दोराहे पर खड़ी है भाजपा

लोकसभा चुनावों के नजदीक आने के साथ सभी दलों की बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। बात चाहे भाजपा की हो अथवा कांग्रेस की तो दोनों ही दल अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते। यही बात क्षेत्रीय दलों के संबंध में भी समझी जा सकती है। 

स्मरण रहे कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव एवं बसपा सुप्रीमो मायावती दोनों ने आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए कार्यकर्ताओं को कमर कसने की सलाह दे दी है। रही सही कसर राक्रांपा के वरिष्ठ नेता के शरद पवार को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने संबंधी बयान से पूरी कर दी है। अब जहां तक प्रश्न चुनावों का है तो निश्चित तौर पर कांग्रेस ने इस दिशा में अपनी बढ़त बना ली है। विगत दिनों हुए चिंतन शिविर से के निष्कर्ष चाहे कुछ भी रहे हों लेकिन दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हो गई हैं।
 
1. आगामी लोकसभा चुनावों कांग्रेस अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए युवराज की ताजपोशी का मन बना चुकी है।
 
2. चुनावों में विजयश्री प्राप्त करने के लिए कठोर से कठोर निर्णय लेने को तैयार है।
 
इन बातों को समझाने के लिए किसी विशेष व्याख्या की आवश्यकता नहीं होनी चाहीए। यथा कांग्रेस में आरंभ से नंबर 2 रहे राहुल की ताजपोशी और उन्हें युवाओं का नेता बताकर छिपे तौर पर ही सही प्रधानमंत्री पद का घोषित करना वास्तव में कांग्रेस की एक मजबूत पहल है। जहां तक प्रश्न है कठोर फैसले लेने का तो बीते दिनों अजमल कसाब की फांसी और हाल ही में अफजल गुरु की फांसी इस बात को समझाने के लिए पर्याप्त है कि कांग्रेस अपने मिशन 2014 को लेकर कितनी गंभीर है।
 
रही बात देशव्यापी राजनीति की तो निश्चित तौर पर देश की राजनीति आज भी दो दलों पर ही केंद्रित है। हांलाकि क्षेत्रीय दलों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता लेकिन फिर भी ये छोटी पार्टियां निश्चित तौर पर इन बड़े दलों की असफलता को ही भुनाती हैं। अतः भाजपा को आज भी एक मजबूत विपक्षी की भूमिका में आना ही पड़ेगा। जहां तक भाजपा की वर्तमान स्थितियों को प्रश्न है तो निश्चित तौर पर भाजपा आज अपने की सहयोगियों से मुंह की खा रही है। राजग के सबसे बड़े दल के रूप में सर्वमान्य भाजपा आजे लगातार अपने से कम सामर्थ्‍यवान दल जद यू से समझौते कर रही है। अब जबकि प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में लगभग सभी दलों के पत्ते खुल चुके हैं। ऐसे में भाजपा की चुप्पी निश्चित तौर पर मतदाताओं के रूझान को प्रभावित करेगी। 
 
ध्यातव्य हो कि विगत उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने हूबहू ऐसा ही दांव खेला था जिसके नतीजे आज सभी जानते हैं। विचारणीय बात है कि अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाला प्रत्येक मतदाता निश्चित पार्टी द्वारा घोषित प्रत्याशी के चरित्र को देखते हुए ही उसके पक्ष या विपक्ष में अपना मत देता है। ऐसे में बहुमत आने के बाद प्रत्याशी की घोषणा निश्चित तौर जनता के सब्र की परीक्षा लेना ही होगा। जहां तक भाजपा में योग्य उम्मीदवारों का प्रश्न है तो निश्चित तौर उसकी कोई कमी नहीं है। आधिकारिक तौर पर विभिन्न न्यूज चैनलों एवं एजेंसियों के द्वारा कराये गये सर्वेक्षणों से ये बात अब सिद्ध हो चुकी है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आज प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में आम जन की पहली पसंद बन चुके हैं। ऐसे में योग्य प्रत्याशी को दरकिनार करने का ये कदम भाजपा के लिए वाकई आत्मघाती साबित हो सकता है।
 
हांलाकि नरेंद्र मोदी का नाम घोषित करने से हिचकने का प्रमुख कारण नीतीश कुमार का विरोध। स्मरण रहे कि नीतीश कई बार सेक्यूलर प्रधानमंत्री की बात कह चुके हैं। रही बात उनके सेक्यूलर मापदंडों की तो कोई बड़ी बात नहीं है कि वे अपनी दावेदारी मजबूत करने में लगे हों। अब जहां तक राजग से जदयू के अलग होने का प्रश्न है तो निश्चित तौर इसके कुछ हानि और लाभ दोनों हैं। इस हानि स्वरूप शायद भाजपा को बिहार में कुछ एक सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है, हांलाकि इसकी संभावना भी न्यूनतम है। अगर लाभ की बात करें तो उसे इस बात से समझा जा सकता है कि जदयू बिहार के बाहर पूर्णतः मृतप्राय दल है। रही बात मोदी की विकास पुरूष की छवि तो सर्वमान्य रूप से वो नीतीश कुमार से कहीं बड़ी है। अब सवाल उठता नीतीश द्वारा लगातार किये विरोध का तो ये स्पष्ट है कि उनका ये दुराग्रह कहीं न कहीं उनकी ईष्‍या से अभिप्रेरित है। ऐसे में जदयू की धमकियां सहकर गठबंधन निर्वाह करने से बेहतर अपने रास्ते अलग कर लेना। जहां तक परीक्षण का प्रश्न है तो जद यू की विश्वसनीयता का आकलन राष्ट्रपति पद के चुनाव के वक्त ही हो गया था।
 
चुनावों में मुद्दे निश्चित तौर पर बड़े कारक साबित होते हैं। ऐसे में कांग्रेस के द्वारा एक के बाद लिये गये फांसी के निर्णयों ने सौ फीसदी ये मुद्दे भाजपा के हाथ से छीन लिये हैं। भाजपा प्रवक्ताओं द्वारा इसे देर से लिया निर्णय बताना वास्तव में जुबानी जमाखर्च से ज्यादा कुछ नहीं हैं। जनता उनके इन कोरे तर्कों से कत्तई प्रभावित नहीं होगी। इन विषम परिस्थितयों में जब लगभग सारे दल छद्म सेक्यूलरिज्म की चादर तले पांव पसारने को तैयार बैठे हैं, भाजपा को निश्चित तौर पर एक बड़े फैसले की दरकार है। ये फैसले प्रधानमंत्री पद का आधिकारिक उम्मीदवार घोषित करने से कम कुछ नहीं हो सकता है। लगातार भ्रष्टाचार, घोटाले और निकृष्ट राजनीति से आजिज आ चुकी जनता अब वास्तव में विकास केंद्रित शासन चाहती है। अतः अगर विकास की बात करें तो नरेंद्र मोदी से बड़ा प्रत्याशी आज पूरे देश में नहीं है। रही बात गुजरात दंगों की तो असम दंगों और उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों के दंगों के बारे में क्या कहा जाएगा? 
 
गुजरात दंगों के लिए यदि नरेंद्र मोदी को अछूत बताया जाता है तो यही व्यवहार अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों के संदर्भ में भी सत्य सिद्ध होनी चाहिए? जहां तक प्रश्न है न्याय का तो वास्तव में उसके दोहरे मापदंड तो कत्तई नहीं हो सकते। स्मरण रहे कि पार्टी विद डिफरेंस का दम भरने वाली भाजपा के प्रारंभिक नेता पं. दीन दयाल उपाध्याय की बात करें तो अपने एक 

संबोधन में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि, भाजपा सिद्धांत विहीन सत्ता संचालन के स्थान पर जीवन भर विपक्ष में बैठना पसंद करेगी। उनकी इन बातों का असर सभी को पता है। भाजपा आज एक बार फिर सिद्धांतों और सिंहासन के दोराहे पर खड़ी है। अब वक्त आ गया है भाजपा को अपने डिफरेंस प्रदर्शित करने का। ऐसे में सिर्फ इतना कहना ही समीचीन होगा कि भाजपा को अपनी प्रासंगिकता पहचाननी होगी। अंततः अब हवाएं ही करेंगी रोशनी का फैसला, जिस दीये में जान होगी वो दिया बच जाएगा।
 
लेखक सिद्धार्थ मिश्र स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. 

”हिंदुस्‍तान अखबार में नौकरी पानी है तो कंप्रोमाइज करो या फिर पैसे दो”

यशवंत सिंह जी, भड़ास4मीडिया, महोदय। सविनय निवेदन यह है कि मैं एक कवयित्री हूँ, अपनी कविताओं को सुनाकर कर अपना व अपने परिवार का जीवनयापन कर रही हूँ। मुझे मेरठ में हिन्दुस्तान अखबार में संपादक बताकर एक व्यक्ति, जिनका नाम करण कश्यप है, ने मुझसे हिन्दुस्तान अखबार में नौकरी लगवाने के नाम पर 2 लाख रुपये ठग लिए। मैंने कई जगह शिकायत की पर हर जगह से मुझे बैरंग ही वापस लौटना पड़ा। अब थक हार कर अंत में आपसे मदद मांग रही हूँ कि आप कृपया इसमें किसी स्तर पर मेरी मदद करें।  

कई लोगों ने मुझे बताया कि अब कहीं मदद मिल सकती है तो वो सिर्फ आपके पास से ही मिल सकती है। मैं काफी दुखी मन से ये लिख रही हूँ।  इस मेल में मेरा नाम पता सब है व साथ ही मैं वह शिकायत पत्र भी अटैच कर रही हूँ, जिसमें करण कश्यप के खिलाफ शिकायत पुलिस में की है, पर वहां से मुझे कोई मदद नहीं मिली। पुलिस ने मुझे ही यह कहकर भगा दिया कि वह (करण कश्यप) पत्रकार है, तूझे जीने नहीं देगा। चुपचाप अपने घर जाकर बैठ जा।
 
अस्मि सागर 
कामना, वैशाली,
गाज़ियाबाद, उत्‍तर प्रदेश 

‘दो दीनदयाल मिल जाते तो देश की तस्वीर बदल जाती’

: पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि 11 फरवरी के लिए लेख : महान दार्शनिक विचारक चिंतक अर्थशास्त्री इतिहासवेत्ता शिक्षाविद और पत्रकार के रूप में जिसे समूचे भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में जाना और पहचाना जाता था। समाज के आखिरी पायदान पर खड़े मजलूम व वंचितों के विकास के लिए जिनमें काफी गहरी तड़प और संवेदना थी। उनकी सोच यह थी कि जब समाज के निर्धनतम व्यक्ति के चेहरे पर खुशी के भाव उभरें तभी यह माना जा सकता है कि देश का सही मायने में विकास हो रहा है। एकात्म मानववाद की विचारधारा के प्रतिपादक थे। उनमें अदभुत संगठनात्मक क्षमता थी। उस महान शख्सीयत का नाम था पंडित दीनदयाल उपाध्याय।

उनके व्यक्तित्व की खूबियों को देखते हुए भारतीय जनसंघ के संस्थापक डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सन 1951 में यह टिप्पणी की थी कि यदि उन्हें दो दीनदयाल मिल जाते तो वे पूरे देश की राजनीतिक तस्वीर को बदलकर रख देते। वे भारत के लिए देश की क्षमताओं और संस्कृति को ध्यान में रखकर विकास का देशी माडल विकसित करने के पक्षधर थे। यही वह प्रमुख कारण था कि भारतीय जनसंघ ने हर हाथ को काम और हर खेत को पानी नारा बुलंद किया था। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी विचारधारा अब भी करोड़ों देशवासियों के मानस को झकझोर कर कुछ बेहतर करने की प्रेरणा दे रही है।

दीनदयालजी का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नगला चंद्रभान गांव में 25 सितंबर 1916 को हुआ था। उनके पिता भगवती प्रसाद प्रख्यात ज्योतिषाचार्य थे। उनकी माता रामप्यारी देवी बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। मात्र तीन साल की आयु में उनके सिर से पिता का साया विधि ने छीन लिया। आठ साल की आयु से पहले ही मां की भी मृत्यु हो गई। ऐसे में उनकी परवरिस मामा के संरक्षण व देखरेख में हुई। विपत्तियों का पहाड़ टूटने के बावजूद उनकी पढ़ाई मेधाशक्ति की बदौलत जारी रही। बाद में उन्होंने सीकर के हाईस्कूल से मैट्रीकुलेशन की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। सीकर के तत्कालीन महाराजा ने उन्हें स्वर्ण पदक देकर नवाजा। उन्होंने दीनदयालजी के लिए दस रूपए प्रतिमाह की छात्रवृत्ति और 250 रूपए की पुस्तकीय सहायता दी। उन्होंने पिलानी के बिड़ला कालेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। सन 1939 में उन्होंने कानपुर के सनातन धर्म कालेज से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में अंग्रेजी साहित्य से परास्नातक की डिग्री हासिल करने के लिए उन्होंने आगरा के सेंट जोंस कालेज में दाखिला लिया। परास्नातक प्रथम साल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली लेकिन दूसरे साल यानी फाइनल की परीक्षा में वे कतिपय घरेलू कारणों से शामिल नहीं हो सके। अपने मामा की सलाह पर वे प्राविंशियल सर्विसेज की परीक्षा में शामिल हुए परीक्षा पास कर ली। साक्षात्कार के बाद चुन भी लिए गए लेकिन उनकी रूचि प्रशासनिक सेवा में नहीं थी इसीलिए उन्होंने नौकरी नहीं ज्वाइन की।

समाजशास्त्र और दर्शनशास्त्र उनको बहुत भाता था। समाजसेवा के क्षेत्र में उतरने से पहले उन्होंने इनका गहन अध्ययन किया। सन 1937 में जब वे कानपुर में सनातन धर्म कालेज में अध्ययनरत थे तो इसी दौरान संयोगवश राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डाण् हेडगेवार से उनकी मुलाकात हुई। डाण् हेडगेवार ने उनको संघ की एक शाखा में बौदधिक विचार विमर्श के लिए बुलाया जिससे वे बडे़ प्रभावित हुए। सन 1942 में जब दीनदयालजी ने प्रयाग से बीटी की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली तो स्वयं संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम करने का फैसला किया। नागपुर में आयोजित 40 दिन के शिविर में उन्होंने संघ की कार्य रीतियों और उददेश्यों को गहराई से समझा और आत्मसात किया।बाद में जीवनपर्यंत संघ के प्रचारक के रूप में काम करने का संकल्प लिया।

उनमें आशावादिता कूट-कूटकर भरी हुई थी। साथ ही साथ सांगठनिक क्षमता भी अदभुत थी। उनके विचार लोगों को सम्मोहित कर देते थे। सन 1940 में लखनउ से उन्होंने राष्ट्रधर्म नामक पत्रिका की शुरुआत की। यह पत्रिका राष्ट्रवाद की विचारधारा को प्रसारित और प्रचारित करने की मंशा से निकाली गई थी। बाद में उन्होंने पांचजन्य और दैनिक स्वदेश की भी शुुरुआत कराई। सन 1951 में जब डाण् श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की तो दीनदयालजी को उत्तर प्रदेश इकाई का महासचिव बनाया गया। बाद में राष्ट्रीय महासचिव चुने गए। सन 1953 में जब डाण् मुखर्जी का निधन हो गया तो पार्टी को पूरे देश में विस्तार देने और उसकी आंदोलनात्मक गतिविधियों को तेज करने की जिम्मेदारी दीनदयालजी के कंधों पर आ गई।उन्होंने करीब 15 साल तक इस काम को बखूबी अंजाम दिया।

हालांकि वे चुनाव भी लड़े लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अलबत्ता वैचारिक प्रखरता के कारण विपक्षी भी उनका लोहा मानते थे। उनका मानना था कि भारत की अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर होनी चाहिए। गांवों को विकास की धुरी बनाया जाना चाहिए। विकेंद्रीकरण की नीति अपनाई जानी चाहिए। उनका मानना था कि ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिससे हर आम आदमी के हाथों को काम मिले। खाद्यान्न के उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वे हर खेत को पानी मुहैया कराने के प्रबल पक्षधर थे। उनकी सोच यह थी कि आजादी मिलने के बाद भारत पश्चिमी देशों की विकास की अवधारणा का अनुसरण कर विकास नहीं कर सकता है। आजादी के बाद देश की नीतियां पश्चिमी अवधारणा से प्रभावित हो गईं। नतीजतन ये देश की मूल जरूरत से भटक गई।

वे नई तकनीकी को अपनाना जरूरी मानते थे लेकिन उतनी ही मात्रा में जितनी देश को वास्तव में जरूरत हो। वे बेलौस अंदाज में कार्यकर्ताओं का आहवान करते थे कि जब सरकार की नीतियां अच्छी हों तो सहयोग करो और जब भी गलत जान पड़ें तो निर्भयतापूर्वक उनका मुखर विरोध करो। वे राष्ट्रप्रेम को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे। करोड़ों दिलों में राष्ट्रवाद की चेतना जगाने वाले इस महामानव को 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय स्टेशन के यार्ड में खड़ी एक रेलगाड़ी में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाया गया।

पंडितजी ने अपने जीवनकाल में हिंदी में चंद्रगुप्त नामक नाटक लिखा। शंकराचार्य की जीवनी लिखी। उन्होंने डाण् हेेडगेवार पर मराठी में लिखी गई पुस्तक का हिंदी में अनुवाद भी किया। वे कहा करते थे कि हमें अपनी राष्ट्रीय पहचान के बारे में विचार करना चाहिए। इसके बगैर स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। भारतीय समस्याओं की जड़ वे राष्ट्रीय पहचान न होने को ही मानते थे। उनका मत था कि अवसरवाद की सोच ने राजनीति के प्रति जनता के विश्वास को हिला दिया है।

उनका मानना था कि पश्चिमी विज्ञान और पश्चिमी जीवन दर्शन दो अलग.अलग बातें हैं। पश्चिमी विज्ञान सार्वत्रिक है जिसे हमें आगे बढ़ने के लिए अपनाना चाहिए लेकिन पश्चिमी जीवनशैैली व मूल्यों के संदर्भ में वैसा नहीं कर सकते हैं। स्वतंत्रता तभी अर्थपूर्ण होगी जब यह भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति के विस्तार का साधन बने।

लेखक उमेश शुक्ल जनसंचार व पत्रकारिता संस्थान, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी से संबद्ध हैं.

आनलाइन एडवाइस पोर्टल ‘एडवाइस अड्डा डॉट कॉम’ लांच

देश के किशोरों और युवाओं को उनकी तमाम तरह की समस्याओं को निजात दिलाने के मकसद से भारत का पहला आनलाइन एडवाइस पोर्टल लांच किया गया है। एडवाइस अड्डा डॉट  कॉम (AdviceAdda.com) नाम से लांच हुए इस वेबसाइट के जरिए युवाओं और किशोरों को शिक्षा, करियर, जॉब, प्रेम संबंध, सेक्स, स्वास्थ्य, फिटनेस, ब्यूटी या फैशन-लाइफस्टाइल से जुड़े तमाम मसलों पर एक्सपर्ट एडवाइस दी जाएगी।

आनलाइन एक्सपर्ट एडवाइस देने वाली देश की पहली वेबसाइट  एडवाइस अड्डा डॉट  कॉम (AdviceAdda.com) पर दी जाने वाली एक्सपर्ट एडवाइस बिल्कुल मुफ्त है यानि एक्सपर्ट की सलाह पाने के लिए अब किसी तरह का कोई शुल्क देने की भी जरुरत नहीं है। वेबसाइट होने की वजह से आपके पास एक सहूलियत ये भी है कि आप अपनी पहचान जाहिर किए बगैर अपनी समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं।

इस वेबसाइट  की शुरुआत उन लाखों-करोड़ों  किशोरों और युवाओँ को ध्यान  में रखकर किया गया है जो अपनी जिंदगी में तमाम तरह  की उलझनों और सवालों से बेहद परेशान है। एडवाइस अड्डा  डॉट कॉम (AdviceAdda.com) के एक्सपर्ट पैनल में देश के अलग-अलग क्षेत्रों के जाने माने एक्सपर्ट्स मसलन करियर काउंसलर, साइकोलॉजिस्ट, डॉक्टर, स्किन एवं हेयर एक्सपर्ट, स्त्री रोग विशेषज्ञ, हेल्थ एवं फिटनेस एक्सपर्ट, इनवेस्टमेंट एक्सपर्ट, गैजेट एक्सपर्ट जैसे तमाम विशेषज्ञ मौजूद हैं जो आपको आपकी समस्याओं से निजात दिलाने में मदद करेंगे।

एडवाइस अड्डा डॉट  कॉम (AdviceAdda.com) का मकसद समय के साथ बदलते सामाजिक ताने-बाने में दिनोंदिन उलझनों का शिकार हो रहे भारतीय किशोरों और युवाओं की जिंदगी में सुझाव का एक विकल्प देना है, जहां वो अपनी पहचान जाहिर किए बगैर मुश्किल से मुश्किल सवालों के जवाब हासिल कर सकते हैं वो भी अलग-अलग फील्ड के जाने माने एक्सपर्ट्स से। एडवाइस अड्डा डॉट  कॉम (AdviceAdda.com)  देश की पहली वेबसाइट है जहां किशोरों और युवाओं की जिंदगी से जुड़े हर पहलू पर कुछ न कुछ खास मिलेगा।

एडवाइस अड्डा डॉट कॉम का मकसद किशोरों और युवाओं को उन परेशानियों से निजात दिलाना है जिनकी वजह से आजकल किशोर और युवा तनाव और अवसाद का जीवन जीने को मजबूर हैं। अगर आपको कोई भी सवाल परेशान कर रहा है और आप उसे लेकर बेहद तनाव में हैं तो एक बार एडवाइस अड्डा डॉट कॉम पर जरुर जाएं, एक्सपर्ट से अपना सवाल पूछें और परेशानी से आजाद होने के एक नए और आसान तरीके का अनुभव करें।

प्रेस विज्ञप्ति

हंडिया के विधायक महेश नारायण सिंह की मौत

इलाहाबाद। दिल्ली से सूचना आ रही है कि समाजवादी पार्टी के नेता व इलाहाबाद के गंगापार स्थित हंडिया विधानसभा क्षेत्र के विधायक महेश नारायण सिंह ने लंबी बीमारी के बाद सोमवार को दम तोड़ दिया। विधायक सिंह कई महीने से बीमार थे। उन्हें गुर्दे के बीमारी की शिकायत थी। उनका इलाज एम्स दिल्ली में चल रहा था।

इलाहाबाद जिले के आसपास की राजनीति में महेश नारायण सिंह का नाम काफी जाना पहचाना था। करीब चार दशक के अपने राजनैतिक जीवन में महेश नारायण सिंह आजीवन समाजवादी विचारधारा से जुड़े थे। छात्र जीवन से राजनीति शुरू करने वाले महेश नारायण सिंह काफी तेज तर्रार नेता माने जाते थे। लोकप्रियता के चलते वे तीसरी बार विधायक चुने गए थे।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट

महाकुंभ में हेलीकाप्टर से फोटो खींच रहा फ्रांसीसी फोटोग्राफर हिरासत में, एफआईआर दर्ज

इलाहाबाद के महाकुंभ मेला से खबर है कि एक फ्रांसीसी फोटोग्राफर को हिरासत में लेकर उसकी तस्वीरें जब्त कर ली गई हैं. उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज किया गया है. साथ ही हेलीकाप्टर कंपनी के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की गई है. कुंभ मेला प्रशासन ने फ्रांसीसी फोटोग्राफर और हेलीकाप्टर कंपनी के खिलाफ सख्त कार्रवाई का मूड बना लिया है. फ्रांसीसी फोटोग्राफर हेलीकाप्टर पर सवार होकर रविवार को दोपहर शाही स्नान के समय घाट पर एकदम नीचे उड़ान भरकर बिना अनुमति तस्वीरें लेने लगा था.

इसकी वजह से वहां अफरा-तफरी मचने लगी थी और फिर अधिकारियों ने किसी तरह एयरफोर्स से हस्तक्षेप करके उसे हटवाया. कुंभ मेला मजिस्ट्रेट मनि प्रसाद मिश्र ने बताया कि फ्रेंच फोटोग्राफर को हिरासत में ले लिया गया है और तस्वीरें भी जब्त कर ली गई हैं. यह हेलीकाप्टर दोपहर करीब ढाई बजे सेक्टर बारह के ऊपर उड़ रहा था. अचानक वह एकदम नीचे आ गया. इलाहाबाद के कमिश्नर देवेश चतुर्वेदी ने बताया कि फोटोग्राफर और हेलीकाप्टर कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई है.

उनका कहना है कि इतने नीचे हेलीकाप्टर उड़ने से स्नान के लिए अपार जन समूह में कौतूहल और चिंता पैदा हो गई थी, नावें हिलने लगी थीं. इसलिए बमरौली एयरफोर्स स्टेशन को मैसेज करके उसे तुरंत जमीन पर उतारा गया और कैमरा जब्त करके एफआईआर दर्ज की गई. आगे के कदम के लिए एयरफ़ोर्स, भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार को लिखा गया है. अभी तक पूरे मामले को गोपनीय रखा गया है. एक पुलिस अफसर का कहना है कि उस समय संगम पर करोड़ों की भीड़ को संभालना अपने आप में एक चुनौती भरा काम था.

ऐसे में हेलकॉप्टर इतने नीचे आने से नाव हिलने लगी, और लोग इधर उधर भागने लगे. तब अफसरों के होश उड़े और तत्काल उसे हटाया गया. पुलिस महानिरीक्षक आलोक शर्मा का कहना है कि यह बहुत गंभीर मामला है और चूँकि यह एक बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है. प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के हवाले से घाट पर फोटोग्राफी मना कर रखी थी. आसमान से केवल एयरफ़ोर्स और सरकार के हेलीकाप्टर निगरानी के लिए काफी ऊंचाई पर उड़ान भर रहे थे.

गोल्फ प्रीमियर लीग की चैंपियन बनी ‘उत्तराखंड लॉयन्स’

 

: सीएम विजय बहुगुणा समेत कई लोगों ने दी बधाई : गोल्फ प्रीमियर लीग में उत्तराखंड लॉयन्स की टीम ने झंडे गाड़ते हुए चैंपियन्स ट्रॉफी पर कब्जा कर लिया है। माइनस 34 अंकों के साथ उत्तराखंड लॉयन्स ने दमदार खेल दिखाया और दिल्ली एवं पंजाब जैसी धुरंधर टीमों को पछाड़ते हुए गोल्फ प्रीमियर लीग 2013 के खिताब पर कब्ज़ा जमा लिया।
पुणे के एंबी वैली में हुए इस कड़े मुकाबले के पहले राउंड में पिछड़ने के बाद उत्तराखंड लॉयन्स ने दूसरे राउंड में शानदार वापसी की और तीसरी पोजीशन पर जा पहुंचीं। तीसरे और आखिरी राउंड में डारेन क्लार्क और चपचई निरात ने दमदार खेल दिखाया और नतीजों को आखिरी शॉट तक खींच ले गए। बस, यही वो पल था जब विनिंग शॉट उत्तराखंड लॉयन्स के खाते में आ गया और एक नया इतिहास बन गया। उत्तराखंड लॉयंस ने डैरेन क्लार्क और चपचई निरात तथा मुकेश कुमार और शंकर दास का असरदार कॉम्बिनेशन बनाया और चैंपिन्स ट्रॉपी को देवभूमि का नाम लिखवा दिया।
 
दूसरे नंबर पर संयुक्त रुप से पंजाब लांसर्स और दिल्ली डार्ट्ज़ रहे। दोनों ही टीमों ने माइनस 33 प्वाइंट्स स्कोर किए। जबकि यूपी ईगल्स माइनस 32 प्वाइंट्स के साथ चौथे नंबर पर रही। 'उत्तराखंड लॉयंस' ने अपनी टीम में पूर्व वर्ल्ड चैंपियन डैरेन क्लार्क और एशियन चैंपियन चपचाई निरात को शामिल किया था। इसके अलावा शंकर दास और मुकेश कुमार भी टीम की रीढ़ बने थे। टीम के पैरेंटल ओनर्स न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया के संस्थापक उमेश कुमार और GTM बिल्डर्स के MD तुषार कुमार ने खुशी जताई है। उन्होंने कहा कि इससे उत्तराखंड में गोल्फ खेल एक विकल्प के तौर पर डेवलप होगा।
 
इस शानदार जीत के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने उमेश कुमार को फोन कर के बधाइयां दी और समाचार प्लस चैनल पर ऐलान किया कि सूबे में वापस लौटने पर टीम का शानदार स्वागत किया जाएगा। केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने भी खुशी जताई है। पूर्व मुख्यमंत्रियों भगत सिंह कोश्यारी और बीसी खंडूड़ी ने कहा है कि उमेश कुमार की टीम ने उत्तराखंड का मान बढ़ाया है और प्रदेश में गोल्फ को बड़े स्तर पर डेवलप किया जाना चाहिए। उधर, उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से कैबिनेट मंत्री राम आसरे कुशवाहा ने भी उत्तराखंड लायन्स टीम को ढेरों बधाइयां दी हैं।

निर्मलेंदु को ‘चौथी दुनिया’ में शरण, ईश्वर का पंजाब केसरी और मयंक व मनोज का हिंदुस्तान से इस्तीफा

निर्मलेंदु साहा को फिलहाल चौथी दुनिया में ठिकाना मिल गया है. कुछ वर्षों में साहा ने कई अखबारों चैनलों को पकड़ा छोड़ा है. पिछले दिनों तक वे हम वतन अखबार में थे. देखना है कि वे चौथी दुनिया और संतोष भारतीय के साथ कितने दिनों तक निभा पाते हैं. निर्मलेंदु साहा जहां जहां गए, वहां वहां आंतरिक राजनीति ने खूब जोर पकड़ा और अंततः या तो अखबार को बंद होना पड़ा या फिर खुद साहा को विदा होना पड़ा.

पंजाब केसरी, रोहतक से खबर है कि वरीय संवाददाता ईश्वर सिंह ने इस्तीफा दे दिया है. वे करीब पिछले दो वर्षों से रोहतक में अखबार को अपनी सेवाएं दे रहे थे. बताते हैं कि पारिवारिक कारणों से वे करीब एक माह से छुट्टी पर चल रहे थे. इस्तीफा देने का कारण भी यही बताया जा रहा है. पंजाब केसरी में वे क्राइम के अलावा अन्य महत्वपूर्ण बीट की जिम्मेदारियां संभाल रहे थे. इससे पूर्व ईश्वर सिंह गोरखपुर में खबर इंडिया डाट काम, स्वतंत्र चेतना व जनसत्ता एक्सप्रेस अखबार में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. बताते हैं कि वे गोरखपुर में ही अपनी नई पारी की शुरुआत करेंगे.

मेल के जरिए मिली एक अन्य सूचना के मुताबिक हिंदुस्तान, बरेली से मयंक चतुर्वेदी और मनोज त्रिपाठी ने इस्तीफा दे दिया है. हिंदुस्तान, बरेली से इस्तीफा के सिलसिला तेज हो चुका है. कुछ अन्य लोगों के जाने के आसार हैं.

दैनिक भास्कर, चंडीगढ़ से सूचना है कि सिटी एडिटर दर्पण चौधरी के इस्तीफे के बाद हिमाचल दस्तक से अधीर रोहल को लाया गया है और उन्हें नया सिटी चीफ बनाया गया है. दर्पण चौधरी ने पिछले दिनों इस्तीफा देकर पंजाब केसरी ज्वाइन कर लिया था.

देवास प्रेस क्लब का चुनाव संपन्न, सिकरवार निर्विरोध अध्यक्ष बने

देवास। प्रेस क्लब देवास के चुनाव शहर के सर्किट हाउस पर संपन्न हुए। सोमवार को हुए इस चुनाव में अनिल राज सिंह सिकरवार निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित हुए। प्रेस क्लब के समस्त सदस्यों ने एकमत से श्री सिकरवार के पक्ष में अपनी राय व्यक्त की। इसी तरह परंपरानुसार प्रेस क्लब के सदस्यों ने अन्य पदों के लिए भी पदाधिकारियों का निर्विरोध चुनाव किया। उपाध्यक्ष पद के लिए वरिष्ठ पत्रकार मुन्ना वारसी, सचिव सुभाष मोदी, संयुक्त सचिव नितिन गुप्ता, कोषाध्यक्ष अकरम शेख तथा कार्यकारिणी सदस्यों में तरुण मेहता, असलम खान, अतुल बागलीकर, विनोद जैन, खूबचंद मनवानी, अरविंद टेलर, आलोक त्रिवेदी का चयन किया गया।

बैठक में निर्णय हुआ कि प्रेस क्लब का विस्तार समय रहते किया जाएगा। इस हेतु पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय व सम्मानित नामों को प्रवेश हेतु प्रेरित किया जाएगा। सदस्यता अभियान के अंतर्गत आवेदन पत्र 15 फरवरी से मैनाश्री कॉम्प्लेक्स स्थित प्रेस क्लब कार्यालय से प्राप्त हो सकेंगे। सदस्यता हेतु नियम व शर्तों का पालन करने की बात भी सर्वसम्मति से पारित हुई। बैठक में वरिष्ठ पत्रकार रमेश तलरेजा, अतुल शर्मा, रशीद पठान, अरविंद त्रिवेदी, गिरीश गोयल, मनीष व्यास, मयूर व्यास आदि मौजूद थे। चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद देवास के पत्रकारिता क्षेत्र के तथा सामाजिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोगों ने निर्वाचित पदाधिकारियों का स्वागत किया।

चुनाव संपन्न होने के बाद नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने खेड़ापति हनुमान मंदिर पहुंचकर आशीर्वाद लिया। इसके बाद सभी पत्रकारों, प्रतिष्ठत लोगों ने नवनिर्वाचित अध्यक्ष व अन्य पदाधिकारियों का भव्य स्वागत किया। यहां पर ढोल ढमाकों के साथ जमकर आतिशबाजी की गई व मिठाई बांटी गई। तत्पश्चात खेड़ापति मंदिर से एक स्वागत जुलूस निकाला गया, जो सयाजी द्वार होते हुए चामुण्डा कॉम्प्लेक्स पहुंचा। यहां पर भी जमकर अतिशबाजी की गई व मिठाई बांटी गई। तत्पश्चात यह जुलूस मैनाश्री कॉम्प्लेक्स पहुंचा, जहां शुभचिंतकों ने आतिशबाजी कर अपनी खुशी का इजहार किया। मैनाश्री कॉम्प्लेक्स स्थित कार्यालय पहुंचने के बाद नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री सिकरवार ने हस्ताक्षर कर विधिवत पदभार ग्रहण किया। इस अवसर पर हिमांशु राठौर, समाजसेवी महेन्द्र चौहान प्रिंस, पत्रकार ललित शर्मा, शारिक अख्तर दुर्रानी, शकील खान, सौरभ सचान, अनिल जोशी, अमिताभ शुक्ला, चेतन राठौर, अरुण परमार, विशाल जलोरे, संदीप वर्मा, अरविंद चौकसे, बाबू शेख, शेखर कौशल सहित बड़ी संख्या में शुभचिंतक उपस्थित थे।
 

लखनऊ से ‘दिव्यता’ मासिक पत्रिका मार्च के पहले सप्ताह से प्रकाशित होगी

लखनऊ : दिव्यता पब्लिकेशन, लखनऊ की पहली मासिक मासिक पत्रिका "दिव्यता " मार्च के पहले सप्ताह में बाज़ार में उपलब्ध होगी। यह जानकरी देते हुए "दिव्यता" पत्रिका के प्रधान संपादक प्रदीप श्रीवास्तव ने बताया कि "दिव्यता " मासिक आम पत्रिकाओं से जरा हट कर होगी क्योंकि इसमें ख़बरों के साथ-साथ घर-परिवार के सभी सदस्यों की जिज्ञासा को पूरा किया जाएगा। उनका कहना है कि यह पत्रिका कुछ वर्षों पहले बंद हो चुकी दो साप्ताहिकों की खानापूर्ति का प्रयास करेगी जिससे पाठकों को सभी तरह की जानकारियां एक जगह ही मिल सके।

श्रीवास्तव का कहना है कि "दिव्यता "मासिक अपने पाठकों को  नवीनतम समाचार फीचरों के साथ कहानी, कवितायेँ, धर्म, संस्कृति, खेल, व्यापार समेत वह सभी तरह की सामग्रियां अपने पाठकों को  उपलब्ध कराएगी, जिससे उनकी जिज्ञासा का समाधान हो सके। उन्होंने बताया की इस पत्रिका का मूल्य केवल बीस रुपये होगा, यद्यपि बाजार में इतनी कम कीमत की गिनीचुनी पत्रिकाएं ही हैं, लेकिन  दिव्यता अपने आम पाठकों तक अपनी पहुँच बना सके, इसलिए कम कीमत राखी गई है। लगभग अस्सी पृष्ठों की यह पत्रिका बहुरंगीय होगी। "दिव्यता" मार्च के पहले सप्ताह में देश के सभी प्रमुख बुक स्टालों पर उपलब्ध होगी।
 

कुंभ में पापियों के पाप धोने और फिर पापी होने की परंपरा

हमारे नेता और अभिनेता, सारे के सारे अचानक जाग गए हैं। कुंभ जा रहे हैं। हर हर गा रहे हैं। इलाहाबाद में छा रहे हैं। गंगा में नहा रहे हैं। और पाप बहा रहे हैं। जी हां, पाप। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक कुंभ के पवित्र स्नान से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं। फिर यह कुंभ तो पूरे 144 साल बाद आया है और इतने ही सालों बाद वापस आएगा। यह भी कहते हैं कि  कुंभ में नहाने से सौ गंगा स्नान का पुण्य मिलता है। फिर कुंभ अगर 144 साल बाद वाला खास हो तो उसके तो कहने ही क्या। निश्चित रूप से उसमें तो हर किस्म के पाप धुल ही जाते होंगे।

नेता इसीलिए जा रहे हैं। अभिनेता भी इलाहाबाद इसीलिए आकर नहा रहे हैं। अभिनेता और नेता यह कभी नहीं कहेंगे कि वे कुंभ में नहाकर अपने पाप धो रहे हैं। लेकिन अपना मानना है कि वहां नहाने का नया पाप करने अवश्य पहुंचे हैं। नया पाप… जी हां नया पाप। नया इसलिए कि उनके नहाते ही पुराने पापों का मुलम्मा तो भले ही उतर जाएगा। लेकिन गंगा स्नान का जितना जोरदार प्रचार करके उसका राजनीतिक और व्यापारिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है, उससे साफ लगता है कि मंशा उनकी पुण्य कमाने की तो कतई नहीं है। और यह एक नया पाप नहीं तो क्या है। वैसे भी राजनीति और फिल्मों की मायावी दुनिया का सारा का सारा नफा नुकसान कुल मिलाकर सिर्फ और सिर्फ एक सफलता पर ही निर्भर करता है। फिर सफलता चाहे किसी एक फिल्म को हिट करने की हो या राजनीति में अपनी एक गोटी को फिट करने की। मंशा कुल मिलाकर सिर्फ और सिर्फ व्यावहारिक है। इसलिए हमारे नेताओं और अभिनेताओं के कुंभ स्नान के पीछे कोई धार्मिक आस्था या पुण्य कमाने की परंपरागत लालसा तो कतई नहीं दिखती।

पिछले अध्यक्षीय काल में शत प्रतिशत असफल रहने का तगमा उतारने के लिए बीजेपी के दुबारा अध्यक्ष बनकर सफल होने को तरस रहे राजनाथ सिंह कुंभ में नहाए। राजस्थान में सीएम की कुर्सी पर दुबारा बैठने के ख्वाब को सजाकर मैदान में उतरी महारानी वसुंधरा राजे भी कुंभ में नहाईं। बीजेपी के मुख्तार अब्बास नकवी भी डुबकी लगा आए। कोयले की दलाली के कलंक की कालिख से सने श्रीप्रकाश जायसवाल सहित उसी कोयले के दागी सुबोधकांत सहाय भी कुंभ में डुबकी लगाने आए। सहाय तो न केवल नहाए, बल्कि यह भी कह आए कि कुछ अवसरवादी राजनेता भारत के इस पवित्रतम धार्मिक अवसर को भी राजनीति का अखाड़ा बनाए हुए है। सहाय इलाहाबाद में यह भी बोले कि वे अब धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं होने देंगे। सहाय और भी बहुत कुछ बोले। लेकिन अब आप ही बताइए कि वे खुद कुंभ में क्या करने आए थे। बहुत सारे और नेता भी कुंभ में डुबकी लगा आए।

हमारी परंपरा में जिस सास को हमारे देश में मां की तरह पूजा जाता है, उस पवित्र रिश्ते को खलनायिका के अवतार में परोसनेवाली फिल्म निर्माता एकता कपूर भी कुंभ नहा आई। लगातार सत्ताइस किस करने के बावजूद एक सांस तक न लेनेवाले इमरान हाशमी तो खैर परदे के आगे और पीछे दोनों तरफ अनेकों पाप करते रहे हैं, सो मान लिया जाए कि उनको अपने पाप धोने की बहुत जरूरत थी। लेकिन राज कुंद्रा के बीस साल पुराने गृहस्थी के तंबू को उजाड़ते हुए उनकी पत्नी को खदेड़कर राज की दूसरी पत्नी बनने का पुण्य करनेवाली शिल्पा शेट्टी पता नहीं अपने कौनसे वाले जनम का पाप धोने कुंभ आई थी। वैसे अपन ने कोई ठेका नहीं ले रखा है, कि नेताओं और अभिनेताओं के पापों का हिसाब किताब रखें। लेकिन हर साल लाखों शिवलिंग बनाने वाले अभिनेता राजपाल यादव,  भगवान शंकर के परम उपासक अभिनेता आशुतोष राणा एवं मसखरे राजू श्रीवावस्त के बारे में अपन कतई नहीं जानते कि उनने क्या पाप किए, सो कुंभ नहाए। पाप अपन से भी हुए होंगे, पर कुंभ नहाने आज तक कभी नहीं गए। जाना भी नहीं चाहते। क्योंकि डर यह है कि शिल्पा शेट्टियों और इमरान हाशमियों के नहाए पानी में नहाने से कहीं उनके पाप अपने पर न चढ़ जाएं। 

निरंजन परिहार का विश्लेषण.

39 वर्ष जीने वाले स्वामी विवेकानंद ने 31 बीमारियों को यूं झेला

आज देश-दुनिया में सबसे अधिक मोटिवेशन (प्रेरणा) की बात होती है. पग-पग पर. मशीन या टेक्नालॉजी (तकनीक) की इस आधुनिक दुनिया में अकेलापन नियति है. जीवन का अर्थ ढूंढ़ना भी. जीने या होने (बीइंग) का आशय समझना. जीने का मर्म तलाशना भी. इस नयी दुनिया में पल-पल निराशा, हताशा और डिमोटिवेटिंग फोर्सेस (उत्साह सोखनेवाली ताकतें) से लड़ना आसान नहीं. इस युग का दर्शन है कि या तो धारा के साथ बहें, समय का गणित मानें, पैसे-पावर के खेल में हों या जीवन भोग में डूब कर जीयें या कथित सफलता के लिए आत्मसम्मान गिरवी रखें, चारण बनें. या फिर अपनी अंतरात्मा से जीयें, तो अकेले अपनी राह बनायें. दरअसल, संकट सबसे अधिक अंतरात्मा से जीनेवालों को है.

नयी पीढ़ी के युवकों-विद्यार्थियों में भी बड़ी बेचैनी है. उनकी परेशानियां अलग हैं. तीव्र स्पर्धा के बीच जगह बनाना. आइआइटी से लेकर अन्य बड़े संस्थानों के युवा छात्रों के बीच बढ़ती आत्महत्या, भारतीय समाज के लिए बड़ी चुनौती है. मनुष्य के दुख को भी इस युग ने बाजार बना दिया है. निराशा, हताशा का धंधा. आज हजारों मोटिवेटर (प्रेरित करनेवाले) पैदा हो गये हैं. यह बिलियन (अरबों-खरबों) डॉलर का उद्योग बन गया है. इनके बीच अनेक जाने-माने लोग हैं, जो अच्छा काम कर रहे हैं, पर भारतीय समाज को प्रेरणा पाने के लिए या संकल्प लेने के लिए मोटिवेशन इंडस्ट्री (प्रेरणा बाजार) की जरूरत नहीं है.

विवेकानंद की हम 150वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. वह महज 39 वर्ष जीये. पर कई हजार वर्षों का काम कर गये. इस छोटी आयु में. उनके जीवन को नजदीक से देखने-समझने पर लगता है कि परेशानियों, चुनौतियों, मुसीबतों के पहाड़ के बीच वह पैदा हुए. पल-पल जीये. आजीवन इनसे ही घिरे रहे. फिर भी हैरत में डालनेवाले, स्तब्ध कर देनेवाले काम वह कर गये. यकीन नहीं होता कि भारी मुसीबतों के बीच एक इंसान की इतनी उपलब्धि.

आज लोग अपने जीवन से लेकर सामाजिक जीवन में जो चुनौतियां झेलते हैं, वे विवेकानंद की परेशानियों के मुकाबले एक रत्ती भी नहीं हैं. उनके शरीर को ‘व्याधिमंदिरम’ कहा गया. जब तक वह जीये, बीमारियों से जूझे. उन्हें दो बड़ी बीमारियां तो वंशगत मिलीं. कहें, तो विरासत में. पहला मधुमेह और दूसरा हृदय रोग. अचानक पिता के न रहने के बाद से हमेशा ही उनके सिर में तेज दर्द की समस्या रही. उस दर्द से राहत पाने के लिए वह कपूर सूंघते थे. कहते हैं कि पूरे जीवन में उन्हें 31 बीमारियां हुईं. इनमें हृदय रोग, मधुमेह, दमा, पथरी, किडनी की समस्या, अनिद्रा, स्नायु रोग या न्यूरोस्थेनिया, लिवर संबंधी बीमारी, डायरिया, टाइफॉयड, टॉनसिल, सिर का तेज दर्द, मलेरिया, सर्दी-खांसी, विभिन्न प्रकार के बुखार, बदहजमी, पेट में पानी जमना, डिस्पेप्सिया, लाम्बेगो या कमर दर्द, गर्दन का दर्द, ब्राइट्स डिजीज, ड्रॉप्सी या पैर का फूलना, एल्बूमिनियूरिया, रक्तिम नेत्र, एक नेत्र की ज्योति का चले जाना, असमय बाल व दाढ़ी का सफेद होना, रात को भोजन के बाद गरमी का तीव्र अनुभव, गरमी सहन न कर पाना, जल्द थकना, सी सिकनेस व सन स्ट्रोक शामिल हैं.

समय-समय पर अपने परिचितों-मित्रों को उन्होंने पत्र लिखे. उन पत्रों में इन बीमारियों का उल्लेख है. कल्पना करें, इतनी बीमारियों से घिरे होने के बावजूद उस संन्यासी ने इतने कम समय में कैसे-कैसे काम किये? नितांत अविश्वसनीय. युगों-युगों तक असर डालनेवाले. 1897 में डाक्टर शशि घोष को अल्मोड़ा से उन्होंने पत्र लिखा. अनिद्रा रोग के संदर्भ में. पत्र में वह कहते हैं, ‘जीवन में कभी भी मुझे बिस्तर पर जाते ही नींद नहीं आयी. कम से कम दो घंटे तक इधर-उधर करना पड़ता है. केवल मद्रास से दाजिर्लिंग की यात्रा और प्रवास के पहले महीने में तकिये पर सिर रखते ही नींद आ जाती थी. वह सुलभ निद्रा पूरी तरह चली गयी है. अब फिर इधर-उधर करने की बीमारी और रात को भोजन के बाद गरमी लगने की समस्या लौट आयी है.’ बाद में एक संन्यासी शिष्य स्वामी अचलानंद को उन्होंने कहा, होश संभालने के बाद कभी भी मैं चार घंटे से अधिक नहीं सो सका.

इलाज के लिए स्वामी जी, चिकित्सकों के पास गये. उनके जीते जी मेडिकल साइंस का इतना विकास और विस्तार नहीं हुआ था. इलाज के लिए स्वामी जी एलोपैथ, होम्योपैथ, देशज वैद्यों के अलावा देश-विदेश में झोलाछाप डाक्टरों या मामूली डाक्टरों के पास भी गये. वह लगातार आर्थिक तंगी में रहे. डाक्टरों को फीस देने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं होते थे. एक बार सन् 1898 में वह डाक्टर केएल दत्त के पास गये. दिखाने के बाद डाक्टर ने 40 रुपये फीस की मांग की. साथ में दवा के लिए अतिरिक्त दस रुपये. स्वामी जी को वह देना पड़ा. उन दिनों पचास रुपये की कीमत क्या थी, इसका आकलन संभव है. उनके गुरुभाइयों ने बड़ी कठिनाई से इसका बंदोबस्त किया.

घर की परेशानियों से भी स्वामी जी आजीवन व्यथित-दुखी रहे. अपनी बीमारियों से अधिक वह अपनी मां, भुवनेश्वरी देवी के लिए बेचैन और परेशान रहे. कहते हैं, जब तक पिता विश्वनाथ दत्त जीवित थे, उनके परिवार का मासिक खर्च था, लगभग एक हजार रुपये. वर्ष 1884 में उनकी मौत के बाद स्वामी जी की मां, भुवनेश्वरी देवी ने वह खर्च घटा कर तीस रुपये तक ला दिया. अचानक आयी मुसीबत और दरिद्रता के बीच भी भुवनेश्वरी देवी का असीम धैर्य अपूर्व था. इधर स्वामी जी में आजीवन मां को सुख न दे पाने की पीड़ा रही. मां, पल-पल गरीबी में समय काटती थी. उनके लिए पैसे का प्रबंध करना, स्वामी जी के लिए सबसे कठिन था. इसका एहसास भी उन्हें आजीवन रहा. एक जगह उन्होंने कहा भी है, ‘जो अपनी मां की सच में पूजा नहीं कर सकता, वह कभी भी बड़ा नहीं हो सकता.’

स्वामी जी को परेशानियों की महज कल्पना या झलक सिहरन पैदा करती है, पर इनके बावजूद उन्होंने वे काम किये, जो भारत हजारों-हजार वर्ष तक याद रखेगा. इस इंसान से बढ़ कर दूसरा कौन बड़ा प्रेरक है, मानव समाज के लिए? पारिवारिक जीवन की भारी मुसीबतें, निजी जीवन में रोगों से परेशान फिर भी दूसरों के लिए, समाज के लिए, भारत माता के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देना और जीवन झोंक देना. इससे बड़ा आदर्श चरित्र आज की युवा पीढ़ी के लिए दुनिया में कौन होगा? अनेक इतिहास नायक हुए हैं, बड़े लोग हुए है, जिनकी कुरबानियों और संघर्ष ने संसार को यहां तक पहुंचाया, पर अभावों से इस तरह गुजरते हुए इतना कुछ कर जाने वाले इंसान बहुत कम हुए हैं.

अवसर है कि जब देश, स्वामी विवेकानंद की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब घर-घर तक उनके पुरुषार्थ, संकल्प और संघर्ष की बात पहुंचे. उनके जीवन को लोग जानें, ताकि देश में एक नया मनोबल पैदा हो. खासतौर से युवाओं के बीच स्वामी जी का संदेश पहुंचना जरूरी है. उनके जीवन के ‘मिशन और विजन’ (ध्येय और दृष्टि) से ही भारत की युवा पीढ़ी जीने का अर्थ तलाश-जान सकती है. वह एक व्यक्ति हैं, जो भारत के सामाजिक -आर्थिक -सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में टर्निग प्वाइंट (मोड़ देनेवाले) हैं. इतिहास अब तक सेनाएं या सम्राट मोड़ते रहे हैं, एक फकीर-संन्यासी नितांत अभावों मे जीता इंसान, गरीबी से त्रस्त, बीमारियों से घिरा, पर मुल्क का इतिहास मोड़ दिया.

रजवाड़ों में बंटे भारत में एक देश होने का भाव भरा. हजारों वर्ष से चली आ रही भारत की आध्यात्मिक एकता (भौगोलिक नहीं) को एक नयी ऊर्जा दी. वह भारतीय ताना-बाना मजबूत बना. उनके होने और काम के बाद ही भारतीय जीवन के हर क्षेत्र में एक नयी चेतना का विस्तार हुआ. जब देश दास था, तब एक अकेला इंसान, विवेकानंद के रूप में खड़ा हुआ, और भारत के जगद्गुरु होने की भविष्यवाणी की. भारत की पहचान को एक नयी संज्ञा दी. आज विवेकानंद के लिए नहीं, अपने होने का मतलब-मकसद जानने के लिए उनका स्मरण जरूरी है.

आज भारत को सबसे अधिक किस चीज के जरूरत है? विवेकानंद के शब्दों में, ‘भारत को समाजवादी अथवा राजनीतिक विचारों से प्लावित करने के पहले आवश्यक है कि उसमें आध्यात्मिक विचारों की बाढ़ ला दी जाये. सर्वप्रथम, हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों मे जो अपूर्व सत्य छिपे हुए हैं, उन्हें इन सब ग्रंथों के पन्नों के बाहर निकाल कर, मठों की चहारदीवारियां भेद कर, वनों की शून्यता से दूर लाकर, कुछ संप्रदाय-विशेषों के हाथों से छीन कर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा, ताकि ये सत्य दावानल के समान सारे देश को चारों ओर से लपेट लें-उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक सब जगह फैल जायें- हिमालय से कन्याकुमारी और सिंधु से ब्रह्मपुत्र तक सर्वत्र वे धधक उठें. सबसे पहले हमें यही करना होगा.’

हरिवंश(विवेकानंद साहित्य भाग – 5, पृष्ठ 115-116 और विवेकानंद साहित्य के मर्मज्ञों, संन्यासियों से मिली सूचनाओं-तथ्यों के आधार पर)


लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा कुछ समय पहले प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.

चीन इस उपमहाद्वीप में एकमात्र गेम चेंजर है, जरा उसकी औकात तो आंकिए

अब राजनीति और जनता, आगे बढ़ गये हैं. देश पीछे छूट गया है. देश के हालात, अब राष्ट्रीय मुद्दे नहीं बनते. न मुल्क को बेचैन करते हैं. देशप्रेम की बात पुरातनपंथी है. अप्रगतिशील और पिछड़े मानस की पहचान. राष्ट्रीय मुद्दे क्या हैं? राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी? अपनी सत्ता, अपना स्वार्थ, अपने को महानतम सिद्ध करने की होड़? बाजार के भोग में डूबे युवा वर्ग के बीच फैशन, फ्रेंडशिप वगैरह पर फेसबुक पर होते विवाद. इन सबके बीच भारत मुल्क कहां खड़ा है? उसका भविष्य क्या है? इसी सप्ताह की खबर है. चीन, भारत को चौतरफा घेर चुका है. पाकिस्तान ने एक फरवरी को ग्वादर पोर्ट (बंदरगाह) को बनाने और विकसित करने का काम चीन को सौंप दिया है. पाकिस्तान की इच्छा है कि चीन इस बंदरगाह को नौसैनिक अड्डा भी बना दे.

पाकिस्तान ने इस काम के लिए तय कुल 1331 करोड़ रुपये के 75 फीसदी का भुगतान भी चीन को कर दिया है. मालदीव के मराओ में चीन उपस्थित है. 1991 में मालदीव ने इस द्वीप को चीन को लीज पर दिया. श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट पर चीन मौजूद है. डीप-वाटर पोर्ट बनाने का काम लेकर. भारत के रणनीतिक हिसाब से यह बंदरगाह बेहद महत्वपूर्ण है. भारत के मालवाहक जहाज और नौसेना के जहाज भी इधर से गुजरते हैं. बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह में चीन मौजूद है. उसने बांग्लादेश को चटगांव पोर्ट के विस्तार के लिए लगभग 47,000 करोड़ रुपये की मदद की है. चीनी नौसेना के लड़ाकू जहाज यहां आते हैं. इस बंदरगाह से बांग्लादेश का 90 फीसदी व्यापार होता है. म्यामांर (बर्मा) के शीतबे बंदरगाह का अलग सितम है. इसे एक भारतीय कंपनी ने लगभग साढ़े छह सौ करोड़ रुपये में तैयार किया. पर इस बंदरगाह से ज्यादा लाभ चीन ले रहा है. नेपाल में चीन की उपस्थिति अलग है. जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल तक चीन, भारतीय सीमा पर तीन तरह से उपस्थित है. अच्छी, मजबूत और चौड़ी सड़कें बना कर. कई हवाई अड्डे बना कर. कई जगहों पर रेल लाइनें बिछा कर.

अब चीन, भारत की सेना की हर कोशिश विफल करने की स्थिति में है. वह हवाई मार्ग और समुद्र मार्ग से 70 हजार चीनी सैनिकों को एक पहल पर, एक जगह जुटा सकता है और भारत? सिर्फ समुद्री रास्ते महज तीन हजार सैनिकों को एक पहल में एकजुट कर सकता है. यानी 70 हजार बनाम तीन हजार का मुकाबला? पिछले सप्ताह ही चीन ने अपने वाई-20 वायुयान का परीक्षण किया है. देश में ही बना वायुयान. 66 टन भार ढोनेवाला. इस तरह चीन, तीस हजार सैनिकों को अपने हवाई बेड़े से ढो सकता है. साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ सड़कें और हवाई अड्डे, भारत-चीन सीमा पर चीन ने बना दिये हैं. आज चीन इस उपमहाद्वीप में एकमात्र निर्णायक हैसियत (गेम चेंजर) है.

रूस ने अपना मालवाहक आइएल-76 जहाज चीन को नहीं दिया, चीन ने इसके जवाब में वाई-20 तैयार कर लिया. चीन बारह बड़े जलपोतों का निर्माण कर रहा है. बीस हजार टन से अधिक भार के, जो सेना के तीन डिविजनों यानी तीस हजार सैनिकों को ढो सकते हैं. इससे भारत अपने ही समुद्री क्षेत्र में चीन से मात खा जायेगा. इनके अलावा चीन ने दो लैंडिंग प्लेटफार्म डाक्स भी भारतीय समुद्री इलाके में लगाये हैं, जिनमें दस हजार सैनिक, टैंक और लड़ाई के हेलीकाप्टर रह सकते हैं. इन सबके मुकाबले भारत के पास महज एक जहाज है, आइएनएस जलाश्व. यह जहाज महज तीन हजार सैनिकों को ढो सकता है. यह भी अमेरिका से खरीदा गया है.

भारतीय सीमा में लद्दाख और अरुणाचल के क्षेत्र में खराब नेटवर्क, सड़कों का न होना, अलग गंभीर मुद्दे हैं. चीन की लगातार तेजी से विकास करती अर्थव्यवस्था, नौसेना और वायुसेना की मारक क्षमता में स्तब्धकारी विस्तार भारत के लिए शुभ नहीं है. भारतीय समुद्र में स्थित मालदीव और सेसेल्स द्वीप जैसे देशों से चीन ने प्रगाढ़ रिश्ते बना लिये हैं. अब ये छोटे द्वीप भी भारत को आंख दिखा रहे हैं. आज चीन समुद्री जहाज बनाने में दुनिया में दूसरे नंबर पर है. क्षमता और विस्तार के हिसाब से. अब भारत को भारतीय समुद्र में ही चीन ने घेर लिया है. घर में ही भारत घिर चुका है.

न्यूयार्क टाइम्स में हाल में छपे एक लेख में स्टीवन रैटनर ने भारत और चीन की तुलना की है. काफी खोज और परिश्रम के बाद रैटनर का निष्कर्ष है कि हर मापदंड पर भारत, चीन से बहुत पीछे है. चीन ने 21 वीं शताब्दी में छलांग लगा ली है. झपट कर आगे बढ़ गया है. पर भारत अब भी 21 वीं सदी में घुसने में ही पछाड़ खा रहा है. लंगड़ा और लड़खड़ा रहा है. भाव है कि एक चीते की तरह छलांग लगा चुका है, दूसरा कछुए की चाल में भी नहीं है.

अर्जुन की नजर की तरह चीन ने एक झटके में ही अपने भविष्य के निर्माण में अपनी ताकत झोंक दी है. भारत बहुत पीछे है. आज चीन में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 9416 डॉलर है, भारत से दोगुना. 2012 में इसकी अर्थव्यवस्था 7.7 फीसदी की दर से आगे बढ़ी. भारत किसी तरह 5.3 फीसदी के आसपास रेंगा. प्रति व्यक्ति आमद, वार्षिक विकास दर, मुद्रास्फीति, सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में निवेश, बेरोजगारी, बजट घाटा और भुगतान संतुलन की स्थिति में चीन, भारत से बहुत आगे निकल गया है. हर मापदंड और मोरचे पर बहुत आगे.

दुनिया का सच है कि ताकतवर के आगे सब दंडवत होते हैं. आज यही स्थिति चीन की है. भारत के मामूली पड़ोसी देश (मालदीव और सेसेल्स द्वीप) भी भारत को आंख दिखाते हैं. नेपाल तो पूरी तरह चीन की गोद में है. तिब्बत की ऊंचाई पर अब चीन सुपरहाइवे बना रहा है. इधर भारतीय सड़कें मैदानी इलाकों में भी दुर्दिन में हैं. यहां बिजली की खराब हालत है. इन्फ्रास्ट्रक्चर जर्जर हैं. क्योंकि सरकारें सिर्फ गद्दी बचाने में लगी हैं. नेता धन कमाने में लगे हैं या परिवार-रिश्तेदार को उपकृत करने में. राजनीतिक दल पारिवारिक कंपनियों में बदल गये हैं. सिर्फ और सिर्फ कुरसी की लड़ाई है. कुरसी भी क्यों चाहिए? भ्रष्टाचार बढ़ाने, बेईमान, जर्जर और बोझ बन चुकी व्यवस्था को ढोने के लिए?

यह सच है कि ध्वस्त और इनइफीशिएंट व्यवस्था को बदले बिना भारत फिर गुलाम बनने की ओर अग्रसर है. पर यह व्यवस्था बदलने के लिए शासक वर्ग तैयार नहीं है, क्योंकि इसी व्यवस्था में यह वर्ग फल-फूल सकता है. पहले रजवाड़ों के झगड़ों ने देश को गुलाम बनाया, अब भ्रष्ट राजनीतिक दलों की संकीर्ण दृष्टि, तंग मकसद और संकुचित विजन देश को गुलामी की ओर ठेल रहा है. इधर भारत से उच्चतम स्तर पर चीन बात भी करता है, पर भारत को बाहर से पता चलता है कि ब्रह्मपुत्र पर चीन चौथा बांध बना रहा है. हालांकि वर्षों से यह बात सार्वजनिक है. भारत, इन गंभीर मुद्दों पर गहरा आक्रोश व्यक्त करने की भी स्थिति में नहीं है. खबर सार्वजनिक होने के एक सप्ताह बाद छह फरवरी को भारत के रक्षा मंत्री कहते हैं, ग्वादर बंदरगाह पर चीन का काम, भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

उधर छह फरवरी को दिल्ली में भारत के प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह शर्मनाक है कि विश्व के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों की सूची में एक भी भारतीय संस्थान नहीं है. चीन, इस क्षेत्र में भी भारत से बहुत आगे है. यह साफ होना चाहिए कि चीन के उकसावे पर हम युद्ध की बात नहीं कर रहे, पर मजबूत संस्थाएं बनाने, श्रेष्ठ इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने, अधुनातन अस्त्र-शस्त्र देश में बनाने यानी वह हर प्रयास करने की बात, जो देश को सर्वश्रेष्ठ बना सके, यही सृजन का काम हम कर दें, चीन को जवाब मिल जायेगा. पर हम-हमारी कौम बातूनी, अकर्मण्य, भ्रष्टाचार-भोग में लिप्त है.

पांच फरवरी की खबर है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत की विकास दर का आकलन किया है. कुछ वर्षों पहले तक भारत दुनिया में चीन को पीछे छोड़ आगे निकलता दिखायी दे रहा था. दुनिया के विश्लेषकों, चिंतकों, कंपनियों एवं अर्थशास्त्रियों की नजर में. पर केंद्र सरकार के अनिर्णय की स्थिति (पॉलिसी पैरालिसिस) ने भारत को बांग्लादेश से भी पीछे पहुंचा दिया है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार वर्ष 2012 में भारत साढ़े चार फीसदी की दर से आगे बढ़ा, जबकि इंडोनेशिया, फिलीपींस के साढ़े छह फीसदी की दर से बढ़ने के अनुमान है. इन छोटे देशों से भी हम मात खा रहे हैं. बांग्लादेश 6.3 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. हम भारतीय, इंडोनेशिया, फिलीपींस, बांग्लादेश को छोटे मुल्क कह सकते हैं. अपने अकर्म या हीन पुरुषार्थ को छुपाने के लिए. पर उधर चीन जैसा बड़ा देश है. उससे मुकाबला करने के प्रसंग में तो हम कहीं टिकते ही नहीं. इसके लिए बाहरी देश दोषी नहीं हैं. विश्व अर्थव्यवस्था की मुसीबतें जिम्मेदार नहीं हैं. यह तो हमारी अकर्मण्यता, अक्षमता और अकर्म का परिणाम है. सिस्टम कोलैप्स (ध्वस्त) हो जाने की देन है. राजनीतिक इच्छाशक्ति या संकल्प के खत्म हो जाने का सबूत है.

राजनीतिक दलों के दिवालियापन और वैचारिक दरिद्रता का परिणाम. भारत के शहीदों ने इस मुल्क के लिए एक सपना देखा था. यह एक सपने की मौत है. क्या इस तरह के सवाल को आज मुल्क में सबसे अधिक बहस का विषय नहीं होना चाहिए था? पूरे देश के लिए चिंता का विषय! पर इस पर कहीं चर्चा है? 1962 में चीन ने इस मुल्क पर हमला किया, तो अपढ़ और गरीब महिलाओं ने अपने जेवर उतार कर राष्ट्रकोष में दे दिये. देशप्रेम में. इस देश में एक गरीब का बेटा प्रधानमंत्री (लालबहादुर शास्त्री) बना. पाकिस्तान ने हमला किया, तो लोगों ने एक शाम खाना बंद कर दिया. क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री का आवाहन था, जय जवान, जय किसान. भूखे रह कर अन्न बचायेंगे, देश को यह बचत देंगे, इसके पीछे यह भाव था. स्वाभिमान के साथ जीना. उस प्रधानमंत्री ने भी एक दिन उपवास शुरू कर दिया. यह थी, भारत की राजनीति और जनता का देशप्रेम. क्योंकि चरित्र वाले लोगों के हाथ में बागडोर थी.

आज किसे याद है कि इस देश की चौथी लोकसभा ने शपथ ली थी कि जब तक चीन, भारत की अधिकृत (1962 में जिस भारतीय जमीन पर कब्जा किया) जमीन नहीं छोड़ता, कोई बात नहीं होगी. आज भारत की सेना के जवान का सिर काट कर दुश्मन ले जाते हैं. पर हम शब्दवीर चुपचाप दर्शक बन जाते हैं. आज कोई चीन के एक जवान को मार कर देख ले. सिर हरिवंशकलम करने की बात तो दूर है. धर्म की राजनीति, जाति की राजनीति, वोट बैंक की राजनीति, अकर्मण्यता की राजनीति, भ्रष्टाचार की राजनीति, सपनों की हत्या करनेवाली राजनीति ने आज मुल्क को कहां पहुंचा दिया है?

लेखक हरिवंश देश के जाने माने पत्रकार हैं. प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं.  हरिवंश जी के लिखे अन्य पठनीय और प्रेरणादायी लेखों / विश्लेषणों / समीक्षाओं को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें-

भड़ास पर हरिवंश

एक काम क्‍यों नहीं करते, इस मुल्‍क को आप हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र घोषित कर दीजिए

‎"मैं पिछले दस सालों से घर से दूर अकेले रह रही हूं। लेकिन मेरी मां को आज भी लगता है कि मैं घर वापस आ जाऊं। लड़की के अकेले रहने, अकेले घर से बाहर निकलने के ख्‍याल से उन्‍हें बार-बार इलाहाबाद की उस महिला डॉक्‍टर का ख्‍याल आता है, जिसे कुछ लोगों ने रेप करके मार डाला था। दिल्‍ली गैंग रेप के बाद उनका डर और गहरा हो गया है। वो जानती हैं, रहना तो पड़ेगा लेकिन उनके दिल को सुकून नहीं है। उन्‍हें कतई भरोसा नहीं है कि कभी कुछ बुरा नहीं हो सकता। इस मुल्‍क में उन्‍हें अपनी बच्‍ची की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं लगती। वो डर में जीती हैं।"

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"मेरा एक मुसलमान दोस्‍त मुंबई में रहता है। शहर में जब-जब बम फटता है, उससे बहुत दूर बिजनौर में बैठी उसकी मां डर जाती है। वो नास्तिक है। खुदा से उसका कभी याराना नहीं रहा। वो न नमाज पढ़ता है, न रोजे रखता है। लेकिन उसे याद है कि हर नौकरी में लोगों ने उसके नाम के कारण उसे तिरछी निगाहों से देखा है। जब-जब बम फटे, उससे उसकी देशभक्ति का सबूत मांगा है। वो जिस मुल्‍क में पैदा हुआ, उसके दादा, परदादा, दादा के दादा, जिस मुल्‍क में जन्‍मे और जिसकी मिट्टी में दफन हो गए, वो मुल्‍क उससे रोज उसकी देशभक्ति का सबूत मांगता है। दूर देश बैठी उसकी मां रोज डर में जीती है। मां को भरोसा नहीं इस मुल्‍क पर कि वो उसके बच्‍चे की हिफाजत करेगा। इस मुल्‍क ने मां को वो भरोसा कभी नहीं ही दिया।

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मेरा एक और दोस्‍त है। बहुत गरीब दलित परिवार से आता है। उसकी विधवा मां ने लोगों के घरों में झाडू-बर्तन करके उसे पढ़ाया। आज वो पीसीएस ऑफीसर है। लेकिन अब भी वो कभी-कभी उदास होता है क्‍योंकि उसकी सारी पढ़ाई, मेहनत, पोजीशन और पावर के बावजूद लोग उसे आज भी पीठ पीछे चमार का लड़का कहकर बुलाते हैं। उसकी सारी उपलब्धियों का ठीकरा रिजर्वेशन के सिर फोड़ देते हैं। मां अपनी धुंधलाई आंखों से बेटे को देखती है और सोचती है कि इतना पढ़-लिखकर भी आखिर बदला क्‍या। उसकी मां को भी इस मुल्‍क पर भरोसा नहीं। क्‍या चाहिए था जिंदगी में। इज्‍जत और स्‍वाभिमान की दो रोटी। रोटी तो मिली लेकिन इज्‍जत और स्‍वाभिमान नहीं।

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ये सारी माएं तुम्‍हारे महान लोकतांत्रिक मुल्‍क में आज भी डर में जीती हैं। वो मुल्‍क पर भरोसा कर न सकीं, मुल्‍क उन्‍हें भरोसा करा न सका। क्‍योंकि ये मुल्‍क औरतों के, दलितों के, मुसलमानों के स्‍वाभिमान का घर है ही नहीं। एक काम क्‍यों नहीं करते। अपने मुल्‍क को आप हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र घोषित कर दीजिए।

xxx

मेरे मुसलमान दोस्‍त से ये मुल्‍क बार-बार देशभक्ति का सबूत मांगता है। एक औरत से उसका पति उसके शरीर की पवित्रता का सबूत मांगता है। बलात्‍कार की शिकार महिला से पुलिस, कानून, न्‍यायालय तक अच्‍छे चरित्र का सबूत मांगते मनीषा पांडेयहैं। एक दलित से उसकी खून की श्रेष्‍ठता का सबूत मांगते हैं। नौकरी और प्रमोशन में योग्‍यता का सबूत मांगते हैं।
तुम्‍हारे मुल्‍क में हम सब हर क्षण संदेह के घेरे में हैं। तुम्‍हारे हिंदू, सवर्ण, मर्द राष्ट्र में हमारे लिए न इज्‍जत है, न स्‍वाभिमान।

इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय Manisha Pandey के फेसबुक वॉल से.

प्रोफेसर सुभाष धूलिया उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त

प्रो. सुभाष धूलिया की नयी पारी उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में शुरू हो रही है. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय नई दिल्ली में स्कूल आफ जर्नलिज्म के निदेशक प्रो. सुभाष धूलिया नए कुलपति नियुक्त किए गए हैं. मुक्त विश्वविद्यालय में कुलपति पद 24 नवंबर, 2012 से रिक्त चल रहा है.

प्रो. सुभाष धूलिया
प्रो. सुभाष धूलिया
उत्तराखंड के राज्यपाल डा. अजीज कुरैशी ने सोमवार को प्रो. धूलिया को कुलपति नियुक्त किया. उनकी नियुक्ति तीन वर्ष की अवधि के लिए की गई है. उत्तराखंड से जुड़े शिक्षाविद एवं वरिष्ठ पत्रकार प्रो. धूलिया वर्तमान में इग्नू में स्कूल आफ जर्नलिज्म और न्यू मीडिया स्टडीज के निदेशक हैं. वह वर्ष 2006 से 2011 तक इग्नू में ही इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रोडक्शन सेंटर की एजुकेशन, रिसर्च एंड ट्रेनिंग यूनिट के हेड और प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दे चुके हैं.

इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन में प्रोफेसर रहे प्रो. धूलिया विभिन्न प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी का निर्वहन कर चुके हैं. विभिन्न रिसर्च प्रोजेक्ट के साथ ही वह देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं से भी जुड़े हुए हैं. उत्तराखंड से जुड़े प्रो. धूलिया ने एमए अर्थशास्त्र की डिग्री डीएवीपीजी कालेज देहरादून से प्राप्त की. प्रो. धूलिया विश्वविद्यालय के तीसरे कुलपति होंगे.

सजा है इक नया सपना हमारे मन की आंखों में… (लखनऊ में अपना तो मिले कोई का लोकार्पण)

मुम्बई के शायर देवमणि पांडेय के ग़ज़ल संग्रह ‘अपना तो मिले कोई’ का लोकार्पण पूर्व सांसद, साहित्यकार एवं उ.प्र. हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष श्री उदय प्रताप सिंह ने किया। हिंदी संस्थान, हज़रतगंज, लखनऊ के प्रेमचंद सभागार में 9 फरवरी 2013 की शाम को आयोजित इस कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के रूप में बोलते हुए उदय प्रताप सिंह ने कहा कि हिंदी और उर्दू दरअसल एक ही भाषाएं हैं।

राज दरबारों में बोली जाने वाली ज़बान को उर्दू नाम दिया गया जब कि समाज में बोली जाने वाली भाषा को हिंदी कहा गया। कवि देवमणि पांडेय की ग़ज़लों की ज़बान भी यही है। इसे आप चाहे हिंदी, चाहे उर्दू कह सकते हैं। इसी आम फ़हम ज़बान में पांडेयजी ने अपने समय और समाज की सच्चाइयों को असरदार तरीके़ से अभिव्यक्त किया है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष जाने-माने शायर जनाब अनवर जलालपुरी ने कहा कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लों में एक तरफ़ तो गाँव की ज़िंदगी मुस्कराती है तो दूसरी तरफ़ शहरों का अजा़ब (दर्द) भी चहलकदमी करता दिखाई देता है। उन्होंने आगे कहा कि उर्दू के अधिकतर शायरों ने हिंदी में लिखना-पढ़ना सीख लिया है। अगर हिंदी के 25 प्रतिशत शायर भी उर्दू स्क्रिप्ट सीख लें तो दोनों ज़बानों में बहुत अच्छा तालमेल हो जाएगा और दोनों की तरक़्की़ होगी। देवमणि पांडेय ने उर्दू सीखकर इस दिशा में क़ाबिले-तारीफ़ काम किया है। कार्यक्रम की शुरूआत में कवयित्री नीतू सिंह ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। नीतू जी ने देवमणि पांडेय की एक ग़ज़ल भी तरन्नुम में पेश की –

जो मिल गया है उससे भी बेहतर तलाश कर

क़तरे में भी छुपा है समंदर तलाश कर

हाथों की इन लकीरों ने मुझसे यही कहा

कोशिश से अपनी अपना मुक़द्दर तलाश कर

शायर आमिर मुख़्तार ने भी देवमणि पांडेय की एक ग़ज़ल तरन्नुम में पेश की –

प्यासी ज़मीं थी और मैं बादल नहीं हुआ

इक ख़्वाब था मगर वो मुकम्मल नहीं हुआ

ख़ुशबू मेरी निगाह की तुझसे लिपट गई

क्या बात है कि दिल तेरा संदल नहीं हुआ

उर्दू माहनामा ला-रैब के सम्पादक जनाब रशीद कु़रेशी ने ‘अपना तो मिले कोई’ पर इज़हारे ख़याल करते हुए कहा कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लें ऊपर से देखने में बेहद सरल और आसान लगती हैं लेकिन उनके भीतर गहरा अर्थ छुपा होता है। सहारा समय न्यूज़ चैनल के पत्रकार व शायर हसन काज़मी ने कहा कि देवमणि पांडेय की ग़ज़लें दिल से निकली हुई ग़ज़लें हैं और दिल को छूती हैं। कथाकार दयानंद पांडेय, व्यंग्यकार सूर्यकुमार पांडेय और ईटीवी के वरिष्ठ सम्पादक-शायर तारिक़ क़मर ने भी कवि देवमणि पांडेय को बधाई दी। इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन-मुशायरे में हिंदी-उर्दू के प्रमुख कवियों-शायरों ने शिरकत की। प्रमुख अतिथि उदय प्रताप सिंह ने चुनिंदा शेर सुनाए-

न मेरा है न तेरा है, ये हिंदोस्तान सबका है

नहीं समझी गई ये बात तो नुकसा़न सबका है

श्रोताओं की माँग पर देवमणि पांडेय को कई ग़ज़लें पेश करनी पड़ी। दो शेर देखिए-

सजा है इक नया सपना हमारे मन की आँखों में

कि जैसे भोर की किरणें किसी आँगन की आँखो में

सुलगती है कहीं कैसे कोई भीगी हुई लकड़ी

दिखाई देगा ये मंज़र तुम्हें बिरहन की आँखों में

शायर अनवर जलालपुरी, रशीद क़ुरेशी, डॉ. मेराज साहिल, इमरान अनवारवी, आमिर मुख़्तार, इस्लाम फ़ैसल, अहमद फ़राज़, सलमान ज़फ़र, ओ.पी. तिवारी, मनोज श्रीवास्तव, जनेश्वर तिवारी और नीतू सिंह के कविता पाठ का श्रोताओं ने जमकर लुत्फ़ उठाया। सहारा समय न्यूज़ चैनल से जुड़े पत्रकार-शायर हसन काज़मी ने तरन्नुम में अपनी लोकप्रिय ग़ज़ल पेश की-

खू़बसूरत हैं आखें तेरी रातों को जागना छोड़ दे

खु़द बखु़द नींद आ जाएगी तू मुझे सोचना छोड़ दे

डॉ.हारून रशीद ने कार्यक्रम का रोचक संचालन किया। संयोजन वीरेंद्र नारायण सिंह ने और नराकास (लखनऊ) के अध्यक्ष संजय पांडेय ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में अच्छी तादाद में लखनऊ महानगर के रचनाकार-पत्रकार और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

रिपोर्ट : रमा पांडेय

दिल्ली में नशेड़ी वकील ने अपनी पत्नी को पीट-पीट कर अधमरा किया

दिल्ली के वकील और नत्थुपुरा, संतनगर, बुराड़ी के राजेंद्र नाथ पांडेय ने अपनी पत्नी को मारते-मारते अधमरा कर दिया और घर के बाहर फेंक दिया। पीड़िता 100 नंबर पर पुलिस को फोन करती रही लेकिन मदद नहीं मिली। फिर पीड़िता ने 181 पर पुलिस से मदद की गुहार लगाई, जिसके बाद पुलिस ने पीड़िता को जहांगीरपुरी के बाबू जगजीवन राम अस्पताल में दाखिल कराया।

पुलिस ने आरोपी वकील को हिरासत में तो ले लिया, लेकिन केस दर्ज करने से बच रही है। आरोपी पहले भी शराब के नशे में अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता रहा है। वहीं बुराड़ी पुलिस का कहना है कि मामला स्वरूपनगर थाने का है।

‘अफजल गुरू ने कुछ समय पहले चारों वेद पढ़ा’

: द हिंदू अखबार में अफजल गुरू को लेकर छपी एक खबर से उसके बारे में नए तरीके से सोचने-समझने की दृष्टि बनती है : ये है पूरी खबर …

In Tihar, officials feel ‘tinge of sorrow’

Gaurav Vivek Bhatnagar

‘Al vida’, said Afzal Guru to his executioner, who had himself bid him good bye with the same words a few seconds earlier. And then as the executioner pulled a lever, Afzal’s frame hung from the gallows.

“He was dead in a minute, though”, as per the jail norms, the body was kept hanging for a full half hour, said an official who witnessed the hanging. Thereafter Afzal’s body was taken down from the gallows and buried with full religious rites near Jail No. 3, right next to the grave of Kashmiri separatist Maqbool Butt who too was hanged in Tihar.

“But there is a difference between the two. While Butt was a separatist leader, Afzal never spoke about secession of Kashmir from India. In fact, he used to tell us that he had been unnecessarily dragged into this. In fact, he actually believed in ridding India of corruption," the official added. He spoke to The Hindu on condition he not be identified because he was not authorised to speak to the press.

While right-wing activists across the country celebrated Afzal’s execution, in the jail itself there was no celebration. Rather, the staff appeared glum. “He was a pious soul and was extremely well behaved. Even as he was being taken to the gallows, he greeted the jail staff he knew by their first names. The only thing he requested before the hanging was that ‘mujhay ummeed hai aap mujhay dard nahin karaogay’ (I hope you will not cause me pain). And he was assured by the executioner, who himself was overcome with emotion as he kept looking into his eyes as the black cloth was drawn over them, that it would be a smooth journey. And so it was."

Contrary to some media reports, Afzal was told of his impending execution on the actual morning and not the previous evening.

“The only thing he had in the morning was a cup of tea. But that is because he was not offered any food. Otherwise, he was so normal that he would have had that too.” Initially Afzal was wearing a pheran, or Kashmiri gown. He later took bath and changed into a white kurta-pyjama and offered namaz.

"There have been about 25 executions in Tihar and senior officials [here] have witnessed the last 10, but never have they seen a man so calm and composed on learning the news of his impending death."

In the last couple of hours of his life, Afzal had the company of some jail officials. And he narrated to them his thoughts about life and death. "He spoke of universal brotherhood and oneness of the mankind; how no human being is bad and how the soul in each one was a creation of the same God. He believed that if you moved on the path of truth, that was the biggest achievement."

In fact, Afzal was so calm in the morning that he even penned down some of his thoughts, put the date and time on the paper and signed it.

When asked by the jail staff about his last thoughts of his family, on who would take care of them, Afzal said "it was God who looks after each one of us and so would be the case now".

"His strength came from his spirituality. He was a learned man; as well versed in Islam as with Hinduism. Often, he would tell us about the similarities in the two religions. Some time ago he had read all the four Vedas. How many Hindus have actually done that? You normally rejoice at the end of evil, [but] when a pious soul goes away, it leaves behind a tinge of sorrow," the official said.

Recalling, how all through Afzal was "joyful" as also "cool and calm", the officials said in the past they have seen people shiver at being told about their being taken to the gallows. "But here it was just like what we had heard about people going to the gallows smiling."

Another difference between Afzal and others who were executed for terrorist crimes terrorists, the official said, was that while almost all others had made religious or political cries before being hanged, Afzal just walked the last 100 steps from his cell to the gallows as he normally would and went away wishing those around him.