पंकज सिंह को जनसत्ता के संपादक मुकेश भारद्वाज की श्रद्धांजलि : अनजान शहर में जान-पहचान

एक बेतकल्लुफ-सी मुलाकात थी वो। दिल्ली में औपचारिक तौर पर काम संभालने के बाद एक पुराने वरिष्ठ सहयोगी के इसरार पर मैं अजित राय के जन्मदिन की पार्टी में शिरकत के लिए पहुंचा। यह पहला मौका था कि मैंने किसी आयोजन में शमूलियत की हामी भरी थी। जनसत्ता के पूर्व संपादक अच्युतानंद मिश्र, प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह और मशहूरो-मारूफ बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन की सोहबत का मौका मिला।

एक कोने की टेबल पर तसलीमा नसरीन के साथ अभी बातचीत का दौर शुरू ही हुआ था कि अजित एक प्रभावशाली व्यक्तित्व को मेरे पास लाए लेकिन औपचारिक परिचय से पहले ही कोई उनको खींच ले गया। हाथ में जाम और प्लेट में स्नैक्स के साथ वो मेरे साथ ही कुर्सी पर विराजमान हुए। एक अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ मुझे लगभग घूरते हुए उन्होंने कहा, ‘आप मुझे जानते नहीं है?’ मेरे लिए थोड़ा कठिन समय था उनका सवाल एक वाक्य था सधा हुआ, जिसमें कहीं सवालिया होने की गंध भी थी। शिष्टाचार का तकाजा था कि मैं ‘‘ना’’ न कहूं लेकिन, हां कहना कठिनतर था सो मैंने ही आंखों से ही अपनी उत्सुकता को बेआवाज अभिव्यक्ति दी।

बात आगे न बढ़ी तो मैंने थोड़ी देर में पूछ ही लिया, ‘आप भी लिखते हैं?’ उनकी हंसी एक भरी-पूरी टेबल पर अट्टहास की देहरी से थोड़ी ही दूर ठिठक गई। सहज ही बोले, ‘‘कोई बात नहीं। संयोग यह है कि कुछ दिन पहले यही सवाल मैंने तुम्हारे लिए भी किया था।’’ वार्तालाप में सब आसपास की आवाजों को भूल जाएं तो कुछ क्षण निर्विघ्न मौन रहा, फिर अपने जाम में से एक लंबा घंूट भरते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं पंकज सिंह हूं।’ यह थी पंकज सिंह से मेरी पहली मुलाकात जो बाद में ज्यादातर इंडिया इंटरनैशनल सेंटर में मेरी आमद से कुछ अरसा पूर्व नगर के प्रबुद्ध वर्ग के एक इकट्ठ में हुई। एक घटना या दुर्घटना के आसपास ही सिमटी रही। सब सुन कर सहज ही खातिर गजनवी की पंक्तियां स्मरण हो आईं।

मैं इसे शोहरत कहूं या अपनी रुसवाई कहूं,
मुझसे पहले उस गली में मेरे अफसाने गए।

उस खास घटना के आसपास बुनी गई निंदा की नक्शकारी को भूल जाऊं तो इस घटना से ही शहर में मुझे मेरी अहमियत का एहसास भी हुआ। अपने ही अखबार के कुछ नियमित लेखकों की जानकारी भी मिली जो इस घटना के चश्मदीद थे। बहरहाल उससे भी ज्यादा जो हुआ वह था पंकज सिंह के सकारात्मक और जान-पहचान बढ़ाने की नीयत से किया गया संवाद। ऐसे मौकों का यही लाभ सबसे ज्यादा है कि आप बहुत से लोगों से मिलते हैं और बहुत कुछ जान लेते हैं। बातचीत की डोर उस खास घटना से टूटी तो कविता, कहानी और साहित्य और साहित्यकारों की ओर बढ़ती चली गई। कहना न होगा कि पंकज सिंह वे पहली शख्सियत थे जिसने मुझे दिल्ली के दिलदार दिल, बेरहम बनावट और सहज सौहार्द से वाकिफ करवाया। मुझे हैरत थी कि बातचीत की डोर जब टूटी तो फिर मिलने का कोई वादा नहीं था।

बाद उसके, मुंबई में शिव सेना ने गजलकार गुलाम अली के कार्यक्रम पर रोक लगा दी। मेरी कलम इस सांप्रदायिक आतंकवाद पर सहज ही चल गई। उसी सुबह मेरा फोन बजा, एक अनजान नंबर था। मैंने उठाया तो एक आवाज ने ‘‘हैलो’’ के फौरन बाद कहा, ‘‘मैं पंकज सिंह बोल रहा हूं।’’ मेरे लेखन पर उनके उदार उद्गार मुझे बहुत भाए। एक लेखक या रोज अपनी कलम से एक नई कहानी बांचने वाले के लिए यह उपलब्धि ही होती है कि कोई उनकी रोज की लिखाई में किसी दिन तारीफ के दो शब्द बोले। बात लंबी चली। इस बार मिलने का वादा भी हुआ।

बहरहाल, यह दो संक्षिप्त से शाब्दिक आदान-प्रदान मेरे और पंकज सिंह के बीच एक ऐसी कड़ी जोड़ गए कि उनके जाने की खबर तकलीफ के तीर की तरह दिल पर लगी। एक अनजान शहर जिसके साथ कुछ महीनों पहले तक आपका महज आने जाने का नाता ही हो, ऐसे एक पहले जानकार का जाना एक निजी नुकसान के जैसा ही महसूस हुआ। पंकज सिंह चले गए लेकिन पीछे छोड़ गए एक शून्य। उनसे दूसरी बार फोन पर बात करते हुए इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि मिलने का पहला वादा जो उन्होंने नहीं किया और दूसरी बार जो किया उसको वो अब कभी वफा नहीं करेंगे।

जीवन की क्षणभंगुरता की भी इससे बड़ी मिसाल और क्या होगी कि जान-पहचान का पौधा ठीक से अंकुरित होने से पहले ही यादों के झरोखे में सज गया।

एक अनजान शहर में मेरे इस पहले और बिना जान-पहचान के ही बने इस खैरख्वाह की स्मृति शेष सदा ही रहेगी और किसी भी अनजान शहर में मेरे जैसे न जाने पहचाने को ऐसे ही खैरख्वाह मिलते रहेंगे। पंकज सिंह आज नहीं हैं लेकिन वे रहेंगे, हमारी स्मृतियों के पन्ने पर अपनी पहचान के साथ। सदा।

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक मुकेश भारद्वाज द्वारा यह लिखा जनसत्ता अखबार में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार.

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