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साहित्य

…सुलह होगी पंकजजी, यहां नहीं तो वहां : ओम थानवी

Om Thanvi : परसों की ही बात है। आइआइसी मेन के लाउंज में सुपरवाइजर की मेज के गिर्द हम दोनों अगल-बगल आ खड़े हुए थे। करीब, मगर अबोले। बगल वाले शख्स पंकज सिंह थे। नामवर सिंहजी के सालगिरह समारोह के दिन से हमारी तकरार थी। बहरहाल, परसों हम आमने-सामने होकर भी अपने-अपने घरों को चले गए। पर मुझे वहाँ से निकलते ही लगा कि यहीं अगली दफा हम लोग शायद गले मिल रहे होंगे। क्षणिक तकरार कोई जीवन भर का झगड़ा होती है? आज मैं इलाहाबाद आया। वे पीछे दुनिया छोड़ गए। लगता है अब वहीं मिलेंगे। आज नहीं तो कल।

<p>Om Thanvi : परसों की ही बात है। आइआइसी मेन के लाउंज में सुपरवाइजर की मेज के गिर्द हम दोनों अगल-बगल आ खड़े हुए थे। करीब, मगर अबोले। बगल वाले शख्स पंकज सिंह थे। नामवर सिंहजी के सालगिरह समारोह के दिन से हमारी तकरार थी। बहरहाल, परसों हम आमने-सामने होकर भी अपने-अपने घरों को चले गए। पर मुझे वहाँ से निकलते ही लगा कि यहीं अगली दफा हम लोग शायद गले मिल रहे होंगे। क्षणिक तकरार कोई जीवन भर का झगड़ा होती है? आज मैं इलाहाबाद आया। वे पीछे दुनिया छोड़ गए। लगता है अब वहीं मिलेंगे। आज नहीं तो कल।</p><script async src="//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js"></script> <!-- black ad unit --> <ins class="adsbygoogle" style="display:block" data-ad-client="ca-pub-7095147807319647" data-ad-slot="9016579019" data-ad-format="auto"></ins> <script> (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); </script>

Om Thanvi : परसों की ही बात है। आइआइसी मेन के लाउंज में सुपरवाइजर की मेज के गिर्द हम दोनों अगल-बगल आ खड़े हुए थे। करीब, मगर अबोले। बगल वाले शख्स पंकज सिंह थे। नामवर सिंहजी के सालगिरह समारोह के दिन से हमारी तकरार थी। बहरहाल, परसों हम आमने-सामने होकर भी अपने-अपने घरों को चले गए। पर मुझे वहाँ से निकलते ही लगा कि यहीं अगली दफा हम लोग शायद गले मिल रहे होंगे। क्षणिक तकरार कोई जीवन भर का झगड़ा होती है? आज मैं इलाहाबाद आया। वे पीछे दुनिया छोड़ गए। लगता है अब वहीं मिलेंगे। आज नहीं तो कल।

पंकजजी की कविताएँ मुझे सदा अजीज रहीं। उनकी अपनी आवाज में मैंने उनकी एक रेकार्डिंग फेसबुक पर साझा की थी। उन्हें भी मेरा लिखा पसंद था। मरहूम कुबेर दत्त के कार्यक्रम में दूरदर्शन के लिए उन्होंने मेरा इंटरव्यू किया था। आइआइसी मैं अक्सर साथ ही बैठते थे। कुछ चीजों – वर्तनी, उच्चारण, शब्दस्रोत आदि – को लेकर इतने अड़ जाते थे कि सविताजी से मैं मजाक में कहता था इनके साथ आप कैसे जीती हैं, बहस में कोई इनके समक्ष गरदन भी काटकर पेश कर दे तब भी कहेंगे कि थोड़ी टेढ़ी कट गई है!

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नामवरजी के जन्मदिन पर भी हम उलझे। कहा-सुनी थी, पर बात तब और बिगड़ी जब इस तकरार के किस्से में नमक-मिर्च लगाकर एक कवि (कृष्ण कल्पित/कल्बे कबीर) ने फेसबुक पर इसे मारपीट की कपोल-कल्पित कहानी बना दिया और पता नहीं क्यों पंकजजी उसका खंडन नहीं कर सके। जो हो, मैं इस किस्से के निपटारे को लेकर उम्मीदजदा था। परसों आमने-सामने हुए तो न उनमें कटुता थी, न मुझमें। महसूस हुआ कि रेत का एक पहाड़ ढहा चाहता है।शायद ढह भी गया हो। पर उससे उनकी संगत का जो लाभ मुझे मिल सकता था, अब उससे वंचित हूँ। हमेशा के लिए। एक अजब टीस के साथ। मगर यह सुलह होगी, पंकजजी। यहाँ नहीं तो वहाँ। फिलहाल उनकी स्मृति को नमन। लेखक का लिखा हमारे बीच रहता है। वह हमेशा था। रहेगा भी।

जनसत्ता अखबार के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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