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उत्तराखंड

समूचा उत्तराखंड ‘पेपर चोर गद्दी छोड़’ के नारों से झुलस रहा है, लेकिन संपादकों को खबरें छापना मना है!

राहुल पांडेय-

सर्दियों ने हिमालय में दस्तक दे दी है, लेकिन समूचा उत्तराखंड जल रहा है। देहरादून से लेकर देवप्रयाग तक, हल्द्वानी से लेकर पिथौरागढ़ तक पेपर चोर-गद्दी छोड़ के नारे लग रहे हैं। सोशल मीडिया पर इनकी विडियोज खूब चल रही हैं। उत्तराखंड के लोकगायक अपने बच्चों के साथ आ खड़े हैं। वे इनके संघर्ष के लिए गीत-गौनही बना रहे हैं, गा रहे हैं। लेकिन क्या बात है कि दैनिक जागरण, हिंदुस्तान से लेकर खुद को उत्तराखंड का नंबर वन अखबार कहने वाले अमर उजाला में इनकी खबरें नहीं हैं? जितना बड़ा छात्रों का आंदोलन है, क्या बात है कि उससे बड़ी कवरेज पेपर चोरों को दी जा रही है, जिनसे पहाड़ की जवानी गद्दी से उतरने को कह रही है?

कुछेक स्थानीय रिपोर्टरों के पास इस सवाल के कुछ जवाब हैं। मसलन, टेलीफोनिक बातचीत में रिपोर्टरों ने बताया कि धामी ने अपने अधिकारियों को छात्र आंदोलन को बदनाम करने का आदेश दे दिया है। कुछ फेसबुक पेजों पर इसकी तसदीक भी मिलती है, जहां छात्र सीधे पुलिस को चेतावनी दे रहे हैं, देहरादून के एसएसपी के खिलाफ मोर्चा खोलकर बैठे हैं। इसके अलावा संपादकों को भी निर्देश दिए जा चुके हैं कि छात्रों की खबरें नहीं छापनी हैं। छाप दीं तो विज्ञापन बंद कर दिए जाएंगे। संपादक नाम की संस्था तो पहले से ही घुटनों के बल बैठी थी, और चाह भी रही थी कि सरकार की तरफ से ही ऐसे निर्देश मिलें, ताकि वे तुरंत अपनी-अपनी पैंट उतारकर तेल का लोटा बगल में रखकर लेट जाएं।

लेकिन दिक्कत बस एक फंस गई। हिमालय बचाओ यात्रा के दौरान मैंने देखा था कि सोशल मीडिया सुदूर गांवों तक फैल चुका है, और सूचना लेने-देने का प्रमुख माध्यम बन चुका है। केदारनाथ आपदा के वक्त जब एक भी पत्रकार आपदाग्रस्त क्षेत्रों में पहुंचने में नाकाम रहा था, तो पत्रकारिता की सारी जिम्मेदारी वहीं के आसपास के लोगों ने ही निभाई थी, जिसके बाद ही उस आपदा की ऐसी ऐसी भयावह तस्वीरें सामने आई थीं कि अगर संपादकों की चलती तो तब भी ये लोग वो सारी तस्वीरें गायब कर देते। इसी तरह से अब के छात्र आंदोलन की लाख कोशिशों के बाद ये संपादक लोग अखबार से तो खबर गायब कर रहे हैं, लेकिन खबरों को लोगों तक पहुंचने से रोक नहीं पा रहे हैं।

नेपाल से ट्रेंड में आया जेन Z टर्म अब उत्तराखंड से लेकर लद्दाख तक पहुंच चुका है। लद्दाख में भाजपा का कार्यालय फूंका जा चुका है। उत्तराखंड के जेन Z की तारीफ करनी होगी कि अभी तक उसने अपना आपा नहीं खोया है। लेकिन कितने दिनों तक? जिस तरह से प्रदेश का कमपढ़ सीएम इसे नकल जेहाद कहकर हिंदू-मुस्लिम करने की कोशिश कर रहा है, शायद उसे नहीं पता कि जेन Z का हिंदू-मुस्लिम जैसी फर्जी अवधारणाओं से कभी नाता ही नहीं रहा। ये पीढ़ी बहुत अच्छे से जानती है कि जेब में पैसे होने का क्या मतलब है और जेब में पैसे होने ही चाहिए।

उत्तराखंड की भाजपा सरकार का इतिहास देखें तो पिछले चार-पांच साल से इस सरकार में ढेरों पेपर लीक हुए हैं। 2021 की जुलाई में वन दरोगा से लेकर पटवारी तक की परीक्षाओं के पेपर लीक हुए। फिर दिसंबर में ग्रेजुएट लेवल की परीक्षा में हुए पेपर लीक में डेढ़ लाख से अधिक स्टूडेंट्स प्रभावित हुए। 2022 में जूनियर इंजीनियर की परीक्षा के पेपर लीक हुए। अभी फिर ग्रेजुएट लेवल की परीक्षा के पेपर लीक हुए हैं, जिसमें भाजपाई ही पकड़ा गया है। ऐसा लगता है कि पेपर लीक करना भाजपा नेताओं का पसंदीदा धंधा रहा है, क्योंकि जहां-जहां इनकी सरकारें हैं, तहां-तहां जमकर पेपर लीक हो रहे हैं।

कुछ लोग पूछ रहे हैं कि क्या जेन Z लद्दाख और उत्तराखंड यानी कुल मिलाकर हिमालय से नीचे कभी उतरेगा? भाई साब, जेन Z ऑलरेडी नीचे उतरा हुआ है, लखनऊ से लेकर पटना तक। लेकिन अभी भारत की यह पीढ़ी नेपाल जितनी आक्रामक नहीं हुई है। इसका मतलब यह नहीं कि यह पीढ़ी आक्रामक नहीं है। यह पीढ़ी बाकी सारी पीढ़ियों से कहीं ज्यादा आक्रामक है, कहीं ज्यादा विचारशील है और कहीं ज्यादा फैसलाकुन है। सरकारें तो भाजपा हॉर्स ट्रेडिंग से बचा लेगी, मगर एक बार अगर ये पीढ़ी भड़क गई तो अपने दफ्तर नहीं बचा पाएगी। इसलिए भी नहीं बचा पाएगी, क्योंकि जेन Z जानती है कि नोटबंदी क्यों की गई थी।

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