पत्रकार से पॉवर ब्रोकर बने डॉ प्रणय रॉय का पाखंड और एनडीटीवी का पतन – भाग (5)

पार्ट चार से आगे…. ऐसे में आप यह सोच रहे होंगे कि “प्रचार के औजार” में और शुद्ध तौर पर मीडिया संस्थान में क्या अंतर होता है? इसे समझने के लिए आपको आजतक और एनडीटीवी के बीच के अंतर को समझना होगा. आजतक शुद्ध तौर पर मीडिया संस्थान है. इसलिए वह अपने पत्रकारीय धर्म और कारोबार के बीच संतुलन स्थापित करके चलता है. कुछ अपवादों को छोड़ दीजिएगा तो आमतौर पर ऐसे संस्थान अतिरेक पर नहीं जाते हैं और इनकी कोशिश हमेशा प्रतिस्पर्धा में आगे रहने की होती है. यहां काम करने वालों में यह अहसास बना रहता है कि वो बाजार में खड़े हैं और उन्हें बाजार के नियमों का पालन करना है. इसलिए इस तरह के संस्थान ज्यादा से ज्यादा टारगेट रेटिंग प्वाइंट्स/टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स (टीआरपी) हासिल करने के लिए आपस में होड़ करते दिखेंगे.

आखिर टीआरपी है क्या? टीआरपी बाजार द्वारा बनाया गया एक ऐसा मानक है जिसके आधार पर यह तय होता है कि किस चैनल को किस क्षेत्र -में किस वर्ग के कितने दर्शक देखते हैं. टीआरपी के आधार पर ही कंपनियां अपनी विज्ञापन रणनीति तैयार करती हैं. हमारे यहां मीडिया सेंकेडरी बिजनेस है और मीडिया संस्थानों की आमदनी का मुख्य स्रोत विज्ञापन होते हैं. ऐसे में मीडिया संस्थान टीआरपी से समझौता नहीं कर सकते. इनकी हमेशा यही कोशिश होती है कि ज्यादा से ज्यादा दर्शक अपने पाले में खींच सकें. जरूरत पड़ने पर ये संस्थान सत्तापक्ष को चुनौती भी देते हैं. जनता के पक्ष में कैंपेन भी चलाते हैं. लेकिन सत्ता पक्ष को उखाड़ फेंकेने की कोशिश नहीं करते. यह काम सियासतदानों को करने देते हैं.

वहीं एनडीटीवी में खबरों को पेश करने का तरीका दूसरा है. यह शुद्ध रूप से मीडिया संस्थान नहीं है. इसे “प्रचार के औजार” के तौर पर विकसित किया गया है. इसलिए इसका मॉडल आजतक के मॉडल से अलग है. इसका मूल मकसद सियासी हितों की पूर्ति है. ऐसे मीडिया संस्थान उस समय राज करते हैं जब उनके सियासी धड़े की सरकार होती है. उस समय ये सत्ता पक्ष की पत्रकारिता करते हैं. जब वह सियासी धड़ा विपक्ष में होता है तो ये मीडिया संस्थान सत्ता पक्ष के खिलाफ सुनियोजित तरीके से कैंपेन चलाते हैं. “अभिव्यक्ति की आजादी” और “जनता की पत्रकारिता” जैसे स्लोगन इनके लिए कवच का काम करते हैं. ऐसे मीडिया संस्थानों की आमदनी का मुख्य स्रोत संबंध होते हैं. वही स्रोत बाजार के नियमों के विरुद्ध जाकर उसकी रक्षा करते हैं.

2007-2008 की वैश्विक मंदी के दौरान एनडीटीवी बर्बाद हो गया होता, लेकिन सरकार उसकी अपनी थी इसलिए उसे बचा लिया गया. 2004 से 2014 तक दस साल मनमोहन सिंह की सरकार रही और तब एनडीटीवी कम टीआरपी और तमाम गलत कारोबारी फैसलों के बावजूद बच गया. यह उसकी सत्ता पक्ष की पत्रकारिता का असर था कि मनरेगा और मिड डे मील जैसी योजनाओं के लागू होने पर उनके फायदे गिनाए गए. वोट की खातिर “भीख” के तौर पर उछाले गए चंद रुपयों को क्रांतिकारी कदम करार दिया. किसी ने नहीं पूछा कि 2.5 रुपये से भी कम की खुराक से किसी बच्चे का कितना विकास होगा? भूख और गरीबी जैसी बीमारी को दूर करने के लिए बनाई गई इन बीमार योजनाओं को क्रांतिकारी करार दिया गया. आधार के खिलाफ कोई कैंपेन नहीं चलाया गया. किसी ने जब सत्ताधारी गठबंधन के खिलाफ कोई खबर की तो खबर गिरा दी गई या फिर सरकार में बैठे कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए घुमा दी गई. लेकिन 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद जो भी फैसला लिया गया या फिर नीति लागू की गई एनडीटीवी ने शुरुआत से ही उसके खिलाफ बागी तेवर अख्तियार कर लिया.

मतलब दोनों ही परिस्थितियों में लाइन “सिंपल” है. जब अपनी सरकार हो तो “समाचार” वो जिससे सत्ता पक्ष मजबूत हो. जब विरोधी धड़े की सरकार हो तो खबर वो जिससे सत्ता पक्ष एक्सपोज हो. लेकिन यहां एक बात और ध्यान रखिएगा कि सत्ता पक्ष को एक्सपोज करने के अपने खतरे होते हैं. अगर आप कोई खबर ब्रेक करिएगा, किसी घोटाले से पर्दा उठाइयेगा तो आप पर मुकदमे हो सकते हैं. एनडीटीवी के मालिकान मुकदमों से बहुत डरते हैं. इसलिए खबर ब्रेक करने का काम अन्य संस्थानों को करने देते हैं. जब खबर पब्लिक डोमेन में आ जाती है और सियासी आग सुलगने लगती है तो एनडीटीवी के महान पत्रकार आग भड़काने का काम करते हैं. उन खबरों पर कैंपेन चलाते हैं. जो मीडिया संस्थान कैंपेन नहीं चलाते उन्हें उकसाते हैं. उनकी निंदा करते हैं. ये खुद खबर नहीं करते, ये दूसरों की खबरों पर भाषण देकर खुद के ईमानदार और प्रतिबद्ध होने का भ्रम रचते हैं.

यहां बहुत से लोग इसे वैचारिक प्रतिबद्धता बता सकते हैं. लेकिन यह वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं है. वैचारिक तौर पर प्रतिबद्ध पत्रकार की निष्ठा विचार से होती है, सत्ता में शामिल व्यक्तियों से नहीं. व्यक्ति तभी तक अहमियत रखता है जब तक वह विचार के साथ खड़ा है, अगर सत्ता के मोह में व्यक्ति ने विचार का साथ छोड़ा तो वैचारिक तौर पर प्रतिबद्ध पत्रकार और उसका संस्थान उस व्यक्ति के खिलाफ भी खड़ा नजर आएगा. प्रभाष जोशी इसके सबसे बड़े उदाहरण थे. उनका रुझान दक्षिणपंथी था. मगर जब बाबरी मस्जिद ढहाई गई तो उन्होंने बीजेपी और संघ के खिलाफ लंबा कैंपेन चलाया. जिस समय अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और लालकृष्ण आडवाणी उप प्रधानमंत्री, उस समय भी प्रभाष जोशी उन्हें “हिंदू होने का धर्म” सिखाते रहे. मानवीय मूल्यों को लेकर “कागद कारे” करते रहे.

लेकिन एनडीटीवी की बात दूसरी है. यहां प्रतिबद्धता विचार के साथ नहीं है बल्कि व्यक्तियों के साथ है. व्यक्तियों के साथ उसकी यही प्रतिबद्धता उसे एक जैसी दो खबरों पर दो तरह की प्रतिक्रिया देने को मजबूर करती है. प्रीति जैन के मामले में आरोपों के घेरे में मधुर भंडारकर थे और उनसे एनडीटीवी के मालिकों के हित नहीं जुड़े थे इसलिए उनके खिलाफ कैंपेन चलाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई. तब नैतिकता का सवाल नहीं उठा. जाह्नवी प्रकरण में सवालों के घेरे में बच्चन परिवार था. अमिताभ बच्चन के साथ डॉ रॉय के व्यक्तिगत ताल्लुकात थे. अमिताभ बच्चन के संबंध अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव से थे. उस समय मनमोहन सिंह सरकार को गाहे-बगाहे समाजवादी पार्टी के समर्थन की जरूरत पड़ती थी. अमिताभ बच्चन की बिटिया श्वेता बच्चन का एनडीटीवी प्रॉफिट पर एक खास शो आता था. मतलब रिश्ते कई स्तर पर थे. इसलिए नैतिकता का सवाल उठाया गया. लेकिन उसके लिए भी खबर पलटने का इंतजार किया गया.

जाह्नवी प्रकरण के बहाने दिबांग को संपादक पद से हटाया गया, मगर असली वजह दूसरी थी. डॉ रॉय और मिसेज रॉय, दिबांग को लेकर कम्फर्टेबल नहीं थे. रॉय सत्तापक्ष की पत्रकारिता करना चाहते थे और दिबांग की अगुवाई में उनकी टीम “बहक” जा रही थी. मैं अक्टूबर 2004 में एनडीटीवी गया था. तब राजदीप सरदेसाई भी एनडीटीवी में ही हुआ करते थे. उन शुरुआती दिनों का एक वाकया मुझे आज भी याद है. तब मेरे जिम्मे मॉर्निंग शिफ्ट थी. आउटपुट हेड नरेंद्र पाल सिंह ने मुझे एक खबर पर “खास ध्यान” देने को कहा. वह खबर कांग्रेस बीट के रिपोर्टर की थी और उसमें एक बड़े कांग्रेसी नेता की चापलूसी थी. मैंने कई घंटे वह खबर नहीं चलने दी. बाद में राजदीप चीखते हुए मेरे पास आए और बोले की आप लोग सिर्फ दो लोगों के लिए काम करते हैं. उनका इशारा दिबांग और नरेंद्र पाल सिंह की ओर था. मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. क्योंकि संपादक कौन होगा यह मालिक का अधिकार क्षेत्र होता है और संपादक का आदेश मानना संपादकीय टीम का दायित्व. अब संपादक मालिक के इशारे पर चले या नहीं चले – यह मालिक और संपादक के बीच की बात है. फिर वो दिन भी सामने आया जब डॉ रॉय ने संपादक बदल दिया. दिबांग की जगह एक ऐसे आदमी- औनिंद्यो चक्रवर्ती को उस कुर्सी पर बिठा दिया जो डॉ रॉय की ही जुबान बोलता था. उनके इशारे अच्छी तरह समझता था. उसे हिंदी नहीं आती थी और वह हिंदी चैनल का संपादक बना. एंकर भी बना. डॉ रॉय और मिसेज रॉय को संपादक नहीं चाहिए था. उन्हें भोंपू की जरूरत थी और वह अच्छा भोंपू निकला.

एनडीटीवी पर डॉ प्रणय रॉय का विज्ञापन अक्सर नजर आता है. उसमें वो दावा करते हैं कि एनडीटीवी खबरों की दुनिया का सबसे विश्वसनीय नाम है. मैं जब भी वह विज्ञापन देखता हूं तो मन में यही सवाल उठता है कि वो आखिर किसके विश्वास की बात कर रहे हैं? उनके तीनों न्यूज चैनल अपने-अपने वर्ग में आखिरी पायदान पर हैं. 100 में 2 दर्शक भी एनडीटीवी इंडिया को नहीं देखते. दर्शकों के विश्वास की परवाह होती तो वह उसे हासिल करने की कोशिश करते. चैनल की प्रोग्रामिंग मजबूत करते. लेआउट सुधारते. कंटेंट और पैकेजिंग पर ध्यान देते. जो ठीक से हिंदी नहीं बोल सके उसे एंकर नहीं बनाते. कुछ खबरें ऐसी करते कि हलचल मचा देते. लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया.

2007 से 2010 का दौर हर लिहाज से “महान” दौर था. देश में “श्रेष्ठ शासन” था. मनमोहन सिंह के जरिए सोनिया गांधी देश पर हुकूमत कर रही थीं. “श्रेष्ठ पत्रकारिता” थी. तमाम चैनलों पर क्रांतिकारी संपादक थे. टीवी पत्रकारिता 3सी1एस (3C1S) के कॉन्सेप्ट पर सिमट गई थी. 3C1S मतलब क्राइम, क्रिकेट, सिनेमा और सेक्स. उन दिनों एनडीटीवी के महान पत्रकार खबर करने की जगह शर्म किया करते थे. जब शर्म ज्यादा आने लगती तो दलितों की दुकान और मुजरा करने वाली महिलाओं का दर्द दिखा दिया करते थे. भांटगीरी के उस दौर में जब चैनल तेजी से पिछड़ने लगा तो फ्रंट फुट पर खेलने की जगह डॉ रॉय ने नैतिकता का पाखंड रचना शुरू किया.

सरकार अपनी थी इसलिए सत्ता के खिलाफ खबर कर नहीं सकते थे. जो बचा हुआ स्पेस था उसमें भी कुछ करने की गुंजाइश उन्होंने खत्म कर दी. क्राइम शो बंद कर दिए गए. मुझे अच्छी तरह याद है उन दिनों कुमार संजोय सिंह एक नए क्राइम शो के कॉन्सेप्ट पर काम कर रहे थे. वह काम भी रोक दिया गया. फिल्मी गॉशिप बंद कर दी गई. सिनेमा के शो में पीआर के अलावा कुछ होता नहीं था. क्रिकेट जैसे मनोरंजक खेल के शो भी सबसे उबाऊ अंदाज में बनाए जाते थे. उसी दौर में बॉम्बे लॉयर्स जैसा घटिया सीरियल एनडीटीवी इंडिया के प्राइम टाइम पर चला दिया गया. उन दिनों डॉ रॉय एनडीटीवी इमैजिन लॉन्च करने की तैयारी में थे. बॉम्बे लॉयर्स नाम का यह सीरियल उसी तैयारी के तहत बनवाया गया था. लेकिन इमैजिन की क्वालिटी टीम ने इसे खारिज कर दिया. सीरियल बनाने वाले के “संबंध” डॉ रॉय से थे. कहते हैं कि वही “संबंध” निभाने के लिए बॉम्बे लॉयर्स को उन्होंने एनडीटीवी इंडिया पर चलवा दिया. कुल मिला कर टीआरपी बढ़ाने की कोई कोशिश नहीं की गई. फैसले ऐसे लिए गए जिससे टीआरपी गिरती चली गई. उन दिनों एनडीटीवी ने सिर्फ संबंध निभाए. सत्ता पक्ष की पत्रकारिता की. इसके अलावा जो कुछ शेष था, वह शर्म थी. उसी शर्म का सौदा करके कुछ पत्रकार खुद को चमकाने में जुटे थे.

जहां तक निवेशकों के भरोसे की बात है शेयर बाजार में एनडीटीवी का भाव इसकी सच्चाई बयां करता है. 2008 में एनडीटीवी के प्रत्येक शेयर की कीमत 470 रुपये हुआ करती थी. आज ये भाव 30 रुपये के करीब है. इनके सियासी खेल में न जाने कितने निवेशक तबाह हो गए होंगे. उनकी खून-पसीने की कमाई बाजार में डूब गई होगी. भरोसा टूट गया होगा. लेकिन इससे भी डॉ प्रणय रॉय और मिसेज रॉय को कोई फर्क नहीं पड़ता इनकी अपनी दूकान चलनी चाहिए.

आखिर में, दर्शक हैं नहीं और निवेशकों का भरोसा बचा नहीं. तो फिर डॉ रॉय अपने विज्ञापन में किस भरोसे की बात करते हैं? और किसके भरोसे की बात करते हैं? ये विश्वास शासकों के उस धड़े का है जिसमें वो शामिल हैं. जनता, नैतिकता, मूल्य और अभिव्यक्ति की आजादी – इन सबकी आड़ में ये अपना और शासक वर्ग के उसी धड़े का हित साधते हैं. डॉ रॉय और राधिका रॉय ने यह जो छद्म रचा है, उससे जब पर्दा उठता है तो एक भ्रष्ट तस्वीर उभरती है. ऐसी तस्वीर जिसमें सियासत के रंग बहुत गाढ़े हैं और पत्रकारिता की स्याही बेहद हल्की है. (समाप्त)

(नोट: एनडीटीवी पर लिखने को बहुत कुछ है. खबरों की आड़ में सौदेबाजी के ढेरों उदाहरण तो मैं ही जानता हूं. मनमोहन सरकार के दौरान पीएमओ से मिलने वाले आदेश की चर्चा कर ही चुका हूं. कुछ लोगों का कहना है कि मनमोहन के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने अपनी किताब में जिस घटना का जिक्र किया था और मैंने जिस घटना का जिक्र किया है दोनों अलग-अलग हैं. मतलब जिन्हें मैं पीएमओ के दखल का एक मामला समझ रहा था वो पीएमओ दखल के दो मामले निकले. उनके अलावा वोल्कर प्रकरण, राडिया कांड, अमर सिंह टेप प्रकरण, बीएमडब्लू कांड, समेत बहुतेरे मामले ऐसे हैं जिसमें इस चैनल की भूमिका संदेहास्पद है. हवाला ट्रांजेक्शन और वित्तीय अनियमितता/भ्रष्टाचार के अन्य मामले तो अपनी जगह हैं ही. एक वाकया तो बेहद खौफनाक था. एक प्रतिबद्ध रिपोर्टर ने जान की बाजी लगा कर एक स्टिंग ऑपरेशन किया और मालिकों ने उसका सौदा कर लिया. उस स्टिंग ऑपरेशन पर आधे घंटे का विशेष मैंने ही बनाया था. बीस घंटे प्रोमो चलाने के बाद रात में वह खबर ही गोल कर दी गई. गुस्ताखी माफ लगा दिया गया. दर्शकों के साथ कितना बड़ा धोखा किया गया. हम लोगों का सिर शर्म से झुक गया था. उस रिपोर्टर पर क्या बीती होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. लेकिन डॉ रॉय और मिसेज रॉय को इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता है. क्योंकि यहां “समाचार” की शर्त “सिंपल” है. इस प्रकरण पर भी कभी विस्तार से चर्चा होगी. अभी इतना ही.)

(समाप्त)

लेखक समरेंद्र सिंह एनडीटीवी न्यूज चैनल में लंबे समय तक काम करने के बाद अब अपना उद्यम करते हुए फेसबुक पर बेबाक लेखन करते हैं.

इसके पहले वाले पार्ट पढ़ें….

पत्रकार से पॉवर ब्रोकर बने डॉ प्रणय रॉय का पाखंड और एनडीटीवी का पतन – भाग (4)

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पत्रकार से पॉवर ब्रोकर बने डॉ प्रणय रॉय का पाखंड और एनडीटीवी का पतन – भाग (3)

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पत्रकार से पॉवर ब्रोकर बने डॉ प्रणय रॉय का पाखंड और एनडीटीवी का पतन – भाग (2)

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पत्रकार से पॉवर ब्रोकर बने डॉ प्रणय रॉय का पाखंड और एनडीटीवी का पतन – भाग (1)

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