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छत्तीसगढ़

महिला रेलकर्मी ने जीएम के साथ डुएट गाने से मना किया तो हुआ ट्रांसफर, थमा दी चार्जशीट

”पिछले 8 सालों से रेलवे में कल्चरल कोटे के तहत काम कर रही हूं। हर साल मंडल को नेशनल इंटर कंम्पटीशन में जिताती आ रही हूं। लेकिन आज तक कभी सम्मान या अवार्ड नहीं मिला। उल्टा अधिकारीयों की पर्सनल पार्टियों में घर जाकर गाना गाना पड़ता है। फिर चाहे दिवाली का मौका हो या न्यू ईयर का।” यह आपबीती है उस महिला सीनियर क्लर्क की जिसे रेलवे जीएम सत्येंद्र कुमार के साथ गाना न गाने पर सबसे बड़ी अनुशासन हीनता बताते हुये चार्जशीट और ट्रांसफर ऑर्डर दिया गया।

”पिछले 8 सालों से रेलवे में कल्चरल कोटे के तहत काम कर रही हूं। हर साल मंडल को नेशनल इंटर कंम्पटीशन में जिताती आ रही हूं। लेकिन आज तक कभी सम्मान या अवार्ड नहीं मिला। उल्टा अधिकारीयों की पर्सनल पार्टियों में घर जाकर गाना गाना पड़ता है। फिर चाहे दिवाली का मौका हो या न्यू ईयर का।” यह आपबीती है उस महिला सीनियर क्लर्क की जिसे रेलवे जीएम सत्येंद्र कुमार के साथ गाना न गाने पर सबसे बड़ी अनुशासन हीनता बताते हुये चार्जशीट और ट्रांसफर ऑर्डर दिया गया।

इतना ही नहीं, रात 2 बजे तक उन्हें पार्टी में ही रोके रखा गया। हालाँकि इस हरकत का खुलासा होते ही जीएम से लेकर डीआरएम तक अपनी बचाते दिखे और ऑर्डर वापस ले लिया गया। लेकिन इनकी ओहदे की गरमी देखिये कि किसी ने गाना नहीं गया तो चार्जशीट देकर ट्रांसफर कर दिया।

दरअसल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जोन के जीएम सत्येंद्र कुमार 31 जनवरी को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसलिये महोदय के सम्मान में 16 जनवरी को राजधानी रायपुर में एक विदाई की हाई प्रोफाइल पार्टी का आयोजन किया गया। और इसी दौरान महिला क्लर्क को उनके साथ गाना गाने के लिए बोला गया। जिस पर पीड़िता ने मना कर दिया। हालाँकि उन्होंने इसकी वजह गाना याद न होना बताई। लेकिन यह बात चमचों के गले की फ़ांस बन गई। रायपुर डीआरएम राहुल गौतम के मुताबिक तो यह सबसे बड़ी लापरवाही है और इसीलिये जीएम के साथ डुएट न गाने जैसी अनुशासन हीनता कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी। बस इसीलिये चार्जशीट दी गई।

इस मामले को दैनिक भास्कर के सीनियर जर्नलिस्ट सन्दीप रजवाड़े ने बड़ी प्रमुखता से उठाया। मीडिया में मुद्दा गरमाता देख मण्डल अधिकारीयों के पसीने छूट गये। दी गई चार्जशीट और ट्रांसफर ऑर्डर पर उन्हें कोई जानकारी ही नहीं, ऐसी बयानबाजी करने लगे। यहां तक कि कुछ इसे खुद ही गलत ठहराते हुये कहने लगे कि ऐसा ऑर्डर निकलता है तो मजबूरन साइन करने पड़ते हैं। अब यह मजबूरी पद की है या चमचागिरी की, यह वही बेहतर बता पायेंगे।

खैर, जब कर्मचारियों की बजाय चमचों का कोई झुण्ड किसी सरकारी विभाग में घुस जाता है तो ऐसे ही तुगलकी फरमान जारी होते हैं। न जाने ऐसे और कितने किस्से होंगे जो साहब की विदाई के साथ ही दब जायेंगे। बाकी सरकारी तन्त्र में जो अपने पद का दुरुपयोग न करे, वो काहे का सरकारी। आप ज्यादतियों पर ज्यादतियां करते रहिये, ज्यादा होगा तो ट्रांसफर हो जायेगा।

आशीष चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर

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