तो इस तरह जनता को मूर्ख बनाती है मध्यप्रदेश सरकार की हेल्पलाईन!

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की हेल्पलाईन की तारीफ सुननी होतो आपको बड़े-बड़े विज्ञापन मिल जायेंगे। वेबसाईट की भी माने तो अब तक करीब 50 लाख शिकायतें यहां दर्ज हुई हैं। जिनमें से 47 लाख का निराकरण भी हो गया है। लेकिन हकीकत पर जायें तो निराकरण का यह आंकड़ा आधा भी नहीं होगा। हेल्पलाईन प्रदेश की जनता को किस प्रकार मूर्ख बनाती है। इसका जबरदस्त उदाहरण इंदौर में देखने मिला है। शिकायतकर्ता के मुताबिक उसने 10 नवम्बर को टेलीफोन नगर क्षेत्र के मकान नम्बर 208 में अवैध ढंग से चल रहे होटल और हॉस्टल “इंडियन जायका” के विरुद्ध कम्प्लेन दर्ज कराई थी।

कम्प्लेन में होस्टल में रहने वालों द्वारा लड़कियों को छेड़ने/सीटी मारने जैसी बात भी लिखाई गई। शिकायतकर्ता ने बताया कि कॉलोनी की लड़कियां जब रास्ते से निकलती हैं। तो हॉस्टल के लड़के उनको सीटी मारते हैं। इतना ही नहीं हॉस्टल में हर तरह की नशाखोरी होती है। मारपीट होती है। इन्हीं सबकी शिकायत उसने सीएम हेल्पलाईन में की थी। ताकि हेल्पलाईन की मदद से हॉस्टल और होटल पर कार्रवाई हो सके।

लेकिन कमाल की बात है कि हेल्पलाईन के कॉल सेंटर प्रतिनिधि ने होटल/हॉस्टल का नाम तक गलत लिखा और साथ ही उसका पता भी नहीं डाला। और उस पर भी आश्चर्य यह कि करीब 19 दिन बाद बिना शिकायतकर्ता से सम्पर्क किये शिकायत का निराकरण हो गया बताकर शिकायत क्लोज कर दी गई। वैसे हेल्पलाईन की धांधली का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे भी बड़े स्तर के कारनामे शिवराज के भ्रष्ट और कामचोर अधिकारी अंजाम दे चुके हैं। खैर हेल्पलाईन को क्या फर्क पड़ता है कि कोई लड़की आज छिड़ रही है। कल को उसके साथ कोई अप्रिय घटना हो जाये। क्योंकि सीएम महोदय के मुताबिक प्रदेश की सड़कें विदेशी सड़कों से बेहतर है। तो प्रदेश भी किसी दूसरे देश से बेहतर होगा।

आशीष चौकसे
एसोसिएट एडिटर, भड़ास4मीडिया
ashishchouksey0019@gmail.com

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कंज्यूमर फोरम के अध्यक्ष ने की एसपी से शिकायत- ”दैनिक भास्कर का पत्रकार डाल रहा दबाव”

बिलासपुर : रायपुर, राजनांदगांव के बाद अब बिलासपुर शहर से दैनिक भास्कर के पत्रकार की करतूत सामने आ रही है। इस बार कंज्यूमर फोरम के अध्यक्ष ने एसपी को लिखित शिकायत दी है कि एक पत्रकार आशीष दुबे जो खुद को दैनिक भास्कर में कार्यरत बताता है, उसके द्वारा किसी केस में फैसला अपने परिचित के हक में करवाने दबाव डाला जा रहा है। वायरल हुई इस शिकायत का असर इतना जोरदार हुआ कि खुद प्रेस क्लब के एक बंदे को मामला दबाने तुगलकी फरमान जारी करना पड़ा कि इस खबर को जो भी चैनल या अखबार लगायेगा तो उस पर अनुशासनहीनता की कार्रवाई की जायेगी। हालांकि मिली जानकारी के मुताबिक प्रेस क्लब अध्यक्ष ने ऐसे किसी फरमान से पल्ला झाड़ लिया है।
खबर की भाषा बता रही है इरादे..

1 नवम्बर को डीबी स्टार में फोरम से सम्बंधित खबर छपी है। वायरल हुये शिकायत पत्र में इस खबर का भी जिक्र है कि ऐसी निराधार खबरें दबाव डालने बनाई जा रही हैं। बहरहाल खबर कुछ केसेज का हवाला देकर बनाई गई है। जिसमें पहला केस ही उन महोदय का है जिनके पक्ष में तथाकथित पत्रकार फैसला करवाना चाहते हैं। यही नहीं अगर हम ध्यान दें तो सीधी बात का जो वर्जन फोरम के अध्यक्ष का लिया गया है। वह भी केवल उसी केस से जुड़ा है। खबर की भाषा, केसेज और लिए गए वर्जन को अगर एक सूत्र पिरोएं तो समझ आयेगा की यह खबरें किसी विशेष इरादे से ही लगाई जा रहीं है।

आशीष चौकसे
एसोसिएट एडिटर
भड़ास4मीडिया

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दैनिक भास्कर में ये क्या छप गया! गई दो पत्रकारों की नौकरी

हैडिंग में कोई शायरी नहीं है। बल्कि हकीकत है दैनिक भास्कर के रायपुर एडिशन की। आनंद पांडे जी के जाने के बाद जब से शिव दुबे को रायपुर भास्कर का संपादक बनाया गया है। भास्कर की छीछालेदर होती जा रही है। ताजा उदाहरण है कि 14 अक्टूबर के सिटी भास्कर में खबर में ऐसे शब्द शामिल हैं जिन पर कड़ी आपत्ति आते ही 2 कर्मियों तन्मय अग्रवाल और सुमन पांडे की विदाई कर दी गई है।

दरअसल गलती खबर बनाने वालों की नहीं है क्योंकि उन्हें तजुर्बा ही नहीं… उन्हें पता ही नहीं कि किसी ने अपने किरदार का नाम “गाली” रखा हो तो उसे घुमाकर परोसा जाता है। उन्होंने तो सीधे-सीधे किरदारों के नाम लिखकर छाप दिए थे। अब हुआ यूं कि जब ऊपर से शिव दुबे की सिंकाई हुई तो उसने दोनों कर्मियों को तत्काल रिलीव कर दिया।

अंदर की बात यह है कि तन्मय अग्रवाल, शिव दुबे का खास बन्दा था। दुबे को पता था सिटी भास्कर को निकालने और पब्लिक के टेस्ट को पकड़ने का हुनर उसके किसी और खास आदमी में नहीं है। इसीलिए उसने तन्मय को सुनहरे भविष्य के सपने दिखाकर भास्कर से जाने नहीं दिया था। लेकिन जब माई बाप से प्रेशर पड़ा तो उसी ने तन्मय की विदाई कर दी। वैसे यह वही शिव दुबे हैं जो सन्डे के दिन IIT का रिजल्ट डिक्लेयर होने की खबर बनवा रहा था जिसे मैंने रुकवाया था। क्योंकि सन्डे को एग्जाम तो कंडक्ट हो सकते हैं लेकिन रिजल्ट डिक्लेयर नहीं हुआ करते।

नमूनों से भरी है नई टीम

24 अक्टूबर के रायपुर सिटी भास्कर के फ्रंट पेज की लीड खबर में ट्रांसपेरेंट शब्द की बजाय “न्यूड” का बारबार इस्तेमाल किया गया है। अब जाहिर सी बात है ट्रेनी पत्रकारों को या नौसिखियों को कम तनख्वा देकर बिठाओगे तो यही सब तो पढ़ने मिलेगा।

आशीष चौकसे
पत्रकार और ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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रिलायंस जियो उतरा ठगी पर, बढ़ते कंपटीशन के चलते झूठ बोलकर धोखे से करवा रहे रिचार्ज!

रिलायंस जियो भले ही पैसे के दम पर मीडिया के द्वारा अपनी पॉजिटिव पब्लिसिटी करवा रहा हो लेकिन हकीकत यह है, कि यह कम्पनी फ़्रॉड कर रही है। इसके पीछे की वजह है 4G इंटरनेट में बढ़ता कॉम्पटीशन। इसके चलते रिलायंस स्टोर वाले ग्राहकों से झूठ बोलकर रिचार्ज करवा रहे हैं। दरअसल अन्य मोबाइल कंपनियों ने भी 4G इंटरनेट के बेहतरीन प्लान निकाले हैं। जिसके चलते जियो को कड़ी टक्कर मिल रही है।

गौरतलब है कि जियो लगातार अपने प्लान में फेरबदल कर रहा है। कभी यह 28 दिन की वैलिडिटी कर देता है, कभी 56 दिन की तो कभी 84 दिनों की। ऐसे में कस्टमर उन कम्पनियों की तरफ आकर्षित होता है जिनका प्लान जियो से बेहतर है। इसी के चलते रिलायंस केयर या स्टोर वाले झूठ बोलकर अधिक वैलिडिटी बताकर रिचार्ज करवा रहे हैं जिसका पता कस्टमर को रिचार्ज होने के बाद चलता है।

इंदौर में सामने आया ये मामला

जियो ग्रुप की ठगी का मामला इंदौर में सामने आया है। जहां ओल्ड पलासिया स्थित जियो सेंटर (केयर) के मैनेजर राहुल गुप्ता ने कस्टमर को 84 दिन की वैलिडिटी बताकर 509 से रिचार्ज करवा लिया। बाद में कस्टमर को केवल 56 दिन की ही वैलिडिटी मिली। यानी कुल घाटा देखा जाये तो जियो के ही प्लान के मुताबिक 28 दिन और 56GB 4G डाटा की प्राईज 2000 रुपये के करीब होती है। इसकी शिकायत करने पर राहुल गुप्ता ने सॉरी गलती हो गई कह कर पल्ला झाड़ लिया। इस ठगी पर जियो ग्रुप द्वारा कोई एक्शन न लेना कम्पनी के फरेब के इरादे को जाहिर करता है।

आशीष चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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‘राजस्थान पत्रिका’ अखबार का एक और कारनामा… ‘श्रीमती राहुल गांधी’ छाप डाला!

सीधी बात तो यह है कि ‘पत्रिका’ अखबार खुद में ब्लंडर्स का स्पेशल एडिशन है। इसी फेहरिस्त में चुरु से निकलने वाला ‘पत्रिका’ का एडिशन भी पीछे नहीं रह गया है। दरअसल 15 अगस्त के मौके पर कांग्रेस पार्टी की ओर से मिले बड़े से विज्ञापन में वहां के होनहार कर्मियों ने सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी को भी “श्रीमती” लगाकर बड़े में छाप दिया। अब पत्रिका या कोठारी जी को गलतियां भूलकर आगे बढ़ने की आदत होगी लेकिन उनका क्या, जिनको लगता है कि गलतियां सबक लेने के लिए होती हैं, न कि एक लेवल ऊपर होकर फिर से करने की चीज।

इसके पहले भी पत्रिका ने “उल्टा तिरंगा” पकड़ी युवती को बड़े में छापकर देशभक्ति की मिसाल दी थी। और तो और, छत्तीसगढ़ वालों ने तो फुल पेज विज्ञापन में CM रमन सिंह को PM रमन सिंह बताकर छाप दिया था। तो भई ऐसा है कि किसी कार्यक्रम में माइक मिलने के बाद ज्ञान देना या खुद से खुद को महान बताने का काम कोई भी कर सकता है। अगर आपका वजूद मीडिया क्षेत्र से है तो नमूना से आगे बढ़कर ब्रांड बनने पर जोर लगाइये।

आशीष चौकसे
ब्लागर और पत्रकार
ashishchouksey0019@gmail.com

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वर्किंग आवर में मोबाईल में बिजी SBI कर्मचारी, 4 दिन में भी नहीं खुला खाता (देखें वीडियो)

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के हबीबगंज ब्रांच के SBI बैंक का स्टिंग सामने आया है। यह स्टिंग बैंक में खाता खुलवाने कई दिनों से भटकती एक महिला ने किया है। दरअसल महिला का खुद का खाता इसी ब्रांच में है। लेकिन जब वे अपने बच्चे का खाता खुलवाने आईं तो उन्हें घण्टो इंतजार करवाया गया। कभी स्टाफ न होने की बात कही गई तो कभी काम अधिक होने का हवाला दिया। थककर उन्होंने इस तरह की हरामखोरी को उजागर करने का फैंसला किया।

स्टिंग में साफ समझ आ रहा है कैसे वहां के कर्मचारी टाइम पास करते हैं। और किसी न किसी बहाने से काम टालकर लोगों को चक्कर कटवा रहे हैं। आपको बता दें कि कुछ समय पहले हुई नोटबन्दी में बैंक कर्मियों को एक्स्ट्रा वर्क करना पड़ा था। जिसके चलते न केवल कर्मियों ने अधिक भत्ता मांगा था, बल्कि स्ट्राइक भी की थी। लेकिन हकीकत में यह कैसे सरकारी तनख्वा पाकर मुफ्तखोरी की कुर्सी तोड़ते हैं, सरकार और आम जनता यह भी देख ले।

कर्मचारी नम्बर 1- स्टिंग में वर्किंग आवर में मोबाईल में घुसा एक बेहद बिजी कर्मी नजर आ रहा है। महाशय इतने व्यस्त थे कि उनके पास आने वालों को यह कहकर टरका रहे थे कि बहुत काम है मैं आज ही आया हूं। अब चिट चैट करके शायद वही निपटा रहे हों।

कर्मचारी नम्बर 2- एकाउंट ओपन करने का जिम्मा जिन मोहतरमा का है वे नदारद थीं। पीड़िता ने जब इतने दिनों में भी एकाउंट ओपन न होने की वजह पूछी तब उनको यही बताया गया। इसका मतलब मोहतरमा अगर लम्बी छुट्टी पर निकल जायें तो उनकी वापसी तक बैंक में एक भी खाता नहीं खुलेगा।

कर्मचारी नम्बर 3- अमूमन लंच ब्रेक 30 मिनट का होता है। लेकिन जिन जनाब को पासबुक एंट्री या करेक्शन के लिए मोटी तनख्वा देकर बिठाया गया है। वे चाय नाश्ते के बहाने घण्टों अपनी सीट से गायब रहते है।

बहरहाल एक तरफ तो सरकार खाते खुलवाने जनता पर दबाव डालती है वहीं दूसरी तरफ बैंक के ऐसे सुस्त मुर्गे उसी जनता को चक्कर कटवाते हैं। इसीलिए इस खबर में हमने किसी “उच्च अधिकारी” से बात नहीं की क्योंकि हमें उनकी लीपापोती और झूठी सफाई में कोई दिलचस्पी नहीं है। बैंक में किस तरह का काम, आराम और हरामखोरी हो रही है उसका बड़ा उदाहरण आपके सामने हैं।

महिला द्वारा किए गए स्टिंग को देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

आशीष चौकसे
पत्रकार और ब्लॉगर
8120100064

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दैनिक भास्कर ने अपने कर्मियों से कहा- ”10 लाख नए पाठक जोड़ने हैं, प्रति पाठक 150 रुपये मिलेंगे!”

दैनिक भास्कर ग्रुप ने ऑफिशियल लेटर जारी कर अपने कर्मियों को इस साल 10 लाख नये पाठक जोड़ने का टारगेट बताया है और इसके लिए उसने अपने कर्मियों को ऑफर दिया है कि वे नये पाठक जुड़वायें जिसके लिए उन्हें प्रति पाठक 150 रुपये का कमीशन या प्रोत्साहन राशि मिलेगी। बहरहाल इस ऑफर के बाद कुछ कर्मी यह सोच रहे हैं कि क्या अब पत्रकारिता “टारगेट जॉब” तो नहीं बन जायेगी? हो सकता है कस्टमर न लाने वालों का इंक्रीमेंट/प्रमोशन भी कंपनी रोक दे।

खैर खुद का प्रचार प्रसार विस्तार करने का हक हर ब्रांड को होता है लेकिन, 1 साल में 10 लाख पाठक जोड़ने जैसा बड़ा टारगेट बनाने वाला और खुद को देश का नम्बर 1 अखबार कहने वाले भास्कर ग्रुप ने ऑफिशियल लैटर में खुद को करीब 10 हजार कर्मियों की कंपनी होने का दावा किया है। साथ ही लेटर में विश्व का चौथा सबसे अधिक प्रसार संख्या वाला अखबार भी बताया है। तो फिर अपने कर्मियों को पर्याप्त सेलरी या मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देने की बात उठने पर भास्कर की यही “ब्रांड वैल्यू” कम कैसे हो जाती है, यह सोचने वाली बात है।

आशीष चौकसे
पत्रकार और ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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फर्जी ब्रांड ikall से सावधान… खराब प्रोडक्ट्स भेजकर ग्राहकों से कर रही है ठगी

इंडियन कम्पनी iball से मिलते जुलते नाम वाली एक कम्पनी ikall ऑनलाइन मार्केट के जरिये लोगों से ठगी कर रही है। आपको बता दें कि यह कम्पनी दूसरे कॉमन प्रोडक्ट्स को अपना बताकर यानी पैकेजिंग में ikall वाला हॉलमार्क लगाकर कई गुना दामों पर बेच रही है। इसके लिए यह homeshop18 और इस जैसी अन्य ऑनलाइन सेलिंग वेबसाइट्स की मदद ले रही है।

इतना ही नहीं यह प्रोडक्ट्स पर गारंटी/वारंटी देने और कस्टमर केयर होने का भी दावा करती है। लेकिन मध्यप्रदेश से जो केसेज मिले हैं उनके मुताबिक पैसे मिलने के बाद यह कम्पनी तड़ीपार हो जाती है। इन्होंने छोटे दुकानदारों को अपना सर्विस सेंटर दे रखा है जिनको यह ऑथराइज्ड बताते हैं लेकिन हकीकत में यह उनके द्वारा बनाई गई जॉब शीट तक ओपन नहीं करते। जिसके चलते खरीददार महीनों-महीनों सर्विस सेंटर के चक्कर काटता है।

फ़िलहाल इस फर्जी कम्पनी के खिलाफ एक कस्टमर ने कंज्यूमर फोरम में केस करने की तैयारी कर ली है। कस्टमर के मुताबिक उसने एक स्मार्टवाच मंगवाई थी जो डिफेक्टिव निकली। शिकायत करने के बाद से महीनों तक उसे सर्विस सेंटर भटकाया गया जिसके बाद उसने homeshop18 और ikall के nikon systems privet ltd (Delhi) के खिलाफ नोटिस भेजकर कंज्यूमर फोरम की कार्रवाई करने की बात कही है।

Ashish Chouksey
Journalist
ashishchouksey0019@gmail.com

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लोकसभा अध्यक्ष के बंगले में देर रात बजता रहा डीजे, अगल-बगल वाले परेशान

नियम, कायदे, कानून की डायन नेताओं के घर जाती ही नहीं

शनिवार की रात एक बंगले पर देर रात तक डीजे बजने की सूचना मिली। मैंने पूछा किसका बंगला है? तो पता चला BJP से सांसद और लोकसभा अध्यक्ष “सुमित्रा महाजन” का। यह सुनकर मैंने बोला भाई… कान में रुई ठूंस और सो जा! वरना जो गाना बज रहा है “आज रात का सीन बना ले” उसको एन्जॉय कर। क्योंकि मुझे यह पता है कि नियम, कायदे, कानून की जो डायन होती है वो एक घर छोड़कर चलती है। और वो घर नेताओं का होता है। और रही बात पुलिस में शिकायत करने की तो इंदौर के ठुल्ले ऐसी जगह सिर्फ सलामी देने पहुंचते हैं।

इंदौर शहर में महाजन परिवार का बड़ा सा बंगला है। लोकसभा अध्यक्ष यहां अक्सर वीक एंड पर आती हैं। यानी शनिवार और रविवार। तो महोदया आईं होंगी तो पार्टी रख ली गई। हाँ ये बात अलग है कि नेताओं की पार्टी में अय्याशी और मस्ती थोड़ी ज्यादा होती है। अब भई जनप्रतिनिधि तो जनता ने ही बनाया है। ऐसे में जनता के कैश पर ऐश करना उनका संवैधानिक अधिकार हुआ।

आशीष चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर
इंदौर
ashishchouksey0019@gmail.com

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इस्तीफा देने को मजबूर करने पर मीडियाकर्मी ने भास्कर प्रबंधन की लेबर आफिस में शिकायत की!

अन्यथा पेमेंट और ग्रेच्यूटी रोकने की धमकी देता है…

जिद से दुनिया बदलने वाले दैनिक भास्कर के बिलासपुर प्रबंधन द्वारा एक मीडियाकर्मी से जबरन इस्तीफा लेने का केस सामने आया है। यह हम उस शिकायत पत्र के आधार पर कह रहे हैं जो सहायक श्रमायुक्त, बिलासपुर को पीड़ित द्वारा दिया गया है। इस शिकायत पर सहायक श्रमायुक्त कार्यालय से जवाब तलब हेतु नोटिस भी जारी किया गया है।

क्या है शिकायती पत्र में…

मैं अमित कश्यप पिता दयाराम कश्यप, 16 सितंबर 2008 से दैनिक भास्कर, बिलासपुर में कार्यरत हूं। 21 फ़रवरी 2017 को यकायक स्थानीय यूनिट हेड अभिक सूर और एच.आर. हेड सुबोध पंडा द्वारा केबिन में बुलाकर नौकरी से इस्तीफा देने बोला गया। जिस पर असहमति जताने पर मेरी पेमेंट और ग्रेजुएटी रोक देने की धमकी दी गई। जिस दबाव के चलते मैंने इस्तीफ़ा दिया है। अतः महोदय से निवेदन है कि प्रबंधन को आदेशित कर मुझे मेरी नौकरी वापस दिलवायें। अथवा नौ साल का मजीठिया वेज बोर्ड के तहत रकम व अन्य सुविधायें दिलवाने की कृपा करें।

अब जो बड़ा सवाल मुंह बायें खड़ा है वो यह कि सर्वोच्च न्यायालय के मुताबिक मीडिया मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड की जानकारी नहीं थी। तो फिर यह छंटाई किस वजह से? या फिर यह समझा जाये कि कर्मचारी कमजोर कड़ी होता है शायद इसलिये इन्साफ का पलड़ा मालिकों की तरफ झुक गया? खैर हकीकत जो भी हो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मजीठिया वेज बोर्ड का खतरा मंडराता देख ही अमित जैसे सैंकड़ों पत्रकारों को घर बिठाया गया है।

पत्रकार आशीष चौकसे की रिपोर्ट. संपर्क : 8120100064 / journalistkumar19@gmail.com

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हे जागरण वालों! फर्जी विज्ञापन के जरिये मीडियाकर्मियों का माखौल उड़ाना बंद करो

अक्टूबर 2015, अगस्त 2016, जनवरी 2017 और अभी मई 2017… इतने लम्बे समय से दैनिक जागरण विज्ञापन जारी करके मीडिया कर्मी ही ढूंढ रहा है। अरे भई साफ लिखो न कि हमको पत्रकार नहीं, मजदूर चाहिए जो न तनख़्वाह मांगे और न ही मजीठिया वेज बोर्ड। नौकरी के लिए जारी विज्ञापनों में दैनिक जागरण ने बायोडाटा भेजने के लिए पहले तो मेल आईडी hr@nda.jagran.com देता रहा, अब career@jagran.com पर रिज्यूम मांग रहा। लेकिन career@jagran.com पर कोई भी मेल सेंड नहीं कर पा रहा।

जागरण में प्रकाशित वो विज्ञापन जिसमें बायोडाटा भेजने के लिए जिस मेल आईडी का उल्लेख किया गया है, वह काम नहीं कर रहा. 

बहुत सारे लोगों ने जागरण के जाब वाले विज्ञापन में फर्जी मेल आईडी होने की शिकायत की है.

बहुत सारे लोगों ने शिकायत की है कि दैनिक जागरण ने मीडियाकर्मियों की भर्ती के लिए जिस मेल आईडी पर बायोडाटा मांगा है, वह काम नहीं कर रहा। इसे क्या समझा जाए। यह मीडियाकर्मियों से मजाक नहीं तो और क्या है। वैसे भी कहा जाता है कि जिस अखबार में डिजाईनर मजदूर भरे हों वहां टैलेंट की क्या जरूरत। इधर एक नई जानकारी भी सामने आई है कि खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का पैरोकार बताने वाला दैनिक जागरण अपने ही आफिस में दूसरी वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगा रखा है ताकि उसके इंप्लाई कहीं बागी न हो जाएं। दैनिक जागरण ऑफिसों में भड़ास4मीडिया डाट काम समेत कई वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाना दरअसल दैनिक जागरण के मालिकों और संपादकों की सामंती मानसिकता को दर्शाता है जो लेखन, विचार और समाचार के जिस पेशे में हैं, उसी पेशे पर कुठाराघात करने में जुटे हुए हैं।

फर्जी मेल आईडी देकर बेरोजगारों का माख़ौल उड़ाने वाला जागरण ग्रुप एक ओर तो छंटाई करने में जुटा है ताकि मजीठिया न देना पड़े, वहीं नए कर्मियों की भर्ती के लिए बेचैन दिख रहा है पर इसके लिए सही मेल आईडी तक नहीं दे पा रहा है। यह है देश के कथित सबसे बड़े अखबार का अलोकतांत्रिक और अराजक चेहरा।

आशीष चौकसे
पत्रकार एवं ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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इंदौर नगर निगम कर्मियों की गुंडई… बताते-बताते रोआंसा हो गया ठेला लगाने वाला वृद्ध

62 साल की उम्र में ठेला लगाने वाला वृद्ध सबसे ज्यादा किसी से डरता है तो वो है कमाई का जरिया बंद होने से। ऐसा ही डर अशोक बुनियां की आंखों में दिखा जो व्यथा बताते-बताते गला भरने तक पहुंच गया। और उठा गया वो सवाल जिसने मुझे मजबूर कर दिया उन जैसे तमाम गरीबों का डर और इंदौर नगर निगम की कार्यप्रणाली या कहूँ गुंडागर्दी बताने पर।

अपनी जीविका चलाने कुल्फी का ठेला लगाते हैं अशोक बुनियां। स्वाद ऐसा कि जुबां पर बना रहे और दाम एकदम कम। 5-10 रुपये में ऐसा स्वाद आपको पूरे शहर में नहीं मिलेगा। यानी उतनी ही कमाई का मकसद जितने में घर चल सके। पहले अशोक मेन रोड (ग्राहकी के लिए) के किनारे ठेला खड़ा करते थे। फिर कुछ दिनों से साइड वाली गली में अंदर आ गये। आज एकदम ही अंदर दिखे। मैंने पूछा तो बोले नगर निगम का अमला कभी भी आ जाता है। ठेला तोड़ देंगे। सारा सामान फेंक देंगे तो दुबारा कहां से ठेला लगाऊंगा? 9 साल पहले 10 टका ब्याज पर पैसे लेकर ठेला लगाया। कर्जा कैसे चुकाया मेरा दिल जानता है। रोड किनारे खड़ा होकर बेचता हूं क्योंकि बूढ़ा हो गया हूं ज्यादा चल फिर नहीं सकता। लेकिन मेरी स्थिति से किसी को क्या शहर तो स्मार्ट बन रहा है। जिसमें ठेले दिखाई नहीं देने चाहिये।

दरअसल हमारे देश में 2 तरह के गरीब बसते हैं। एक जिनके घर में AC होता है और दीवार पर गरीबी रेखा का क्रमांक। और दूसरे हैं अशोक बुनियां और उनके जैसे करोड़ो… जो ईमानदार और मेहनत से सिर्फ इतना कमाना चाहते हैं जिससे जिंदगी का गुजर बसर हो सके। पहले वाले गरीब सरकारी योजनाओं की मलाई चांटकर मजे में हैं। और अशोक जैसे रोज इस डर में कि कहीं निगम का अमला न आ जाये और मेरी रेहड़ी (ठेला) न तोड़ दे। या सारा सामान न फेंक दे। एक तरह सरकार गरीबों के विकास की बात करती है और दूसरी तरह जो चोरी, फरेब, अपराध न करके इज्जत की कमाई खाना चाहते हैं उनकी जीविका पर खतरा बन रही है।

मुझे यह बात समझ नहीं आई कि स्मार्ट सिटी की होड़ में लगा इंदौर शहर और उसके शुभचिंतक यह कैसी कार्रवाई कर रहे हैं? क्या किसी को हटाने का मतलब है उसको आर्थिक तौर पर बर्बाद कर देना? विस्थापन की एक प्रक्रिया होती है कि आप उनको ऐसी जगह मुहैया करा दीजिये जहां वो 4 पैसे कमा सके। और अगर वे शांतिपूर्वक, बिना गंदगी किये धंधा कर रहे हैं तो कोई खाली स्थान देकर मदद ही कर दीजिये। सामान फेक देना, ठेला तोड़ देना, मार मारकर अधमरा कर देना यह तरीका किस नियम की किताब में लिखा है? और अगर लिखा नहीं है और आप लिखना चाहते हैं तो आपको बता दूं आप इंसान हैं अपने कद से ऊपर मत उठिये। वरना गरीब की बद्दुआ आपको स्तरहीन बना देगी।

आशीष चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर
8120100064
ashishchouksey0019@gmail.com

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छत्तीसगढ़ में अधिकारी काम से नहीं, कामसूत्र से खुश होते हैं! पढ़िए इस महिला सिपाही की दास्तान

आधी रात को फोन करके महिला पुलिसकर्मी को अपने घर बुलाने की तमन्ना रखने वाले बिलासपुर पुलिस के तत्कालीन आईजी पवन देव के खिलाफ पीड़िता ने पुनः शिकायत ही है। इस बार पीड़िता ने खुद को देव का परिचित बताते कुछ लोगों द्वारा डराने/धमकाने की बात कही है। इतना ही नहीं आईजी महोदय के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई करने की भी मांग की है। खैर कार्रवाई चाहे जितने घुमावदार रास्तों से होकर अपने अंजाम तक पहुंचे।

हम तो बेबाकी से यही पूछेंगे की वर्दी वालों की तमन्नायें ऐसे हिलोरे मारेंगी तो क्या अपराधियों की हिम्मत नहीं बढ़ेगी? और जब ऐसे पुलिस अधिकारी अपना पूरा ध्यान और प्रयास अपनी तमन्नाओं की पूर्ति में लगायेंगे तो नौकरी क्या करेंगे? शहर को सुरक्षित क्या रखेंगे? और क्या यह काम की बजाय कामसूत्र से खुश होते हैं?

आपको बता दें कि कुछ समय पहले सोशल मीडिया में ऑडियो क्लिप वायरल हुई थी जिसमें मेल और फीमेल वॉइस थी। मेल आधी रात को फीमेल को अपने पास बुला रहा था और असुविधा होने पर “मैं लेने आता हूं न” जैसी बात भी कही। बाद में इस कनवरजेशन को आईजी महोदय और एक महिला पुलिसकर्मी (पीड़िता) का बताया गया। साथ ही इसके विरुद्ध FIR भी दर्ज की गई तथा मामले की जांच आंतरिक शिकायत समिति को सौंपी गई।

मीडिया में भी मामले ने तूल पकड़ा और फिर शुरु हुआ आरोप-प्रत्यारोपण का सिलसिला। मुझे फंसाया जा रहा है। मेरे खिलाफ साजिश है। जैसे बचकाना बयान भी दिए गये। लेकिन यह नहीं बताया गया कि ऐसी बातें महोदय किन जज्बातों के वशीभूत होकर कर रहे थे? क्योंकि शिकायत पत्र में लिखी बातों के मुताबिक आंतरिक शिकायत समिति ने आरोप को सही पाया है।

पढ़ें महिला सिपाही का पत्र….

आशीष चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर

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महिला रेलकर्मी ने जीएम के साथ डुएट गाने से मना किया तो हुआ ट्रांसफर, थमा दी चार्जशीट

”पिछले 8 सालों से रेलवे में कल्चरल कोटे के तहत काम कर रही हूं। हर साल मंडल को नेशनल इंटर कंम्पटीशन में जिताती आ रही हूं। लेकिन आज तक कभी सम्मान या अवार्ड नहीं मिला। उल्टा अधिकारीयों की पर्सनल पार्टियों में घर जाकर गाना गाना पड़ता है। फिर चाहे दिवाली का मौका हो या न्यू ईयर का।” यह आपबीती है उस महिला सीनियर क्लर्क की जिसे रेलवे जीएम सत्येंद्र कुमार के साथ गाना न गाने पर सबसे बड़ी अनुशासन हीनता बताते हुये चार्जशीट और ट्रांसफर ऑर्डर दिया गया।

इतना ही नहीं, रात 2 बजे तक उन्हें पार्टी में ही रोके रखा गया। हालाँकि इस हरकत का खुलासा होते ही जीएम से लेकर डीआरएम तक अपनी बचाते दिखे और ऑर्डर वापस ले लिया गया। लेकिन इनकी ओहदे की गरमी देखिये कि किसी ने गाना नहीं गया तो चार्जशीट देकर ट्रांसफर कर दिया।

दरअसल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जोन के जीएम सत्येंद्र कुमार 31 जनवरी को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसलिये महोदय के सम्मान में 16 जनवरी को राजधानी रायपुर में एक विदाई की हाई प्रोफाइल पार्टी का आयोजन किया गया। और इसी दौरान महिला क्लर्क को उनके साथ गाना गाने के लिए बोला गया। जिस पर पीड़िता ने मना कर दिया। हालाँकि उन्होंने इसकी वजह गाना याद न होना बताई। लेकिन यह बात चमचों के गले की फ़ांस बन गई। रायपुर डीआरएम राहुल गौतम के मुताबिक तो यह सबसे बड़ी लापरवाही है और इसीलिये जीएम के साथ डुएट न गाने जैसी अनुशासन हीनता कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी। बस इसीलिये चार्जशीट दी गई।

इस मामले को दैनिक भास्कर के सीनियर जर्नलिस्ट सन्दीप रजवाड़े ने बड़ी प्रमुखता से उठाया। मीडिया में मुद्दा गरमाता देख मण्डल अधिकारीयों के पसीने छूट गये। दी गई चार्जशीट और ट्रांसफर ऑर्डर पर उन्हें कोई जानकारी ही नहीं, ऐसी बयानबाजी करने लगे। यहां तक कि कुछ इसे खुद ही गलत ठहराते हुये कहने लगे कि ऐसा ऑर्डर निकलता है तो मजबूरन साइन करने पड़ते हैं। अब यह मजबूरी पद की है या चमचागिरी की, यह वही बेहतर बता पायेंगे।

खैर, जब कर्मचारियों की बजाय चमचों का कोई झुण्ड किसी सरकारी विभाग में घुस जाता है तो ऐसे ही तुगलकी फरमान जारी होते हैं। न जाने ऐसे और कितने किस्से होंगे जो साहब की विदाई के साथ ही दब जायेंगे। बाकी सरकारी तन्त्र में जो अपने पद का दुरुपयोग न करे, वो काहे का सरकारी। आप ज्यादतियों पर ज्यादतियां करते रहिये, ज्यादा होगा तो ट्रांसफर हो जायेगा।

आशीष चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर

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गाड़ी खरीदने जा रहे तो इसे जरूर पढ़िए, इंश्योरेंस और RTO चार्जेज़ पर वसूली कर रहे शोरुम

गाड़ी चाहे 2 व्हीलर हो चाहे 4 व्हीलर। शोरुम वाले अब कमीशन के अलावा RTO और इंश्योरेंस चर्जेज़ पर जमकर मुनाफाखोरी कर रहे हैं। और यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस वजह से कस्टमर को गाड़ी उसकी ओरिजनल प्राइज से भी अधिक की पड़ रही है। वो ओरिजनल प्राइज जिसमें टैक्स, कमीशन पहले से ही जुड़ा रहता है। आपको बता दें शोरुम वाले यह लूट इसलिये कर पा रहे हैं क्योंकि नियमानुसार गाड़ी बिना इंश्योर्ड हुये शोरुम से बाहर नहीं निकल सकती। और तो और उसका टैक्स भी पेड होना जरुरी है। अब ऐसे में शोरुम इनके अमाउंट में मनचाहा फेरबदल करके ऊपरी कमाई कर रहे हैं और नियमों का हवाला देकर खुलेआम आपकी जेब काट रहे हैं।

ऐसे समझिये दलाली का खेल… गाड़ी कोई भी तो उसकी बेस प्राइज का 7% RTO लगता है। और उसकी ट्रू वेल्यू पर इंश्योरेंस होता है। लेकिन… जब आप शोरुम से कोटेशन लेते हैं तब उसमें RTO चर्जेज़ 7% से ज्यादा रहता है। इतना ही नहीं इंश्योरेंस की EMI में भी बड़ा फर्क होता है। हालाँकि यह दोनों चीजें कस्टमर खुद करा सकते हैं, लेकिन तब शोरुम वाले आपको गाड़ी देंगे नहीं। क्योंकि 1 बाइक में जहां 1500 से 2000 का ऑन पेपर कमीशन मिलता है। वहीं इस तरह की दलाली से उससे ज्यादा इन्कम हो जाती है।

एक एश्योरेंस कम्पनी के एजेंट ने बताया कि आजकल शोरुम वालों को गाड़ी बेचने से ज्यादा इंट्रेस्ट इंश्योरेंस और दूसरे कम्पलसरी पेपर वर्क पर मिलने वाले कमीशन में रहता है। आप शोरुम से इंश्योरेंस करवायेंगे तो वह महंगा पड़ेगा बजाय इंश्योरेंस कम्पनी के ऑफिस से। हालांकि जब उनसे पूछा गया कि आप रसीद में सेम अमाउंट शो करते हो तो यह अमाउंट(कमीशन) एडजस्ट कहां करते हो? तो उन्होंने चुप्पी साध ली।

RTO की बात करें तो जहां 7% टैक्स लगता है। वहीं शोरुम में यही टैक्स 8 से 10% तक वसूला जा रहा है। जबकि ऑनर खुद RTO ऑफिस जाकर जाकर फॉर्मेलिटी करके गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नम्बर प्राप्त कर सकता है। लेकिन ऐसा करने से शोरुम को कमीशन नहीं मिलेगा और वह आपको गाड़ी हैंड ओवर नहीं करेगा। आपके सामने एक कोटेशन है। जिसमें गाड़ी टैक्स के साथ 87 हजार 545 की है। उसमें बतौर RTO 8280 रुपये लिया गया है। जबकि ओरिजनल अमाउंट 6128(7%) होता है। वहीं इंश्योरेंस के 2315 जोड़े हैं। जबकि उसी कम्पनी के ऑफिस से यह अमाउंट करीब 1940 बताया गया। इस लिहाज से जो गाड़ी 95 हजार से कुछ अधिक की थी। वह कस्टमर को 98 हजार से भी ज्यादा की पड़ी। यही सब 4व्हीलर पर भी होता है। कोई डीलर एक्स शोरुम प्राइज पर गाड़ी छोड़ देता है। तो कोई उस पर RTO और इंश्योरेंस अलग से जोड़कर बेच रहा है।

आशीष कुमार चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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ABVP की रैली में बंधक बना बीमार शिशु, कई किमी तक बुआ पैदल दौड़ीं तब बची जान (देखें तस्वीरें)

 

(साफ-साफ पढ़ने के लिए उपरोक्त न्यूज कटिंग पर क्लिक कर दें)

जनता जिये या मरे, नेता को फर्क नहीं पड़ता। वो सिर्फ खेद प्रकट करता है और अपने अगले काम में लग जाता है। सलमान खान की एक फ़िल्म आई थी “जय हो”। उसमें एक सीन में दर्शाया गया था कि कैसे नेता या उनके परिवारीजन अपनी सहूलियत के लिए जनता को तकलीफ देते हैं। वो सीन भले फ़िल्म का था लेकिन उसमें दर्शायी हकीकत आजकल के नेताओं और उनके दलों पर पूर्णतया सटीक बैठती है। अपनी ताकत दिखाने नेता / दल / पार्टियां अक्सर आम जनता को कष्ट देती हैं। यहां तक की उनकी जान भी ले लेती हैं।

इंदौर का ताजा उदाहरण ले लीजिये… राजनीतिक पार्टियों / दलों के इस शक्ति प्रदर्शन से कैसे आम जनता की जान पर बन आती है इसके तमाम उदाहरणो में ताजा उदाहरण 26 दिसम्बर सोमवार को इंदौर में निकली ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्) की रैली में देखने मिला। करीब 3 घण्टे तक इंदौर के एक हिस्से में जहां यातायात प्रभावित रहा। वहीं 1 मासूम की जान पर बन आई। नतीजन उसकी बुआ को खुद गोदी में उठाकर कई किमी दौड़कर बच्चे को अस्पताल पहुंचना पड़ा। शुक्र इस बात का है कि तत्काल ट्रीटमेंट से बच्चे की जान बच गई।

अब जरा कल्पना कीजिये कि अगर बच्चे की जान नहीं बच पाती तो बेशर्म नेताओं में से कौन इसकी जिम्मेदारी लेता? आपको बता दूं नेता कभी जिम्मेदारी नहीं लेता। वो सिर्फ खेद प्रकट करके अपने काम में लग जाता है। और पीछे रह जाते हैं वो मूर्ख लोग जो इन नेताओं को अपना हमदर्द समझते हैं। उनकी खुशामद करते हैं। उनके पैर छूते हैं। यह जन समर्थन तो कतई नहीं, प्रलोभन देकर बुलाई भीड़ जरूर होती है…

अब सवाल यह कि रैली निकालने का यह तरीका क्यों? आप किसको ताकत दिखा रहे हैं? और यह ताकत कौन से आपके  जनसमर्थन की है? यह ताकत जन समर्थन की तो कतई नहीं होती। यह तो तरह-तरह के प्रलोभन देकर बुलाये लोगों की भीड़ होती है। कोई बोलता है उसे खर्चा चाहिए। किसी की गाड़ी में मुफ़्त का पेट्रोल डलता है। तो किसी को प्रति व्यक्ति लाने पर कमीशन मिलता है। अब पैसों के लिए झण्डा उठाकर घण्टो नारेबाजी करने वालों से नैतिकता की उम्मीद रखनी भी फजूल है। और जहां ऐसे ही लोग बहुतायत हों वहां जान-माल की हानि होना तय होता है।

आशीष कुमार चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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