रोहित सरदाना बहुत मेहनत कर ETV में एंकर बने थे!

धीरज कुमार-

दिवंगत टीवी पत्रकार रोहित सरदाना से मेरी दोस्ती 20 साल पुरानी थी जिसमें 12 साल हमने साथ में काम किया। उसके साथ के अनगिनत किस्से हैं जिनमें से कुछ को मैं साझा करना चाहूंगा।

2002 में मैंने जब ईटीवी हैदराबाद ज्वाइन किया तो पहले दिन गौर किया कि बगल के यूपी डेस्क पर बैठा एक लड़का मुझसे नजरें मिलते ही मुस्करा रहा है। मुझे ताज्जुब भी हुआ और जिज्ञासा भी हुई कि भाई ये मुझे देखकर इतना प्रसन्न क्यों है? क्या ये मुझे पहचानता है ?
मैंने उससे ही पूछ लिया” हम पहले कहीं मिले हैं क्या? ”
वो हंसने लगा और हंसते हुए कहा ”नहीं मिले”
फिर उसने मुझसे सवाल किया
”तुम धीरज हो ना ?”
मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। कि आखिर नाम कैसे जानता है? उसे जब लगा कि मैं जानने के लिए उतावला हो रहा हूं कि ये माजरा क्या है तो उसने तपाक से कहा
” मैं झा जी का रूम पार्टनर हूं, अवधेश झा ने बताया था कि धीरज जी आज बिहार डेस्क पर ज्वाइन करने वाले हैं वो जामिया के मेरे क्लासमेट हैं ”

रोहित मेकअप में था। पता चला उसी दिन पहली बार एंकरिंग का टेस्ट दिया था। जहां तक मुझे याद है उसे कहा गया था कि एक दो दिन और प्रैक्टिस करके फिर से बुलेटिन रिकॉर्ड कराओ तो फाइनल देखेंगे। उसके बाद उसने बहुत मेहनत की और ईटीवी में तो एंकर बना ही, लगातार अपने बोलने की शानदार क्षमता की बदौलत आगे बढ़ता चला गया।

हम हैदराबाद में एक क्लोज सर्किल का हिस्सा बन गए थे। वहां अवधेश, संजीव, प्रेम और विमल भैया एक साथ एक फ्लैट में साथ रहते थे तब। और बगल के फ्लैट में मेरी क्लासमेट रही अल्प्यू और साथ में स्वाति, नीलू और दीपाली रहती थी। मैं जब भी दिलसुखनगर (हैदराबाद) जाता तो इन सबके साथ चाय की चुस्कियां लेने पहुंच जाता। सहारा ज्वाइन करने के लिए हैदराबाद छोड़ते वक्त रोहित भावुक भी हुआ था क्योंकि सर्किल के सभी लोगों की दिल्ली में नौकरी लग गई और मैं अकेला रह गया था।

रोहित का स्वभाव और व्यवहार इतना अच्छा था कि एक-एक दोस्त को हमेशा स्पेशल होने का अहसास कराता था। मैं जब हैदराबाद से आकर एक बार नोएडा में सहारा के दफ्तर में उससे मिला तो उसने कई लोगों के लिए हाथ से लिखकर चिट्ठी दी कि हैदराबाद लौटना तो उन्हें जरूर कहना कि मैं मिस कर रहा हूं। तब व्हाट्सएप नहीं था।

उसके साथ थोड़े भी पल के लिए होना इतना मजेदार और सुखद होता था कि लंबे समय तक उसको सोच सोच कर आप खुश रहते थे। आपकी आम गतिविधि में भी वो कुछ ऐसे लतीफे वाला तत्व खोज निकालता था कि सामने वाला हंसते हंसते पागल हो जाए। और हरियाणवी अंदाज में उसकी हर चीज में रस ढूंढने की कला गजब की थी। उसके न्यूज रूम में घुसते ही मानो सब में जान आ जाती थी। उसके रास्ते में जो भी आया उसे टोके बिना वो आगे नहीं बढ़ता था, और वो भी मन गदगद करने वाली ही बात होती थी। मैं अगर उसकी तरफ देख नहीं भी रहा होता तो आवाज़ देता ”और धीरज बाबू”। नहीं सुनता तो दोहराता ‘ओ धीरू भाई’। कभी पीछे से कंधे पर हाथ रख देता तो कभी पीठ पर मारता हुआ आगे बढ़ जाता। मैं बोलता कि क्या ‘बाबू’ लगा रखा है ‘धीरज’ बोल तो कहता मैं तो बच्चा हूं तुम्हारे सामने। उसे मालूम था मैं उम्र में उससे तीन चार साल बड़ा हूं।

ज़ी न्यूज़ में जब मेरा सेलेक्शन हुआ तो वो बहुत खुश हुआ बोला बाकी सब ‘सहारा’ होते हुए यहां आए और तू सीधा आ गया। चैनल में मुझे सहज बनाने में भी उसने बहुत मदद की थी। उसने बताया कि ईटीवी से कितना अलग और प्रोफेशनल माहौल है ज़ी न्यूज़ का।

दिल्ली आने पर मेरी एंकरिंग छूट गई तो वो बहुत चिंतित हुआ था। एक बार मैंने किसी एंकर को ज़ी में नौकरी दिलवाने के लिए उसे पैरवी करने को कहा तो उसने कहा तू अपना क्यों नहीं दोबारा कोशिश करता है? मैंने कहा दोस्त गैप बहुत हो गया है । तो उसने कहा ‘क्या बोलना भी भूल गया’? मैंने बात को हंसी में टाल दी कि तू जब मैनेजिंग एडिटर बनेगा तो मैं दोबारा एंकरिंग शुरू कर दूंगा तो हंसने लगा कहा ‘तू रहने दे आलसी कहीं के’।

रोहित सिर्फ मौखिक शब्दों का जादूगर नहीं था। कंप्यूटर के की बोर्ड पर बिजली की तरह उसकी उंगलियां दौड़ती थी। अच्छे अच्छे कॉपी एडिटर और डेस्क के धुरंधर से अच्छा लिखता था। कई बार मैं लिख रहा होता था तो खड़ा होकर देखने लगता था। मुझे टोकता अबे टाइम क्यों लगा रहा है। मैं बोलता अरे कंक्लूड नहीं कर पा रहा हूं। तो कहता “हट चेयर दे” और फिर स्क्रिप्ट पर हाथ फेरता तो मैं कह उठता यही लिखना चाह रहा था तो मुस्कुराते लगता।

वो अपने दोस्तों के प्रति इतना कमिटेड था कि एक बार श्याम किशोर सहाय भाई साहब ने अपनी शादी के रिसेप्शन के लिए उसे कहा कि धीरज को जरूर लेकर आना। उसने इवनिंग शिफ्ट में मुझसे कहा कि रिसेप्शन में चलना है। मैंने कहा दो ही लोग हैं साढ़े 10 बजे के बाद कैसे होगा? तो वो सीधा शिफ्ट इंचार्ज के पास पहुंच गया। शिफ्ट इंचार्ज ने पूछा 'कोई बड़ी खबर आ गई तो? तब रोहित ने कहा " एक दिन आप खुद देख लीजिए ना सर। मैं तो ले जा रहा हूं इसे।" अपनी कार में बिठा कर ले गया मुझे। श्याम जी से कहा ले आया धीरज को, श्याम जी ने कहा तभी तो तुम्हें टास्क दिया था।

रोहित बहुत बोल्ड था। कॉन्फिडेंस कमाल की थी। किसी से कुछ भी कह देने का माद्दा रखता था चाहे वो कोई भी हो, कितनी बड़ी शख्सियत क्यों ना हो। उसमें सबसे खास बात थी कि वो सफलता की सीढ़ियों पर तेजी से बढ़ता हुआ कभी बदला नहीं।

रोहित दुनिया के लिए भले ही सेलिब्रिटी एंकर, सोशल मीडिया स्टार और वरिष्ठ पत्रकार था लेकिन दोस्तों के बीच यारों का यार था। महफिल को खुशमिजाज बना देने वाला इंसान। दिसंबर 2002 में पहली मुलाकात के वक्त से लेकर फरवरी 2021 तक जब मेरी उससे फोन पर आखिरी बात हुई थी, वैसे ही जोश के साथ बात की, जैसा शुरू में करता था। 24 घंटे में कभी भी फोन लगा दो या मैसेज कर दो तो फौरन जवाब देता था। मीडिया के स्टार की तरह ये कभी नहीं जताया कि व्यस्त हूं बाद में बात करता हूं जैसे ज्यादातर ‘बिग’ मीडिया वाले करते हैं। उसने आखिरी बातचीत में जल्द पूरी फैमिली के साथ घर आने की बात की थी जब मैंने बताया अब ग्रेटर नोएडा वेस्ट आ गया हूं तो तुरंत बोला ” ये तो ऑफिस से मेरे घर के रास्ते के बीच ही है अब लंबा गैप नहीं होने देंगे, मिलते रहेंगे।”

तो रोहित अब वादा निभाने के लिए एक बार घर आ जाओ यार। मैं तो फक्र महसूस करता था कि करियर की शुरुआत का दोस्त तेजी से ऊंचाई पर पहुंच गया है । दोस्त आज वोटों की काउंटिंग है। सभी स्टार एंकर वैसे ही बोले जा रहे हैं पर तुम किसी स्क्रीन पर नहीं हो। दोस्त, दिल के अंदर के स्क्रीन से तुम कभी नहीं जाओगे। वैसे ही चमकते रहोगे स्टार की तरह।

धीरज का परिचय- 1992-95 बैच सोशल साइंस फैकल्टी, बीएचयू। पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स। 1996 तक बीएचयू कैंपस के एएनडी हॉस्टल में रहा। उसके बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से मास्टर्स और जामिया मिलिया इस्लामिया से मास कम्युनिकेशन का कोर्स किया। पिछले 20 साल से टेलीविजन जनर्लिज्म फिल्ड में हूं। ईटीवी (अब न्यूज़ 18), ज़ी न्यूज़ नेशनल में काम करने के बाद अभी इंडिया टीवी में हूं। पैतृक घर भागलपुर, बिहार है। पैदा होने से लेकर 12वीं तक की पढ़ाई रांची, झारखंड में हुई। दिल्ली से सटे वैशाली, गाजियाबाद में रहता हूं, ऑफिस नोएडा में है। Twitter – @dhirajmedia

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Comments on “रोहित सरदाना बहुत मेहनत कर ETV में एंकर बने थे!

  • गिरिजेश says:

    यशवंत भाई, मुझे लगता है’ रोहित मेकअप में था’ से धीरज का मतलब ये नहीं है कि रोहित पहले मेक-अप डिपार्टमेंट में था, बल्कि वो कह रहे हैं कि रोहित ने मेक अप कर रखा था.
    दरसल रोहित के ETV आने से चंद रोज़ पहले ही मैं ETV UP छोड़कर दिल्ली लौटा था. उन दिनों वहाँ डेस्क के लोगों का टेस्ट लेकर उन्हें ऐंकर बनाया जा रहा था. मैं खुद वहाँ इसी प्रक्रिया से ऐंकर बना था. रोहित का भी संभवतः यही केस रहा हो

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  • PRAVIN BAGI says:

    बहुत बढ़िया संस्मरण आपने लिखा है। एक मित्र को इससे अच्छी शब्द श्रद्धांजलि और नहीं हो सकती। रोहित के असामयिक निधन पर हम सभी दुखी हैं। सदर नमन और श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और परिवार को हिम्मत दे।

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