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सहाराश्री का जाना- अंतिम : धंधा दिमाग से होता है, दिल से नहीं… दुर्भाग्य से यह मंत्र समझने में सुब्रत रॉय नाकाम रहे!

अनिल भास्कर-

धन कमाना और धन जुटाना दो अलग उपलब्धि है। सहाराश्री ने धन तो खूब जुटाया, लेकिन किसी उद्यम में निवेश कर लाभ कमाने में नाकाम रहे। कारण यह नहीं था कि उन्होंने व्यवसाय गलत चुना, बल्कि शायद उसे चलाने का सही तरीका नहीं चुन पाए। भरोसे के संकट और भावनात्मकता के अतिशय दवाब में उसका सही प्रबंधन नहीं कर सके। एयरलाइंस से लेकर मीडिया, रियल एस्टेट, हॉस्पिटैलिटी और एफएमसीजी तक के कारोबार के लिए इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स को नियोजित करने के बजाय उन्होंने हर नए उपक्रम की शीर्ष जिम्मेदारी पैराबैंकिंग के अपने पुराने साथियों को सौंपी, जो शायद उन उपक्रमों के प्रबंधन के लिए प्राथमिक योग्यता भी नहीं रखते थे।

यह कारोबार के मूल सिद्धांतों के ठीक उलट था। धंधा दिमाग से होता है, दिल से नहीं। दुर्भाग्य से यह मंत्र समझने में सहाराश्री नाकाम रहे और इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स से ज्यादा खुद और अपने सहयोगियों की काबिलियत पर अतिविश्वास बनाए रखा। इसलिए सारे बड़े फैसले खुद लेते रहे। या इन फैसलों में उन्होंने अपनी जिस सलाहकार मंडली की राय को शामिल किया, उसका व्यावसायिक दक्षता से कोई लेना-देना नहीं था।

पैराबैंकिंग, जो कम्पनी का मुख्य व्यवसाय है, सिर्फ धन इकट्ठा करने का जरिया बनकर रहा। अगर कम्पनी के दावे पर यकीन करें तो जब वह व्यवसाय के उच्चतम शिखर पर थी तब उसकी कुल परिसम्पत्ति एक लाख करोड़ रुपए से ऊपर हो चुकी थी। यह वर्ष 2008-09 के आसपास का समय था। जहां तक मैं इस बिजनेस मॉडल को समझ पाया, कम्पनी ने जमाकर्ताओं के धन इकट्ठा किए लेकिन उसे बतौर पूंजी निवेश कर लाभ कमाने में नाकाम रही। जमाकर्ताओं को पॉलिसी की मैच्युरिटी पर
सूद समेत उनकी रकम कैसे लौटाई जाएगी, इसका कोई मॉडल नहीं गढ़ पाई। सिर्फ लाइबिलिटी शिफ्टिंग करती रही।

इसे आसानी से इस तरह समझा जा सकता है कि यदि कम्पनी के पास जमाकर्ताओं के 100 रूपए इकट्ठा हुए और अगले साल उन्हें सूद के साथ 110 रुपए लौटाने हैं तो जाहिर है कम्पनी को उन 100 रुपए को किसी लाभकारी व्यवसाय में निवेश कर इस दरमियान कम से कम 120 रुपए कमाने होंगे ताकि जमाकर्ताओं को 110 रुपए लौटाए जा सकें और बाकी 10 रुपए से कम्पनी का खर्च चल जाए। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं। कम्पनी ने अगले साल जमाकर्ताओं से 150 रुपए इकट्ठा किए और उनमें से 110 रुपए पुराने जमाकर्ताओं को अदा कर बाकी अपने खर्च के लिए रख लिए।

अगले साल फिर यही क्रम दुहराया गया। शायद कम्पनी के शीर्ष प्रबंधन ने ऐसा मान रखा था कि डिपॉजिट्स स्कीम्स हमेशा चलती रहेगी और लाइबिलिटी शिफ्टिंग का सिलसिला अनंतकाल तक चलता रहेगा। यानी लोग पैसे जमा करते रहेंगे और उन पैसों से पुराने जमाकर्ताओं को सूद समेत मूलधन लौटाया जाता रहेगा। इस तरह कम्पनी की देनदारी लगातार बढ़ती तो जाएगी लेकिन यह भविष्य की तरफ खिसकती जाएगी।

बस यहीं बड़ी चूक हो गई। कोई भी स्कीम अनंतकाल तक नहीं चल सकती। यही कारण था कि कुबेर, जेवीजी और अनुपम प्लांटेशन जैसी कम्पनियां बहुत लंबे समय तक इस मॉडल के साथ चल नहीं पाईं और जल्द ही घाटे का साथ बंद हो गईं। मगर बड़े नेटवर्क के बूते सहारा का बिजनेस चलता रहा। वर्ष 2009 में जब सहारा का व्यवसाय उच्चतम शिखर पर था, तब कम्पनी ने अपनी इंफ्रास्ट्रक्चर कम्पनी ‘सहारा प्राइम सिटी’ का आईपीओ लाने की योजना बनाई और इसके लिए सेबी में आवेदन भेज दिया।

अब सेबी ने उसके आवेदन की स्क्रीनिंग शुरू की तो उसे पता चला कि सहारा इंडिया रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड और सहारा इंडिया हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड ने बगैर लिस्टिंग करीब तीन करोड़ निवेशकों से 24 हजार करोड़ रुपए जुटाए थे। सेबी ने इसे अवैध उगाही माना और आईपीओ का आवेदन खारिज करते हुए 12 हजार करोड़ का जुर्माना लगा दिया। साथ ही सहारा समूह की अन्य कम्पनियों पर भी जांच बिठा दी।

बस यहीं से इस विशाल कम्पनी के पतन की शुरुआत हो गई। धीरे-धीरे पैराबैंकिंग कम्पनियों की स्कीम्स रोक दी गईं और कम्पनी की आय सीमित हो गई। दूसरी तरफ जमाकर्ताओं की देनदारी बढ़ती चली गई और कम्पनी का वित्तीय संकट गहराता चला गया। दिमाग चाहे कुछ भी कहे, मगर मेरा दिल यह मानने को न तब राजी था, न आज है कि सहाराश्री ने जमाकर्ताओं के साथ धोखाधड़ी का रास्ता अपनाया।

दरअसल तमाम मीटिंग्स में वह जमाकर्ताओं को लेकर जो सम्मान का भाव प्रस्तुत करते थे और कारोबार संहिता में कड़े अनुशासन का महत्व रेखांकित करते थे, उसे देखते हुए यह विश्वास कर पाना मुश्किल है कि उनकी नीयत में रत्तीभर खोट था। हां, वह अपने बिजनेस मॉडल, जो कभी प्रॉफिट मेकिंग नहीं था, को गलत मानने को हरगिज तैयार नहीं हुए। अतिशय आत्मविश्वास के मद में सेबी से लेकर अदालत तक अड़े रहे और अंततः बाज़ी हार गए। उनकी यह हार कम्पनी की सेहत के लिए तो खासा नुकसानदेह थी ही, उन तमाम जमाकर्ताओं के लिए किसी कयामत से कम नहीं थी जिन्होंने छोटी बचत से बड़े सपने पूरे करने के लिए अपनी खून-पसीने की कमाई उनके हाथों में सौंपी थी।

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