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लखनऊ के सहाफी सय्यद निज़ाम अली का इंतेक़ाल

नवेद शिकोह-

नवजीवन के एक और नगीने ने जीवन छोड़ा… अर्से से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे लखनऊ की पत्रकारिता की पुरानी लॉबी के नुमाइंदे सय्यद निज़ाम अली का इंतेक़ाल हो गया। नवजीवन अखबार के सुनहरे दिनों में लम्बे वक्त तक उन्होंने इस तारीखी (एतिहासिक)अखबार में मुलाज़मत की थी।

देश के मशहूर खेल रिपोर्टर अनंत मिश्रा ने निजाम साहब को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि-

निजाम जी के जाने का बेहद अफसोस हुआ। निजाम जी ने खेल पत्रकारिता में भी झण्डे गाड़े। कबीर शाह, एलेक्स चैण्डी, सुनील द्विवेदी, राकेश शुक्ला, असीम मुखर्जी की पीढ़ी के खेल पत्रकार थे। खेलों पर उन्होंने कई किताबें भी लिखीं। भारत-पाकिस्तान क्रिकेट शृंखलाओं पर भी उन्होंने एक किताब लिखी।….विनम्र श्रद्धांजलि

नवजीवन बंद होने के बाद तमाम अखबार कर्मियों की तरह वो भी नौकरी के लिए परेशान रहे। अमर उजाला लखनऊ छोड़कर यूपी, पंजाब, हरियाणा के कई शहरों में एडीशन लॉन्च कर रहा था। स्वर्गीय रामेश्वर पांडेय भाषाई पकड़ वाले नए-पुराने पत्रकारों को नौकरी के अवसर प्रदान कर रहे थे। निज़ाम अली साहब को अमर उजाला में काम करने का मौका मिला। फिर घर की जिम्मेदारियां उन्हें लखनऊ खीच लाईं। उन दिनों मरहूम वकार रिजवी का उर्दू-हिंदी अवधनामा तेजी से उभर रहा था। यहां निजाम साहब ने ने सम्पादकीय विभाग का निज़ाम संभाल कर उर्दू-हिंदी अखबारों को नई धार दी।

संघर्षो की सहाफत की लम्बी पारी खेल ही रहे थे कि क़ैसर जैसी मूज़ी बीमारी ने उनके जीवन को चुनौती दे दी। बहुत वर्षों तक वो कैंसर से लड़े लेकिन अंततः वो हार गए।

मुझे याद है नवजीवन के मोहर्रम विशेषांक में कर्बला की जंग पर लिखे उनके लेख उन्हें सेलीब्रिटी बना देते थे। नब्बे के दशक में कम उम्र में मैंने एक छोटे अखबार का मोहर्रम विशेषांक निकालने आ साहस किया था। मोहर्रम, अजादारी,कर्बला की जंग और हज़रत इमाम हुसैन पर लिखने वाले कुछ खास लेखक सेलीब्रिटी समझे जाते थे। जिसमें प्रोफेसर आगा मोहम्मद बाकर, मौलाना अतहर साहब, मौलाना अशफाक साहब, शायर कृष्ण बिहारी नूर, अंतरराष्ट्रीय ख्याती प्राप्त सितार वादक और भातखंडे के प्रिंसिपल तज़म्मुल खान, शायर हसन फराज और शबाहत हुसैन विजेता। ऐसे लोगों में नवजीवन के पत्रकार सय्यद निजाम अली का भी नाम शामिल था। उनसे मोहर्रम विशेषांक के लिए एक आर्टिकल लिखवाने की हिम्मत करते हुए मैं नवजीवन अखबार के दफ्तर में मिला था। उन्होंने बिना किसी नखरे के मेरे लिए लेख लिखने पर सहमति व्यक्त कर दी। उनका लेख मेरे मोहर्रम विशेषांक की कवर स्टोरी बना।

“कर्बला जहां सत्य की विजय हुई” शीर्षक का ये लेख खूब पसंद किया गया और इस विशेषांक की पांच हजार प्रतियां सात मोहर्रम की मजलिसों में एक घंटें में बिक गई। जगदीश नारायण शुक्ला जी के प्रतिदिन अखबार की गुंजनिका प्रेस में पंहुचकर अखबार की प्लेटें रुकवाईं और पुनः पांच हजार प्रतियों का आर्डर किया।

ये सब किस्से अब इतिहास बन गए हैं। लखनऊ की सहाफत की अंगूठी के बेशकीमती पुराने नग निकलते जा रहे हैं। पुरानों हर जिक्र में हेराल्ड ग्रुप के तस्किरे लाज़मी हैं।प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का हेराल्ड ग्रुप पत्रकारिता का भाषाई खजाना था। इस मीडिया समूह की खासियत थी कि तीन मुख्य भाषाओं में उनके अखबार थे। नवजीवन, नेशनल हेराल्ड और नवजीवन। कैसरबाग में बारादरी के निकट हेराल्ड ग्रुप के कार्यालय में हर किस्म के भाषाई विद्वान अलग-अलग किस्म की वेषभूषा में दिखाई देते थे। दाढ़ी टोपी वाले, धोती तिलक वाले और अंग्रेजी लुक के सूट-बूट,टाई वाले भी।

लेकिन इसमें कुछ ऐसे मुलाजिम भी थे जिनका लिबास इस बात की तस्दीक नहीं कर पाता था कि ये हिन्दी यानी नवजीवन वाले हैं। उर्दू मतलब कौमी आवाज वाले हैं या हेराल्ड कि अंग्रेजियत वाले। निजाम साहब की वेषभूषा, आचरण,व्यवहार और भाषा सामान्य थी।‌ उनकी बस यही पहचान थी कि वो एक संघर्षशील, इमानदार और मुख्तलिफ जबानों की पकड़ वाले गंभीर खाटी पत्रकार हैं। अब ऐसे पत्रकारों की कमी में आपका चला जाना और भी खल रहा है।

निज़ाम भाई को खिराजे अकीदत

  • नवेद शिकोह
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