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सुख-दुख

पत्रकारिता की रेवड़ी कितने दिन?

Schaschikkantte Trriviedy-

एक अक्टूबर से सारे पत्रकार चाहे वे सम्पादक हो या चम्पादक संस्थान से कभी भी निकाले जाने के लिये तैयार रहें। उन्हें समय पर वेतन मिलेगा इसकी भी उम्मीद छोड़ दें। ऐसी कोई अब कानूनी बाध्यता अखबार चलाने वाले संस्थान पर नहीं है। हाँलाकि यही आर्थिक विकास और वैभव दूसरी इंडस्ट्रीज़ का भी होने वाला है।

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फिर भी पत्रकारों को सचेत हो जाना चाहिए। मुगालते में न रहें। आपकी तनख्वाह 15000 रुपये महीने से ज़्यादा होना कानूनन ज़रूरी नहीं है। अब बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि आपको नौकरी पर रखकर झेला जाए।

हर अखबार, चैनल, वेबसाइट चाहे तो सभी काम कर रहे धुरंधर पत्रकारों को बाहर निकालकर प्रति खबर के हिसाब से पेमेंट कर सकता है जो सरकार का बहुत ही प्रसंशनीय कदम है। ई एफ पी एफ, ई एल सी एल गई तेल लेने।

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हाथ जोड़ोगे, नाक रगड़ोगे, जो कहेंगे वो करोगे तभी वजूद रहेगा। ज़रूरी नही है कि पन्द्रह हज़ार रुपये हर माह दिए जाएं हो सकता है 40 रुपया घण्टे के हिसाब से दिहाड़ी मिले। और अब जो दफ्तर से शाम के 5 बजे से लोग घड़ी देखने लगे जाते थे वे 10 बजे रात से पहले घर नहीं जा सकेंगे चाहे पत्रकार हों या सेल्समेन और सुबह 9 बजे ऑफिस आना पड़ेगा।

अब जी तोड़ मेहनत करो या पकौड़े तलो। गए नेहरू जी वाले दिन। अब अखबार या अपनी अपनी फैक्ट्री के मालिक को वाकई मालिक जी कहना पड़ेगा नही तो नमस्ते। उसकी दया है वो जो दे दे।

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