संजय कुमार सिंह
परीक्षा रद्द नहीं हुई पर नतीजे उलट-पलट गये, ठीक है कि अगर किसी को अनुचित लाभ पहुंचाने की कोशिश रही हो तो वह पूरा नहीं हो पाया। लेकिन ऐसा करने की कोशिश हुई – यह भी तो अपराध है। इसके लिए सजा क्यों नहीं? क्या यह सिस्टम में नहीं होना चाहिये कि गलती हो तो उसके जिम्मेदार को पकड़ा जाये उसके खिलाफ कार्रवाई हो। आइये, इसका मतलब और महत्व समझें तथा यह जानने की कोशिश करें कि यह सब सरकार के सहयोग या इच्छा से ही तो नहीं हो रहा है? आखिर देश के भविष्य के चिकित्सकों और चिकित्सा व्यवस्था का सवाल तो है ही। नीट का मामला सुप्रीम कोर्ट और इस साल के परीक्षार्थियों के लिए निपट गया होगा। एनटीए और सरकार को तो फिर अगले साल परीक्षा आयोजित करनी है।
नीट मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला वही है जो सरकार चाहती थी और किसी के लिए यह चाहे मुद्दा न हो पर खबर के लिहाज से यह जानना जरूरी है कि सरकार ऐसा क्यों चाहती थी या चाहती होगी। जो कारण सरकार ने बताये या स्वीकार किये हैं वो अपनी जगह, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से परीक्षार्थियों को जो असुविधा हुई, एनटीए की योग्यता, क्षमता और ईमानदारी पर जो सवाल उठे वह सब अनुत्तरित है। आशंका यह भी है कोई गिरोह या कुछ लोग प्रश्नपत्र लीक कराने या परीक्षार्थियों को लाभ पहुंचाने का काम करते हैं। उसका पता नहीं चला है और जो हुआ है उससे उसका काम चलता रहेगा। इस व्यवस्था को हतोत्साहित करने वाले निर्णय नहीं हुए। संभव है, इसकी मांग ही नहीं रही हो पर एनटीए ने पूरी परीक्षा के दौरान कई ऐसे काम किये जो नहीं करने चाहिये थे, कुछ को सुप्रीम कोर्ट ने पलटा लेकिन एनटीए ने ऐसे काम किये ही क्यों और इसके लिए किसी को सजा नहीं मिली और मिलती तो किसे यह सब कुछ पता नहीं है।
इस आधार पर कहा जा सकता है कि एनटीए की व्यवस्था इरादतन या अनजाने में ऐसी है जो परीक्षा के संबंध में ऐसी कार्रवाई करती है जो उसे नहीं करना चाहिये, सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया लेकिन वह योजनाबद्ध है या चूक इसे तय किया जाना चाहिये ताकि आगे की परीक्षाएं ठीक हों और सिर्फ सुपात्रों का चयन हो। कहने की जरूरत नहीं है कि इस व्यवस्था के लाभार्थियों और सरकार के समर्थकों के लिए यह मुद्दा नहीं होगा। अगर किसी के लिए यह मुद्दा हो भी तो वह भारत सरकार या एनटीए जैसी शक्तिशाली संस्था के खिलाफ कुछ नहीं कर सकते हैं और मामला धीरे-धीरे भूल जायेगा। बहुत संभावना है कि अगले साल फिर यही सब दोहराया जाये और जो चल रहा है (या चलाने की कोशिश है) वह चलता रहे और कोई शोर-शराबा हंगामा नहीं हो। तब तो मांग और नहीं होगी। इसलिए अब होनी चाहिये पर आज यह खबर सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है।
होने को यह खबर आज नवोदय टाइम्स में भी पहले पन्ने पर है। यहां इसका शीर्षक है, नीट-यूजी का रिवाइज्ड (संशोधिक) स्कोर कार्ड जल्द। उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट के पैसले के बाद तैयारी में एनटीए। आप समझ सकते हैं कि परीक्षा भले रद्द नहीं हुई, नतीजे में काफी कुछ उलट-पलट गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर बताती है कि परीक्षा भले रद्द नहीं हुई बहुत कुछ बदला है और इसमें प्रमुख है कि टॉप करने वालों की संख्या 61 से 17 रह गई है। 50 से एक लाख के बीच रैंक पाने वाले जिन 16 हजार छात्रों को पहले मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलने की संभवना थी वे अब सीट से वंचित रह सकते हैं। यह सामान्य नहीं है पर इस स्थिति के लिए दोषी या जिम्मेदार कौन है, का पता ही नहीं है, सजा देना तो दूर। अगर ऐसा एक ही बार हुआ होता तो आप इसे भूल सकते थे पर नीट की परीक्षा उसी एनटीए को हर साल करानी है। आगे यह परीक्षा ठीक से हो और सिर्फ सुपात्रों का चयन हो इसे सुनिश्चित किया जाना जरूरी है और इसके लिए एनटीए की कार्यप्रणाली में निश्चित रूप से काया-पलट की जरूरत है।
आप जानते हैं कि परीक्षा में एक ऐसा सवाल पूछा गया था जिसके दो उत्तर थे और यह एनसीईआरटी की किताबों के दो संस्करणों में अलग-अलग है। जाहिर है छात्रों से वही अपेक्षा की जायेगी जो उन्हें पढ़ाया गया होगा पर कानूनन गलत जवाब के लिए नंबर नहीं दिये जाने चाहिये। सुप्रीम कोर्ट ने अपना काम कर दिया। विशेषज्ञों के पैनल से सही जवाब पता किया और आदेश किया कि सही जवाब देने वालों को ही नंबर दिये जायें और गलत जवाब देने वालों के नंबर काटे जायें। परीक्षा के नियमों के अनुसार गलत जवाब के एक नंबर और कटते हैं यानी सही के लिए चार नंबर हो तो गलत जवाब देने पर पांच नंबर कटेंगे। इस हिसाब से अब उत्तीर्ण छात्रों की नई सूची बनेगी और उम्मीद है एनटीए आज यह सूची जारी करेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि गलती एनटीए की थी और दोनों उत्तर को सही मानकर उसने नंबर लुटाये थे जो ऐसे सवाल पूछने की सजा के रूप में भोगे जाने चाहिये थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानूनन सही नहीं माना तो रोक दिया पर गलती करने वाले को सजा नहीं मिली। गलती एनसीईआरटी की भी है। एक सवाल के दो उत्तर कैसे हो सकते हैं और कैसे यही बताया गया है। कायदे से किताब में बताया जाना चाहिये कि पहले यह बताया गया है जो गलत है। सही जवाब यह है।
जाहिर है, इसकी मांग ही नहीं की गई होगी और मुकदमा यह नहीं होगा। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि फैसला वह है जो सरकार चाहती थी। परीक्षा रद्द हो जाती तो यह माना जाता कि एनटीए ने ऐसी गड़बड़ी की कि सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षा रद्द कर दी अब उसकी गड़बड़ी मामूली हो गई है। परीक्षा परिणाम दोनों स्थितियों में बदलने थे। रद्द करने पर शायद कुछ दूसरे समूह को लाभ होता पर वह अलग मुद्दा है। मेरा मुद्दा यह है कि अखबार इसे महत्व क्यों नहीं दे रहे हैं। नीट का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे इस सरकार की कार्यशैली उजागर होती है। सरकार की कार्यशैली बताने वाला एक और मामला आज टाइम्स ऑफ इंडिया में ही पहले पन्ने पर है। इस खबर के अनुसार डीडीए ने सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ से कहा है कि वह रिज की योजना को रद्द कर देगा और दूसरी से कहा कि योजना को अनुमति दी जाये। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जेल में हैं और यह मामला उपराज्यपाल से संबंधित है। इसमें काफी समय से विवाद चल रहा है और कल भी अखबारों में खबर थी कि एक ही मामला दो पीठ के समक्ष था।
अब खबर है कि दोनों पीठ से एक ही मामले में दो अलग तरह की मांग की गई है और दलील दी गई है। मुझे लगता है कि ऐसा नियमों के साथ अपने काम को भी गंभीरता से नहीं देखने के कारण होता है। अखबारों में खबर छप रही होती तो जनता को सब पता होता पर हेडलाइन मैनजमेंट अखबारों में ही नहीं, संसद में भी है। आप जानते हैं कि इमरजेंसी लगाने की तारीख 25 जून को अभी हाल में ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित करने के बाद 2016 की नोटबंदी के बारे में बात करने से मना करने पर क्या हुआ। मेरा मानना है कि गलत का समय पर विरोध करना चाहिये, बाद में वो असर नहीं रह जाता है। आज मेरे सात में से चार अखबारों ने खनिज पर कर और रॉयल्टी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लीड बनाया है। हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और नवोदय टाइम्स में यह लीड नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड की चर्चा हो गई अब हिन्दुस्तान टाइम्स और नवोदय टाइम्स की लीड की चर्चा कर लूं। हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की लीड है, बारिश से चार राज्यों में भूस्खलन बाढ़ जैसी हालत की शुरुआत। यहां खनिज पर सुप्रीम कोर्ट की खबर सेकेंड लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खबर के अलावा पेरिस ओलंपिक की खबर है। जो अन्य खबरें हैं उनमें एक का शीर्षक है, शिखर की पांच सौ फर्मों को सीएसआर खर्च के आधार पर इंटर्न का कोटा मिलने की संभावना। इनमें आईआईएम, आईआईटी, सीए और सरकारी कर्मचारियों के बच्चे शामिल नहीं होंगे। दूसरी खबर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एक टिप्पणी है जो आरएसएस के कर्मचारियों पर लगे प्रतिबंध के संबंध में है कि सरकार को अपनी इस गलती को देखने में पांच दशक लगे। मेरा मानना है कि जिन कंपनियों को अपने लिये प्रशिक्षुओं की आवश्यकता है उनके पास इसकी व्यवस्था है और जमशेदपुर में टाटा मोटर्स के प्लांट में तो मैं यह 1970 के दशक से देख रहा हूं। उदारीकरण के बाद से मैं अनुवाद का काम करता रहा हूं और इस दौरान भिन्न कंपनियों के प्रशिक्षण और इसके लिए आईटीआई से गठजोड़ तथा इस संबंध में सरकारी योजनाओं और पाठ सामग्री आदि के अनुवाद करता रहा हूं और मेरा मानना है कि कौशल युक्त होने से ज्यादा उसका उपयोग बढ़ाने की आवश्यकता है। चाय और पकौड़े तो कोई भी बना-बेच लेगा। पर बेचने की जगह हो तभी कोई बेचता रह पायेगा। वरना अगर इस समय पढ़े-लिखे या बिना कौशल वाले बेरोजगार हैं जब प्रशिक्षित और कौशल युक्त लोग बेकार रहेंगे। जो भी हो, सरकार की योजना है तो उसका प्रचार भी होगा ही। जनता को फायदा मिले या नहीं सरकार ने कीमत देकर समर्थन खरीद लिया है। द हिन्दू में आज एक खबर है जिससे पता चलता है कि शंभू बॉर्डर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों ने कहा है कि वे हरियाणा चुनाव से पहले कहीं नहीं जा रहे हैं। देश के कई राज्यों में बाढ़ से तबाही की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है जबकि द हिन्दू ने इससे संबंधित एक फोटो लगाकर बाढ़ की स्थिति बताई है। राष्ट्रपति भवन के हॉल के नाम बदले जाने की खबर अंदर होने की सूचना भी द हिन्दू में पहले पन्ने पर है। आज की एक बड़ी खबर, लोकसभा में चन्नी बिट्टू भिड़े भी है। नवोदय टाइम्स ने इसे लीड बनाया है।


