रैली में राहुल गांधी ने कहा, ज्ञानेश के बाद मोदी व शाह का नंबर। देशबन्धु ने इसे बैनर शीर्षक बनाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह लीड का शीर्षक है लेकिन लीड एक फ्लैग शीर्षक के तहत है और तीन कॉलम में ही। इसकी दूसरी ‘खबर’ दो कॉलम में अमित शाह की है। अमर उजाला और दैनिक भास्कर ने संतुलन की पत्रकारिता की कोशिश की है। कइयों ने अमित शाह के इस यह दंभ को रैली के बराबर प्रमुखता दी है कि राहुल गांधी नकली संसद के ही पीएम रहेंगे या रह सकते हैं (और वोट चोरी रुक नहीं सकती है)।
संजय कुमार सिंह
अखबार वालों से ऐसे किसी कारनामे की उम्मीद मुझे कल से ही थी। वह इसलिए कि वोट चोर, उनके समर्थक, प्रचारक आदि मानने के लिए तैयार ही नहीं थे कि रैली में काफी लोग आए। ऐसी रैली 12 साल में तो नहीं ही हुई। लोगों को आने से रोकने से तमाम उपाय किए जाने के बावजूद जितने लोग दिखे वैसी रैली बहुतों को याद नहीं है। फिर भी, बहुत सारे लोग राम लीला मैदान की क्षमता और क्षेत्रफल से लेकर वहां बैठ सकने वाले ज्यादा से ज्यादा लोगों की संख्या का हिसाब लगाते रहे। उनके लिए मुद्दा यह नहीं था कि 13 करोड़ लोग जब वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं तो जितने भी आएंगे, एक करोड़ से भी कम होंगे। भले 10 लाख से ज्यादा हों। कुछ लोगों का कहना है कि 13 करोड़ में कई मर गए, कुछ पते पर नहीं मिले इसलिए हटाया जाना सही है। कुल मिलाकर, बात वहीं है कि मुद्दा बदल देंगे।
मुद्दा वोट चोर और वोट चोरी है तो बना देंगे रैली की सफलता (या असफलता)। ऐसे में अखबारों पर यह दबाव तो होना ही था कि फोटो ऐसी न छप जाए जिससे रैली ऐतिहासिक लगे। कई पुराने लोगों ने कहा है कि इतनी भीड़ राम लीला मैदान की किसी रैली में नहीं हुई। भाजपा या संघ भी कभी इतनी बड़ी रैली नहीं कर पाया। इसलिए मुद्दा रैली में मौजूद लोगों की संख्या है। एक फोटो हजार शब्द कहती है इसलिए फोटो जरूरी थी पर फोटो नहीं है। होती भी कैसे, जो भी फोटो अच्छी थी उसे एआई से बना करार दिया गया। यह संयोग ही होगा कि आज द टेलीग्राफ में भी भीड़ दिखाने वाली फोटो नहीं है। हालांकि, शीर्षक और जो फोटो है वह कम जोरदार या किसी भी तरह से कम स्पष्ट नहीं है।
अमूमन भाजपा जो चाहती है, कर ले जाती है। लेकिन अब उसे जवाब मिल रहा है, चुनौती है। उदाहरण के लिए, दिखाया गया कि राम लीला मैदान का हिस्सा खाली था। जवाब में यह भी दिखा दिया गया कि वहां कीचड़ था इसलिए खाली था। हालांकि इस प्रचार युद्ध में जीत उसी की होनी है जिसके पास पैसे हैं और हम जानते हैं कि किसके पास हैं। इसलिए मुद्दा वह नहीं है। मुद्दा यह है कि फोटो नहीं है। क्यों नहीं है समझना मुश्किल नहीं है। आज (पहले पन्ने पर) भीड़ दिखाने वाली जो फोटो है वह देशबन्धु में छपी है और दूसरी टाइम्स ऑफ इंडिया में। दोनों पूरे मैदान को कवर नहीं करती है। टाइम्स ऑफ इंडिया की फोटो मार्च की लगती है। इसका कैप्शन है, दिल्ली पुलिस के अनुमान के अनुसार रविवार को इंडिया ब्लॉक की रैली में करीब 50,000 लोग आए।
इसलिए, यह रैली हर लिहाज से अलग थी। अलग तो भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग पर चर्चा का मॉक संसद भी था लेकिन उसकी खबर कैसे छपी थी, कल बता चुका हूं। आज जो फोटो हैं उनसे भीड़ का अनुमान तो लगता है लेकिन अधिकतम भीड़ दिखा पाने वाली कोई फोटो प्रकाशित नहीं होना भी दिलचस्प है। फोटो के लिए अब तो ड्रोन कैमरे भी हैं। हाल में दैनिक भास्कर ने उड़ीशा में तूफान और बारिश के कारण सड़क पर पानी भर जाने से रुके वाहनों की कतार दिखाने वाली फोटो पहले पन्ने पर छापी थी। आज दैनिक भास्कर में ऐसी फोटो पहले पन्ने पर नहीं है। ड्रोन की फोटो की जरूरत इसलिए थी कि कल एक टीवी चैनल पर खबर के साथ एंकर ने कहा कि मैदान खचाखच भरा है लेकिन बाद में ड्रोन का वीडियो दिखाकर कहा कि मैदान का पिछला हिस्सा खाली था।
दि एशियन एज में रैली की खबर तो लीड है लेकिन बराबर में भाजपा की जवाबी रैली की खबर भी तीन कॉलम में है। इसका शीर्षक है, भाजपा ने विपक्ष की अराजकता की आलोचना की और दो जवाबी रैलियां निकालीं। इसके साथ एक और खबर है, दुकानें बंद रहने के कारण व्यापारियों को नुकसान पर कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप प्रत्यारोप। आप जानते हैं कि देश भर में जमाने से रैलियां होती रही हैं। बंद हुए हैं, दुकानें लूटी गई हैं और चोरियां तो होती ही हैं। कभी भी किसी रैली से दुकानदारों और व्यापारियों को नुकसान मुद्दा नहीं होता है। मोदी सरकार से आम आदमी को आर्थिक नुकसान है। सरकारी नौकरियों के पद खाली हैं, लोग बेरोजगार हैं और सरकार ने कुछ नहीं किया है। करने की कोशिश करती भी नहीं दिखी लेकिन वोट चोरी रैली से व्यापारियों को नुकसान का मुद्दा बना दिया और यह मतदाता सूची के शुद्धिकरण जैसी नौटंकी है।
इस प्रक्रिया में खर्च, परेशानी और संसाधनों की बर्बादी के मुकाबले जरूरत मुद्दा ही नहीं है और चुनाव चोरी के विरोध से होने वाले नुकसान को मुद्दा बना दिया गया। हिन्दुस्तान टाइम्स की फोटो लांग शॉट नहीं है। कैप्शन है – रविवार को ऊपर से खुले एक वाहन में इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने कनॉट प्लेस से राम लीला मैदान तक की यात्रा की। इन नेताओं में राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, फारूक अब्दुल्ला और तेजस्वी यादव शामिल थे। खबर का शीर्षक है, सीईसी के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन में विपक्ष ने एकजुट होकर मार्च निकाला। अखबार की इस खबर के मुकाबले लगभग बराबर में अमित शाह की फोटो के साथ एक खबर है। इसका शीर्षक है – अमित शाह ने कहा, राहुल गांधी मॉक पार्लियामेंट में ही प्रधानमंत्री हो सकते हैं।
इस खबर के साथ अमित शाह का कहा जो अंश हाईलाइट किया गया है वह इस प्रकार होगा – “झूठ बोलना, अफरा-तफरी (या अराजकता) फैलाना, नकारात्मकता को बढ़ावा देना, संसद के कामकाज में बाधा डालना, और संसदीय मुद्दों को सड़कों पर लाकर हंगामा खड़ा करना — अगर यही आपका [कांग्रेस का] स्वभाव रहा है, तो फिर विपक्ष में अगले पाँच साल बिताने के लिए तैयार हो जाइए।” अमित शाह कई साल सत्ता में बने रहने का दावा कर चुके हैं। उन्होंने कहा है कि 2029 का चुनाव भी भाजपा जीतेगी। दूसरी ओर राहुल गांधी इस (विश्वास) का कारण वोट चोरी कहते हैं। उस पर तमाम आरोप, सबूत और उदाहरण हैं। कुल मिलाकर, राहुल गांधी ने कहा है और यह दिखता रहा है कि वोट चोरी से सत्ता में आने के बाद, संसद में नहीं आने और विरोध की तमाम संभावनाओं को कुचल देने वाली सरकार प्रदर्शन भी नहीं करने देती है।
जंतर मंतर पर अब प्रदर्शन हो ही नहीं सकता है और मजबूरी में कांग्रेस अध्यक्ष के घर मॉक संसद का आयोजन करना पड़े तो यह अराजकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब वे इस सरकार को उखाड़ने के लिए ही कर रहे हैं तो रीजिम चेंज का रोना रोया जाता है, विदेश से साजिश करने का आरोप लगाया जाता है लेकिन उसका विवरण नहीं दिया जाता है और विपक्ष से मांगा जाता है जबकि सरकार के लिए यह सब पता करना चुटकी बजाने जैसा है। जाहिर है, सरकार फंस चुकी है। अब उसके पास बहाने नहीं हैं, तर्क तो पहले ही नहीं थे। उसमें इतना बडप्पन भी नहीं है कि विरोध का मर्यादा के साथ सामना करे और जायज मुद्दों का जवाब दे। उनपर आवश्यक कार्रवाई करे। ऐसे में जनता की नाराजगी दिखने के लिए प्रदर्शन और रैली का आयोजन हुआ तो जवाबी रैली निकाली जा रही है। खबर यही है।
आप जानते हैं खरी-खरी खबर छापने वाले द टेलीग्राफ के संपादक इस सरकार के शिकार हो चुके हैं। पहले उनका नाम मतदाता सूची से कटा, फिर पासपोर्ट (नवीकरण) नहीं बना और वे विदेश नहीं जा पाए। द टेलीग्राफ की आज की जोरदार हेडलाइन के अलावा, आज द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, मुख्य चुनाव आयुक्त ने नागरिकों की आवाज़ छीनी, उन्हें जेल जाना होगा: राहुल। उपशीर्षक है, ‘वोट की चोरी’ के विरोध में ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं के साथ भारी भीड़ ने मार्च किया; कांग्रेस नेता ने मोदी के बाद के दौर के लिए सद्भाव पर आधारित विज़न पेश किया; अखिलेश ने रामलीला मैदान को ‘लोकतंत्र की हल्दीघाटी’ बताया। आप समझ सकते हैं कि भाजपा को परेशानी क्या है और जवाबी मार्च क्यों निकालना पड़ रहा है।
द हिन्दू ने जो फोटो कैप्शन में लिखा है वह दि इंडियन एक्सप्रेस में लीड का शीर्षक है। रामलीला में विपक्ष का संयुक्त मोर्चा; राहुल ने कहा सीईसी को जेल भेजा जाएगा। यहां चार कॉलम की दो फोटो ऊपर-नीचे छपी है। लेकिन भीड़ नहीं दिखाती है। रैली की सफलता से हैरान-परेशान अमित शाह, रैली को असफल बनाने में लगे हैं। यहां छपी खबर के अनुसार, राहुल गांधी ने रैली के लिए 1984 के दंगे के दिन को चुना और पीड़ितों के जख्मों के पर नमक रगड़ा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने दोनों खबरों को एक ही फ्लैग शीर्षक से छापा है। हालांकि, राहुल गांधी ने जो कहा वह काली स्याही से बड़े और बोल़्ड फौन्ट में है। शीर्षक है, राहुल ने कहा – ज्ञानेश को जाना होगा। अमित शाह वाली खबर का शीर्षक वही है जो ऊपर लिखा है – राहुल मॉक पार्लियामेंट में ही प्रधानमंत्री हो सकते हैं। अखबार ने दिल्ली की मुख्यमंत्री के हवाले से 1984 के दंगों को लोकतंत्र की हत्या कहा है।
नवोदय टाइम्स ने विज्ञापन के बाद बची जगह में रैली की खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है, एसआईआर के खिलाफ हल्ला बोल। उपशीर्षक है, रामलीला मैदान में इंडिया की रैली, निशाने पर रहे सीईसी। हिन्दी के मेरे दो अखबारों – अमर उजाला और दैनिक भास्कर ने संतुलन की पत्रकारिता की है और रैली की खबर के साथ जवाबी रैली की भी खबर लगाई है। अमर उजाला की खबर के अनुसार, राम लीला मैदान की रैली के जवाब में भाजपा ने देश भर में मार्च निकाला। अध्यक्ष नितिन नबीन ने कहा और दोनों अखबारों ने प्रमुखता से छापा है कि राहुल गांधी विदेशी ताकतों के इशारे पर काम कर रहे हैं।
यहां मुद्दा यह है कि विदेशी ताकतों के इशारे पर काम करना गैर कानूनी है तो सरकार रोक क्यों नहीं पा रही है और नहीं है तो परेशान क्यों है? सनातनी अनैतिक काम नहीं करने की भी बात करते हैं लेकिन झूठे आरोप लगाने और महिलाओं के लिए अपशब्द से अनैतिक क्या हो सकता है? जहां तक राहुल गांधी के विदेशी इशारे पर काम करने की बात है, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि एपस्टीन से संबंधों का क्या नुकसान हुआ है या हो सकता है। हाल में खबर थी कि अमेरिकन काउंसिल ऑफ यंग पॉलिटिकल लीडर्स (एसीवाईपीएल) ने अपनी वेबसाइट पर नरेन्द्र मोदी की फोटो लगा कर उन्हें अपना अंतरराष्ट्रीय नेता घोषित कर रखा है। आरोप वे और उनके लोग राहुल गांधी पर लगाते हैं।
आज के अखबार भाजपाई प्रचार से प्रभावित लग रहे हैं और इसमें कई खबरों को प्रमुखता नहीं मिली है। उदाहरण के लिए राहुल गांधी ने कहा और यह दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं दिखा कि मोदी जाना भी चाहें तो विपक्ष नहीं जाने देगा। आप जानते हैं कि एक मौके पर किसी ने मल्लिकार्जुन खरगे से कहा कि मोदी नहीं जाएगा तो खरगे ने तैश में वही कह दिया जो देश में कोई भी ऐसी चुनौती पर कहता है। भाजपा ने बाप भी जाएगा को पकड़ लिया और मुद्दा बनाने की कोशिश की। यह भी प्रचारित किया गया कि, मोदी कहीं नहीं जाएगा। राहुल गांधी ने जो कहा इसी का जवाब है। अब मॉक संसद के पीएम की बात आई है। पहले कांग्रेस की ओर से जवाब नहीं आते थे अब खूब आते हैं, कांग्रेस आधिकारिक तौर पर न भी दे तो कोई न कोई देता ही है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



