कहां हैं आतंक की जड़ें?

पेशावर में मासूमों का क़त्ल हो या फिर सिडनी के यूनुस से लेकर, सुकमा के नक्सलियों का क़हर या फिर छत्तीसगढ़ की जीरम घाटी का अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला…. जिसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री और नौ बार के सांसद वीसी शुक्ल समेत दर्जनों नेता और जवान मारे गये… या फिर नक्सलियों, कश्मीरी आतंक या बब्बर खालसा, तालिबान या आईएस जैसे वो नाम जो न किसी सरकार को मानते है न किसी कानून को… हर हादसे के बाद कुछ दिनों तक सरकारें आंतकियों के सफाए के स्वच्छता अभियान की तरह दावे करतीं हैं और फेसबुकिए कॉपी पेस्ट के माहिर कथित लेखक अपनी भड़ास निकालते हैं…

मगर कोई ये क्यों नहीं सोचता कि आख़िर सियासत के खिलाड़ियों, दुनियां के कथित रहनुमाओं और दहशत के सौदागरों के टकराव के बीच फंसे दुनियां के अमन को बचाया कैसे जाए… यानि सोचना ये है कि इस समस्या का असल हल क्या है….? हंसता खेलता देश ईराक… जहां एक राष्ट्रपति और जनता की लोकप्रिय सरकार की मौजूदगी में अमेरिका ने जो काम किया उसको आमतौर पर सारी दुनियां किसी भी देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप मानती है….ठीक इसी तरह अफगानिस्तान में भी अमेरिका ने जता दिया कि जिसकी लाठी भैंस भी उसी की है….और दुनियां के ठेकेदारों समेत यूएन जिसको कि कुछ लोग अब यूसलैसनॉंनसैंस ऑर्गनाइजेशन तक कहने लगे हैं तक खामोश तमाशाई बने रहे….वही अमेरिका जिसने कभी वियेतनाम में अपनी मनमानी की थी और जापान के हिरोशिमा में जो किया वो भी सबको याद है… लेकिन अमेरिका को दुनियां को ठेकेदार मामने वाले शायद जानते हैं कि ताकतवर के सामने बोलना समझदारी की बात नहीं है….

सच्चाई ये भी है कि भले ही अमेरिका हो या कोई…. आईएसाईएस हो या तालिबान किसी भी समस्या का हल न तो गोली में है न बम में…किसी भी समस्या या शिकायत के हल का सबसे बेहतर तरीका यही है कि दोनो पक्ष आमने सामने बैठे बात करें और किसी एक बात पर सहमत होने की कोशिश करें….ऐसे में जो देश तटस्थ हैं उनका भी फर्ज है कि दोनों पक्षों की बात को निष्पक्षता से सुने और ईमानदार मध्यस्ता की मदद से मामले को हल करें…ताकि एक बेहतर युग को न सिर्फ बनाया जाए बल्कि दुनियां के आने वाले भविष्य को भी सुरक्षित किया जा सके….अगर हम ने इस वक्त ईमानारी से अपेन रोल को अदा नहीं किया तो यक़ीन मानना कि कल दुनियां को ये न सोचना पड़े कि …..

” मां तो दरवाज़े पर इंतज़ार ही करती रह गई….. और बच्चे स्कूल से ही जन्नत को चले गये ।।

लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं. सहारा समय, इंडिया टीवी और इंडिया न्यू़ज़ समेत कई राष्ट्रीय चैनलों पर प्रमुख पदों पर कार्य कर चुके हैं। उनसे संपर्क +91 9718361007 के जरिए किया जा सकता है।



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Comments on “कहां हैं आतंक की जड़ें?

  • santosh singh says:

    AAPNA MATLAB NIKAL GAYA TO PAHCHANTE NAHI (KYA THA PAHLE AB KAYA HAI HAM JANTE HAI PHIR BHI NAM WALE KE SATH SAB RAHNA CHAHTA HAI) …….SAWDHAN INDIA

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