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अलविदा एनडीटीवी!

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प्रकाश के रे-

एनडीटीवी के अधिग्रहण की औपचारिक प्रक्रिया प्रारंभ होने के समाचार को देखते हुए कई बातें ध्यान में आ रही हैं. दो दशक पूर्व मीडिया में नौकरी तलाशने के क्रम में पहली दफ़ा चैनल के कार्यालय जाना हुआ था. रिसेप्शन पर सीवी दे देने का चलन हुआ करता था. दूरदर्शन में इंटर्नशिप समाप्त होने के साथ ही यूएनआई में नौकरी मिल चुकी थी. पर ललक थी टीवी में जाने की. उसी दौरान इंडिया टीवी में भी सीवी दिया था और राजदीप सरदेसाई से भी मिला था. उन्होंने कहा कि हिन्दी चैनल शुरू करेंगे, तो आइयेगा. एनडीटीवी से बुलावा नहीं आया, पर इंडिया टीवी में नौकरी मिल गयी. बहुत जल्दी समझ में आ गया कि टीवी में जितनी मेहनत है, जो अनुशासन चाहिए, वह मेरे बूते की बात नहीं.

बहरहाल, कई साल बाद एनडीटीवी पर बतौर पैनलिस्ट जाने का सिलसिला शुरू हुआ. मज़े की बात यह है कि यह सिलसिला पहले अंग्रेज़ी एनडीटीवी से शुरू हुआ, जिसके कार्यक्रम सोशल नेटवर्क में कशिश ने बुलाना शुरू किया था. फिर रवीश ने कई बार बुलाया. उनके साथ मेरा पहला कार्यक्रम भारतीय सिनेमा के सौ साल पूरा होने पर था. रवीश के साथ कार्यक्रम करने का अनुभव शानदार रहा और उन्होंने हमेशा मुझे अपनी बात कहने का पूरा मौक़ा दिया. कुछ बार निधि कुलपति और नग़मा सहर के कार्यक्रमों में भी जाने का अवसर मिला. एनडीटीवी पर देखकर अनेक चैनलों ने भी आमंत्रित किया, लेकिन मैंने एनडीटीवी के अलावा केवल दूरदर्शन, लोकसभा टीवी और राज्यसभा टीवी के कार्यक्रमों में ही हिस्सा लिया. जो मौक़े एनडीटीवी ने मुझे दिये, उसके लिए उनका हमेशा आभारी रहूँगा.

एनडीटीवी से लगाव ही वह वजह रही है कि मैंने उसके शेयर भी ख़रीदे. पिछले दिनों जब शेयरों के भाव आसमान पर थे और अधिग्रहण लगभग तय दिख रहा था, तब उस मोह से मैंने छुटकारा पाया. एनडीटीवी मेरे कैशोर्य, युवा और अब अधेड़ होते समय का अहम हिस्सा रहा है. चैनल के अधिग्रहण के साथ एक पूरा युग पूरा होता है. इस चैनल ने और इसके पत्रकारों ने अपने पेशे में एक प्रतिमान स्थापित किया है. सबको धन्यवाद और शुभकामनाएँ…

अंत में एक दिलचस्प कहानी- एक दफ़ा निधि कुलपति प्राइम टाइम कर रही थीं. मैं भी आमंत्रित था. स्टूडियो में वे मिलीं और उन्होंने कहा कि वे निधि कुलपति हैं. मैंने उन्हें कहा कि आपको कौन नहीं जानता! हम तो आप को और माधुरी दीक्षित को देखकर जवान हुए हैं. वे क्या कहतीं, मुस्कुरा कर रह गयीं.

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