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सियासत

ब्रजवासियों पर थोपी गई ‘मुंबई की हेमा’ का मथुरा आना भी ख़बर होता है!

जगदीश वर्मा ‘समंदर’

मथुरा। भाजपाईयों द्वारा दावा किया रहा है कि हेमा मालिनी मोदी के नाम पर तीसरी बार मथुरा का चुनाव जीत रही हैं। दूसरी ओर इस आंकलन पर मुहर लगाते लोगों में भी खामोश चर्चा है कि हेमा भले चुनाव जीत जाएं, लेकिन वे ब्रजवासियों का प्रेम हार चुकी हैं।

मथुरा में हेमा की अनुपलब्धता और स्थानीय योग्यता को दरकिनार कर थोपी गई उनकी तीसरी इच्छा का साफ विरोध है… फिर भी उनकी जीत के दावे, मजबूत हैं।

लोग कहते हैं कि हेमा की जीत विधायक श्रीकांत शर्मा की दूसरी जीत जैसी होगी। श्रीकांत भी दुबारा विधायकी का चुनाव जीते, लेकिन अपने काम और व्यवहार के दम पर नहीं… केवल मोदी, योगी के नाम पर। विधानसभा चुनावों में अंतिम समय तक स्थानीय स्तर पर लोगों में उनसे नाराजगी रही। जिसे अब वो दूर कर रहे हैं।

निजी कॉलेज की एक अध्यापिका कहती हैं कि पिछले दस वर्षों में भी हेमा मालिनी मुंबई की अभिनेत्री से मथुरा की जनप्रतिनिधि में परिवर्तित नहीं हो पाईं हैं।

परचून की दुकान चलाने वाले महावीर पाठक बोलते हैं कि’ हेमाजी का व्यवहार आज भी सेलिब्रेटी, हीरोइन वाला है। ब्रज के एक सामान्य नागरिक का अपने सांसद से मिलना… मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन के करीब है।’

मुंबई हेमा का घर है, मथुरा में उनके आगमन की सूचना, एक खबर है… जो अखबारों में छपती है। एक टिप्पणी ये भी है।

सांसद और सांसद प्रतिनिधि में फर्क होता है… जनता सांसद के लिए वोट डालती है, उसके प्रतिनिधि को चुनने के लिए नहीं। लेकिन ऐसा लगता है, जैसे ब्रजवासी मजबूर हैं।

बीजेपी के एक पुराने वोटर खीजते हुए बोलते हैं ‘विकास वो है जिसे याद न रखना पड़े, जिसे विज्ञापन देकर न बताना पड़े… मथुरा में ऐसा ही मनमौजी विकास हुआ है। असल में स्वच्छ यमुना, बंदर आतंक, वृंदावन जाम, रोजगार जैसी मूलुभूत समस्याओं पर सांसद के प्रयास और झूठ, ब्रज की गलियों में बिखरे पड़ें हैं।

राजनीति के जानकार कहते हैं कि इन सब शिकायतों के बावजूद हेमा की स्थिति मजबूत है। क्योंकि मथुरा के सक्षम विपक्ष के अधिकांश चेहरे किसी न किसी रूप में या तो उनकी पार्टी से सीधे जोड़ लिए गए हैं, या फिर कूटनीति से उनका विरोध थाम दिया गया है। जो उनके विरोध में प्रमुखता से लड़ रहे हैं। लोगों की आशंका है कि उनमें से एक, चुनाव बाद मांट वाले विरोधी की तरह दुबारा मूल पार्टी के साथ खड़े दिख सकते हैं।

बाकी, हाशिए पर पड़ी पार्टी के प्रतिद्वंदी को चुनाव के साथ साथ अपनी पार्टी की अंदरूनी फूट से भी लड़ना पड़ रहा है। अगर समय से उनका नाम घोषित होता, और पार्टी के पुराने खलीफा मनोबल तोड़ने की बजाय, साहस बढ़ाते तो…और अच्छा हो सकता था। बहुत से लोग चमत्कार में भी विश्वास करते हैं…और कई बार चमत्कार हो भी जाते हैं।

वैसे जमीनी हकीकत ये है कि मथुरा का ये चुनाव उमंग हीन है… लोग उदासीन हैं। लगता नहीं कि चुनाव है। ऐसे ही चुनाव में कौन जीते ये समय की बात है, लेकिन फिलहाल मोदी समर्थकों और राजनेतिक पंडितों का दावा है, कि हेमा मालिनी प्रेम की बलि देकर भी चुनाव जीत रही हैं।

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