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असत्य और हिंसा जितने बढ़ेंगे, जैन दर्शन उतना प्रासंगिक होगा

रंगनाथ सिंह-

MA (Comparative Religion) में 8 धर्मों की बुनियादी बातें पढ़ायी गयी थीं। मेरी राय में जैन धर्म नैतिकता और शुचिता का सर्वोच्च शिखर है। सिर्फ तात्विक आधार पर मुझे निर्णय देना हो तो जैन धर्म जैसी दूसरी नैतिक व्यवस्था मेरी नजर में नहीं है। जाहिर है कि जैन धर्म में पैदा होना एक बात है और भगवान महावीर की शिक्षाओं पर चलना दूसरी बात है। हिन्दी भाषा पर भी जैनियों का बहुत ऋण है। जैनी विद्वान लाइब्रेरी मेटेंन करने में सिद्धहस्त रहे हैं।

पिछले कुछ सालों में जब भी शाकाहार और माँसाहार की बहस चली तो मुझे भगवान महावीर और भगवान बुद्ध की याद आयी। भारत में एक बड़ी आबादी के भीतर अगर जीवों को मारकर खाने के प्रति अरुचि है तो उसके लिए मुख्य जिम्मेदार ये दोनों महान लोग हैं। रोमिला थापर की शब्दावली में दोनों ही श्रमण थे, ब्राह्मण नहीं। वर्ण व्यवस्था के हिसाब से भी दोनों ब्राह्मण नहीं। अतः “शाकाहार को ब्राह्मणवाद से जोड़ना गर्हित प्रोपगैंडा है। जाहिर है कि पुरानी आदत आसानी से नहीं जाती। लम्बी बहस के बाद भारतीय समाज ने यह स्वीकार किया होगा कि शाकाहार श्रेय है। यह बहस दुबारा खुली है तो दुबारा से भगवान महावीर और भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को याद करना स्वाभाविक है।

गांधी की जी को सत्य और अहिंसा का सूत्र भी भगवान महावीर की शिक्षाओं से ही मिला होगा। गांधी जी वैष्णव हिन्दू थे। हिंदू पंथों में जैन धर्म की नैतिकता-शुचिता के कोई सबसे करीब नजर आता है तो वह हैं वैष्णव पंथ है। आचार्य ओशो रजनीश ने बहुत सटीक बात कही है कि अब्राहमी पंथों और भारतीय पंथों में एक बुनियादी अंतर ये है कि वहाँ अपडेट करने की गुंजाइश नहीं है। संस्थापक ने जो कह दिया सो कह दिया देश-काल-परिस्थिति बदलने के साथ ही हर पंथ में कुछ विकृत्तियाँ आ जाती हैं, कुछ बग आ जाते हैं। अगर सिस्टम को अपडेट करने की सुविधा न रहे तो पूरा सिस्टम वायरस से भर जाता है।

भारत के कई गैर बौद्ध, गैर जैन पंथों में आज बहुत सी शिक्षाएँ ऐसी हैं जिनपर विशेष जोर देने का काम भगवान बुद्ध और भगवान महावीर जैसों ने किया। दूसरे पंथों ने अपने ईष्ट देव और धार्मिक संस्कार को बदले बिना, आचार-विचार बदल लिया। उसे नए दर्शन के हिसाब से मॉडिफाई कर लिया। इसका सबसे रोचक उदाहरण भी शाकाहार-माँसाहार की बहस से ही याद आ रहा है।

जीव बलि के हिन्दू समर्थकों में शाक्त परंपरा की दुहाई देने वालों की संख्या ज्यादा है। खासतौर पर उन लोगों की जो पूर्वी भारत में रहते हैं। लेकिन इस समय वैष्णो देवी शायद देश में सर्वाधिक लोकप्रिय देवी होंगी लेकिन उनकी “आज्ञा” है कि मुझे प्रसन्न करने के लिए जीव बलि नहीं दिया करो! बहुत से लोग कठदलील देते हैं कि वैष्णो देवी तो अभी नई-नई नहीं!

जाहिर है ऐसे लोगों को यह समझ में नहीं आता है कि अपडेट लेटेस्ट ही अच्छा होता है। हालाँकि ऐसे लोग भी मानते हैं कि हिन्दू धर्म “नित नूतन चिर पुरातन” सिस्टम है। लेकिन ऐसे लोग इसपर विचार नहीं करते कि इस सिस्टम में क्या नूतन है, क्या पुरातन है!

हिन्दू धर्म की तुलना शिप ऑफ थीसियस से की जा सकती है। थीसियस के पास एक जहाज था। उसकी जहाज का जो हिस्सा खराब होता गया, वह उसे बदलता गया। धीरे-धीरे उस जहाज के सारे हिस्से बदल गया। वहाँ से एक पैराडॉक्स पैदा हो गया कि समय के साथ-साथ जब एक हिस्से बदल गये तो अब जहाज वही पुराना है या पूरा नया हो गया है! जाहिर है कि थीसियस का जहाज ‘नित नूतन चिर पुरातन” था।

आज भगवान महावीर की जयंती है। उनकी जंयती पर यह पोस्ट इसलिए लिखी है ताकि हम यह याद कर सकें कि भले ही कागजी तौर पर खुद को जैन कहने वाली की संख्या कुछ करोड़ हो, लेकिन हर हिन्दू के अन्दर पर्याप्त मात्रा में जैन धर्म है। हिन्दू होने की सबसे अच्छी चीज भी यही है कि हिन्दू सभी धर्मों की अच्छी शिक्षाओं को सीखने के लिए धार्मिक रूप से स्वतंत्र है। अगर हिन्दू धर्म के जहाज में कोई टुकड़ा खराब हो जाए तो उसकी मरम्मत के लिए अच्छा पुर्जा जहाँ से मिले, वह उसे स्वीकार कर लेगा।

जिनके पास समय और रुचि हो, उन्हें भगवान महावीर के वचनों का अध्ययन जरूर करना चाहिए। बौद्धिक डोमेन में काम करने वालों को अनेकांतवाद का अध्ययन करना चाहिए। आप चकित हुए बिना न रहेंगे कि पोस्ट-माडर्न स्कॉलर के जन्म से दो हजार साल पहले भारत में ‘सप्तभंगी नय’ का दर्शन दिया जा चुका था। अफसोस है कि मार्क्स, फूको, देरीदा इत्यादि का जैन दर्शन से परिचय नहीं था, नहीं तो वह भी उससे लाभान्वित होते और अपनी सैद्धांतिकी को बेहतर माँज पाते।

जैन धर्म की शिक्षाओं को आधुनिक सन्दर्भ में पुनर्पाठ की मेरी इच्छा शायद ही पूरी न हो सके, लेकिन उम्मीद है कि आने वाली पीढ़ियाँ ज्यादा स्वतंत्र होंगी और western epistemology के आतंक से मुक्त होकर सूक्ष्म दार्शनिक विषयों पर विचार करने में सक्षम होंगी।
आज इतना ही। शेष, फिर कभी।

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