राणा यशवंत की अगली किताब ‘अर्धसत्य’

Rana Yashwant : मेरी अगली किताब ‘अर्धसत्य’ पर काम जारी है. आमिर ख़ान पर जो एपिसोड था, उस पर जो लिखा है, उसका एक टुकड़ा आपके लिए. कांटेंट और टेक्सचर दोनों का थोड़ा ख्याल रखा है.

”लखनऊ से उत्तर की तरफ कार दौड़ लगा रही थी. सुबह के यही कोई दस बज रहे थे. दोनों तरफ के खेतों में रबी की बुआई चल रही थी या फिर हो गई थी. कुछ खेतों में ईंख की फसल खड़ी थी, लेकिन मरियल-सी, कमजोर. मैंने अपने ड्राइवर से पूछा- भई इधर ईंख ऐसा क्यों है ? जवाब आया- सर इधर की मिट्टी थोड़ी कमजोर है, लेकिन किसान के पास ईंख बोने के अलावा कोई और रास्ता है ही नहीं. दरअसल हम हरदोई जिले में घुस चुके हैं और यहां आबादी तो बहुत है सर लेकिन गरीबी भी उतनी ही है – ड्राइवर ने अपनी बात जोड़ी. अच्छा, यहां से शाहाबाद कितनी दूर? मैंने बात बदली. सर, बस आधा घंटा और मान लीजिए. शाहाबाद में एक गांव है अख्तियारपुर जहां हमें जाना था. यह गांव फिल्म स्टार आमिर खान का पुश्तैनी गांव है. आमिर खान का शो सत्यमेव जयते स्टार प्लस चैनल पर आता है और इसको लेकर देशभर में काफी चर्चा होती है. हाल ही में एक एपिसोड जो बुजुर्गों पर था, उसमें आमिर इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखें छलक पड़ीं. एक एपिसोड में वो कह रहे थे कि हम कई मुद्दों पर लड़ने की बजाए उनपर पर्दा डाल देते हैं. मैं अपने शो अर्धसत्य के ज़रिए आमिर के दर्द को उनके अपनों के बीच समझना चाहता था. मेरी कार जब सड़क से नीचे उतरी तो ईंटवाली सड़क साथ चलने लगी. करीब पांच सौ मीटर जाने के बाद अख्तियारपुर शुरु हुआ. कार, आमिर के घर के बाहर रुकी. हमारे स्थानीय रिपोर्टर आलोक सिंह पिछले दो किलोमीटर से साथ थे और रास्ते की डोर उन्होंने ही पकड़ रखी थी. बस-बस यहीं रोकिए- आलोक ने ड्राइवर के कंधे पर हाथ दबाते हुए कहा और लगे हाथ दांयी तरफ उंगली उठाकर बताया – सर यही है आमिर का घर . किसी पुरानी हवेली का खंडहर-सा लगा. आगे का जो भी हिस्सा रहा होगा, ढह चुका था- सहन था. बांयी तरफ एक बड़ा-सा कमरा खड़ा था, जिसकी छत और चौखट नहीं थे. इस कमरे की पिछली दीवार से लगकर एक दीवार दांयी तरफ जा रही थी, जिसके बीचवाले हिस्से में दरवाज़ा था. अंदर जाने का इकलौता रास्ता. मैं अपने कैमरामैन शरद बारीक के साथ दरवाज़े पर खड़ा हो गया. यह दरवाज़ा एक कमरे में खुलता था जिसके अंदर दो खाट बिछी थी, दीवार पर ठुकी कीलों पर कुछ कपड़े टंगे थे और एक तरफ छत से कुछ नीचे लकड़ी के तख्ते पर बच्चों की किताबें रखी थीं. इस कमरे में एक और दरवाजा था जिससे आंगन लगा हुआ था. बस कुछ सेकंड के अंदर मैंने पूरा मुआयना कर लिया. बेटा घऱ में कोई बड़ा है? दरवाजे पर एक बच्ची खड़ी थी- मैंने उससे पूछा. मेरी बात अभी पूरी ही हुई थी कि आंगन से एक महिला कमरे में आईं. सिर पर पल्लू संभालते हुए मेरे नमस्कार कहने से पहले उन्होंने ही सिर झुका दिया. मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि मैं चाहता हूं घर के अंदर आकर आपसे कुछ बात करुं. उन्होंने थोड़ा हिचकते हुए ही सही लेकिन हामी भर दी…”

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की एफबी वॉल से.

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