‘इंडिया न्यूज’ के पत्रकार रोहित सावल बने हिमाचल प्रदेश के सीएम के मीडिया सलाहकार

Rana Yashwant : कुछ उपलब्धियां आपके लिए खुशी और नाज़ दोनों का ख़ज़ाना लेकर आती है. इंडिया न्यूज उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड और हरियाणा के संपादक रोहित सावल का नया मुकाम मेरे लिये ऐसा ही है. आज उन्हें हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का मीडिया सलाहकार बनाने का एलान हुआ. नोटिफिकेशन जारी किया गया. रोहित एक सुलझे और साहसी पत्रकार हैं.

काबिल, जुनूनी, जुझारु और ईमानदार. बतौर इंसान नेकदिल, नेकनीयत और नेकी में यकीन रखनेवाले. मेरे साथ एक अजीब-सा रिश्ता रहा है रोहित का. करीब भी उतनाऔर मुझसे लिहाज,डर भी उतना ही. छोटी-बड़ी, निजी-पराई, हर जरुरी बात बताना और दफ्तर से घंटे भर के लिये भी कहीं जाना हो तो पहले पूछ लेना कि सर जाएं?

इन आदतों के चलते रोहित मेरे बहुत करीब होते गए. याद नहीं कि कुछ कहा हो और उसपर अमल ना हुआ हो. मूड बहुत अच्छा हो या बहुत खराब -दोनों स्थितियों में फोन आना कि सर आज टाइम निकालिए,आ रहा हूं. प्रोफेशनल रिश्तों के धीरे धीरे निजी, सहज, आत्मीय और भावनात्मक होने की मेरे लिए बेहतरीन मिसाल है, रोहित से मेरा रिश्ता.

उनके सुनहरे और चमकदार भविष्य की बहुत सारी मंगलकामनाएं.

इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की एफबी वॉल से.

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इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत और उनके परिजनों को ‘भक्त’ देने लगे धमिकयां!

Rana Yashwant : इस देश में एक कौम पैदा की जा रही है जो पूरी तरह से नंगा है और आप पर अपनी सारी सड़ांध, लिजलिजापन और गंध लिए कभी भी हमला बोल देती है. ये सोशल मीडिया पर होता है और फोन के जरिए भी. मुझे अभी एक कॉल आया एक नंबर से. (ये नंबर जरूरत पड़ी तो मैं आप लोगों से साझा करुंगा) निहायत घटिया जुबान और हर बात के आखिर में- ”तुम…देशद्रोही”. ये देशभक्ति का ठेका लेकर चलनेवाली जमात सनकी, दिमागी तौर पर अपाहिज और लफंगों-लुहेड़ों की है.

उसको पता ही नहीं कि हम किस मिट्टी के बने लोग हैं. डर और आतंक की औकात ही नहीं कि रत्ती भर भी हिला पाए. इस बार का ‘अर्धसत्य’ कार्यक्रम किसानों पर था और लाजिमी है कि सत्ता-व्यवस्था से आप सवाल करेंगे ही. हमारा काम ही सवाल करना है. सवाल हमारा फर्ज है, विरोध नहीं. जबतक जिंदा रहेंगे, इस सवाल से किसी को भी फारिग नहीं होने देंगे. किसी भी हाल में नहीं. अगर ऐसे दो कौड़ी के लोगों के चलते कलम औऱ जुबान बदलने लगे तो इससे बेहतर मरना होगा.

प्रधानमंत्री जी, गृह मंत्री जी, उम्मीद कर रहा हूं कि उस नंबर के बारे में मुझसे पूछा जाएगा. अभी जब मैं ये पोस्ट खत्म कर ही रहा था कि मेरे बेटे का फोन आया कि पापा फलां नंबर से फोन आया और काफी गाली गलौज कर रहा था, धमकी दे रहा था मारने की. ये स्थिति खतरनाक है.

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की एफबी वॉल से.

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सच ये है कि मोदी अब एक ब्रैंड में बदल गए हैं : राणा यशवंत

उत्तर प्रदेश से जो जनादेश है उसका चाहे जितना पोस्टमार्टम कर लें, खुद बीजेपी के लिये भी ये समझ पाना मुश्किल है कि ऐसा हुआ कैसे! लेकिन सुनामी आई और इसने कई जकड़बंदियों, राजनीतिक रिवाजों, फरेब के हवाईकिलों और बेहूदगियों-बदज़ुबानियों को ध्वस्त कर दिया. सामाजिक न्याय के नाम पर जातियों को अपनी जागीर बनानेवाले नेताओं के लिये ये जनादेश एक सबक है. कानून-व्यवस्था और सड़क-बिजली जैसी बुनियादी जरुरतों की जगह एक्सप्रेस-वे और स्मार्ट फोन देने की राजनीति के लिये ये जनादेश एक सबक है.

दलितों के नाम पर लगातार मालदार-महलदार होते जाने और हाशिए पर खड़े समाज के भविष्य को बाबा साहेब और हाथियों की मूर्तियों से जकड़ देने के खतरनाक खेल के लिये ये जनादेश एक सबक है. और यही सारे सबक मोदी या फिर यूपी की नई सरकार के लिये संदेश भी है. संदेश, विरोध की बेलगाम-बदजुुबान राजनीति करनेवाले लोगों और किसी पार्टी या विचारधारा (वैसे ये बस कहने के लिये है) की पट्टी बांधे पत्रकारों के लिये भी है.

सच ये है कि मोदी अब एक ब्रैंड में बदल गए हैं. बाजार में आप कोई उत खरीदते हैं और समान तरह के उत्पादों के बीच सबसे ज्यादा अगर किसी उत्पाद पर विश्वास करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि आप इस्तेमाल करते करते, विज्ञापनों और लोगों की बातचीत के जरिए ये भरोसा कर लेते हैं कि यही उत्पाद सबसे विश्वसनीय है. फिर वो ब्रांड हो जाता है. मोदी एक ब्रांड हो गए हैं. लोगों को उनपर भरोसा हो चला है. इसीलिए अगर वो कहते हैं कि नोटबंदी मैंने सिर्फ इसलिए की कि ये जितने कालेधन वाले और हराम की कमाई कर कोठी-अटारी भरनेवालों को सबक सिखाऊं तो लोग तालियां बजाते हैं. साठ दिन तक हलकान रहने, लाइन में खड़ा होकर परेशान रहने के बावजूद उबाल नहीं पैदा होता.

जन-धन खाते खुलवाने के पीछे गरीब से गरीब को सरकार की योजनाओं से जोड़ने और बीमा से लेकर मुआवजे तक से सीधे जोड़ने की बात मोदी कहते हैं तो लोगों को लगता है कि कुछ नया तो ये आदमी कर ही रहा है. श्मशान कब्रिस्तान की बात मोदी जब करते हैं और कहते हैं कि तुष्टिकरण की नीति नहीं चलनी चाहिए, सबके साथ बराबर का व्यवहार होना चाहिए तो सेक्लूयरिम के नाम पर बहुसंख्यकों को हाशिए पर डालने की राजनीति लोगों को समझ में आने लगती है. ऐसा नहीं कि कोई दूसरा नेता इन बातों को नहीं कहता है या फिर नही कहा है, लेकिन मोदी पर लोग भरोसा सिर्फ इसलिये कर रहे हैं कि उन्होंने खुद को एक ब्रैंड में बदल लिया है. ये एक प्रक्रिया है जो धीरे-धीरे चलती रहती है और लोगों के दिल-दिमाग में बदलाव आता रहता है.

परसेप्शन और ब्रैंडिग की फिलॉसोफी ही यही है. आप अपनी बात को किस तरह से रखते हैं, लोगों की जरुरत और उम्मीदों पर कितना खरा उतरते हैं और मुकाबले में चल रही संस्थाओं-मान्यताओं को कितना ध्वस्त करते हैं. मोदी तीनों मोर्चों पर लगातार काम करते रहे हैं. चाहे विदेशों में जाकर बड़े बड़े इवेंट खड़ा करना हो, म्यांमार में अंदर जाकर उग्रवादियों के ठिकानों को ध्वस्त करना हो, पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों के कैंप खत्म करना हो, उज्ज्वला योजना के जरिए घर घर तक गैस सिलेंडर पहुंचाना हो, बिचौलियों का धंधा बंदकर हजारों करोड़ बचाने का एलान करना हो, जनता का पैसा लेकर बैठे नेताओं-पूजीपतियों को ना छोड़ने का शंखनाद करना हो, मैं आपका ऐसा प्रधानसेवक हूं जिसने आजतक आराम नहीं किया- ये याद दिलाना हो और ऐसी दर्जनों बातें आम, आदमी के दिमाम में मोदी के लिये एक अलग छवि तैयार करती रहीं. मोदी को फोकस कर नारे गढने और विज्ञापन तैयार करने की योजनाएं भी इस इमेज को मजबूत करती हैं. पिछले पौने तीन साल में मोदी और उनकी टीम ने नरेंद्र दामोदर दास मोदी की पूरी इमेज की जबरदस्त ब्रैंडिग कर दी.

आप क्या कहते हैं ये समझना बड़ा जरुरी है और बारीकी से समझना होगा. मोदी जब कहते हैं कि मेरा मालिक कोई नहीं है, मुझे किसी को जवाब नहीं देना है- मेरे मालिक आप हैं, मैं आपको जवाब देने के लिये हूं तो लोग गदगद हो जाते हैं. बनारस में वे कहते हैं मैं आपके दर्शन करने आया हूं तो लोगों के दिल पसीजता है. रैलियों में मोदी याद दिलाते हैं कि मैं यहां तब आया था और उस समय इतनी भीड़ थी, आज इतना बदला है भाई- कुछ होनेवाला है. ऐसी बातें चर्चा में आती है कि देखो पीएम होने के बाद भी कितना ध्यान रहता है इस आदमी को. दरअसल यह काम टीम करती है और लोगों में ऐसी ही बातों की चर्चा चलवाने के लिये बनाती है ताकि ब्रैडिंग की प्रक्रिया चलती रहे.

लोगों की नेताओं, राजनीति औऱ शासन के बारे में राय बदलती रहे. इन तमाम मोर्चों पर देश के दूसरे नेता मोदी से कोसों दूर दिखते हैं. नतीजा ये है कि आज लालू- मुलायम की लाठी, लठैतों और जाति की जहरीली राजनीति लोगों को रास नहीं आ रही क्योंकि नौजवान ६५ फीसदी हैं और ये नए नजरिए की पीढी है. अखिलेश और राहुल नौजवान जरुर हैं लेकिन नौजवानों की पसंद-जरुरतों पर मोदी ज्यादा फिट बैठते हैं. वे साफ सुथरी राजनीति, करप्शन फ्री सिस्टम, बहाली और तरक्की की पारदर्शी व्यवस्था, जवाबदेह नौकरशाही और दुनिया में हिंदुस्तान की साख मजबूत करने की जो बात करते हैं- वह नौजवानों को रास आती है.

यह पीढी हुल्लड़बाजों-लफंगो की भीड़ लेकर चलनेवाले और सनसनी पैदा करनेवाले काफिलों पर इतरानेवाले नेताओं को अब खारिज करने लगी है. अब डिलिवरी चाहिए, डेडिकेशन चाहिए और यही मोदी के लिये चुनौती है जिसका अंदाजा उन्हें बाकायदा है. मोदी के आसपास कोई नेता आज की तारीख में साख और सलीके के नजरिए से दिखता है तो वो नीतीश कुमार हैं लेकिन उनमें वो डायनामिज्म नहीं है जो मोदी में है. मोदी रिस्क लेते हैं और यह लोगों को पसंद आता है. बनारस में बीजेपी की हालत पतली थी. श्यामदेव राय चौधरी को टिकट नहीं देने का मामला जिले में बीजेपी नेतृत्व पर सवाल उठा रहा था. मोदी ने अपने गढ मे तीन दिन ताकत झोंक दी और नतीजा ये कि सभी सीटें निकाल गए. उत्तर प्रदेश में २१ रैलियों के जरिए मोदी १३२ सीटों तक पहुंचे और इनमें ९६ सीटें बीजेपी जीत ले गई.

मायावती लगातार कहती रहीं कि मुसलमान बीेएसपी को वोट दें और उन्होंने १०० मुसलमान उम्मीदवार उतारे भी. दूसरी तरफ अखिलेश ने कांग्रेस से हाथ ही इसलिए मिलाया कि मुस्लिम वोट को बीजेपी के खिलाफ लामबंद किया जा सके. लेकिन हुआ ये कि वैसी १३४ सीटें जिनपर मुस्लिम मतदाता २० फीसदी या फिर उससे ज्यादा है, बीजेपी करीब सौ सीटें जीत गई. कुछ लोगों की राय में मुस्लिम महिलाओं ने मोदी का साथ तीन तलाक पर सरकार के विरोध के चलते दिया. उनका करीब १५ फीसदी वोट बीजेपी को मिला. लेकिन वजह ये नहीं है. वजह ये है कि जहां मुस्लिम ज्यादा है, वहां मोदी और उनकी टीम ने तुष्टीकरण की नीति को हवा दी. लगे हाथ इस बात को भी मजबूती से रखा कि विरोधियों ने आजतक बहुसंख्यकों के आगे अल्पसंख्यकों को अहमियत दी. तुष्टीकरण, ऐसा हथियार है जिसको बीजेपी कथिक सेक्यूलरिज्म के खिलाफ इस्तेमाल कर बाकी दलों को बेनकाब करना चाहती है.

दूसरी तरफ वो मोदी को सबका साथ-सबका विकास के नारे-वादे के साथ समूचे हिंदुस्तान के नायक के तौर पर स्थापित करना चाहती है. मोदी का विश्वनाथ से सोमनाथ की पूजा अर्चना और गंगा से लेकर गो रक्षा के जयघोष को कवरेज देने-दिलवाने का इंतजाम, एक खास तरह की लेकिन बहुत मजबूत धार्मिक भावना से मोदी को जोड़े रखने और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्दांत को सही ठहराने की बड़ी योजना का हिस्सा है. जब आप मोदी की डिलिवरी वाले गवर्नेंस और करप्शनलेस ट्रांसपैरेंसी वाले सिस्टम के आगे किसी को खड़ा करेंगे तो वो छोटा और फीका लगेगा. यहां केजरीवाल जैसे आंदोलनकारी नेता, उनका निगेटिव कैंपेन और हर बार रोने वाली राजनीति धीरे धीरे खारिज होने लगेगी.

आज मायावती की पूरी राजनीति के सामने अंधेरा है, अखिलेश के चमकने की उम्मीदें फिलहाल धूमिल हो चुकी हैं, राहुल गांधी ५ साल में २४ चुनाव हारकर समय से पहले की खंड-खंड खंडहर हो चुके हैं. फिर होगा ये कि मोदी के सामने कोई विरोधी नेता ही नहीं होगा. इसी लिहाज से ऊपर मैंने नीतीश कुमार का नाम लिया क्योंकि उनकी ही राजनीति कहीं ना कहीं मोदी से मेल खाती है. उमर अबदुल्ला अगर कहते हैं कि अब आप २०१९ नहीं २०२४ की तैयारी कीजिए तो ये बात बेमानी भी नहीं है.

मोदी ने हिंदुस्तान में जिसतरह की राजनीति शुरु की वो परंपरागत राजनीति से अलग दिखने लगी, डिलिवरी और ट्रांसपैरेंसी के जोर से शासन की अलग इमेज खड़ा करनी शुरु की और स्वच्छता अभियान से लेकर उज्जवला योजना ने सरकार का सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के एक नया चेहरा गढा, जैसा पहले नहीं दिखा. ये सब मोदी को एक क्रेडिबल ब्रैंड के तौर पर खड़ा करते जा रहे हैं. लेकिन इसी के साथ मोदी के सामने लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती भी बहुत बढ गई है. अगर मोदी खरा नहीं उतर पाए तो राजनीति की नई संस्कृति का मिसकैरिज ठीक वैसे ही हो जाएगा जैसा केजरीवाल के जरिए पैदा हुई विकल्प की राजनीति का हुआ।

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की एफबी वॉल से.

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राणा यशवंत की अगली किताब ‘अर्धसत्य’

Rana Yashwant : मेरी अगली किताब ‘अर्धसत्य’ पर काम जारी है. आमिर ख़ान पर जो एपिसोड था, उस पर जो लिखा है, उसका एक टुकड़ा आपके लिए. कांटेंट और टेक्सचर दोनों का थोड़ा ख्याल रखा है.

”लखनऊ से उत्तर की तरफ कार दौड़ लगा रही थी. सुबह के यही कोई दस बज रहे थे. दोनों तरफ के खेतों में रबी की बुआई चल रही थी या फिर हो गई थी. कुछ खेतों में ईंख की फसल खड़ी थी, लेकिन मरियल-सी, कमजोर. मैंने अपने ड्राइवर से पूछा- भई इधर ईंख ऐसा क्यों है ? जवाब आया- सर इधर की मिट्टी थोड़ी कमजोर है, लेकिन किसान के पास ईंख बोने के अलावा कोई और रास्ता है ही नहीं. दरअसल हम हरदोई जिले में घुस चुके हैं और यहां आबादी तो बहुत है सर लेकिन गरीबी भी उतनी ही है – ड्राइवर ने अपनी बात जोड़ी. अच्छा, यहां से शाहाबाद कितनी दूर? मैंने बात बदली. सर, बस आधा घंटा और मान लीजिए. शाहाबाद में एक गांव है अख्तियारपुर जहां हमें जाना था. यह गांव फिल्म स्टार आमिर खान का पुश्तैनी गांव है. आमिर खान का शो सत्यमेव जयते स्टार प्लस चैनल पर आता है और इसको लेकर देशभर में काफी चर्चा होती है. हाल ही में एक एपिसोड जो बुजुर्गों पर था, उसमें आमिर इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखें छलक पड़ीं. एक एपिसोड में वो कह रहे थे कि हम कई मुद्दों पर लड़ने की बजाए उनपर पर्दा डाल देते हैं. मैं अपने शो अर्धसत्य के ज़रिए आमिर के दर्द को उनके अपनों के बीच समझना चाहता था. मेरी कार जब सड़क से नीचे उतरी तो ईंटवाली सड़क साथ चलने लगी. करीब पांच सौ मीटर जाने के बाद अख्तियारपुर शुरु हुआ. कार, आमिर के घर के बाहर रुकी. हमारे स्थानीय रिपोर्टर आलोक सिंह पिछले दो किलोमीटर से साथ थे और रास्ते की डोर उन्होंने ही पकड़ रखी थी. बस-बस यहीं रोकिए- आलोक ने ड्राइवर के कंधे पर हाथ दबाते हुए कहा और लगे हाथ दांयी तरफ उंगली उठाकर बताया – सर यही है आमिर का घर . किसी पुरानी हवेली का खंडहर-सा लगा. आगे का जो भी हिस्सा रहा होगा, ढह चुका था- सहन था. बांयी तरफ एक बड़ा-सा कमरा खड़ा था, जिसकी छत और चौखट नहीं थे. इस कमरे की पिछली दीवार से लगकर एक दीवार दांयी तरफ जा रही थी, जिसके बीचवाले हिस्से में दरवाज़ा था. अंदर जाने का इकलौता रास्ता. मैं अपने कैमरामैन शरद बारीक के साथ दरवाज़े पर खड़ा हो गया. यह दरवाज़ा एक कमरे में खुलता था जिसके अंदर दो खाट बिछी थी, दीवार पर ठुकी कीलों पर कुछ कपड़े टंगे थे और एक तरफ छत से कुछ नीचे लकड़ी के तख्ते पर बच्चों की किताबें रखी थीं. इस कमरे में एक और दरवाजा था जिससे आंगन लगा हुआ था. बस कुछ सेकंड के अंदर मैंने पूरा मुआयना कर लिया. बेटा घऱ में कोई बड़ा है? दरवाजे पर एक बच्ची खड़ी थी- मैंने उससे पूछा. मेरी बात अभी पूरी ही हुई थी कि आंगन से एक महिला कमरे में आईं. सिर पर पल्लू संभालते हुए मेरे नमस्कार कहने से पहले उन्होंने ही सिर झुका दिया. मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि मैं चाहता हूं घर के अंदर आकर आपसे कुछ बात करुं. उन्होंने थोड़ा हिचकते हुए ही सही लेकिन हामी भर दी…”

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की एफबी वॉल से.

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आईआईटी का ये प्रोफेसर नौकरी छोड़ एक दिन चल पड़ा जंगल की ओर…

Rana Yashwant : आज एक स्टोरी आई. स्क्रिप्ट पढते ही मैं चौंक गया. कहा- कल इसको ठीक से करेंगे. अभी वही खबर दिख गई तो सोचा आपसे साझा कर लूं. शहाबुद्दीन जैसे लोगों के लिये सैकड़ों गाड़ियों का काफिला और हजारों की भीड़ चुटकियों में खड़ा हो जाते हैं, लेकिन एक आदमी इस देश की सेवा की बेहतरीन मिसाल खड़ी कर गया और हम उसको जानते तक नहीं. आलोक सागर, आईआईटी में प्रोफेसर हुआ करते थे. उनके छात्रों में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी हैं.

एक दिन आलोक सागर को लगा कि सिर्फ पढाना, खाना, कमाना ही जीवन नहीं है, वह कुछ और भी है. इस आदमी ने आईआईटी की प्रोफेसरी छोड़ी और वे मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाके में चले गए. बैतूल और होशंगाबाद में आलोक सागर ने आदिवासियों के बीच काम करना शुरु किया. पिछले २६ साल से यह आदमी एक ऐसे गांव में रहता है, जहां ना तो बिजली है और ना ही सड़क. वे अबतक पचास हजार से ज्यादा पेड़ लगा चुके हैं. उनको लोग बीज बांटते और पौधा बांटते ही देखते हैं. मैने सोचा कि एक बार सुन लूं कि यह आदमी कह क्या रहा है और सुना तो देर तक सोचता रहा कि इतना जीवट और ऐसी सोच आम इंसान की हो ही नहीं सकती.

आलोक कह रहे थे कि हम बस डिग्री दिखाने और अपनी काबलियत साबित करने में ही रह जाते हैं, हमने लोगों के लिए किया ही क्या- यह सोचते ही नहीं. सच तो यह है कि देश की सेवा जमीन पर उतरकर ही बेहतर तरीके से की जा सकती है. अब इससे भी बड़ी बात सुनिए. हाल में जब स्थानीय चुनाव हुए तो बैतूल के अधिकारियों ने कहा कि भाई आप ऐसे ही बीज बांटते, पेड़ लगाते रहते हैं- आपके बारे में लोग कम जानते हैं, सो फिलहाल आप जिले से बाहर जाइए, चुनाव है. तब उन्होंने अपनी डिग्री दिखाई और अपने बारे में बताया.

अधिकारियों ने जांच करवाई और सारी बातें सही पाई गईं. जो आदमी तीन कुर्ते और एक साइकिल पर जीवन काटता हो, कई भाषाएं फर्राटेदार बोलता हो , आदिवासियों का जीवन बेहतर करने में अपना जीवन खपाता हो, आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग की हो और ह्यूस्टन से पीजी और पीेएचडी किए हुए हो वह कितना महान है, एक बार ठीक से सोचिएगा. आलोक सागर से मिलना ज़रूर है और वह भी जल्द.

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की एफबी वॉल से.

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टॉप तीन चैनलों में शुमार इंडिया न्यूज़ ने RedInk अवॉर्ड के तीन categories पर भी क़ब्ज़ा जमाया

Rana Yashwant : तीन साल के फ़ासले में इंडिया न्यूज़ ने देश के टॉप तीन चैनल में ना सिर्फ़ अपनी मज़बूत जगह बनायी है बल्कि पत्रकारिता के लिए देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान RedInk अवॉर्ड पर तीन categories में क़ब्ज़ा कर ये भी जता दिया है देश में इंडिया न्यूज़ ने पत्रकारिता का मान बहुत बढ़ाया है. बुंदेलखंड के किसानों पर अर्धसत्य के एपिसोड को मानवाधिकार के लिए बेहतरीन शो का पुरस्कार मिला.

देश में पीने के ज़हरीले पानी के लिए इंडिया न्यूज़ के कार्क्रम ऑपरेशन कालापानी को health and hygiene category में बेस्ट शो का पुरस्कार मिला. दीपिका पादुकोण के लव स्कैंडल पर बेस्ट entertainment शो का अवॉर्ड भी इंडिया न्यूज़ के हिस्से गया. 9 category में से तीन पर इंडिया न्यूज़ का क़ब्ज़ा. इंडिया न्यूज़ टीम को बहुत बहुत बधाई.

इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत के फेसबुक वॉल से.


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‘अर्द्ध सत्य’ के इस शानदार एपिसोड के लिए राणा यशवंत बधाई के पात्र हैं

भड़ास4मीडिया के कामकाज की व्यस्तता और यहां-वहां की यात्राओं-भागदौड़ के कारण न्यूज चैनल देखने का कम ही मौका मिल पाता है. लेकिन जब भी देखता हूं तो ज्यादातर निराश होता हूं और तुरंत डिस्कवरी, डिस्कवरी साइंस, एनजीसी, हिस्ट्री आदि चैनलों पर जाकर टिक जाता हूं. बकवास की चीख पुकार की जगह धरती ब्रह्मांड समुद्र जीव जंतु आदि के बारे में जानना सुनना समझना श्रेयस्कर है. दो रोज पहले ऐसे ही हिंदी न्यूज चैनलों पर भटक रहा था तो इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत का शो ‘अर्द्ध सत्य’ देखने लगा. शो अभी शुरू ही हुआ था. कंटेंट प्रभावित करता गया. रुक कर देखने को बाध्य हुआ.

बहुत अरसे बाद लगा कि किसी हिंदी न्यूज चैनल पर किसी सोशल एक्टिविस्ट ने कोई प्रोग्राम तैयार किया हो. बेहद साफ सरल शब्दों में बाजार और ताकतवरों के खेल का खुलासा कर दिया. बेहद शांति और साफगोई के साथ किसानों मध्यवर्गीयों गरीबों बच्चों के साथ किए जा रहे छल साजिश का भंडाफोड़ कर दिया. आलू बनाम चिप्स का महाखेल, कोल्ड ड्रिंक्स यानि लूट का अंतरराष्ट्रीय कारोबार, बेबी प्रोडक्ट्स यानि बचपन के साथ विश्वासघात, बोतलबंद पानी बनाम गरीबों की मजबूर प्यास… ऐसे मसलों के जरिए राणा यशवंत ने बहुत सरलता सहजता से समझा दिया कि ये जो सत्ता बाजार है, मिलजुल कर लूट का एक ऐसा संगठित गिरोह चला रहे हैं जिसका हमको आपको एहसास तक नहीं होता और हम रोज हंसते मुस्कराते रोते लुटते नष्ट होते रहते हैं.

इसे देखने के फौरन बाद मैंने तय किया कि इस शो को अन्य लोगों को भी दिखाया जाए ताकि वे भंगियाए हुए इनकी उनकी जय जय गान करने की जगह सच्चे तथ्यों आंकड़ों तर्कों पक्षों को अपने भीतर इजाद कर सकें और इनके जरिए पैदा हो रहे सवालों को लेकर इस क्रूरतम समय के महारथियों से मुठभेड़ का माद्दा पैदा कर सकें. इस शानदार शो के लिए राणा यशवंत बधाई के पात्र हैं. बिना बौद्धिक बाजीगरी के और बिना लफ्फाजी के से आतंकित किए, राणा यशवंत सरलता से वह सारी बातें कह बता जाते हैं जिसको सुनने के बाद व्यवस्था सत्ता बाजार के खिलाफ मन में गुस्सा नफरत भर जाता है.

इस शो के बीच में सत्ता सिस्टम से सवाल पूछने के दौरान नरेंद्र मोदी के कुछ फुटेज दिखाए जाने से यकीनन ये संदेश दर्शकों में गया कि मोदी सरकार भी लुटेरों को समर्थन देने के मामले में बकिया पूर्ववर्ती सरकारों से अलग नहीं है. राणा यशवंत कवि हृदय संपादक हैं और कविताएं लिखते रहते हैं. इसकी छाप उनके इस शो में भी दिखती है. गद्य और गुस्सा को बजाय भोंड़े व तीखे तरीके से पेश करने के, वे पद्यात्मक और स्तब्ध कर देने वाले अंदाज में संप्रेषित करते हैं जो सीधे दिल में उतर जाता है. शो आप भी देखें और अपने दूसरे साथियों को भी दिखलाएं.

शो का यूट्यूब लिंक ये है: https://www.youtube.com/watch?v=gc7a2c-4ISU

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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रेखा पर राणा यशवंत की कविता

Rana Yashwant : रेखा पर कई दफा कविता लिखने की सोची, लेकिन कैनवास इतना बड़ा है कि हर बार रहने दिया। आज कुछ ऐसा हुआ कि बात बनती सी गयी और रेखा रच गयी।

रेखा

भोर का तारा-
गहरी रात में उतरती संतरी सुबह
कोहरे की नशीली महक
आदि और अंत के बीच खड़ा
दमकता लपकता प्रकाशपुंज.

एक अबूझ पहेली-
अनाम रिश्ता ढोता सिंदूर
दूर तक पसरा अकेलापन
अचानक से टपके कुछ बेनाम आंसू
और नरगिसी हंसी में लिपटे कुछ धूप से सवाल.

एक सरगम –
संदल का लहराता जंगल
दर्द दबाए गुनगुनाता दरिया
नीले आसमान को थपकियां देती रात
उमराव के अंजुमन का अधूरा तराना.

एक अदाकारा-
चांद से बेहतर ज़मीं की तामीर
इश्क को सलाम भेजती नज़र
लौ सी लपकती देह की लहराती कलाइयां
और चूड़ियों के बाज़ार का सबसे चमकदार रंग

एक अफसाना-
बंद दरवाज़ों के बाहर ठहरी राह
तिलिस्म में लिपटे दरो-दीवार
महफिलों में अदब से झुकती जवां सुरीली रात
और दूर आसमान में भटकते चांद का अमिताभ.

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत के फेसबुक वॉल से.

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राणा यशवंत की कविता : ऐसी खबरों के लिये माफ कीजिए, अभी दिल्ली से खबर बाकी है

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फ्लिपकार्ट विज्ञापन और नेटवर्क क्रैश का निहितार्थ : घर में घुसकर जेब से पैसा निकालने की कोशिश

Rana Yashwant : ६ अक्टूबर की सुबह जब दिल्ली के लोगों ने शहर का नामी गिरामी अखबार हाथ में लिया तो उसके पहले औऱ आखिरी पन्ने पर ई शापिंग की कंपनी फ्लिपकार्ट के विज्ञापन दिखे। बंपर डिस्काउंट का विज्ञापन। रसोई की जरुरत से लेकर टीवी लैपटॉप मोबाइल औऱ कई छोटी मोटी जरुरत तक की चीजों की ऑनलाइन बुकिंग का विज्ञापन। समय भी लिख दिया गया था- सुबह ८ बजे से। नतीजा ये हुआ कि कंपनी का नेटवर्क क्रैश कर गया। कहने का मतलब ये कि हिंदुस्तान में ऑनलाइन शॉपिंग के लिये इतने लोग आ गये कि ट्रैफिक कंजेशन ने सिस्टम ठप कर दिया।

( File Photo Rana Yashwant )

घर के भीतर घुसकर जेब से पैसा निकालने की इतने बड़े पैमाने पर इस तरह की ये पहली कोशिश थी। तकनीक ने बाजार के लिये आप तक पहुंचने का रास्ता कितना आसान कर दिया है ये इसकी बेहतरीन मिसाल है। पैसा अगर नहीं भी है तो उसका किसी तरह से इंतजाम कर सामान खरीदने का लालच पैदा करता है ये बाजार। उसका अपना एक अर्थशास्त्र है जो आपको ये समझाता है कि अभी खऱीद लेने से तीस परसेंट या चालीस परसेंट की रकम बच जाएगी। कुल मिलाकर मोटी सी बात ये कि बचत का इत्मिनान पैदा कर दूसरे काम के लिये रखे आपके पैसे को खींचने का तंत्र विकसित हो रहा है। जैसे जैसे देश में स्मार्ट फोन की संख्या औऱ इंटरनेट कनेक्टिविटी बढेंगी हिंदुस्तान के बाजार को इसतरह के स्टिमुलेंट दिए जाएंगे ताकि उसकी परचेजिंग कैपेसिटी को उसकी वाजिब क्षमता से कहीं ज्यादा बढाया जा सके।

नतीजा ये होगा कि पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों पर होनेवाले खर्चों में स्वाभाविक कटौती होगी जिसका असर आपको कभी सीधा नजर नहीं आएगा। केएफसी, मैक्डोनल्ड, डॉमिनोज़ जैसी कंपनियां एक मैसेज और कॉल पर आपके घर फास्ट फूड पहुंचा देती हैं। अब शर्ट, जूते, गॉगल्स, जींस और कई एसेसरीज ई शॉपिंग के जरिए २४ घंटे में आपतक डिलिवर कर दिए जाते हैं। और वो भी बाजार के दाम से कहीं कम पर । क्योंकि, स्टॉकिस्ट और रिटेलर का प्राफिट उन्हें जोड़ना नहीं पड़ता। बस अपना मुनाफा लेकर वो सामान आपतक पहुंचा देती हैं। लेकिन हमारा आपका पैसा देश के बाजार की जगह ऐसी कंपनियों के नेटवर्क में सर्कुलेट होता है। देशी दुकानदारों और बाजार के लिये यह एक दूसरे तरह का खतरा है।

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत के फेसबुक वॉल से.

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