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सियासत

कार्टूनिस्ट इरफान की हत्या याद है? (संदर्भ- हैदराबाद मुठभेड़ कांड)

Peri Maheshwer : कार्टूनिस्ट इरफान की हत्या याद है? मैं जो कहने वाला हूं वह दहला देने वाला है। पर सच है। और मैं एक मूकदर्शक था। और यह भी एक कारण है कि ट्रायल के बिना तुरंत न्याय के खिलाफ मैं खुलकर बोलता हूं।

1999 में देश के सबसे अच्छे कार्टूनिस्ट में से एक आउटलुक के लिए काम करते थे। उनका नाम था इरफान हुसैन। वे शर्मीले, स्पष्ट समझ वाले और अपने काम के उस्ताद थे। उनके कार्टून लोगों को वहीं चोट करते थे जहां तकलीफ होती है। और अपनी योग्यता के कारण, वे हमेशा खतरे में रहते थे। और ऐसा ही एक खतरा बेहद गंभीर था जिसकी सूचना हमलोगों ने पुलिस को भी दी थी। और इसके कुछ ही महीने बाद मार्च 1999 में उनकी हत्या हो गई थी।

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पुलिस पर पत्रकार समुदाय का भारी दबाव था। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री (अटल बिहारी वाजपेयी) और सत्ता में बैठा हर कोई इरफान के परिवार के लिए न्याय चाहता था। 1999 के अंत तक पुलिस ने 5 आरोपियों को पकड़ा और उनपर कार जैकिंग तथा हत्या का आरोप लगाया। इनमें से कम से कम दो श्रीनगर में अनंतनाग के थे। 2001 में उनपर चार्जशीट दाखिल हुई और उपयुक्त प्रक्रिया के बाद 2006 में ट्रायल शुरू हुआ। और जब ट्रायल शुरु हुआ तो पुलिस की साजिश स्पष्ट हो गई। उन लोगों ने भिन्न स्थानों पर काम करने वाले 5 कार जैकर की पहचान की थी जिन पर कार जैकिंग के दूसरे मामले में ट्रायल चल रहा था। उनपर इरफान की हत्या का मामला भी बना दिया। एक राजनीतिक हत्या को कार जैकिंग और हत्या के मामले में बदल दिया गया।

आरोप पत्र इतना सतही था कि कार जैकिंग के दौरान इरफान को चाकू मारने के 28 जख्मों की बात कही गई थी। लेकिन जब इरफान के कपड़े पेश किए गए तो उसपर खून का कोई निशान नहीं था। ऐसे जैसे किसी ने उनके कपड़े उतरवाए हों, चाकू मारे हों और फिर कपड़े पहना दिए हों। अभियुक्तों को बरी करते हुए अदालत ने कहा, “ऐसा लगता है जैसे एक ऐसी कहानी है जिसे कहानी की किसी किताब से सीधे उठा लिया गया हो या किसी फिल्म की कहानी हो।” पुलिस अपनी साजिश जानती थी इसलिए बरी किए जाने के खिलाफ अपील नहीं करने का निर्णय किया। इस तरह इनलोगों ने दबाव का समय निकाल लिया और अपने राजनीतिक आकाओं को फिर से सफलतापूर्वक बचा लिया।

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पूरी तरह दुखी औऱ निराश, हम अदालत पहुंचे ताकि मामले की दोबारा से जांच के आदेश प्राप्त कर सकें। अदालत ने इससे इनकार कर दिया क्योंकि 10 साल बाद कोई सबूत तो होने नहीं थे। हालांकि, 2009 में अदालत ने इस जांच की जांच के आदेश दिए थे ताकि पुलिस में किसने यह सब गड़बड़ की उसकी पहचान की जा सके।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि पांच निर्दोष समझे जा सकने वाले युवाओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। न्यायपालिका ने उन्हें बरी करने में सात साल लगाए। उनके जीवन या युवावस्था के सात प्रमुख वर्ष बर्बाद हुए। दूसरी ओर, इरफान के हत्यारे भारत में कहीं जीवित हैं और हंस रहे होंगे। हत्यारों के राजनीतिक आकाओं को इरफान से छूट मिल गई और वे अब भी लूट रहे हैं। और पुलिस भी वही कर रही है जो करती रही है। इरफान नहीं रहे और किसी ने इरफान को नहीं मारा।

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पत्रकार और उद्यमी Peri Maheshwer की अंग्रेजी पोस्ट का हिंदी अनुवाद. अनुवादक हैं वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह.


Samar Anarya : 8 सितंबर 2017: अति रईस लोगों के बच्चों को पढ़ाने वाले रयान इंटरनेशनल स्कूल गुड़गाँव के टॉयलेट में दूसरी कक्षा के छात्र, 7 साल के प्रद्युमन ठाकुर की लाश मिली। देश भर में आक्रोश फैल गया। (इंटरनेशनल स्कूल था आख़िर)। बावजूद इसके कि लाखों में फ़ीस लेने वाले स्कूल में ज़्यादातर सीसीटीवी काम नहीं कर रहे थे (और बाप माओं को ये देखने की फ़ुरसत नहीं थी) पुलिस ने घंटों के भीतर केस सुलझा ‘अपराधी’ ड्राइवर अशोक को गिरफ़्तार कर लिया। अशोक ने ‘क़ुबूल’ भी कर लिया।

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बावजूद इसके कि अन्य कर्मचारियों ने कहा कि उसे बलि का बकरा बनाया जा रहा है। 21 सितंबर: प्रद्युमन के माँ बाप को बात गले नहीं उतर रही थी फिर भी पुलिस ने जाँच बंद कर दी। माँ बाप संतुष्ट नहीं हुए, कोशिश करते रहे। आख़िर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और जाँच सीबीआई को सौंपी गई।

8 नवंबर 2017: सीबीआई ने मामला सुलझाया, पाया कि ड्राइवर अशोक निर्दोष था। हत्या उसी स्कूल के 11वीं में पढ़ने वाले एक लड़के ने की थी। सिर्फ़ अपनी परीक्षा टलवाने के लिए!

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28 फ़रवरी 2018: ड्राइवर अशोक बाइज़्ज़त बरी हुआ, असली, नाबालिग हत्यारे पर मामला चलता रहा।

अगर पुलिस ने अशोक का एंकाउंटर कर दिया होता तो!

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आप में से बहुतेरे नाच रहे होते, निर्दोष की जान गई होती, हत्यारा और हत्याएँ करता घूम रहा होता। इस बार भी नाचिए- जब तक असल हत्यारे आप या आपके अपनों तक नहीं पहुँच जाते।

डॉक्टर का बर्बर बलात्कार और हत्या हैदराबाद के एकदम उसी इलाके में पहला मामला नहीं था, पर हाई प्रोफ़ाइल पहला है. पुलिस इस मामले में भी लड़की के घरवालों की शिकायत के बावजूद घंटों सोती रही, उनका मजाक उड़ाती रही.

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पर मामले के राष्ट्रीय बनते ही, टीआरपीखोर बिकाऊ मीडिया की लुहाई आदमखोर भीड़ के सोशल मीडिया पर उतरते ही जागी- और घंटों के भीतर 4 को धर लिया!

ठीक एक हफ्ते 2 दिन बाद पुलिस चारों आरोपियों को घटनास्थल पर ले गए- आरोपियों ने भागने की कोशिश की- पुलिस हिरासत में थे तो शर्तिया निहत्थे होने के बावजूद।

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पुलिस फिर भी उनको पकड़ नहीं पाई, उसे उन चारों को मारना ही पड़ा! माने या पुलिस इतनी निकम्मी थी कि उन्हें हिरासत में भी हथियार मिल गए! या इतनी कि वो उन्हें बिना पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था ही वहाँ लेकर चली गई थी- माने 4 आरोपियों के लिए 8 छोड़िये बस एक कांस्टेबल के साथ भेज दिया था! वो भी बिना हथकड़ी वथकड़ी लगाए!

और उस बहादुर सिपाही ने अपनी थ्री नॉट थ्री जिससे एक मिनट में एक गोली भी नहीं दग पाती उसी से चारों को गोली मार दी! वे चारों भी भागे नहीं, एक एक कर गोली खाने का इंतज़ार किया!

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कहानी बढ़िया है!

बाकी ये मुठभेड़ तो है, पर सबूतों का- किसी बड़े गुनहगार को बचाने के लिए! पुनः: कहीं की पुलिस बलात्कार-हत्या आरोपियों के ऐसे ‘मुठभेड़’ के बारे में सोचने की हिम्मत भी कर सकती है, करना तो छोड़ ही दीजिये! ऐसे आरोपियों की कमी तो नहीं है न?

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अच्छा उनकी नहीं तो कठुआ से शुरू कर कल उन्नाव में सामूहिक बलात्कार के बाद जमानत पर छूट कर पीड़िता को ज़िंदा जला देने वाले पांचों को? अगर आपका जवाब न है और आप फिर भी ख़ुशी में झूम रहे हैं तो आप चुगद हैं! अपनी बार का इंतज़ार करें- बलात्कारी नेताओं/गुंडों और बेलगाम पुलिस दोनों में से किसी के आपके दरवाजा खटकाने का!

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय उर्फ समर अनार्या की एफबी वॉल से.

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Sachin Gupta : थोड़ा याद दिलाता हूं… बुलंदशहर में NH-91 पर 29 जुलाई-2016 को नोएडा की कार सवार मां-बेटी से गैंगरेप हुआ। देशभर में इसकी गूंज हुई तो पुलिस पर आरोपियो को पकड़ने का दवाब बना। आनन फानन में 9 अगस्त को बुलंदशहर पुलिस ने सलीम, परवेज और जुबैर को आरोपी मानते हुए जेल भेज दिया।

उप्र सरकार ने इस केस की जांच CBI को दी। CBI ने भी इन्हीं तीनों को दोषी मानते हुए चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी। इस बीच 13 सितंबर 2017 को हरियाणा की क्राइम ब्रांच ने एक्सल गैंग के 7 गुर्गे गिरफ्तार किए। उन्होंने बुलंदशहर हाइवे गैंगरेप की घटना कुबूली।

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हरियाणा पुलिस ने आरोपियों और पीड़िता के स्पर्म की जांच कराई, जो मैच हो गया। यह तय हो गया कि उप्र पुलिस ने गैंगरेप में निर्दोषों को जेल भेजा था। असली आरोपी वे हैं, जो हरियाणा में पकड़े गए हैं। इस केस में CBI भी फेल हुई। मतलब किरकिरी से बचने को उस वक्त निर्दोष जेल भेजे गए थे।

अगर पहले पकड़े गए तीनों आरोपी फ़र्ज़ी एनकाउंटर “न्याय” में मार डाले गये होते तो…..? खोपड़ी में भुस न भरा हो तो पापुलर थीम में बहने की जगह ऐसे मामलों का याद भर कर लें ….!

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पत्रकार सचिन गुप्ता की एफबी वॉल से.


Vivek Singh : मैं आज कहूंगा कि दिल्ली की पुलिस ज्यादा प्रशिक्षित और व्यवस्थित है। चाहे निर्भया के दोषियों का मामला हो या फिर चर्चित रंगा-बिल्ला केस हो। बहुचर्चित मामलों में दिल्ली पुलिस ने आरोपियों को न केवल पकड़ा बल्कि उन्हें सजा तक पहुंचाया। रंगा-बिल्ला को फांसी दी गई और निर्भया के दोषियों को भी दिल्ली पुलिस की जांच चलते फांसी की सजा सुनाई गई। फांसी में देरी के लिए पुलिस जिम्मेदार नहीं है। वहीं हैदराबाद पुलिस को तो शायद खुद पर भरोसा ही नहीं था कि उसकी जांच से कोई सजा तक पहुंचेगा।

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तेजतर्रार पत्रकार विवेक सिंह की एफबी वॉल से.


Prateeksha Pandey : पुलिस पर फूल तो तब बरसाने चाहिए थे जब विक्टिम के घरवाले उनके पास शिकायत लिखाने गए और उन्होंने कहा कि तुम्हारी लड़की किसी लड़के के साथ भागी होगी, अफेयर होगा उसका. पुलिस ने फिल्मी तरीके से रातोंरात मीडिया नैरेटिव बदल दिया है और हम सवाल तक नहीं कर रहे. पहले किसी का रेप होने देना फिर उसके कथित रेपिस्ट को मार डालना न्याय नहीं होता. हम मूर्ख हैं.

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महिला पत्रकार प्रतीक्षा पांडेय की एफबी वॉल से.


Rajiv Nayan Bahuguna : हैदराबाद मुठभेड़ के बारे में तो क्या कहूं। जो हुआ, सो हुआ। किंतु यह मामूल, अर्थात रूटीन न बने। गढ़वाली कहावत है- आज गिजेणी काखडी, भोळ गिजेणी बाखरी। अर्थात, जिसे आज ककड़ी चुराने की लत पड़ गयी, कल बकरी चुराएगा। आज पुलिस वास्तविक अपराधी का एनकाउंटर कर वाहवाही बटोर रही है।

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कल निर्दोष को मार कर भी दाद पा सकती है। अपराधों का दण्ड अदालत से ही मिले। लेकिन मुकद्दमों में अदालतों की दीर्घ सूत्रता और कमज़ोर पैरवी के कारण जघन्य अपराधी छूटते रहे हैं। हैदराबाद एनकाउंटर इसी प्रवृत्ति का परिणाम है।

अपराधी से अदालती प्रक्रिया के दौरान कई सूत्र मिलते हैं। मसलन, यदि नाथूराम गोडसे को तत्काल गोली मार दी गयी होती, तो यह भेद कभी न खुलता कि इस हत्या के पीछे संघ परिवार की भूमिका थी। हैदराबाद एनकाउंटर से मैं दुखी नहीं, पर चिंतित अवश्य हूँ।

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देहरादून के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.


Vijay Shanker Singh : त्वरित न्याय की ओर बढ़ता नया भारत. हैदराबाद में पशु चिकित्सक डॉ रेड्डी की बलात्कार के बाद जला कर हत्या कर देने वाले चारों अभियुक्त पुलिस मुठभेड़ में मार दिये गए। कहा जा रहा है कि, मौके से भागने की कोशिश में चारों अभियुक्त मारे गए। निहत्थे थे। उन्हें हथकड़ी लगाई गई थी या नहीं, यह पता नहीं। सीन रिक्रिएट कराने के लिये ले जाये गये थे। वहीं से भाग रहे थे।

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पुलिस ने पकड़ने की कोशिश की होगी। नहीं पकड़ पायी तो टपका दिया। लेकिन निहत्थे लोगों ने पुलिस पर हमला कैसे किया होगा यह तो हैदराबाद पुलिस ही बता पाएगी। लेकिन एक नए सिद्धांत की ओर हम बढ़ रहे हैं, और वह है, जनता की मांग पर अपराध के फैसले का निस्तारण। यह घटना, इसकी स्वीकार्यता की बात करना, इसे बिना किसी जांच के ही सच मान लेना, देश के आपराधिक न्याय प्रणाली की विफलता का सूचक है।

हैदराबाद मुठभेड़ के बारे में, सुबह सुबह यह खबर मिली कि, चारो अभियुक्त मुठभेड़ में मारे गए। थोड़ा हैरानी हुयी कि वे तो जेल में थे। बहरहाल, नौकरी के दिन याद आ गए। नौकरी के दिन याद भी तो बहुत आते हैं। याद आया, जब कंट्रोल रूम सुबह ही सुबह सन्देस पठाता था कि, बदमाशो ने पुलिस पर गोली चलाई और पुलिस ने आत्मरक्षा में उनका जवाब दिया।, उनकी गोली नहीं लगी, हमारी लग गयी और वह मौके पर मारा गया। कुछ खोखा कारतूस और देशी कट्टा या पौना मिला है।

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हैदराबाद में अब डॉ प्रियंका रेड्डी के केस में तो तफ्तीश के लिये कुछ बचा नहीं। मुल्ज़िम तो चारों ही मारे गये। इनके लिये हम सब फांसी चाहते भी थे। अब इस मुठभेड़ की जांच हो तो सच पता लगे कि हुआ क्या है। हर मुठभेड़ की जांच होती है। यह एनएचआरसी की गाइडलाइंस में है। इसकी भी होगी। पहले मैजिस्ट्रेट जांच करेगा। मुठभेड़ का मुकदमा भी दर्ज होता है। उसकी तफतीश होती है।

अब तक पुलिस पर उन आरोपियों को जेल भेजने, सुबूत इकट्ठा करने और सज़ा दिलाने का दबाव था। इन सब झंझट से मुक्त हुयी हैदराबाद पुलिस। अदालत में जुर्म साबित करना बड़ा कठिन होता है। यही तो पुलिस का असल काम है। पर इतनी व्यस्तताओं के बीच इतना समय कहाँ कि ढंग से तफ्तीश और अदालत में पैरवी हम कर सकें। अब यही तरीका ठीक है। जनता भी खुश, और नक्शा नज़री, केस डायरी लिखने से जहमत से भी पिंड छूटा। लेकिन, सारे गम अब भी खत्म नहीं है। मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यों! अब इस इनकाउंटर को असली है या नक़ली, इसे साबित करने का दबाव पुलिस पर आएगा। यह एक बड़ा गम होगा। पूरा घटनाक्रम, हैदराबाद पुलिस खुद ही विस्तार से बताएगी। सब डिटेल सामने आये तो पता चले।

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अभी तो हम सबको भी यही पता है। लेकिन बड़े और रसूखदार रेपिस्ट अच्छे होते हैं। वे मौके से भागने की कोशिश नहीं करते हैं। अपने फन के मंजे खिलाड़ी होते हैं। उनमें से कुछ को, अस्पताल से लेकर सदन तक में पनाह भी मिल जाती है। वे न तो भागने की कोशिश करते हैं और न पुलिस पर हमला। इसलिए पुलिस उनका इनकाउंटर नहीं कर पाती है। मन मसोसकर रह जाती है। वे इतने विश्वसनीय होते हैं कि उन्हें लेकर तफ्तीश के लिए मौके पर सीन रिक्रिएट कर के सच जानने की ज़रूरत भी नहीं होती है। अब और कुछ खबर हैदराबाद से आये तो कुछ प्रतिक्रिया दी जाय। फिलहाल तो इतना ही।

पुलिस के बड़े अधिकारी रहे विजय शंकर सिंह की एफबी वॉल से.

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