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दिवंगत IPS विजय शंकर सिंह की अधिवक्ता बहू मयूरी रघुवंशी की CJI ने की तारीफ!

हते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही दिखाई देने लगते हैं। आज इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है सुप्रीम कोर्ट की तेज तर्रार अधिवक्ता मयूरी रघुवंशी ने। रघुवंशी दंपत्ति आज किसी परिचय के मोहताज नही हैं। उनके परिचय ने आज उन बुलंदियों का परचम तब छू लिया जब ओपन कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने मयूरी रघुवंशी की तारीफों के पुल बांध दिए।

मयूरी रघुवंशी दिवंगत रिटायर्ड IPS विजय शंकर सिंह की बहू और अधिवक्ता व्योम रघुवंशी की पत्नी हैं। पति पत्नी सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं ये तो सभी जानते हैं लेकिन ये बेहद कम लोग ही जानते हैं कि यदि किसी के लिए न्याय और सत्य की लड़ाई लड़नी हो तो इन दंपत्ति के लिए रुपये या फीस कोई मायने नही रखती। आपको याद होगा कि गोरखपुर के खोजी पत्रकार सत्येन्द्र के मामले में ये दंपत्ति उम्मीद की किरण बनकर उभरे थे तथा कोर्ट के सामने तथ्यों को इस सलीके से रखा था कि कोर्ट को सोचने पर मजबूर होना पड़ा था कि एक सिस्टम से चोटिल एक विद्रोही स्वभाव के पत्रकार को पाँच महीनों के दरम्यान गोरखपुर पुलिस ने किन हालातों में हिस्ट्रीशीटर और गैंगस्टर तक बना डाला था।

हुआ यूं कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक निर्णय पारित करने के लिए ऑनलाइन सहयोग किया, और गुजरात उच्च न्यायालय की जिला न्यायाधीशों की पदोन्नति नीति को बरकरार रखा। आज फैसला सुनाने से पहले सीजेआई ने खुलासा किया कि जब वह ब्राजील में जे20 शिखर सम्मेलन के बाद भारत की यात्रा कर रहे थे, तो उन्होंने फैसले का मसौदा तैयार करने के लिए जस्टिस जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा के साथ सहयोग करने के लिए विमान इंटरनेट का इस्तेमाल किया था।

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वे कहते हैं कि “हमें आज फैसला सुनाना था और मैं जे20 शिखर सम्मेलन के लिए ब्राजील में था। इसलिए मैंने विमान इंटरनेट का उपयोग किया और न्यायमूर्ति पारदीवाला ने मेरे साथ मसौदा तथा दस्तावेज़ को साझा किया, और न्यायमूर्ति मिश्रा भी उसी दस्तावेज़ पर बने हुए थे। सबसे महत्वपूर्ण यह कि न्यायालय ने एक कनिष्ठ वकील मयूरी रघुवंशी द्वारा मामले में दिए गए तर्कों की सराहना करने का भी मुद्दा उठाया और कहा कि “हम कनिष्ठों की बात नहीं करते, लेकिन इस मामले में जब मयूर रघुवंशी ने अपने रेजॉइंडर में अपनी प्रस्तुतियाँ दीं तो इसने उत्तरदाताओं की ओर पैमाने को झुका कर रख दिया।

मामला ये था कि गुजरात सरकार तथा गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा योग्यता-सह-वरिष्ठता के आधार पर जिला न्यायाधीश की नियुक्तियां करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर यह फैसला जो सुनाया था उसमें असहमति के सुर सुनाई देने लगे थे और जिला न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त होने की इच्छा रखने वाले याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि वरिष्ठता-सह-योग्यता के मौजूदा सिद्धांत पर होनी चाहिए थी जिसके अनुसार वरिष्ठता को योग्यता पर वरीयता दी जाती है।

शीर्ष अदालत ने 13 अप्रैल, 2023 को मुख्य मामले में उच्च न्यायालय और राज्य सरकार से जवाब मांगा था। हालाँकि, चार दिन बाद, सरकार आगे बढ़ी और एक पदोन्नति सूची अधिसूचित की।

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28 अप्रैल, 2023 को पारित अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने इस घटनाक्रम को ‘बहुत दुर्भाग्यपूर्ण’ करार दिया। इसके बाद मेरिट-कम-वरिष्ठता नियम के आधार पर 68 न्यायिक अधिकारियों को जिला न्यायाधीशों के पद पर पदोन्नत करने के गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले और उसके बाद राज्य सरकार की अधिसूचना पर रोक लगा दी गयी थी।

हालाँकि, न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया था कि रोक सूची में शामिल उन लोगों पर लागू नहीं होगी जिन्हें केवल योग्यता के आधार पर पदोन्नत किया जाएगा, क्योंकि उन्हें वैसे भी पदोन्नत किया जाएगा, भले ही पदोन्नति वरिष्ठता पर योग्यता को प्राथमिकता देने पर आधारित हो। सबसे बडी बात यह कि पदोन्नत किए गए 68 लोगों में सूरत के न्यायिक मजिस्ट्रेट हरीश हसमुखभाई वर्मा भी शामिल थे, जिन्होंने मार्च में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को आपराधिक मानहानि का दोषी ठहराया था और उन्हें दो साल की साधारण कैद की सजा सुनाई थी।

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