संत प्रसाद के बारे में पूर्वाग्रहपूर्ण धारणा बनाकर निगेटिव न्यूज़ पोस्ट करने से भड़ास को बचना चाहिए था : परमेंद्र मोहन

Paramendra Mohan : दुनिया को ख़बरों की दुनिया से अवगत कराने के तंत्र का नाम मीडिया है और ख़बरिया दुनिया की ख़बरों से बाख़बर करने वाली लोकप्रिय वेबसाइट है Bhadas4media जिसके संस्थापक संपादक हैं Yashwant Singh. मिला तो नहीं हूं लेकिन अपरिचित भी नहीं हैं एक-दूसरे से हम, कई बार मेरे फेसबुक वॉल से वो पोस्ट लेते रहे हैं और मैसेंजर पर भी हमारी बात होती रही है..

खुलकर और डंके की चोट पर इस वेबसाइट पर हर तरह के आलेख और पत्रकारों के निजी विचार पोस्ट होते हैं..लेकिन इस पोस्ट के पीछे मेरा मकसद कुछ अलग है..और अलग ये कि किसी व्यक्ति विशेष के प्रति अनुमान आधारित या अपुष्ट सूचनाओं के मुताबिक पूर्वाग्रहपूर्ण धारणा बनाकर निगेटिव पोस्ट करने से इस निष्पक्ष वेबसाइट को बचना चाहिए, जो पहली बार मुझे नज़र नहीं आ रहा।

मैं इंडिया टीवी में हूं और इसी चैनल में Sant Prasad भी हैं, दो दशक से हम साथ-साथ और अलग-अलग भी चैनलों में कार्यरत रहे हैं..एक नया हिंदी न्यूज़ चैनल खुला है इसी साल जिसका नाम है टीवी 9 भारतवर्ष..इसी चैनल की लांचिंग से पहले बतौर आउटपुट एडिटर संत के ज्वाइन करने की चर्चा थी, लेकिन संत ने इंडिया टीवी में बने रहने का फैसला लिया था, जिसे लेकर उस वक्त भी भड़ास ने लिखा था कि गच्चा दिया, गैरपेशेवर रवैया है, पैसे बढ़वाने के लिए रूक गए वगैरह। छह महीने बाद भारतवर्ष में ही संत के मैनेजिंग एडिटर बनकर ज्वाइन करने की ख़बर को भड़ास ने गच्चा देने वाले पत्रकार…कहकर पोस्ट किया है..जिससे मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूं।

कई सवाल हैं इन दोनों पोस्ट को लेकर मसलन ये कि क्या किसी के बारे में इस तरह का निगेटिव आलेख सही है? ज्वाइन करने के फौरन बाद रिज़ाइन करने से क्या ये बेहतर नहीं है कि अगर न जमे तो ज्वाइन करने से पहले ही इंकार करने का फैसला लिया जाए? क्या ये बेहतर नहीं है कि हर पहलू को खंगालने के बाद ही ज्वाइन करने का फैसला हो? क्या ये नहीं होना चाहिए कि जिस संस्थान में व्यक्ति कार्यरत हो, उस संस्थान की ओर से अगर उसकी अहमियत को, ज़रूरत को सम्मान मिले, बने रहने को कहा जाए तो व्यक्ति संस्थान की भावना का सम्मान करते हुए निजी फैसला बदलने का भी साहस दिखाए? फैसला बदलने को गच्चा देना कहा जाने लगे तब तो कोई कहीं आ-जा ही नहीं सकता क्योंकि ज्यादातर संस्थाओं में ज्वाइन करते समय साल-दो साल का कांट्रैक्ट होता ही है, लेकिन फ्रीक्वेंसी मैच नहीं करने पर रहने या जाने का फैसला साल-दो साल बाद ही हो, ऐसा प्रैक्टिकल नहीं होता।

किसी चैनल से रिज़ाइन करने तक ये अंदाज़ा नहीं होता कि संस्थान के लिए व्यक्ति विशेष की अहमियत कितनी है? रिज़ाइन करने के बाद जब संस्थान की ओर से उससे बात की जाती है, रुकने के लिए कहा जाता है, उसके बाद ही व्यक्ति अंतिम फैसला ले पाता है, ज़रूरी नहीं कि पैसा ही रुकने या जाने का मुख्य कारक होता है, व्यक्तिगत संबंध, पद, जिम्मेदारियां, लगाव, टीम, न्यूज़रूम का माहौल, कार्य का तनाव कई कारक होते हैं और इनमें से कोई भी कारक निर्णायक फैसले का आधार हो सकता है।

ये भी सोचना चाहिए कि कुछ तो बात होगी बंदे में कि जहां का ऑफर नहीं स्वीकार किया था, वहीं से फिर ऑफर आया है और वो भी पहले से बेहतर, जबकि संत कोई एंकर नहीं हैं, डेस्क पर काम करने वालों में बहुत कम लोगों का काम इस कदर बोलता है यानी ये उच्च पदों पर बैठे नामदारों के बीच एक कामदार पत्रकार का काम बोल रहा है, लेकिन इसका जिक्र कहीं भड़ास ने देना ज़रूरी नहीं समझा।

दूसरी बात, पैसे बढ़वाने के लिए रूकने वाली बातें सुनी-सुनाई होती हैं, संत की इंडिया टीवी में ये दूसरी पारी चल रही है, जाहिर सी बात है कि पहली पारी में उन्होंने अपने काम से संस्थान का भरोसा हासिल किया होगा, तभी दूसरी पारी का मौका मिला, वर्ना इतने बड़े न्यूज़ चैनल में काम करने का मौका सबको मिलता है क्या?

तीसरी बात, भड़ास के दोनों पोस्ट में जोर देकर लिखा गया कि अजित अंजुम की वजह से ही संत इंडिया टीवी में आए और अब भारतवर्ष जा रहे हैं, लेकिन क्या अजित अंजुम की वजह से संत ज़ी न्यूज़ में करीब 8-9 साल और फिर इंडिया टीवी में दूसरी पारी में आए? जवाब है-नहीं।

मेरे कहने का सीधा मतलब ये है कि किसी की नज़दीकी का मतलब ये नहीं होता कि वो भाग्यविधाता बन जाता है और उसके बिना अगले का काम नहीं चलता, ये हर व्यक्ति की अपनी कार्यक्षमता पर निर्भर करता है कि वो कहां अपनी जगह बना पाता है, ये उसकी इच्छा, उसकी प्लानिंग पर निर्भर करता है कि उसकी मंजिल का अगला पड़ाव क्या हो, कब तक उस पड़ाव पर पहुंचना है, ठहरना है, मंजिल क्या है?

मैं इन दिनों निजी वजहों से सोशल मीडिया पर नहीं आ पा रहा, अरसे बाद वक्त मिला तो भड़ास के आलेख की जानकारी मिली..इस वेबसाइट का नियमित पाठक हूं, इस बार मुझे अच्छा नहीं लगा तो ये पोस्ट लिख रहा हूं..

यशवंत खुद भी पत्रकार रहे हैं, ये अच्छी तरह जानते होंगे कि कई बार एक ही व्यक्ति को दो-तीन संस्थान से एक साथ ऑफर आ जाते हैं, मेरे साथ भी ऐसा संयोग दो बार हुआ है..जिस दिन इंडिया टीवी में इंटरव्यू था, उसी दिन और उसी वक्त एक चैनल से इंडिया टीवी में मिलने वाली सैलरी से 15 फीसदी ज्यादा और एक पद ऊपर का ऑफर फोन पर आ रहा था, तब तक मैं इंटरव्यू बोर्ड के सामने गया भी नहीं था, पैसा प्रमुखता होता तो तभी खिसक लेता। इंटरव्यू के अगले दिन एक और चैनल से एक और ऑफर आया, मेरा नंबर उस संस्थान ने जिससे लिया था, वो अभी भी उसी चैनल में है, उसने व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर भी मुझसे वहीं आने को कहा।

मैंने दोनों को कहा कि देखता हूं, बताता हूं लेकिन ज्वाइन इंडिया टीवी ही किया। ऊपर से ज़ी हिंदुस्तान में पैसे बढ़ाकर देने की बात कही गई, रुकने को कहा जा रहा था, वहां भी न हां कहते बन रहा था, न ना कहते.. यानी चार ऑफर एक साथ आपके पास हो, एक आपने एक्सेप्ट कर लिया तो बाकी तीन को गच्चा देना कहेंगे क्या? चारों जगह प्रमुख पदों पर बैठे लोग आपके करीबी हों, आपका काम उनके भरोसे पर खरा उतरता हो, तो एक झटके में मना करने में बनता है क्या? कई फैसले बेहद कठिन होते हैं, अपना घर-परिवार होता है, जोखिम होता है, वर्षों का पेशेवर रिश्ता होता है, पेशेवर रिश्तों में भी कई से दोस्ताना रिश्ता होता है, चैनल का भविष्य, अपना भविष्य सब सामने होता है और फिर फैसला लेना होता है।

आज तक में था मैं, नक़वी जी थे, ज्वाइन किया था तब राणा यशवंत, अखिल भल्ला आउटपुट देखते थे, साल भर बाद अजय कुमार आउटपुट देखने लगे, सत्ता बदलने पर भी वहां 25 फीसदी की बड़ी इन्क्रीमेंट मिली थी। इसके बावजूद मैंने ज़ी न्यूज़ लौटने के लिए रिज़ाइन किया था, क्योंकि यहां संजय पांडेय सर ने बुलाया था, जिनसे मेरा रिश्ता दोस्ताना था, अभी भी है, आज तक हमेशा से नंबर वन चैनल रहा है, वहां भविष्य सुरक्षित है, मैंने अपने काम से अपनी जगह भी बना ली थी, सभी सीनियर्स काम से खुश थे, लेकिन तब फैसले का आधार प्रोफेशनल नहीं, व्यक्तिगत रिश्ता था यानी कई बार इस तरह के फैसलों में नफा-नुकसान नहीं देखा जाता, फैसला जो होता है, अपना होता है और फैसलों का सम्मान होना चाहिए। अगर पत्रकारों की आवाज़ यानी भड़ास भी किसी निजी फैसले को गलत तरीके से मीडिया वर्ल्ड में रखे तो मुझे अच्छा नहीं लग रहा और लगेगा भी नहीं।

टीवी पत्रकार परमेन्द्र मोहन की एफबी वॉल से.

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