रिहा हुईं पत्रकार प्रदीपिका ने गाजीपुर जेल में बंद महिलाओं की खराब हालत पर आवाज उठाई

Samar Anarya : बेहद प्यारी ख़बर के साथ शुरू हो, इन ‘अच्छे दिनों’ में ये हादसा कम ही होता है।

ख़ैर शुक्र है कि आज हुआ…

दैनिक जागरण ने 10 साथियों के साथ ज़िला कारागार ग़ाज़ीपुर में शांति के लिए पड़ यात्रा में क़ैद की गई साथी प्रदीपिका सारस्वत के साथी महिला क़ैदियों के हालात के ज़िक्र और उनकी मदद की कोशिश पर पूरी ख़बर की है।

उनके आह्वान के एक दिन के भीतर ही, दरअसल 24 घंटे से भी कम में, ग़ाज़ीपुर के साथियों द्वारा ज़रूरी मदद पहुँचा देने के साथ साथ आगे क़ानूनी साथ की तैयारी भी शुरू कर दी थी। आगे करते रहने का वादा भी है उनका!

काश कि देश के बाक़ी हर ज़िले में मौजूद साथी भी ये करें!

बाक़ी: इस रपट में मेरी भूमिका अतिशयोक्ति वाली है- Yashwant Singh भाई की मेरे लिए मुहब्बत है। असल में मैन सिर्फ़ डाकिया था- संदेश ज़रूरी, ज़मीनी लोगों तक पहुँचा देने वाला।

श्रेय असल में बस प्रदीपिका, यशवंत भाई, Umesh Srivastava, सुजीत सिह प्रिंस, आशीष राय और अशोक कुमार शर्मा जी और अन्य साथियों का है!


Not everyday begins with such positive news in these gloomy days!

Dainik Jagran covers a little attempt on the call of Pradeepika Saraswat, arrested and imprisoned in District Jail, Ghazipur for daring to take out a peace march on foot in these times of hate, to assist women, many of them destitute, imprisoned there.

Within a day of her call, friends in Ghazipur responded with all their might and helped, with a promise of continuing to do so in future as well.

May friends in other districts too join them!

P.S. My role in this news report is highly exaggerated, My role was nothing more than a messenger, a postman, delivering the message to those who could help!

Credit goes to only Pradeepika, Yashwant Singh, Ashok ji, and others…


कल सत्याग्रह कर जेल पहुँची साथी Pradeepika Saraswat ने एक अपील की।

ग़ाज़ीपुर महिला जेल बंद उन महिला क़ैदियों के लिये जिनसे मिलने तक कोई नहीं आता। वजह जो भी हो- जिनका या कोई अपना नहीं है, या समर्थ नहीं है। ऐसी दोस्तों के बारे में जिनको ज़मानत मिल चुकी है पर चुकाने वाला कोई नहीं इसलिये वे अब भी जेल में हैं।

पर अपनी ज़िन्दा उम्मीदों के, जिजीविषा के साथ। नीम फेश वाश जैसी प्यारी सी ज़रूरतों के साथ।

Yashwant Singh भाई और Atul Shankar Pandey – यही दो ग़ाज़ीपुरिये सबसे पहले याद आये। इन्हें पकड़ा।

दोनों ने और दोस्तों को पकड़ा, शाम भर जानी हुई ज़रूरतों की लिस्ट बनी, मुलाक़ात की अर्ज़ी। आज यशवंत भाई सहित 4 साथी मिल आये, सामान पहुँचा आये, वकीलों से लेकर आगे की बाक़ी के साथ के लिये ज़रूरी सूचना ले आये।

महिला क़ैदी साथियों ने प्रदीपिका को जो धन्यवाद बोला उसके साथ साथ एक क़ैदी की कल हो गई रिहाई की बेहद प्यारी खबर के साथ!

सारे ज़मीनी साथियों को सलाम पहुँचे!

अरे हाँ, संयोजन के लिए जो वहाट्सऐप समूह बना था उसका नाम यशवंत भाई ने रखा था: ज़िला कारागार ग़ाज़ीपुर

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अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर उर्फ समर अनार्या की एफबी वॉल से.

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