दैनिक जागरण की पत्रकारिता : डूसू में ABVP जीती तो नतीजे पहले पन्ने पर, जेएनयू में हारी तो अंदर

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के नतीजे दैनिक जागरण में 14 सितंबर अंक में पहले पन्ने पर छपे थे। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के लिए मतदान छह सितंबर को हुए थे पर नतीजे नहीं थे। पता चला कि चुनाव नतीजों की घोषणा पर अदालत की रोक है। अदालत की रोक हटने के बाद कल जेएनयू के चुनाव नतीजों की घोषणा हुई और आज (18 सितंबर 2019) के अखबारों में जेएनयू के नतीजे हैं। दैनिक जागरण में जेएनयू के नतीजे पहले पन्ने पर नहीं हैं। कोई खबर आप पहले पन्ने पर ढूंढ़ रहे हों और पहले पन्ने पर नहीं है तो अमूमन राष्ट्रीय खबरों के पन्ने पर होती है। राष्ट्रीय खबरों का पन्ना अखबार का दूसरा महत्वपूर्ण पन्ना होता है। कई अखबारों में यह आखिरी पन्ना होता है और कई अखबारों में आखिरी पन्ना खेल की खबरों का होता है। यह बदलता भी रहता है और पाठक के रूप में आखिरी पन्ने पर खेल की खबरें होती हों तो बहुत लोगों को एक ही अखबार में दो अखबारों का मजा मिलता है। आप हल्के मूड में अखबार पीछे से भी पढ़ना शुरू कर सकते हैं। पर वह अलग मुद्दा है।

दैनिक जागरण में डूसू चुनाव की खबर पहले पन्ने पर थी और जेएनयू की खबर पहले पन्ने पर नहीं थी तो मैंने कंप्यूटर पर पेज पलटना शुरू किया और चूंकि खबर दूसरे पन्ने पर थी इसलिए मुझे जल्दी मिल गई। हालांकि यह स्थानीय खबरों का पन्ना है। राष्ट्रीय संस्करण में डूसू के चुनाव नतीजे 14 सितंबर को पहले पन्ने पर और उसी राष्ट्रीय संस्करण में जेएनयू छात्र संघ के चुनाव अंदर और वह भी शहर की खबरों के पन्ने पर – क्या इसका कोई कारण हो सकता है। कैसे तय होता है कि कौन सी खबर कहां जाएगी। अव्वल तो एक अखबार पढ़ने वाले लोग अपने अखबार को जानते हैं और उन्हें अंदाजा होता है कि कौन सी खबर कहां कितनी बड़ी होगी पर हमलोग ऐसे अखबार बनाने वाले हैं कि हमारे संपादक को भी अंदाजा नहीं होता था कि हम क्या-क्या कर सकते हैं। जनसत्ता में तो एक समय हर आदमी का बनाया हुआ अखबार अलग होता था और हमलोग देखकर समझ जाते थे कि किसने बनाया होगा। अब ऐसा शायद किसी अखबार में न हो। सच यह है कि सभी अखबार एक ही आदमी के बनाए लगते हैं।

इसलिए जो नहीं जानते हैं और जानना चाहते हैं उनके लिए बता रहा हूं कि यह कैसे तय होता है कि कौन सी खबर पहले पन्ने पर होगी और कौन सी अंदर या शहर के खबरों के पन्ने पर। इसमें तय करने वाले का पूर्वग्रह, निजी पसंद ना-पसंद और प्राथमिकताएं सब शामिल है पर पूछा जाए तो आपके पास बताने लायक कारण होना चाहिए। आइए, आज इन खबरों को पहले पन्ने पर और शहर के पन्ने पर छापने का कारण समझने की कोशिश करते हैं। 14 सितंबर को डूसू वाली खबर का शीर्षक था, डूसू चुनाव में एबीवीपी का परचम। जागरण संवाददाता, नई दिल्ली दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव में फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का परचम लहराया। उसने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और संयुक्त सचिव पद पर जीत हासिल की है। वहीं, सचिव पद नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआइ) के खाते में गया। पिछले साल भी एबीवीपी ने इन तीनों पदों पर जीत हासिल की थी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह व कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने विद्यार्थी परिषद को बधाई दी है।

आज प्रकाशित जेएनयू छात्र संघ चुनाव की खबर का शीर्षक है, जेएनयू में फिर लहराया वाम एकता का परचम। यह खबर भी जागरण संवाददाता की है और इस प्रकार है, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्र संघ चुनाव में एक बार फिर वाम एकता का परचम लहराया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने छह सितंबर को छात्र संघ चुनाव के नतीजों की घोषणा पर रोक लगा दी थी। मंगलवार दोपहर सुनवाई के बाद रोक हटा दी गई। इसके बाद जेएनयू छात्र संघ चुनाव समिति ने शाम सात बजे नतीजे घोषित किए। वाम एकता ने लगातार तीसरे वर्ष छात्र संघ चुनाव जीता है। वहीं एबीवीपी इस बार भी दूसरे नंबर पर रही है। सीधी टक्कर वामपंथी छात्र संगठनों और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के बीच थी। 2017 से लगातार सभी वामपंथी छात्र संगठन गठबंधन करके चुनाव लड़ रहे हैं। जेएनयू छात्र संघ चुनाव में अध्यक्ष आईशी घोष, उपाध्यक्ष साकेत मून, महासचिव सतीश चंद्र यादव और संयुक्त सचिव मुहम्मद दानिश जीते हैं। ये सभी वाम एकता के उम्मीदवार हैं।

खबरों का प्लेसमेंट कई बार लिखने वाले और शीर्षक से भी तय होता है। यहां दोनों खबरें जागरण संवाददाता की हैं इसलिए ऐसा कोई कारण नहीं है। खबर में रहस्य रोमांच हो तो (टीवी के साथ-साथ) अखबारों को भी टीआरपी मिलती होगी। पर यहां दोनों नतीजे पिछले साल जैसे ही हैं। वामपंथी छात्र संगठनों का मिलकर लड़ना और जीतना। अदालती रोक के कारण समय पर नतीजे न आने से उत्सुकता बढ़ना कुछ ऐसे तथ्य हैं जिनकी वजह से जेएनयू वाली खबर भी (ही) पहले पन्ने पर हो सकती थी। वैसे तो अंतर साफ है – एबीवीपी की जीत पहले पन्ने पर और हार अंदर के पन्ने पर लेकिन डूसू वाली खबर में एक और खासियत है। सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष ने जीत पर बधाई दी है – जो जेएनयू के मामले में नहीं है (हो भी नहीं सकती थी, यहां तो लोग ट्वीट भी तौल कर करते हैं)। खबरों का प्लेसमेंट कहां हो यह अखबार में विज्ञापन और दूसरी महत्वपूर्ण खबरों की उपलब्धता पर भी निर्भर करता है। संयोग से दैनिक जागरण में 14 सितंबर को और आज भी पहले पन्ने पर कोई विज्ञापन नहीं है और जहां तक दूसरी महत्वपूर्ण खबरों की बात है, दोनों दिन स्थिति बहुत अलग नहीं है। इस तरह, डूसू की खबर पहले पन्ने पर छापने के पक्ष में तर्क तो दिए जा सकते हैं और जो हैं वो स्पष्ट हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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Posted by Bhadas4media on Wednesday, September 18, 2019
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