एक पत्रकार को जीवन में पहली बार ‘अछूत’ होने का अहसास क्यों हुआ?

प्रोफेशनल लाइफ के २८ साल में मैंने खूब भाड़ झोंकी है। करीब ढाई दशक तक मीडिया संस्थानों की शोषण की चक्की में खुद को हँसते- हँसते पिसवाया। जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर और राष्ट्रीय स्तर  पर एक से एक निकृष्ट मालिकों के अधीन काम करने का कटु अनुभव रहा। कुछ संस्थानों की नौकरी को मैंने खुद छोड़ दिया तो कुछ संस्थानों ने मुझे निकाल दिया। प्रोफेशनल लाइफ के पहले पंद्रह साल में मुझे नौकरी जाने का थोड़ा दुःख भी होता था। मन में टीस उठती थी कि कठोर परिश्रम और सत्यनिष्ठा एक झटके में व्यर्थ चली गई, लेकिन पिछले एक दशक से मैं इस मामले मैं बिलकुल संवेदनहीन हो गया हूँ। नौकरी जाना कोई मसला नहीं। 

प्रोफेशनल्स को कहीं न कहीं कम या ज्यादा में कुछ न कुछ काम मिल ही जाता है। कोई भी संस्थान छोड़ने के बाद सहयोगियों से मित्रवत सम्बन्ध बने ही रहते हैं, जो भावनात्मक ऊर्जा और सुरक्षा का सुखद अहसास कराते हैँ। यह भी एक प्रकार की पूँजी है, लेकिन पिछले आठ- दस महीने से मुझे खुद के अछूत होने का अहसास हो रहा है। यह अजीब दुःखद अनुभव है, लेकिन है कटु सत्य।

मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान के सोशल मीडिया सेल की अमानवीय परिस्थितियों के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए मैंने पिछले साल इसे छोड़ दिया था। मैंने प्रोफेशनल्स की तरह व्यवहार करते हुए बाकायदा एक माह का नोटिस दिया था, लेकिन सेल चलाने वाली कंपनी के लोगों ने दो कौड़ी के सड़क छाप दुकानदार की तरह मुझे व्हाट्सएप पर ही बर्खास्त कर दिया। अनुबंध तोड़ने और सीएम के नाम से डरा-धमका कर २४ घंटे काम लेने और आग्रह-दुराग्रह से अन्य कम्पनीज के लिए बिना भुगतान दिए काम लेने और आपराधिक साजिश रचने के मामले में मेरी कंपनी से कानूनी लड़ाई चल रही है। इस बीच, कंपनी के कर्ता-धर्ताओं ने सीएम सोशल मीडिया सेल के अन्य कर्मचारियों के मुझ से संपर्क रखने पर बैन लगा दिया है। उनमें इतना खौफ है कि कोई मोबाइल या व्हाट्सप्प/ मैसेंजर पर भी मुझसे बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है।

उन्हें डर है कि उनका व्हाट्सप्प/ मैसेंजर हैक हो सकता है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या है जो कंपनी के कर्ता-धर्ता छिपाना चाहते हैं ? प्रदेश के शीर्ष अधिकारी सीएम सोशल मीडिया सेल का काम आउटसोर्स करके निश्चिन्त हैं। उनकी बला से कंपनी अपने स्टाफ का खून निचोड़ने तक शोषण करे।  मेरी शिकायत पर भी किसी शीर्ष अधिकारी ने यही टिप्पणी की है कि सरकार से कोई अनुबंध नहीं हुआ था।  दूसरे शब्दों में यदि सरकार से आपका कोई अनुबंध नहीं हुआ है तो किसी भी कंपनी को श्रम कानूनों को कुचलने का पूरा अधिकार है।

दिन-रात प्रोफेशनलिज्म का ढोल पीटने वाले कंपनी के इन कर्ता-धर्ताओं ने मुझसे उस दिन भी काम कराया जब हाई ब्लड प्रेशर से मेरी नाक से बहुत खून बहा था। साफ़ है कंपनी के कर्ता-धर्ता बौद्धिक दिखने का ढोंग भले ही करते हों, लेकिन उनकी मानसिकता निर्माण मजदूरों का ठेका लेने वाले ठेकेदार से ज्यादा  नहीं है। कंपनी के कर्ता-धर्ता नहीं चाहते कि सीएम सोशल मीडिया सेल  में चल रहे श्रम कानूनों के उल्लंघन और मानवाधिकारों के हनन की  बात सामने आये या अन्य स्टाफ भी अपने हक़ की मांग करने लगे। इसलिए उन्होंने मुझे ही ‘अछूत’ बना दिया। कमाल है २१वीं सदी में ऐसी भी कंपनी है जो कर्मचारियों को अपना दास समझती है।

विश्वदीप नाग
स्वतंत्र पत्रकार, भोपाल
मोबाइल + 917649050176

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं
  • भड़ास तक कोई भी खबर पहुंचाने के लिए इस मेल का इस्तेमाल करें- bhadas4media@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *