एक पत्रकार को जीवन में पहली बार ‘अछूत’ होने का अहसास क्यों हुआ?

प्रोफेशनल लाइफ के २८ साल में मैंने खूब भाड़ झोंकी है। करीब ढाई दशक तक मीडिया संस्थानों की शोषण की चक्की में खुद को हँसते- हँसते पिसवाया। जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर और राष्ट्रीय स्तर  पर एक से एक निकृष्ट मालिकों के अधीन काम करने का कटु अनुभव रहा। कुछ संस्थानों की नौकरी को मैंने खुद छोड़ दिया तो कुछ संस्थानों ने मुझे निकाल दिया। प्रोफेशनल लाइफ के पहले पंद्रह साल में मुझे नौकरी जाने का थोड़ा दुःख भी होता था। मन में टीस उठती थी कि कठोर परिश्रम और सत्यनिष्ठा एक झटके में व्यर्थ चली गई, लेकिन पिछले एक दशक से मैं इस मामले मैं बिलकुल संवेदनहीन हो गया हूँ। नौकरी जाना कोई मसला नहीं। 

प्रोफेशनल्स को कहीं न कहीं कम या ज्यादा में कुछ न कुछ काम मिल ही जाता है। कोई भी संस्थान छोड़ने के बाद सहयोगियों से मित्रवत सम्बन्ध बने ही रहते हैं, जो भावनात्मक ऊर्जा और सुरक्षा का सुखद अहसास कराते हैँ। यह भी एक प्रकार की पूँजी है, लेकिन पिछले आठ- दस महीने से मुझे खुद के अछूत होने का अहसास हो रहा है। यह अजीब दुःखद अनुभव है, लेकिन है कटु सत्य।

मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान के सोशल मीडिया सेल की अमानवीय परिस्थितियों के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए मैंने पिछले साल इसे छोड़ दिया था। मैंने प्रोफेशनल्स की तरह व्यवहार करते हुए बाकायदा एक माह का नोटिस दिया था, लेकिन सेल चलाने वाली कंपनी के लोगों ने दो कौड़ी के सड़क छाप दुकानदार की तरह मुझे व्हाट्सएप पर ही बर्खास्त कर दिया। अनुबंध तोड़ने और सीएम के नाम से डरा-धमका कर २४ घंटे काम लेने और आग्रह-दुराग्रह से अन्य कम्पनीज के लिए बिना भुगतान दिए काम लेने और आपराधिक साजिश रचने के मामले में मेरी कंपनी से कानूनी लड़ाई चल रही है। इस बीच, कंपनी के कर्ता-धर्ताओं ने सीएम सोशल मीडिया सेल के अन्य कर्मचारियों के मुझ से संपर्क रखने पर बैन लगा दिया है। उनमें इतना खौफ है कि कोई मोबाइल या व्हाट्सप्प/ मैसेंजर पर भी मुझसे बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है।

उन्हें डर है कि उनका व्हाट्सप्प/ मैसेंजर हैक हो सकता है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या है जो कंपनी के कर्ता-धर्ता छिपाना चाहते हैं ? प्रदेश के शीर्ष अधिकारी सीएम सोशल मीडिया सेल का काम आउटसोर्स करके निश्चिन्त हैं। उनकी बला से कंपनी अपने स्टाफ का खून निचोड़ने तक शोषण करे।  मेरी शिकायत पर भी किसी शीर्ष अधिकारी ने यही टिप्पणी की है कि सरकार से कोई अनुबंध नहीं हुआ था।  दूसरे शब्दों में यदि सरकार से आपका कोई अनुबंध नहीं हुआ है तो किसी भी कंपनी को श्रम कानूनों को कुचलने का पूरा अधिकार है।

दिन-रात प्रोफेशनलिज्म का ढोल पीटने वाले कंपनी के इन कर्ता-धर्ताओं ने मुझसे उस दिन भी काम कराया जब हाई ब्लड प्रेशर से मेरी नाक से बहुत खून बहा था। साफ़ है कंपनी के कर्ता-धर्ता बौद्धिक दिखने का ढोंग भले ही करते हों, लेकिन उनकी मानसिकता निर्माण मजदूरों का ठेका लेने वाले ठेकेदार से ज्यादा  नहीं है। कंपनी के कर्ता-धर्ता नहीं चाहते कि सीएम सोशल मीडिया सेल  में चल रहे श्रम कानूनों के उल्लंघन और मानवाधिकारों के हनन की  बात सामने आये या अन्य स्टाफ भी अपने हक़ की मांग करने लगे। इसलिए उन्होंने मुझे ही ‘अछूत’ बना दिया। कमाल है २१वीं सदी में ऐसी भी कंपनी है जो कर्मचारियों को अपना दास समझती है।

विश्वदीप नाग
स्वतंत्र पत्रकार, भोपाल
मोबाइल + 917649050176

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कुछ चैनल वाले जिले में स्टिंगर को अपने संस्थान का कुत्ता समझते हैं

‘नेशनल वायस’ के बाराबंकी रिपोर्टर ने उत्पीड़न से दुखी होकर इस्तीफा दिया… ‘नेशनल वायस’ चैनल के बाराबंकी के रिपोर्टर ने इस्तीफा दे दिया. इस्तीफा से पहले रिपोर्टर ने चैनल के असाइनमेंट ग्रुप में एक पोस्ट डाल कर अपने उत्पीड़न के बारे में विस्तार से लिखा, जिसे नीचे दिया जा रहा है.

आदणीय नेशनल वायस मैनेजमेंट टीम

लखनऊ

विषय : बगैर पगार चैनल के लिए दिनरात भागदौड़ करना और जबरदस्त तनाव के साथ स्टोरी के लिए स्थानीय नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों से दुश्मनी लेना.. खुद अपने खर्च पर न्यूज़ तैयार कर चैनल को उपलब्ध कराना…. बदले में चैनल में कार्ययत कुछ लोगों द्वारा अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए लगातार प्रेशर बनाना और चैनल से हटवा देने की धमकी देना… जब अपनी स्टोरी के पेमेंट के लिए बात की जाती है तो पाँच सौ कारण गिनाकर पेमेंट न भेजना… क्या साहब, चैनल में स्टोरी पेमेंट के लिए 500 कारण से गुजरना पड़ता है.. इन्हें पास करना करना जरूरी है… मुबारक हो मेरा ये पेमेंट… मैं खुद बाराबंकी जिले से नेशनल वायस चैनल से इस्तीफा दे रहा हूँ!

आदणीय महोदय!

मुझे बड़ी खुशी हुयी जब पता चला- ”चैनल को दोबारा चलाने के लिए संस्थान में अच्छे लोग अब आ गए है. जिले से नेशनल वाइस चैनल के शुरुवाती दौर से मेहनत से काम करने वाले रिपोर्टर हटाए नही जाएंगे, वही लोग काम करेंगे और अब उन्हें समय समय पर उनकी स्टोरीज का पेमेंट भी मिलेगा.” यह सब सुनकर मेरे अंदर फिर से उत्साह जगा और फिर से कहीं ज्यादा एनर्जी के साथ हम काम पर लग गए. मुझे विश्वास था हम अच्छे से अच्छा काम करेंगे और हमें हमारी मेहनत का पेमेंट भी मिलेगा. लेकिन चैनल के शुरुवाती दौर में और न​ इधर तीन महीने से कोई पेमेंट चैनल की तरफ से मुझे दिया गया. पेमेंट की बात करता हूँ तो पांच सौ कारण गिनाये जाते हैं न देने के. ​

दीपावली पर उम्मीद थी, वो भी इन्तजार करते करते निकल गयी. चलो पैसे नहीं आये, कोई बात नहीं. हम उसे भूल जाते हैं. लेकिन चैनल में बैठे कुछ लोगों के द्वारा अभद्र व्यवहार, टिप्पणी और बार बार चैनल से हटवा देने का ताने देना अब बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है. फोन पर उल्टी सीधी बातें बोलना. क्यों ये खबर क्यों नहीं आयी? लेट क्यों हो गयी/ डे प्लान की स्टोरी क्यों नहीं आयी? डे प्लान क्यों नहीं भेजा? डे प्लान का डिटेल्स क्यों नहीं भेजा? क्या क्या करोगे,  ये भी लिखो? इस स्टोरी पर अपनी माइक आईडी क्यों नहीं लगी? अरे साहब आपकी इज्जत करते हैं इसलिए हम बिना पेमेंट के पिछले काफी समय से काम तो करते चले आ रहे हैं!

पत्रकारिता के गुरुजनों ने कभी बेईमानी और चाटुकारिता नहीं सिखाई. और, न ही मान सम्मान से समझौता करने की सलाह दी. इसलिए चापलूसी हमें कभी पंसद नहीं आयी. जिनके साथ हमने काम किया और आज भी करता हूँ उन्होंने कभी दुर्व्यवहार और बदतमीजी से बात नहीं की. शायद ऐसे लोगों को हमारे गुरुजनों से सीखना चाहिए जो जिले के स्टिंगर को अपने परिवार के सदस्य की तरह आज भी मानते हैं! ईमानदारी से काम करने वालों के लिए काम की कमी नहीं है. जिले में हम धन उगाही नहीं करते. मीडिया में ​अपनी और अपने संस्थान की ईमानदारी के लिए हम बहुत कुछ अपने निजी संसाधनों से मैनेज करते हैं जिसके बाद ​हम आपको जिले से स्टोरी ​देते हैं.

आपको लगता है जिले में पैसों की बौछार होती है और जिले का रिपोर्टर बहुत मालामाल रहता है. ये सोच आप बदल दीजिये. आपको तो मोटी पगार महीना ख़त्म होते मिल जाती है. लेकिन हम लोग सालों इंतजार में समय खर्च कर देते है. सोचते हैं चलो, कभी न कभी तो चैनल से पेमेंट आ ही जाएगा. मेरा भी परिवार है. मेरे भी खर्चे हैं. अगर इतने लम्बे समय में दो से तीन बार हमारे खाते में अगर तीन से चार हजार रूपये चैनल की तरफ से आ भी गए तो उतने रूपये में हमारा खराब कैमरा भी तो नहीं बनेगा. आपतो संस्थान से छुट्टी लेकर परिवार के साथ बाहर घूमने भी चले जाते हो. मुझसे उम्मीद करते हो कि 24 घंटे जिला छोड़कर न जाएं और हर खबर भेजते रहें. हमे लगता है जो लोग फ्री में काम करवाना चाहते हैं उन्होंने जिले से कुछ ख़ास पत्रकारिता सीखी है और हमसे भी वही उम्मीद करते हैं!

इसमें चैनल मालिक और प्रबंधक की कोई गलती नहीं है. गलती उनकी है जो लोग झोलाछाप पत्रकार बनकर संस्थान में हेकड़ी दिखाने लगे हैं. अगर आपको कुछ सीखना है तो कुछ बड़े ब्रांड न्यूज़ चैनल में काम करने वाले लोगों से सीखना चाहिए. जिनका प्रदेश और देश की पत्रकारिता में बहुत नाम है. उनके साथ काम करते हुए मुझे आजतक एहसास नहीं हुआ. कभी तनाव न कभी प्रेशर! आप तो ये भी कहते हो मेरे चैनल में काम करना है तो दूसरे चैनल का काम हम न करें. लेकिन ये बातें हमारे इन बड़े ब्रांड में काम करने वाले साहब नहीं कहते हैं जिनके साथ काम करते हुए एक लंबा समय गुजार दिया.

आपने कभी अपने चैनल से मेरी मान्यता प्राप्त करवाने के बारे में नहीं सोचा होगा लेकिन हमारे इस बड़े चैनल ने हमें बहुत पहले से सरकारी मान्यता प्राप्त पत्रकार का दर्जा दिलवा रखा है! टीआरपी और सबसे आगे दिखाने के लिए आपने कभी जिले के रिपोर्टर के बारे में नहीं सोचा होगा कि वो अपनी जान जोखिम में डालकर और टेंशन लेकर आपके चैनल के लिए खबर कवरेज करने निकला है. उस दौरान भी आप फोन के ऊपर फोन लगाते रहते हो जबकि वो तेज तफ्तार से बाइक पर चल रहा होता है! जब पेमेंट की बात होती हैं तो 500 कारण गिनाए जाते हैं. एक भी कमी निकलने पर पेमेंट देने से मना कर दिया जाता है. कुछ चैनल वाले जिले में स्टिंगर को अपने संस्थान का कुत्ता समझते हैं. वो चाहते हैं कि उनके इशारे पर वो अपनी दुम हिलाये. उनके इशारे पर वो भोंके. उनके कहते ही तत्काल उन्हें खबर उपलब्ध करवा दे.

ऐसे लोगों से मेरा अनुरोध है आपने एक माइक आईडी उसे पकड़ा दी और कह दिया जाओ, तुम जिले के शेर हो, उसकी ये कर देना उसकी वो कर देना, उसकी फाड़ देना, हमे सबसे पहले एक्सक्लेसिव फुटेज देना, वो भी अपने चैनल की माइक आईडी पर… अरे साहब, आपने एक माइक आईडी पकड़ा दी लेकिन न उसे संस्थान से कैमरा दिया और न ही उसे कैमरामैन मुहैया कराया. इतना ही नहीं, उसके पास शायद कम्प्यूटर और अच्छा फोन है या नहीं, ये भी आपने साहब जानने की कोशिश नहीं की. उसने कैसे मैनेज किया होगा, पता नहीं किया. उसे न आने जाने का साधन दिया न खर्चा. आपने महीना पूरा होने पर उसके द्वारा भेजी गयी स्टोरी का पैसा तक नहीं दिया.

इसके बावजूद आप लोग चाहते हो वो हर स्टोरी पर आपके चैनल की माइक आईडी लगाए, डे प्लान देकर अच्छी पीटीसी वाक् थ्रू करके फटाफट खबर भेजता रहे. साहब, वो इंसान है, मशीन नहीं है. मै भी इंसान हूँ. मशीन नहीं. तनाव मुक्त और ईमानदारी के साथ इज्जत से पत्रकारिता करने वाला इंसान हूँ! मुझे जिन गुरुजनों ने मीडिया की एबीसीडी सिखाई, उन्होंने कभी मान सम्मान से समझौता करना नहीं सिखाया. जिस संस्थान के लोग पांच सौ कारण गिनाकर जिले के रिपोर्टरो का पेमेंट काट लें, उन्हें ये पैसा मुबारक हो… हां, पत्रकारिता में अपने उसी संस्थान के साथ बेहद खुश हूँ जहां मान सम्मान के साथ साथ महीने की शुरुवात होते ही खाते में पैसा आ जाता है.. पैसे न मिले तो ठीक… मान सम्मान से कोई समझौता नहीं… नेशनल वाइस न्यूज़ परिवार को बहुत बहुत बधाई… सभी को मेरा प्रणाम!

जय हिन्द

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छुट्टी मांगने पर उस हृदयहीन संपादक ने कहा- ‘किसी के मरने जीने से मुझे कोई मतलब नहीं है’

Jaleshwar Upadhyay : निष्ठुर प्रबंधन और बेशर्म संपादकों के कारण एचटी बिल्डिंग के सामने धरनारत कर्मचारी की मौत पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मैंने अपनी जिंदगी में ऐसे बेगैरत और हृदयहीन संपादक देखे हैं कि नाम याद कर घिन आती है। नाम नहीं लूंगा, लेकिन जब मेरी पत्नी मृत्युशैया पर थीं तो मैंने अपने संपादक से छुट्टी मांगी।

उसने कहा किसी के मरने जीने से मुझे कोई मतलब नहीं है। मजबूरन मुझे इस्तीफा देना पड़ा और पत्नी भी कुछ दिन बाद नहीं रहीं। इस वाकये को 11- 12 साल हो गए, लेकिन कभी चर्चा नहीं की। आज एचटी कर्मी की धरने पर मौत के घटनाक्रम को सुन कर खुद को रोक न सका। माफ़ी चाहता हूं।

अमर उजाला, बनारस में लंबे समय तक कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार जलेश्वर उपाध्याय के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Rakesh Vats Sir sorry to say but disclose that blady and heartless man who is not socially

Yashwant Singh उसका नाम खोलना चाहिए सर. अब काहे का डर. ऐसे लोगों के खिलाफ आनलाइन निंदा अभियान चलाना चाहिए.

Jaleshwar Upadhyay He is very well known figure. Actually a big name in hindi journalism. यशवंत जी, काफी वक्त बीत गया। इस एक घटना ने मेरी जिंदगी बदल दी। आप सब जानते हैं। अब निंदा से क्या फायदा? जो गया, वह लौट नहीं सकता।

राकेश चौहान प्रणाम सर लेकिन उसका नाम आप बताये हैम उसके खिलाफ अभियान चलाना ही चाहिए

Mamta Kalia निर्दय होते जाते समय का यथार्थ है यह।यह सवाल उठता है कि क्या वह पत्रकार freelancing नही कर सकता था।एक ही नौकरी के पीछे क्यों पड़ा रहा।

Smita Dwivedi ममता जी यही तो विडंबना है इस देश की जो जेहन से कर्मठ और ईमानदार पत्रकार उससे नौकरी छीन ली जाती हैं।

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नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

एक अहम बात और है. दुकानदार हमें उधार देने से डरते हैं. बाज़ार में नगद रूपए लेकर भी कुछ खरीदने चले जाओ तो कई बार दुकानदार कह देता है ये वस्तु मेरे यहाँ नहीं है. रही बैंक की तो बैंक में ये गाईड लाइन फिक्स है कि पत्रकारों को लोन नहीं देना है क्योंकि इन्होंने लौटाया नहीं तो इनका क्या हम करेंगे? लोग धंधे व्यापार की बात हमारे सामने करने से परहेज करते हैं. किसी का हाल पूछो तो वो ऐसे बताएगा जैसे दुनिया का सबसे पीड़ित और दुखी व्यक्ति वही है क्योंकि उसे पता है यदि अच्छा बता दिया तो न मालूम क्या होगा.
यह तो समाज का आईना है. यदि प्रोफेशन की बात करें तो बड़ी बड़ी खबरें लिखने वाले पत्रकारों को एक दिहाड़ी मजदूर के बराबर तनख्वाह भी नहीं मिलती.

इसमें ज़्यादा बदतर हालत है आंचलिक पत्रकारों की. हम अधिकारियों और पुलिस वालों के साथ खड़े हुए दिखते हैं तो लोग सोचते हैं, इसकी खूब चलती है. लेकिन हकीकत यह है कि पास खड़ा अफसर या नेता सोचता है ये कब निकले. खबरों के लिए हमेशा ऊपर ताको. ऊपर वाले का आप पर लाड हो तो ठीक. वरना आपकी चाहे जितनी बड़ी खबर हो, रद्दी की टोकरी में जायेगी. आप रोते बिलखते रहो, खबर नहीं लगी. खबर जिनसे जुडी है,  नहीं लगने पर कह देंगे- सेटलमेंट कर लिया, इसलिए नहीं लगाई. अब उन्हें कैसे समझाएं कि भाई ऊपर की कथा कहानी अलग है. मुस्तफा भाई ने तो खबर पेल दी थी, रोये भी थे, लेकिन नहीं लगी तो क्या करें.

अब रिश्तों की बात करें तो मेरी आँख से पट्टी उस दिन हटी जब मैंने अपने दोस्त पुलिस अफसर को फोन लगाया. मेरा इनसे बीस साल पुराना याराना था. एक दिन दूसरे शहर में उनसे मिलने के लिए फोन लगाया तो वे बोले मैं बाहर हूं. इत्तेफाक से मैं जहां खड़ा रहकर फोन लगा रहा था, वे वहीं खड़े थे और अपने सहयोगी से कह रहे थे कि मुस्तफा मिले तो मेरी लोकेशन मत बताना. वह सहयोगी मुझे देख रहा था क्योंकि वो भी मेरा परिचित था. उसने यह बात बाद में मुझे बता दी. मैंने जब उनका इतना प्रेम देखा तो समझ में आया कि लोग बिठाकर जल्दी से चाय इसलिए मंगवाते हैं ताकि इनको फूटाओ. हम उसे याराना समझ लेते हैं और ज़िन्दगी भर इस खुशफहमी में जीते हैं कि हमें ज़माना जानता है.

इन्ही सब हालात के चलते अब स्थिति यह है कि मैंने तय किया कि जो नहीं जानता उसको कभी मत खुद को पत्रकार बताओ. ये बताने के बाद उसका नजरिया बदलेगा और आप उसे साक्षात यमदूत नज़र आने लगोगे. यह कुछ ज़मीनी हकीकत है जो बीस बाईस साल कलम घिसने के बाद सामने आयी है. पहले मैं सोचता था कि जिसे कोई काम नहीं मिलता वो स्कूल में मास्टर बन जाता है. लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गयी है. मेरा सोचना है कि जिसे कोई काम न मिले वो पत्रकार बने, वो भी आंचलिक. खबर छपे तो आरोप लग जाए कि पैसे मांगे थे, न दिए तो छाप दिया. न छपे तो कह दे, पैसे लेकर दबा दिया. यानि इधर खाई इधर कुआं.

देश में सुर्खियां पाने वाली अधिकाँश बड़ी खबरें नीचे से यानि अंचल से निकलती उठती हैं. लेकिन जब खबर बड़ी होती है तो माथे पर सेहरा दिल्ली भोपाल वाले बांधते हैं. आंचलिक पत्रकार की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह हो जाती है. उसकी कौन सुन रहा है. मैंने देखा जब स्व. सुंदरलाल पटवा का देवलोक गमन हुआ तब उनकी अंत्येष्टि पर पूरा मीडिया लगा था. दिल्ली भोपाल के पत्रकार अपने लाइव फोनो में न जाने क्या क्या कह रहे थे. लेकिन जिन आंचलिक पत्रकारों ने स्व. पटवा को कुकड़ेश्वर की गलियों मे घूमते देखा, उनके साथ जीवन जिया,  किसी चैनल वाले ने यह ज़हमत नहीं की कि अपने आंचलिक स्ट्रिंगर/रिपोर्टर की भी सुन ले. स्व.पटवा से जुडी बातें वो बेहतर बता पायेगा. किसी चैनल ने ये भी नहीं दिखाया कि कुकड़ेश्वर नीमच में उनके देवलोक गमन के बाद क्या हालात है. हर कोई सीएम और मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ अपने अज़ीज़ रिपोर्टर की वॉक स्पोक दिखा रहा था.

प्रदेश में कई पत्रकार संगठन हैं. वे बड़े बड़े दावे आंचलिक पत्रकारों की भलाई के लिए करते हैं. लेकिन जिन पत्रकारों को पच्चीस पच्चीस साल कलम घिसते हुए हो गए, ऐसे हज़ारों पत्रकार हैं जिनका अधिमान्यता का कार्ड नहीं बन पाया. कार्ड तो छोड़िये, जिले का जनसंपर्क अधिकारी उसे पत्रकार मानने को तैयार नहीं. फिर भी हम जमीनी पत्रकार और चौथा खंभा होने की खुशफहमी पाले बैठे हैं. हम हर रोज मरकर जीते हैं और फिर किसी को इन्साफ दिलाने की लड़ाई लड़कर खुद को संतुष्ट कर लेते हैं.

लेखक मुस्तफा हुसैन नीमच के पत्रकार हैं. वे 24 वर्षों से मीडिया में हैं और कई बड़े न्यूज चैनलों, अखबारों और समाचार एजेंसियों के लिए काम कर चुके हैं और कर रहे हैं. उनसे संपर्क 09425106052 या 07693028052 या mustafareporter@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.

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सहाफत अखबार में काम करने गए मोहम्मद इरफान के साथ क्या हुआ, जानिए उनके पत्र से

Media friends, aaj mai aap sabhi newspaper ke friends aur social media ke logo ko apna dard batana chahta hu ki maine print media ke circulation deptt. me taqreeban 15 saal diye jisme The hindu, Janmadhyam aur Inquilab jaise newspaper shamil hai. Maine ek august ko sahafat urdu daily join kiya tha. Aman abbas sb ne mujhe kai baar call karke bulaya tha aur kaha ki mere sahafat ka circulation incharge ban jaiye.

mai apni team bhi laya aur aman ke kehne par usey join karwaya jisme reporter aur marketing ka banda shamil tha. Khair maine join kar liya aur khuda gawah hai ki maine har lamha apni duty perform ki but salary mangte rehne par aman abbas sb mujhe taltey rahe aur had kal 18 sep 2017 ko ho gayi jab raat der tak aman sb ne mujhe office bitha kar rakha aur akhir me kehne lage ki mujhe circulation ki koi zarurat nahi aur aap ja sakte hai, kal se mat aana.

Puri tarah se mai financially toot chuka tha, inhone mithi baten karke mujhse apne akhbar ka circulation sahi karwaya.  kyunki 50 din kaam kar ke sahafat me maine apni pocket se sarey paise laga diye, ab mujhe salary milni thi jo mera haq tha. Par aman abbas ne kaam nikal kar mujhse keh diya ki aapki ab koi zarurat nahi. Chaliye theek hai par kya jab tak maine kaam kiya tab tak ki salary nahi milni chahiye mujhe Aur ye log sirf logo ke kharab waqt ka fayeda uthate hai aur unka exploitation karte hai.

Jab inki is harkat ke bad maine pata kiya to inke staff ne bataya ki kafi employees ka inhone misuse kiya hai aur salary ke len den me bahut badnam hai. aman sb ne bahut zindagi tabah ki hai baki mauqe par apni baat se mukar jate hai. Aise logo ne akhbar ko badnam kar rakha hai. Aap sabhi log is akhbar aur aman abbas ke jhanse me kabhi na aaye ki baad me rona padey.

Aap media friends ko ye batakar mai inform kar dena chahta hu ki aman sb jaise fraud shaks ki baton par kabhi bharosa na karen. Mai kis takleef aur pareshani se guzar raha hu ye sirf mai janta hu aur aise waqt me sahafat se jo dokha mujhe mila aap sab hazrat hi insaf karen. Aise log akhbar ko badnam kartey hai logo ki imandari ka mazak banate hai.

Shukriya.

Aapka bhai

Mohammad irfan

Circulation incharge

Sahafat urdu daily

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रिपोर्टरों का पैसा खा गया यह चैनल!

सेवा में,
सम्मानित चैनल हेड / सीनियर्स / रिपोर्ट्स / स्टाफ
नेशनल वायस चैनल

आप और हम लोगों ने नेशनल वायस न्यूज़ चैनल को बड़ी मेहनत से आगे बढ़ाया और कम समय में मेहनत के बलबूते पर आगे तक लेकर गए और उस मेहनत की मलाई किसी ओर को समर्पित की गई। हमने दिन रात मेहनत कर लगभग दो साल तक चैनल को अपने खून पसीने से सींचा मगर हमारे सीनियर्स, चैनल के उच्चाधिकारियों ने हमारी मेहनत की मलाई खूब अच्छे से खाया और अपना पेट भरा। साथ ही उनका भी भरा जो उनके चाटुकार थे। मैंने अपनी मेहनत से चैनल को खूब काम करके दिया। खुद भूखा रहा। मगर चैनल को भूखा नहीं रहने दिया। उसका पेट भरता रहा। अपने करियर को देखते हुए घर में झूठा दिलासा देता रहा कि मैं एक अच्छे चैनल में काम कर रहा हूँ। मुझे अच्छा मेहनताना मिलता है। दिल टूट गया जब मेरे पिताजी ने एक दिन कहा कि अपनी कमाई से कुछ घर भी लेकर आया कर। मगर उन्हें कहाँ पता था कि मेरी मेहनत की कमाई तो चैनल के बड़े लोगों में बंट रही है।

सभी को यह बता दूं मुझे पत्रकारिता में लंबा समय हो गया है। मगर मैंने कभी चैनल के नाम पर दलाली नहीं की। मैंने मेहनत की और मेहनताना के नाम पर कुछ नहीं मिला। चैनल के उच्च साथियों से पता चलता कि हमें अगले माह से वेतन दिया जाएगा। मैं दुबारा काम शुरू कर देता। मगर आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। ईमानदारी का बड़ा अच्छा फल मिला। उसके लिए आप सभी का तहे दिल से धन्यवाद। उच्च अधिकारियों द्वारा लुभावने लड्डू जो दिए जाते रहे, उनका भी धन्यवाद। आप लोगों को मान गए कि आप लोग मैनेज करने में एक्सपर्ट हैं। मेरी अन्य सभी साथियों के लिए एक सलाह। आप लोगों को भी लुभावने वादे किये जा रहे हैं मगर वह पूरे नहीं होने वाले। बाकी क्या कहूं। सभी तो विद्वतजनों में गिने जाते हैं।

बड़े बुजुर्ग कह कर गये है कि जो गरीब की मेहनत को कुचलता है तो उसका जरूर बुरा होता है। मगर मैं यह नहीं चाहूंगा। मैं तो यह चाहूंगा कि आप लोगों का चैनल दिन रात तरक्की करे। सिर्फ इस बात से डरता हूँ चैनल को किसी मेहनती व्यक्ति की दिल से हाय न लग जाये क्योंकि जिसने मेहनत की होगी वह व्यक्ति चैनल के लिए की गयी मेहनत पर जरूर रोया होगा। दुःख तो इस बात का होता है जब चैनल का वरिष्ठ अधिकारी ये बात बताने पर जवाब देता है कि चैनल किसी रिपोर्टर से पूछ कर काम नहीं करता। बाद में वह अपने ही रिपोर्टर को कहता है कि आपको बात करने की तमीज नहीं। वैसे चैनल की दुकान चला रहे उस व्यक्ति को बता दूं, धंधे की इज्जत करना सीखो, साथ ही उनकी भी जो लोग आपकी दुकान चलाने में आपका सहयोग दे रहे हैं। हर आदमी बिकाऊ नहीं होता।

आप लोगों के साथ काम करने का मौका मिला उसके लिए आप सभी का धन्यवाद. और एक जरुरी बात… जितने भी लोग यह सोचते है की आपका ये चैनल ETV चैनल को टक्कर दे रहा है या देगा तो वह सरासर गलतफहमी में जी रहा है। अपने दिल से पूछें कि चैनल उस नेटवर्क के बराबर है या नहीं। यह चैनल कभी एक जगह पर नहीं टिक सकता। इसका उदाहरण यह खुद ही देता रहा है। कभी नोएडा तो कभी लखनऊ। सोचनीय विषय यह जो खुद ही एक जगह पर टिका नहीं हो वह दूसरे को कैसे टिका पायेगा। हो सके तो चैनल जो वायदे किये थे, जो बिल मंगवाए थे, उन्हें पूरा करे। भगवान न करे कि कोई मेहनत का मेहनताना न मिलने पर भूखा सोये। 

धन्यवाद
कुलदीप थपलियाल
thapliyalkuldeep312@gmail.com

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सच्चे ब्लैकमेलर पत्रकार ऐसे होते हैं… पढ़ लीजिए और पहचान लीजिए…

सोनभद्र में साधना न्यूज के पत्रकार विष्णु गुप्त के खिलाफ ब्लैकमेलिंग और बलात्कार का मुकदमा दर्ज

यूपी के सोनभद्र जिले के दुद्धी से खबर है कि प्राईवेट अस्पताल में कार्यरत एक महिला ने पत्रकार विष्णु गुप्त के खिलाफ स्थानीय थाना में कई धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया है. महिला ने अस्पताल में अनियमितता का भय दिखाकर सत्तर हजार रुपये ब्लैकमेल करने और भयाक्रांत कर मर्जी के खिलाफ शारीरिक सम्बन्ध बनाने का आरोप लगाया. पत्रकार विष्णु के खिलाफ स्थानीय थाना में 376, 385, 228, 504, 506 आदि धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया जा चुका है. पत्रकार विष्णु खुद को साधना न्यूज चैनल समेत कई न्यूज चैनलों और अखबारों का संपादक बताता है. वह अश्लील वीडियो क्लिप भी लोगों को दिखा कर महिला को बदनाम कर रहा है.

कथित पत्रकार विष्णु गुप्ता (पुत्र मोती लाल गुप्ता, शक्ति कम्पलेक्स, पुलिस चौकी रेनुकूट, थाना पिपरी, जिला सोनभद्र) पर आरोप है कि वह समाचार संकलन करने के बहाने प्राईवेट अस्पताल पर गया और अनियमितता का विडियो क्लिप बनाकर ब्लैकमेलिंग करने लगा. बाद में वह उसने महिला का शारीरिक शोषण / दुष्कर्म किया. उसने करीब 70,000 रूपये ठग लिया. वह महिला को अपने पति से तलाक लेकर अपने साथ रहने को दबाव बनाने लगा. राजी नहीं होने पर पति को जान से मारने व मरवाने की धमकी देने लगा.

पीड़िता ने अपनी शिकायत स्थानीय थाना पर लिखित रूप से की. लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया. बाद में पुलिस अधिक्षक ने महिला के सम्मान को तार-तार होते देख एक जांच कमेटी बैठाई और उसके आधार पर दिनांक 18/8/17 को थाना कोतवाली दुद्धी सोनभद्र में कई धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया. पीड़िता ने उम्मीद जाहीर की है कि आगे भी उसे न्याय मिलेगा और मीडिया के नाम से तथाकथित कुछेक व्यक्ति जो मीडिया को बदनाम कर रहे हैं, उसे चिन्हित कर अलग-थलग किया जायेगा.

सोनभद्र से पीयूएचआर (मानवाधिकार) अध्यक्ष प्रभूसिंह एडवोकेट की रिपोर्ट.

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UC NEWS में प्रबंधन की गुूंडई : एक महिला कर्मी को बुरी तरह प्रताड़ित कर बाहर निकाला

 चीन की कंपनी अलीबाबा ग्रुप के यूसी न्यूज़ में काम कर रही महिला कर्मचारी को अपने हक के लिए आवाज़ उठाने पर दिखा दिया गया बाहर का रास्ता

भारत-चीन का मुद्दा जग जाहिर है. सीमा पर चल रहे विवाद के बावजूद चीन की कई बड़ी कंपनियों ने भारतीय बाज़ार में अपने पैर फैला रखे है. उन्हीं में से एक है जाने-माने अलीबाबा ग्रुप का यूसी न्यूज़ (UC NEWS) जिसका ऑफिस गुरुग्राम में स्थित है. अपना ऑफिस होने के बाद भी यूसी न्यूज़ ने एक कंसल्टेंसी कंपनी को अपनी वेबसाइट पर आने वाली ख़बरों के कंटेंट ऑडिट, वीडिओ ऑडिट, ट्रांसलेशन आदि का काम सौंप रखा है. दूसरे शब्दों में “एन्हांस बिज़नेस सोल्यूशन” नाम की इस कंसल्टेंसी कंपनी का यूसी न्यूज़ एक क्लाइंट है. यहाँ काम करने वाले सभी ऑडिटर्स वैसे तो काम यूसी न्यूज़ के लिए कर रहे लेकिन उनका पेरोल एन्हांस बिज़नेस सोल्यूशन के नाम पर ही होता है.

अलीबाबा जैसे बड़े ग्रुप की जिसने इतनी बड़ी कमान कुछ महीने पहले आई एक ऐसी कंपनी को सौंप दी है जिसे न तो अपने कर्मचारियों से बात करने की तमीज है और न ही उनकी दिक्कतों को समझने की समझ. यहाँ एचआर पद पर बैठी एक महिला अपने आप को कंपनी की मालिक समझती है. उसने एक एम्प्लोयी को सिर्फ इसलिए बाहर का रास्ता दिखा दिया क्यूंकि उसने न सिर्फ एचआर द्वारा अपने ऊपर बार बार होने वाले जातिवादी व क्षेत्रवादी कमेंट के खिलाफ़ आवाज़ उठाई बल्कि ऑफिस के कुछ बेसिरपैर के कायदे-कानून के खिलाफ़ सवाल किये.

मसलन गुरुग्राम में किसी महिला एम्प्लोई को 8 बजे के बाद गाड़ी की सुविधा देना अनिवार्य होता है. इससे बचने के लिए कंपनी ने ऑफिस समय ही 10:45 से 7:45 कर दिया जिससे उन्हें गाड़ी की सुविधा न देनी पड़े. इस पर जब ऑफिस की एक महिला एम्प्लोई ने सवाल किया तो उसे यह कह कर बेइज्जत किया की “कानपुर-यूपी जैसे छोटे शहरों के लोगों को नौकरी में रखना ही नहीं चाहिए, तुम लोगों को लगता है कि 8 बजते ही सड़कें सूनसान हो जाती है, यह दिल्ली एनसीआर है यहाँ 12-12 बजे तक लड़कियां पार्टी करती हैं, इसीलिए यह कनपुरिया स्टाइल अपने अन्दर से निकाल दो.”

महिला कर्मचारी द्वारा अपने आप को संबोधित करने के लिए “मैं” की जगह “हम” शब्द का प्रयोग करने पर भी एचआर हेड ने मजाक बनाया.

उसे ज़बरदस्ती सुबह 11 बजे से 8 बजे वाली शिफ्ट करने पर मजबूर किया और जब उसने इसके खिलाफ़ उन्हें जवाब देने की कोशिश की तो उसे अचानक एक दिन अपने केबिन में बुला कर ज़बरदस्ती मजबूर किया कि या तो वह कंपनी से तत्काल इस्तीफ़ा दे या फिर उसे तुरंत टर्मिनेट किया जायेगा. महिला एम्प्लोई ने उससे सोचने के लिए कुछ वक़्त की मांग की तो धमकी भरे लहजे में उससे बोला कि “तुम्हे सोचने का वक़्त नहीं दिया जायेगा, तुरंत फैसला लो और इस केबिन से तुम्हें तभी बहार निकलने देंगे जब तुम इन दोनों में से किसी एक को स्वीकार कर लोगी. और ऐसा नहीं करने की स्थिति में हम तुम्हें टर्मिनेट कर देंगे और यह भी पक्का करेंगे कि तुम्हें कहीं और नौकरी न मिले.”

अपनी गलती पूछने पर उसने बोला- तुम सवाल बहुत करती हो और तुम्हारी देखा-देखी और भी लड़कियां सवाल करने आ जाती हैं. मैं अपने ऑफिस में किसी की आवाज़ नहीं उठने दूंगी. तुम बाकी सबके लिए एक उदाहरण बनोगी कि इस ऑफिस में आवाज़ उठाने का क्या अंजाम होता है.

उस महिला एम्प्लोई को इतना डरा दिया की उसने मजबूरी में आकर उनकी तरफ से पहले से तैयार इस्तीफ़े पर साइन कर दिए.

एचआर का मन इससे भी नहीं भरा तो उसने अपनी जूनियर को बुलाया और उसे बोला कि “ये अपना सामान लेने अपनी सीट पर जा रही है, तुम इसके साथ साथ पीछे जाओ और ध्यान रहे कि ये किसी से बात न करने पाए और न ही किसी से मिल पाए.” यहाँ तक कि उसके बाद उसने जूनियर एम्प्लोई को उस महिला को बाहर गेट तक छोड़ने के लिए भेजा जिससे वो किसी को कुछ न बता पाए. उस महिला एम्प्लोई के साथ इतना दुर्व्यवहार निंदनीय था. उसके साथ ऐसा व्यवहार किया गया जैसे उसने ऑफिस में कोई चोरी या फिर क्राइम किया हो. शर्म आती है ऐसी महिला अधिकारियों पर जो किसी का ऑफिस में काम नहीं देखतीं बल्कि अपना ईगो संतुष्ट करने के लिए उन्हें ऑफिस से निकाल देती है. चीन के अलीबाबा ग्रुप को शायद यह नहीं पता कि अपने काम की ज़िम्मेदारी उन्होंने जिस कंपनी को दी है वह अपने कर्मचारियों से इतना दुर्व्यवहार करती है. कर्मचारी फ़िलहाल श्रम न्यायालय में अपने साथ हुए इस दुर्व्यवहार के खिलाफ़ हक़ की लड़ाई लड़ रही है.

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बिहार में दैनिक जागरण कर रहा अपने कर्मियों का शोषण, श्रम आयुक्त ने जांच के आदेश दिए

दैनिक जागरण, गया (बिहार) के पत्रकार पंकज कुमार ने श्रम आयुक्त बिहार गोपाल मीणा के यहाँ एक आवेदन दिनांक लगाया था. पिछले महीने 26 जुलाई को दिए गए इस आवेदन में पंकज ने आरोप लगाया था कि गया जिले सहित जागरण के बिहार के सभी चार प्रकाशन केंद्र में श्रम कानून के तहत मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को कई किस्म का लाभ नहीं दिया जा रहा है. यहां 90 प्रतिशत से अधिक पत्रकार एवं गैर पत्रकारों का प्राविडेंट फंड, स्वास्थ्य बीमा, सर्विस बुक सहित कई सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है. साथ ही माननीय सर्वोच्च्य न्यायालय द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड के तहत सेलरी, पद और ग्रेड की जो घोषणा की जानी थी, उसे भी नहीं नहीं किया गया है.

श्रम आयुक्त गोपाल मीणा ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए एक आदेश (3 / डी-96 / 2015 श्र० स० 4142 दिनांक 04-08-17) जारी कर दिया है. आदेश के माध्यम से कहा गया है कि दैनिक जागरण में कार्य के माहौल, श्रम नियमों और मजीठिया वेज बोर्ड आदि के अनुपालन की नियमानुकूल आवश्यक जांच की जाए तथा कृत कार्रवाई से संबंधित प्रतिवेदन विभाग को तुरंत उपलब्ध कराया जाए. ये आदेश मगध प्रमंडल के उप श्रमायुक्त को दिया गया है.

पंकज कुमार ने इसके पूर्व माननीय उच्चतम न्यायालय में अवमानना वाद दायर किया था. पंकज का गया से जम्मू विद्वेष के कारण तबादला कर दिया गया था. इस तबादला को स्टे करने तथा मजीठिया वेज बोर्ड की अनुसंशा के आलोक में वेतन सहित अन्य सुविधा देने की मांग पंकज ने की थी. माननीय उच्चतम न्यायालय ने सभी आवेदकों को श्रम आयुक्त के पास इंडस्ट्रियल डिस्पुट एक्ट के तहत आवेदन दायर करने का आदेश दिया है. पंकज कुमार द्वारा दायर अवमानना वाद की खबर भड़ास ने प्रमुखता से एक मई को प्रकाशित किया था. श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के ताजे आदेश का लाभ हजारों मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को मिलेगा जो दैनिक जागरण सहित अन्य प्रकाशन संस्थानों में काम कर रहे हैं.

गया से जाने माने वकील और पत्रकार मदन तिवारी की रिपोर्ट. संपर्क : 8797006594

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मैं आपको भारत के लोक सेवा प्रसारक ‘दूरदर्शन’ की हकीकत बताता हूं

दूरदर्शन केंद्र जयपुर में कैजुअल स्टाफ के हितों की रक्षार्थ… यूं तो हम सभी जानते हैं कि अधिकतर प्राइवेट कम्पनियों में कार्यरत मजदूरों का शोषण होता ही है परन्तु अगर सरकार के किसी संस्थान, विभाग में ऐसा हो तो बात खटकने की है। स्थिति बदतर तब होती है कि जब आर्थिक व सामाजिक  शोषण के साथ साथ संविधान विरूध्द कार्य शुरू हो जायें। मैं आपको भारत के लोक सेवा प्रसारक “दूरदर्शन” की हकीकत बताता हूं।

दूरदर्शन केंद्रों में कार्य करने के लिए एक तो व्यवस्था है प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों की। इसी तरह अभियांत्रिकी में भी अधिकारी व कर्मचारी कार्यरत हैं। इनके सहयोग या सीधे अर्थों में यू कहें कि इनका पूरा काम करने के लिए अनियमित कर्मचारियों की व्यवस्था भी है। अब अनियमित कर्मचारी को ऱखने की जो व्यवस्था है उसमें आते है आकस्मिक कलाकार जो कि असाइनमेंट आधार पर बुक किये जाते हैं। दूरदर्शन के जयपुर केन्द्र की हम बात करते हैं। दूरदर्शन केंद्र जयपुर में भी ऐसे ही अनियमित कर्मचारी, आकस्मिक कलाकार काम करते हैं।

उल्लेखनीय है कि प्राइवेट कम्पनियों में भी अगर कोई कैसे भी काम करता है तो उसकी हाजिरी, उपस्थिति जरूर होती है जबकि दूरदर्शन केंद्र जयपुर में इनकी कोई उपस्थिति नही की जाती और ना ही कोई हस्ताक्षर रहीं करने दिये जाते हैं। ये निम्न पदों पर निम्न काम करते हैं –

1. पोस्ट प्रोडक्शन असिसंटेंट – इन्हें किसी कार्यक्रम के पोस्ट प्रोडक्शन के लिये बुक किया जाता है परन्तु इनके कार्य की प्रकृति वीडियो एडिटर की है, इन्हें प्रति असाइनमेंट 1980 रुपये दिये जाते हैं तथा एक कलैण्डर माह में अधिकतम 7 असाइनमेंट्स दिए जाते हैं।

2. वीडियो असिसंटेंट – इन्हें किसी कार्यक्रम में रिकोर्डिंग के लिए कैमरा सहयोग के लिये बुक किया जाता है इनके कार्य की प्रकृति कैमरामेन  की है, इन्हें प्रति असाइनमेंट 3300 रुपये दिये जाते हैं तथा एक कलैण्डर माह में अधिकतम 7 असाइनमेंट्स दिए जाते हैं।

3. ग्राफिक असिस्टेंट  – इन्हें किसी कार्यक्रम के ग्राफिक पार्ट में सहयोग के लिये बुक किया जाता है लेकिन इनसे न्यूज व प्रोग्राम में स्क्रोल लिखने, नाम सूपर करने आदि कार्य करवाये जाते है, इन्हें प्रति असाइनमेंट 1650 रुपये दिये जाते हैं तथा एक कलैण्डर माह में अधिकतम 7 असाइनमेंट्स दिए जाते हैं।

4. रिसोर्स पर्सन – इन्हें किसी कार्यक्रम हेतु रिसोर्सेज जुटाने व सहयोग के लिए बुक किया जाता है परन्तु इनके कार्य की प्रकृति चपरासी के समान है, इन्हें प्रति असाइनमेंट 1650 रुपये दिये जाते हैं तथा एक कलैण्डर माह में अधिकतम 7 असाइनमेंट्स दिए जाते हैं।

अब बात करते हैं पोस्ट प्रोडक्शन असिस्टेंट पद की। यूं तो इन आकस्मिक कलाकारों को एक कलैण्डर माह में अधिकतम 7 असाइनमेंट्स दिए जाते हैं। माह मार्च 2015 तक इनके रिकोर्ड में कार्य करने की अवधि 7 दिन दिखाई जाती थी और माह अप्रैल 2015 से इनके कार्य करने की अवधि 7 असाइनमेंट दिखाई जाती है जबकि इन लोग से पूरे माह 30 दिन कार्य करवाया जाता है। यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि अवधि का मतलब समय में आना चाहिये। 7 असाइनमेंट से अवधि साबित ही नही होती है। अब अगर कोई  इसके विरुध्द कुछ भी बोलता है या माँग करता है तो चूंकि आकस्मिक नियुक्ति होने के कारण उसे हटा दिया जाता है।

अब एक तो उनसे सात दिन का पैसा देकर पूरे महीने काम लिया जाता है जो कि आर्थिक शोषण है। उसके पश्चात भी उन लोगों को चार महीने पाँच महीने तक पेमेंट नही दिया जाता यह कहकर कि बजट नही है। या अन्य कोई कारण बताकर जिससे कार्मिक दबाव में बने रहें। इस संदर्भ में दो लोगों ने आवाज उठाई और जयपुर केन्द्र का प्रतिनिधित्व करते हुए पीएमओ, मंत्री, महानिदेशालय को इस बारे में सबने मिलकर पत्र लिखा व दिल्ली में महानिदेशक, दूरदर्शन से मिलकर आये।

इससे जयपुर केंद्र के उच्चाधिकारी बौखलाकर उन्हें तरह तरह की धमकी देने लगे व दोनों को अकस्मात् निकाल दिया गया। तथा नवम्बर 2016 से फरवरी 2017 तक का उनका मानदेय भी नही दिया गया है। यह सब न्यायसंगत नहीं है तथा संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित आर्थिक न्याय व व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करने ( जो कि व्यक्ति के मूल अधिकारों में भी शामिल है) के प्रावधान को भी प्रभावित करता है। इसी क्रम में समान कार्य समान वेतन की अवधारणा भी प्रभावित हो रही है एवं इन सभी लोगों को विकट वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है।

उन दो लोगों के लिए जब बाकी के साथी खड़े हुए तो उन सभी से उच्चाधिकारियों ने जबरन नौकरी से हटाने की धमकी देते हुए एक पेपर पर यह लिखवा लिया गया कि हम यहां सीखने के लिए आते है और हमें दूरदर्शन केंद्र जयपुर में कार्य करते हुए कोई समस्या नही है पूर्व में लिखित पत्र भी झूठें हैं तथा हमें भ्रमित कर पत्र लिखवा लिया गया। इसके विरोध में व सच्चाई का साथ देने के लिए जब पोस्ट प्रोडक्शन असिस्टेंट्स ने पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए तो उन्हें नौकरी से हटा दिया गया।

उनका इस तरह से हटाना औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 सेक्शन 25 (F) व औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 सेक्शन 25 (G) के प्रावधान को भी प्रभावित करता है। आप सोच सकते हैं कि ये सरकारी विभाग भी कैसे काम करते हैं। क्या ये मज़दूर इस देश के लोग नहीं हैं? क्या मज़दूर कोई गलत माँग कर रहे हैं? आप गंभीरता से सोचेंगे तो पता चलेगा कि भारत का लोक सेवा प्रसारक “दूरदर्शन” जो कि लोक कलाकारों व लोक सेवा के लिये काम करने हेतु बना है अगर वह इसी तरह कार्य करता रहा तो उसका इस देश और यहाँ की गरीब जनता से कुछ भी लेना-देना नहीं है।  उसका  लोकहित में कार्य करना सिर्फ ढ़ोल पीटना है। वास्तव में वह गरीबों और मजदूरों के शोषण का एक केंद्र है। वर्तमान में वे असहाय आकस्मिक कलाकार पोस्ट प्रोडक्शन असिस्टेंट्स – आठ लोग बेरोजगारी के इस समय में दर दर की ठोकरें खाने पर विवश हैं।

गिरीश शास्त्री व समस्त पोस्ट प्रोडक्शन असिस्टेंट्स (कैजुअल स्टाफ)
दूरदर्शन केंद्र, जयपुर
मोबाइल- 9461858766
ईमेल- girishshastri1@gmail.com

मूल खबर…

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दैनिक जागरण ने मेरा पैसा नहीं दिया तो हाईकोर्ट जाऊंगा

पटना के बाढ़ अनुमंडल से दैनिक जागरण के पत्रकार सत्यनारायण चतुर्वेदी लिखते हैं-

मैं सत्यनारायण चतुर्वेदी दैनिक जागरण बिहार संस्करण के स्थापना व प्रकाशनकाल से बाढ़ अनुमण्डल से निष्ठा व ईमानदारी पूर्वक संवाद प्रेषण का कार्य करता रहा हूँ. नये सम्पादक जी के आने के कुछ ही महीने बाद वर्ष 2015 के अक्टूबर माह से अचानक मेरी खबरों के प्रकाशन पर रोक लगा दी गयी जो अब तक जारी है। इस बारे में मैंने रोक हटाने का निवेदन श्रीमान सम्पादक जी से किया, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

मेरा जून 2015 से अक्टूबर 2015 तक का पारिश्रमिक सहित सभी खर्च का भुगतान अब तक नहीं किया गया है। दैनिक जागरण के महाप्रबंधक श्रीमान आनन्द त्रिपाठी जी भी स्थापना काल से हमें अच्छी तरह से जानते हैं। नये सम्पादक जी के यहां आने से पहले श्रीमान महाप्रबंधक जी एवं पूर्व के सम्पादक जी हर माह मुफस्सिल सम्वाददाताओं के साथ बैठक करते थे। पर नए सम्पादक जी के आने के बाद कोई बैठक नहीं हुई। मेरी खबरों के प्रकाशन पर से तत्काल रोक नहीं हटाई गयी और सरकार द्बारा निर्धारित पारिश्रमिक की भुगतान नहीं किया गया तो बाध्य होकर वाजिब हक पाने के लिये उच्च न्यायालय, पटना से गुहार लगायेंगे। मेरे जैसे कई पत्रकार पीड़ित हैं।

Satya Narayan
stnarayan00@gmail.com

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रांची एक्सप्रेस अखबार में मीडियाकर्मियों का शोषण, स्टाफ चिंतिंत

रांची एक्सप्रेस का नया प्रबंधन अपने स्टाफ के साथ तानाशाही भरा रवैया अपना रहा है. यहां के स्टाफ को दो माह बाद सेलरी दिया जाना आम बात हो गयी है. दो माह बाद भी कुछ स्टाफ को सेलरी दी जाती है, कुछ को नहीं. शिकायत करने पर कोई सुनवाई नहीं होती है. स्टाफ को प्रबंधन द्वारा न तो कोई आईडी दिया गया है, न ही पीएफ की सुविधा. ऐसे में कई स्टाफ लेबर कोर्ट में जाने वाले हैं.

समय पर वेतन न मिलने के कारण स्टाफ के लिए अपना परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. कई अच्छे स्टाफ पिछले तीन माह का वेतन न मिलने के कारण प्रबंधन को जवाब देकर चले गये हैं. ऐसे में बाकी बचे लोग अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं. प्रबंधन उनसे तानाशाही भरा रवैया अपना कर काम ले रहा है, मगर सैलरी मांगने पर आग-बगूला हो जाता है. दूसरी तरफ प्रबंधन के लोग अखबार के प्रोपेगंडा के लिए बड़े-बड़े होटलों में प्रोग्राम कर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं. साथ ही प्रबंधन अपनी नाकामियों का ठीकरा संपादकीय स्टाफ पर फोड़ रहा है, जबकि इस अखबार के संपादकीय विभाग में ज्यादातर मेहनती व अनुभवी लोग हैं जो विभिन्न प्रतिष्ठित अखबारों में काम कर चुके हैं.

गौरतलब है कि रांची एक्सप्रेस अखबार झारखंड का काफी पुराना समाचारपत्र है. एक समय था जब इस प्रदेश में इस अखबार की तूती बोलती थी. इस अखबार को सरकार के आईपीआरडी से अन्य अखबारों की तरह ऐड मिलता है. मगर स्टाफ को वेतन देने में यह अखबार कंजूसी कर रहा है.  वस्तुस्थिति यह है कि जून माह बीतने के बावजूद ज्यादातर स्टाफ को अप्रैल माह का वेतन भी नहीं नसीब नहीं हुआ है.

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‘चक दे’ में काम कराते हैं लेकिन सेलरी नहीं देते

मेरा नाम रणजीत कौर है और मैंने ‘चक दे’ में 8 जून 2016 को ज्वाइन किया था, बतौर न्यूज़ एंकर इन पंजाबी. स्टार्टिंग में बड़ी बड़ी बातें की गयी थीं. पर था कुछ नहीं. नाईट ड्यूटी थी और सिक्योरिटी के नाम पर कुछ नहीं था. एक छोटी सी बिल्डिंग में इसका ऑफिस है, फरीदाबाद में. वहीं कॉल सेंटर चलते हैं. वहीं न्यूज़ चैनल भी है. इस चैनल का मालिक एनआरआई है.

यहां गणेश नायर है जो सुब कुछ देखते हैं. नाईट में जो लड़कियां रहती हैं उनकी सेफ्टी के लिये कुछ भी नहीं है. गणेश नायर अपने नीचे काम करने वालों का शोषण करते हैं. कहने को तो ये चैनल बताते हैं लेकिन इनके पास कोई लाइसेंस नहीं है चैनल चलाने का. ये दरअसल वेब न्यूज़ चैनल चलाते हैं. यहां पर लड़कियों को बिना कारण परेशान किया जाता है. जिसे भी इम्प्लॉयी को रखा जाता है उसे एक या दो महीने काम कराके बिना सेलरी के ही वापस भेज दिया जाता है.

मैंने नाईट शिफ्ट की है जिससे मेरी हेल्थ तो खराब हुई ही, साथ में मैं फाइनेंशली भी काफी वीक हुई. गणेश नायर फालतू की बातें करता था. वह लुभावनी बातें करके शोषण करने के मौके ढूंढत था. मेरे अलावा बहुत से लोग हैं जिनकी सेलरी उसने नहीं दी. साथ में मेंटली परेशान किया वह अलग से. बात मेरे लिए पैसों का नहीं है. ऐसे काम बंद होने चाहिए जहां काम करने वालों का हर तरह से शोषण किया जाता है. मैं नहीं चाहती मेरे बाद कोई दूसरा बंदा इस चैनल के झांसे में फंसे और अपना वक्त, पैसा बर्बाद करे.

रणजीत कौर
jesikajesus84@gmail.com

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छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की आड़ में कैसा खेल, बिना वेतन जिलों में काम कर रहे पत्रकार

चैनल की माइक आईडी की लग रही बोली, वसूली और धमकी का चल रहा खेल, अनशन-शिकायतों का लगा अंबार, सोशल नेटवर्क का बेजोड़ इस्तेमाल, पीएमओ तक हो रही शिकायत

2016 का साल बीत चला। अगर आपका यह साल खराब बीता हो। तो आप नए साल की बेहतरी के लिए कई तरीकों का इजाद करेंगे। इन तरीकों में चैनल की माइक आईडी सबसे बेहतर और कारगर उपाय है। आप माइक आईडी लीजिए और आप हो गए पावरफुल। चाहे आपको पत्रकारिता के मापदंड मालूम हो या नहीं। इस माइक आईडी के साथ वाट्सग्रुप, फेसबुक, ट्वीटर जैसे सोशल नेटवर्क आपके पास हथियार हैं। इन सबके बावजूद आपको और पावरफुल होना है तो आप सामाजिक कार्यकर्ता, भ्रस्टाचार उन्मूलन संगठन, मानवाधिकार संगठन से अपना नाता जोड़ लें। समाज के लिए आप कुछ करें या ना करें। लेकिन आप अपने एशो-आराम के लिए तमाम वो उपाय करेंगे जिससे आपकी जिंदगी लग्जरी हो जाए। कुछ इसी तरह का रास्ता इन दिनों छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की आर में चल रहा है। कोई आवाज उठाता है। तो उसको मिलती है धमकी। रूसवाई। अपमान। मानसिक प्रताड़ना। शिकायतों का अंबार। ऊँची पहुँच की धौंस। और क्या न क्या।

ऐसे बहुत सारे मामलों का अंबार है। नक्सल प्रभावित इस राज्य में। ठीक है। आप मुद्दों को उठाओ, उसकी गहराई तक पहुँचो। जो माध्यम है। उन माध्यमों के जरिए पीड़ितों को हक दिलाओ न कि अपनी रोटी सेंको। पैसा बनाओ। लग्जरी जीवन-यापन करो। कुल मिलाकर आप जिस पर दलाली का आरोप लगाते नजर आते हो। वो खुद अपना गिरबां देख लें। वो क्या कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला का खरसिया का क्षेत्र। जहां 2015 में एक वैष्णव परिवार काफी सुर्खियों में रहा। एफआईआर हुआ। जेल की सलाखों के बीच पहुँचा परिवार। कई सारी अफवाहें भी आई। इन अफवाहों में जून 2015 में एक रायगढ़ जिला जेल में खरसिया के वैष्णव दंपत्ति के अनशन की खबर भी थी। जो सिर्फ और सिर्फ अफवाह निकली थी। अजाक पुलिस ने एक पुराने मामले मेंं खरसिया निवासी भूपेंद्र किशोर वैष्णव एवं उसकी पत्नी आरती वैष्णव को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के पूर्व वैष्णव दंपत्ति खरसिया एसडीएम आफिस के बाहर आमरण अनशन पर बैठे हुए थे। ऐसे में, उनकी गिरफ्तार व जेल दाखिले की पुलिसिया कार्रवाई के बाद भी जेल अंदर उनके अनशन की खबर फैलाई जा रही थी। जिसे जेल प्रशासन ने खारिज किया था।

2015 का साल जैसे-तैसे इस परिवार के लिए बीता। 2016 की शुरूआत में श्री मां प्रकाशन कंपनी के तहत साधना न्यूज के लिए आरती वैष्णव ने 25 हजार रूपए चेक एवं 25 हजार चेक के जरिए अपनी नियुक्ति पत्र ले ली। जिस व्यक्ति ने इस नियुक्ति की मध्यस्थता की। उसने 10 हजार रूपए का कमीशन भी लिया। आरती वैष्णव ने साल में चैनल के लिए विज्ञापन भी किया। एक स्कूल में धमकी-चमकी का मामला भी आया। ऐसी शिकायतों की अंबार लग गई। लेकिन चूंकि चैनल दो कंपनियों की आपसी द्वंद में फंसा था। ऐसे में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले पर किसी की नजर नहीं गई। श्री मां प्रकाशन से साधना न्यूज का एग्रीमेंट खत्म हुआ। लेकिन संस्थान ने पिछली कंपनी द्वारा नियुक्त किसी भी व्यक्ति को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया।

आरती वैष्णव साधना न्यूज रायगढ़ के लिए नियुक्त थी। लेकिन वो अपने पति को संस्थान से जुड़ने के लिए दबाव बनाती रही। जिस पर प्रबंधन ने कोई ध्यान नहीं दिया। इसी बीच खरसिया के कुनकुनी जमीन घोटाला सुर्खियों में आया। इसको लेकर आरती वैष्णव ने संस्थान प्रमुख को खबरों को हो रही अपडेट में कोई जानकारी नहीं दी। इसके अलावाा आरती वैष्णव तो संस्थान के लिए नियुक्त थी। लेकिन काम करते नजर आते थे भूपेन्द्र वैष्णव। कुनकुनी जमीन घोटाला में शिकायतों का दौर शुरू हो चुका। जो गलत है। वो गलत है। पीएमओ तक यह मामला पहुँचा है। आरती वैष्णव से बात करने की कोशिश की तो पहले उन्होंने फोन नहीं उठाया। और बाद में जिस फोन से रिकार्डिंग होती है, उससे फोन कर स्टेट हेड पर ही उलटा आरोप जड़ दिया गया। फिलहाल इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। पुलिस में शिकायत हो चुकी है। आरती वैष्णव सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मानवाधिकार एवं भ्रष्टाचार उन्मूलन संगठन में छत्तीसगढ़ प्रदेश महासचिव नियुक्त हैं। राष्ट्रीय नागरिक सुरक्षा मंच मानवाधिकार की जन सूचना अधिकारी भी है। इस लेख के साथ ऑडियो भी है। कुछ वॉटसअप क्लिप भी हैं। इस लेख की अगली किस्त का इंतजार कीजिए जिसमें कुछ अहम कड़ियां और भी सामने आने वाली हैं।

लेखक आरके गाँधी साधना न्यूज में बतौर स्टेट हेड नियुक्त हैं। संपर्क : gandhirajeevrohan@gmail.com

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उफ्फ… दैनिक जागरण अलीगढ़ और ईनाडु टीवी हैदराबाद में हुई इन दो मौतों पर पूरी तरह लीपापोती कर दी गई

अलीगढ दैनिक जागरण के मशीन विभाग में कार्यरत एक सदस्य की पिछले दिनों मशीन की चपेट में आकर मृत्यु हो गई. न थाने ने रिपोर्ट लिखा और न ही डीएम ने कुछ कहा. शायद सब के सब जागरण के प्रभाव में हैं. यह वर्कर 2 दिन पहले वहां तैनात किया गया था. उसका भाई वहां पहले से कार्यरत था. पंचनामा जबरन कर लाश को उठवा दिया गया. बताया जाता है कि अलीगढ़ दैनिक जागरण में शाफ्ट टूट कर सिर में लगने से मौत हुई.

यह कर्मचारी दो दिनों से ड्यूटी पर आ रहा था और उसका ट्रायल लिया जा रहा था. दैनिक जागरण प्रबंधन ने इसे रोड एक्सीडेंट दिखा दिया. पीड़ित को कहीं से कोई मदद नहीं मिली. कर्मचारी का नाम केशव प्रजापति बताया जाता है. घटना 24 सितंबर की रात ढाई बजे की है. कर्मचारी का मौके पर ही मौत हो गई. पुलिस को कई बार बुलाया गया लेकिन पुलिस नहीं आई. पंचनामा जागरण प्रबंधन के निर्देश के अनुसार भरा गया.

उधर, पत्रकार अमित सिंह चौहान (जी न्यूज में कार्यरत) के भाई यशपाल सिंह जो कि ईनाडु टीवी डिजिटल के हिंदी डेस्क पर कंटेंट एडिटर के पद पर कार्यरत थे, का 19 सितंबर 2016 को निधन हो गया.  डॉक्टर के अनुसार यशपाल सिंह का निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ. यशपाल सिंह को उनके सहकर्मियों द्वारा समय से हैदराबाद के मशहूर ग्लोबल अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था.  लेकिन अस्पताल की तरफ से एक लाख रुपए सिक्योरिटी के रूप में जमा करने को कहा गया तो ऐसा हो न सका क्योंकि किसी सहकर्मी के पास पैसा नहीं था. हालांकि ईलाज पर जो खर्च हो रहा था, इसके लिए पैसे लगातार जमा किए जा रहे थे. लोगों ने आनन फानन में ईनाडु दफ्तर को पूरी बात से अवगत कराया. बावजूद इसके ऑफिस से कोई त्वरित कार्रवाई नहीं हुई. यशपाल सिंह के फैमिली मेंबर से बात होने के बाद और पहुंचकर पूरे पैसे चुकाने के आश्वासन के बाद भी ऑफिस ने पैसे जमा नहीं किए. इससे इलाज के आभाव में 30 वर्षीय यशपाल सिंह का उक्त तारीख को रात दस बजे निधन हो गया.

यशपाल सिंह के बड़े भाई पत्रकार अमित फ्लाइट से जब तक हैदराबाद पहुंचते तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अमित सिंह ने भाई के निधन के बाद लापरवाही के कारण हत्या का केस दर्ज कराया है. इसकी स्थानीय एलबी नगर पुलिस जांच कर रही है. मामला बडे मीडिया हाउस से जुड़े होने के कारण पुलिस पर काफी दबाव है. अस्पताल प्रशासन और ईनाडु ग्रुप मामले को एक दूसरे पर डालकर पल्ला झाड़ रहे हैं. इस मामले की रामोजी फिल्मसिटी में खूब चर्चा है. खबर यह भी है कि बीमारी के बाद भी यशपाल सिंह को काम से छुट्टी नही मिली थी. इसके कारण खराब तबीयत में उनने निधन से एक दिन पहले तक आफिस में काम किया था. यशपाल सिंह इसके पहले दिल्ली में एपीएन न्यूज व खबर भारती में काम कर चुके हैं. यशपाल यूपी के बहराइच जिले के रहने वाले थे. ईनाडु प्रबंधन ने मामला दबाने की लाख कोशिश की लेकिन पत्रकारों में यह प्रकरण चर्चा का विषय बना हुआ है.

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