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नेटफ़्लिक्स पर आई फ़िल्म ‘न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड’ देखने लायक़ है!

फ़िरोज़ खान-

जंग का सबसे ज्यादा फायदा उन लोगों को होता है, जो बंदूक खरीदते हैं, जंग का बिगुल बजाते हैं और फिर अपने सुरक्षित बंकर में छिप जाते हैं। जंग का सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों को होता है, जिनके हाथों में बंदूक और दिमागों में झूठा राष्ट्रवाद होता है और जिनकी गोलियां एक रोज खत्म हो जाती हैं। जो खेत जोतते हैं, दफ्तर जाते हैं, नुकसान उनका होता है। एक लंबी जंग के बाद फौज का अफसर भी बेकार और बेरोजगार हो जाता है।

जंग दुनिया और दिलों के खंडहर को थोड़ा और बढ़ा देती है। बिल्कुल वैसे ही, जैसे हम अमेरिकन फिल्मकार पॉल ग्रीनग्रास की फिल्म ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्ड’ में देखते हैं। यह फ़िल्म अमेरिकन उपन्यासकार और कवयित्री Paulette Jiles के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। जिन लोगों ने टॉम हैंक्स की ‘फॉरेस्ट गम्प’ और ‘कास्ट अवे’ देखी है, वे उनके लिए भी यह फिल्म देख सकते हैं। यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर दो रोज पहले ही रिलीज हुई है।

इस फिल्म में एक भी खूबसूरत दृश्य नहीं है। न कोई हवा का झौंका है, न गेहूं के खेत, न हरी लहलहाती घास, न फलों से लदे पेड़, न मन भिगाने वाली बारिश, न नदी कोई, न समंदर, न हंसता हुआ कोई बच्चा है, न नाचती हुई कोई औरत, ठहाके मारता कोई पुरुष भी नहीं है। यह फिल्म न खत्म होने वाला शोकगीत है। जंग के बाद जमीन के कुछ टुकड़ों पर रह गए खून के धब्बे हैं, खंडहर हैं, हंसने की कोशिश कर रहे रोते हुए लोग हैं, 12 साल की लड़की के लिए हवस से भरे हुए भेड़िए हैं। हर तरफ खंडहर हैं, गुबार हैं। अब वैसे फासिस्ट नहीं हैं, तो मजदूरों के बीच से ही, जो थोड़े कुलीन हैं, फासिस्ट बन गए हैं।

मजे की बात यह कि इस सबके बीच भी एक उम्मीद है, एक ख्वाब है, एक जिंदगी है। समय अमेरिकन सिविल वार के खत्म हो जाने के ठीक बाद का है। अब्राहम लिंकन के ठीक बाद का समय। जब अमेरिका बदहाल हो चुका है और बीमारियां फैली हुई हैं। इस बीच फौज का एक कैप्टन जैफरसन कायले किड (टॉम हैंक्स) फिक्र-ए-रोजगार में घर से निकल जाता है। अपनी बीवी को घर में छोड़े हुए उसे चार साल हो गए हैं। एक अद्भुत विडंबना है कि एक समाज के लिए अखबार की खबरें मनोरंजन का माध्यम बनती हैं। उस समाज की कल्पना कीजिए, जहां कहानियां खत्म हो जाएं और अपराध कथाएं मनोरंजन करें। कैप्टन किड गांव-गांव घूमकर लोगों को अखबारों में छपी खबरें सुनाता है। बाकायदा टिकट खरीदकर लोग खबरें सुनने आते हैं। लेकिन कहानी तो अभी शुरू नहीं हुई। मैं तो आपको कहानी के बीच की जो खाली जगहें रह गई थीं, अब तक वही बता रहा था। आधी कहानी वही है, जो सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाई जान’ की है।

एक गांव से समाचार सुनाकर लौट रहे कैप्टन किड को जंगल में एक लड़की मिलती है। डरी, सहमी, जंगली और आक्रामक लड़की। जो इंडियन टेरिटरी की है। इंडियन टेरिटरी से मतलब अमेरिका के मूल निवासी, जिनका सभ्य कहे जाने वाले अमेरिकियों से लंबा संघर्ष रहा। अमेरिकन सिविल वॉर से करीब 30 साल पहले अमेरिका एक कानून पारित करता है ‘इंडियन रिमूवल ऐक्ट’। यह कानून अमेरिकी मूल निवासी इंडियनों की जमीनों को उसी तरह खाली कराने का काम करता है, जिस तरह भारत में आदिवासी इलाकों में किए जाने की सतत कोशिश होती रहती है और जिसके चलते नक्सलवाद जैसा खूनी संघर्ष देखने को मिलता है।

बहरहाल, कैप्टन किड उस लड़की की जुबान नहीं समझते। वे उसे उसके गांव-घर पहुंचा देना चाहते हैं। इसी सफर की एक कथा है, लेकिन इसकी उपकथा आपको हिला देगी। उस उपकथा को जानने के लिए यह फिल्म देख डालिए। फिल्म में कोई इमोशनल सीन फिल्म के दौरान नहीं दिखते। लेकिन फिल्म खत्म हो जाने के बाद बार-बार हूक उठती रही और लगा कि जैसे अगर जोर-जोर से न रोया गया तो सीने की बर्फ पिघलेगी नहीं।

एक आखिरी बात यह कि फिल्म को गहराई से समझना है तो फिल्म देखने से पहले अमेरिकन सिविल वॉर के इतिहास को थोड़ा-बहुत समझ लें, जान लें। अगर नहीं जानेंगे तो फिल्म में उस 12 साल की लड़की की यात्रा को ठीक से नहीं समझ पाएंगे, जिसे कैप्टन किड घर पहुंचाना चाह रहे हैं। इसी सफर के बीच एक जगह कैप्टन खाना खाने रुकते हैं और वे लड़की को चम्मच देते हैं कि सूप इससे पियो और वह लड़की चम्मच फेंककर पूरे हाथ को सनाते हुए सूप खाती है।

दरअसल अमेरिकी क्रांति के ठीक बाद अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने अपने सुधार कार्यक्रमों के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिकता देने के लिए इंडियन लोगों को सभ्य बनाए जाने की बात कही थी। फिल्म में इस लड़की का इस तरह सूप खाना उसी इतिहास की एक याद है।

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