ख़ूब मीठी भोजपुरी बोलने वाले और खांटी बलियाटिक हरिवंश जी को हार्दिक बधाई!

Dayanand Pandey : ख़ूब पढ़ाकू , भाषा के धनी , सार्वजनिक जीवन में शुचिता और शालीनता के लिए जाने जाने वाले मेरे मित्र हरिवंश जी आज राज्यसभा के उप सभापति चुन लिए गए हैं। मेरे लिए यह हर्ष का विषय है। यह बताते हुए ख़ुशी होती है कि हरिवंश जी मेरे उपन्यासों, कहानियों के भी बहुत बड़े प्रशंसक हैं।

जब भी कुछ पढ़ते हैं, फ़ोन कर के उस पर लंबा बतियाते हैं। ख़ास कर मेरे उपन्यास ‘वे जो हारे हुए’ तथा ‘बांसगांव की मुनमुन’ के वह रसिया हैं। एक-एक पात्र का नाम ले-ले कर बतियाते हैं। अपने भाषणों में मेरे उपन्यासों का ज़िक्र करते रहते हैं। एक बार किसी कार्यक्रम में जब वह गोरखपुर गए तो अपने भाषण में कहा कि, गोरखपुर को दयानंद पांडेय के एक उपन्यास वे जो हारे हुए के मार्फ़त भी जानता हूं।

कवि मित्र Devendra Arya ने यह सुन कर, बहुत ख़ुश हो कर, फ़ोन कर के यह बात उसी दिन मुझे बताई थी। Nirala Bidesia पहले भी मुझे ऐसा बताते रहे थे। अभी पंद्रह दिन पहले ही उन का फ़ोन आया था। दिल्ली अपने घर पर बुला रहे थे। दो दिन पहले जब इस पद खातिर उन के नाम की चर्चा चली तो उन की व्यस्तता को देखते हुए मैंने उन्हें एस एम एस लिख कर बधाई भेजी। रात में उन का धन्यवाद का संदेश आया।

हरिवंश

भारतीय राजनीति में अब हरिवंश जी जैसे पढ़े-लिखे लोगों की बहुत ज़रूरत है। नरेंद्र मोदी ने राज्य सभा में जिस तरह उन के चार दशक के पत्रकार जीवन की यात्रा का इतने विस्तार से बखान किया है, वह आसान नहीं है।

धर्मयुग, रविवार से प्रभात ख़बर तक की उन की यात्रा बताई है। बी एच यू से पढ़े-लिखे जयप्रकाश नारायण के गांव के निवासी, कभी चंद्रशेखर के अतिरिक्त सूचना सलाहकार रहे हरिवंश जी अपनी इस नई पारी में भी हम सभी का मन मोहेंगे और नए-नए प्रतिमान गढ़ेंगे। हरिवंश जी राज्य सभा की गरिमा को और बढ़ाएंगे। राज्य सभा के अपने पहले ही कार्यकाल में उप सभापति बन जाना भी एक बड़ी उपलब्धि है। ख़ूब मीठी भोजपुरी बोलने वाले और खांटी बलियाटिक हरिवंश जी को हार्दिक बधाई!

Ravi Prakash : हम सब बहुत ख़ुश हैं सर। हार्दिक बधाई । राज्यसभा के उपसभापति के तौर पर हरिवंश जी का निर्वाचन हमारे लिए गौरव का अवसर है। कैसे भूल सकता हूँ कि जब आपने मुझे रेज़िडेंट एडिटर बनाया, तब मेरी उम्र सिर्फ़ 29 साल थी। उस वक़्त मैं प्रभात ख़बर में सबसे कम उम्र का संपादक था। यह सब आपके स्नेह का परिणाम था। आज आप भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक महत्वपूर्ण पद पर आसीन हुए हैं, तो ज़ाहिर है हमें इसका अभिमान है। आपको पुन: बधाई और समस्त शुभकामनाएँ।

देखिए हरिवंश जी से संबंधित वीडियो…

Rajendra Tiwari : हरिवंश जी से अपना परिचय बहुत पुराना नहीं है। २००९ में मैं झारखंड में हिंदुस्तान का संपादक बनकर रांची आया तो एक बार फोन पर उनसे बात हुई। उसके बाद २०१० में वाईसी अग्रवाल की बेटी की शादी में जमशेदपुर में पहली बार मुलाकात हुई। २०१० में हिंदुस्तान छोड़ने के बाद एक दिन हरिवंश जी का फोन आया। शायद मई का महीना था। हरिवंश जी ने गपशप के लिए जिमखाना क्लब आने को कहा। वहां पर करीब एक घंटे बात हुई और मुलाकात का सिलसिला शुरू हुआ। अक्टूबर में प्रभात खबर में आ गया और वहीं हरिवंश जी को करीब से जानने का मौका मिला। धीरे-धीरे उनसे आत्मीयता बनती गई। २०१४ में जब हरिवंश जी राज्यसभा के लिए चुने गये, तभी हम लोगों को यह लगने लगा था कि वह राजनीति में भी बहुत आगे जाएंगे। आज वह राज्यसभा के उपसभापति चुने गये लेकिन यह एक पड़ाव भर है उनके लिए…और बड़ी मंजिलें उनके इंतजार में होंगी।

Pushya Mitra : पुराने बॉस के संस्मरण… हरिवंश जी राज्यसभा उपसभापति बन गए हैं… पहले ही लिखा है कि यह हमारे लिये व्यक्तिगत खुशी का अवसर है. इस मौके पर मैं उन सात वर्षों को याद करना चाहता हूँ जिसमें उनसे मेरा संपर्क रहा. कुछ बातें साझा करना चाहूंगा, ताकि आप इस नए राजनेता और पुराने संपादक के व्यक्तित्व से अवगत हो सकें.

2010 में मैं सिर्फ इसलिए प्रभात खबर में काम करने आया था कि हरिवंश जी के साथ काम करते हुए काम सीखने का मौका मिलेगा. और मेरे दिमाग में इस बाद को भरने वाले अविनाश दास थे, जो आज जाने माने फिल्मकार हैं. मगर दुर्भाग्य से जब मैं यहां आया तो हरिवंश जी दिनानुदिन की पत्रकारिता से दूर होने का मन बना चुके थे और अपने जूनियर्स को अखबार की बागडोर सौंपने लगे थे. इसलिए जिस मंसूबे के साथ यहां आया था, वह आंशिक रूप से ही पूरा हुआ. कभी-कभार उनसे मुलाकात होती थी. मगर जो काम करता था, वह उनके विचारों में पगा था, उसका लाभ मिला.

इस दौरान मैंने बहुत करीब से देखा कि दैनिक भास्कर जैसे बड़े अखबार की रांची में लांचिंग उनकी वजह से फेल हो गयी और वे जब तक रहे देश के इस सबसे एग्रेसिव ग्रुप को झारखंड में जमने नहीं दिया. और दिलचस्प बात यह है कि उन्हीं दिनों दैनिक भास्कर के मालिक संभवतः सुधीर अग्रवाल रांची आये हुए थे, हरिवंश जी ने उन्हें प्रभात खबर बुला लिया और अपने साथियों के सामने उनका एक व्याख्यान भी करा दिया. हालांकि इस व्याख्यान में मैं मौजूद नहीं था.

फिर मैंने देखा कि वे कैसे बिहार के मुजफ्फरपुर और भागलपुर में यूनिट की शुरुआत करवा रहे हैं. भागलपुर लॉंचिग के वक्त राजेंद्र तिवारी सर प्रभात खबर आ चुके थे और भागलपुर में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका थी.

इसके बाद प्रभात खबर की जो दो पत्रिकाएं शुरू हुईं, वह उनके ही विचारों की प्रतिध्वनि थी. फरवरी, 2011 में पंचायतनामा साप्ताहिक अखबार शुरू हुआ. उस जमाने में जब आइनेक्स्ट और सिटी लाइव जैसे सप्लीमेंट लॉंच हो रहे थे, एक गांव केंद्रित, पंचायतीराज व्यवस्था पर फोकस पत्र को शुरू करना उनके जैसा व्यक्ति ही सोच सकता था. मेरा सौभाग्य था कि उस लॉंचिंग में भी मैं था और दो साल उस पत्रिका में काम करते हुए गुजारा, जो मेरे पत्रकारीय जीवन के सबसे यादगार दिन थे. गांव-गांव घूमकर अच्छी खबरें लाना, सरकारी योजनाओं की बारीकियां हासिल करना, मुखिया, सरपंच से लेकर जिला परिषद अध्यक्ष तक बना राब्ता. सबकुछ अद्भुत था.

फिर एक नयी पत्रिका शुरू हुई, पॉलिटिक्स. यह भी यूनिक थी. राजनीति की बातें, मगर सिद्धांतों और जमीनी मसलों के साथ. कोई राजनीतिक मसाला नहीं. 25 अंक निकले, सब एक पर एक. मुझे वहां भी काम करने का मौका मिला. बदकिस्मती से वह पत्रिका बीच में ही बंद हो गयी. मगर वह भी उनके ही विचारों का आइना थी. उसके बाद तो वे अखबार से ही दूर होते चले गये. बमुश्किल दो-तीन लोगों से उनकी नियमित बात होती थी.

बहरहाल एक प्रसंग मुझे हमेशा याद रह जाने वाला था. पंचायतनामा के दो साल पूरे हो रहे थे. आयोजन का विचार था. इसकी रूपरेखा बनाने का जिम्मा मुझे ही मिला था. संपादक संजय भैया ने कहा, जाइये, इसे हरिवंश जी को दिखा दीजिये. मैं रूपरेखा लेकर उनके केबिन में पहुंच गया. उन्होंने काफी समय देकर एक-एक बिंदु पर बातचीत की और अंत में पूछा, मुझे नहीं बुलाओगे? मैं शर्मिंदा हो गया. कहा, जरूर सर. और एक सेशन में उनका नाम तय हो गया.

इस आयोजन के तीन-चार दिन बचे थे कि अचानक उनके उस वक्त के पीए पंकज पाठक ने आकर कहा कि सर ने आपके लिए संदेश भेजा है. मैंने पूछा क्या, तो उन्होंने कहा कि सर ने कहा है कि वे पंचायतनामा के आयोजन में आ नहीं पायेंगे. उन्होंने क्षमा मांगते हुए कहा है कि कोई वैकल्पिक व्यवस्था कर लें. पता चला कि उनके कोई बहुत नजदीकी रिश्तेदार अस्पताल में भरती हैं, वे काफी गंभीर हैं. मुझे हैरत हुई कि इस तनावपूर्ण माहौल में भी उन्हें याद रहा कि उन्होंने अपने ही संस्थान के एक अदना से पत्रकार को समय दे रखा है. उसे समय से बताना जरूरी है ताकि वह वैकल्पिक व्यवस्था कर सके.

पिछले सात सालों में मैंने यही सीखा और समझा कि यह आदमी काफी व्यवस्थित और अनुशासनप्रिय है. इनकी 25 साल पुरानी डायरी भी सुरक्षित है और एक-एक दिन का कार्यक्रम तय रहता है, ऐसे कई किस्से प्रभात खबर के दफ्तर में प्रचलित हैं. अगर घाटशिला के किसी दूर दराज के गांव का कोई आदिवासी युवक भी इनसे मिलने प्रभात खबर के दफ्तर आता तो वे जरूर मिलते और पूरा वक्त देते. पिछले साल मैंने जब इन्हें अपनी पहली पुस्तक रेडियो कोसी की प्रति भिजवायी तो पते पर पहुंचते ही इनका फोन आया कि किताब मिल गयी है और पढ़कर बताऊंगा.

मेरे जैसा लापरवाह और अनुशासनहीन व्यक्ति इनके इन्हीं गुणों से प्रभावित रहता है और इनका सम्मान करता है. इनका सम्मान इस वजह से भी है कि इन्होंने प्रभात खबर में ऐसा कल्चर बनाया है कि एक अदना सा सब एडिटर भी बड़े संपादकों से बहस कर सकता है. अपनी स्वतंत्र राय रख सकता है. बाकी कमियों की बात अलग है, उसका दिन कोई और होगा. और वे तो बार-बार लोगों से पूछते ही रहते हैं कि बताओ मुझमें क्या कमी है. लोग मेरे बारे में क्या राय रखते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय, रवि प्रकाश, राजेंद्र तिवारी और पुष्य मित्र की एफबी वॉल से.

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