एम्बेसडर कार से हिंदी विभाग में पढ़ने आने वाली बालिका से कैसे हुई हेमंत शर्मा की शादी, सुनिए उन्हीं की जुबानी

Hemant Sharma-

कल हमारा दाम्पत्य जीवन ३१ बरस का हो गया। महामारी, अवसादी माहौल और बहुत सारे अपनो के खोने की वजह से हमने कोई आयोजन नहीं किया। फिर भी ढेर सारे लोगों ने अपनी शुभकामनाएँ भेजी। उन सबका आभार। गए साल शादी की सालगिरह पर जो लिखा था उसकी पुनरावृत्ति।

‘असाध्य’ वीणा

आज हमारी शादी के मुसलसल तीस बरस हो गए। हालाँकि उससे पहले के आठ बरस हमारे उनके लप-झप के भी जोडे तो कुल साढ़े सत्रह बरस ही मेरे बिना उनकी ज़िन्दगी के खाते में हैं। इतने लम्बे समय तक मुझे झेलने वाली कोई असाधारण व्यक्तित्व की ही स्वामिनी होगी ।वीना के कानूनन बालिग होने के 6 महीने पहले ही मैं उन्हें मिल गया था। हालांकि मेरा बचपन कुछ लंबा चला था। जीवन से लौंडपन जाने का नाम ही नहीं ले रहा था। बहरहाल शादी के बाद का यह लंबा अरसा ऐसा बीता कि पीछे देखो तो लगता है कि सब कल की बात हो। पर इश्क की यह दास्तां दिलचस्प है। मोहब्बत की इंतहा इश्क होती है। आज लोग प्रेम मोहब्बत से नहीं इश्क से परेशान हैं। दिल-जिगर-जिस्म-जान और ना जाने ऐसे कितने शब्द हैं जिनके बिना हमारे समाज में प्रेम कहानियां पूरी नहीं होतीं। पर अपनी कहानी भेजा-अकल-विवेक-बौद्धिक विमर्श-बहस मुबाहिसा और फिर झगड़े के इर्द-गिर्द ही रही। रस-गंध-स्पर्श के साथ ही हमारे अफसाने में प्रेम और आत्मीयता के क्षण तो मिलेंगे पर वो स्थाई भाव नहीं हैं। ज्यादा देर मोहब्बत नहीं रहती। 3-4 घंटे में एक बहस लाजमी है। सालों पहले जैसे थे आज भी वैसे हैं। हां खुद को एक दूसरे की आदतों के अनुकूल बना लेने से समस्याएं थोड़ी कम हुई हैं।

शायद दूसरे की आदत में खुद को ढालना ही दांपत्य की सफलता की पहली सीढ़ी है पर अभी यह मामला कितना अनुकूल बना है, ये बात आप इसी से समझ सकते हैं कि हेमंत की कटकटाती रात में भी उन्हें पंखा चाहिए। जबकि हेमंत में हेमंत के दांत पंखे से कटकटाते हैं। अक्सर हमें दूसरे कमरे में सोना पड़ता है। इस सबके बावजूद खुशनुमा पलों, मतभेदों, त्रासदियों को हमने साथ जिया है। अगर यह साथ होना नहीं है तो मुझे नहीं पता साथ होना क्या होता है? प्रभाष जी कहते थे शादी अंधा कुआं है। आंख मूंदकर इसमें छलांग लगानी चाहिए। कुएं के अंदर जो भी है, उसे आपको अपने अनुकूल बनाना होगा। पर इस अनुकूलता का निर्माण मेरे लिए कैलाश मानसरोवर की यात्रा जैसा था। दरअसल हम दोनों के वर्गीय चरित्र में फर्क था। मैं एक मास्टर का साइकिल पर चलने वाला बेटा यानी सर्वहारा का प्रतिनिधि और वह उस बुर्जुआ की प्रतिनिधि जिनकी एम्बेसडर कार विश्वविद्यालय में मेरी माली हालात पर धुआं उड़ाती गुजरती थी। आप मेरी हिम्मत की दाद दे सकते हैं कि साइकिल और एम्बेसडर कार के असमान वर्गीय चरित्र को मैंने इश्क़ के जरिए कैसे तोड़ा? इस वर्गीय चरित्र की ही देन है कि मेरी और वीणा की उल्टी आदतें हैं। अब तो थक हारकर मैं उन्हें सुबह उठने को कहता भी नहीं। उनका सूरज दस बजे के आसपास उगता है। मेरे देर तक पढ़ने और सुबह सुबह जल्दी उठने पर अब उन्हें भी एतराज नहीं रहा। एक दूसरे की आदतों का ऐसा राजनैतिक समाधान ही दांपत्य का आधार है। इससे उपजती आजादी ही हमारे दांपत्य जीवन को पटरी पर रखती है।

शायद इसीलिए अपनी परंपरा में जन्मपत्री मिलाने का रिवाज था। पर हमारे दिल मिल गए थे इसलिए जन्मपत्री मिलाने की जरूरत नहीं समझी गई। हो सकता है कि जन्मपत्री दिखाई जाती तो कोई यहां गिरता, कोई वहां गिरता और मान लीजिए दिखा भी लिया होता तो क्या हो जाता? कबीरदास क्यों लिखते, “मुनि वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी, सोध के लगन धरी। सीता हरन, मरन दशरथ को, वन में बिपति परी, करम गति टारे नहीं टरी।” यानी दिलों के कुलाचे के आगे सारी जन्मपत्रियां फेल होती हैं। हालांकि इस कमबख्त दिल पर इश्क और मेडिकल साइंस की राय अलग-अलग है। किसी ने वाजिब सवाल उठाया, साइंस कहता है कि दिल में हड्डी नहीं होती तो इश्क में यह दिल फिर टूटता क्यों है? मेरी समझ में भी आज तक नहीं आया। साइंस कहता है दिल का साइज 12 सेंटीमीटर लंबा होता है फिर सारे जहां का दर्द उसमें समाता कैसे है? काफी देर तक इस सवाल पर सोचने के बाद मुझे लगा कि यह दिल तो कंप्यूटर का भी बाप निकला। इसकी हार्ड डिस्क बहुत बड़ी है।
अपना मानना है दिल चाहे जितना बड़ा हो, वक़्त उसे बदलता है। गुलजार कहते हैं वक्त की हथेली पर बहता आदमी बुलबुला है पानी का। इसलिए आदतें बदलती हैं, व्यवहार बदलता है। हमने भी बदला। किचन के काम में भी अपनी दखल बढ़ाई। राजा नल पाक विद्या में निपुण थे। उनकी इसी विशेषता के कारण दमयंती ने उन्हें ऋतुपर्वा के यहां छद्म वेश में भी पहचान लिया था, जब वे सारथी के वेश में काम कर रहे थे। गदाधारी महाबली भीम भी अज्ञातवास के वक्त राजा विराट के यहां रसोइए का काम कर रहे थे। प्राचीन काल में लड़के भी पाक विद्या और गृह कला सीखते थे। आश्रमों में बाकायदा उन्हें शिक्षा दी जाती थी। स्वामी विवेकानंद अपने हाथ से स्वादिष्ट खाना बनाते थे। जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री भी अपनी पत्नी के हर काम में सहयोग को तत्पर रहते थे। तो यह मुला खादिम क्यों नहीं? अब तो मामला बिल्कुल बदल गया है। उम्र के इस उत्तरार्ध में यह कोशिश करता हूं कि यात्राओं में वे साथ रहें। भले होटलो के कमरों में मुझे साड़ी प्रेस करना पड़े। पांच सितारा होटलों में कपड़ों पर प्रेस कराना मंहगा होता है और आपके सुइट में प्रेस के उपकरण लगे होते हैं।इसलिए खुद उनकी साड़ी प्रेस करना बाजिब होता है। बात यहीं तक नहीं रुकती। “अरे सुनो हाथ पीछे नहीं जा रहा है, जरा ब्लाउज के बटन बंद कर दो” अब तो वह भी करने लगा हूं।

अपने बारे में बता दूँ कि पढ़ाई लिखाई में मैं ठीक ही था। बीए संस्कृत और हिन्दी साहित्य से था। परले दर्जे से पास हुआ। विश्वविद्यालय में हवाई जहाज़ उड़ाने की ट्रेनिंग अलग ले रहा था। एनसीसी एयरविंग के ज़रिए। पीपीएल लाईसेन्स मिला था। एमए हिन्दी में दाख़िला हुआ, तब तक जेएनयू में भी दाख़िला हो चुका था। उस वक्त जेएनयू में नशे के कारोबार की चर्चा जोरों पर थी। सो पिता की मनाही के बाद बीएचयू में ही पढ़ना पड़ा।

वीणा से पहली मुलाक़ात यहीं हिन्दी विभाग में ही हुई। पहली मुलाक़ात में ही बात कुछ जँची क्योंकि विभाग में ज़्यादातर मूर्ख थे। वो कोई सन् 82 की बरसात थी। दोस्तो के साथ मेरी अड़ी हिन्दी विभाग की सीढ़ी पर ही लगती थी। ज़्यादातर ग़ुरूओं से अपना दोस्ताना था। उनमें कुछ पिताजी के मित्र थे। विश्वविद्यालय में गोल-गिरोह ठीक थी। विभाग में रसूख़ था। एक दिन देखा कि एम्बेसडर कार से एक बालिका उतरी। विभाग में यह कार से आने वाली बालिका कौन है? दरियाफ्त किया तो पता चला कि पं सरयू प्रसाद जी की कन्या है। वे बनारस के मेयर रह चुके थे। बड़े भाई राज्यसभा के सदस्य रहे हैं। क्लास में गया तो पता चला मोहतरमा मेरे ही सेक्शन में विराजमान है। एम ए में दो सेक्शन चलते थे। बात बढ़ी। निराला के शब्दों में- नयनो से नयनों का गोपन प्रिय सम्भाषण।

बात तो आगे बढ़ गयी पर पढ़ाई छूट गयी थी। उसके बाद नियमित क्लास में बैठकर कभी नहीं पढ़ा। इश्क़ ने तो ग़ालिब को भी निकम्मा बना दिया था। भला हो बड़ौदा के महाराज सयाजी राय गायकवाड़ का जो उन्होंने सेन्ट्ल लाईब्रेरी बनवा दी और हमारे छ बरस उसी में चाय समोसे पर गुज़र गए। अब हमारी पढ़ाई की जगहें होती थी सेन्ट्रल लाईब्रेरी, बीएचयू का विश्वनाथ मंदिर,लाइब्रेरी के ऊपर रामकेर की चाय की दुकान, सिन्धी और केरला कैफ़े या फिर ललिता, विजया ,पद्मश्री ,गुंजन जैसे सिनेमा हाल। ये सब विश्वविघालय के आसपास ही थे। अब ये सारे सिनेमा हाल इतिहास में चले गए हैं। सो कबीर के पदचिन्हों पर मेरी पढ़ाई जारी रही। कबीर के ढाई आखर को पढ़ मैं पंडित हो रहा था। पहला साल ऐसे ही बीता। दूसरे साल विभागाध्यक्ष से झगड़ा हुआ। विभाग में ताला बन्द आन्दोलन हुआ। कुलपति तक बात गयी। मुझे शो-काज नोटिस मिली। शो-काज नोटिस मिलने के बाद तो छात्र का जलवा और बढ़ जाता है। यह कहानी लम्बी है। फिर कभी। एमए भी पहले दर्जे में पास हुआ। अब मास्टरी के अपने रास्ते भी खुल रहे थे। रिसर्च में रजिस्ट्रेशन हुआ। यूजीसी से जूनियर फ़ेलोशिप मिली। उसके बाद नए विभागाध्यक्ष मेरे गुरू प्रो त्रिभुवन सिंह बने। सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का। इन्हीं के निर्देशन में रिसर्च चल रहा था। एक दम सीधा सहज घर से लाईब्रेरी। फिर चाय नाश्ता। कभी कभी पूरे समय चाय की दुकान पर, और वहीं से घर वापस। गुरुदेव ने एकाध बार टोका, कभी कभी विभाग आया कीजिए। पूरे महीने की हाजिरी एक बार ही लगा देता क्योंकि फ़ेलोशिप के बिल पास कराने के लिए ऐसा करना ज़रूरी होता।

अब अपनी मण्डली बढ़ गयी थी इस अडी पर कोई दस बारह मित्र रोज़ आते थे। चाय समोसे की लम्बी गोष्ठी लोटते समय वीणा मेरी मोटरसाइकिल पर होतीं। हॉ, अब हमारी माली हालत हीरो होण्डा तक पहुँच गयी थी। लौटते वक्त के पड़ाव सिन्धी रेस्टोरेन्ट और केरला कैफ़े होते थे। तब बनारस में यही अव्वल कैफ़े थे। एक रोज़ सिन्धी में बैठ हमने आर्डर दिया ही था कि येज्दी मोटर साईकिल पर सवार नागेन्द्र भईया और वीणा के एक और भाई सालिगराम जी वहॉं आ धमके। वीणा ने उनसे बात की। मैंने दण्डप्रणाम किया पर हमारे प्राण सूख गए। पर अब क्या? भेद तो खुल ही गया था। तमाम प्रेम कहानियों की तरह हमारे इश्क के रास्ते की अड़चन नागेन्द्र भईया दिखने लगे। अब क्या करूँ? मुझे जिगर मुरादाबादी याद आने लगे “एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है।”

नागेन्द्र जी के साथ के दूसरे भाई सालिगराम जी उस वक्त वीणा के पिता जी के साथ वकालत करते थे। वे आजकल गॉंव में खेती करते हैं। मुझे लगा, नागेन्द्र जी बुरा मानेगें। जब वे लोग रेस्तराँ से चले गए तो हम निकले। बात अब दायरे से बाहर गयी। घर पर फुसफुसाहट शुरू हुई। सालिगराम राम जी अपने काम में लग गए। उन्होंने प्रचार किया कि मैं ऐसा वैसा ही हूँ। कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण भी नहीं हूँ। वीणा को इस बारे में सोचना भी नही चाहिए। पर वीणा जैसे अब भी ग़लत बात पर डटी रहती हैं, उस वक्त भी हमारे मामले में डटी रहीं। बात आगे बढ़ी। पिता जी और देवेन्द्र जी को मामला पता चल गया था। वे मेरे प्रति नरम थे। देवेन्द्र जी राज्यसभा के सदस्य रह चुके थे। वे दिल्ली के साउथ एवेन्यू में रहते थे। पत्रकारों के साथ रोज़ बैठकी और रसरंजन के चलते पत्रकार और पत्रकारिता के लिए उनके मन में इज़्ज़त थी। फिर वे भी इसी पथ के राही थे। इसलिए मेरी उम्मीद बनी रही।

एमए करने के बाद बीजे और फिर रिसर्च स्कालर व यूजीसी का फ़ेलो बनते हुए, मैं जनसत्ता का स्ट्रिंगर भी था। प्रभाष जी से मेरी कोई मुलाक़ात नहीं थी पर वे मेरे लेखन से परम प्रसन्न थे। इसी दौरान वीपी सिंह ने राजीव गॉधी से बग़ावत किया। इलाहाबाद में उपचुनाव हुआ। वीपी सिंह संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार बने। देश की राजनीति ने यहीं से पलटा खाया। प्रभाष जी ने मुझ अकिंचन को इस चुनाव को कवर करने के लिए भेजा। मैंने दो चार रिपोर्ट ऐसी लिखी जिनसे दिल्ली में तहलका मचा। इसी चुनाव में मैंने एक रिपोर्ट लिखी जिसमें कहा गया था कि इलाहाबाद के कौन कौन से बूथ पर मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह की कैप्चरिंग की योजना है। मेरी यह रिपोर्ट अंग्रेज़ी में भी छपी। खबर बड़ी थी। आप इसे अंधे के हाथ बटेर लगना भी कह सकते है। पर मुझ रंगरूट के हाथ बटेर लग गयी थी। चुनाव आयोग से लेकर दिल्ली की केन्द्र सरकार में मेरी रिपोर्ट पर जुम्बिश हुई। मैं रातों रात स्टार बन गया।

अब मामले ने पलटा खाया। इस रिपोर्टिंग ने एक स्ट्रिंगर को सीधे ब्यूरोचीफ बना दिया।मैं लखनऊ में रहने लगा था। वीणा से सम्पर्क का ज़रिया चिट्ठी ही थी। ज़माना एसएमएस और फ़ोन का था नही। हर हफ़्ते बनारस जाता। जाते ही अपना मक्का सेन्ट्रल लाईब्रेरी। मियाँ की दौड़ मस्जिद , दो साल तक चली। फिर कभी न जा पाता तो चिट्ठी किसी मित्र को देता जो उन तक पहुँचाते थे।डाक से भेज नहीं सकता था, नही तो किसी और को मिल जाती। पुराने ज़माने में संदेश कबूतर से भेजे जाते थे। सो हमारे एक मित्र हमारे कबूतर थे। यह संयोग ही है कि आज रामापुरा का डाकिया अपना ज्ञान प्रकाश पोस्ट मास्टर है। उस वक्त रहता तो कितना आसान होता। पप्पू पोस्टमास्टर सीधे हमारी चिट्टी मंजिल तक पहुंचाता।

साल 89 में चुनाव थे। टिकटों की मारामारी दिल्ली में थी। राजनीति दिल्ली में थी। प्रभाष जी ने मुझे दिल्ली बुला लिया क्योंकि जनता दल के सभी बड़े नेता उत्तर प्रदेश के ही थे जिनसे अपना राफ्ता बेहतर था। कोई महीना भर दिल्ली में रहा। देवेंद्र भइया दिल्ली में रहते थे। उनसे इस दौरान दो दफ़ा मिला। उनसे मिलने का आईडिया वीणा ने ही दिया था। भईया ने साउथ एवेन्यू घर पर बुलाया। वे जनसत्ता को मॉनिटर कर रहे थे। जाते ही पूछा, आपने तो हमारी पार्टी के खिलाफ अभियान छेड़ा हुआ है। मैंने डरते डरते कहा कि देश बदलाव चाह रहा है। उन्होंने पूछा कहाँ रह रहे हैं? मैंने कहा ”हरियाणा भवन।” “वहीं तो साज़िश हो रही है, मेरी सरकार के ख़िलाफ़”, वह बोले। उन दिनों जनता दल के सारे सूत्र देवीलाल के पास थे। इसलिए हरियाणा भवन में ही पार्टी की सारी बैठकें होती थीं। मुलायम सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा संसदीय बोर्ड के सदस्य थे। मैं हरियाणा भवन में ही रहता था। हरियाणा भवन विपक्ष की राजनीति का केन्द्र था। इसलिए जनतादल की खबरों में मैं आगे रहता था। देवेन्द्र जी से राजनीति पर चर्चा हुई। चर्चा क्या, देश की राजनीति पर उनका एकतरफ़ा भाषण सुना।

क़ायदे से देवेन्द्र जी से मेरी पहली बातचीत थी। लगा कि मामला बन रहा है। इण्टरव्यू में पास हो गया हूँ। अब बात आगे बढ़ चली थी। मैंने अपने पिता श्री को भी बता दिया था। मेरा भी वर्गीय चरित्र बदलने लगा था। मेरा सिक्का भी लखनऊ में जम चुका था। देवेन्द्र जी और पिता जी की बात हुई और वह घड़ी आ गयी। विवाह तय हो गया। बारात निकली सरस्वती सिनेमा के सामने उपवन गेस्ट हाउस से जो वीणा के घर से कोई एक किमी दूर होगा। लखनऊ से मित्रों का जमावड़ा। उधर सारे कॉंग्रेस, इधर सारे विपक्षी। बारात चली पर आगे ही न बढ़े। मेरे साथ साथ मेरे मित्र अशोक प्रियदर्शी थे। उन दिनों मेरे सबसे नज़दीकी मित्र। तब वे लखनऊ के कलक्टर थे। उन्होंने किसी को लगाया, देखो आगे कहॉं जाम है। उसने आकर बताया कि बारात तो पहुँच गयी है। यानि बारात का एक सिरा घर तक था और मैं उपवन गेस्ट हाउस पर ही खड़ा रह गया।

नाना प्रकार के लोग। मेरी गाड़ी के सामने से उस्ताद ज़ामिन खां हटने को तैयार नहीं थे। वह बिस्मिल्ला खां के बेटे थे। बारात में शहनाई बजा रहे थे।मित्रों की पूरी सरकार थी। उनका प्रशासनिक लवाजमा और मेरी पूरी मित्र मंडली जिसमें शारदा नाई से लेकर मेरी मोटर साइकिल बनाने वाले इन्दिरा गुरू और लंगड़ा मोची तक। मुझे गाड़ी से उतार घोड़े पर बिठाकर घर तक पहुँचाया गया। बड़ा आत्म संतोष था। अब तक जिस गली में चोरी छुपे आता था, वहॉं घोड़े पर बैठ पूरे तामझाम के साथ आया था। प्रभाष जी पूरी रात विवाह मैं बैठे। शीतल सिंह की शराब की बोतल किसी ने ग़ायब कर दी थी। हमारा विवाह पं जायता महराज जी ने कराया।

ज़ायता गुरू को मैं पहले से जानता था। मेरे विवाह से पहले मैंने उन्हें संजय गॉधी और इन्दिरा गॉधी कीअन्तेष्टि कराते हुए टीवी पर देखा था। बाद में उन्होंने राजीव गॉंधी की भी अन्त्येष्टि कराई। जायता महराज कमलापति जी के पुरोहित थे इसलिए गॉधी परिवार का सब काम वही कराते थे। अपने अलावा मैंने जायता महराज को अंत्येष्टि छोड़कर किसी का विवाह कराते कभी नही देखा था। अजय पंडित ने तब मारूति 800 नई नई ख़रीदी थी। दूसरे रोज़ सुबह उसी में मैं वीणा को विदा करा घर ले आया।

रात भर विवाह फिर विदाई। आज ही शाम रिसेप्शन और दूसरे रोज़ फिर गंगा पुजईया, दोनों तरफ़ की। गंगाघाटी में किसी काम के होने पर गंगा पुजईया का चलन है। उसी सन्दर्भ का यह गीत है ऐ गंगा मईया तोहे पीयरी चढैबे, सयां से कर दे मिलनवा हाय राम। वर-वधू को सजाकर घर से गंगा घाट तक बाजे-गाजे के साथ, ‘ सोने की थाली में जेवना परोसों’ गाती हुई महिलाएँ चलती हैं। गंगा-पुजइया का ही एक अनुष्ठान है, आर-पार की माला जिसमें नवविवाहित दंपति सुखी दांपत्य जीवन के लिए गंगा को आर पार की माला पहनाते है।

हमने गंगा के दोनों किनारों को, मूँज की पीली रस्सी से, जिसमें पीले कनेर के फूल गुंथे थे, जोड़ दिया। कथाकार शिवप्रसाद सिंह लिखते हैं, “दुलहिन झीने घूँघट के बीच से आँखें घुमाकर देखती है। दुल्हा मुस्कराता है। आँखें कहती हैं, ‘आज वे दोनों कभी न मिलने वाले किनारे को जोड़ देंगे। ‘ अंचल विशेष का यह धार्मिक विश्वास है। विवाह के उपरान्त गंगा किनारे जाकर संपन्न होने वाली इस रीति के पीछे यह धारणा है कि हम दोनों कभी अलग नहीं होंगे।

तीन रोज की इस थका देने वाली प्रक्रिया के बाद हम हनीमून को उद्यत थे। उदारीकरण का दौर आया नही था। विदेश के नाम पर केवल नेपाल था। हम दोनों साहित्य के विद्यार्थी थे। पंत जी ने लिखा था कि कौसानी हिन्दुस्तान का स्विट्जरलैण्ड है। गॉंधी ने इस बात की तस्दीक़ की थी। उन्होंने यहीं अपनी किताब अनाशक्ति योग लिखी थी।

सो हम चल पड़े ग़रीबों के स्विट्जरलैण्ड। प्राकृतिक सौंदर्य, मनोहारी दृश्य, हरियाली, हरी-भरी घाटियां और पर्वत की चोटियों को अपने में समेटे कौसानी एक बेहद खूबसूरत जगह है। इसकी खूबसूरती को देख ‘महात्मा गांधी’ ने कहा था कि ‘अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है’ यानि ‘कौसानी धरती का स्वर्ग’ है। यहाँ सूर्योदय का नज़ारा अद्भुत होता है। सौन्दर्य के कवि सुमित्रा नन्दन पंत का जन्म यहीं हुआ था। वे इसके बारे में लिखते है।-

आह्लाद, प्रेम औ’ यौवन का नव स्वर्ग : सद्य सौन्दर्य-सृष्टि; मंजरित प्रकृति, मुकुलित दिगन्त, कूजन-गुंजन की व्योम सृष्टि! –लो, चित्रशलभ-सी, पंख खोल उड़ने को है कुसुमित घाटी,– खिल पड़ीं निखिल पर्वत-पाटी!

कौसानी हमारे हनीमून की स्थली थी। आप जानते ही हैं कि हनीमून के बारे में अधिक विस्तार निषिद्ध होता है। कालिदास ने कुमारसम्भवम् में यह कोशिश की थी। उन्हें कुष्ठ रोग हो गया। सो इस विषय को यहीं छोड़ते हैं। वीणा के साथ जुड़ी हुई यादों को समेटने के लिए ये पन्ने बेहद कम हैं। सोचता हूं कि कभी फुर्सत में लिखना शुरू करूंगा तो सीधे किताब खत्म कर ही रुकूंगा। हॉ यह ज़रूर है कि हमारा जो बृहत्तर संसार है। समृद्ध मित्र मंडली है। उसको संजोकर रखने का काम उन्होंने किया है। मैंने जीवन में रिश्ते कमाए। उन्हें निभाने का काम उनका रहा। अक्सर जब हम तीन ही हुआ करते। रात में कहीं बाहर से खाना खाकर आते। तो घर में कोई प्रचारक इन्तज़ार करते मिलते। वीणा फिर उन्हें खाना बना खिलाकर ही भेजती थी।मेरा जो समाजवाद का भाई व्यवहारवाद है। हर किसी के कार्य प्रयोजन में खड़े रहने के पीछे भी उनकी सदा़शयता है। वक्त तो उनके हिस्से का भी जाता है।

इतनी यादें हैं। स्मृतियों के इतने कोर हैं कि जहां तक दृष्टि डालता हूं, स्मृति की मंजूषा से पन्ने फडफडाने लगते है।अब इन पन्नों पर धूल जम रही है। इन्हे झाड पोंछ फिर कभी कहानी सुनाउगॉं। पर एक दिलचस्प बात जरूर बताने को है। आज भी जब कभी मैं सालिगराम जी को श्रेष्ठ ब्राह्मण के नाम पर छेड़ता हूँ तो वे सकुचाते हुए कहते हैं, “एकठे गॉंव पर आपकअ प्रोग्राम हो जाय”। इससे लगता है कि उन्हें खेद नहीं हुआ होगा, इस फैसले पर। सालिगराम जी भले आदमी हैं। तीस साल से उन्हीं का दिया सिरका हम लोग खाते हैं। इतने वर्षों बाद भी जब सालिगराम और नगेन्द्र भईया को देखता हूँ तो मुझे सिन्धी कैफ़े याद आता है। वहां बैठी हुई वीणा ध्यान में आती हैं। वीणा के तारों से निकला वो अद्वुत संगीत ध्यान आता है जो ईशानी और पुरू के अस्तित्व की लय में अब भी गूंज रहा है।

तो इस लॉक डाऊन में शारिरिक दूरी के साथ विवाह की वर्षगाँठ और कोई मित्र मंडली नहीं यह मेरा उत्सव धर्मी मन मानने को तैयार नहीं है। पर उपलब्धि यह है की शिशु और पुरू आ गए हैं सत्तर दिन के एकांतवास के बाद। बाक़ी जय जय।

लेखक हेमंत शर्मा टीवी9भारतवर्ष न्यूज चैनल के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं.

सौजन्य-फेसबुक

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