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वक़्त बदल गया पर ये हिंदी अखबार नहीं बदले

Nadim S. Akhter

आजकल के हिंदी अखबारों में देखने और पढ़ने लायक कुछ होता ही नहीं। खबरें भी बासी जो एक दिन पहले हम नेट पर पढ़ लेते हैं। उसमें कोई value addition नहीं। सम्पादकीय पेज पर भी वही घिसे-पिटे लेख। उनको कौन पढ़ना चाहता है भाई? उससे ज्यादा और बेहतरीन तो आज पब्लिक सोशल मीडिया या ब्लॉग पर पढ़-देख-जान लेती है।

हो सकता है कि छोटे शहरों के वे लोग जो सोशल या ऑनलाइन मीडिया पे ज्यादा सक्रिय नहीं हैं, वे इन अखबारों के नियमित पाठक हों पर मेट्रो सिटीज के लोगों के लिए ये हिंदी अखबार नहीं हैं। लोकल खबरें भले इनसे मिल जाएं पर इसके अलावा इनकी कोई और उपयोगिता नहीं दिखती। महिलाओं, कैरियर और रसोई वाला पन्ना तो और कूड़ा होता है। उससे ज्यादा लोग यूट्यूब पे देखकर जानते व सीखते हैं।

वक़्त बदल गया पर ये हिंदी अखबार नहीं बदले। इन अखबारों ने क्या आज के पाठकों को मूर्ख समझ रखा है? इन हिंदी अखबारों के मैनेजमेंट को कम से कम मेट्रो सिटीज में या टायर-1 शहरों में एक सर्वे कराना चाहिए कि पाठक उनका अखबार क्यों पढ़ते या खरीदते हैं? साथ ही ये कि वे अखबार से और क्या चाहते हैं! इससे नए जमाने के अनुरूप अखबार को ढालने में मदद मिल सकती है। हो सकता है किसी ने कराया भी हो पर हिंदी अखबारों के पुराने ढर्रे में मुझे कोई परिवर्तन दिखता नहीं।

कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर रहे पत्रकार नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

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