भागवत साहब, “भारतीय रेलवे” को “हिंदू रेलवे” घोषित कर दें….

Sumant Bhattacharya :  मैं भारतीय रेल के बहाने श्रीयुत मोहन भागवत साहब के नाम खुला पत्र लिखना चाहता हूं। आदरणीय भागवत जी से मेरी अपील है कि वो भारतीय रेलवे को हिंदू घोषित करें। क्यों..? क्यों की इस पीड़ा का लेखाजोखा आपके सामने है। रेलमंत्री सुरेश प्रभु के साथ बातचीत के लिए दिल्ली के ताज पैलेस में ज़ी टीवी ने एक कार्यक्रम रखा था। ज़ी के एडिटर सुधीर चौधरी ने सुरेश प्रभु के आगमन के पहले कहा, “आज इस कार्यक्रम में भारत (मेरी नजर में दिल्ली भी नहीं) के श्रेष्ठ दिमाग मौजूद हैं, और मुझे उम्मीद है कि जब रेल मंत्री यहां से जाएंगे तो उनके सामने एक अलग ही “ब्लू प्रिंट” होगा।“ सुधीर के ये शब्द मेरे मन में काफी उम्मीद जगा गए। बहरहाल, भारतीय ट्रेन की तरह रेल मंत्री भी लेट हुए।

जैसे-जैसे सवालों का दौर चलता गया, मेरी नाउम्मीदी बढ़ती गई। मैं उस भारत को तलाशने लगा, जो ना जाने कितने ही सपनों के साथ किसी को हुकूमत की कुंजी सौंपता है। और हर होती सुबह के साथ उसके सपने ध्वस्त होते हैं। वाकई में भारत के “श्रेष्ठ मस्तिष्क” से निकलते हर सवाल मुझे चौंका रहे थे..हर जवाब मुझे नेस्तनाबूत कर रहे थे। सुधीर ने शुरुआत अच्छी की थी। रेलवे की चुनौतियों का जिक्र करते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की। कोई पत्रकार हैं अशोक टंडन, जिन्होंने सवाल की बजाय एक थ्योरी ही रख दी। टंडन साहब बोले, “इतने निगेटिव नोट के साथ भारतीय रेल को नहीं आंका जाना चाहिए, क्योंकि रेलवे ने इतने सालों में बहुत तरक्की की।“ उन्होंने विदेशी मुल्कों के बरक्स तकनीक का सवाल उठाया तो मुझे लगा कि शायद टंडन साहब “तकनीक” पर कुछ रोशनी डालेंगे…लेकिन उन्होंने जिक्र भर किया, कोई तथ्य शायद उनकी जेब में ना था।

फिर एक के बाद जाने-पहचाने स्थापित चेहरे मेरे लिए अनजाने से बनते गए। अमर सिंह साहब की सबसे बड़ी दुश्चिंता ये थी कि रेलवे की तरक्की के लिए पैसा चाहिए और पैसा लगाने के लिए कोई इंडस्ट्रलिस्ट क्यों आएगा..? जबकि राजनीतिक हालात मुनासिब ना हो। अमर सिंह साहब ने यह भी कहा, “ मैं अट्ठारह सालों से राजनेता था, फिर लौटकर उद्योगपति बन गया हूं, जैसे कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी लौटकर वकालत करने लगे।“

गजब, जी में तो आया कि उठ कर अमर सिंह से सीधा सवाल करूं, “ये हर राजनेता उद्योगपति ही क्यों हो जाता है…?” फिर लगा कि कहूं, “ यकीन रखिए अमर सिंह साहब, इस मुल्क की आवाम किसी राजनेता से ये नहीं पूछेगी कि इंडस्ट्री चलाने के लिए आपके पास पैसा कहां से आया…” लेकिन यह तय मानिए कि हर ऐसे राजनेता को इसी मुल्क की जनता धीरे-धीरे खारिज कर देगी…जैसे आपको कर दिया।”

हैरानी तो तब हुई जब “बीसीसीआई घोटाले” में न्यायिक जांच आयोग के चेयरमैन रहे “जस्टिस मुदगल” के सवाल को सुना। जस्टिस मुदगल की तकलीफ थी, “एअरपोर्ट शहर से बहुत दूर हो चले हैं, आने-जाने में, और फिर चेक इन के लिए घंटे दो घंटे पहले पहुंचने में ज्यादा वक्त खर्च होता है सो सुपर स्पेशियलिटी ट्रेन चलाई जाएं, या फिर इन्हीं ट्रेनों में कुछ ऐसे कपार्टमेंट लगाए जाने चाहिए, जिनका किराया ज्यादा भले हो, लेकिन सुविधाओं के मामले में कहीं से उन्नीस ना बैठें।“ बैठे-बैठे मुझे जैसे डंक मार गया। इस मुल्क का जस्टिस रिटायरमेंट के बाद भी खुद को भीड़ का हिस्सा बनाने को राजी नहीं है? क्योंकि उसके पास पैसा है…? क्योंकि वो कभी “विशेष” रह चुके हैं…” क्या यही वजहें हैं इनकी हेठी के पीछे…”

कांग्रेस के राशिद अल्वी साहब भारतीय ट्रेन को कम्युनल रंग देने से नहीं चूके। राशिद साहब ने सुरेश प्रमु के साथ हमदर्दी जताते हुए कहा, “लगता है कि आप काफी थके हुए हैं, शायद ये प्रधानमंत्री का दबाव है जो आपके चेहरे पर नजर आ रहा है।“ फिर बोले, “ये बताएं रेल मंत्री साहब, एक तरह तो भीड़ बढ़ रही है, और दूसरी तरफ आपके नेता हैं जो चार से पांच बच्चे पैदा करने को कह रहे हैं..।“ खैर इस पर मोर्चा मीनाक्षी लेखी ने संभाला, लेखी ने उसी तर्ज पर सियासी पलटवार किया, “बच्चो की बात तो वो करें जो इसके लिए जिम्मेदार हैं..।“ जाहिर है उनका इशारा मुसलमानों में ज्यादा बच्चो के रुझान की ओर था।

एक चुके हुए एक्टर हैं, नादिर जमाल साहब। उनका उलाहना था, “ट्रेन में सबके साथ जाना होता है और तमाम लोग सोते वक्त जोर-जोर से “खर्राटा” लेते हैं, हो सके तो रेलवे रूई के बड्स मुहैया करा दे।“ नादिर जमाल साहब को तो इतना भी पता था कि रूई के फाहे कान में ठूंसने से खर्राटों की आवाज 40 फीसदी मंद हो जाती है। गजब की “वैज्ञानिक जानकारी” है नादिर साहब आपको..।

हां, इनके बीच यदि उजाले की रोशनी दीपक पांडेय का जिक्र ना करुंगा तो गुनहगार साबित हो जाऊंगा, खुद की ही नजर में। डिजास्टर मैनेजमेंट में शोध कर रहे दीपक साहेब ने रेलवे के लिए अलग से डिजास्टर प्लान की जरूरत को रेखांकित किया, जिस पर सुरेश प्रभु साहब ने मंत्रियों वाला जवाब दिया। यानि इस पर सोचा जा रहा है।

भारत के इन्हीं “श्रेष्ठ मस्तिष्क” में शामिल थे। अहमदाबाद “आईआईएम” के पूर्व निदेशक ढोलकिया साहब। उनका मानना था कि रेलवे को निजीकरण की ओर बढ़ना चाहिए। जी में आया कि पूंछू, ढोलकिया साहब कभी पांच हजार किलो के पहलवान और पचास किलो के पहलवान के बीच कुश्ती में पचास किलो के पहलवान को जीतते देखा है? क्या फिर कभी किसी नरेंद्र मोदी साहब के अब्बा हुजूर सौ रुपए केतली, पचास रुपए की चाय पत्ती और दूध के साथ किसी बड़नगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेच कर परिवार का बसर कर पाएगा..?

बहरहाल, इन सवालों के बीच में मेरा सवाल कहीं डूब सा गया। माइक की छीना छपटी और स्थापित चेहरों के संघर्ष में मैं हार गया। और सच कहूं, मुझे लग चुका था कि मेरा भारत भी हार गया है, इन रोशनियों और स्थापित चेहरों के बीच मैं कहीं नहीं, मेरा भारत कहीं नहीं। क्योंकि मैं इस मुल्क का सबसे “बदतर-घटिया मस्तिष्क” हूं।

मेरा दर्द था कि पूछूं, “क्या सुरेश प्रभु साहब, इस मुल्क के भावी प्रधानमंत्री का भावी बाप फिर किसी रेलवे स्टेशन में केतली में चाय लेकर बेच पाएगा…” क्या हुकूमत इस बात की गुंजाइश देगी ?

आईआरसीटीसी के गठन के बाद रेलवे ने मुल्क के लाखों लोगों के हाथों से कामधंधा छीन कर बेरोजगार कर दिया। सांस्कृतिक विविधता की वॉट लगा दी है। कभी दौर था, दिल्ली से तिनसुकिया तक निकल जाइए, या फिर किसी ट्रेन में जम्मू से कन्याकुमारी तक सफर कीजिए। हर इलाके का खाना, आपका स्वागत करता था। ट्रेन की बोगियां कभी पुदीने-धनिया और हरी मिर्च के स्वाद से गमागमा जाती थीं तो कभी इडली-ढोकले की खुशबू से जी उछल पड़ता था..बिहार से गुजरती ट्रेनों के मुसाफिरों के लिए हर छोटे-बड़े स्टेशन पर गरमागरम लिट्टी चोखा मानों इंतजार करता था।

आज कहां है यह सब…? आज मेन्यू फिक्स है। पनीर या फिर चिकन करी। दो अधसिके पराठेनुमा रोटियां। सारा भारत क्या “हल्दीराम” या “बीकानेर वाले” के कब्जे में आ चुका है…..हिंदुस्तान का जायका क्या सिर्फ चंद कारोबारियों के किचन का “गुलाम” बन चुका है……

आखिर ऐसा क्यों हुआ..? वजहों पर बहुत ज्यादा सिर खपाने की जरूरत नहीं है। रेग्यूलेट करने के पीछे एक ही मकसद होता है, “करप्शन को संगठित तरीके” से करना। और यही काम यूपीए सरकार ने किया और उसी का विस्तार एनडीए सरकार कर रही है। मुझे तो कोई हैरानी नहीं है।

मैं समझना चाह रहा था कि क्या कभी “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” (आरएसएस) का “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” “भारतीय रेलवे” पर भी लागू होगा.. ? क्या कभी धर्म-जाति के दायरे से निकल कर भारतीय रेलवे परचम लहराते हुए ये कहेगा कि हमारे सांस्कृतिक नायक, लिट्टी बनाने वाले हैं, हमारे हिंदुत्व के प्रतीक भीगे चने और ढोकला या फिर झाल मुड़ी बेचने वाले हैं। यकीनन भागवत साहब, जिस दिन आप हिंदुत्वव की इस धारा में आप भारतीय रेल को ला देंगे मैं आपका मुरीद हो जाऊंगा। फिर या ना पूछूंगा कि आप इस मुल्क को क्यों हिंदू बनाना चाहते हैं…? .

मेरे लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक फाफामऊ स्टेशन की चाय हो सकती है। मेरे लिए यह प्रतीक किसी स्टेशन का पकौड़ा या फिर लिट्टी चोखा हो सकता है। पर ये सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मूक गंगा पर ही क्यों लागू होता है..? रोजी रोटी कमाने के मौकों पर हल्दीराम, केएफसी, मैक्डॉनल्ड ही क्यों बाजी मार ले जाते हैं…? मैं समझता हूं कि मेरे सवाल बेहद “बचकाने” हैं, कोई औकात नहीं है मेरी…क्योंकि मैं स्थापित चेहरा जो नहीं हूं…क्योंकि मैं भीड़ का छोटा सा हिस्सा भर हूं…

आप कहते हैं, ये सब तो मिलता है..तो मैं कहूंगा नहीं मिलता। क्योंकि ये जो बेचते हैं, ये “संगठित गिरोहों” के सदस्य हैं। जो बिना किसी “प्रतिस्पर्धा” के बंधक बनाए गए मुसाफिरों के सामने “विकल्प” नहीं छोड़ते। हर मुसाफिर बाध्य है कि इन्हीं विकल्पों में से ही चुने। भले ही कचौरी के नाम पर भीतर दाल की बजाय ब्रेड के टुकड़े मिले। मुझे तो वो “हिंदू भारतीय रेल” चाहिए, जिसमें फिर किसी भी जाति और धर्म का व्यक्ति क्यों ना हो, अपना माल बेचें, और हम बिना जात-धर्म पूछे उसकी बनी चीज खाएं, और फिर दोस्तों के बीच तारीफ करें।

सत्ता इस पर दो सवाल उठाती है। पहला “क्वॉलिटी कंट्रोल”। तो मेरा कहना है, हमें कृपया “बालिग” समझें। इस मुल्क के हर इंसान को पता है कि क्या बेहतर है और क्या बदजायका। हर इंसान को खाने की तमीज है, और जायका पहचानने की भी। पर वो करे तो करे क्या, चंद पलों के लिए रुकती ट्रेन की वजह से उसके सामने विकल्प ही नहीं रहता। दूसरे, आप कहेंगे, पैसेंजर सेफ्टी। यानि यात्रियों की सुरक्षा। गजब मुल्क है ये, हर गरीब इंसान ठग, लुटेरा और लंपट है। और सत्ता के साथ जुड़ा हर इंडस्ट्रलिस्ट, हर नेता, हर सफेदपोश पाकदामन है। अमर सिंह की तरह। क्या इस मुल्क की सरकार कभी ये बताएगी, आईआरसीटीसी के बनने के बाद रेलवे में होने वाले अपराधों में कितनी कमी आई…? .क्या कभी यह आंकड़ा सामने आएगा…? क्या कभी मीडिया इस सवाल को उठाएगी….? नहीं उठेंगे सवाल मित्रों…

तो क्या कहते हैं भागवत साहब..क्या भारतीय रेलवे को हिंदू घोषित करेंगे आप….? सच कहता हूं मित्रों, इस मुल्क के “श्रेष्ठ मस्तिष्क” में “आप” कहीं नहीं हैं………वास्तविक “भारत गैरहाजिर” है…….हो सके तो अपनी “आवाज” खुद बनिए………..

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्या के फेसबुक वॉल से.

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Comments on “भागवत साहब, “भारतीय रेलवे” को “हिंदू रेलवे” घोषित कर दें….

  • sanjeev singh thakur says:

    Downtrodden, Chotte logon ki rozi roti,
    bharat k vividhta ke khane peene ko bhi khtam karne ja raha hai Railway ka Corporatikaran.

    Zamin se jude lekh k liye dhanaybaad.

    Reply

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