डीएम रितु माहेश्वरी पर भ्रष्टाचार के आरोप और दो न्यूज चैनलों के खिलाफ एफआईआर : सच क्या है?

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने का बीड़ा उठा रहे हैं। नौकरशाहों को वह नसीहत भी दे चुके हैं। इसी सबके बीच गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के सिस्टम के खिलाफ कथित रिश्वतखोरी की खबर चलाना दो चैनल पर भारी पड़ गया। खबर एक बिल्डर की पत्नी की तरफ से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व अन्य को भेजी गई शिकायत पर आधारित थी। जिसमें कथित रूप से जीडीए वीसी का प्रभार देख रहीं जिलाधिकारी रितु माहेश्वरी को 2 करोड़ की मोटी रिश्वत देने की बात कही गई।

सिर्फ वीसी ही नहीं सचिव और प्रवर्तन विभाग भी रिश्वत के आरोपों में घिरा। इनके अलावा तहसीलदार और लेखपाल को भी रिश्वत देने का आरोप लगा। यह भी कहा गया कि पूरे खेल में राजस्व को 3 करोड़ रूपये का चूना लगा दिया गया। सनसनीखेज खबर चलने के बाद हड़कंप मच गया और जीडीए की तरफ से दोनों चैनलों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करा दिया गया। पत्रकारों में इस तरह की कार्रवाई से रोष है और वह आंदोलन की रणनीति बना रहे हैं, क्योंकि अपनी तरह का यह पहला ऐसा मामला है जब निष्पक्ष जांच या नोटिस को प्राथमिकता दिए बिना ही मीडिया हाउस को सीधे जद में ले लिया गया हो। इसे तानाशाही रवैया करार दिया जा रहा है। मामला ऐसे वक्त पर हुआ है जब यूपी सरकार पत्रकारों की सुरक्षा और उन्हें बेहतर माहौल उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत है। प्रकरण सामने आने के बाद जीडीए और बिल्डर लॉबी में खलबली है।

रिश्वत के आरोपों वाली शिकायत पर चली खबर
दरअसल बीते 27 अप्रैल को दो न्यूज चैनल ‘समाचार प्लस’ व ‘न्यूज वन इंडिया’ ने एक खबर चलाई। खबर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मेरठ कमिश्नर व अन्य को बिल्डर त्रिलोकचंद अग्रवाल की पत्नी शालिनी अग्रवाल की तरफ से भेजी गई दो पेज की एक शिकायत के आधार पर थी। शिकायत में कहा गया कि नीतिश्री बिल्डर अनिल जैन का राजनगर एक्सटेंशन में ओरा चिमेरा नामक प्रोजेक्ट हैं। इसमें ग्रीन व आवासीय भूमि पर 48 दुकानों का निर्माण किया गया। आरोप लगाया गया कि इन दुकानों का निर्माण जीडीए का अतिरिक्त प्रभार देख रहीं जिलाधिकारी को 2 करोड़, सचिव व प्रवर्तन इंचार्ज को 50-50 लाख की रिश्वत देकर किया गया। उन पर सील लगने वाली थी, लेकिन रिश्वत के जरिए बचा लिया गया। तहसीलदार व पटवारी को भी आरोपित किया गया। राजस्व को तीन करोड़ की चपत लगाने की बात कही गई। शिकायत में घपले की जांच कराकर दुकानों को ध्वस्त कराने और समस्त लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की मांग की गई।

खबर चलने से मचा हड़कंप, हो गई एफआईआर
गंभीर आरोप की खबर प्रसारित होने के बाद हड़कंप मच गया। जिसके बाद जीडीए प्रशासन चैनल्स के खिलाफ बड़ी तेजी से एक्शन में आ गया। जीडीए के अधिशासी अभियंता आरपी सिंह पुत्र खचेरा सिंह की तरफ से सिहानी गेट थाने में दोनों चैनल के प्रधान संपादकों व उनके स्थानीय संवाददाताओं के खिलाफ मुकदमा लिखा दिया गया। तहरीर में रिश्वत के आरोपों वाली शिकायत को फर्जी बताया गया और कहा गया है कि बिना कोई अधिकारिक वर्जन व बिना तथ्यों की पुष्टि किए दोनों चैनल द्वारा एकपक्षीय रूप से प्राधिकरण की वीसी, सचिव व अन्य पर झूठे अनर्गल आरोप लगाए गए हैं। यह भी बताया गया कि ऐसा ब्लैकमेलिंग, अधिकारियों का प्रताड़ित करने शासन, प्रशासन अधिकारियों की प्रोफेशनल व व्यक्तिगत छवि को खराब करने एवं मानसिक हानि पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया। कृत्य को सरकारी कार्य में बाधा भी बताया गया। मुकदमा धारा-189, 353, 505 (1) बी व आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम की धारा-7 के अन्तर्गत दर्ज कराया गया। मामला इतने पर ही शांत नहीं हुआ। बिल्डर अनिल जैन की तरफ से भी शिकायतकर्ता महिला व उसके पति के खिलाफ थाना कविनगर में मुकदमा दर्ज करा दिया गया। बिल्डर ने दंपत्ति पर अवैध धनराशि मांगने और जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया। पूरा मामला चर्चाओं में आ गया।

प्रशासन के रवैये से फैल गया पत्रकारों में रोष
प्रधान संपादकों व संवाददाताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने से पत्रकारों में रोष व्याप्त हो गया। उन्होंने मीडिया सेंटर में बैठक की और इसे पत्रकार जगत पर हमला व बड़ी चुनौती करार दिया। बिना जांच के खुद ही शिकायत को फर्जी मान लेने पर भी सवाल उठाए गए। पत्रकारों ने कहा कि जिस तरह फर्जी धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई गई उससे स्पष्ट होता है कि डीएम पत्रकारों को दबाव में लेकर प्रशासन व जीडीए को चलाना चाहती हैं। आरोपों को खबर के रूप में चलाकर चैनलों ने कोई गुनाह नहीं किया। किसी की पीड़ा को सामने रखना मीडिया का धर्म है। देशद्रोह की धारा भी लगाई गई है। अधिकारी खुद को कानून से ऊपर और मीडिया को गुलाम दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। प्रशासनिक भ्रष्टचार की खबरों को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। हैरानी की बात यह है कि जिन पर आरोप है वह खुद ही अपनी जांच करने की बात कर रहे हैं। जीडीए की ऐसी जांच का क्या औचित्य जबकि मामले की जांच शासन या अन्य के द्वारा की जानी चाहिए। गौरतलब यह है कि तहरीर में ही शिकायत को फर्जी बता दिया गया है। पत्रकारों ने सामूहिक गिरफ्तारी देने और निर्णायक आंदोलन का निर्णय लिया।

डीएम बोलीं आपराधिक कृत्य, मीडिया ने कहा तानाशाही
एफआईआर दर्ज होते ही मामला और तूल पकड़ गया। इस प्रकरण में गाजियाबाद की जिलाधिकारी व जीडीए उपाध्यक्ष रितु माहेश्वरी का कहना है कि खबर प्रसारित करके मानसिक रूप से ब्लैकमेल किया गया, यह आपराधिक कृत्य है इसलिए रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। बिल्डर अनिल जैन पर गलत तरीके से दुकानें बनाने का आरोप लगाया गया है। मामले की जांच के लिए कमेटी गठित कर दी गई है। बिल्डर ने शिकायतकर्ता के खिलाफ कविनगर थाने में मुकदमा लिखाया है। दूसरी तरफ समाचार प्लस चैनल के एग्जीक्यूटिव एडीटर प्रवीन साहनी कहते हैं कि समाचार का प्रसारण शिकायत के आधार पर किया गया। हमने डीएम रितु माहेश्वरी का पक्ष लेने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की। पत्रकारिता के लिए यह कठिन दौर है और रवैया तानाशाही है। वह सवाल उठाते हैं कि सरकारी काम में बाधा डालने और क्रिमिनल एक्ट की धाराएं भी लगा दी गईं। खबर से भला सरकारी कामकाज में कैसी बाधा हुई। पत्रकार क्या गुंडा होता है जो उस पर क्रिमिनल एक्ट लगा दिया जाए। ऐसे में पत्रकारों के लिए काम करना कठिन हो जाएगा। न्यूज वन इंडिया के चीफ एडीटर अनुराग चड्ढा का कहना है कि प्रसारित न्यूज कोई गपशप नहीं थी, बल्कि पीड़ित व्यक्ति की शिकायत पर आधारित थी। वहीं वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि बेहतर होता कि जिलाधिकारी को नोटिस जैसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी सीधे एफआईआर लिखाना पत्रकारों को डराने जैसा प्रतीत होता है।

आजाद पत्रकार नितिन सबरंगी की रिपोर्ट.

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