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कल्पेश याग्निक यानि कार्पोरेट जर्नलिज्म का अनूठा जुझारू

आप याद आएँगे कल्पेश जी… कार्पोरेट जर्नलिज्म का अनूठा जुझारू… आम तौर पर शोक दर्ज़ नहीं करता, पर आज रहा नहीं गया। तमाम असहमतियाँ एक तरफ़, मगर कार्पोरेट जर्नलिज्म के लिए जुझारु लगाव रखने वाले कल्पेश याग्निक का असमय जाना दुखद है। दैनिक भास्कर में हमने साथ साथ काम किया। 2001 में भास्कर समूह के साथ जुड़ने से पहले मैं उन्हें नहीं जानता था। 2005 से 2007 तक साथ काम करने का मौका भी मिला।

अखबार में नवाचार के ज़बर्दस्त हामी। किसी घटना की अन्तर्वस्तु तक पहुँचने का ऐसा जुनून बिरलों में देखा। खबर को मथ कर सच निकलवाने का हुनर उन्हें आता था। अंग्रेजी पत्रकारिता के ट्रेंड्स पर वे हिन्दी पत्रकारिता को कस कर देखते थे। स्मार्ट जर्नलिज्म जिसे कहते हैं, वही वे करते भी थे। बेहद चुस्त। अचूक रहने की हद तक मुस्तैद। भास्कर के न्यूज़रूम में उनकी मथानी शाम से जो चलनी शुरू होती, वह देर रात, जब तक मक्खन निकल न आए, चलती रहती।

ऊपरी तौर पर खुशमिज़ाज थे, मगर मेरा मानना है कि अन्तर्मुखी ही थे। कार्यशैली, स्वभाव और विचारों को लेकर अक्सर ही खुद को उनसे सहमत नहीं पाता था। समवयस्क थे पर हमारे आपसी रिश्तों में गर्मजोशी नहीं थी। अलबत्ता उनकी ऊर्जा, उत्साह, जोश और नवाचार से प्रभावित भी था और उसे सीखने का प्रयास भी करता रहा।

सम्भवतः 2006-7 में भास्कर के रीलांच का अवसर था। हर तरह के नए कंटेट की प्लानिंग चल रही थी। उन्हें “शब्दों का सफ़र” का एक नमूना दिया जिसे मैनेजिंग डायरेक्टर श्री सुधीर अग्रवाल के साथ होने वाली बैठक में पेश करने योग्य समझा गया। उसके बाद यह लगातार कई वर्ष भास्कर का नियमित साप्ताहिक कॉलम बना रहा।

वे अक्सर निवृत्ति की उम्र से पहले निवृत्त होने की बात करते थे। हमने इसे मनपसंद काम करने का बहाना समझा।

निवृत्ति और निर्वाण में तो अन्तर होता है कल्पेश जी!!!

वरिष्ठ पत्रकार अजित वडनेरकर की एफबी वॉल से.

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