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टीवी

खबर वही जो आग लगा दे, बहस वही जो आस्तीन चढ़ा दे!

अनिल भास्कर-

खबर वही जो आग लगा दे… जिस तरफ हमारी पत्रकारिता मुड़ चुकी है, लगता है जल्द ही खबर के कारोबारी कुछ ऐसे ही स्लोगन चीखते नज़र आएंगे।

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अपन ने तीन दशक पहले आईआईएमसी से डिग्री समेटकर जब अखबार की दुनिया में कदम रखा तो टीवी जर्नलिज्म घुटने के बल चलना सीख रहा था। तब खबर मतलब अखबार होता था और विश्लेषण मतलब पत्रिकाएं।

वह पत्रकारिता करते हुए सीखने का दौर था। लेकिन इसे सीखने-करने की के लिए सबसे जरूरी थी मन-मानस में जनसरोकारों के लिए आग। शासन-प्रशासन की खामियों को अनावृत-उध्दृत करने की आग। समाज में सकारात्मक बदलाव की आग। पाठकों को आगे बढ़ाने की आग। पत्रकारिता का मूल मतलब ही यही था।

खबर की परिभाषा भी स्पष्ट थी- अद्यतन और समसामयिक सूचना जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पाठकों के हित-अहित से जुड़ी हो। समय के साथ परिस्थितियां बदलीं। परिदृश्य बदले। पत्रकारिता पर अर्थशास्त्र का दवाब ऐसा बढ़ा कि खबरों की परिभाषा बदलने लगी। हम कुछ यूं कहने लगे- अखबारों में विज्ञापनों से बचे स्थान को भरने के लिए जिस शब्दजाल की आवश्यकता होती है उसे खबर कहते हैं।

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समय और बदला। परिस्थितियां और परिदृश्य भी। अब पत्रकारिता को सिर्फ सिर्फ एबीसी और टीआरपी के पैमाने पर आंकने और तदनुसार उसे व्यवसाय जगत में साधने का दौर है। जनसरोकार पहले हाशिए पर और अब नेपथ्य में धकेल दिए गए हैं।

जाहिर है पत्रकारिता और खबर दोनों की परिभाषा एक बार फिर बदलाव की तलबगार है। पत्रकारिता को तो खैर अब सीधे-सरल शब्दों में “खबरों का कारोबार” कहा जा सकता है। हां, खबर की परिभाषा थोड़ी सनसनीखेज़ हो सकती है।

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मीडिया के मैदान में, खासकर टीवी पत्रकारिता के नाम पर जो मदारीपन शुरू हुआ है, जिस तरह जनसरोकारों से सीधे जुड़े विषयों को दरकिनार करते हुए सोशल मीडिया से भड़काऊ कंटेंट चुन-चुनकर पूरे चिल्लपों के साथ परोसा जा रहा है, शायद जल्द ही खबरों की परिभाषा को कुछ ऐसे स्लोगन से समझना पड़े- “खबर वही जो आग लगा दे, बहस वही जो आस्तीन चढ़ा दे।”

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