कम जांच, कम इलाज : जांच में दिखी किसी भिन्नता को कब बीमारी माना जाए कब नहीं, यह खुद में एक बड़ा सवाल है!

चंद्र भूषण-

जाने-माने अमेरिकी डॉक्टर और वरिष्ठ शोधकर्मी एच. गिलबर्ट वेल्च फिलहाल पूरी दुनिया में घूम-घूम कर जरूरत से ज्यादा मेडिकल जांच और संभावित बीमारियों के आक्रामक इलाज के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। अमेरिका में बड़े पैमाने के एक सर्वेक्षण के बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जिन इलाकों में बात-बात पर सीटी स्कैन करने की व्यवस्था मौजूद है, वहां गुर्दों में कैसा भी उभार दिख जाने पर कैंसर का खतरा बताकर एक किडनी निकाल देना बिल्कुल आम बात हो चुकी है।

नतीजा यह है कि ऐसे 50 मरीजों में औसतन एक की मौत तो एक-दो महीने के अंदर ही हो जाती है। लेकिन जांच-पड़ताल से गुजरे कई मामलों में ऐसा पाया गया कि ट्यूमर की शक्ल काफी समय बाद तक ज्यों की त्यों बनी रही। ट्यूमर ने बढ़ने का नाम ही नहीं लिया। यानी कुछेक मामले ऐसे जरूर रहे होंगे, जिनमें ट्यूमर के मैलिग्नेंट अथवा कैंसरस होने का अनुमान पूरा इत्मीनान किए बगैर ही लगा लिया गया होगा।

डॉ. वेल्च का मानना है कि मरीज को बिना किसी समस्या के ही किसी असाध्य बीमारी से ग्रस्त बता देने का चलन मौजूदा मेडिकल साइंस की मुख्य प्रवृत्ति बन गया है। उन्होंने अपने सर्वेक्षण के नतीजे में यह भी पाया कि नियमित जांच कराने वाले और न कराने वाले समूहों में मृत्यु की दर बिल्कुल एक सी थी। हालांकि किसी भी समाज में इस तरह के बड़े नतीजे निकालने के लिए सैंपल साइज भी बड़ा रखा जाना चाहिए।

मेडिकल बीमा से चलने वाले विशाल चिकित्सा ढांचों में काम करने वाले डॉक्टर मरीजों को बताते हैं कि लगातार जांच कराकर वे संभावित बीमारियों से बच सकते हैं, या समय रहते उनका इलाज शुरू कर सकते हैं। लेकिन जांच में दिखी किसी भिन्नता को कब बीमारी माना जाए कब नहीं, यह खुद में एक बड़ा सवाल है। इसके साथ यह पहलू भी जुड़ा है कि किसी बीमारी की एक सीमा तक पुष्टि हो जाने के बावजूद संबंधित शरीर में उससे लड़ने की क्षमता अलग-अलग हो सकती है।

स्वस्थ लोग, या स्वस्थ जीवन शैली वाले लोग कुछेक बीमारियों का जितनी दूर तक प्रबंधन कर ले जाते हैं, वह अस्वस्थ जीवन शैली वाले लोगों के बूते से बाहर होता है। इसका अर्थ यह तो कतई नहीं है कि जांच-पड़ताल नहीं कराई जानी चाहिए। शरीर में कोई भी समस्या पैदा होने पर उसकी जांच होनी ही चाहिए। सवाल इस जांच से तत्काल सबसे भयंकर नतीजे निकालने और उनका और भी भयंकर इलाज तजबीज करने की अभी के दौर वाली व्यापक डॉक्टरी प्रवृत्ति पर है।

इस दिशा में एक बड़ा कदम अब से आठ साल पहले सन 2014 में कनाडा में उठाया गया, जहां संभावित स्तन कैंसर की जांच (मैमोग्राफी) को हर स्त्री के लिए जरूरी बना देने की कवायद को सिरे से खत्म कर दिया गया। वहां लंबे समय तक किए गए सर्वे के नतीजे बता रहे थे कि मैमोग्राफी कराने वाली और न कराने वाली महिलाओं में स्तन कैंसर से निपटने की दर एक सी थी और दोनों की मृत्यु दर में कोई अंतर नहीं था।

लिहाजा कनाडा सरकार ने पीड़ादायी मैमोग्राफी के बजाय खुद से स्तनों की नियमित जांच और जब-तब इसकी डॉक्टरी जांच की व्यवस्था बनाई है। पहले माना जाता था कि मैमोग्राफी से संभावित स्तन कैंसर का अंदाजा औसतन चार साल पहले लगाया जा सकता है, लेकिन फिर यह आकलन बदल कर एक साल पर आ गया। स्तन कैंसर के पूर्ण रूप लेने में औसतन नौ साल का समय लगता है, लिहाजा एक साल पहले इलाज शुरू करना खुद में कोई मायने नहीं रखता।

कनाडा की यह पहल खुद में काफी अच्छी है, लेकिन डॉ. एच. गिलबर्ट वेल्च का मुकाबला पूरी दुनिया में, खासकर भारत जैसे विकासशील देशों में तेजी से एक कमाऊ उद्योग का रूप ले रहे डॉक्टरी के धंधे से है। यहां बड़े नर्सिंग होमों में इलाज के एवज में हासिल होने वाली रकम का 30 प्रतिशत अस्पताल को और 70 प्रतिशत डॉक्टर को मिलता है, जबकि जांच में यह अनुपात पलट जाता है, यानी 70 प्रतिशत अस्पताल का और 30 प्रतिशत डॉक्टर का हिस्सा बनता है।

जाहिर है, अस्पतालों का जोर छोटी से छोटी से बीमारी में भी बड़ी से बड़ी जांच कराने पर होता है। उनकी कोशिश यह होती है कि हर केस में कोई न कोई ऐसी बीमारी पकड़ ली जाए, जिससे मरीज के मेडिकल बीमे का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा दुहा जा सके। ऐसे में एक सामान्य पेट दर्द का अंजाम गॉल ब्लैडर निकालने के रूप में सामने आता है और पेशाब में मामूली तकलीफ का समाधान किडनी निकाल देने की हद तक चले जाने के किस्से हर जगह सुनाई पड़ने लगे हैं।

जाहिर है, कम जांच और कम इलाज की बात सुनने में चाहे जितनी भी अच्छी लगे, कोई डॉक्टर या नर्सिंग होम या विकास की माला जपने वाली कोई लोकप्रिय सरकार ऐसी किसी अनुशंसा को मानने के लिए राजी होगी, इसमें संदेह है।



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