National Dog Day – 26 August : 12,000 साल की दोस्ती खतरे में क्यों है?

कपिल शर्मा के कॉमेडी शो में हाल ही में स्ट्रीट डॉग्स पर दया दिखाने का जिक्र प्रमुखता से किया गया। शो के मेहमान, भोजपुरी सिनेमा के सुपर स्टार व सांसद रवि किशन ने भी कहा कि वह जानवरों पर अत्याचार के खिलाफ कड़े प्रावधानों के लिए संसद में एक बिल प्रस्तुत करने की सोच रहे हैं। इस बीच, खतरों के खिलाड़ी टीवी शो की शूटिंग में व्यस्त अभिनेता करन पटेल का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो गया, जिसमें वह वोर्ली मुंबई में अत्याचार के शिकार हुए लकी नामक एक डॉग की हत्या में शामिल लोगों को धमकाते हुए कह रहे हैं कि विदेश से लौटकर वह उन लोगों की मृतक कुत्ते से भी बदतर हालत करेंगे।

बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा पहले ही सोशल मीडिया पर जस्टिस फॉर एनीमल्स हैशटैग के साथ एक अभियान छेड़ चुकी हैं। उनकी मांग है कि जानवरों पर अत्याचार करने वालों के लिए कानून पुराने पड़ चुके हैं। 1960 में बने कानूनों में संशोधन कर उन्हें सख्त बनाने की तत्काल आवश्यकता है। इस मुद्दे पर बॉलीवुड के कुछ अन्य बड़े एक्टर्स भी एकमत हैं, जिनमें सोनम कपूर, जैकलीन फर्नांडीज, इरफान खान और जॉन अब्राहम आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

कुत्ते की दोस्ती

आदिकाल में, मनुष्य ने कुत्ते पालने की शुरुआत की। प्रारंभिक पालतू पशुओं में कुत्ते प्रमुख थे। इस बात के प्रमाण हैं कि 12,000 से अधिक वर्ष पूर्व, आदि मानव ने शिकार में साथ देने, रक्षा करने और दोस्ती के लिए कुत्तों को अपने साथ रखना शुरू किया। ग्रे वुल्फ यानी भूरे भेड़ियों को कुत्तों का पूर्वज माना जाता है और इनका संबंध लोमड़ी व सियार से भी है। जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से मनुष्य ने अपनी जरूरत के हिसाब से कुत्तों की 400 से ज्यादा ब्रीड तैयार कर लीं।

समस्या क्या है?

सड़क पर पलने वाले कुत्तों का जीवन भारी संकट में है। कुत्तों के काटने की खबरें अक्सर ही देखने को मिल जाती हैं। अस्पतालों में रेबीज की वैक्सीन का अभाव है। कुत्तों की आबादी निरंतर बढ़ रही है। देश में इनकी संख्या अनाधिकारिक तौर पर 30 करोड़ से ऊपर है। सड़कों पर मोटर गाड़ियों की आवाजाही तेज हो गयी है। कुत्तों का चलना-फिरना दुश्वार है। नासमझ लोग इन बेजुबानों पर पत्थर मारते हैं, उन्हें बोरे में बंद करके कहीं दूर पटक आते हैं और कुछ निर्दयी लोग इन्हें जहर देकर भी मार देते हैं। पालतू कुत्तों की भी दुर्दशा है। कई शहरी गैर-जिम्मेदार लोग पालतू कुत्तों को दूर लावारिश हालत में छोड़ आते हैं या तंग मकान में भूखा-प्यासा बांध देते हैं।

समस्या की वजह क्या है?

कुछ दशक पहले सब ठीक था। परंतु, आधुनिक बहुमंजिला इमारतों, स्मार्ट शहरों और टैक्नोलॉजी के विस्तार ने कुत्तों का जीवन मुश्किल में डाल दिया है। हाउसिंग सोसाइटीज में मकान बहुत ऊपर होते हैं, जिससे वहां रहने वालों को नीचे मौजूद कुत्तों की भूख-प्यास और परेशानी का पता नहीं चल पाता। सोसाइटीज और आधुनिक मकानों में लावारिश कुत्तों के बैठने या खाने-पीने की जगह निर्धारित नहीं होती है। स्वच्छता अभियान के चलते कूड़ा-कचरा भी दूर चला जाता है, जिससे सड़क के कुत्तों को भूखा प्यासा रहना पड़ रहा है। वृक्ष, तालाब, हैंडपम्प नदारद हैं। ऐसे में, कुत्तों को न खाना नसीब हो पा रहा है, न पानी और न छाया। ऊपर से, निर्दयी लोग उन्हें चोट पहुंचा देते हैं। जानवरों पर अत्याचार की खबरें अखबारों में तो नहीं दिखतीं, लेकिन सोशल मीडिया पर इनकी भरमार है।

जिस जानवर को कभी मनुष्य ने अपने जिगरी दोस्त का दर्जा दिया और खुद ही उसका विकास किया, आज उसी मानव को हजारों साल पुराना वफादार दोस्त अब बेकार का लगने लगा है। विडंबना देखिए कि देश में हर रोज लाखों टन बचा हुआ भोजन नालियों में बहा दिया जाता है, कूड़े में फेंका जाता है, लेकिन भूखे इंसानों या लावारिश कुत्तों तक इसका एक टुकड़ा भी नहीं पहुंचता है। लोग भूखे कुत्ते को रोटी का एक टुकड़ा नहीं देते हैं, उल्टे कई सिरफिरे उन्हें शारीरिक चोट पहुंचाते हैं, जबकि ये बेचारे मासूम जानवर अपने जीवन के लिए पूरी तरह से मनुष्य पर ही आश्रित हैं।

कमजोर कानून

आज जरूरत इस बात की है कि 1960 में बने, प्रीवेंशन ऑफ क्रूएलिटी टु एनीमल्स एक्ट में संशोधन करके इसमें सजा के प्रावधान सख्त किये जाएं। कुत्तों को मारने वाले अपराधी अभी कुछेक हजार रुपये जुर्माना देकर छूट जाते हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। कुत्तों को तकलीफ देने, चोट पहुंचाने और मारने पर बेहद कठोर सजा का प्रावधान होना जरूरी है। साथ ही, हर कॉलोनी व हाउसिंग सोसाइटी में वहां जन्मे कुत्तों के लिए रहने की सुरक्षित जगह और खाने-पीने के लिए फूड कॉर्नर होना चाहिए। हर घर से एक रोटी भी मिल जाये, तो ये जीव भूखे नहीं रहेंगे।

जागरूकता जरूरी

जानवरों और लावारिस कुत्तों की चिंता करने वाले गैर-सरकारी संगठनों, स्वयंसेवकों व शहरी प्रशासन को चाहिए कि लोगों में जागरूकता उत्पन्न करते रहें। सरकारों को चाहिए कि कड़े कानून बनाएं और कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण की व्यवस्था सुनिश्चित करें। कुत्ते अपनी आबादी को खुद से नियंत्रित नहीं कर सकते। इसके लिए मनुष्यों को ही प्रबंध करना होगा। समाज के प्रबुद्ध वर्ग और सेलिब्रिटीज को चाहिए कि समय-समय पर बेजुबानों की समस्याओं की चर्चा करें और लोगों को जागरूक करते रहें। लोगों को पैट शॉप से महंगे डॉग खरीदने की बजाय, शैल्टर होम्स में उपलब्ध लावारिश या जरूरतमंद कुत्तों को एडॉप्ट करना चाहिए। देशी कुत्तों के बच्चों को भी पालना चाहिए। कॉमेडियन कपिल शर्मा ने खुद कुछ लावारिस डॉग घर में पाले हुए हैं।

नेशनल डॉग डे

हर साल 26 अगस्त को नेशनल डॉग डे मनाया जाता है। इसकी शुरुआत, अमेरिका की पशु प्रेमी और पैट एक्सपर्ट, कोलीन पैज ने 2004 में की थी। इसी दिन उनके घर में शैल्टी नामक एक डॉग को गोद लिया गया था। यह दिन, पालतू और लावारिश दोनों ही तरह के डॉग्स के बारे में जागरूकता फैलाने और उनकी समस्याओं को उजागर करने के लिए मनाया जाता है। सभी पशु प्रेमियों को इस दिन डॉग्स को उपहार देने चाहिए। उन्हें भोजन कराना चाहिए, कहीं घुमाना चाहिए। उनके साथ खेलना चाहिए। यदि आपके पास पालतू डॉग न हो, तो किसी अन्य के डॉग अथवा अपनी कॉलोनी के डॉग्स को खाना देना चाहिए। डॉग्स मानव समाज का अभिन्न अंग रहे हैं। डॉग्स खुश रहेंगे तो समाज में खुशहाली और दोस्ती का माहौल रहेगा।

लोगों के लिए कुछ सुझाव

सड़क पर रहने वाले कुत्तों को खाने के लिए रोटी, बिस्कुट, बचा भोजन और पानी अवश्य दें। कार, बाइक या बैग में बिस्कुट का एक सस्ता पैकेट हमेशा साथ रखें। खिलाने को कुछ न दे सकें, तो प्यार से पुचकारें अवश्य। डॉग से डर लगता हो तो उससे निगाह न मिलाएं और सुरक्षित दूरी पर रहें। किसी भी सूरत में डॉग को मारें नहीं। कोई डॉग को किसी भी तरह से परेशान कर रहा हो तो उसकी शिकायत पुलिस, नगर पालिका, एनजीओ या एनीमल लवर्स से करें। फेसबुक पर एनीमल लवर्स के अनेक ग्रुप और पेज सक्रिय हैं, जैसे कि जॉय फॉर एनीमल्स, डॉगिटाइजेशन, बॉम्बे एनीमल राइट्स आदि। इनसे जुड़ें और जरूरी पोस्ट को शेयर करें। पालतू डॉग कोई खिलौना नहीं, बल्कि आपकी ही तरह एक जीवित व्यक्ति है, जो बस बोल नहीं पाता है। उसे तंग न करें और किसी भी हालत में लावारिस न छोड़ें। आप न पाल सकते हों तो किसी डॉग लवर को दे दें। अनजाने में इलाके में पहुंचने पर दूसरे डॉग हमला कर देते हैं और भोजन तलाशना एक बड़ी समस्या हो सकती है। पहले तो किसी जानवर को घर में तभी लाएं जब आप उसकी जीवन भर की जिम्मेदारी ले सकें। सभी जानवरों पर दया करें। एक जिम्मेदार नागरिक बनें।

लेखक नरविजय यादव वरिष्ठ पत्रकार और ‘जॉय फॉर एनीमल्स’ के संस्थापक हैं.

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