नवभारत बस्तर के कर्मचारियों को दो महीने में एक दफे वेतन मिलता है!

नवभारत यूं तो एक प्रतिष्ठित अखबार समूह है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों की दुर्दशा यह है कि यहां उन्हें दो महीनों में एक दफे वेतन मिलता है। आपको बता दें कि बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर दफ्तर से संचालित है। दूसरी ओर वेतन में भी भारी विसंगति ​की जानकारी मिली है। कुछ लोगों का कहना है कि अन्य अखबार समूहों के बनिस्बत यहां काफी कम वेतन मिलता है। और तो और, पिछले महीने का वेतन इस महीने की 25 तारीख को दी जाती है। ऐसे में अपने परिवार का पोषण करने वाले विशुद्ध पत्रकार किस तरह से अपने दायित्वों को निभाते होंगे, इसे लेकर सहजता से अंदाजा लगाया जा सकता है।

अखबार के मालिक ने मैनेजमेंट में फेरबदल किया और भ्रष्ट लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद नये मैनेजमेंट से कुछ आस तो जरूर जगी है, लेकिन कब तक वे कर्मचारियों के हित में फैसला लेंगे, इस पर संशय बना हुआ है। कुछ महीनों पहले अगस्त माह से वेतन में वृद्धि का आश्वासन दिया गया था, लेकिन अब तक इसका कोई पता नहीं है। कर्मचारियों की स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही है। न तो अब तक जगदलपुर के कर्मचारियों को ही नियमित किया जा सका है और न ही वेतनवृद्धि को लेकर ही कोई सुगबुगाहट समझ आ रही है। कर्मचारियों को बाउचर पर वेतन दिया जाता है, ऐसे में यहां गड़बड़ी की आशंका बनी हुई है। कहीं कर्मचारियों के वेतन का हक तो नहीं मारा जा रहा, ऐसे ही और भी कई सवाल हैं, जो कर्मचारियों के दिमाग में दौड़ते चले जा रहे हैं। कभी उनका नियमितीकरण हो पायेगा क्या, कभी उनका वेतन बढ़ेगा क्या, इस बात को लेकर वे परेशान हैं और लगातार अवसाद की जद में आते जा रहे हैं।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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Comments on “नवभारत बस्तर के कर्मचारियों को दो महीने में एक दफे वेतन मिलता है!

  • ममु जैलू says:

    पत्रिका रायपुर में सबकुछ ठीक नही चल रहा है।प्रसार और विज्ञापन में राज्य संस्करण का प्रदर्शन भले ही ठीक हो, एडिटोरियल में घमासान मचा हुआ है।रायपुर संस्करण के पूर्व संपादक एमपी सिंह यहाँ व्याप्त तनाव के चलते हार्ट अटैक भुगत कर अन्यत्र चले गए हैं।समग्रता मेंदेखें तो समाचारों केमामले में पत्रिका मुख्य प्रतिद्वन्द्वी दै.भास्कर से कहीं भी कमजोर नही लगता।लेकिन सतह के नीचे बेहद असंतोष है।पत्रकारों के लिए काम करना मुश्किल होता जा रहा है।खेमेबाजी पर रोक लगाने की पुरजोर कोशिशों में स्टेट एडिटर अब तक तो नाकाम हैं।दीवाली के बाद कर्मचारियों का पतझड़ का मौसम पूरे सबाब पर होगा।हालत ये है कि मजबूरी या अनजाने में ही लोग यहां काम करेंगे या किसी खेमे से जुड़कर। आगे भगवान ही मालिक है।

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