फिर आया रेडियो का जमान

‘गीतमाला के श्रोताओं को अमीन सयानी का नमस्कार’…याद आया! इस कार्यक्रम को सुनने के लिए लोग एक हफ्ते तक बेसब्री से इंतजार किया करते थे। किसी जमाने में रेडियो होना सोशल स्टेटस का प्रतीक हुआ करता था। टेलीविजन, इंटरनेट, म्युजिक प्लेयर या टेपरिकार्डर इत्यादि ने रेडियो को बड़ी चुनौती दी। जिसका जवाब एफएम रेडियो ने जोरदार तरीके से दिया। एफएम ने रेडियो का जमाना वापस लाया है। जिंदगी में रेडियो एक बार फिर से दाखिल हो गया है। अब रेडियो पर इतने सारे नए गीत आ रहें कि नयी सीडी खरीदने की जरूरत नहीं महसूस होती। सिटी बसों पर एफएम में चल रहा मधुर संगीत में लोग बुरी बातें भूल जिंदगी का लुत्फ उठाते हैं। यह संगीत का कमाल है। ऐसा पाया गया कि यदि पेड़-पौधों को संगीत की संगत में बढ़ने का अवसर दिया जाए…तो वो अधिक विकासशील हो जाते हैं। आदमी भी संगीत के जादू से अछुता नहीं। मधुर संगीत मन को शांति देकर शरीर में नयी ताजगी का संचार कर सकता है। उदघोषकों की प्रयोगधर्मी आवाज…उतार चढ़ाव काफी आकर्षित करते हैं। श्रोताओं की नब्ज का अंदाजा शायद इन्हें है। रेडियो ने टीवी धारावाहिकों के प्रसारण का जमाना भी देखा है। पहले पहल टेलीविजन केवल सूचना का माध्यम हुआ करता था। सिनेमा व संगीत की लोकप्रियता का असर टीवी पर पड़ा। शुरू हुआ फीचर फिल्मो का प्रसारण, फिर फिल्मी गीतों से सजा चित्रहार भी। लेकिन वो भटका …। रेडियो का वजूद टीवी से ऐसा मेल नहीं खाता कि कार्यक्रमों का लेनदेन किया जा सके, लेकिन यह हासिल हो चुका है। एफएम के पास नए व हिट कार्यक्रमों का विकल्प उपलब्ध रहता है। रेडियो चैनल यह समझ रहे हैं कि लोग बार-बार उसी फनकार को नहीं सुनेंगे। वो नहीं चाहते कि हल्की-फुल्की जानकारियों से उन्हें बहकाया जाए। रेडियो केवल टीवीनुमा- सिनेमानुमा बनकर न रह जाए। कुछ शिक्षा-कहानीनुमा भी हो। बिग एफएम पर प्रसारित ‘यादों का इडियट बाक्स…याद शहर’ श्रोताओं की चाहत को ध्यान से सु्न रहा है। काफी-हाऊस पर युनुस खान भी कहानियां लेकर आते हैं। कोई भी वक्त या मौसम आप रेडियो को ट्युन कर मनपसंद कार्यक्रम सुन सकते हैं। विकास की भूख ने रेडियो को अनिवार्य बनाया था। सूचना व मनोरंजन के तालमेल ने उसे लोकप्रिय बना दिया।

परंपरागत रेडियो जब अपनी सीमाओं से पीड़ित होने लगा। श्रोताओं की अपेक्षाओं को पूरा करने के रास्ते तलाशे जाने लगे। इन प्रश्नों को ध्यान में रखकर रेडिकल बदलाव अनिवार्य हो चले। इन्हीं बदलावों ने एफएम रेडियो का आधार रखा। इस प्रसारण तकनीक में तरंगें बहुत ऊंचे जाकर बिखरती हैं व आवाज़ बडी साफ सुनी जा सकती है। संगीत के शौकीन लोगों को रेडियो में एक नयी कहानी मिली। यहां डिजिटल स्टीरियो को केंद्र में रखकर रोचक कार्यक्रम तैयार किए गए। सुबह-शाम घर से दफ्तर, दफ्तर से घर तक सफर ट्रेफिक में गुजार दिया करते हैं। एक तरह से महानगरों की आधी आबादी एक समय में सड़कों पर रहती है। उनके लिए हर पल की ट्रेफिक मूवमेंट खबरें बड़ी उपयोगी होती हैं। फरमाइशी कार्यक्रमों में खत लिखकर इंतज़ार करने का जमाना तेजी से बदल रहा है। एक किस्म की भागीदारी के जरिए सक्रिय साझेदारी को रेखांकित किया गया। सहभागी रेडियो की संकल्पना शायद इसी को कहते हैं। खनकता हुआ संगीत, दिलकश अदाएगी, अन्वेषी कार्यक्रमों की संकल्पना एफएम रेडियो की बड़ी ताकत बन गए हैं। नब्बे दशक के मध्य में शुरु हुयी क्रांति आज एक-एक दैनिक जरूरत बन गयी है। शरूआत में कहा गया कि रेडियो ने वेस्टर्न पावर को तबाह किया…अब हिन्दुस्तान की बारी है। हमारे यहां एफएम रेडियो की शुरुआत ऐसे समय में हुई जब ऑडियो कंपनियां अपनी तकदीर का मातम कर रही थी। उसका उदय उस जमाने में हुआ जहां टिकाऊ संगीत को पांव जमाने की जगह नहीं मिल रही थी। आज का जमाना एफएम के लिए माकूल समय है। जब वो आया तब भी माकूल था। आज हर तीसरे दिन एक नया गाना रिलीज हो जाता है। एक नजरिए से देखा जाए तो आडियो कंपनियों की खराब तकदीर रेडियो के लिए आक्सीजन सी है। फुर्सत कम होने की वजह से शुरू में लोग क्वालिटी पर ध्यान नहीं दे रहे थे। आज रेडियो लोगों को लिस्सिनिंग लिट्रेट कर रहा है। आज का रेडियो स्थानीय संवेदनाओं से जुड़े कार्यक्रम भी बनाने लगा है। जाहिर है कि दिल्ली व कोलकाता में रहने वाले लोगों का स्वाद अलग है। दर असल माइक्रोफोन के सामने जो प्रस्तुत किया जा रहा वो सब वाचिक कला का ही विस्तार है। रेडियो के चरित्र को बनाने में ध्वनि-वाणी-संगीत का रोल निर्णायक है। सुनने वालों का अनुभव संसार आंदोलित करने के लिए नित नए प्रयोग जरूरी हैं। क्योंकि एक्शन आवाज से परवान चढ़ती है। रेडियो भाषा विमर्श व विवाद का बड़ा विषय है। लेकिन आप गौर करेंगे कि भाषा परिवेश से उत्पन्न होती है।

हाल ही बात है बिग एफएम ने रेडियो फिल्म का प्रसारण शुरु किया। यादों के इडियट बाक्स फेम सरीखा लेखकों की एक नया मंच मिला। रेडियो में फिल्म वाली बात सुनकर एक दिलचस्प मुस्तकबिल नजर आता है। कहानियां-नाटक-रूपक रेडियो पर एक अरसे से सुनाए जा रहे थे। नीलेश मिश्रा की याद शहर की कहानियां अपने अंदाज़ में अब तक की परंपरा से अलग हैं। आपको ‘काफी हाऊस’ कार्यक्रम में आने वाली कहानियां भी पसंद आएंगी। याद शहर की कहानियां आप सरीखा युवा लेखको को उचित मंच देने के लिए मशहूर हैं। कहना होगा कि इस कार्यक्रम ने प्रतिभाओं को गुमशुदा होने से सुरक्षित रखा है। याद एक साहस भरा प्रयास था। रेडियो में फिल्म का नया आकर्षण जुडना माध्यम की जिंदगी में दिलचस्प मोड़ थी। एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव का रास्ता याद शहर की सड़क से गुजरते देख रहा हूं। श्रोताओं को बेहतर से बेहतर सेवाएं देने की दिशा में बेहतरीन पहल यह थी। कहना चाहिए कि थोड़े विलम्ब से सही लेकिन नीजी एफएम रेडियो ने साहित्य को अपना लिया है।

 

सैयद एस.तौहीद

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