सहारा से सीईओ अरुप घोष, विजय त्रिवेदी, ओंकारेश्वर पांडेय समेत दो दर्जन पत्रकार कार्यमुक्त

अरुप घोष

एक बड़ी खबर सहारा मीडिया से आ रही है. सहारा समय न्यूज चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ अरुप घोष समेत कई वरिष्ठ पत्रकार अब इस मीडिया हाउस के हिस्से नहीं रहे. अरुप घोष का कार्यकाल दो महीने पहले ही पूरा हो गया था और वो आगे कार्य करने को इच्छुक नहीं थे.

वहीं कुछ लोगों का कहना है कि सहारा में सेलरी संकट को देखते हुए प्रबंधन ने ज्यादा सेलरी वालों को कार्यमुक्त करने का फैसला लिया. इसी क्रम में कई लोग सहारा से गए हैं. खासकर अरुप घोष जिन लोगों को अपने साथ या बाद में लेकर आए थे, उन्हें जाना पड़ा है. ऐसे लोगों को संख्या दो दर्जन से ज्यादा है.

विजय त्रिवेदी और ओंकारेश्वर पांडेय भी अरुप घोष के सौजन्य से सहारा में आए थे. इन लोगों की भी विदाई की खबर है. सूत्रों का कहना है कि विजय त्रिवेदी कई किताबों के प्रोजेक्ट में बिजी हैं, इसलिए उन्होंने खुद को सहारा से अलग कर लिया है. विजय त्रिवेदी सहारा न्यूज नेटवर्क में एडिटर (कंटेंट) की भूमिका में थे. उन पर ग्रुप के सभी चैनलों के कंटेंट की जिम्मेदारी थी. त्रिवेदी राजस्थान पत्रिका में नेशनल एडिटर और एनडीटीवी इंडिया में कंसल्टिंग एडिटर की भूमिका निभा चुके हैं. वे अटल बिहारी वाजपेयी के बाद अब योगी आदित्यनाथ पर किताब लिखकर चर्चा में आए हैं.

ओंकारेश्वर पांडेय को लेकर विरोधाभाषी खबरें आ रही हैं. कुछ लोगों का कहना है कि वे कार्यमुक्त हो गए हैं वहीं कुछ का कहना है कि पांडेयजी अभी सहाराश्री सुब्रत राय तक पहुंचने की कोशिश में लगे हैं ताकि वह कांटीन्यू कर सकें. वरिष्ठ पत्रकार ओंकारेश्वर पांडे राष्ट्रीय सहारा के हिंदी और उर्दू अखबारों में सीनियर ग्रुप एडिटर के बतौर कार्यरत थे. वे पहले भी सहारा समूह में काम कर चुके हैं. तब वे राष्ट्रीय सहारा अखबार के दिल्ली संस्करण के स्थानीय संपादक हुआ करते थे. ओंकारेश्वर पांडे पूर्वांचल प्रहरी, द संडे इंडियन, रूरल एंड मार्केटिंग, सन स्टार आदि के संपादक रहे हैं.

फिलहाल इतने बड़े बड़े विकेट गिरने से सहारा मीडिया में आज हलचल का माहौल है. लोग कामकाज में कम, इन बदलावों में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं. चर्चा ये भी है कि सहारा प्रबंधन अब अपने पूरे मीडिया हाउस को सिंक्रोनाइज करने की कोशिश में है ताकि इसे नो प्राफिट नो लॉस में लाया जा सके. इसके लिए बड़े पैमाने पर छंटनी की आशंका है. गुपचुप तरीके से सहारा से हटाए जाने वाले लोगों की लिस्ट बनाई जा रही है. ऐसे लोगों की संख्या सौ से ज्यादा हो सकती है.

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Comments on “सहारा से सीईओ अरुप घोष, विजय त्रिवेदी, ओंकारेश्वर पांडेय समेत दो दर्जन पत्रकार कार्यमुक्त

  • सहारा में एक कमी है . वह है कामचोर लोगों द्वारा फर्जी चिट्ठी के जरिये योग्य कर्मियों को बदनाम करना. कई कामचोर लोग फर्जी चिट्ठी लिखकर ऐश कर रहे हैं. इन्ही लोगों में पटना राष्ट्रीय सहारा के दो कर्मी हैं जो देहरादून ट्रान्सफर होने के बावजूद सहाराश्री के आदेश को धत्ता बताया. एक तो दोनों कर्मी देहरादून नहीं गए और दूसरी ओर तीन महीने से घर बैठकर वेतन उठा रहे हैं.. यह सब फर्जी चिट्ठी और कार्मिक लोगों की मिलीभगत से हो रहा है. पटना से ट्रान्सफर किये गए दोनों कर्मी निहायत कामचोर हैं. उत्पादकता जीरो है. संस्थान विरोधी कार्यों में जुटे रहते है पर फर्जी चिट्ठी लिखने में माहिर हैं. ऐसे लोगों को निकाल दिया जाये तो पटना यूनिट सुधर जायेगा. भगवन ऐसे लोगों से सहारा को बचाए.

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  • Saharasri is very generous person as well as good administrator. Wait for his new circular. All person who is not performing will be kick out.

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  • arun shrivastava says:

    सहारा : जब हटाना ही था तो रखे ही क्यों? ओंकारेश्वर पांडेय के बहाने कुछ सवाल… अभी भड़ास4मीडिया से ओंकारेश्वर पांडेय के आने की खबर हटी ही थी ओंकारेश्वर पांडेय सहारा से विदा होने की खबरें आ गई। खबर अपुष्ट (वैसे इस न्यूज पोर्टल की खबर गलत होती नहीं और मैं चाहता नहीं कम से कम ये खबर सही हो) है। किसी के ‘ पेट पर लात पड़ना ” अच्छी बात नहीं है बावजूद इसके ये और इन जैसे लोग ना जाने कितनों के पेट पर लात मार चुके हैं और जब भी मौका मिलेगा मारेंगे, कभी अपनी नौकरी बचाने के लिए तो कभी मालिक के दरबार में अपना कद बढ़ाने के लिए।

    20 सदी के अंतिम दशक के शुरुआत में एक मीडिया संस्थान ने अपने पैसे के दम पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की सड़कों को ” ये एक और अखबार नहीं रचनात्मक आंदोलन है” नामक शीर्षक से पाट दिया था। आज 27 साल बाद इसका ” वास्तविक मतलब समझ में आया, वैसे संकेत तो उसी समय मिल गया था जब अखबार का दिल्ली संस्करण शुरू हुआ नहीं कि उसके संस्थापक संपादक कमलेश्वर जी हक गए या हटा दिये गए। ऐसा किसी अखबार में देखा है। मैंने 40 साल की पत्रकारिता के दौरान तो नहीं देखा और इस तरह का ” रचनात्मक आंदोलन” भी नहीं देखा।

    अखबार में लोगों का नौकरी छोड़ना फिर आना कोई नयी बात नहीं है। 1988 में मैंने हिंदी दैनिक आज के इलाहाबाद संस्करण से अखबारी नौकरी में आया। उस समय भी लोग आज अखबार छोड़ते थे तो दैनिक जागरण में आते थे। दैनिक जागरण छोड़ते थे तो आज ज्वाइन करते थे। नवभारतटाइम्स की गिनती गंभीर अखबार में होती थी तो हिंदुस्तान नामक अखबार को पत्रकारिता के क्षेत्र में लाटरी वाला अखबार कहा जाता था। अखबार की पहचान शहर से होती थी। बनारस आज का तो कानपुर जागरण का, लखनऊ से स्वतंत्र भारत तो आगरा-बरेली अमर उजाला का था। इंदौर से एक संस्करण के बल पर 17 साल तक नई दुनिया नंबर वन था।

    अखबार का बेड़ागर्क किया ” एक साथ कई शहरों से प्रकाशित” कारपोरेट कल्चर व तथाकथित मीडिया हाउस ने। ना तो पहले अखबारों में ” आयाराम-गयाराम ” की स्थिति उतनी भयावह थी जितनी ” करपोरेटिया ने कर रखी है और ना संपादकों की हालत। संपादक नामक जीव अखबार से कब और कैसे गायब हो गया यह पता ही नहीं चला। पहले भी मालिक अखबार चलाते थे आज भी चला रहे हैं। राष्ट्र रत्न कहे जाने वाले शिव प्रसाद गुप्त के पुत्र शार्दुल विक्रम गुप्त ने अपने पिता की विरासत आज अखबार संभाला तो पूर्णचंद्र गुप्त के बेटे नरेन्द्र मोहन ने दैनिक जागरण और अग्रवाल और महेश्वरी परिवार ने अपने-अपने पिता की विरासत अमर उजाला को।

    कान्वेंट स्कूल से आयी नयी पीढ़ी ने विरासत तो संभाली लेकिन उनकी रुचि उस तरह से अखबार के प्रति नहीं रही जिस तरह से उनके पूर्वजों की थी। पूर्वजों के लिए अखबार मिशन था वंशजों के लिए धंधा। इसी मानसिकता की देन है ” कारपोरेटिया कल्चर। इसी कल्चर ने अखबार को पहले घराने में बदला उसके बाद मीडिया में। अखबारी घराने मीडिया हाउस हो गए और पत्रकार मीडियाकर्मी। जिस तरह से नौकरशाही अपने को खपाने के लिए नये-नये पद (जैसे प्रमुख सचिव, मुख्य सचिव, अपर सचिव, अनु सचिव, प्रभारी सचिव वगैरह वगैरह) सृजित करती है वैसे ही मालिक अपने चमचों को खपाने के लिए, अपना आदमी बैठाने के लिए नये-नये ओहदे। पहले सिर्फ और सिर्फ संपादक होता था ऊपर कोई नहीं, उसके नीचे उप संपादक होता था और कोई नहीं। आज संपादक के ऊपर और आसपास स्थानीय संपादक, संपादक, प्रधान संपादक, प्रबंध संपादक, समूह संपादक होने लगे हैं। एक अखबार ने संपादक के दो फाड़कर दिये। संपादक समाचार और संपादक विचार। अब जब राष्ट्रीय कहे जाने वाले अखबार ने यह किया तो नाम के राष्ट्रीय ” राष्ट्रीय सहारा” कैसे पीछे रहता। इस अखबार ने समूह संपादक के सिर पर वरिष्ठ समूह संपादक ओंकारेश्वर पांडेय को ढूंढ-ढांढ कर ले आया और बैठा दिया। पहले आदरणीय रणविजय सिंह समूह संपादक थे। अब कल को वो वापस आ जाएं (आदरणीय स्वतंत्र मिश्र की तरह) और ओंकारेश्वर पांडेय के जाने की खबर गलत हो जाए तो…?

    तो क्या वे अति वरिष्ठ समूह संपादक के पद पर सुशोभित करेंगे। अब जब कल्पना ही कर रहे हैं तो कुछ और क्यों नहीं। घूर के दिन भी 12 साल पर फिर जाते हैं तो फिर चर्चा सहारा के संपादकों की हो रही है। इस कसौटी/फार्मूला के तहत अगर गोविंद दीक्षित और माधव कांत मिश्रा जी की वापसी हो गई तो उन्हें कौन सा पद नवाजा जाएगा।
    यह सवाल मैं किसी का भी अपमान करने या अपनी खुन्नस निकालने के लिए नहीं कह रहा हूँ बल्कि इस तरह की कुप्रवृत्ति की तरफ ध्यान आकर्षित करा रहा हूँ। रही बात सहारा की तो इसके बारे में एक कहावत है कि, ” सहारा में फ्यूज़ बल्ब भी जल जाते हैं। साहित्य में थूंककर चाटना विभत्स रस है तो सहारा में श्रृंगार रस। लोग निकाले जाते हैं, फोटो छापी जाती है और साथ ही साथ हिदायत दी जाती है कि, इनसे अब सहारा का कोई संबंध नहीं है जो संबंध रखेगा वह खुद जिम्मेदार होगा फिर ऐसे लोगों को रख भी लिया जाता है।

    अरुण श्रीवास्तव
    देहरादून।

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