पत्रकार शलभ को भाजपा ने देवरिया से टिकट नहीं दिया तो साथी पत्रकार हो गए नाराज, पढ़ें एक पत्र

प्रिय मित्र शलभ,

भाजपा के उम्मीदवारों की सूची में तुम्हारा नाम न देख कर बहुत निराशा हुई. तुमने तो पार्टी के अनुशासित सिपाही की तरह चुप्पी साध ली मगर मैं तो बोलुंगा. भाजपा के प्रति एकमात्र जुड़ाव कि वजह तुम थे. इसी को देश का भ्रष्ट राजनीतिक सिस्टम कहते हैं भाजपा भी इससे अछूती नहीं है, यहां सफल होने का पैमाना है किसी बड़े नेता की चापलूसी करना, किसी बड़े बाप का लड़का होना अकूत संपत्ति होना या बाहुबली होना. इनमें से किसी खांचे मे तुम फिट नहीं बैठते.

तुम्हें क्या लगा कि लाखों के पैकेज वाली नौकरी छोड़ कर राजनीति में आने पर और सीधे जनता के बीच जाकर काम करने पर टिकट मिलता है. हुंह कितने नादान निकले तुम. इससे बढ़िया तो पत्रकार रहते दूसरों की तरह गणेश परिक्रमा करते और एमएलसी या राज्य सभा मे नामित हो जाते. कुछ नहीं तो सूचना सलाहकार या सूचना आयुक्त ही बन जाते मगर नहीं तुम्हें तो जननायक बनने का भूत सवार था न, तुम्हें शायद अंदाजा नहीं था कि राजनीति के शातिरों को ये बर्दाश्त नहीं कि कोई नवागंतुक आए और सीधे जनता के बीच जाकर लोकप्रिय हो जाए.

तुम्हें क्या लगा कि दो दशक की दमदार और जनहित की पत्रकारिता करने के बाद राजनीति में भी जनहित की लड़ाई लड़ोगे तो मठाधीश तुम्हें आसानी से पचा लेंगे. अरे इससे बढ़िया तो स्मार्ट दिखते ही हो फिल्म में जाकर नाच गाना किये होते तो गोरखपुर से टिकट पा जाते. और गोरखपुर सीट भी तुम निकाल लेते. तुम्हें देवरिया न सही गोरखपुर से भी टिकट न देकर देश के भ्रष्ट राजनीतिक सिस्टम ने उन युवाओं साफ सुथरे ईमानदार लोगों को भी संदेश दिया है कि चुपचाप अपना काम करो जो कर रहे हो या करने को मिला है, लोकतंत्र में तुम्हारी भूमिका सिर्फ वोट देने तक सीमित है, ज्यादा ज्यादा हमारे जिंदाबाद के नारे लगाओ समझे नेता मत बनो.

ऐ भाजपा नेतृत्व, तुम्हारे टिकट वितरण को देखकर हैरानी नहीं होती बल्कि हंसी आती है. ऐ स्वयंभू चाणक्यों तुम्हारी बुद्धि कहां चली गई है टिकट वितरण में या मान लिया जाए विनाशकाले विपरीत बुद्धि. सिर्फ भाषण देना कि अच्छे लोगों को राजनीति में आना चाहिए जब कोई आ जाए तो उसे किनारे लगा देना ताकि दूसरे लोग भी जो उत्साहित हो रहे हों समझ जाएं कि देखो येही हश्र तुम्हारा भी होगा.
मन बेचैन था भड़ास निकालनी थी तो निकाल दी जिसको जो लगे सो लगे…

आपका
राजीव तिवारी
पत्रकार
लखनऊ

राजीव तिवारी पिछले नौ वर्षों से लखनऊ में हैं और करीब पांच वर्षों से बतौर राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं.

दो पत्रकार भरी सड़क पर खुलेआम सांड़ बन गए हैं 🙂 एक दूसरे को बता रहे हैं दलाल…

दो पत्रकार भरी सड़क पर खुलेआम सांड़ बन गए हैं 🙂 एक दूसरे को बता रहे हैं दलाल… एक एनडीटीवी का है और दूसरा सहारा समय का…

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