विज्ञापनों को हथियार और खैरात की तरह इस्तेमाल करना बंद करे सरकार

श्रीप्रकाश दीक्षित (भोपाल)-

बीस-एक साल पहले तक प्रसार और सामग्री के मामले मे हिन्दी पट्टी मे अंगरेजी के अखबारों का खासा रुतबा और दबदबा हुआ करता था.अब हालात बदल चुके हैं और हिन्दी के अखबार कम से कम प्रसार के मामले मे तो अंगरेजी के अखबारों को पीछे छोड़ चुके हैं. ऐसे मे कश्मीर फाइल्स पर टाइम्स ऑफ इंडिया मे 27 मार्च को चेतन भगत का लेख देख कर आश्चर्य के साथ खुशी भी हुई. यह लेख दैनिक भास्कर मे तीन दिन पहले याने 24 मार्च छप चुका है. भले टाइम्सवालों का जो स्टैंड हो पर दोनों अखबारों का पाठक होने से मैं यही मानूँगा की वे भास्कर मे छप चुका लेख परोस रहे हैं.

उधर मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार अपने विज्ञापन दैनिक भास्कर मे नहीं छपवा रही है,शायद केंद्र और अन्य भाजपा सरकारें भी ऐसा कर रही हैं..!नाराजगी के चलते विज्ञापनों पर रोक लगा उसे बतौर हथियार इस्तेमाल कर सरकार जनता के साथ भी अन्याय कर रही है.मसलन 12 से 14 साल के बच्चों का टीकाकरण 23 मार्च से शुरू हुआ जिसकी जानकारी मोदी और शिवराज की तस्वीरों वाले विज्ञापन के मार्फत दी गई.

यह विज्ञापन दैनिक भास्कर मे नहीं छपाया गया है. इसे सब मानेंगे की तमाम विसंगतियों के बावजूद दैनिक भास्कर सबसे ज्यादा बिकता है. उसमे सूचनात्मक विज्ञापन ना छपने से बड़ी संख्या मे जनता तक सरकार का महामारी विरोधी संदेश तो पहुंचा ही नहीं..?

इस प्रकार सरकार विज्ञापनों को बतौर हथियार इस्तेमाल कर रही है.उसे कम से कम कोरोना से संबंधित विज्ञापनों पर रोक नहीं लगानी थी. उधर सरकारी विज्ञापनों का बतौर खैरात भी इस्तेमाल होता रहा है,और हो रहा है,जिसकी बानगी दीगर अखबारों मे छप रहे अनावश्यक विज्ञापनों मे देखी जा सकती है.

दो दशक पहले तक प्रदेश के साप्ताहिक अखबारों को हर महीने एक पेज विज्ञापन की खैरात दी जाती थी.जब यह मामला हाईकोर्ट गया तो उसने इस सरकारे भीख पर रोक लगा दी.इसके बाद दैनिक अखबारों मे हैरान करने वाला इजाफा हुआ,अब न्यूज़ पोर्टलों का जमाना है.!

दैनिक भास्कर/टाइम्स ऑफ इंडिया की कतरनें-



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