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साहित्य

तब वीरेन डंगवाल ने कहा था : ….गण्यमान्य लोगों की धारा मेरी धारा नहीं है

Pankaj Chaturvedi : तुम्हारे लिए कोई एक शब्द इस्तेमाल करने की विवशता हो, तो मैं कहूँगा : अकृत्रिम। यही सिफ़त तुम्हें ज़िन्दगी के बेहद क़रीब लायी और तुम उसकी महिमा को पहचान सके। एक हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर मनुष्यता को पहुँचाने के लिए सड़क बनाते शहीद हुए मज़दूरों की स्मृति में कृतज्ञता से नतमस्तक होकर तुमने लिखा : ”कितनी विराट है यहाँ रात / घुल गये जिसमें हिम-शिखर / नमक के ढेलों की तरह / सामने के पहाड़ अन्धकार में / दीखती हैं नीचे उतरती एक मोटर गाड़ी की / निरीह बत्तियाँ / विराट है जीवन।”

Pankaj Chaturvedi : तुम्हारे लिए कोई एक शब्द इस्तेमाल करने की विवशता हो, तो मैं कहूँगा : अकृत्रिम। यही सिफ़त तुम्हें ज़िन्दगी के बेहद क़रीब लायी और तुम उसकी महिमा को पहचान सके। एक हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर मनुष्यता को पहुँचाने के लिए सड़क बनाते शहीद हुए मज़दूरों की स्मृति में कृतज्ञता से नतमस्तक होकर तुमने लिखा : ”कितनी विराट है यहाँ रात / घुल गये जिसमें हिम-शिखर / नमक के ढेलों की तरह / सामने के पहाड़ अन्धकार में / दीखती हैं नीचे उतरती एक मोटर गाड़ी की / निरीह बत्तियाँ / विराट है जीवन।”

प्यार के लिए नज़र का यही विस्तार चाहिए था। इसी बिना पर तुम्हारी एक बड़ी ख़ासियत थी—-विडम्बना के बावजूद जीवन के सुखद पहलू को देख पाना : ”मेरे चेहरे पर / गोया मुहल्ले के नाई की गँदली फ़व्वारा बोतल से / एक सुहानी फुहार।”

शायद इसीलिए सिर्फ़ कुछ ख़ास, ताक़तवर लोगों से रब्तोज़ब्त रखने की उच्च-भ्रू संस्कृति के बरअक्स तुमने उनसे लगाव की बात की, जिन्हें हम जानते तक नहीं : ”चिट्ठियाँ छाँटते समय / दीखते हैं कई चेहरे फाटक और कुत्ते / इन्हीं में कई अजनबी भी हैं / मगर उन्हें भी सहेज कर बाँध लिया जाता है / गड्डी में।”

मेरे यह पूछने पर कि ”आप अपने को किस परम्परा का कवि मानते हैं ?”, तुमने कहा था : ”मैं किस धारा का कवि हूँ,…………यह तो दूसरे जानेंगे। इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि गण्यमान्य लोगों की धारा मेरी धारा नहीं है।”

यों तुम बराबर प्रभु-वर्ग को प्रश्नांकित करते रहे। देश को मिली आज़ादी का एक प्रमुख अंतर्विरोध क्या गाँधी और नेहरू के फ़ासिले में ही नज़र नहीं आता, जैसा कि तुमने जनमत के बहाने लक्ष्य किया है : ”यह भी कहते लोग कि यद्यपि हैं नेहरू जी / गाँधी के शागिर्द स्वदेशी के हिमायती / लेकिन आला ख़ानदान में रख-रखाव में / उनका जलवा अंग्रेज़ों से भी बढ़कर है।”

अब राजनीति बहुत बदल गयी है। नेहरू से उसने ठाट-बाट ज़रूर लिया है, मगर उनकी निष्ठा को भुला दिया है, जिस पर गाँधी को भी संदेह नहीं था। नतीजतन हम वह राजनीति देखते हैं, जो मूल्यों की दुहाई देती है, पर जिसके हाथ ख़ून में रँगे हैं : ”कौन हैं वे,……….कौन / जो हर समय आदमी का एक नया इलाज ढूँढ़ते रहते हैं ? जो बच्चों की नींद में डर की तरह दाख़िल होते हैं ? जो रोज़ रक्तपात करते हैं और मृतकों के लिए शोकगीत गाते हैं ?”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 95)

तुम्हारे होते हुए या होने के कारण किसी को तकलीफ़ हुई, तो वह भी तुम्हें गुनाह जैसा लगा। प्यार जो करेगा, उसकी पहचान यह है कि पीड़ा नहीं पहुँचायेगा। ज़िन्दगी को भी नहीं। महादेवी वर्मा के शब्द याद आते हैं : ”पथ को न मलिन करता आना / पद-चिह्न न दे जाता जाना।”

अगर अपने पिता की बाबत तुम्हें अंदेशा था कि कर्तव्य-पालन में तुमसे कोई चूक हुई है, तो ज़रूरी नहीं कि हुई हो ; पर यह नज़रिया तुम्हारी आत्यंतिक संवेदनशीलता का सुबूत था : ”मेरे घर में एक कोना पिता का है / जो काफ़ी उम्रदराज़ हैं………..मैं अपराधियों की तरह सोचता हूँ।”

कैंसर के सतत आघात के चलते आख़िरी वर्षों में तुम अपने अतीत की परछाईं-भर रह गये थे। तब न सिर्फ़ यह कि तुम्हें अपने को अपने ही में खोजना पड़ा, बल्कि प्यार की आशा करते हुए भी तुमको अपराध-बोध हुआ : ”ढूँढ़ना ख़ुद को / ख़ुद की परछाईं में / एक न लिये गये चुम्बन में / अपराध की तरह ढूँढ़ना।”

बीमारी का जिस बहादुरी से तुमने सामना किया, उसकी उचित ही सराहना हुई है; मगर इस संघर्ष के लिए तुम किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहते थे। यह तुम्हारे स्वाभिमान का तक़ाज़ा था। तभी तुम्हें मीर का यह शे’र प्रिय था, जिसमें आत्म-सम्मान की शान्ति, अवसाद और गरिमा में डूबे हुए शाइर का बयान है कि किसी के सामने हाथ क्यों फैलायें ? : ”आगे किसू के क्या करें दस्त-ए-तम्’अ दराज़ / वह हाथ सो गया है सरहाने धरे धरे।”

एक बार फ़ोन पर तुमने उस आवाज़ में—-जो तुम्हारी-सी नहीं रह गयी थी—-मुझसे पूछा : ”मेरी आवाज़ तो ठीक सुनायी पड़ती है न ?” मैंने कहा कि ”हाँ, बिलकुल”, पर तुम शायद जान रहे थे कि मैं झूठ बोल रहा हूँ। तुम्हारे मौन से मुझे ऐसा ही लगा। तुम नहीं चाहते थे कि तुम्हारी विवशता के नतीजे में किसी की चेतना पर कोई दबाव पड़े। लिहाज़ा मुझे शक है कि बहादुरी का लबादा तुमने इसलिए भी ओढ़ा था कि लोग तुम्हारी करुणा तक न पहुँच सकें।

इसी दौरान मीर का एक और शे’र तुम्हारे दिल के सबसे क़रीब रहा, जिसके मुताबिक़ ‘हमारा खोया हुआ दिमाग़ अब भी आसमान पर है, भले आसमान ने हमें मिट्टी में मिला दिया है’ : ”अब भी दिमाग़-ए-रफ़्तः हमारा, है ‘अर्श पर / गो आस्माँ ने ख़ाक में हम को मिला दिया।”

मगर यह तुम्हारी मनःस्थिति का महज़ एक किनारा था। दूसरे सिरे पर सच यह था कि अपनी परछाइयों को तुम्हें अपने होने का यक़ीन दिलाना पड़ रहा था और तुम ज़बरदस्ती जीना नहीं चाहते थे : ”परछाइयो / मैं ही हूँ मैं तुम्हारा / अरी धूप / कब तक पकड़े रहेगी दाँतों से कमबख़्त / बादल का सलेटी दामन।”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 94)

तुम किसी शब्द को ऐसे इस्तेमाल करते थे कि अन्याय का पूरा सन्दर्भ उजागर होता था। मसलन एक मुहावरा है : ”हक़ मारना।” सरकार से हम सही की उम्मीद करते हैं, क्योंकि इंसाफ़ के ही मक़सद से हमने उसे ताक़त दी है।

उसका नाम आने पर मन में छवि उभरती है जनहित के लिए प्रतिश्रुत पराक्रम, प्रामाणिकता और पारदर्शिता की। मगर यह अक्सर आदर्श है, वास्तविकता नहीं।

सरकार का मतलब देश नहीं है। वह कुछ चुने हुए लोगों का समुच्चय है, जिसे एक निश्चित अवधि के लिए शासन की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है।

परिस्थिति बहुत विकट हो, तो यह समय कम भी किया जा सकता है, जैसा कि लोहिया ने कहा था : ”ज़िन्दा क़ौमें पाँच साल इंतिज़ार नहीं करतीं !”

बहरहाल। सरकार न्याय करेगी या नहीं, यह उसमें बैठे लोगों की ज़ेहनीयत पर निर्भर है।

उत्तर प्रदेश सरकार के पास हम शिक्षकों के वेतन का बहुत सारा पैसा कई वर्षों तक बक़ाया था। बीच-बीच में वह कहती भी रहती थी कि अब भुगतान कर दिया जायेगा।

ऐसे ही एक एलान के बाद फ़ोन पर तुमने मुझसे पूछा : ”ये लोग हमारा पैसा दे देंगे ? मार तो नहीं देंगे ?”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 93)

देश को गँवाना नहीं, इसे फिर से पाना है। सत्ताएँ जब इसे ‘मेरा भारत महान’ या ‘अतुल्य भारत’ के रूप में विज्ञापित करती हैं, तो यह बिसराकर कि महानता ख़र्च नहीं, अर्जित की जाती है। वह प्रक्रिया है, उपलब्धि नहीं ; क्योंकि उसे हम अक्षुण्ण नहीं रख सकते, तो खो देते हैं।

नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह की पृष्ठभूमि के चलते आठवें दशक में आंदोलनरत कवियों और बुद्धिजीवियों को लगता था कि भारतीय समाज में एक रैडिकल परिवर्तन संभव है। मगर नवें दशक के अख़ीर में सोवियत संघ और बाद में पूर्वी यूरोप की समाजवादी व्यवस्थाओं के विघटन के साथ वे उम्मीदें पराजित हुईं।

निराशा की उसी मानसिकता में बीसवीं सदी के अन्त के आसपास तुम्हारे प्रिय कवि-मित्र आलोकधन्वा ने लिखा : ”भारत में जन्म लेने का / मैं भी कोई मतलब पाना चाहता था / अब वह भारत भी नहीं रहा / जिसमें जन्म लिया।”

क्या तुम जानते थे कि अजनबीपन का यह एहसास आगे चलकर इस क़दर बढ़ेगा कि कलाकारों और साहित्यकारों पर अपमानजनक और जानलेवा हमले होंगे, कोई अपना प्यारा देश छोड़ने के लिए मजबूर हो जायेगा, कुछ को ऐसा करने की धमकियाँ दी जायेंगी और कुछ यहाँ रहना ही नहीं चाहेंगे?

अगरचे जो विदेश में बसने की बात करता है ; वह एक ओर तो अपने अकूत आर्थिक सामर्थ्य, दूसरी तरफ़ प्रतिगामी ताक़तों से जूझने की अपनी अनिच्छा को भी दिखाता है। कौन झंझट में पड़े का अभिजात रुख़!

क्या इसकी बुनियाद में अपने वतन की मिट्टी से मुहब्बत में कमी नहीं है ? बक़ौल ग़ालिब : ख़ून की लहर के सर से गुज़रने की नौबत हो, तो क्या हम यार की चौखट से उठ जायें?— ”मौज-ए-ख़ूँ सर से गुज़र ही क्यों न जाय / आस्तान-ए-यार से उठ जायें क्या।”

मुहब्बत अगर कम नहीं है, तो सवाल यह उठता है कि मुल्क के हालात से अपने मोहभंग के इज़हार के लिए इसे छोड़ देने के ‘रेटरिक’ का इस्तेमाल करने की ज़रूरत क्या है? दूसरे शब्दों में, यह समस्या का सामना करने का सही तरीक़ा है या कोई हवाई समाधान?

रास्ता तुमने सुझाया था कि जिसे हमने खोया है, उसे हासिल करने की ज़िम्मेदारी भी हमारी ही है : ”देस बिराना हुआ मगर इसमें ही रहना है / कहीं ना छोड़ के जाना है इसे वापस भी पाना है / बस न तू आँधी में उड़ियो। मती ना आँधी में उड़ियो।”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 92)

कभी मन करता है कि आराम किया जाय। बहुत हो गया। झंझट है। वग़ैरह। मगर क्या आराम कभी मिलेगा ?—-इस प्रश्न का उत्तर एक दूसरे प्रश्न में छिपा है—-क्या वह पहले कभी मिला था?

संसार वह है, जो संसरण करता है। यानी चलता है। संसार का शाब्दिक अर्थ है आवागमन और संसरण का पार्थिव जीवन। इसलिए हम रुक जायें, तो भी बीत जायेंगे।

प्रवाह निकल जाने पर पीछे छूटने का मतलब बचना नहीं, बल्कि बिना सार्थकता के क्षरित होना है। तभी तुमने लिखा है : ”………जीवन हठीला फिर भी / बढ़ता ही जाता आगे / हमारी नींद के बावजूद।”

जिसे हम घर समझते हैं, वह दरअसल डेरा है और भले हम यहाँ रहने आये हैं, पर रहना आख़िर है नहीं। कबीर की वाणी गूँज रही है : ”रहना नहीं यह देस बिराना है !”

कोई मंज़िल नहीं है, जहाँ पहुँचकर आराम मिले, क्योंकि उसे जीत माना जा सके।……और इसीलिए सफ़र में होना हार नहीं है। शाइर ने कहा कि जो राह थी, वही मंज़िल थी। नाकामी का कोई प्रश्न था ही नहीं : ” ‘फ़ैज़’ थी राह सर-ब-सर मंज़िल / हम जहाँ पहुँचे कामयाब आये।”

मीर का मशहूर शे’र है : ”अहद-ए-जवानी रो रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद / यानी रात बहुत थे जागे, सुब्ह हुई आराम किया।” यों आराम का क्षण मृत्यु का क्षण है और वह जीवन के बाहर की घटना है।

तुम इस सच को जानते थे। इसीलिए अपने जहाज़ी बेटे पाखू के लिए स्कूली कविता लिखते समय तुमने उसे यह झूठा दिलासा नहीं दिया कि आराम का मौक़ा भविष्य में मिलेगा : ”उठा लंगर छोड़ बन्दरगाह / अभी मिलना नहीं है विश्रांति का अवसर / कभी मिलना नहीं है / बस खोजनी है राह।”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 70)

हिंदी के प्रतिभाशाली कवि और आलोचक पंकज चतुर्वेदी फेसबुक पर लगातार ‘वीरेन डंगवाल स्मरण’ लिख रहे हैं. अब तक 95 कड़ियां प्रकाशित कर चुके हैं. पंकज के ही एफबी वॉल से कुछ नई कड़ियां उठाकर यहां प्रकाशित की गई हैं: पंकज से फेसबुक के जरिए संपर्क इस लिंक पर क्लिक करके किया जा सकता है: Facebook.com/pankaj.chaturvedi.5621


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पंकज चतुर्वेदी लिख रहे हैं ‘वीरेन डंगवाल स्मरण’

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वीरेन कविता को इतना पवित्र मानता है कि अक्सर उसे लिखता ही नहीं है…

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