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ये कैसा जमाना… छोटे अखबारों का खात्मा हुआ और रिटायर पत्रकार चापलूस बन गए…

Arun Chandra Roy : धनबाद में पहले कई छोटे छोटे अखबार छपते थे। आवाज़ , जनमत आदि। इनके मालिक स्थानीय पत्रकार या राजनीतिज्ञ होते थे। अब वे बंद हो गए हैं या निष्प्रभावी। इसी तरह मुझे लगता है कि देश के सभी बड़े छोटे शहरों अख़बार छपते रहे होंगे। उनका अपना स्थानीय महत्व होता होगा। लेकिन अब यह सब ख़त्म हो रहा है।

Arun Chandra Roy : धनबाद में पहले कई छोटे छोटे अखबार छपते थे। आवाज़ , जनमत आदि। इनके मालिक स्थानीय पत्रकार या राजनीतिज्ञ होते थे। अब वे बंद हो गए हैं या निष्प्रभावी। इसी तरह मुझे लगता है कि देश के सभी बड़े छोटे शहरों अख़बार छपते रहे होंगे। उनका अपना स्थानीय महत्व होता होगा। लेकिन अब यह सब ख़त्म हो रहा है।

आर्थिक उदारीकरण के बाद देश के सभी क्षेत्रों में विदेशी निवेश आया है। प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक में भारी निवेश आया है। इसका परिणाम यह हुआ कि बाहरी पूँजी से यहाँ के बड़े अखबारों ने छोटे अख़बारों को ख़रीदा। हिंदी और अंग्रेजी के कुछ बड़े अखबार के राष्ट्रव्यापी संस्करण निकले जिसकी कीमत छोटे अखबारों ने चुकाई।
यह निवेश केवल प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं डालता बल्कि यह अपना एजेंडा भी सेट करता है। हम उन्ही का एजेंडा पढ़/समझ रहे हैं।

Zafar Irshad : ज़िंदगी भर निष्पक्ष पत्रकार होने का दावा करने वाले पत्रकार जब बूढ़े होकर रिटायर हो जाते है तो किसी पार्टी विशेष का भोपूं बन जाते हैं.. अब उनको कहीं अख़बार में लिखने को तो मिलता नहीं है, इसलिए दिन भर वो सोशल मीडिया पर अपनी अपनी पार्टियों का गुणगान किया करते हैं, इस लालच में कि शायद उन्हें पार्टी किसी अकादमी का सदस्य बनाकर उनका बुढ़ापा गुलज़ार करा दे.. यकीन नही आता तो किसी भी रिटायर पत्रकार का फ़ेसबुक पर डाला गया स्टेटस देख लें, आप खुद समझ जाएँगे उनका मन किस तरफ डोल रहा है..

Harishankar Shahi आपके एक पुराने संस्थान से रिटायर इसमें सबसे माहिर हैं…. अधिकतर सेटिंग ही करते रहते हैं… और, कई तो सेट हैं ही…. जनसत्ता में रहे गढ़े लोग इस तरह की प्री-रिटायर या पोस्ट-रिटायर सेंटिंग्स के माहिर होते हैं….

पत्रकार अरुण चंद्र राय, जफर इरशाद और हरिशंकर शाही के एफबी पोस्ट / कमेंट्स.

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