कोई अख़बार इस तेवर में न लिख रहा हो तो उसे भी श्मशान में जला आइए!

रवीश कुमार-

दैनिक भास्कर वही कर रहा है जो करना चाहिए।जब अपने ही पाठक बिना इलाज के मर जाएँ, उनका नाम मौत के आँकड़ों से ग़ायब हो जाए तो फिर अख़बार किसके लिए बचेगा। यह वक्त जनता से वफ़ादारी का है। सरकारों ने बहुत धोखा किया। गुंडई की सीमा से आगे चले गए हैं।

कोई अख़बार इस तेवर में न लिख रहा हो तो उसे भी श्मशान में जला आइये। दैनिक भास्कर के पत्रकार और ताक़त से ज़मीनी काम करें। अपने पाठकों को बताएँ। शानदार। इस अख़बार में अतीत में जो हुआ वो शर्मनाक था उसे याद रखो लेकिन अभी लोगों का साथ दो।


कृष्ण कांत-

“भारत में कोरोना से मौतों की वास्तविक संख्या 5 गुना अधिक, असल संख्या छिपाने के लिए राज्यों पर केंद्र का दबाव”

यह बर्बरता ही उनकी 18 घंटे वाली कर्मठता है। पहला प्रयास लोगों की जान बचाना नहीं, लोगों की आवाज बंद करना है। आंकड़े छुपा लो, पोस्ट डिलीट करवा दो, धमकाओ, मगर जान न बचाओ।

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One comment on “कोई अख़बार इस तेवर में न लिख रहा हो तो उसे भी श्मशान में जला आइए!”

  • ramukaka says:

    हां एनडीटीवी का अतीत भी चकलाघर जैसा ही है। राडिया टेप आने के बाद इसे लोग रंडीटीवी कहते थे।

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