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बिहार में ‘आज’ अखबार की दशा-दिशा : जाने कहां गए वो दिन…

बिहार में “आज” अखबार की स्थिति अच्छी नहीं है. चूँकि मैं इसके स्थापना काल से जुड़ा रहा हूँ इसलिए मुझे असह्य पीड़ा हो रही है. अगले एक दशक के भीतर यह अखबार अपने प्रकाशन के एक सौ  वर्ष पूरे करने जा रहा है. वाराणसी से प्रकाशित होने वाला “आज” का बिहार कार्यालय सन १९७७ में पटना के टीएन बनर्जी रोड में खुला और बयूरोचीफ़ बने श्री पारसनाथ सिंह. मैं पहले से ही आज का पटना में संवाददाता था. बिहार की राजधानी पटना से इसका प्रकाशन २८ दिसम्बर १९७९ को शुरू हुआ.

बिहार में “आज” अखबार की स्थिति अच्छी नहीं है. चूँकि मैं इसके स्थापना काल से जुड़ा रहा हूँ इसलिए मुझे असह्य पीड़ा हो रही है. अगले एक दशक के भीतर यह अखबार अपने प्रकाशन के एक सौ  वर्ष पूरे करने जा रहा है. वाराणसी से प्रकाशित होने वाला “आज” का बिहार कार्यालय सन १९७७ में पटना के टीएन बनर्जी रोड में खुला और बयूरोचीफ़ बने श्री पारसनाथ सिंह. मैं पहले से ही आज का पटना में संवाददाता था. बिहार की राजधानी पटना से इसका प्रकाशन २८ दिसम्बर १९७९ को शुरू हुआ.

भाषा वैज्ञानिक माने जाने वाले बाबू पारसनाथ सिंह के संपादकत्व में इसका प्रकाशन शुरू हुआ था. वह भी क्या दिन थे जब काशी से बाबू दूधनाथ सिंह, नर्वदेश्वर राय, यशवंत सिंह, डॉ धीरेन्द्रनाथ सिंह, पदमपति शर्मा, अशोक सामयिक, सत्यप्रकाश असीम जैसे अपनी-अपनी विधा के धुरंधर सम्पादकीय सहकर्मी पटना में कैम्प किये और अखबार को स्थापित किया. उस वक्त के आर्यावर्त जैसे स्थापित अखबार से लोहा लेना कोई मामूली बात नहीं थी. लेकिन आर्यावर्त सोया हाथी था जिसका लाभ आज को मिला. मैं तो पहले से ही “आज” से जुड़ा था ही. बाद में सुरेन्द्र किशोर जी आये. धीरे-धीरे  गाडी चल पड़ी और आज की इस सेवा यात्रा से जुड़ते गए देवेन्द्र मिश्र, अवधेश कुमार ओझा, कुमार दिनेश, नवेंदु,  सलिल सुधाकर, दीपक कोच्गवे, अनिल विभाकर, दीपक पांडेय, अविनाशचन्द्र मिश्र, अमरेन्द्र कुमार, अविनाश विद्यार्थी आदि.

तात्पर्य यह कि “आज” को सींचने वाले धीरे-धीरे निकलते गए. संपादक सह संचालक शार्दूल विक्रम गुप्त से सबों का सीधा सम्बन्ध था. कोई वाया मिडिया नहीं. मुझे न केवल पप्पू भैया (शार्दूल जी) बल्कि अम्मा जी शशिबाला  गुप्ता (शार्दूलजी की माँ) और उनकी पत्नी श्रीमती पूनम गुप्ता का पूरा प्यार और स्नेह मिला करता था. इसलिए मुझे “आज” का लाडला स्टार कहा जाता था. यही कारण रहा कि पारस बाबू को विदा करते ही कम उम्र में मुझे सम्पादकीय विभाग का प्रभार दे दिया गया. पुराने लोग वाराणसी से विदा होते गए और युवकों की टीम ने पटना का कमान सम्हाला. हाँ, राय साहेब  पटना रह गए.

अमिताभ चकवर्ती और बेनी माधव चटर्जी जैसे नौजवान की प्रबंधकीय व्यवस्था में सब ठीक चलता रहा. लेकिन अचानक कहते हैं न कि किसी की नजर “आज” को लग गयी. उस वक्त पटना में गंगा नदी पर पुल नहीं बना था और पानी वाले जहाज से अखबार के बण्डल को उस पार कर उत्तर बिहार के जिलों में भेजा जाता था ताकि वैशाली, छपरा, सिवान, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर, दरभंगा,  सीतामढ़ी, मधुबनी अदि जिलों में अखबार समय पर पहुँच सके. प्रिंटिंग में लेट होने पर जहाज को कैसे विलम्ब से खोलने के लिए मैं किस तकनीक को अपनाता था, मैं ही जानता हूँ. सन १९८४ में मैं आज से मुक्त हुआ. मेरे बाद असीमजी, विद्यार्थीजी और फिर अविनाशचन्द्र  मिश्र  संपादक बने. अविनाशजी के निकलते ही अखबार बैठने सा लगा. आज ऐसी स्थिति है कि यह अखबार अपने सौ वर्ष पूरे करने का आयोजन देख पायेगा कि नहीं, इस पर लोगों को संदेह है.

विस्तार से बताने का मतलब था आज की पृष्ठभूमि से मित्रों को अवगत कराना. ताजी सूचना यह कि प्रबंधन ने सम्पादकीय विभाग के मजबूत हस्ताक्षर बाल्मीकि विमल और रजनीकांत शुक्ल को  बाय-बाय कर दिया है. आज के साथ स्थापना काल से जुडे कैमरामैन अभय चौबे और लेखा विभाग के खन्ना को भी मुक्त कर दिया गया है. मैं अपनी पीड़ा को और आगे व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ.  मेरा अनुरोध होगा आदरणीय पप्पू भईया और उनके दोनों सुपुत्रों श्वेताभ और शाश्वत से कि अब भी ज्यादा कुछ नहीं बिगड़ा है. आगे आइये और नए सिरे से लांच कीजिये. आपकी पुरानी टीम के सारे  सदस्य पटना में मौजूद हैं.

लेखक ज्ञानवर्धन मिश्र बिहार के वरिष्ठ पत्रकार और “आज” के प्रभारी संपादक रहे हैं. इसके आलावा श्री मिश्र  “पाटलिपुत्र  टाइम्स” (पटना), “हिंदुस्तान” (धनबाद) एडिटोरियल हेड और “सन्मार्ग”  (रांची) के संपादक रह चुके हैं. Gyanvardhan Mishra से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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