भड़ास के संचालन हेतु आर्थिक मदद की अपील

भड़ास4मीडिया एक ऐसा न्यू मीडिया प्लेटफार्म है जो विशेष तौर पर मीडिया के अंदरखाने चलने वाले स्याह-सफेद को उजागर करता है, आम मीडियाकर्मियों के दुख-सुख का प्रतिनिधित्व करता है. साथ ही मुख्य धारा की कारपोरेट मीडिया द्वारा दबाई-छिपाई गई खबरों को प्रमुखता के साथ प्रकाशित प्रसारित कर पूरे मीडिया जगत का माइंडसेट तय करता है. पिछले दस वर्षों से चंदे, डोनेशन और आर्थिक मदद के जरिए संचालित यह चर्चित पोर्टल खबरों को लेकर कभी किसी के सामने न झुका, न डरा. Continue reading

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मोदी सरकार में पीएम से लेकर मंत्री तक अपना काम छोड़ दूसरे का भार हलका करने में जुटा है!

Abhishek Srivastava : अपना काम तो सभी करते हैं। बड़ाई इसमें है कि आप दूसरे का काम करें। वो भी पूरे निस्‍वार्थ भाव से। यह सरकार मुझे इसीलिए इतनी पसंद है। बंधुत्‍व और सहयोग की भावना यहां भयंकरतम रूप में दिखती है। अब देखिए जेटलीजी को। होंगे वकील, लेकिन कानून मंत्री थोड़े हैं। फिर भी एलजी बनाम दिल्‍ली सरकार के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कानूनी व्‍याख्‍या कर दिए। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का बोझ कम हुआ, तो वे अफ़वाहों पर लगाम लगाने के लिए वॉट्सएप के इस्‍तेमाल पर ज्ञान देकर संचार मंत्री मनोज सिन्‍हा को हलका कर दिए। लगे हाथ सिन्‍हाजी वोडाफोन और आइडिया के विलय में जुट गए। Continue reading

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योगीराज में अंधेरगर्दी : सौ से ज्यादा शिक्षकों को मनमाने तरीके से लखनऊ में पोस्टिंग दे दी गई!

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भले ही साफ-सुथरी और सबको न्याय दिलाने का वादा करती हो लेकिन उसके अधिकारी सरकार की मंशा पर पलीता लगाये हुए हैं। ‘पैसे और पहुंच’ के बल पर कई शिक्षकों का अंतर जनपदीय स्तर पर मनमाने ढंग से तबादला करके ‘प्राइम पोस्टिंग’ दे दी गई। वहीं वे शिक्षक-शिक्षिकाएं दर-दर भटक रही हैं, जिनके पास ‘पैसा और पहुंच’ नहीं है। हाल यह है कि तबादला नीति के लिये स्कोरिंग के जो मापदंड तय किये गये थे, उसमें भी खूब खेल हुआ है। Continue reading

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कोर्ट में मीडियाकर्मियों द्वारा डाले गए केस को घुमाने-लटकाने में उस्ताद है दैनिक जागरण प्रबंधन

Brijesh Pandey : दैनिक जागरण, हिसार के 41 कर्मियों के टर्मिनेशन का मामला… ये टर्मिनेशन मामले 16 A के तहत सरकार ने 29 जनवरी 2018 को निर्णय के लिए श्रम न्यायालय, हिसार भेजे थे। प्रबंधन को 22 मार्च को क्लेम स्टेटमेंट का जबाब देना था, तो उस दिन प्रबन्धन ने सरकार के रेफर को गलत बताते हुए मामले को ख़ारिज करने की लिखित पत्र दिया। Continue reading

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IFWJ (Jaipur) sweeps election, Pink City Press Club gives 7 out of 15 seats

Jaipur (Rajasthan): The Indian Federation of Working Journalists (I.F.W.J.) nominees have won the posts of President, General Secretary, Vice President, Treasurer and four in the executive committee in a keen contest for the Pink City Press Club. Results were announced today (March 27 2018). Mr Abhay Joshi won the presidentship securing 192 votes while his immediate rival Mr. Radha Raman Sharma also polled 192 votes.

Both will hold office by turn. Mr. Mukesh Chaudhry of the daily Navjyoti was re-elected general secretary. Abhay Joshi was till recently the Vice President of the IFWJ unit in Rajasthan, headed by Com. Upendra Singh Rathore of Jodhpur. IFWJ veteran Devendra Singh formerly of ETV won the Vice Presidentship. A senior journalist Raghuvir Jangid was elected Treasurer. The four elected to the club executive included Giriraj Gurjar, Vinay Joshi, Vimal Singh Tanwar and Ramendra Singh Solanki.

A notable feature of the Press Club election was that a vetran journalist and former president Ish Madhu Talwar’s fraction suffered crushing defeat. His candidate for Presidentship Harish Gupta, who claims to be general secretary of Rajasthan Working Journalists Union, came fourth in the contest in a six-cornered poll.

Ashok Bhatnagar who broke from the IFWJ and joined the dead outfit, got just two votes. He was also blessed by Talwar. Talwar had lost very badly last year when he had himself contested for Press Club presidentship. His clout with the BJP government was lost when the Rajasthan Govt. evicted him from the Govt. flat as Talwar is no more a working journalist.

Full credit for this glorious victory goes to Comrade Upendra Singh Rathore, State Unit President. Com. Rathore had organized the IFWJ Working Committee meeting in Jaipur on 28th October last year to mark the 67th Anniversary, presided over by Com. K. Vikram Rao president IFWJ He had hosted the IFWJ’s National Council 71st session in the frontier town of Jaisalmer 23-26 September 2016 when delegates had demonstrated at the Pakistan Border  for a free Balochistan and the liberation of Pak-occupied Kashmir. Three days after the IFWJ rally, the Modi government carried of a “Surgical Strike ” inside Pakistan.

Yours fraternally
Vipin Dhuliya
Secretary: IFWJ

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स्वतंत्र मिश्रा ने ‘समाचार प्लस’ छोड़ा, सहारा में हुई वापसी, पढ़ें सहाराश्री का पत्र

सहारा समूह से एक बड़ी खबर आ रही है. स्वतंत्र मिश्रा को फिर से सहारा मीडिया का हिस्सा बना लिया गया है. उन्हें काफी बड़े पद पर लाया गया है. स्वतंत्र मिश्रा की रिपोर्टिंग सीधे सहाराश्री सुब्रत राय और अभिजीत सरकार को रहेगी. सहारा श्री सुब्रत राय ने स्वतंत्र मिश्रा की ज्वायनिंग को लेकर एक पत्र जारी किया है.

इस पत्र में कहा गया है कि सहारा में अपने पिछले कार्यकाल के दिनों में स्वतंत्र मिश्रा पर कई किस्म के आरोप लगे थे. इन आरोपों की जांच कराई गई जिसमें स्वतंत्र मिश्रा पर कोई आरोप सच नहीं पाया गया. सहारा समूह के प्रति प्रतिबद्धता और पिछली पारी की सेवाओं को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र मिश्रा को फिर से सहारा समूह का हिस्सा बनाया गया है.

सुब्रत राय का पत्र पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें.. 

Sahara Shri Letter

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‘हिंदी खबर’ चैनल के एडिटर इन चीफ अतुल अग्रवाल का स्टिंग देखें

कोबरा पोस्ट ने कई मीडिया हाउसों में काम करने वालों का स्टिंग किया. ज्यादातर उनमें मार्केटिंग वाले थे. संपादकीय विभाग के कम लोग ही फंसे.  लेकिन एक ऐसे एडिटर इन चीफ को कोबरापोस्ट ने फांसने में कामयाबी पा ली जो एक न्यूज चैनल संचालित करते हैं. चैनल का नाम है ‘हिंदी खबर’. एडिटर इन चीफ हैं अतुल अग्रवाल.

ये महोदय पहले भी कई चैनलों में काम कर चुके हैं और कई किस्म के विवादों-आरोपों के लिए जाने जाते हैं. कोबरा पोस्ट की टीम के स्टिंग में ये न सिर्फ लपेटे में आए बल्कि बिना एडवांस पैसा मिले ही पेड न्यूज चलाना शुरू कर दिए. साथ ही साथ अपने ‘क्लाइंट’ को बताने भी लगे कि हमने ‘एजेंडे’ को लागू करना शुरू कर दिया है…

ये संपादक महोदय क्लाइंट के मालदार और प्रभावशाली होने का एहसास कर उसे चरणस्पर्श भी बोलने लगे.बड़बोले अतुल अग्रवाल यहीं तक नहीं रुके. उन्होंने ‘क्लाइंट’ द्वारा कोबरा पोस्ट पर परेशान करने का आरोप लगाने पर कोबरा पोस्ट को ही नेस्तनाबूत कर देने की बात करने लगे…

सुनिए देखिए अतुल अग्रवाल का स्टिंग… नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=5iAFRGW0nN4

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कितना आसान हो गया है सच लिखने-बोलने वालों को मार देना…

Prashant Mishra : मप्र के भिंड के पत्रकार संदीप शर्मा की हत्या करने के लिए एक्सीडेंट को हथियार बनाया गया. रांग साइड जाकर ट्रक ने उन्हें कुचल दिया. यह एक्सीडेंट है या हत्या सब जानते हैं. इसके लिए दस सेकेंड का सीसीटीवी फुटेज देख लीजिए, सब जाहिर हो जाएगा. संदीप द्वारा कुछ दिन पहले लिखा एक पत्र भी है. उन्होंने हत्या की आशंका जताई थी. रेत माफिया और सरकारी सिस्टम के लोग मिलकर खुलेआम एक पत्रकार की हत्या करवा देते हैं. बिहार में भी दो पत्रकारों की हत्या कर दी गई. कितना आसान हो गया है आवाज़ उठाने वाले को मार देना. कितना आसान हो गया है सच लिखने-बोलने वालों को मार देना. आप भी हर रोज पत्रकार को गरिया देते हैं. लेकिन किसी पत्रकार के पक्ष में आवाज़ उठाने से बचते हैं.  यह लोकतंत्र है. जय हो ऐसे लोकतंत्र की.

Om Thanvi : ग़नीमत है दिल्ली में पत्रकारों से मारपीट भर हुई है। कैमरे तोड़े गए हैं। मध्यप्रदेश में तो पत्रकार को सरे-राह ट्रक से कुचल दिया गया। बिहार में दो पत्रकारों को एसयूवी चढ़ा कर मार डाला। पत्रकारिता में अच्छे दिन तो पहले ही आ चुके थे। अब उन पर क़ानून-व्यवस्था की मेहरबानी है। और इस आड़ में संदेश साफ़ है – जो बोलेगा, मारा जाएगा।

Abhishek Tiwari Cartoonist : दुखी हूँ। क्षुब्ध हूँ। हमारे भिंड के एक युवा पत्रकार संदीप शर्मा ने भिंड शहर में सिटी कोतवाली के सामने अपनी जान गंवा दी। संदीप के परिवार वालों ने सीधे तौर पर इसे सड़क दुर्घटना न मानकर हत्या बताया है। हत्या की आशंका संदीप को थी। अपनी जान की रक्षा की गुहार उसने देश के पीएम से लेकर, मध्यप्रदेश के सीएम और स्थानीय प्रशासन से बार बार की। दअरसल संदीप एक स्थानीय टीवी न्यूज चैनल के लिए काम करते थे। चम्बल से होनेवाले अवैध रेत खनन पर उन्होंने एक स्टिंग किया था। चम्बल में रेत माफिया किस कदर बुलन्द है। यह किसी से छुपा नहीं है। बानमोर एसपी की मौत सबको याद है। संदीप ने पत्रकारिता धर्म निभाया। बदले में उसे क्या मिला? पुलिस ने SIT गठित की है। पुलिस कैसे जांच करती है, कैसे जांच के परिणाम तय करती है। सबको मालूम हैं। फिर भी हम निष्पक्ष जांच की उम्मीद कर रहे हैं। संदीप के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा दो छोटे बच्चे हैं. संदीप के एक भाई फौज में थे जो अप्रैल 2004 में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे।

Paramendra Mohan : अद्भुत संयोग है! मध्य प्रदेश के भिंड में रेत माफिया के खिलाफ स्टोरी करने वाले पत्रकार संदीप शर्मा को ट्रक ने कुचलकर मार डाला। अपनी जान को खतरा को लेकर दिवंगत संदीप शर्मा ने पुलिस से शिकायत भी दर्ज कराई थी। उधर, बिहार के आरा-सासाराम रोड पर पत्रकार नवीन निश्चल और विजय सिंह स्कॉर्पियो से कुचल कर मार दिए गए। इन्हें एक पूर्व मुखिया पति ने एक स्टोरी को लेकर हाल ही में धमकाया था, संयोग से स्कॉर्पियो उसी की थी। संदेश बहुत सीधा है, पत्रकार वैसी कवरेज न करें, जो अपराधी, रसूखदार न चाहते हों। मीडियाकर्मी ऐसी खबरें न दिखाएं, जो आम लोगों से जुड़ी हों, क्योंकि आम लोगों के हित की खबरों का मतलब ही है राजनीतिक दलों, राजनेताओं, प्रशासनिक संस्थाओं, सत्ता संरक्षित अपराधियों, अपराधियों के खिलाफ खबरें। अगर किसी व्यक्ति को कोई पुलिसकर्मी पीट रहा हो और क्यों पीट रहा है, ये पूछने पर जवाब भी न दे, तस्वीर लेने पर कैमरा भी छीन कर तोड़ दे, महिला पत्रकार होने पर भी बदसलूकी करे, तो बाकी सब भी इससे सबक लेकर पुलिस के हाथों पिटते आम लोग की कवरेज न करे। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में भारत दुनिया के भ्रष्टतम देशों की लिस्ट में विकास करता हुआ 79वें से 81वें पर आ पहुंचा है। रिपोर्ट में भ्रष्टाचार, प्रेस की आज़ादी और पत्रकारों की हत्या के मामले में भारत को फिलीपींस और मालदीव जैसे देशों के समकक्ष बताया गया है। अब चूंकि मीडिया या तो गोदी मीडिया है या देशद्रोही मीडिया है तो पत्रकारों की हत्या हो या पिटाई, किसी को क्या फर्क पड़ता है? लेकिन, हमें फर्क पड़ता है क्योंकि मेरा अभी भी मानना है कि जो पत्रकार होते हैं, वो भी इंसान होते हैं, उनके भी बुजुर्ग माता-पिता होते हैं, उनकी पत्नी भी हत्या के बाद विधवा होती हैं, उनके बच्चे भी पिता की मौत के बाद अनाथ होते हैं। एक बात नोट कर लें कि जिस दिन वाकई मीडिया सौ फीसदी कर्तव्यविहीन और सौ फीसदी मीडियाकर्मी बिकाऊ हो गए, उस दिन जनता के लिए कोई बोलने वाला बचेगा नहीं, सिर्फ राजनेता, सत्ता संरक्षित रसूखदार, अपराधी ही बोलेंगे या फिर उनके समर्थक-विरोधी और वो भी फिक्स्ड क्योंकि तब कवरेज भी सौ फीसदी फिक्स्ड ही होगी। छोटा सा हिंट देता हूं, एक राज्य में एक सत्ताधारी दल का नेता अपने चहेते को ठेका दिलवाता है और विपक्षी दल का नेता ठेका लेने वाली कंपनी में अपने चहेते की ट्रांसपोर्ट कंपनी को माल आवाजाही का काम दिलाता है, दोनों नेता मस्त कमा-खा रहे हैं और दोनों ही एक-दूसरे की आलोचना कर रहे हैं। एक और हिंट, एक सत्ताधारी दल और दूसरा विपक्षी दल दोनों मिलकर विदेशी चंदे के नाम पर करोड़ों का बेहिसाबी गोलमाल करते हैं और इसे कानून का कवच पहना दिया जाता है और ये दोनों भी अपने दल-बल के साथ एक-दूसरे की आलोचना करते हैं। समझना चाहें तो समझें वर्ना पप्पू-गप्पू सीरीज़ तो चल ही रहा है.. चमचे और चम्मचचोर पत्रकारों (पत्तलकारों) का क्या है, मारे जाएं तो अपनी बला से..है कि नहीं?

Pushya Mitra : बिहार में फिर दो पत्रकारों की हत्या हो गयी। इस बार दो पत्रकारों को एक मुखिया द्वारा स्कार्पियो से कुचल कर मारने की बात सामने आ रही है। पत्रकार बाइक पर थे। कल की घटना को मिला दें तो पिछले डेढ़-दो साल में इस तरह पत्रकारों की हत्या के मामले दहाई में पहुंच गए होंगे। इस लिहाज से बिहार पत्रकारों के लिये संभवतः देश का सबसे खतरनाक राज्य बन गया है। अब चुकी इनमें से ज्यादातर पत्रकारों की हत्या राजनीतिक कारणों से नहीं होती, मतलब मोदी विरोध या लालू- नीतीश विरोध के कारण तो यह बड़ा सवाल नहीं बनता। जबकि बस्तर की छोटी-छोटी घटनाएं भी दिल्ली के प्रेस क्लब के आंदोलन का मसला बन जाती है।

मगर सच यह भी है कि ये पत्रकार भी सत्ता के विरोध में पत्रकारिता करते हुए मारे जा रहे हैं। जिलों और प्रखंडों में मुखिया, कोई बड़ा नेता, विधायक भी आखिरकार सत्ता का प्रतीक ही है। पत्रकार जब उनसे टकराता है तो वे इन्हें सबक सिखाते हैं। पिछले साल ही एक टेप भी वायरल हुआ था, जिसमें एक विधायक एक पत्रकार को कुत्ते की तरह गालियां दे रहा था। जिलों और कस्बों के पत्रकार यहां लगातार ऐसे लोगों के निशाने पर रहते हैं। मगर इनके लिये कोई सुरक्षा नहीं है।

यह एक कड़वा सच है कि बिहार के ग्रामीण एवं कस्बाई पत्रकारों के जीवन पर खतरे की एक बड़ी वजह यहां के समाचार समूह हैं। इन्हें पत्रकारिता के साथ-साथ विज्ञापन वसूलने के काम के लिये भी बाध्य किया जाता है। अब चुकी इनका वेतन इतना कम होता है कि कमीशन के लालच में इन्हें यह काम करना ही पड़ता है। वरना घर कैसे चले।

और यह काम इन्हें खतरों की जद में डाल देता है, क्योंकि आपको जिसके खिलाफ खबर लिखना है उसी से विज्ञापन भी वसूलना है। और एक बार जब आप किसी मुखिया, प्रमुख या विधायक से विज्ञापन ले लेते हैं तो वह अपेक्षा करता है कि आप उसके खिलाफ खबरें न लिखें। उसकी बड़ी से बड़ी चूक और अपराध पर चुप्पी साध लें। मगर एक संवेदनशील पत्रकार के लिये यह मुमकिन नहीं। उसे अपने पाठक समाज को जवाब भी देना होता है, उसकी अपनी भी इंटिग्रिटी होती है। लिहाजा वह खबर तो लिख ही देता है। मगर बाद में उसे कीमत चुकानी पड़ती है।

इस लिहाज से राजधानियों के पत्रकार सुरक्षित हैं। एक तो उनके जिम्मे विज्ञापन का काम नहीं है। दूसरा वह सरकार के खिलाफ जरा भी टेढ़ी खबर लिखे वह खबर संपादक के विचार सूची में कैद हो जाती है। वर्षों उस पर विचार और मंथन चलता रहता है। इस बीच अखबार में गुणगान छपता रहता है। लिहाजा हम पत्रकारों को फेसबुक पर उल्टी करने के अलावा और कुछ नहीं आता। और फेसबुक की सूचनाओं की वजह से जान खतरे में नहीं पड़ती।

यह बिहार की पत्रकारिता का नंगा सच है। और पत्रकारिता किस तरह यहां खतरे में है, इसे समझने का रास्ता। बहरहाल हमारे पास अपने इन दोनों साथियों को श्रद्धाजंलि देने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। कल स्कार्पियो को जला ही दिया गया है। कुछ कानूनी कार्रवाईयां होंगी, मगर न कोई नतीजा निकलेगा, न हालात बदलेंगे। दिवंगत साथी को श्रद्धांजलि

सौजन्य : फेसबुक

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अपनी भाषाई सभ्यता को बाकी लोगों पर थोपना IIMC के प्रोफेसरों से सीखें

पत्रकारिता के क्षेत्र में चोटी का संस्थान माने जाने वाले भारतीय जनसंचार संस्थान में इन दिनों प्लेसमेंट हो रहे हैं. यूं तो संस्थान अपने विवरणिका में 100 फीसदी प्लेसमेंट का दावा नहीं करता फिर भी कंपनियां आती हैं और विद्यार्थियों को अपने यहां नौकरी देती हैं. यहां कई भाषाओं, मसलन उर्दू,मलयालम, मराठी (संभवतः पिछले साल या इस साल से शुरू हुआ है या होगा), उड़िया अंग्रेजी, हिन्दी की पढ़ाई होती है. इसके साथ विज्ञापन और रेडियो टीवी के विभाग हैं.

हर साल कोई ना कोई नया हंगामा होता है. सो इस बार भी हो रहा है. इसमें गलती विद्यार्थियों की नहीं है. गलती उन लोगों की है जो प्लेसमेंट सेल के हेड होते हैं. मसलन कभी श्रीमती सुरभी दहिया जी तो कभी रिंकू पेगू जी. अपनी भाषाई सभ्यता को बाकी लोगों पर थोपना हो तो ईस्ट इंडिया कंपनी से नहीं IIMC के प्रोफेसरों से सीखना चाहिए.

आप उस कंपनी की परीक्षा में नहीं बैठ सकते (ऐसी पुष्ट-अपुष्ट जानकारी है. विद्यार्थियों और प्रोफेसरों के इनकार करने पर बदल सकती है.) जिस विभाग के आप छात्र नहीं हैं. मसलन विज्ञापन के प्लेसमेंट कंपनी में हिन्दी और रेडियो टीवी विभाग के लोगों को नहीं बैठने दिया गया. छात्रों ने एक पत्र लिखा है.

हिन्दी का इतना बड़ा बाजार होने पर भी अगर विद्यार्थियों को विज्ञापन विभाग की परीक्षाओं में बैठना पड़ रहा है तो यह भी अपने आप में एक चोटी के संस्थान लिए शर्म की बात है, वो भी तब जबकि संस्थान के महानिदेशक श्री केजी सुरेश जी खुद DD समेत कई संस्थानों में काम कर चुके हैं.

खैर, अभी तो बात सिर्फ विज्ञापन विभाग की है. दावा कर रहा हूं जो सच होगा भी कि रेडियो और टीवी की प्लेसमेंट परीक्षाओं में भी ऐसी कारगुजारियां होंगी. IIMC में प्लेसमेंट उसी दिन संपन्न मान लिया जाता है जब विज्ञापन और कुछ एक अन्य विभागों में छात्रों की नियुक्तियां अथवा इंटर्नशिप की व्यवस्था संपन्न हो जाती है.

हिन्दी विभाग के विद्यार्थियों को RTV से जुड़ी क्लासेज में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. इक्विपमेंट नहीं दिलाए जाते. यह सब तब है जबकि IIMC एक स्वायत्त संस्थान हैं. (समझ रहे हैं ना जो बीते दिनों 60 संस्थाओं के साथ किया गया है. फायदा नुकसान यहीं देख लें.)

अंग्रेजी में पीपीटी मुहैया करा देने वाले प्रोफेसर, आपसी लड़ाई (मसलन नेताओं और राजनीतिक दलों से संस्थागत करीबी, HOD और DG के पद के लिए ) में बिजी रहते हैं. लेकिन किसी के पास इतना वक्त नहीं होता कि कोई नौकरियों पर ध्यान दे ले. सबके बहुत संपर्क है. इतना की एक बार में मेरे सरीखे शख्स का गूगल कॉन्टैक्ट भर जाए (अगर ऐसा होता हो तो) लेकिन सब संपर्क नौकरी के नाम पर ना जाने कहां गायब हो जाते हैं.

क्लास में लेक्चर के समय विद्यार्थी अक्सर (मैंने सुना है) प्रोफेसर का इतिहास सुनते रह जाते हैं. फिर प्लेसमेंट के समय खुद इतिहास होकर रह जाते हैं. बेहतर हो कि आने वाली बैच यह सोच कर बिल्कुल ना आए कि उसे यहां से नौकरी मिलेगी. प्रोफेसर लोगों की आपसी खींचतान, EG0 (काम शुरू करे 6 सेकेंड में) और DG की लफ्फाजियों के चलते विद्यार्थियों का जीवन चौपट होता है.

मेरी राय है कि संस्थान इस साल जारी किए जा रहे विवरणिका में यह स्पष्ट कर दे कि हम नौकरी नहीं दे सकते. हम अभी आपसी लड़ाई, खींचतान और EGO में बिजी हैं. जब खुद इन सबसे मुक्त हो जाएंगे तो आपकी चर्चा करेंगे.

विभागों में प्रोफेसर नहीं हैं. जो बाहर से पढ़ाने आते हैं उनका भी मानदेय का बिल देख कर साहबान-मालिकान भड़क जाते हैं. मिड टर्म में एक हिन्दी विभाग के एक शिक्षक का कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने वाले हैं ऐसी खबर है. हो सकता है कोई अपना बेरोजगार बैठा हो.

फिलहाल इस प्लेसमेंट में अब तक जो कारगुजारियां हुई हैं उन पर रोक लगाया जाए और फेयर प्लेसमेंट कराया जाए. बाद बाकी मुझे उनकी बड़ी चिंता हो रही है जो ‘हंगामा नहीं नौकरी चाहिए’ का पोस्टर पीठ पर टांगे घूम रहे थे.

सादर

राहुल सांकृत्यायन

युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार राहुल सांकृत्यायन की एफबी वॉल से.

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ये एंकर अब जन विरोधी गुंडे हैं : रवीश कुमार

…पुण्य प्रसून वाजपेयी ने हाल ही में कहा है कि ख़बरों को चलाने और गिराने के लिए पीएमओ से फोन आते हैं। कोबरा पोस्ट के स्टिंग में आपने देखा ही कैसे पैसे लेकर हिन्दू मुस्लिम किए जाते हैं। इस सिस्टम के मुकाबले आप दर्शकों ने जाने अनजाने में ही एक न्यूज़ रूम विकसित कर दिया है जिसे मैं पब्लिक न्यूज़ रूम कहता हूं। बस इसे ट्रोल और ट्रेंड की मानसिकता से बचाए रखिएगा ताकि खबरों को जगह मिले न कि एक ही ख़बर भीड़ बन जाए…

Ravish Kumar : न्यूज़ चैनल निर्लज्ज तो थे ही अब अय्याशियां भी करने लगे हैं। इस अय्याशी का सबसे बड़ा उदाहरण है अभी बारह महीने बाद होने वाले चुनाव में कौन जीतेगा। ताकि दिल्ली के आलसी पत्रकारों और एंकरों और बंदर और लोफर प्रवक्ताओं की दुकान चल सके। आम आदमी सड़कों पर मरता रहे।

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पब्लिक ही मेरा संपादक है और मैं पब्लिक न्यूज़ रूम में काम करता हूं। हमारा चैनल अब कई शहरों में नहीं आता है। इससे काम करने के उत्साह पर भी असर पड़ता है। शहर का शहर नहीं देख पा रहा है, सुनकर उदासी तो होती है। इससे ज्यादा उदासी होती है कि संसाधन की कमी के कारण आपके द्वारा भेजी गई हर समस्या को रिपोर्ट नहीं कर पाते। कई लोग नाराज़ भी हो जाते हैं। कोई बेगुसराय से चला आता है तो कोई मुंबई से ख़बरों को लेकर चला आता है। उन्हें लौटाते हुए अच्छा नहीं लगता। आपमें से बहुतों को लगता है कि हर जगह हमारे संवाददाता हैं। सातों दिन, चौबीसों घंटे हैं। ऐसा नहीं है। दिल्ली में ही कम पड़ जाते हैं। जिन चैनलों के पास भरपूर संसाधन हैं उन्हें आपसे मतलब नहीं है। आप एक एंकर का नाम बता दें तो सुबह चार घंटे लगाकर सैंकड़ों लोगों के मेसेज पढ़ता है। इसलिए धीरज रखें। मेरा सवाल सिस्टम से है और मांग है कि सबके लिए बेहतर सिस्टम हो। आपमें से किसी की समस्या को नहीं दिखा सका तो तो आप मुझे ज़रूर उलहाना दें मगर बात समझिए कि जो दिखाया है उसी में आपका सवाल भी है।

आपके मेसेज ने पत्रकारिता का एक नया मॉडल बना दिया है। उसके लिए मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं और प्रणाम करना चाहता हूं। स्कूल सीरीज़, बैंक सीरीज़, नौकरी सीरीज़, आंदोलन सीरीज़ ये सब आप लोगों की बदौलत संभव हुआ है। दो तीन जुनूनी संवाददाताओं का साथ मिला है मगर इसका सारा श्रेय आप पब्लिक को जाता है।दुनिया का कोई न्यूज़ रूम इतनी सारी सूचनाएं एक दिन या एक हफ्ते में जमा नहीं कर सकता था। महिला बैंकरों ने अपनी सारी व्यथा बताकर मुझे बदल दिया है। वो सब मेरी दोस्त जैसी हैं अब। आप सभी का बहुत शुक्रिया। हर दिन मेरे फोन पर आने वाले सैंकड़ों मेसेज से एक पब्लिक न्यूज़ रूम बन जाता है। मैं आपके बीच खड़ा रहता हूं और आप एक क़ाबिल संवाददाताओं की तरह अपनी ख़बरों की दावेदारी कर रहे होते हैं। मुझे आप पर गर्व है। आपसे प्यार हो गया है। कल एक बुजुर्ग अपनी कार से गए और हमारे लिए तस्वीर लेकर आए। हमारे पास संवाददाता नहीं था कि उसे भेजकर तस्वीर मंगा सकूं।

जब मीडिया हाउस खत्म कर दिए जाएंगे या जो पैसे से लबालब हैं अपने भीतर ख़बरों के संग्रह की व्यवस्था ख़त्म कर देंगे तब क्या होगा। इसका जवाब तो आप दर्शकों ने दिया है। आपका दर्जा मेरे फ़ैन से कहीं ज़्यादा ऊंचा है। आप ही मेरे संपादक हैं। कई बार मैं झुंझला जाता हूं। बहुत सारे फोन काल उठाते उठाते, उसके लिए माफी चाहता हूं। आगे भी झुंझलाता रहूंगा मगर आप आगे भी माफ करते रहिएगा। यही व्यवस्था पहले मीडिया हाउस के न्यूज़ रूम में होती थी। लोगों के संपर्क संवाददाताओं से होते थे। मगर अब संवाददाता हटा दिए गए हैं। स्ट्रिंगर से भी स्टोरी नहीं ली जाती है। जब यह सब होता था तो न्यूज़ रूम ख़बरों से गुलज़ार होता था। अब इन सबको हटा कर स्टार एंकर लाया गया है।

आपसे एक गुज़ारिश है। आप किसी एंकर को स्टार होने का अहसास न कराएं। मुझे भी नहीं। ये एंकर अब जन विरोधी गुंडे हैं। एक दिन जब आपके भीतर का सियासी और धार्मिक उन्माद थमेगा तब मेरी हर बात याद आएगी। ये एंकर अब हर दिन सत्ता के इशारे पर चलने वाले न्यूज रूम में हाज़िर होते हैं। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने हाल ही में कहा है कि ख़बरों को चलाने और गिराने के लिए पीएमओ से फोन आते हैं। कोबरा पोस्ट के स्टिंग में आपने देखा ही कैसे पैसे लेकर हिन्दू मुस्लिम किए जाते हैं। इस सिस्टम के मुकाबले आप दर्शकों ने जाने अनजाने में ही एक न्यूज़ रूम विकसित कर दिया है जिसे मैं पब्लिक न्यूज़ रूम कहता हूं। बस इसे ट्रोल और ट्रेंड की मानसिकता से बचाए रखिएगा ताकि खबरों को जगह मिले न कि एक ही ख़बर भीड़ बन जाए।

मैंने सोचा है कि अब से आपकी सूचनाओं की सूची बना कर फेसबुक पर डाल दूंगा ताकि ख़बरों को न कर पाने का अपराधबोध कुछ कम हो सके। यहां से भी लाखों लोगों के बीच पहुंचा जा सकता है। कभी आकर आप मेरी दिनचर्या देख लें। एक न्यूज़रूम की तरह अकेला दिन रात जागकर काम करता रहता हूं। कोई बंदा ताकतवर नहीं होता है। जो ताकतवर हो जाता है वो किसी की परवाह नहीं करता। मैं नहीं हूं इसलिए छोटी छोटी बातों का असर होता है। आज कल इस लोकप्रियता को नोचने के लिए एक नई जमात पैदा हो गई है जो मेरा कुर्ता फाड़े रहती है। यहां भाषण वहां भाषण कराने वाली जमात। एक दिन इससे भी मुक्ति पा लूंगा। शनिवार रविवार आता नहीं कि याद आ जाता है कि कहीं भाषण देने जाना है। उसके लिए अलग से तैयारी करता हूं जिसके कारण पारिवारिक जीवन पूरा समाप्त हो चुका है। जल्दी ही आप ऐसे भाषणों को लेकर आप एक अंतिम ना सुनेंगे। अगर आप मेरे मित्र हैं तो प्लीज़ मुझे न बुलाएं। कोई अहसान किया है तब भी न बुलाएं। मैं अब अपनी आवाज़ सुनूंगा साफ साफ मना कर दूंगा। अकेला आदमी इतना बोझ नहीं उठा सकता है। गर्दन में दर्द है। कमर की हालत खराब है। चार घंटे से ज्यादा सो नहीं पाता।

आप सब मुझे बहुत प्यार करते हैं, थोड़ा कम किया कीजिए, व्हाट्स अप के मेसेज डिलिट करते करते कहीं अस्पताल में भर्ती न हो जाऊं। इसलिए सिर्फ ज़रूरी ख़बरें भेजा करें। बहुत सोच समझ कर भेजिए। मुझे जीवन में बहुत बधाइयां मिली हैं, अब रहने दीजिए। मन भर गया है। कोई पुरस्कार मिलता है तो प्राण सूख जाता है कि अब हज़ारों बधाइयों का जवाब कौन देगा, डिलिट कौन करेगा। मुझे अकेला छोड़ दीजिए। अकेला रहना अच्छा लगता है। अकेला भिड़ जाना उससे भी अच्छा लगता है। गुडमार्निग मेसेज भेजने वालों को शर्तियां ब्लाक करता हूं। बहुतों को ब्लाक किया हूं। जब नौकरी नहीं रहेगी तब चेक भेजा कीजिएगा! तो हाज़िर है पब्लिक न्यूज़ रूम में आई ख़बरों की पहली सूची।

उत्तर प्रदेश में बेसिक टीचर ट्रेनिंग कोर्स एक पाठ्यक्रम है। प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक की नौकरी पाने के लिए यह कोर्स करना होता है। प्राइवेट कालेज में एक सेमेस्टर की फीस है 39,000 रुपए। राज्य सरकार हर सेमेस्टर में 42,000 रुपये भेजती है। मगर इस बार छात्रों के खाते में 1800 रुपये ही आए हैं। छात्रों का कहना है कि अगले सेमेस्टर में एडमिशन के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। आगरा के एम डी कालेज के छात्र ने अपनी परेशानी भेजी है। उनका कहना है कि प्राइवेट और सरकारी कालेज के छात्रों के साथ भी यही हुआ है।

छात्र ने बताया कि बेसिक टीचर ट्रेनिंग का नाम सत्र 2018 से बदलकर डिप्लोमा इन एलिमेंट्री एजुकेशन कर दिया है। इसमें राज्यभर में 2 लाख छात्र होंगे। अब जब 2 लाख छात्र अपने साथ होने वाली नाइंसाफी से नहीं लड़ सकते तो मैं अकेला क्या कर सकता हूं। इन्होंने कहा है कि मैं कुछ करूं तो मैं लिखने के अलावा क्या कर सकता हूं। सो यहां लिख रहा हूं।

बिहार से 1832 कंप्यूटर शिक्षक चाहते हैं कि मैं उनकी बात उठाऊं। लीजिए उठा देता हूं। ये सभी पांच साल से आउटसोर्सिंग के आधार पर स्कूलों में पढ़ा रहे थे। मात्र 8000 रुपये पर। अब इन्हें हटा दिया गया है। आठ महीने से धरने पर बैठे हैं मगर कोई सुन नहीं रहा है। इन्हें शिक्षक दिवस के दिन ही हटा दिया गया। कई बार लोग यह सोचकर आउटसोर्सिंग वाली नौकरी थाम लेते हैं कि सरकार के यहां एक दिन परमानेंट हो जाएगा। उन्हें आउटसोर्सिंग और कांट्रेक्ट की नौकरी को लेकर अपनी राजनीतिक समझ बेहतर करनी होगी। नहीं कर सकते तो उन्हें रामनवमी के जुलूस में जाना चाहिए जिसकी आज कल इन 1832 कंप्यूटर शिक्षकों की भूखमरी से ज़्यादा चर्चा है। ऐसा कर वे कम से कम उन्माद आधारित राजनीति के लिए प्रासंगिक भी बने रहेंगे। नौकरी और सैलरी की ज़रूरत भी महसूस नहीं होगी क्योंकि उन्माद की राजनीति अब परमानेंट है। उसमें टाइम कट जाएगा। सैलरी की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। वैसे इन शिक्षकों ने एक ट्विटर हैंडल भी बनाया है जहां वे मुख्यमंत्री को टैग करते रहते हैं। मगर कोई नहीं सुनता है। पचास विधायकों ने इनके लिए लिखा है मगर कुछ नहीं हुआ। ये सांसद विधायक भी किसी काम के नहीं है। पत्र लिखकर अपना बोझ टाल देते हैं।

हज़ारों की संख्या में ग्रामीण बैंक के अधिकारी और कर्मचारी तीन दिनों से हड़ताल पर हैं मगर इन्हें सफलता नहीं मिली है। रिटायरमेंट से पहले एक लाख रुपये की सैलरी होती है और रिटायर होने के अगले ही महीने इनकी पेंशन 2000 भी नहीं होती है। बहुत से बुज़ुर्ग बैंकरों की हालत ख़राब है। कोई 2000 में कैसे जी सकता है। आप नेताओं की गाड़ी और कपड़े देखिए। अय्याशी चल रही है भाई लोगों की। ज़ुबान देखिए गुंडों की तरह बोल रहे हैं। आपका सांसद और विधायक पेंशन लेता है और आप से कहता है कि पेंशन मत लो। यह चमत्कार इसलिए होता है क्योंकि आप राजनीतिक रूप से सजग नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है कि सरकारें किसी की नहीं सुनती तो फिर क्यों इन दो कौड़ी के नेताओं के पीछे आप अपना जीवन लगा देते हैं।

कटिहार मेडिकल कालेज के छात्र लगातार मेसेज कर रहे हैं। वहां डॉक्टर फैयाज़ की हत्या हो गई थी। कालेज प्रशासन ख़ुदकुशी मानता है। फ़ैयाज़ की हत्या को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। कैंडल मार्च कर रहे हैं। बहुत दुखद प्रसंग है। गोपालगंज, कटिहार में भी छात्रों ने प्रदर्शन किया है। दोस्तों अपनी लड़ाई में मेरे इस लेख को ही शामिल समझना। मिलने की ज़रूरत नहीं है न बार बार मेसेज करने की। काश संसाधनों वाले चैनल के लोग आपकी खबर कर देते तब तक आप अपने घरों से हर न्यूज़ चैनल का कनेक्शन कटवा दें। एक रुपया चैनलों पर ख़र्च न करें।

अनवर बर्ख़ास्त हो गया, अनिल बच गया। हांसी से किसी पाठक ने दैनिक भास्कर की क्लिपिंग भेजी है। खबर में लिखा गया है कि गवर्नमेंट पी जी कालेज प्रशासन ने प्रोग्रेसिव स्टुडेंट यूनियन के सदस्य अनवर को बर्ख़ास्त कर दिया और एक अन्य सदस्य अनिल को चेतावनी दी है। अच्छी बात है कि सभी छात्रों ने इसका विरोध किया है और प्रिंसिपल सविता मान से मिलकर आंदोलन की चेतावनी दी है।

भास्कर ने लिखा है कि कालेज के इतिहास विभाग ने 22 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत के मौके पर भाषण प्रतियोगिता कराई थी। कार्यक्रम में प्रोगेसिव स्टुडेंट्स फ्रंट के सदस्यों ने पुस्तक प्रदर्शनी लगाई। भगत सिंह की जेल डायरी,दस्तावेज़ व अन्य प्रगतिशील पत्रिकाएं रखी गईं। छात्रों ने कहा कि प्रिंसिपल ने क्रायक्रम के बीच से ही सब हटवा दिया। छात्रों के आई कार्ड छीन लिया। इसके बाद नोटिस लगाया गया जिसने अनवर का नाम काटने और अनिल को चेतावनी देने की बात लिखी हुई है। छात्रों ने विरोध किया है। प्रिंसिपल ने कहा कि अनवर अनुशासनहीनता करता है। प्राध्यापकों की बात नहीं मानता है। दीवार पर पोस्टर चिपका देता है। उसे कई बार चेतावनी दी गई मगर नहीं माना। हमने भास्कर की ख़बर यहां उतार दी।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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संदीप ने जिस तरीके से हत्या किए जाने की आशंका जताई थी, वैसे ही उन्हें मारा गया, पढ़िए पत्र

भिंड में रेत माफिया और पुलिस के गठजोड़ का स्टिंग करने वाले पत्रकार संदीप शर्मा ने अपनी जिस किस्म की हत्या किए जाने की आशंका जताई थी, उनकी हत्या वैसे ही कर दी गई. पुलिस प्रशासन और शासन से उनका गुहार लगाना, पत्र लिखना सब बेकार गया.

रेत मफिया द्वारा भेजे गए एक ट्रक ने रांग साइड जाकर बाइक से जा रहे संदीप को कुचल कर मार डाला. पढ़िए वो पत्र जो संदीप ने शासन-प्रशासन को भेजा था और एक्सीडेंट कराकर हत्या करा दिए जाने की आशंका जताई थी….

संदीप शर्मा की जघन्य हत्या पर ग्वालिय के पत्रकार Arpan Raut फेसबुक पर लिखते हैं :

एक पत्रकार को मरना ही चाहिए! पत्रकार एक ऐसा जीव है जो दूसरों के लिए आजीवन संघर्ष करता है। उसकी सामाजिक बुराइयाँ व भलाइयाँ कभी व्यक्तिगत नही होती। बस अख़बार मे १२ पॉइंट बोल्ड की बायलाइन स्टोरी और चैनल पर एक्सक्लूसिव ब्रेकिंग उसका धर्म है। जबकि उसका जब अंत होता है तो वह नितांत अकेला होता है। जिनके लिए वह ख़बरें लिखता, गढ़ता और बुनता है वो कभी पलटकर साथ नही देते। जिस अख़बार व चैनल के लिए वह अपना पूरा जीवन दे देता है वह भी बुरे समय में पहचान तक नही दिखाते। मसला भिंड में पत्रकार संदीप शर्मा से जोड़कर कह रहा हूँ।

अंचल का खनन माफ़िया इतना क़द्दावर है कि वह पत्रकार से पहले एक आईपीएस समेत कई पुलिस वालों को भी खा चुका है। रूपये की पंजीरी जब बँटती है तो फिर पुलिस मरे या पत्रकार जवाबदार और नज़दीकी भी दोमुँहे साँप बन जाते है। एक मुँह से माल खाते है दूसरे से उपवास रखते है। हैरानी तब हुई है कि संदीप केवल कांग्रेस , आम आदमी या वामियो और कला क्षेत्र से जुड़ा पत्रकार नही था।

कल शहर के बुध्दीजीवी वर्ग के आव्हान पर सत्ता से जुड़ा एक व्यक्ति दुख जताने नही आया, और ना ही हाइ फाइ क्लब वाले आंटी अंकल जो फोटो खिंचाकर खुदको सबसे बड़ा समाजसेवी होने का स्वाँग रचते है। विपक्ष का आना लाज़िमी है कि वह सत्ता का विरोध करना चाहता है। उनके आने का आशय यह तो नही कि मरने वाला पत्रकार सत्ता की विरोधी था ! वह सत्ता का नही वरन भ्रष्टाचार व अव्यवस्था का विरोधी था। खैर, आज सुबह हम हकीकत में इन सभी को कोसने का नैतिक हक़ भी खो चुके है। दरअसल कल के विरोध प्रदर्शन में केवल एक समाचार पत्र ने ही जगह दी। बाकी सब बड़े ही बेशर्मी से नज़रअंदाज़ कर गये। यक़ीन मानिये एक पत्रकार की हत्या का विरोध मीडिया हाउस ही बेशर्मी से अनदेखा करने लगे तो उसे मर ही जाना चाहिए।

मूल खबर :

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अबकी भिंड में पत्रकार संदीप शर्मा की ट्रक से कुचलकर रेत माफिया ने करा दी हत्या

भिंड में रेत माफिया और पुलिस के गठजोड़ का स्टिंग करने वाले पत्रकार संदीप शर्मा की ट्रक से कुचलकर हत्या कर दी गई। उन्होंने अपनी हत्या की आशंका पहले ही जता दी थी। संदीप शर्मा तत्कालीन अटेर एसडीओपी इंद्रवीर भदौरिया का स्टिंग कर चर्चा में आए थे। संदीप न्यूज चैनल के लिए काम करते थे.

ट्रक से कुचले जाने का सीसीटीवी फुटेज सामने आ गया है. इसमें साफ नजर आ रहा है कि ट्रक ड्राइवर ने किस तरह रांग साइड जाकर बाइक से रहे संदीप को कुचला और फिर तेजी से भाग गया. संदीप को डायल 100 से तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन ट्रॉमा सेंटर में इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया.

रेत माफिया और पुलिस के गठजोड़ के स्टिंग के बाद संदीप इस तरह के हादसे की आशंका पहले ही जता चुके थे. हत्या की आशंका को लेकर संदीप ने भिंड एसपी सहित पीएम और सीएम को भी पत्र लिखा था.

गौरतलब है इससे पहले भी रेत माफिया प्रदेश में कई बार बड़े अधिकारियों तक पर हमला कर चुके हैं.

पत्रकार संदीप शर्मा की मौत की जांच के लिए एसपी प्रशांत खरे ने एसआईटी गठित की है. इस एसआईटी में डीएसपी राकेश छारी, टीआई मेहगांव नरेंद्र त्रिपाठी, टीआई कोतवाली शैलेन्द्र कुशवाह, एसआई आशुतोष शर्मा, एएसआई सत्यवीर सिंह और साइबर सेल के लोग शामिल हैं.

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तो क्या यूपी में राघवेंद्र प्रताप सिंह की हैसियत डिप्टी सीएम जैसी है! सुनें ये टेप

ये तो सभी जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ जब सीएम नहीं थे, तब भी उनके सबसे करीबी आदमी राघवेंद्र प्रताप सिंह हुआ करते थे. डुमरियागंज से विधायक बने राघवेंद्र प्रताप सिंह की हैसियत इन दिनों अघोषित रूप से डिप्टी सीएम की हो चुकी है. ऐसा उनके सगे बड़े भाई का कहना है.

एक आडियो वायरल हुआ है जिसमें राघवेंद्र प्रताप सिंह के सगे बड़े भाई एक पंडीजी को बहुत मीठे तरीके से समझा रहे हैं. पंडीजी को शराब की एक दुकान चलाने के लिए ठेका मिला है. इस दुकान को राघवेंद्र प्रताप सिंह अपने खास लोगों की दुकान बताते हुए इस पर से दावेदारी वापस लेने की बात पंडीजी को समझा रहे हैं.

इस बातचीत में कहीं कोई सीधी धमकी या गाली-गलौज नहीं है. लेकिन ये स्पष्ट है कि शराब की दुकान चलाने का लाइसेंस वैध तरीके से पाने के बावजूद पंडीजी को इस पर से अपना दावा वापस लेने के लिए समझाया जा रहा है. इस समझाने में धमकाना तो निहित ही है. 

फिलहाल इस टेप को योगी के ठाकुर राज में राजपूतों के बढ़े हुए प्रभुत्व और ब्राह्मणों की मलिन हुई हैसियत के रूप में प्रचारित किया जा रहा है.

कुल मिलाकर बातचीत मजेदार है जिसमें आप ये सुन सकते हैं कि किस तरह डीएम के बारे में टिप्पणी की जा रही है और विधायक राघवेंद्र को किस रूप में प्रचारित किया जा रहा हैं.

टेप सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :

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राजन अग्रवाल इंडिया न्यूज़ हरियाणा के संपादक बने

राजन अग्रवाल को इंडिया न्यूज़ हरियाणा का संपादक बनाया गया है. वे पहले भी इस चैनल के हिस्से रह चुके हैं. इसके पहले वह ‘लीविंग इंडिया न्यूज़’ में काम कर रहे थे.

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इन दो उगाहीबाज पत्रकारों से सिपाही तक गिड़गिड़ाते हैं, सुनिए ये आडियो

यूपी के जिला महोबा के थाना खन्ना का है ये आडियो. असफाक खां और राजेंद्र यादव नाम के दो शख्स, जो खुद को दैनिक जागरण और अमर उजाला का पत्रकार बताते हैं,  की शिकायत पुलिस कप्तान से की गई है. शिकायत करने वाले सिपाही हैं.

ये दोनों पत्रकार थाने के सिपाहियों को सस्पेंड और लाइन हाजिर कराने की झूटी खबर छापने की बात कह कर इनसे वसूली करते हैं. वसूली इस हद तक पहुँच गयी कि सिपाही गिड़गिड़ाने लगते हैं और अपनी माँ की बीमारी का वास्ता देते हैं. इसके बावजूद दोनों उगाहीबाज पत्रकार इन सिपाहियों से बदसलूकी करने से नहीं बाज आ रहे हैं.

सुनिए आडियो…

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चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार संजीव सलारिया का हार्ट अटैक से निधन

चंडीगढ़ से एक बुरी खबर है. दैनिक सवेरा टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार संजीव सलारिया का मंगलवार को हार्ट अटैक से निधन हो गया. हंसमुख स्वभाव वाले संजीव सलारिया अपने काम के प्रति निष्ठावान थे. उनके निधन पर दैनिक सवेरा के संपादक शीतल विज ने गहरा दुख व्यक्त किया है. सालारिया अपने पीछे मां-बाप, दो बहन व भाई को छोड़ गए हैं.  संजीव सलारिया दैनिक जागरण और दिव्य हिमाचल जैसे अखबारों में भी काम कर चुके हैं.

Chandigarh : Sanjeev Salaria , Senior Reporter of Dainik Savera Times dies here due to heart attack. He was in Sector 17 to attend regular editorial meeting. After meeting he fell down in Sector 17 and he was rushed to Sector 32 Govt.Medical College and Hospital where doctor declared him dead. Media persons immediately rushed to Hospital.

The sad demise of Salaria , a major loss to his family and in media world. He worked in Divya Himachal, Dainik Jagaran and now he was working with Savera Times. His last story was a major hit which was on Railway tracks.

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रतन टाटा ने शेखर गुप्ता के मीडिया वेंचर को दिए साढ़े तीन करोड़ रुपए

‘द प्रिंट’ नाम से शेखर गुप्ता का जो मल्‍टीमीडिया वेंचर है, उसमें रतन टाटा ने साढ़े तीन करोड़ रुपये लगाया है. पत्रकार शेखर गुप्‍ता द प्रिंट के ऑनलाइन प्लेटफार्म के जरिये राजनीति, अर्थशास्त्र समेत कई फील्ड्स की खबरों को कवर करते हैं. यह वेंचर पिछले साल शुरू हुआ था.

इस वेंचर के निदेशकों में रतन टाटा, उदय कोटक, नंदन नीलेकणि, रवि ठाकरान और विजय शेखर शर्मा जैसे पूंजीपति हैं. शुरुआत में इनके जरिये 45 करोड़ रुपये का निवेश जुटाया गया था. अब फिर से टाटा ने इसमें निवेश कर दिया है.

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लल्लूराम डॉट कॉम को ग्राफिक डिजायनर और कापी एडिटर की जरूरत

छत्तीसगढ़ के रायपुर से संचालित सबसे लोकप्रिय न्यूजपोर्टल  लल्लूराम डॉट कॉम के संपादक मनोज सिंह ने सूचित किया है कि लल्लूराम डॉट कॉम को एक ग्राफिक डिजाइनर और एक कापी एडीटर की आवश्यकता है.

साथ ही जल्द शुरू होने जा रहे इंग्लिश न्यूज पोर्टल mrlalluram.com को अंग्रेजी में समाचार लिखने वाले कापी एडीटर की आवश्यकता है. इच्छुक उम्मीदवार अपना रिज्यूम msb.swarajexp@gmail.com पर भेजें.

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सपा – बसपा गठबंधन : संभावना एवं सफलता

एस.आर.दारापुरी

भूतपूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक, जनमंच उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल के उपचुनावों के परिणामों के बाद सपा, बसपा के गठबंधन के भविष्य, संभावनाएं एवं संभावित खतरों की चर्चा बहुत जोर शोर से चल रही है. उपचुनाव में बसपा द्वारा सपा  के समर्थन से दो सीटें जीतने को उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है. यह भी कहा जा रहा है कि यदि 2019 में भी सपा और बसपा का यह गठबंधन कायम रहे तो इससे भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है. कुछ अतिउत्साही लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि इससे न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि शेष भारत में भी भाजपा को हराया जा सकता है. कुछ लोग इसे 1993 के गठजोड़ की पुनरावृति के रूप में भी देख रहे है.

अतः उपरोक्त उत्साहपूर्ण परिस्थितियों में यह देखना ज़रूरी है कि वर्तमान राजनीतिक माहौल में  सपा-बसपा गठबंधन की सम्भावना क्या है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हाल के उपचुनाव में सपा- बसपा का गठजोड़ निस्वार्थ नहीं था. मायावती ने सपा को समर्थन इस शर्त पर दिया था कि वह राज्यसभा चुनाव में बसपा के प्रत्याशी को जिताने के लिए अपने विधायकों के फालतू वोट बसपा प्रत्याशी को देगी. बहरहाल बसपा के समर्थन से सपा गोरखपुर और फूलपुर की दोनों लोकसभा सीट जीतने में सफल रही परन्तु भाजपा की तगड़ी सेंधमारी के कारण राज्यसभा चुनाव में सपा के समर्थन के बावजूद बसपा प्रत्याशी हार गया. अतः उपचुनाव के दौरान बसपा का समर्थन राज्यसभा के चुनाव में सपा के समर्थन से सीधा जुड़ा हुआ था. एक तरीके से यह समर्थन सशर्त था.

उपचुनाव के बाद सपा–बसपा के कार्यकर्ताओं द्वारा आगामी चुनाव के लिए भी आपसी गठजोड़ की मांग को जोर से उठाया गया है.  अब तक मायावती और अखिलेश ने भी राज्यसभा में हार के बावजूद भविष्य में गठबंधन को बनाये रखने की बात कही है. इस सन्दर्भ  में 1993 का गठबंधन जिसके बाद उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा की मिलीजुली सरकार बनीं थी, के इतिहास को भी देखना होगा. उस समय भी दलितों और पिछड़ों की सरकार बनने  से इन वर्गों में बहुत उत्साह पैदा हुआ था और पिछड़ी जातियां ख़ास करके यादव और कुर्मी  सामाजिक भेद भाव भूल कर राजनीतिक स्तर पर दलितों के नजदीक आये थे और इससे राष्ट्रीय स्तर पर नए राजनीतिक समीकरण की सम्भावना बनती दिखाई दे रही थी.

परन्तु उक्त गठजोड़ शीघ्र ही व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया. इस विघटन के पीछे उस समय भी भाजपा की मुख्य भूमिका थी क्योंकि इससे उसे अपना भविष्य धूमिल होता दिखाई दे रहा था. अतः उसने कांशी राम को मायावती को मुख्य्मंत्री बनाने का लालच देकर मुलायम सिंह की सरकार  गिराने के लिए प्रेरित किया. गेस्ट हाउस काण्ड तो केवल निमित मात्र था जबकि उसमें भी भाजपा की बहुत बड़ी भूमिका थी.

गेस्ट हाउस काण्ड के बाद भाजपा ने दलितों और पिछड़ों खास करके यादव जातियों और चमार जाति  में अधिक से अधिक दुश्मनी और दूरी पैदा करने की कोशिश की और दुर्भाग्यवश कांशी राम और मायवती उनके इस कुचक्र में बुरी तरह से फंस गये. नतीजतन जिन्हें कुदरती दोस्त होने के नाते बड़े दुश्मन के खिलाफ एकजुट होना चाहिए था वे आपस में ही उससे से भी बड़े दुश्मन बन गये. यह भाजपा की दलितों-पिछड़ों के सामाजिक तथा राजनीतिक गठजोड़ को ध्वस्त करने की सबसे बड़ी सफलता थी.

इतना ही नहीं इसके बाद भाजपा की बराबर कोशिश रही कि दलितों और पिछड़ों का पुराना गठजोड़ किसी भी तरह से पुनर्जीवित न हो पाए. इसके बावजूद भी 1996 में सपा के कुछ दलित विधायकों द्वारा मुलायम सिंह की अनुमति से पुनः गठजोड़ करने हेतु दिल्ली जाकर कांशी राम से बातचीत की गयी थी.

आश्चर्यजनक तौर पर कांशी राम इसके लिए राजी हो गए थे और उन्होंने उसी दिन दिल्ली में इसकी घोषणा भी कर दी. उस दिन मायावायी लखनऊ में थी और उसने अगले दिन यह कह कर कि ”इसका सवाल ही पैदा नहीं होता” इसका प्रतिकार कर दिया और उस समय भी उक्त गठबंधन पुनर्जीवित होते होते मर गया. यह इस लिए हुआ क्योंकि उस समय मायावती पूर्णतया भाजपा के प्रभाव में थी और कांशी राम मायवती के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद काफी कमज़ोर स्थिति में आ गये थे. इस प्रकार 1996 में भी उक्त गठबंधन बीजेपी के कारण पुनर्जीवित होने से रह गया. इसके बाद भाजपा ने दोबारा दो बार मायावती को केवल इस आशय से समर्थन दिया कि कहीं सपा-बसपा गठबंधन पुनर्जीवित न हो जाये और इसमें वह पूरी तरह से सफल भी रही थी.

वर्तमान में भाजपा केंद्र तथा उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से सरकार चला रही है. भाजपा मायवती की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को भी पूरी तरह से जानती है और मायवती की कमजोरियों को भी. यह सर्वविदित है कि मायावती और उसका भाई आनंद कुमार  भ्रष्टाचार के कई मामलों में बुरी तरह से फंसा हुआ है और सीबीआई और ईडी का फंदा भाजपा के हाथ में है. ऐसा हो सकता है कि मोदी सरकार लालू प्रसाद की तरह सीबीआई का फंदा मायावती पर भी कसने लगे. क्या ऐसी परिस्थिति में मायावती इसी प्रकार की स्वतंत्र राजनीति करने का साहस दिखा पाएगी और सपा के साथ आसानी से गठजोड़ कर पायेगी?

भाजपा की अब तक यह कोशिश रही है कि अगर मायवती उसके साथ खुले गठबंधन में नहीं आती तो उसे किसे दूसरे के साथ भी गठबंधन न करने दिया जाये. उसकी हमेशा कोशिश रही है कि मायावती सभी सीटों पर अकेली लड़े ताकि उसका दलित वोट किसी दूसरी पार्टी खास करके कांग्रेस को न जाये. अब तक के सभी लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनाव में यही स्थिति देखने को मिली है. इससे भाजपा को दोहरा लाभ होता है. एक उसका अपना प्रतिबद्ध वोट तो उसे मिलता ही है दूसरे वह मायावती के माद्यम से दलित वोट कांग्रेस को जाने से रोकने में भी सफल रहती है जैसा कि पिछले गुजरात चुनाव में भी देखा गया है. 

अतः भाजपा संभावित सपा-बसपा गठबंधन को रोकने के लिए मायावती पर दबाव बना कर उसे अकेले ही सभी सीटों पर लड़ने के लिए बाध्य कर सकती है. यह भी उल्लेखनीय कि मायावती इससे पहले सत्ता पाने के लिए तीन बार भाजपा से गठजोड़ कर चुकी है. कुछ लोगों की आशंका है कि वह चौथी बार ऐसा नहीं करेगी, की भी कोई गारंटी नहीं है. 

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि वर्तमान में भाजपा को मायावती की सोशल इन्जीनीरिंग से कोई खतरा नहीं है क्योंकि उसने भी उसी फार्मूले का इस्तेमाल करके दलितों और पिछड़ों के बहुत बड़े हिस्से को वृहद हिंदुत्व के छाते के तले ले लिया है.  इसके परिणामस्वरूप अब सपा के साथ पिछड़ों में केवल यादव ही प्रमुख वर्ग बचा है और अतिपिछड़ों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पास चला गया है. इसी प्रकार बसपा के दलित मतदाताओं का भी बहुत बड़ा हिस्सा चमार/जाटव उपजाति को छोड़कर हिंदुत्व के छाते तले भाजपा के साथ जा चुका है जैसा कि पिछले लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव से स्पष्ट हो चुका है.

अतः इस समय यह कहना कि सपा- बसपा  गठजोड़ से पिछड़ा और दलित वर्ग उसी संख्या में एकजुट हो जायेगा जितना कि वह 1993 में था, केवल दिवास्वपन होगा और यथार्थ से कोसों दूर. ऐसी परिस्थिति में अगर किसी तरह सपा-बसपा गठबंधन बनता भी है तो बहुत मजबूत नहीं होगा जब तक अपने जाति वोट के इलावा इसमें दूसरी जातियों/वर्गों के वोट नहीं मिलते.

उपरोक्त वर्णित परिस्थियों में यह प्रशन पैदा होता है कि क्या सपा–बसपा का जातिगत गठजोड़ भाजपा को हराने में सक्षम होगा? क्या उनके गठजोड़ की घोषणा मात्र से सभी दलित, पिछड़े और मुसलमान बड़ी संख्या में इसके साथ आ जायेंगे? क्या सपा- बसपा उन पिछड़ों  और दलितों को जो वृहद हिंदुत्व के छाते तले भाजपा में चले गये हैं, आसानी से अपनी पार्टियों में वापस ला पाएगी? क्या जाति की राजनीति की काट जाति की राजनीति से हो पाएगी?

वास्तव में अब तक की जाति की राजनीति ने हिंदुत्व को कमज़ोर करने की बजाये उसे मजबूत ही किया है जिसका फायदा भाजपा ने उठाया है. यह भी एक सत्य है कि जिस प्रकार कांग्रेस हिंदुत्व की राजनीति में भाजपा को नहीं हरा पायी है उसी तरह  जाति की राजनीति जो कि हिंदुत्व की पोषक है में सपा-बसपा गठबंधन भी उसे हरा नहीं पाएगी. अतः सपा-बसपा गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने से अलग हुए वोट बैंक को भाजपा से वापस छीनने की होगी और क्या वह केवल गठजोड़ हो जाने से ही वापस आ जायगा? भाजपा की वर्तमान साम,दाम, दंड,भेद की राजनीति के सामने यह आसान नहीं लगता.

यह भी उल्लेखनीय है कि जाति की राजनीति जातिगत भावनाओं के जोड़तोड़ की राजनीति है जिसमे जातिहितों के टकराव और अलगाव की भी प्रमुख भूमिका रहती है. अब तक भाजपा जातिगत भावनाओं को भुनाने का हुनर बहुत अच्छी तरह से सीख चुकी है. अतः अब जातिगत गठजोड़ और टकराव को तोड़ने के लिए जातिगत भावनाओं को भुनाने के  स्थान पर वर्गहित को आगे लाने  की जरूरत  है. इसके लिए ज़रूरी है कि वर्तमान जाति आधारित गठजोड़ के एजंडा की बजाये वर्गहित आधारित राजनीतिक एजंडा आगे लाया जाये जो बेरोज़गारी, गरीबी, कृषि संकट, निजी क्षेत्र में आरक्षण,आदिवासी समस्या, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के निजीकरण को रोकने और सामाजिक न्याय के मुद्दों को प्रमुखता से आगे लाया जाये. इसके साथ ही वर्तमान सरकार की कार्पोरेट परस्त नीतियों के स्थान पर वैकल्पिक नीतियों को लाने की भी ज़रुरत है.

मेरा यह निश्चित मत है कि केवल इस प्रक्रिया द्वारा ही सपा-बसपा वर्गहित को आधार बना कर अपने खोये हुए वोट बैंक को भाजपा की झोली से वापस लाने में सीमित सफलता प्राप्त कर सकती है. डॉ. आंबेडकर ने भी कहा है- “जो राजनीति वर्गहित की बात नहीं करती वह धोखा है.” क्या अब तक जातिगत जोड़तोड़ करके सत्ता की दौड़ में लगी रही सपा और बसपा अपनी कार्यशैली में उक्त आमूलचूल परिवर्तन ला पायेगी? इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर सपा-बसपा जाति की राजनीति को त्याग कर वर्गहित की राजनीती का राजनीतिक एजंडा अपनाती है तो वह भाजपा को 2019 में पुनः सत्ता में आने से काफी हद तक रोकने में सफल हो सकती है. मायावती और अखिलेश को यह भी याद रखना चाहिए कि यह उनके लिए अपना अस्तित्व बचाने का आखिरी मौका है.

S.R. Darapuri

I.P.S.(Retd)

Organiser,

Jan Manch Uttar Pradesh

srdarapuri@gmail.com

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Zoutons क्रोम एक्सटेंशन

क्या आप क्रोम ब्राउसर का उपयोग करते हैं, और आप अपने हजारों रूपये बचाना चाहते हैं? और बहुत सारी अच्छी कूपन्स और डील्स खोज कर थक चुके है? अगर मैं आपसे कहूँ कि आपके सारे सवालों के जबाव सिर्फ एक app दे सकता है तो आप क्या कहेंगे? जी हाँ आपने बिलकुल सही सोचा आप अपने हर सवालों के जबाव इसमें पा सकते है वो है- Zoutons क्रोम एक्सटेंशन!

Zoutons आपकी खोज को आसन, जल्द और आरामदायक बनाता है। इस वेबसाइट ने हाल ही में एक app लॉन्च किया है, इस बार Zoutons अपने साथ क्रोम एक्सटेंशन ले कर आया है।

क्रोम एक्सटेंशन आपको जल्दी और बहुत ही शीघ्रता से चीजों तक पहुँचा देता है। जौटोंस लगभग 150 दुकानों तक अपने कूपन्स उपलब्ध कराता है, जिससे आपको अपने लिए सबसे अच्छे ऑफर्स को खोजने की जरूरत नहीं पड़ती। आपके सारी समस्याओं को हल करने के लिया आ गया है जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन। अब आपको कहीं और जाने की कोई जरुरत नहीं है, आपको किसी कूपन्स और डील्स को खोजने की जरूरत नहीं है। आपको सब कुछ देगा बड़ी ही आसानी से उपलब्ध कराएगा ये जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन। अगर आप इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं, तो कोई बात नहीं आइये मैं देती हूँ आपको इसके बारे पूरी जानकारी।

Zoutons के बारे में

Zoutons एक प्रकार का कूपन्स और डील्स की सुचना देने वाला वेबसाइट है, जहाँ आप अपने हर खरीदारी पर बहुत ही अच्छी डील्स और कूपन्स पा सकते हैं। आप अपने सभी कामों के लिए इस वेबसाइट पर बेहतरीन डील्स पा सकते हैं जैसे:- भोजन मँगाने पर, cabs बुकिंग करने पर, आप अपने फैशन से जुड़े सामानों पर आदि और आप इसमें पा सकते है wallet ऑफर्स, रिचार्ज आप्शन और भी बहुत सारी अच्छी डील्स। यह वेबसाइट सन् 2013 में बनाया गया था, और तब से लेकर आज तक यह वेबसाइट अपने यूजर्स को बेहतरीन सेवाएँ देती आ रही है।

आप हमेशा अपने लिए सही और अच्छी कूपन्स चुन सकते हैं, और आप अलग- अलग कूपन्स के लिस्ट में से खुद के लिए जो कूपन्स चाहते हैं वह पा सकते हैं। हाल ही में जौटोंस app ने एक ऐसी चीज लॉन्च की है जिसमें आप अपने कंप्यूटर को क्रोम एक्सटेंशन से जोड़कर कूपन्स और डील्स के बारे में सारी जानकारी ले सकते हैं। इस app के जरिये आप बड़ी ही आसानी से अपने डील्स तथा कूपन्स के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं, और इस app को चलाना भी बहुत ही आसन है।

क्रोम एक्सटेंशन क्या है –

हम सभी मन बहलाने के लिए तथा किसी चीज की खरीदारी करने के लिए क्रोम पर निर्भर करते हैं। क्रोम एक्सटेंशन एक छोटी सॉफ्टवेर प्रोग्राम है, जो आपने अनुसार ही कम करता है, जिस प्रकार आप उसको निर्देश देंगे उसी प्रकार वह आपका काम करेगा। जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन के साथ, जब आप इसे डाउनलोड करेंगे तो हर नए tab खोलने के साथ इसमें आपके लिए अच्छे और नए ऑफर्स आयेंगे। इससे यह पता चलता है कि आप अपना मन बहलाने कए लिए अपने मन पसंद सामान और आप जो उत्पाद चाहें वो आप देख तथा खरीद सकते है और बाकि ऐसे ही छोड़ सकते हैं।

क्रोम एक्सटेंशन के पीछे का मकसद ग्राहकों को खुद से अपने उत्पाद चुनें और उसे ख़रीदे। अगर कोई यूजर बहुत सारे ऑफर्स के बारे में नहीं जानता हो और वह बहुत सारे वेबसाइट पर ऑफर्स ढूँढ रहा हो तो आप इसके बारे में जन लीजिये। इसके नए फीचर्स आपके लैपटॉप में उपलब्ध हैं, जिससे आप जो चाहते हैं उसकी खरीदारी के लिए आपके सामने कूपन्स code बॉक्स में उपयुक्त कूपन अपने आप आ जाता है। इस एक्सटेंशन की सबसे अच्छी और खास बात यह है कि यह बहुत हल्का और इसका पैमाना सिर्फ 477 KB है।

क्रोम एक्सटेंशन काम कैसे करता है –

किसी भी ग्राहक के लिए एक्सटेंशन system को अपने कंप्यूटर में जोड़ना परेशानी की बात नहीं है। आप सभी इस app को डाउनलोड करके आप अपने मन पसंद उत्पाद चुन सकते हैं इससे आपको कूपन code मिलेंगे। और जब आप ऑनलाइन खरीदारी करेंगे, तब ajio को like करके अपने cart को उस उत्पाद से भरें जो आपको पसंद आया हो तब जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन खुद ब खुद सही से उसमे भर देंगे आपके लिए ज्यादा पैसे बचाने वाला कूपन्स उपलब्ध करेंगे। यह आपका समय तथा रूपये बचाएगा और आपको नए पहलुओं से अवगत कराएगा।

Zoutons ने क्रोम एक्सटेंशन को क्यों जोड़ा

जौटोंस में क्रोम एक्सटेंशन को जोड़ना चाहिए था या नहीं ये सोचने से पहले आइये जानते है क्रोम एक्सटेंशन की कुछ अच्छी और खास फायदें. आप इस फायदों को पढ़ें और खुद सोचें यह सही है या नहीं, तो ये रहे वो फायदे-

1. समय बचाता है

सही कूपन्स को खोजना कठिन काम हो सकता है, और इसमें समय भी बर्बाद होता है। कूपन्स के लिए आपको बहुत सारी वेबसाइट पर जाना पडेगा, उत्पादों को देखना पडेगा, कूपन्स code खोजना पड़ेगा और क्या नहीं! पर इस एक्सटेंशन के साथ सारी उत्पाद आपके सामने होंगे। क्रोम में आपके सरे अच्छे डील्स आपकी आँखों के सामने होंगे और आप उसमें से अपने मन पसंद चीजें चुन सकते हैं।

2. हर नए tab के लिया नए ऑफर्स

हम सब कूपन्स और डील्स को पसंद करते हैं, पर किसी के पास उतना समय नहीं होता कि वे एक एक करके सारे डील्स को बार-बार चेक करे। जौटोंस के क्रोम एक्सटेंशन पर आपको हर नए tab को खोलते ही आपके सामने नए ऑफर्स होंगे, आप अपने समय को बचाते हुए अपने उत्पाद को चुन कर खरीद सकते हैं।

3. एक्सटेंशन आपके लिए सबसे अच्छा ऑफर चुनता है

अब वह दिन चला गया जब आपको सौ डील्स में चुनना पड़े। अब समय आ चूका है आप इस वेबसाइट को डाउनलोड करें और खरीदारी करें बिना किसी कूपन्स की खोजबीन किये। यह एक्सटेंशन अच्छे तरीके से कूपन्स को खोजकर आपके सामने रखता है जिससे आप अपनी खरीदारी सही से करें।

4. नए ऑफर्स से अवगत कराना

जब कोई सेल आता है तो हम नयी चीज खरीदने से पहले उसपर लग रहे कूपन्स और डील्स को देखते है। इस एक्सटेंशन पर आपको कूपन्स खोजने की जरूरत नहीं पड़ेगी यह आपको खुद सारी डील्स से अवगत कराता है।

जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन को कैसे पा सकते है –

अगर आप नहीं जानते की इस क्रोम एक्सटेंशन को कैसे उपयोग में लायें, तो घबराये नहीं यह सिर्फ 2 मिनट का काम है. सिर्फ ये कुछ सही कदम लेकर आप इसे आसानी से पा सकते हैं।

1. आप अपने क्रोम ब्राउज़र पर क्रोम वेब स्टोर खोलें

2. आगे, अपने वेब बार पर बाएं कोने पर जौटोंस खोजें

3. इसके बाद आप पायेंगे कि वहाँ जौटोंस कूपंस फाइंडर आ गया है

4. इसे खोलें और इनस्टॉल बटन पर क्लिक करें

5. इसके बाद वह आपसे आपकी अनुमति मांगेगा तब उसे एक्सेप्ट करें

6. ये कदम लेते ही आपके कंप्यूटर में एक्सटेंशन जुड़ जायेगा

तो यह थी कुछ बातें जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन के बारे में। इस पर काम करना बहुत ही आसान और साधारण है, इससे आपका समय भी बर्बाद नहीं होगा और आप अपने लिए खरीदारी भी कर पाएंगे। आप इसे इनस्टॉल करके इसका इस्तेमाल कर सकते है, और अपने लिए काफी अच्छे कूपन्स और डील्स भी पाकर इसका आनंद ले सकते हैं। उम्मीद करती हूँ, कि आपको यह वेबसाइट बहुत पसंद आएगा और आपको इससे आपका मन पसंद सामान सस्ती कीमतों पर पा सकेंगे। और आपको अच्छी डील्स तथा कूपन्स भी मिले।

सौजन्य : collegedunia.com

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GATE 2018 के परिणाम घोषित, स्कोर कार्ड्स मार्च 31 तक उपलब्ध

GATE स्कोर कार्ड 20 मार्च 2018 को आईआईटी गुवाहाटी के आधिकारिक वेबसाइट  http://gate.iitg.ac.in  पर जारी कर दिया गया है। । इसके पूर्व, गेट 2018 का परिणाम 16 मार्च को घोषित किया गया था । 19 मार्च को गेट 2018 प्रश्न पत्र एवं उत्तर कुंजी भी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड की गयी थी| इस वर्ष GATE परीक्षा आईआईटी गुवाहाटी द्वारा आयोजित की गयी थी|

परीक्षा का परिणाम आईआईटी गुवाहाटी ने पूर्व निर्धारित तारीख़, 17 मार्च, से एक दिन पहले ही घोषित कर दिया था| यह परीक्षा भारत और विदेशों में कंप्यूटर आधारित मोड में 3 फरवरी, 4, 10 और 11, 2018 को आयोजित की गई थी। पूरे देश के 199 शहरों और विदेशों में 6 शहरों के परीक्षा केन्द्रों में आयोजित यह परीक्षा 23 विषयों के लिए आयोजित किया गया था|

GATE 2018 की काउंसलिंग एवं अन्य सम्बंधित जानकारी के लिए यहां क्लिक करें..   

उम्मीदवार अपने परिणाम सीधे गेट ऑनलाइन आवेदन प्रसंस्करण प्रणाली (GOAPS) पर प्रवेश कर जांच कर सकते हैं| GATE 2018 के परिणामों की जांच के लिए सीधा इस वेबसाइट पर जाएँ: https://appsgate.iitg.ac.in

उम्मीदवारों अपने नामांकन आईडी, पंजीकरण संख्या और जन्म तिथि का उपयोग कर GATE 2018 के परिणाम का जानने के लिए GOAPS में प्रवेश कर सकते हैं। GATE स्कोर कार्ड्स केवल उन उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध होगा जो कटऑफ अंकों से बराबर या उससे अधिक अंक प्राप्त करेंगे| उम्मीदवार द्वारा प्राप्त अंकों और ऑल इंडिया रैंकों के साथ क्वालीफाइंग अंक परिणाम में प्रदर्शित होंगे| उम्मीदवार GOAPS पोर्टल से 31 मार्च तक गेट 2018 स्कोर कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं।

यदि गेट के योग्य उम्मीदवारों को 31 मई 2018 के बाद और 31 दिसंबर 2018 तक उनके गेट स्कोरकार्ड की सॉफ्ट कॉपी की आवश्यकता होती है, तो उन्हें उसके लिए अतिरिक्त 500 (पांच सौ) फीस देना होगा।

GATE आईआईटी, आईआईएससी, एनआईटी, जीएफटीआई और अन्य विश्वविद्यालयों में एमए / एमटेक और पीएचडी कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर की स्नातकोत्तर प्रवेश परीक्षा है। यह परीक्षा हर वर्ष आईआईएससी बैंगलोर और 7 आईआईटी (बॉम्बे, दिल्ली, गुवाहाटी, कानपुर, खड़गपुर, मद्रास और रुड़की) द्वारा आयोजित की जाती है| GATE कई विकल्प और संख्यात्मक प्रकार के प्रश्नों का एक ऑनलाइन परीक्षा है| ज्यादातर सवाल मौलिक हैं, अवधारणा आधारित, और सोचा उत्तेजक होते हैं। गेट परीक्षा में 3 अनुभाग में विभाजित 65 प्रश्न शामिल हैं –

  • सामान्य योग्यता
  • मइंजीनियरिंग गणित
  • मसंबंधित विषयों से

एक विद्यार्थी केवल एक ही विषय में उपस्थित हो सकता है| GATE स्कोर कार्ड केवल गेट के परिणाम की घोषणा की तारीख से एम.टेक प्रवेश के लिए 3 वर्षों की अवधि के लिए वैध होता है|

GATE 2018 के स्कोर कार्ड्स के फायदे:

  • मास्टर्स और पीएचडी कार्यक्रमों में नामांकन:

आईआईटी बॉम्बे जैसे संस्थानों ने गेट स्कोर के आधार पर स्नातक होने के तुरंत बाद पीएचडी, पीजीडीएम, और पीजीडीआईई कार्यक्रमों के प्रवेश मिलती हैं। कुछ आईआईएम GATE के माध्यम से डॉक्टरेट कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए आरक्षित सीटें रखती हैं|

  • GATE के माध्यम से छात्रवृत्ति:

GATE 2018 के माध्यम से स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों का चयन करने वाले उम्मीदवारों को MHRD – AICTE द्वारा छात्रवृत्ति दी जाती है।

  • PSU(s) में भर्ती:

विभिन्न पीएसयू (पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग) विभिन्न पदों के लिए योग्य उम्मीदवारों की भर्ती करा रहे हैं| उम्मीदवारों को उच्च मुआवजा पैकेज और अन्य लाभ (चिकित्सा लाभ, आदि) की पेशकश की जाती है।

बी. टेक पाठ्यकर्मों में प्रवेश के लिए आयोजित JEE के विपरीत, एम. टेक और पीएच. डी. में प्रवेश के लिए GATE के सफल उम्मीदवारों के लिए कोई सामान्य काउन्सेलिंग नहीं होगी| उम्मीदवारों को गेट के लिए आईआईटी, एनआईटी, आईआईएससी बैंगलोर, जीएफटीआई और अन्य संस्थाओं द्वारा आयोजित अलग काउन्सेलिंग के माध्यम से स्नातकोत्तर कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए आवेदन देना होगा। आईआईटी जैसी संस्थान आम प्रस्ताव स्वीकृति पोर्टल (COAP) के माध्यम से गेट 2018 काउन्सेलिंग करेंगे। इस पर, एक उम्मीदवार को पहले से संबंधित आईआईटी और विभागों में पंजीकरण करना होगा, जिनके लिए वे प्रवेश चाहते हैं।

एनआईटी और आईआईआईटी जैसे संस्थान GATE 2018 की काउन्सेलिंग एम टेक के लिए केन्द्रीकृत काउन्सेलिंग (CCMT) द्वारा करेंगे| यह ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया सारे एनआईटी और कुछ केंद्र सरकार द्वारा वित पोषित संस्थानों जैसे आईआईआईटीएम ग्वालियर, सेंट्रल युनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान, एनआईएफ़एफ़टी राँची, इत्यादि के लिए है| इसी प्रकार अन्य निजी और राज्य सरकारी कॉलेज के अपने अपने काउन्सेलिंग प्रक्रिया होती हैं| काउन्सेलिंग प्रक्रिया प्रायः अप्रैल के महीने से शुरू होती है|

सौजन्य : collegedunia.com

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इकलौती बेटी को पत्रकारिता के दलदल में झोंक कर मैं काफी दुखी हूं

हर पिता से विनती करता हूं कि अपनी बेटी को पत्रकार न बनने दें…

मान्यवर महोदय,

ज्ञात हुआ कि आपके मंच पर पत्रकारिता से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा होती है, इसीके चलते यह पत्र लिख रहा हूं. मेरी आत्मजा मुंबई में करीब साढ़े छह साल काम करने के बाद हाल ही में दिल्ली शिफ्ट हुई. वह टाइम्स ऑफ इंडिया के अखबार नवभारत टाइम्स में काम कर रही है. सोमवार को जब वह अपने दफ्तर में अपने काम में तल्लीनता से लगी हुई थी. तभी, सोनी सर नामक एक व्यक्ति ने उसके सर पर मुक्का मारा.

मुक्का इतना जोर का था कि मेरी लड़की वहीं बिलबिला उठी. जब उसने विरोध किया तो उसे कहा गया कि यह उक्त व्यक्ति का स्नेह जताने का तरीका है. एक 26 साल की लड़की से प्यार जताने की किसी 46 साल के व्यक्ति को क्या आवश्यकता.

बात यहीं खत्म नहीं हुई. जब प्रार्थी की पुत्री ने अपनी बॉस नम्रता मेडम को इस बारे में बताया तो वह कहने लगी कि कौनसा तुम्हारा मोलेस्टेशन हो गया है जो रो रही हो. महोदय क्या पत्रकारिता में लड़कियों को पलख पांवड़े बिछा कर मोलेस्ट होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए?

पुत्री इस वक्त 100.8 बुखार से जूझ रही है. मैं, मेरी धर्मपत्नी, मेरी तीनों बहने, उनके पति, मेरी पत्नी की बहनें और उनके पति सभी काम काजी हैं, क्या हम यह नहीं जानते कि कार्यस्थलों पर इस तरह का व्यवहार नहीं होना चाहिए?

ज्ञातव्य हो कि वह पहला मौक़ा नहीं है जब प्रार्थी की पुत्री के साथ दुर्व्यवहार किया गया हो. करीब तीन महीने पहले जब उसे पीठ का दर्द हुआ तो डॉक्टर के कहने के बावजूद वरिष्ठों के अहम के चलते उसे ‘कुशन’ का प्रयोग तक नहीं करने दिया गया अपितु ‘कुशन’ ले जाने के लिए उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया.

इसके अलावा भी कई किस्से हैं. कुछ महीनों पहले रविवार को अवकाश होने के उपरांत भी मेरी लड़की को रात साढ़े आठ बजे दो खबरे बनाने के लिए उसके इमिजिएट बॉस ने फोन किया, पुत्री ने बताया कि उसे 101 बुखार है, तब भी यह कह कर कि बुधवार को आने वाले मंगलवार एडिशन के लिए चाहिए उससे काम करवाया गया. काम करने में संकोच नहीं है महोदय पर यह खबरे उस बुधवार नहीं बल्कि उसके भी अगले बुधवार को छप कर आई.

अनेकों बार यह कह कर कि तुम तो अकेले रहती हो. पति बच्चें तो है नहीं, उसे बहुत ज्यादा काम दिया गया. जब उसने प्रतिकार किया तो उसे कामचोर या काम न करने की अभ्यस्त कहा गया जिसके चलते उसने चुपचाप सुनना शुरू किया. क्या अपनी पर्सनल लाइफ कुछ नहीं.

उसे बालीवुड का पूरा एक पेज बनाना होता है जिसके लिए मुंबई से छपने वाले एक अखबार से ही सब न्यूज का अनुवाद करके लिया जाता है, यह पूरा अनुवाद उसके जिम्मे रहा. इसके बाद भी यह कह कर कि तुम्हारा अनुवाद सटीक नहीं है, अभ्यास करो और अभ्यास के नाम पर उसे इसी अखबार की बालीवुड से इतर न्यूज का भी अनुवाद करने को दिया जाता जो फेमिना आदि में छप सके. परिस्थिति यह रही कि यदि उन न्यूज का अनुवाद करके दे दिया जाता तो और न्यूज दे दी जाती.

महोदय एक व्यक्ति से रोजाना 5000 शब्द करवाएंगे तो उसकी गुणवत्ता तो प्रभावित होगी ही. गुणवत्ता प्रभावित होने पर फिर प्रताड़ना. साथ ही ऑफिस में थक जाने और घर लाकर वह काम करके देने के बाद यह सूचित करने की मुझे घर पर भी काम करना पड़ रहा है यह कहा जाता, ‘मत करो घर, यहीं बैठे रहो.’

यह तर्क देकर कि वह घर पर क्या करेगी, उसे सुबह आठ बजे ओफिस बुलाया जाता जबकि बाकी सारे लोग साढ़े नौ से दस के बीच आते. इसके उपरांत भी यह लोग तीन बजे चले जाते और प्रार्थी की पुत्री को साढ़े चार -पांच से पहले निकलने का अवसर नहीं मिला. जब उसने इस बात का विरोध जताना चाहा तो यह कहकर कि एक बार डोक्टर के जाने के लिए, एक बार घर पर प्लम्बर आने के चलते तुम दो -ढाई बजे भी तो निकल गई हो, उसे चुप करवा दिया गया.

आज इस बात को लेकर कि मैंने अपनी एक ही बेटी को पत्रकारिता के दलदल में झोंक दिया मैं काफी दुखी हूं और हर पिता से विनती करता हूं कि अपनी बेटी को पत्रकार न बनने दे, क्योंकि रोज दफ्तर से आकर फोन पर फूट फूट कर रोती बेटी को सुनना बेहद तकलीफदेह है.

भवदीय
विद्यारतन व्यास
vidhyaratnavyas@gmail.com

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सूचना विभाग में पदस्थ एक बाबू से परेशान हैं बनारसी टीवी पत्रकार

वाराणसी :  बनारस में बीते रोज 27 मार्च को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक प्रतिनिधि मंडल सूचना विभाग में नियुक्त अनिल श्रीवास्तव के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रति उपेक्षा पूर्ण रवैये के खिलाफ सूचना प्रसारण राज्य मंत्री नीलकंठ तिवारी से मिलने उनके आवास पर पहुंचा. पत्रकारों ने अनिल श्रीवास्तव के रवैये और उनकी दुर्भावना को लेकर अपनी व्यथा मंत्री से बताई. 

बताया जा रहा है कि इसके बाद माननीय मंत्री ने मोबाइल पर अनिल श्रीवास्तव की जम कर क्लास लगाई और अपना व्यवहार  सभी पत्रकारों के साथ एक समान रखने की हिदायत दी. साथ ही मंत्री जी ने एक लिखित शिकायत भी देने की बात इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों से कही ताकि अनिल श्रीवास्तव के खिलाफ विधिक कार्यवाही की जा सके. मंत्री से मिल कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों ने निम्न बातों की शिकायत की…

1 — वीवीआईपी दौरे के समय पास बनाने के नाम पर खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों को परेशान करना

2– कवरेज के दौरान सूचनाओं के आदान प्रदान में लेट लतीफी करना… अक्सर सूचनाएं छिपा लेना

3– पोर्टल के प्रतिनिधियों के संबंध में सीधे मना कर देना जबकि कई पत्रकार कई वर्षों से इसी बनारस में कर्यरत हैं…

4– कवरेज के दौरान मीडिया के प्रतिनिधियों के लिए चाय नाश्ते के लिए फण्ड आता है वो कुछ चुनिंदा प्रिंट के प्रतिनिधियों के साथ बंदरबाट कर लेना और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों को मना कर देना जैसा कि कल राष्ट्रपति महोदय के कार्यक्रम के दौरान देखा गया…

5 – सामान्य दिनों में भी सूचना विभाग के बाबू अनिल श्रीवास्तव जो करीब 15 वर्षों से यहां जमे हुए हैं, उनका व्यवहार सूचना सही समय से देने के मामले में और बात करने के तरीके को लेकर हमेशा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगो के लिए उपेक्षा पूर्ण रहता है…

बनारस के एक टीवी पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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पत्रकारों की लगातार हो रही हत्याओं के खिलाफ एक प्रतिरोध सभा, देखें तस्वीर

देश भर में पत्रकारों की हत्याएं लगातार हो रही हैं. बिहार से लेकर मध्य प्रदेश और कनार्टक से लेकर उत्तर प्रदेश तक में पत्रकार मारे जा रहे हैं, कुचले जा रहे हैं. कलम के सिपाहियों पर हमले भी लगातार जगह जगह हो रहे हैं. इसके खिलाफ पाकुड़ प्रेस क्लब के सदस्यों ने एक प्रतिरोध सभा का आयोजन किया. इसके बाद इन लोगों ने राष्ट्रपति को संबोधित एक ज्ञापन भी प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा.

देखें तस्वीर और पढ़ें ज्ञापन के डिटेल…

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भारतीय रेलवे की मूर्खता का नमूना… Howrah को Hawrah बना दिया

रेलवे वालों को अंग्रेजी में ‘हावड़ा’ शुद्ध नहीं लिखना आता… देखें बानगी… पश्चिम बंगाल में कोलकाता के बाद हावड़ा दूसरा बड़ा और नामी शहर है। एक ट्रेन है शक्तिपुंज एक्सप्रेस… जो मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर से हावड़ा तक जाती है।

अब आश्चर्य की बात कहें या भारतीय रेलवे की अव्वल दर्जे की मूर्खता का प्रमाण, इस ट्रेन में Howrah को Hawrah लिखा गया है। ऐसा एकाध जगह नहीं बल्कि पूरी ट्रेन में स्पेलिंग मिस्टेक की गई है।

मेरी तरफ से रेलवे विभाग और तमाम मंत्रियों को सलाह है कि विभाग में पढ़े-लिखे लोग शामिल करें या जिसको भी इस तरह का काम सौंपे तो कम से कम उसे स्टेशनों की सही स्पेलिंग बता दें।

ऐसा भी किया जा सकता है कि पूरे रेल विभाग के स्टाफ का फिर से नर्सरी में दाखिला करा दिया जाए ताकि उनकी भूल चुकी पढ़ाई-लिखाई फिर से दुरुस्त हो सके।

आशीष चौकसे

पत्रकार

संपर्क : ashishchouksey0019@gmail.com

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टीवी के एक संपादक ने कायम किया इतिहास, लाइव प्रसारण के दौरान नेताओं के पैर छुए, देखें वीडियो

जी बिहार के संपादक स्वयं प्रकाश : पत्रकारिता के पतित पुरुष

जी ग्रुप के रीजनल न्यूज चैनल ‘जी बिहार’ के संपादक हैं स्वयं प्रकाश. इन्होंने हाल में ही चैनल के संपादक पद को सुशोभित किया है. इन्होंने पिछले दिनों अपने रीजनल चैनल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के लाइव प्रसारण में बिहार के सीएम नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सुशील मोदी का पैर छूकर आशीर्वाद लिया.

दरसअल 26 मार्च को जी बिहार चैनल ने पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में ”एक शाम जवानों के नाम” कार्यक्रम आयोजित किया था… कार्यक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को आना था. संपादक महोदय को दोनों नेताओं के आगवानी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. सो, जैसे ही दोनों नेता कार्यक्रम स्थल पर आए, संपादक महोदय ने झट से उनके पैर छूकर आशीर्वाद ले लिया और फिर उन्हें अंदर ले गए…

पूरा वाकये का live प्रसारण हो रहा था… सो उनकी  यह हरकत भी दर्शकों तक पहुंच गयी.. कहा जा रहा है कि संपादक महोदय सरकार से विज्ञापन लेने के लिये एड़ी चोटी एक किये हुए हैं.. लेकिन सरकार का दिल नही पसीज रहा है… अब संपादक महोदय ने राजा के सामने  दंडवत दिया है..देखिये आगे-आगे क्या होता है…  एक दौर था जब संपादक का कद इतना बड़ा होता था कि नेता-मंत्री उनसे मिलने के लिए टाइम लेते थे और संपादक के आफिस आकर मिलने का इंतजार करते थे. अब दौर ऐसा बदला कि संपादक लोग नेता-मंत्री की अगवानी के लिए खड़े होते हैं और नेता-मंत्री के आते ही लपक कर पैर छू लेते हैं…

वाह रे संपादक नामक संस्था / पद का पतन… यूं ही नहीं कहा जा रहा कि मीडिया का ये ‘गोदी’ काल है… जो संपादक नेता-मंत्री के गोद में बैठेगा, उसकी कुर्सी बची रहेगी… जो सच्ची पत्रकारिता करेगा, उसका हुक्का-पानी सत्ता द्वारा बंद कर दिया जाएगा…. स्वयं प्रकाश का नेताओं का पैर छूना पत्रकारिता के गिरते स्तर की बानगी है… शायद टीवी पत्रकारिता के इतिहास में इस तरह की तस्वीर देखने को नहीं मिली हो…

स्वयं प्रकाश ऐसे पहले टीवी संपादक बन गए हैं जिन्होंने अपने ही चैनल के लाइव प्रसारण के दौरान नेताओं के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और इसे लाखों दर्शकों ने देखा… जी बिहार के संपादक स्वयं प्रकाश द्वारा पैर छूने का वीडियो आप जियो टीवी पर आप 26 मार्च की शाम 7 बजे से 7.5 मिनट तक वाले फुटेज में देख सकते हैं… अगर नहीं देख पाए हों या नहीं देख पा रहे हों तो वीडियो देखने के लिए नीचे दिए यूआरएल पर क्लिक करें :

https://youtu.be/0NrfqYEI9K8

कौन हैं ये स्वयं प्रकाश… इनके बारे में ज्यादा जानने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.bhadas4media.com/edhar-udhar/14294-swayam-prakash-zee-bihar-jharkhand

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दुनिया में फिर से शीतयुद्ध शुरू… अबकी जाने क्या होगा अंजाम…

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले हफ्ते जब यह घोषणा की कि वे अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर जाॅन बोल्टन को लाएंगे और माइक पोंपियो को विदेश मंत्री बनाएंगे, तभी मैंने लिखा था कि इन दोनों अतिवादियों के कारण अब नए शीतयुद्ध के चल पड़ने की पूरी संभावना है। इस कथन के चरितार्थ होने में एक सप्ताह भी नहीं लगा। अब ट्रंप ने 60 रुसी राजनयिकों को निकाल बाहर करने की घोषणा कर दी है।

अमेरिका अब सिएटल में चल रहे रुसी वाणिज्य दूतावास को बंद कर देगा और वाशिंगटन व न्यूयार्क में कार्यरत राजनयिकों को यह कहकर निकाल रहा है कि वे जासूस हैं। अमेरिका के नक्शे-कदम पर चलते हुए 21 राष्ट्रों ने अब तक लगभग सवा सौ से ज्यादा रुसी राजनयिकों को अपने-अपने देश से निकालने की घोषणा कर दी है। इन देशों में जर्मनी, फ्रांस, डेनमार्क, इटली जैसे यूरोपीय संघ के देश तो हैं ही, कनाडा और उक्रेन जैसे राष्ट्र भी शामिल है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इतिहास में इस तरह की यह पहली घटना है। किसी एक राष्ट्र का इतने राष्ट्रों ने एक साथ बहिष्कार कभी नहीं किया।

यह कूटनीतिक बहिष्कार इसलिए हो रहा है कि 4 मार्च को ब्रिटेन में रुस के पुराने जासूस कर्नल स्क्रिपाल और उसकी बेटी यूलिया की हत्या की कोशिश हुई। वे दोनों अभी अस्पताल में अचेत पड़े हुए हैं। इस हत्या के प्रयत्न के लिए ब्रिटेन ने रुस पर आरोप लगाया है। रुस ने अपने इस पुराने जासूस की हत्या इस संदेह के कारण करनी चाही होगी कि यह व्यक्ति आजकल ब्रिटेन के लिए रुस के विरुद्ध फिर जासूसी करने लगा था। इस दोहरे जासूस को रुस में 2005 में 13 साल की सजा हुई थी लेकिन 2010 में इसे माफ कर दिया गया था। तब से यह ब्रिटेन के शहर सेलिसबरी में रह रहा था। रुस ने ब्रिटिश आरोप का खंडन किया है और कहा है कि अभी तो इस मामले की जांच भी पूरी नहीं हुई है और रुस को बदनाम करना शुरु कर दिया गया है।

यह सबको पता है कि ब्रिटेन की यूरोपीय राष्ट्रों के साथ आजकल काफी खटपट चल रही है और ट्रंप और इन राष्ट्रों के बीच भी खटास पैदा हो गई है लेकिन मजा देखिए कि रुस के विरुद्ध ये सब देश एक हो गए हैं। जहां तक रुसी कूटनीतिज्ञों के जासूस होने का सवाल है, दुनिया का कौनसा देश ऐसा है, जिसके दूतावास में जासूस नहीं होते ? किसी एक दोहरे जासूस की हत्या कोई इतनी बड़ी घटना नहीं है कि दर्जनों देश मिलकर किसी देश के विरुद्ध कूटनीतिक-युद्ध ही छेड़ दें। रुस के विरुद्ध ट्रंप का अभियान तो इसलिए छिड़ा हो सकता है कि वे अपने आप को पूतिन की काली छाया में से निकालना चाहते हों और रुस के विरुद्ध सीरिया, एराक, ईरान, उ. कोरिया और दक्षिण एशिया में भी अपनी नई टीम को लेकर आक्रामक होना चाहते हों। घर में चौपट हो रही उनकी छवि के यह मुद्रा शायद कुछ टेका लगा दे।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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कोबरा पोस्ट द्वारा न्यूज चैनलों, अखबारों और वेबसाइट्स पर किए गए स्टिंग के सारे वीडियोज देखें

कोबरा पोस्ट की टीम ने अपने ताजे स्टिंग आपरेशन में मीडिया हाउसेज पर डंक मारा है. कई न्यूज चैनल, अखबार और वेबसाइड पेड न्यूज के धंधे में लिप्त हैं. इसका खुलासा कोबरा पोस्ट ने किया है. इस बाबत आज दिल्ली के प्रेस क्लब आफ इंडिया में अनिरुद्ध बहल और उनकी टीम के लोगों ने एक प्रेस कांफ्रेंस किया. इस पीसी में उन्होंने स्टिंग आपरेशन की सीडी दिखाई.

बाद में एक परिचर्चा का भी आयोजन किया गया जिसमें प्रशांत भूषण समेत कई जाने-माने लोग शामिल थे. कोबरा पोस्ट की टीम ने स्टिंग आपरेशन के वीडियोज अपने यूट्यूब चैनल पर डालने शुरू कर दिए हैं.  मीडिया पर किए गए इस स्टिंग की खबर शायद ही किसी चैनल और अखबार में विस्तार से आए, इस कारण यह जरूरी है कि आप सभी सजग पाठक सारे वीडियोज आनलाइन ही देखें और इसे अपने अपने स्तर पर दूसरों तक शेयर करें..

नीचे कोबरा पोस्ट के यूट्यूब चैनल का लिंक है, उस पर क्लिक करें. स्टिंग से संबंधित सारे वीडियोज आप देख पाएंगे…

https://www.youtube.com/channel/UCJbGQNou2GBFAi_fnMP2_4A/videos  

इन्हें भी पढ़ें-देखें :

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कोबरा पोस्ट द्वारा किए गए ‘समाचार प्लस’ चैनल के स्टिंग का वीडियो देखें

यूपी और उत्तराखंड के न्यूज चैनल समाचार प्लस का स्टिंग आपरेशन कोबरा पोस्ट की टीम ने किया. समाचार प्लस चैनल के उत्तराखंड के मैनेजर सेल्स मुकेश बगियाल से कोबरा पोस्ट की टीम मिलती है और हिंदुत्व के एजेंडे समेत कई मुद्दों पर डील करने का आफर देती है जिसने उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया.

इसके बाद कोबरा पोस्ट की टीम समाचार प्लस के नोएडा आफिस जाकर उनके मार्केटिंग हेड अमित त्यागी से मिलती है. इन दोनों से हुई बातचीत से कई बड़े राज खुलते हैं. समाचार प्लस चैनल से जुड़े लोगों के स्टिंग का वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=J3TbL6BtJGk

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कोबरा पोस्ट का डंक इंडिया टीवी, समाचार प्लस, साधना प्राइम, हिंदी खबर, दैनिक जागरण समेत कई मीडिया हाउसों को लगा

कोबरा पोस्ट ने आज प्रेस क्लब आफ इंडिया में मीडिया पर आधारित एक स्टिंग आपरेशन के डिटेल शेयर किए और संबंधित सीडी सबके सामने चलाई. इस स्टिंग आपरेशन का नाम ‘ऑपरेशन 136’ है. इसके तहत कोबरा पोस्ट ने पैसे लेकर खबर चलाने के लिए तैयार कई मीडिया हाउसों का पर्दाफाश किया है.

कोबरा पोस्ट के स्टिंग आपरेशन में यह भी दिखाया गया है कि कई मीडिया समूह हिन्दुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पैसे लेकर राजनीतिक अभियान चलाने को तैयार हैं. कोबरा पोस्ट ने ‘ऑपरेशन 136’ नाम के अपने स्टिंग में दिखाया है कि देश के कई बड़े मीडिया समूह पैसे लेकर खबरें चलाने के लिए तैयार हैं. ये मीडिया हाउस इसके लिए काला धन भी लेने को तैयार हैं.

जो मीडिया समूह पैसे के बदले खबरें चलाने को तैयार थे, उनमें हिंदी न्यूज चैनल ‘इंडिया टीवी’, ‘समाचार प्लस’, ‘साधना प्राइम’, ‘हिन्दी खबर’, हिन्दी अखबार ‘दैनिक जागरण’, नामी वेबसाइट ‘स्कूप हूप’ के नाम शामिल हैं. कोबरा पोस्ट ने इन न्यूज चैनलों, अखबार, वेबसाइट के उच्च प्रबंधन से बातचीत के वीडियो भी साझा किए हैं.

शुरुआती खबर ये है…

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