आज पूरे दस साल हो गए तुम्हारे बिना प्रिय आलोक तोमर!

हरीश पाठक-

मेरे हिस्से का अंधेरा…. आज पूरे दस साल हो गए तुम्हारे बिना प्रिय आलोक तोमर। इन दस सालों में एक बात जो बिलकुल नहीं बदली है तो वह है महाशोक का वह जटिल अंधियारा जो 20 मार्च की दोपहर से शुरू हो कर 21 मार्च की रात एक बजे तक मुझे यादों के उस सघन वन में उतार देता है जहाँ मैं सिर्फ छटपटाता हूँ।

यह मेरे वे कातर क्षण होते हैं जहाँ मेरी आवाज, मुझसे ही टकराकर लौटती है। बीच में वे क्षण डूबने के लिए उबरते हैं,जो पल हमने साथ साथ जिये।सपनोँ के, हकीकत के, झगड़ों के, सुलह के, सफलता के, असफलता के और अंत में सिर्फ मेरे ही हिस्से आया वियोग का, विछोह का करुण छोर।यह मेरा ही दुर्भाग्य है। क्या करें?

यह दोनों दिन यानी 20 मार्च यानी जिस दिन तुम हम सबसे जुदा हो गए और 21 मार्च जिस दिन दिल्ली के लोधी रोड स्थित श्मशान गृह में तुम धीरे धीरे राख में तब्दील हो गए।न तब यकीन था,न अब है कि तुम एकदम से खामोश कैसे हो सकते हो।यह तो तुम्हारी फितरत कभी नहीं रही?

पर यकीन करना पड़ा। स्तब्ध मुद्राएं अब भी हैं पर परछाइयों के सहारे कौन, कब तक चल पाया है। उस दिन से आज तक इन दस सालों की 20 और 21 मार्च मेरे शोक के,यादों के वे काले दिन होते हैं जहां सिर्फ मैं तुमसे बतियाता हूँ,बतियाता रहूंगा।सम्वाद कैसे टूटेगा मेरे अजीज? मेरे हमनवां?

वह साल था 2011 और तारीख थी 20 मार्च। उन दिनों मैं पटना में ‘राष्ट्रीय सहारा’ का स्थानीय संपादक था। तुम कैंसर से अंतिम लड़ाई लड़ रहे थे। जब मैं पटना से चला तो न जाने क्यों मेरा मन 19 मार्च को तुम्हारी आवाज खासतौर पर ‘हरिज्जी, इस बार मौत को मुक्का मारूँगा’ जैसा सम्वाद सुनने को था, जो तुम इस बीमारी के दिनों में अकसर मुझसे कहते थे।

पर मेरी सारी चेतना उस क्षण गायब हो गयी जब मुझे यह महसूस हुआ कि तुम बोलना तो चाह रहे हो पर आवाज तुम्हारा साथ नहीं दे रही है। यह अशुभ संकेत था। यह खत्म होते रिश्तों का वह सूचकांक था जिस पर स्तब्ध ही हुआ जा सकता था। रोया भी जा सकता था। मेरे साथ यही हुआ।

आया होली मनाने था। 20 मार्च की उस दोपहर मुम्बई के घर में अटैची रखी ही थी कि दो फोन एक साथ बज रहे थे। दोनों पर खबर एक ही थी- आलोक नहीं रहा। आज दोपहर बत्रा हॉस्पिटल में उसका निधन हो गया।एक फोन पर राहुल देव थे,दूसरे पर अरुण तोमर।राहुल देव कह रहे थे,’इतनी देर से फोन लग ही नहीं रहा है’।हिचकियों के बीच में टुकड़ा टुकड़ा था,’जहाज में था।मुम्बई आया हूँ।’कल सुबह की फ्लाइट ले लो 11 के आसपास सीधे लोधी रोड श्मशान गृह आ जाना।’

यह 21 मार्च की दोपहर थी।जगह थी लोधी रोड का श्मशान। उस आलोक को किसने चाहा था जो मेरे सामने बहुत खामोशी से लकड़ियों पर लेटा था जैसे कोई फर्स्ट पेज की लीड दे कर आराम कर रहा हो। चीत्कार के महा स्वर में वे चेहरे भी थे जो अब अतीत बन गए हैं। मम्मी (उर्मिला तोमर) का आर्तनाद, पापा (भारत सिंह तोमर) का अचानक मेरे हाथों पर झूल जाना। सुधीर तैलंग का दिलासा भरा हाथ, शिरीष चन्द्र मिश्र, ज्योतिर्मय, दिनेश तिवारी—वे सब भी अब सिर्फ यादों में ही रह गए हैं।और यह यादें हमें बहुत बहुत रुला रही हैं।

वाया चितरंजन पार्क 21 मार्च की उस रात मैं वापस मुम्बई लौट तो आया था पर मम्मी की कराहों और तस्वीर में फूलमाला से ढका तुम्हारा गला मुझे चिड़ा रहा था।इस आलोक को किसने चाहा है। वह तो मालाओं से इतर का राजकुमार था। अक्षरों का बादशाह। मम्मी ने एक मुड़ा तुड़ा कागज मुझे दिया वह तुम्हारी अंतिम कविता ‘काल तुझसे होड़ है मेरी’ थी।

मुम्बई घर आया तो एक जानलेवा सन्नाटा वहाँ पसरा था। मेरा मन कभी श्मशान, तो कभी ग्वालियर में भटक रहा था औऱ सामने खड़ी मेरी पत्नी यानी तुम्हारी गुड्डो दीदी रुआंसी आवाज में पूछ रही थी, ‘अब आलोक कभी नहीं मिलेगा?’

दो जोड़ी आंखों से बहनेवाले आँसू इसकी गवाही दे रहे थे।
-‘अब कहाँ? उसे तो मैंने राख होते देखा है।’ नेपथ्य से उभर रहा था। अलविदा साथी। अलविदा।

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