अमित शाह मामले में उलटा पड़ा सपा का दांव, भाजपा को मिला ध्रुवीकरण का मौका

उप-चुनाव से ठीक पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ मुजफ्फरनगर की कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल करके अखिलेश सरकार ने भगवा खेंमे को वोटों के ध्रुवीकरण का एक और मौका थमा दिया। यह तब हुआ है जबकि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व पहले से ही फायर ब्रांड नेत्री साध्वी उमा भारती, निरंजन ज्योति, साध्वी डॉ. प्राची, साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ के सहारे उप-चुनाव में हिन्दुत्व का कार्ड खुल कर खेल रही थीं। लोकसभा चुनाव के समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरपुर में दिये गये अमित शाह के विवादित भाषण के खिलाफ उप-चुनाव से तीन दिन पूर्व आरोप दाखिल किया जाना, महज इतिफाक नहीं कहा जा सकता है। जरूर इसमें कहीं न कहीं अखिलेश सरकार की रजामंदी छिपी रही होगी। पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल करने में काफी चपलता दिखाई थी, जिसके कारण उसे कोर्ट की फटकार भी खानी पड़ी।

पुलिस की कार्यशैली से ऐसा लग रहा था कि शायद उसे पहले से ही इस बात का अहसास हो गया था कि सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी इसे चुनावी मुद्दा बनाने को उतावली है। अगर ऐसा न होता तो अदालत जांच अधिकारी को आरोप पत्र की खामियां गिनाते हुए फटकार नहीं लगाती। इतना ही नहीं अदालत ने चार्ज शीट लौटाते हुए पुनःसुधार कर चार्जशीट दाखिल करने की भी बात कही। पुलिस की लापरवाही के चलते अखिलेश सरकार की अच्छी खासी किरकिरी हो गई और इसका फायदा भी पार्टी को नहीं मिला।

बल्कि भाजपा उलटा सवाल दागने लगी कि जब लोकसभा चुनाव के दौरान विवादित भाषण देने के लिये नौ नेताओं को चुनाव चुनाव आयोग ने नोटिस दी थी तो फिर समाजवादी सरकार ने बाकी आठ नेताओं के खिलाफ किस आधार पर कार्रवाई करना उचित नहीं समझा। जो अन्य प्रमुख नाम थे, उसमें कांग्रेस के राहुल गांधी, बेनी प्रसाद वर्मा, सलमान खुर्शीद, सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, आजम खां और आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल प्रमुख थे। अमित शाह ने तो अपने किये के लिये चुनाव आयोग से माफी भी मांग ली थी, लेकिन आजम खां गलती मानने की बजाये अपनी बात पर अड़े रहे थे, जिसके चलते आजम चुनाव प्रचार भी नहीं कर सके थे।

इसे प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि उत्तर प्रदेश में उप-चुनाव की जंग विकास की बजाये वोटों के ध्रुवीकरण के सहारे लड़ी गई। भाजपा को मोदी सरकार की उपलब्धियों पर भरोसा नहीं था तो समाजवादी पार्टी भी अपनी सरकार के विकास कार्यो की चर्चा नहीं करना चाहती थी, जबकि दोनों ही दलों के नेता समय-बेसमय अपनी-अपनी सरकारों के विकास कार्यो की तारीफ के पुल बांधते थकते नहीं हैं। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान मंदिर से लाउडस्पीकर उतारने, साम्प्रदायिक हिंसा, लव जेहाद, मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में होते हैं ज्यादा दंगें, मोदी के झूठ, मुलायम का लड़कों से ‘गलती हो जाती है’ वाला बयान, मुलायम की बेटी से रेप होता तो, धर्मांतरण से लेकर जोधाबाई, चंद्रगुप्त मौर्य तक पर चर्चा होती रही।

विवादित बयान देने के मामले में इस बार सबसे अधिक सुर्खिंयां योगी आदित्यनाथ ने बटोरी। उन्हें चुनाव आयोग ने नोटिस भी दी, लेकिन न तो वह रूके, न ही ठिठके। लखनऊ में तो प्रशासन से अनुमति नहीं मिलने के बाद भी जनसभा कर डाली। यह हाल तब था जबकि प्रदेश की 21 करोड़ जनता जनता केन्द्र की मोदी और यूपी की अखिलेश सरकार से जानना और समझना चाहती थी कि उसने मंहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बिगड़ी कानून व्यवस्था, आतंकवाद, सूखा, बाढ़, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार आदि जनसमस्याओं को लेकर अब तक क्या किया है। शायद सभी दलों के नेताओं को पता है कि जब साम्प्रदायिकता और विद्वेष फैलाकर शार्टकर्ट से चुनाव जीता जा सकता है तो फिर वह लम्बी प्रकिया से क्यों गुजरें। तमाम विवादित बयानों के बीच बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपा को दंगाराज और सपा को जंगलराज पार्टी करार दे दिया है।

बहरहाल, 13 सितंबर को 11 विधान सभा और एक लोकसभा सीट के लिये होने वाला चुनाव प्रचार 11 सितंबर की सांय पांच बजे थम गया है। जुबानी जंग के बाद अब नेता वोटरों को निकालने की रणनीति बनाने के अभियान में जुट गये हैं। 16 तारीख को नतीजे आयेंगे तब पता चलेगा कि किसी हांडी में कैसे चावल पके। हां, अबकी से भाजपा के प्रचार अभियान में यह बदलाव जरूर देखने को मिला कि पूरे अभियान के दौरान बीजेपी के साधू-संत फ्रंट पर रहे, अन्य नेता उनके पीछे खड़े दिखाई दिये।

 

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं और यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं। अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं।

 

 



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