ऑक्सीजन ख़त्म होने से बत्रा अस्पताल में धड़ाधड़ होने लगी मौतें

रवीश कुमार-

दिल्ली के बत्रा अस्पताल में आक्सीजन की कमी से 8 लोगों की मौत… आम लोगों की ज़िंदगी से राजनीति तमाशे का खेल खेल रही है। अब कब आप लोग जनता बनेंगे। कब तक पार्टी का समर्थक बने रहेंगे। दिल्ली के बत्रा अस्पताल में आठ लोगों की मौत इसलिए हो गई कि आक्सीजन नहीं था। यह कैसा समाज है, किसका देश है यह।

यह तमाशा कब तक चलेगा। जो मरे हैं क्या वो एक पार्टी के रहें होंगे? क्या इसकी माफ़ी दी जा सकती है कि आक्सीजन की कमी के चलते 8 लोगों की मौत हो गई? क्या वो परिवार कभी इस सदमे से उबर पाएगा? भयानक है यह तो। किसके लिए लिखा जाए और किससे बोला जाए।

राजनीति निर्लज्ज हो चुकी है। कई दिनों से कोर्ट में दिल्ली और केंद्र के बीच बहस चल रही है। आक्सीजन का कोटा और कोटे के हिसाब से आक्सीजन के न मिलने को लेकर। कोर्ट में बहस चलती रही और आठ लोग मर गए। आम लोग कहां जाए। किस पर भरोसा करे।


प्रीति नाहर-

2 घंटे पहले से ही SOS कॉल दी गई थी। बत्रा अस्पताल में 8 लोग ऑक्सीजन न मिलने की वजह से मर गए जिनमें से अस्पताल के ही एक डॉक्टर भी शामिल हैं। इनकी ऑक्सीजन की कमी से मौत हो गई। अभी भी अस्पताल में Oxygen Crisis चल रहा है। भलाई की क्रेडिट लेने में कोई पीछे नहीं रहेगा कुछ दिन बाद लेकिन इन मौतों की जिम्मेदारी लेने वाला है कोई?


गिरीश मालवीय-

ऑक्सीजन की कमी से हुई मौत की खबरों को किस तरह से सेंसर किया जा रहा है आप खुद देखिए…

एक घण्टे पहले बत्रा अस्पताल के अधिकारियों ने दिल्ली हाईकोर्ट में यह बताया कि वह आज सुबह 6 बजे से ही ऑक्सीजन के संकट से जूझ रहे थे। अस्पताल में 307 मरीज भर्ती थे, जिनमें से 230 को ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया था। उसके पास ऑक्सीजन का पूरा स्टॉक खत्म हो गया …जिसके चलते 8 मरीजों की जान भी चली गई, जिसमें उसके डॉक्टर RK हिमथानी भी शामिल हैं।

उसके बाद यह खबर मीडिया में आयी है !…. क्या दिल्ली के किसी पत्रकार को यह खबर पता नही चल पायी होगी कि बत्रा हॉस्पिटल में हालात इतने बिगड़ गए हैं और लोग वहां मर रहे हैं लेकिन कोई हेडलाइन नही चली !……, यानी अगर बत्रा हॉस्पिटल के अधिकारी अपना बयान दिल्ली हाईकोर्ट के सामने दर्ज नही करवाते तो यह खबर बाहर भी नही आती…….

लगता है आपातकाल से भी बुरे हालात हो गए हैं।


शीतल पी सिंह-

दिल्ली हाईकोर्ट ने कोरोना मामलों की सुनवाई के दौरान आज केंद्र के ख़िलाफ़ रुख़ और कड़ा कर दिया!

चेतावनी देते हुए केंद्र को कहा कि यदि आज दिल्ली को उसके लिये अलाट 490 टन आक्सीजन नहीं मिली तो केंद्र के ख़िलाफ़ कंटेम्प्ट आफ कोर्ट चलेगा!

अज्ञात वजहों से केंद्र दिल्ली में आक्सीजन सप्लाई में अड़चनें डाल रहा है और आज भी दिल्ली के दो अस्पतालों में दर्जनों लोगों की आक्सीजन ख़त्म हो जाने से जान जाने की खबर है ।

इसके पहले मशहूर अस्पताल गंगाराम में चौबीस मरीज़ों की आक्सीजन ख़त्म होने पर जान गई थी ।

हाईकोर्ट रोज़ाना आक्सीजन सप्लाई पर सुनवाई कर रहा है जिससे पता चला कि दिल्ली को केंद्र सरकार द्वारा पहले तो मात्रा ही कम अलाट की गई , और फिर अलाटेड मात्रा की सप्लाई भी पूरी नहीं की गई । जबकि कुछ अन्य राज्यों को ठीक इसी समय अलाटेड मात्रा से कहीं ज़्यादा आक्सीजन सप्लाई की गई ।

दिल्ली में देश के सबसे बड़े और प्रसिद्ध अस्पताल हैं , सीमावर्ती राज्यों से हज़ारों मरीज़ों की यहाँ रोज़ आवाजाही रहती है । कोरोना के दौरान यह क्रम और बढ़ गया है । दिल्ली के अस्पतालों के सामने उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से मरीज़ों को लेकर आई एंबुलेंसों की क़तार कई मीडिया रिपोर्टों का विषय बनी हैं ।

संजय कुमार सिंह-

दिल्ली के बत्रा अस्पताल में फिर 12 लोगों की मौत ही गई। यह दिल्ली के अखबारों के लिए आज निश्चित रूप से सबसे बड़ी खबर है। जो खबरें हैं उनके आलोक में इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता है। इस खबर के शीर्षक में ‘फिर‘ पूरी खबर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड नहीं है। वहां मतगणना की खबर लीड है। ऑक्सीजन से मौत की खबर का शीर्षक है, ऑक्सीजन कम हो जाने से 12 मरे इनमें सीनियर डॉक्टर भी कहने की जरूरत नहीं है कि देश की राजधानी में इतने हंगामे के बाद कुछ ही दिन के अंतराल पर ऑक्सीजन की कमी से एक दो नहीं 12 मरीजों की मौत हो गई और अखबार बता रहा है कि मरने वालों में सीनियरक डॉक्टर भी हैं। बाकी सब तो ऐसे जैसे बहुत आम बात हो। हालांकि, आम बात हो ही गई है। लेकिन क्या इस पर कोई चिन्ता नहीं करतनी है? जो चल रहा है वह सामान्य है और स्वीकार कर लिया जाना चाहिए? टाइम्स ऑफ इंडिया में भी इस खबर का शीर्षक आम है। द हिन्दू में ‘फिर‘ की जगह अंग्रेजी के मोर यानी ‘और‘ है। अकले इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक में अंग्रेजी के अगेन यानी ‘फिर‘ शब्द का उपयोग किया गया है।

ऑक्सीजन की कमी से बत्रा अस्पताल के अलावा गुड़गांव में छह, उत्तर प्रदेश में 31, आंध्रप्रदेश के दो अस्पतालों में 16 व्यक्तियों की मौत हुई। इनमें दिल्ली के 12 जोड़ दिए जाएं तो देश भर में ऑक्सीजन की कमी से एक दिन में 65 व्यक्तियों की मौत हुई। यह संख्या किसी भी तरह से सामान्य नहीं है पर दिल्ली के 12 को अलग करके छापा गया है। बाकी खबरें अलग–अलग टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर हैं। मैं नहीं जानता कि यह इरादतन है या किसी मजबूरी के कारण लेकिन यह भी टाइम्स ऑफ इंडिया में ही है। आपको याद होगा कि महाराष्ट्र में कोरोना बढ़ रहा था तो अखबारों में पूरे राज्य का विवरण कितनी प्रमुखता से छप रहा था। अब देश भर में ऑक्सीजन की कमी से मरने वालों की एक खबर किसी एक अखबार में दिखी क्या?

सरकार का प्रचार करने वाले दिल्ली के इन अखबारों में जीएसटी वसूली बढ़ने की खबर पहले पन्ने पर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सिंगल कॉलम में है लेकिन बाकी के तीन अखबारों – हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू में दो कॉलम में है। टाइम्स ऑफ इंडिया को छोड़कर बाकी के दो अखबारों – हिन्दुस्तान टाइम्स ऑफ इंडियन एक्सप्रेस में यह सरकारी प्रचार बाईलाइन के साथ है और द हिन्दू में विशेष संवाददाता ने की है यानी करवाई गई है। होने को तो यह सरकारी विज्ञप्ति है पर उसे बाईलाइन या विशेष संवाददाता से करवाने का मतलब है खबर को महत्व देना या मांगा जाना। कई कारणों से यह खबर प्रचार है और पहले पन्ने के लायक नहीं है। और एक कारण इंडियन एक्सप्रेस ने एक्सप्लेन्ड में बताया है। इसके अनुसार, महामारी के कारण छोटे असंगठित विक्रेता कारोबार से बाहर हो गए हैं। उनकी जगह संगठित क्षेत्र के बड़े कारोबारियों ने ली है जो टैक्स की जद में हैं।

स्पष्ट है कि इससे उपभोक्ता को जो सामान पहले बिना टैक्स के मिल जाते थे वे अब टैक्स देकर ही मिलते हैं। महामारी में यह जबरन वसूली की तरह है और इसमें प्रचारित करने लायक कुछ नहीं है लेकिन सरकार इसकी आड़ में दावा कर रही है कि इससे आर्थिक स्थिति सुधर रही है। सरकार और सरकारी पार्टी की ऐसी घोषणाएं हवा हवाई साबित होती रही हैं पर मीडिया को ऐसी प्रचार वाली खबरें छापने से कोई परहेज नहीं रहा। ना वे बाद में ऐसी खबरों की पोल खोलते हैं। जीएसटी वसूली बढ़ने की खबर को सरकार एक अभियान की तरह छपवा रही है और अमूमन बिजनेस पन्ने पर छपने वाली खबर पहले पन्ने पर छप रही है।

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